Srimad Bhagavatam Series- #11- Story of Lord Rama
27:03This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Description of Lord Ramacandra's Pastimes.
- Reason for Lord Rama's appearance – Narada Rsi's curse to the Lord. Once Narada Rsi had the pride that he had won over Kamadeva. He approached Narayana and wanted to marry one princess. Lord Narayana wanted to save Narada so gave him a monkey face. During the marriage ceremony, the princess (who was actually Laksmi) married Narayana. Seeing this, Narada Rsi cursed Narayana that ‘I am crying because of you today; you will also cry for a lady.”
- Brief about the birth of Lord Rama, His marriage and exile to the forest.
- During the exile, Rama stayed under a banyan tree near Bihar and Bengal.
- When Rama and Sita reached Navadvipa dhama, Lord Rama explained to Sita that, "Here I will take birth as Gauranga and you will come as Visnupriya in Kaliyuga."
- Rama then talked about whatever will happen further in Ramalila.
- When Rama left Sita then Rama did yajna (fire sacrifice) with golden deities of Sita.
- Luv and Kusa came and recited Ramanaya in the assembly.
- Luv and Kusa informed their mother (Sitaji) that they saw Her (Sita's) deities also in the assembly.
- Lord Rama paying off Sitaji's debt in Mahaprabhu pastimes.
Transcript
श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 11 : भगवान् राम की कथा
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 30 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्जीकरण करें।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हम लोगों ने] श्रीमद्भागवत से श्रीरामचन्द्रजी की लीलाओं का श्रवण किया। संक्षेप में ही, किन्तु श्रीमद्भागवत में सारस्वरूप राम की लीलाओं का वर्णन किया गया है। मैं भी संक्षेप में, इसमें जो उपदेशात्मक बातें छिपी हैं, उनमें से कुछ बतलाने की चेष्टा करूँगा।
आप लोगों ने सुना कि नारदजी को कुछ अभिमान [हो गया] था। अभिमान तो नहीं, किन्तु रामचन्द्रजी का अवतरण करने के लिए उनके हृदय में अभिमान आया— “मैंने कामदेव को भी वशीभूत कर लिया।” और इस प्रकार से वे शंकरजी और ब्रह्माजी के पास गये। उन लोगों ने मना किया, तो भी वे प्रभु के पास में गये और कहा— “प्रभु! आपकी कृपा से मैंने कामदेव को जीत लिया।”
प्रभु ने कहा— “तुम्हारे जैसा भक्त पृथ्वी पर हमारा और कोई नहीं है।” किन्तु प्रभु ने सोचा कि इसकी चीर-फाड़ करनी होगी, अभिमान को निकालना होगा। इसलिये जब नारदजी वीणा बजाते हुए पृथ्वी लोक में आये, [तब प्रभु ने] अपूर्व सुन्दरी लक्ष्मीजी को ही एक दूसरी राजकुमारी के रूप में जगत् में भेजा। उनका स्वयंवर हो रहा था। राजा ने नारदजी से अपनी बेटी का हाथ देखने को कहा और उसे देख करके वे मुग्ध हो गये [और सोचने लगे]— “यह तो त्रिभुवन सुन्दरी है! यह लड़की जिसको पति के रूप में वरण करेगी, वह तो विश्व-ब्रह्माण्ड का स्वामी हो जायेगा, अजर-अमर बन जायेगा।” [तब उनके मन में उस राजकुमारी से] स्वयं विवाह करने की लालसा हुई। [तब उन्होंने] प्रभु से कहा— “मुझे अपना सुन्दर रूप दे दीजिये।”
प्रभु ने कहा— “तेरा मङ्गल हो, मैं वैसा ही करूँगा।” किन्तु उन्होंने उन्हें बन्दर का जला हुआ मुख दे दिया। फिर नारदजी उस राजकुमारी के आगे बार-बार मुँह ऐसा करते, अपना गला देते कि मुझे यह जयमाला पहना दे” और वह नाक सिकोड़कर दूसरी ओर चली जाती। जैसे ऊँट को नकेल देकर घुमा देते हैं, उसी प्रकार से नारदजी को चारों ओर घुमा दिया गया।
शंकरजी के परिकर लोग इनकी हँसी उड़ाने लगे और बोले— “वाह! वाह! वाह! कैसा सुन्दर रूप है, अपूर्व! जरा दर्पण में तो देखिये!” इतने में भगवान् विष्णु स्वयं वहाँ आये और [उस राजकुमारी ने] इनके गले में जयमाला डाल दी, और वे सबके देखते-देखते उसे लेकर गरुड़ [पर बैठकर] चले गये।
तब नारदजी ने कहा— “अरे! आगे नाथ न पीछे पगहा, परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई [#1] अच्छा! मैं इनको शिक्षा दूँगा।” यह सोचकर वे भगवान् के लोक में गये और उनसे कहा— “जिस प्रकार आपने मुझे स्त्री के फेर में रुलाया, [उसी प्रकार] आपको भी इसीके फेर में, चक्कर में पड़ करके रोना पड़ेगा।”
भगवान् ने कहा— “एवमस्तु!” और अपनी माया को हटा लिया। [तब नारदजी ने] देखा— “अरे! यह क्या?” वे [तत्क्षणात् भगवान् के] चरणों में गिर पड़े।
प्रभु ने कहा— “मेरी इच्छा थी कि मैं जगत् में कुछ ऐसी मार्मिक लीलाएँ करूँगा, जिन्हें लोग श्रवण करेंगे; और श्रवण करके सब समय भाव में विभोर रहेंगे, मेरे लिए रोयेंगे, और [इस प्रकार] उनका सहज ही उद्धार हो जायेगा।”
प्रभु चार रूपों में आये— राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। वे विश्वामित्र के साथ में गये और ताड़का तथा सुबाहु को मारा। उन्हें मार करके वे जनकपुर में गये। बीच में उन्होंने अहिल्या का उद्धार किया—[अपने चरण से] स्पर्श किया और साथ-साथ वह परम सुन्दरी—देवी होकर अपने पति के पास पहुँच गयीं। [फिर वे] जनकपुर में गये और वहाँ पर हजारों लोग जिस धनुष को उठा करके इधर-उधर नहीं कर सकते थे, उसे [प्रभु ने] किस प्रकार से पलभर में ही उठा लिया और उसके तीन खण्ड कर दिये। प्रचण्ड शब्द हुआ। [यह सुनकर] परशुरामजी आये और उनसे बातें हुईं। किस प्रकार से प्रभु ने उनको पराभव (पराजित करके या उनका गर्व तोड़) करके उनकी सारी शक्ति अपने अन्दर में ले ली।
अन्त में वे अयोध्या में [लौट] आये। महाराज [दशरथ] ने उनको देख करके युवराज पद देना चाहा। सब तैयारियाँ हो गयीं। भरत और शत्रुघ्न [उस समय] ननिहाल में थे, उनको भी सूचना नहीं दी गयी। दूसरे ही दिन, रामनवमी के शुभ अवसर पर, वसन्त ऋतु में उनके अभिषेक की व्यवस्था की गयी। उसी समय कैकेयी—जो उनको प्राणों से [अधिक] प्यारी थीं और प्राणों से भी अधिक राम को प्रेम करती थीं—भगवान् की कुछ योगमाया के प्रभाव से उन्होंने [रामजी के लिए] चौदह वर्ष का वनवास और भरतजी के लिए राज्य माँगा और [फलस्वरूप रामचन्द्रजी, सीता और लक्ष्मण] वन में चले गये। आप लोगों ने ये सभी लीलाएँ सुनी हैं।
वन में जब गये, तो चलते-चलते, चलते-चलते गङ्गा और यमुना को पार किया और पार करके कहाँ-कहाँ सब देश में गये। भारतवर्ष में वे सर्वत्र गये। गङ्गा के किनारे चलते-चलते वे एक बड़े सुन्दर रमणीय वन में पहुँचे। वहाँ पर एक बहुत ही सुन्दर वट का वृक्ष था। और यह [स्थान] कहाँ था? गङ्गा जहाँ समुद्र में गिरती हैं, उससे थोड़ी देर पहले के [प्रदेश को] ‘बङ्ग’ कहते हैं। वे ‘अङ्ग’ [देश को] पार हो करके ‘बङ्ग’ में गये। अङ्ग किसको कहते हैं? बिहार को। और बङ्ग होता है—बङ्गाल, किन्तु उसका नाम बङ्ग था।
गङ्गा के किनारे पहुँचते हुए वे एक अत्यन्त रमणीय स्थान पर पहुँचे। वहाँ देखकर [उन्होंने कहा—] “स्थल तो बड़ा ही रमणीय है।” चारों ओर से गङ्गा ने उसे [इस प्रकार से] घेर रखा था कि नौ द्वीपों (Nine Island) के जैसा बना हुआ था—परम सुन्दर। कोयलें कुहुक रही हैं, आम्रकुञ्ज बने हुए हैं, कटहल के सुन्दर-सुन्दर कुञ्ज बने हैं, और बेली-चमेली तथा अनेक प्रकार के सुन्दर-सुन्दर [ऐसे] फूल वहाँ [खिले थे,] जो यहाँ नहीं मिलते।
जब वे वहाँ गङ्गा के किनारे एक वटवृक्ष के नीचे पहुँचे, तो [रामचन्द्रजी] ने लक्ष्मणजी से कहा— “यहाँ पर पर्णकुटी बनाओ; हम लोग कुछ दिन इस रमणीय स्थान में वास करेंगे।” कुछ दिन वहाँ रहते-रहते, एक दिन जब लक्ष्मणजी कहीं बाहर गये हुए थे, तब उस समय रामचन्द्रजी ने मन्द-मन्द मुस्कान के साथ सीताजी की ओर बड़े गौर के साथ में देखा।
सीताजी ने कहा— “प्रियतम! आप किसलिये हँस रहे हैं? क्या बात हो गयी?”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “कोई बात नहीं।”
सीताजी ने कहा— “नहीं, अवश्य कुछ बात है।”
जब वे बार-बार पूछने लगीं, तब रामचन्द्रजी ने कहा— “देखो, यह स्थान परम रम्य है। मैं यहीं पर फिर एक समय ब्राह्मण कुल में जन्म लूँगा और तुम भी ब्राह्मणी कुल में जन्म लोगी। तुम्हारा नाम होगा विष्णुप्रिया, और मेरा नाम होगा गौराङ्ग।”
फिर उन्होंने कहा— “देखो, इस रमणीय स्थान में मैं विविध प्रकार की लीलाएँ करूँगा और बीच में मैं संन्यास ले लूँगा। तुम्हें और अपनी मैया को रुलाते हुए, संन्यास ले करके फिर मैं समुद्र के किनारे किसी दूसरे स्थान पर चला जाऊँगा। तुम मेरे विरह में तड़पोगी, मेरी मैया भी तड़पेंगी, और मैं ‘कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण!’ [कहते हुए,] इस प्रकार से विरह में तन्मय होकर ऐसी [लीलाएँ] करूँगा।”
[सीताजी ने] कहा— “ऐसा क्यों होगा?”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “अरे सुनो, अभी कथा समाप्त नहीं हुई है। देखो, अभी हम लोग वन में जा रहे हैं न—अभी आगे जायेंगे। अभी तो यह प्रथम वर्ष है। यहाँ से हम लोग [आगे बढ़ेंगे।] अभी हम चित्रकूट से आ रहे हैं और दण्डकारण्य की ओर जा रहे हैं। वहाँ पर हम लोग आठ-नौ वर्ष रहेंगे, दस वर्ष रहेंगे और इधर-उधर घूमेंगे। और उस समय रावण तुम्हें चोरी करके मुझसे ले करके चला जायेगा। उस समय तुम्हारे विरह में मैं पागल हो जाऊँगा। ‘हा सीते! हा सीते!’ कहते हुए मैं वृक्षों को गले लगा करके पूछूँगा, हिरणियों से पूछूँगा और मैं एकदम पागल हो जाऊँगा। लक्ष्मण भी मुझको सान्त्वना नहीं दे सकेगा, वह भी मेरे विरह [को देखकर] रोयेगा और हम इस प्रकार से घूमेंगे।”
तो उस समय में… यह तो थोड़ी-सी [बात] हुई। इसके बाद फिर मैं जाऊँगा, रावण को वंश सहित मार करके तुमको लेकर आऊँगा। किन्तु उसके बाद, जब मैं पृथ्वी पर ग्यारह हजार वर्ष राज्य कर चुका होऊँगा, और [अन्त में] पाँच, सात या दस वर्ष रह जायेंगे, उस समय मैं तुम्हें फिर छोड़ दूँगा। मैं राजमहल में रहूँगा और तुमको वन में भेज दूँगा। तुम वाल्मीकि के आश्रम में रहोगी। वहाँ रह करके तुम मेरे विरह में तड़पती रहोगी, और मैं भी अयोध्या के राजमहल में विरह में तड़पूँगा। मैं देखूँगा कि तुम चटाई बिछाकर सो रही हो, तो मैं भी राजमहल में पलङ्ग इत्यादि हटवा करके चटाई बिछा करके [रहूँगा] और फिर मैं सब [राजकीय] कपड़े-लत्ते हटा करके साधु-सन्तों के जैसा रहूँगा।
किन्तु एक बात है, तुम्हारे पास हमारे दो पुत्र रहेंगे और तुम वाल्मीकिजी के आश्रम में रहोगी। वे तुमको सान्त्वना देंगे, किन्तु मुझे सान्त्वना देनेवाला कोई नहीं होगा। मैं भीतर-ही-भीतर घुट-घुट करके मरूँगा। अन्त में, जब मुझसे नहीं रहा जायेगा, तो मैं तुम्हारी सोने की मूर्ति [बनवाकर] अपने पास रखूँगा और उसीकी पूजा करूँगा। किन्तु लोगों के सामने तो मैं मर्यादा को भङ्ग नहीं कर सकता। उस समय लोग तुम्हारी निन्दा करेंगे। अरे, एक धोबी [अपनी पत्नी से] कहेगा— “अरे, देखो तो राजा रामचन्द्र ने दूसरे के घर में गयी हुई सीता को फिर से रखकर राजरानी बना दिया। तू मेरे घर से निकल जा! अभी तक कहाँ थी? मैं तुझे नहीं रखूँगा—मैं राम नहीं!” लोगो में इस बात की चर्चा होगी।
अन्त में मैं लक्ष्मण के माध्यम से तुमको वन में भिजवा दूँगा। किन्तु बहुत दिनों बाद, जब मुझसे रहा नहीं जायेगा, तब मैं वशिष्ठजी से कहूँगा— “गुरुजी, मैं यज्ञ करना चाहता हूँ।”
[वशिष्ठजी ने रामचन्द्रजी से कहा]— “तो यज्ञ करो।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “तो आप आदेश दें।”
[वशिष्ठजी ने कहा—] “मैं आदेश नहीं दूँगा; बिना पत्नी के यज्ञ नहीं होता। इसलिये अपनी पत्नी को बुला लाओ। [वह] वाल्मीकिजी के आश्रम में है, [उन्हें] वहाँ से लाकर अपने पास बायें ओर बैठाओ, और मैं यज्ञ करा दूँगा।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “हे प्रभु! यह कैसे होगा? मैंने सबके सामने सीता का परित्याग किया है, और अब फिर उन्हें लाकर यज्ञ करूँ— ऐसा मैं नहीं कर सकता। आप कोई दूसरा उपाय बताइये।”
[वशिष्ठजी ने कहा—] “तब एक काम करो। तुम्हारे पिताजी ने 360 रानियों के साथ विवाह किया; तो तुम तो हज़ारों स्त्रियों के साथ विवाह कर सकते हो। तुम भी देशभर की सबसे सुन्दरी कन्या (लड़की) को चुन लो और उससे विवाह (परिणय) कर लो और फिर उसे बायें बैठाकर यज्ञ कर लो।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “गुरुजी! यह भी [मुझसे] नहीं होगा। सीता के अतिरिक्त मैं अपने हृदय में, बाहर या भीतर, [किसी को भी] स्थान नहीं देना चाहता। वह तो लोक-लज्जा के कारण मैंने ऐसा किया है, किन्तु हृदय से मैंने [उन्हें कभी] नहीं छोड़ा। तब फिर अब क्या उपाय है?”
[वशिष्ठजी ने कहा—] “तब तो तुम यज्ञ नहीं कर सकते।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “नहीं गुरुजी, आप कृपा कीजिये। कोई उपाय तो बताइये।”
[वशिष्ठजी ने कहा—] “अच्छा, एक काम करो। सोने (स्वर्ण) की सीता [की मूर्ति] बनाओ और बना करके उसके साथ में यज्ञ कर सकते हो।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “अच्छा, ठीक है।”
[रामचन्द्रजी ने] सोने की हूबहू [मूर्ति बनवायी।] जब रामचन्द्रजी मूर्ति बनवा रहे हैं, तो सीता की मूर्ति कैसे होगी? ठीक वैसी ही [सीताजी की] बैठी हुई अविकल मूर्ति बनी। मानो उसमें केवल प्राण देने का अभाव था। किन्तु जब श्रीरामचन्द्रजी ने उसका अभिषेक किया और वशिष्ठजी ने उसमें प्राण-सञ्चार कर दिये, तब वह सचमुच में जीवित हो गयी।
उनके साथ गोमती के तट पर, नैमिषारण्य में, एक विशाल यज्ञ-मण्डप में यज्ञ आरम्भ हुआ। उस समय जितने भी बन्दर, भालू, और श्रीरामचन्द्रजी के परिजन-स्वजन थे, सब वहाँ आये। सवेरे यज्ञ होता था और शाम को फिर यज्ञ होता था। बीच का समय— जैसे अभी प्रातः 10 बजे से सायं 4 बजे तक अवकाश रहता है— उसी प्रकार अवकाश के समय में बैठकर भगवद्-चर्चा हुआ करती और लोग कीर्तन किया करते।
उसी समय वाल्मीकिजी के दोनों शिष्य लव और कुश वहाँ पर पधारे। ऐसे ही अलियाँ-गलियाँ और खेमे बनाये गये थे, बड़ी सुन्दर-सी नगरी बसी थी। वहीं से उन्होंने रामचन्द्रजी के जन्म से प्रथम सर्ग [का गान] आरम्भ किया। उन्होंने बड़े सुकोमल और कोकिल को भी मात देने वाले सुन्दर मधुर स्वर से गान किया। मूर्छना, आरोह-अवरोह और वीणा को ले करके वे ऐसे ताल से गान करते कि पशु-पक्षी आदि प्राणी तक भी मुग्ध हो जाते और रामचन्द्रजी की लीलाओं को तन्मय होकर सुनते। यहाँ तक कि औरों की तो बात क्या—श्रीरामचन्द्रजी, लखन लालजी (लक्ष्मणजी), भरतजी, शत्रुघ्नजी और सबसे अधिक माँ कौशल्या बाल-चरित्र और जन्म-लीला इत्यादि को सुन करके अत्यन्त मुग्ध हो गयीं। सभी रानियाँ और जितने भी अन्य सब लोग थे, मुग्ध हो गये। हनुमान इत्यादि सब लोग एकदम मुग्ध हो गये और उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे और तन्मय होकर सुन रहे थे।
इस प्रकार उन्होंने पहले दिन एक-दो सर्गों से लेकर दशम सर्ग तक गान किया। रामचन्द्रजी ने कहा— “लक्ष्मण भैया! इनसे परिचय तो पूछो कि ये किसके बेटे हैं?”
तब सोने के थाल में स्वर्ण, हीरे-जवाहरात, सुन्दर वस्त्र आदि भरकर [उन्हें अर्पित करने की व्यवस्था की गयी।]…
[14:52 पर हरिकथा में अचानक कटौती…]
“मैया का नाम क्या है? कहाँ के रहनेवाले हो? कौन हो?”— एक बार कहा, दो बार कहा…
लव-कुश उनके मुख की ओर देख रहे थे, पर कोई उत्तर नहीं दे रहे थे।
“बोलो-बोलो तो, तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है? किस वंश के तुम लड़के हो?”
लव-कुश ने कहा— “आप विद्वान हैं, सब शास्त्रों को जानते हैं। आप सब बड़े-बड़े विद्वान और बुद्धिमान प्रतीत होते हैं। क्या आप यह नहीं जानते कि ब्रह्मचारियों से उनके पिताजी का परिचय नहीं पूछा जाता? उनकी मैया का परिचय और देश का परिचय नहीं पूछा जाता। उनका परिचय बस यही है कि उनके गुरुजी कौन हैं। हमारे गुरुजी वाल्मीकिजी हैं। उनके अतिरिक्त हम किसी और को नहीं जानते। उन्होंने ही हमें पाला-पोसा और बड़ा किया है और हम उनके ही शिष्य हैं।”
लक्ष्मणजी यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये; उनके पास और कोई उत्तर नहीं था। बात ठीक थी। आजकल लोग हम लोगों से भी पूछते हैं। हमसे कितने लोगों ने पूछा होगा— “महाराजजी! आप कहाँ के रहनेवाले हैं? अभी आपके पिताजी या मैया हैं?” इन बच्चों को बड़े लाड़-प्यार से देखते हैं कि भोले-भाले, सुन्दर, सुकान्त बच्चे हैं और कहते हैं— “अरे बेटा! तुम्हारे पिताजी कौन हैं? उनका नाम क्या है? मैया कौन हैं? तुम कहाँ के रहनेवाले हो? विवाह हुआ था? तुम्हारी स्त्री (पत्नी) है? बेटे हैं?” ये पूछते हैं। साधु-सन्तों और ब्रह्मचारियों से कदापि [ये सब प्रश्न] मत पूछो; नहीं तो अपराध लग जायेगा। उनसे ज्ञान की बातें पूछो और सुनो। अधिक से अधिक तुम लोग उनके गुरु का नाम पूछ सकते हो।
वे सब चुप (निरुत्तर) हो गये। अन्त में उन्होंने और सभा के लोगों ने देखा कि ये दोनों जो लड़के हैं, ये ठीक राम के रूप से मिलते-जुलते हैं। उस समय श्रीराम की आयु ग्यारह हजार वर्ष से दो-चार वर्ष कम थी। और लव-कुश की आयु कितनी थी? अभी आठ-नौ वर्ष की [आयु थी।] किन्तु रामचन्द्रजी सब समय सोलह वर्ष के किशोर ही थे। वे कभी भी बूढ़े [नहीं हुए—] न उनकी दाढ़ी बढ़ी, न केश पके, न मूँछें आयीं; कुछ भी परिवर्तन नहीं। वे कभी किशोर से युवा ही नहीं हुए—सदा नित्यकिशोर ही रहे। [अब विचार कीजिये—एक ओर रामचन्द्रजी की] नित्यकिशोर [अवस्था,] जो पन्द्रह-सोलह वर्ष की और [दूसरी ओर] लव-कुश की आठ-नौ वर्ष की आयु—तो दोनों के रूप कैसे (resemble) करते होंगे? कैसी समानता होगी? [ऐसा लगता था मानो] दोनों में कोई अन्तर ही नहीं है।
लोग कहने लगे— “अहो!” विशेषकर कौशल्या मैया कहने लगीं— यदि राम के बेटे होते न, तो ठीक ऐसे ही दिखते। दोनों में कोई अन्तर नहीं, केवल आयु का थोड़ा-सा [भेद है—] ये बड़े, ये छोटे।” सभा में सब लोग चकित हो करके ऐसे ही परस्पर कानाफूसी करने लगे।
तब लक्ष्मण लालजी सोने के थाल में रत्न, हीरे-जवाहरात, कपड़े-लत्ते, हार, मुकुट इत्यादि सब ले करके उनके पास गये और उन बच्चों—लव-कुश को देने लगे।
लव-कुश ने कहा— “यह क्या? हम इसका क्या करेंगे? अरे, हम लोग ब्रह्मचारी हैं। हमारे [गुरु] वाल्मीकिजी के बगीचे में हम पेड़ों को सिञ्चन करते हैं। वहाँ पर आम, केले, अमरूद [इत्यादि फल] प्रचुर रूप में हैं। कैथ है, कैथ होता है न खट्टा-मीठा। बेल हैं, बेर हैं—काफी प्रचुर [मात्रा में] हैं। हम लोगों को इन सब वस्तुओं की क्या आवश्यकता? और कपड़े-लत्ते (वस्त्र) भी हमारे यहाँ केले के छिलकों से बन जाते हैं। देखिये, हम कितने सुन्दर रूप से पहने हुए हैं! हमको इसकी क्या आवश्यकता है? ये तो आपके खजाने में ही रहे और आप लोगों के पास में रहे। हमको इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।” न उन्होंने कुछ लिया, न दिया— ऐसा कहकर फिर वे अपने आश्रम लौट आये।
इन लोगों ने देखा— “ये तो अद्भुत बालक हैं! जैसे ये सुन्दर-सुकान्त हैं, वैसे ही इनके सुन्दर गुण भी हैं। और इनमें इतना त्याग और वैराग्य! ये साधारण लड़के नहीं हैं।” उन्हीं का गुणगान [करने लगे।] अब रामचन्द्रजी की कथा के बदले सब समय उन्हीं का गुणगान होने लगा—दिनभर, रातभर, यज्ञ के समय, बाहर-भीतर।
[उधर,] आज कथा में कुछ विलम्ब हो गया, इसलिये वे बच्चे विलम्ब से सीता मैया के पास [पहुँचे।] सीता मैयाजी देख रही हैं— “अरे, बेटे अभी तक आये नहीं? कहाँ रह गये? विलम्ब हो गया?” बड़ी उत्सुकता से घर के बाहर और भीतर देख रही हैं। थोड़ी देर के बाद में ये बच्चे आये। उन्होंने एक को बाईं जंघा पर और दूसरे को दाहिनी गोद में बैठा लिया। वे बड़े प्रेम से लव-कुश का मुख चुम्बन करते हुए, स्नेह करते हुए [बोलीं—] “बेटे! आज इतना विलम्ब क्यों हो गया?”
[उन्होंने कहा—] “मैया! इसलिये विलम्ब हो गया [क्योंकि] आज बड़ी विचित्र बात हुई। आज हम लोग रामायण का गान करने जा रहे थे, तो देखा— ‘राम’ नाम का कोई राजा अपनी सेना-सामन्तों, अपने भाईयों, माताओं सबके साथ पास ही नैमिषारण्य में यज्ञ कर रहा है। आज हम लोग वहीं पर पहुँच गये और वहीं पर हमने रामायण गान कर दिया। वाल्मीकिजी [द्वारा रचित इस रामायण के] प्रथम से लेकर दशम सर्ग तक सुनाया। सब लोग चकित होकर सुन रहे थे। वह राजा स्वयं रो रहा था, औरों की तो बात क्या? और उसकी मैया रो रही, उसके भैया रो रहे—सभी लोग [रो रहे थे।] और अन्त में हम एक वस्तु को देख करके आश्चर्यचकित हो गये। मैया! एक बात कहें?”
[सीताजी ने कहा—] “बोलो बेटा।”
[लव-कुश ने कहा—] “वहाँ पर हमने एक सोने की मूर्ति देखी। वह सोने की मूर्ति अविकल तुम्हारे जैसी ही थी। कोई भी अन्तर नहीं—केवल उसमें यही बाकी था कि वह उठ करके चलती नहीं थी और हाथों को ऐसे-वैसे नहीं करती थी। ऐसा प्रतीत होता था कि वह साक्षात् तुम ही हो। किन्तु वहाँ पर उन लोगों को तुमसे क्या मतलब? मैया हमने उसको देखा और सुनते हैं कि उसीके साथ में वह राजा यज्ञ करता है।”
यह सुनकर सीताजी की आँखों से आँसू टपकने लगे। वे एकदम रोने लगीं। बच्चे अपने पीताम्बर से उनका मुख और आँखों के [आँसुओं] को पोंछने लगे— “मैया! उसकी बात सुनकर तुम रोने क्यों लगीं। तुमको क्या हो गया? रोने की क्या आवश्यकता है?”
[मैया] और रोने लगी, तो अन्त में ये बच्चे भी रोने लग गये। मैया ने सोचा— “हमारे प्रियतम ने अपनी प्रियतमा को नहीं छोड़ा। राजा ने अपनी रानी को छोड़ दिया—यह बात हो सकती है। यदि मुझको छोड़ दिया होता, तो मुझे अपने हृदय में बसा करके वहाँ पर मेरी मूर्ति रख करके क्यों पूजा करते?” बस गौरव से उनका हृदय एकदम विह्वल हो गया और फिर रोने लगीं।
वाल्मीकिजी को भी पता लगा। उन्होंने आकर इनको सान्त्वना दी।
इस प्रकार रामचन्द्रजी सीताजी से कहने लगे कि ऐसी लीलाएँ होंगी?
[सीताजी ने कहा—] “ऐसी लीलाएँ क्यों होंगी? इस तरह से मुझे त्याग करके आप भी रोयेंगे और वहाँ पर मेरी पूजा करोगे? राजभवन में बैठ करके मेरी मूर्तियों की [पूजा करोगे?”]
रामचन्द्रजी उन मूर्तियों को अपने राजमहल में रख करके उनके साथ में वार्तालाप करते हैं और अपने विरह को दबाते हैं। अपने हाथों से सीताजी की पूजा-आराधना करते हैं।
[सीताजी ने कहा—] “ऐसा क्यों करते हैं? क्यों मुझको इस प्रकार से इस जन्म में भी और उस जन्म में भी छोड़ेंगे और त्याग करेंगे।”
रामचन्द्रजी कहा— “इसी जन्म में नहीं, बीच में हमारा एक और जन्म होगा। उस समय में मैं कृष्ण होऊँगा और तुम राधा होओगी। उस समय हम लोग [लगभग] दस वर्ष तक बड़े प्रेम के साथ में रहेंगे—हम विवाह नहीं करेंगे, न तुम हमसे करोगी। [केवल] प्रेम ही आधार होगा। विवाह से कोटि गुना [अधिक] हम लोग इसका रसास्वादन करेंगे।
अन्त में इस ऋण का बदला चुकाने के लिए कि मैं तुम्हारी इस राजभवन में रह करके पूजा करता हूँ, तुम भी अपने हृदय में रख करके मेरी पूजा करना चाहोगी। मैंने तुमको राजभवन से निकाल करके वन में छोड़ा और उस जन्म [अर्थात् कृष्णलीला] में भी मैं तुमको वृन्दावन में छोड़ करके चला जाऊँगा। और कहाँ जाऊँगा? कहीं समुद्र के किनारे [द्वारका] चला जाऊँगा और वहीं से मैं तुम्हारी चिन्ता और आराधना करूँगा। किन्तु लोक-मर्यादा के कारण मैं तुम्हारी मूर्ति की पूजा नहीं कर सकूँगा और घर में बैठे हुए न तुम मेरी मूर्ति की पूजा कर सकोगी। दोनों विरह में तड़पेंगे। उस समय भी मैं तुम्हारे ऋण को नहीं चुका सकूँगा।
किन्तु तीसरे जन्म में, जब मैं गौररूप में जन्म लूँगा और तुम विष्णुप्रिया के रूप में आओगी, तो जिस समय मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा, उस समय स्वयं ही अपनी मूर्ति बनवाकर तुम्हारे पास भेज दूँगा। तब तुम उस मूर्ति की पूजा करोगी। इस प्रकार से जैसे मैं [तुम्हारी] पूजा करता था, अब तुम मेरी पूजा करोगी। और मैं वहाँ पर रह करके ‘कृष्ण-कृष्ण’ कह करके जगत् को रुलाऊँगा और रोऊँगा।
इस तरह से इन लीलाओं का परस्पर कुछ [सम्बन्ध है।] रामचन्द्रजी की लीला से कृष्णलीला का और कृष्णलीला से महाप्रभुजी की लीला का परस्पर कुछ सम्बन्ध है। इसीलिये चैतन्य महाप्रभुजी ने अपना बहुत बार षड्भुज रूप दिखलाया तो इन तीनों रूपों में ही अपने को दिखलाया।
यहाँ पर भी कोई षड्भुज रूप होगा। ये देख लो—षड्भुज रूप दिखला रहे हैं। ये रामचचन्द्रजी के रूप में धनुष और बाण, कृष्ण के रूप में वंशी और महाप्रभुजी के रूप में दण्ड-कमण्डलु [धारण किये हुए हैं।]
इस प्रकार से रामचन्द्रजी की ये विरह की लीलाएँ हैं। बहुत ही करुणलीला है। [मैंने इन्हें] संक्षेप में सुनाया। अरे, शेषनाग अपने सहस्त्र मुखों से सहस्त्र कोटि जन्मों या वर्षों में रामचन्द्रजी की इन लीलाओं का वर्णन करने में असमर्थ हैं। हम लोग तो पाँच मिनट में उनकी लीलाएँ [सुनाकर] समाप्त [कर देते हैं।] तो पाँच मिनट में…
किसी एक स्थान पर रामलीला हो रही थी। किसके उपलक्ष्य में? एक लड़के के विवाह के उपलक्ष्य में। एक हजार रुपये दे करके रामायण का गान करनेवाले को बुलाया गया कि यहाँ पर रामायण का गान होगा। वे लोग बन करके [अर्थात् तैयार हो करके] आ गये, सब अपना [आवश्यक समान] रख करके और वहाँ केवल गान करनेवाले थे। किन्तु विवाह की साइत-लग्न अब बीते जा रहा है। जब उन्होंने [गान] आरम्भ किया तो उस लड़के के मैया और पिताजी आकर कहने लगे— “अरे शीघ्र करो, शीघ्र करो, शीघ्र करो!” उसको न्योछावर इत्यादि पहले ही दे दिया [और कहा—] “अब शीघ्र करो, नहीं तो अब समय [निकल जायेगा।”] तो अन्त में वह क्या कहता है? — “एतो बलि हनुमान एक लम्फ दिला, आर ओ पार हइते सीता के...” समझा? यह बङ्गला में है। ऐसा कहकर हनुमानजी ने एक छलाँग लगायी और समुद्र के उस पार गये और सीता को लेकर इस पार में चले गये— इति रामायणम्। यही रामायण है।
उसी प्रकार से हम लोगों ने रामायण को समाप्त किया। अब आगे का चरित्र आप लोग आनन्द के साथ में सुनें।
गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल!
बोलो सियावर रामचन्द्र की जय! जय बजरङ्गबली हनुमान की जय! लक्ष्मणलाल की जय! भरतलाल की जय! शत्रुघ्नजी की जय! महाराज दशरथ की जय! कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी देवी की जय! अयोध्याधाम की जय! रामभक्तों की जय! गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
-------------------------------------------------------------
समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई।
भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥
-श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड)
तुम्हारे सिर पर (नियन्त्रण के लिए) कोई नहीं है, इसलिये तुम पूर्णतः स्वतन्त्र हो। जो तुम्हारे मन में आता है, वही तुम करते हो।
We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.