Srimad Bhagavatam Series- #9- Siva Tattva & Churning the Milk Ocean
24:42This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Srila Gurudeva continued his discussion about ‘samudra manthana’ (churning of the ocean) and ‘Mohini avatara’ pastimes from Srimad Bhagavatam.
- Srila Gurudeva mentioned that it is very difficult to understand Siva-tattva.
- Description of the nature of Siva, He has a combination of conflicting qualities.
- 'vaisnavanam yatha sambhu' - Siva is the guru of vaisnavas.
- Significance of the garland of skulls, serpents & ashes worn by Siva.
- Significance of moon that he wears on his head, and in his heart, he carries Radha Syamsundara.
- Siva also takes a form of Gopesvara. On one hand he burns Cupid down to ashes and on the other, he chases Mohini avatara.
- Krsna took Mohini avatara and distributed nectar to the demigods.
- Sun & Moon both are devotees of the Lord. Sun is Yamuna's father & Krsna came in the dynasty of the Moon.
- If we think that we know more than God or Guru then it is an offense.
- Formation of Rahu & Ketu.
- We should not try to guide Sri Guru.
- Reason for occurence of solar & lunar eclipse.
- Caitanya Caritamrita explains a ‘samudra manthan’ of sastras at Godavari in Raya-Ramanada Samvada. How, after churning all sastras, we come to know about the topmost goal.
- Srimad Bhagavatam teaches us that gopis’ love is the topmost. Radha bhava is superior to all.
Transcript
श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 9 : शिव-तत्त्व एवं क्षीरसागर-मन्थन
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 30 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हरि-गुरु-वैष्णवों की कृपा से आज हमारे श्रीमद्भागवत के चार दिन सम्पन्न हो गये हैं। आज पञ्चम दिवस का आरम्भ हो रहा है। उधर से हम लोगों का लगभग सातवाँ स्कन्ध समाप्त हुआ है। आठवाँ [स्कन्ध] भी [पूर्ण] हो जाता, किन्तु उसे आज के लिए रख दिया गया। तो उधर आठ स्कन्ध हो गये हैं। अब नौवें स्कन्ध के पश्चात् हम लोगों ने चार दिन दशम स्कन्ध के लिए रखे हैं—चार दिन या पाँच दिन, जिससे थोड़ा-सा विस्तृत रूप में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया जा सके।
कल हम लोगों ने समुद्र-मन्थन, मोहिनी अवतार तथा उनके द्वारा अमृत के वितरण इत्यादि का वर्णन किया। इन कथाओं के पीछे भी बड़े-बड़े रहस्य हैं। ऊपर से ये आख्यायिकाएँ साधारण रूप में दिख रही हैं, किन्तु गम्भीर रूप से विचार करने पर इनमें बहुत से विशेष तत्त्वों की उपलब्धि होती है। अब जैसे शंकर-तत्त्व को देखिये। जब [समुद्र-मन्थन] से विष निकला, तो शंकरजी को…
[3:43 पर हरिकथा में अचानक कटौती…]
शंकरजी का तत्त्व और रूप विचित्र है। विश्व की समस्त वस्तुओं का समावेश इस शंकर-तत्त्व में देखा जाता है और वे अचिन्त्यभेदाभेद-तत्त्व हैं, जो चैतन्य महाप्रभुजी ने कहा है। जितने भी सब तत्त्व हैं, [वे स्पष्ट हैं।] कृष्ण का तत्त्व भी स्पष्ट है, शक्ति का तत्त्व भी स्पष्ट है। ब्रह्माजी का तत्त्व, जीव-तत्त्व— ये सब स्पष्ट हैं, किन्तु शंकर-तत्त्व सहज ही समझ में नहीं आता। वे हरि हैं या हर हैं, अथवा उनका तत्त्व क्या है— यह सहज ही [समझना] सम्भव नहीं। ब्रह्माजी तो स्पष्ट रूप से जीव-तत्त्व हैं। [किन्तु] शंकरजी क्या हैं? उन्हें जीव-तत्त्व कहेंगे या नहीं? जीव-तत्त्व तो नहीं कह सकते। तो फिर [क्या] उनको कृष्ण-तत्त्व, भगवत्-तत्त्व कहेंगे? उन्हें पूर्णरूप से भगवत्-तत्त्व भी नहीं कह सकते। वे एक [अत्यन्त] विचित्र तत्त्व हैं। हरि-हर भी एक अभिन्न तत्त्व माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत में उनके इस विचित्र तत्त्व का वर्णन किया गया है। यह भी कहा गया है— “वैष्णवानां यथा शम्भु:” अर्थात् शम्भु वैष्णवों में श्रेष्ठ हैं और गुरु-तत्त्व हैं।
अब देखिये, उन्होंने अपने सिर पर क्या धारण कर रखा है?
भक्त: गङ्गाजी।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उन्होंने परमपवित्र और पावनी भगवती गङ्गा को धारण कर रखा है। गले में क्या लटक रहा है? कैसी सुन्दर मुण्डमाला शोभा दे रही है। ये मुण्डमाला किनकी है? [यह उन] सब त्रिपुण्ड [धारण करने] वालों की है, जो पहले ये कहते हैं— “पार्वतीजी मेरी मैया हैं, मेरी मैया हैं।” और अन्त में कहते हैं—“शिवोऽहम्, शिवोऽहम्!” बस, [शिवजी] खड्ग से [उनके मुण्ड] काट करके उनकी माला पहन लेते हैं।
दूसरी बात— अङ्गों में भस्म [धारण करते हैं। एक ओर] परमपवित्र [गङ्गाजी को] धारण करनेवाले हैं और [दूसरी ओर] अङ्गों में क्या धारण करते हैं? श्मशान-घाट की भस्म—जले हुए शवों की भस्म। क्यों? अरे, यह संसार बड़ा सुहावना है, शरीर बड़ा सुहावना है, किन्तु अन्ततः है क्या? जल करके भस्म हो जाता है। और यदि नहीं [जला,] तो क्या हो जायेगा? भस्म नहीं हुआ, तो [यदि] किसीने शव को नहीं छूआ, तो सड़-गल करके उसमें कीड़े पड़ जायेंगे और [यदि] पशु-पक्षियों ने खा लिया, तो वो विष्ठा बन जायेगा। यही तो यह सौन्दर्य है [अर्थात् यही तो इस शरीर के सौन्दर्य की परिणति है।] इसलिये [शंकरजी] शरीर पर [भस्म] धारण किये रहते हैं, ताकि प्रभु का विस्मरण न हो और रूप-रस-गन्ध की इस दुनिया में हम भी लग न जायें [अर्थात् आसक्त न हो जायें।]
दूसरी बात— अपने यहाँ (मस्तक) पर क्या धारण करते हैं? चन्द्र को। चन्द्र माने सुधा और सुधा माने अमृत। चन्द्र में सुधा है, अमृत है। और गले में क्या धारण करते हैं? कालकूट विष। कैसा सुन्दर सम्मिश्रण! एक ओर [मस्तक पर] अमृत धारण किया और दूसरी ओर [कण्ठ में] कालकूट विष धारण किया। [इसीसे उनका] नाम हो गया— नीलकण्ठ महादेव। और हृदय में क्या धारण करते हैं? राधा-श्यामसुन्दर की, प्रिया-प्रियतम की युगल जोड़ी को हृदय में धारण करते हैं। और बाहर, अङ्गों में ऊपर से क्या धारण करते हैं? विषधर सर्पों के आभूषण धारण करते हैं। गले में सर्प, हाथों में बाजूबन्द भी सर्प, कमर में कमर-पेटी भी सर्प, पैरों में [पायजेब] भी सर्प—सर्वत्र सर्प ही धारण करते हैं।
एक ओर देखिये—गोपीश्वर-महादेव, परम तत्त्व। और उसीमें दूसरी ओर देखिये। एक ओर गोपीश्वर-शिव बने हुए हैं, और दूसरी ओर वे कामदेव को भस्म करनेवाले हैं। काम उनके निकट नहीं रहेगा और दूसरी ओर देखो, वे मोहिनी के पीछे-पीछे कामासक्त होकर दौड़ रहे हैं। उनका हम क्या सामञ्जस्य करेंगे? कैसे विचित्र अर्थात् परस्पर विरुद्ध (opposite) गुणों का सम्मिश्रण शंकरजी में देखा जाता है।
कहाँ भगवान् की अष्टकालीय लीलाओं का स्मरण करनेवाले, और कहाँ भूत-पिशाच-प्रेतों को परिकर बनाकर उनकी सभा में आनन्द के साथ में बैठे हैं। कहाँ बाणासुर का पक्ष लेनेवाले और कहाँ इधर में कृष्ण की सेवा करनेवाले। सब समय राम-नाम को धारण करनेवाले। कहाँ रावण को वरदान देनेवाले, दस सिर देनेवाले, उसको बल शक्ति देनेवाले और कहाँ रामचन्द्रजी के परम भक्त [हनुमान के रूप में] सब समय उनकी सेवा में लगे रहते हैं। ऐसा सम्मिश्रण तत्त्व और किसीमें भी नहीं देखा जायेगा। ये सब कुछ कर सकते हैं। परम वैष्णव हैं। इसलिये हम लोग शिव-तत्त्व को नमस्कार करते हैं। वे हमारे गुरु हैं, वैष्णव हैं। वे हम पर कृपा करें कि हम लोग उन्हें समझ सकें।
अब एक दूसरी बात देखिये। कृष्ण ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत को बाँटा। [उन्होंने देवताओं और असुरों से कहा— “पंक्ति (Line) में लग जाओ।” कभी-कभी वे असुरों की ओर मुस्कुरा करके देख लेती हैं। ऐसी बंकिम दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए थोड़ा-सा हँस देती हैं और उसीपर वे मुग्ध हो जाते हैं। अपना सब कुछ उनपर [न्योछावर कर] देते हैं और जैसा वे कहती हैं, वैसा ही करते हैं। यह दूसरों के द्वारा सम्भव नहीं।
[मोहिनी ने कहा—] “आप लोग पंक्ति में बैठ जाइये। छोटे-बड़े का ध्यान रखकर बैठ जाइये।” देवता लोग एक ओर बैठे हैं, असुर लोग एक ओर। [मोहिनी] देवताओं को अमृत बाँट रही हैं, और असुरों को अपनी हँसी की, मन्द-मुस्कान की सुधा दे रही हैं, और उसीमें वे मुग्ध हो रहे हैं।
अब सूर्य और चन्द्र के बीच राहु आ गया—राहु दैत्य। ये लोग (सूर्य-चन्द्र) देवता हैं। सूर्य-चन्द्र इत्यादि देवता कुछ भक्त हैं। विशेष करके सूर्य और चन्द्र— यही तो दो वंश हैं। इन्हीं से दो वंश [चले हैं, जिनमें] बड़े-बड़े राजा लोग और बड़े-बड़े भक्त लोग आये हैं। तो सूर्य भी भक्त हैं और चन्द्र भी भक्त हैं। सूर्य कैसे हैं? अरे! हमारी यमुनाजी के पिताजी हैं। और चन्द्र— जिस वंश में कृष्ण आये हैं। दोनों का सम्बन्ध [भक्त और भगवान् से है।]
[सूर्य और चन्द्र] दोनों बैठे हुए हैं। अब बीच में राहु देवता का रूप बनाकर आकर बैठ गया—झट से बैठ गया। और कब बैठा? बाँटते-बाँटते उधर से मोहिनी आ रही हैं। अब सूर्य को [अमृत] दिया, इधर चन्द्र बैठे हैं, और बीच में वह बैठा गया। झट एकदम बीच में आकर बैठ गया और मोहिनी जल्दी-जल्दी से परोसते हुए आ रही हैं। सूर्य और चन्द्र दोनों ने मिल करके उनकी ओर इशारा [करते हुए कहा—] “यह देवता नहीं है, सावधान! इसको मत देना,” या इशारा किया— “सावधान हो जाइये, यह असुर है।” अच्छा, क्या ये भगवान् नहीं जानते थे? भगवान् जानते थे या नहीं?
श्रीपाद माधव महाराज: जानते तो थे।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और [यदि] ये लोग (सूर्य-चन्द्र) नहीं कहते, तो न जाने क्या एक और अपूर्व बात होती। किन्तु इन दोनों ने देखा कि यह बात भगवान् को पता नहीं है। [वे दोनों] भगवान् की भगवत्ता को भूल गये और सोचा कि “भगवान् को यह पता नहीं है कि यह कौन है और वे सचमुच में इसे [अमृत] दे देंगे।” अब सन्देह हुआ कि नहीं भगवत्-तत्त्व पर? यदि गुरु पर और भगवान् पर यह सन्देह हो जाये कि “ये नहीं जानते हैं, मैं इनके स्वरूप को जानता हूँ,” तो यह गुरु के प्रति अवज्ञा हुई या अपराध हुआ या क्या हुआ? अपराध न? तो सूर्य और चन्द्र ने क्या किया—यह उनकी गलती हुई, उनका भगवान् के प्रति अपराध हुआ। वे भगवान् को परामर्श देनेवाले बन गये! यही सूर्य और चन्द्र की गलती हुई।
प्रभुजी हँस दिये—“तुमने गड़बड़ कर दी। मेरे ऊपर सन्देह कर दिया। मैं इसको देता या नहीं देता, क्या यह मुझे पता नहीं है? क्या मुझे विचार नहीं है? तुम्हीं को यह विचार है कि प्रभुजी ऐसा [मत कीजिये।”]
[यह तो वही बात हो गई, जैसे कोई कहे—] “गुरुजी, इस व्यक्ति से बातचीत मत कीजिये। गुरुजी, यह व्यक्ति ठीक नहीं है। गुरुजी, आपको ऐसे जानना चाहिये।” तो यह क्या हुआ? यह अज्ञानता हो गयी। ये बड़ी सूक्ष्म बातें हैं। ऊपर से [देखने पर] प्रतीत होता है कि सूर्य और चन्द्र ने उसका गला कटवा दिया, [किन्तु वास्तव में यह प्रभु के प्रति उनका अपराध हो गया।]
अब वह जो [देवताओं का] वेश बना करके आया था—[वास्तव में] तो दैत्य था, पर साधु बन करके आया, तो उसका गला काट दिया गया। और गला भी ऐसे काटा कि जब वह [अमृत को] मुँह में [लेने ही वाला था]—हाथ में तो [अमृत] दे दिया था और अब हाथ उठा करके पान ही करने वाला था, तो पान करने से पहले ही [उसका गला काट दिया।] अभी [अमृत का] होंठों से स्पर्श नहीं हुआ था, हो सकता है कि गन्ध आ गयी हो, किन्तु पीने से पहले ही उसका गला काट दिया। अब उसके दो टुकड़े हो गये—[ऊपरवाला भाग] राहु हो गया और नीचेवाला भाग केतु हो गया। और क्योंकि अमृत हाथ में तो आ ही गया था, इसलिये वे बेचारे मरे नहीं; किन्तु अमृत भी उनको नहीं मिला।
अब सूर्य और चन्द्रमा ने जो अपराध किया, अवज्ञा की—[वह यह कि] भगवान् [के विषय में ऐसा] समझ लिया कि “इनको समझ में नहीं आता है। वे यह बात नहीं समझ सके कि यह असुर है या देवता है।” इस अपराध के कारण ही वे दोनों राहु और केतु कभी सूर्य पर झपटते हैं तो कभी चन्द्र पर झपटते हैं। उन्हें तंग करते हैं। वे दोनों (सूर्य और चन्द्र ) आतंकित रहते हैं— यह इसका तात्पर्य हुआ। उनको यह सब पता नहीं था। इसलिये खबरदार इस विषय में हम लोगों को सम्भलकर रहना चाहिये—विचार करके सावधान रहना चाहिये। भगवान् को हम लोग समझायें नहीं; वे पूर्णरूप से समझनेवाले हैं। और ऐसे जो सद्गुरु हैं, वे भी सब समझनेवाले हैं। उनको भी [इस प्रकार] परामर्श देना— “गुरुजी, उनके साथ में ऐसे व्यवहार कीजिये। आप नहीं जानते हैं, मैं इनको जानता हूँ” [—यह उचित नहीं है।]
इसलिये [राहु और केतु कभी] सूर्य पर झपटते हैं और कभी चन्द्र पर। और झपटकर क्या करते हैं? उनके अन्दर में अन्धकार हो जाता है अर्थात् उनमें छाया लगती है। यही सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण है। चन्द्रग्रहण क्या हुआ? यदि हम विपत्ति में आते हैं… अब इससे बढ़कर के विपत्ति क्या हुई कि भगवान् के चरणों में अपराध हुआ। इसलिये इस विषय में [हमें अत्यन्त] सावधान रहना चाहिये।
और एक बात [देखिये—] समुद्र-मन्थन हुआ न! वह समुद्र-मन्थन भागवत में [वर्णित] हुआ है। उसमें पहले विष [निकला] और उसके बाद सुन्दर-सुन्दर रत्न, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, इसके बाद कौस्तुभ-मणि, लक्ष्मीजी और फिर धन्वन्तरि के सहित में अमृत निकला। चैतन्यचरितामृत में भी एक समुद्र का मन्थन हुआ है। वह समुद्र क्या है? जितने धर्म-तत्त्व, वेद, उपनिषद्, शास्त्र— सबका मिल करके गोदावरी के तट पर मन्थन हुआ। गोदावरी के तट पर वह मन्थन हुआ और उस शास्त्र रूपी समुद्र-मन्थन में क्या-क्या [निकला?] पहले विष जैसा ही निकला न?
वर्णाश्रम-धर्म—‘एहो बाह्य’। अर्थात् संसार में रह करके, गृहस्थी में रह करके, अपनी समृद्धि के लिए भगवान् का भजन करना— यह विष है। यदि इसका पान किया, तो मरोगे। यह किनके लिए है? यह शंकर के लिए है, वे इसका सामञ्जस्य कर सकते हैं। श्रीवास पण्डित [जैसे भक्त,] महाप्रभु के समय के बड़े-बड़े भक्त, गोपियाँ, महाराज जनक— ये लोग संसार में [रहते हुए भी] कुछ लाभ लेकर भगवान् का भजन कर सकते हैं। किन्तु जो लोग इसे हजम नहीं कर सकते, वे यदि इसका पान करेंगे, तो डूब मरेंगे। इसलिये इससे सावधान रहना चाहिये।
[इसीलिए श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा—] “एहो बाह्य, आगे कह आर।” [अर्थात् यह तो बाहर की बात है,] और आगे कहिये।”
[तब श्रीराय रामानन्द ने कहा—] “भगवान् के चरणों में कर्मों का अर्पण [ही साध्य-सार है।”]
[यह सुनकर भी महाप्रभुजी ने कहा—] “एहो बाह्य।”
अभी समुद्र-मन्थन हो रहा है, और जो इसके अधिकारी हैं, उनको दे रहे हैं। किनको? जो शुद्धाभक्ति के अधिकारी नहीं हैं, जो सङ्गसिद्धा-भक्ति, आरोपसिद्धा-भक्ति, कर्ममिश्रा-भक्ति, औपाधिकी-भक्ति के अधिकारी हैं। ज्यों-ज्यों शास्त्ररूपी समुद्र-मन्थन होता जा रहा है, राय रामानन्दजी महाप्रभु के हाथों में देते जा रहे हैं, और महाप्रभु कह रहे हैं— “यह तुम लो, यह तुम लो।” किन्तु उनसे कह देते हैं— “एहो बाह्य।” और आगे चलते हैं।
और क्या? “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” [#1] इसके पहले ज्ञानमिश्रा-भक्ति—
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
-श्रीमद्भगवद्गीता (18.54)
ब्रह्म में अवस्थित प्रसन्नचित्त व्यक्ति न तो शोक करते हैं और न ही आकांक्षा करते हैं। वे सभी भूतों में समदर्शी होकर प्रेमलक्षणयुक्त मेरी भक्ति प्राप्त करते हैं। (GVP)
[महाप्रभुजी इसके लिए भी कहा—] ‘एहो बाह्य’।
[और फिर राय रामानन्दजी ने कहा—] “सर्वधर्मान् परित्यज्य।”
[हरिकथा में] नींद नहीं आनी चाहिये। देखो, सब लोग झुक रहे हैं। कोई झुको मत—थोड़ा-सा तन कर बैठो। भगवान् की कथाओं में सब प्रकार के लोग आते हैं। नींद महारानी भी आती हैं। उनकी दो-तीन कन्याएँ हैं। पहले जम्भाई को भेजती हैं। और उसके बाद में क्या भेजेंगी? आलस्य। ऐसे बैठेंगे, वैसे बैठेंगे। फिर जम्भाई आयेगी। उसके बाद कोटि-मन का पत्थर आँखों पर रख देंगी। चाहेंगे कि जगे और ऐसे-ऐसे [करेंगे।] और उसके बाद में स्वयं आ करके गुड़क जायेंगी और अमृत कोई दूसरा पी लेगा। इसलिये सावधान रहिये।
मेरी आँखें चारों ओर हैं—मैं सबको देख रहा हूँ, कौन-कौन सो रही है, कौन-कौन सो रहा है। मैं बीच में कह दूँगा— “उठकर खड़ी हो जाओ।” सब लोग देखेंगे, बड़ी भारी लज्जा आयेगी। मुझको लज्जा नहीं आती, मैं तो कह दूँगा। इसलिये सावधान रहो। जो कोई सोयेगा, मैं उसको उठा दूँगा। उस समय यह नहीं देखूँगा कि ये लड़की है कि कौन है, वृद्ध है कि कौन है। इसलिये सावधान रहना, मैं उठा दूँगा। ऐसा हमारे महापुरुषों ने भी किया है। श्रील माधव गोस्वामी महाराजजी ऐसा कह देते थे, क्योंकि यह सबसे बड़ा उपकार का काम है।
हाँ, तो मैं क्या कह रहा था?
भक्त : ज्ञानमिश्रा-भक्ति।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज : ज्ञानमिश्रा-भक्ति। ज्ञानमिश्रा-भक्ति क्या है? जो सब जगह सम (बराबर) है—शत्रु-मित्र इत्यादि सब विषयों में बराबर है। जो सबके प्रति समदर्शी है, जिसकी कोई आकांक्षा नहीं है और जिसके [पास] जो कुछ है, उसके अतिरिक्त संसार की किसी अन्य वस्तु की आकांक्षा नहीं रहती— ऐसा व्यक्ति भगवान् की पराभक्ति लाभ करता है। [लाभ करता है अर्थात्] अभी [प्राप्त] नहीं किया। महाप्रभुजी ने कहा— “एहो बाह्य” यह भी नहीं है।
तब फिर राय रामानन्दजी ने कहा— “ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव।” और जब [शास्त्ररूपी समुद्र-]मन्थन किया न, तो ये सब वस्तुएँ शास्त्र में से निकालते हुए [आगे बढ़ते] चले जा रहे हैं और उनको दूसरों में लुटाते हुए, अनाधिकारियों को देते हुए चले जा रहे हैं। अब उच्चैःश्रवा घोड़ा आया, तो इन्द्र ने कहा— “यह मैं लूँगा।” वह क्या है? उसे मानो समझ लो कि यह है— “एहो हय।” क्या?
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव
जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीयवार्त्ताम्।
स्थानेस्थिताः श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि-
र्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैस्त्रिलोक्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.14.3)
[इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान की सहायता से इन्द्रियातीत वस्तु की प्राप्ति के साधन का नाम आरोहवाद या अश्रौतपन्था है। परन्तु जो ज्ञान के लिए कुछ प्रयत्न न कर काय-मान-वाक्य से साधुमुख से निःसृत आपकी लीलाकथाओं का सेवनकर जीवन धारण करते हैं, उनके द्वारा कोई कर्म न किये जानेपर भी आप अजित होकर उनके द्वारा जीत लिए जाते हैं।] GVP
देखो! तुम कुछ करो या मत करो—भागवत की कथा हो रही है, बड़ी रसीली कथा। इसमें तत्त्व अपने आप आ जाते हैं। पृथक रूप में यह कहने की आवश्यकता नहीं रहती कि जीव-तत्त्व क्या है, माया-तत्त्व क्या है, ईश्वर-तत्त्व क्या है, और-और तत्त्व क्या हैं। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसमें ज्ञान, वैराग्य, तत्त्व-ज्ञान, सबकुछ भरा पड़ा है। यहाँ तक कि तत्त्व-ज्ञान के लिए भी प्रयास मत करो। अपने आप यह झरने की भाँति उनके हृदय से निकल करके आ रहा है। उसको प्रेम के साथ श्रवण करो। उन कथाओं को नमस्कार करो, कथावाचक को नमस्कार करो, उस स्थान को नमस्कार करो, श्रोताओं को नमस्कार करो, वक्ताओं को भी नमस्कार करो। और उन कथाओं का निरन्तर चिन्तन करो, उसीका कीर्तन करो। देखो! जो सबके लिए अजित भगवान् हैं, उन्हें भी [इस प्रकार से] थोड़े ही समय में जीत लिया [जाता है,] उन्हें भी वशीभूत कर सकते हैं।
महाप्रभुजी ने कहा—“एहो हय।” थोड़ा-सा कहा। इसके बाद में [राय रामानन्दजी ने कहा—] “यदि प्रेम नहीं है और सब प्रकार की आराधना करते हैं, सब प्रकार से षोडशोपचार से आराधना करते हैं, परिक्रमा करते हैं, और-और बहुत कुछ करते हैं, भागवत-गीता पाठ करते हैं, रामायण भी पाठ करते हैं, अर्चन करते हैं, किन्तु भगवान् के प्रति प्रेम नहीं है तो सब करा धरा [रह जायेगा।] इससे भगवत्-प्रेम नहीं मिलेगा। इसलिये [जो करो,] प्रेम के साथ में करो।
महाप्रभु ने [कहा—] “यह भी बड़ी सुन्दर बात है, किन्तु और आगे चलिये।” [महाप्रभुजी ने इस वस्तु को भी] उन अधिकारियों को दे दिया, जो इसके अधिकारी हैं। इसके बाद में क्रमशः दास्य, सख्य, वात्सल्य और अन्त में मधुर रस तक ले आये। ‘निगमकल्पतरोर्गलितं फलं’ [#2] — यही समस्त शास्त्रों का तात्पर्य है। कृष्ण के प्रति गोपियों की जैसी भक्ति है—उससे बढ़ करके श्रेष्ठ और कोई भक्ति नहीं है। इसलिये—
आराध्यो भगवान् ब्रजेशतनयस्तद्धाम वृन्दावनं
रम्या काचिदुपासना ब्रजवधूवर्गेण या कल्पिता।
श्रीमद्भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुमर्थो महान्
श्रीचैतन्यमहाप्रभोर्मतमिदं तत्रादरो नः परः॥
-(श्रील चक्रवर्ती ठाकुर)
[भगवान् ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण एवं वैसा ही वैभवयुक्त श्रीधाम वृन्दावन भी आराध्य वस्तु है। ब्रजवधुओं ने जिस भावसे कृष्ण की उपासना की थी, वह उपासना ही सर्वोत्कृष्ट है। श्रीमद्भागवत ग्रन्थ ही निर्मल शब्द-प्रमाण एवं प्रेम ही परम पुरुषार्थ है—यही श्रीचैतन्य महाप्रभु का मत है। यह सिद्धान्त ही हम लोगों के लिए परम आदरणीय है, अन्य मत आदर योग्य नहीं हैं।] GVP
यही अमृत की खान दी। आराध्य कौन हैं? ब्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर। जैसे वे आराध्य हैं, वैसे ही वृन्दावन भूमि [भी आराध्य है।] और श्रीमद्भागवत ही प्रमाण-ग्रन्थ है। उसमें [बताया गया है कि] गोपियों की कृष्ण के प्रति आराधना ही सबसे श्रेष्ठ उपासना है। चैतन्य महाप्रभुजी का यही विचार है। अर्थात् समुद्र-मन्थन करके अन्त में क्या दिया? राधाजी का भाव ही सर्वोत्तम है। इससे बढ़ करके और कोई भाव नहीं है। यदि तुम उन्हें प्रसन्न करने के लिए भजन करना चाहते हो, तो राधाजी की अनुचरियाँ जो हैं, उनकी जो सहेलियाँ हैं, दासियाँ हैं, उनकी दासियों की दासी की दासी की दासी के रूप में, उनके चरणों की धूलि और किंकरी बन जायें— यही सब शास्त्रों का एकमात्र तात्पर्य है। भागवत का भी यही प्रतिपाद्य विषय है। तो यथार्थ समुद्र-मन्थन चैतन्यचरितामृत में इस प्रकार से किया गया है। हम लोग इसको ग्रहण करें और अब आप लोग आगे की भागवत-कथा सुनिये।
गौर प्रेमानन्दे!
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
-श्रीमद्भगवद्गीता (18.66)
वर्ण, आश्रम आदि समस्त शारीरिक और मानसिक धर्मों का परित्यागकर एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो। (GVP)
#2
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.1.3)
हे भगवत्-प्रीतिरस-रसिकजनो! हे अप्राकृत रसविशेष की भावना में चतुर भक्तो! श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पतरु का परमानन्दरसमय परिपक्व फल है। यह छिलका, गुठली आदि कठिन हेय-अंश से रहित है और तरल होने के कारण पान करने योग्य है। श्रीशुकदेव गोस्वामी के मुख से निकलकर शिष्य-प्रशिष्यादि की परम्पराक्रम से स्वेच्छा से पृथ्वीपर अखण्ड रूपमें अवतीर्ण इस फल को आपलोग मुक्त अवस्था में भी पुनः-पुनः पान करते रहें। स्वर्ग के सुखों की उपेक्षा करनेवाले परम मुक्तपुरुष भी इस रसमय फल (श्रीमद्भागवत) की उपेक्षा न करके नित्यकाल ही इसका सेवन किया करते हैं। (GVP)
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