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Srimad Bhagavatam Series- #23- Glories of Ekadasi

24:56
#24
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • What is the duty of a living being after taking human birth?
  • Why is Radhaji's name is mentioned confidentially in the Srimad Bhagavatam?
  • Pastime of Mahaprabhu doing ekadasi in Puri.
  • The view about Ekadasi of the pandas in Jagannatha Puri.
  • Glories of Ekadasi.
  • One should follow ekadasi with full determination.
  • One should never do udyapana (stop observing a fast) of ekadasi.
  • Importance of parana (fast breaking) time of ekadasi.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 23 : एकादशी की महिमा

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 6 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज एकादशी है। [आप लोग] “राधे-राधे” तो बहुत करते हैं, बड़े आनन्द से “राधे-राधे” [करते हैं—किन्‍तु] एकादशी कितने लोगों ने की है? इसलिये एकादशी-व्रत [अवश्य] करना चाहिये। केवल “राधे-राधे” कहने से [वास्तविक] “राधे-राधे” नहीं होगा। जो एकादशी [का पालन] नहीं करते, वे [वास्तव में] भगवद्-भजन भी नहीं करते; उनके लिए राधाजी कोटि-कोटि जन्मों तक भी बहुत दूर है।

नारदजी के ध्यान में भी नहीं आनेवाली राधाजी बाजार की इतनी सस्ती सब्जी या कचौड़ी नहीं हैं कि मुख में रख दिया। [राधाजी तो] शुकदेव गोस्वामी के लिए भी अलभ्य हैं, नारदजी के लिए भी अलभ्य हैं। इसलिये हम लोंगो को साथ-साथ इन बातों को भी सुनना चाहिये।

यह शरीर कैसा है? यह एक बाजे [के समान] है। जिन्होंने अपने जीवन में भगवान् का भजन नहीं किया, और अपने अनर्थों को दूर करके भगवान् का भजन नहीं किया, जो कामी हैं, क्रोधी हैं, लोभी हैं, जिनके हृदय में समस्त कुसंस्कार भरे पड़े हैं—[क्या] उनके मुख से कभी “राधा-राधा” नाम होगा? उसके लिए अपने को प्रस्तुत करना पड़ेगा।

भगवान् ने बड़ा दुर्लभ यह मनुष्य शरीर दिया है, और [साथ ही] गुरुरूपी कर्णधार भी दिया है। जो लोग एक पैसे का भोग नहीं छोड़ सकते, अपना स्वार्थ नहीं छोड़ सकते—वे क्या शुद्धभक्ति करेंगे? भगवान् ने अनुग्रह करके यह दुर्लभ शरीर दिया, गुरुरूपी कृपा भी दिलाई, साधुओं का सङ्ग भी दिया, व्रज-वृन्‍दावन में स्थान भी दिया—[यदि] इस पर भी भगवान् का भजन नहीं करते हैं, [तो यह अत्यन्‍त दुर्भाग्य की बात है।]

यह शरीर कैसा है? एक काँच के बाजे के समान है—एक कंकड़ लग गया, तो चकनाचूर हो जायेगा। इसलिये इसका सदुपयोग करना चाहिये। गुरु-वैष्णवों के आनुगत्य में साधन-भजन करें, निष्किञ्‍चन बनिये, गुरुजी के आदेश का पालन कीजिये। साथ-साथ त्याग और वैराग्य भी हो। भागवत में वैराग्य की भी बात आयी है। ज्ञान और वैराग्य भक्ति के पुत्र हैं। इसलिये त्याग, वैराग्य, संयम, तृणादपि सुनीच भाव [धारण करके,] तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य को दूर करके इस [शरीररूपी] बाजे का प्रयोग भगवान् का भजन करने के लिए किया जाये; और नहीं तो कब एक कंकड़ी लगेगी और यह सब चूर-चूर हो जायेगा।

इस [शरीररूपी] बाजे में सुन्दर सप्त-स्वर भी हैं और सब कितनी चीजे हैं! यदि गुरु-वैष्णवों के आनुगत्य में शिक्षा लाभ करके इस स्वर को बजाया जाये तो भगवान्—राधा और कृष्ण—दोनों प्रसन्न हो जायेंगे और उनकी भक्ति सहज ही मिल जायेगी।

अब जरा एक [कीर्तन] सुनिये तो, उसके बाद फिर कथा [आरम्भ करेंगे।]

[3.30-9.25 तक कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण ही भगवत्ता की सीमा हैं, और राधाजी उनकी ह्लादिनी शक्ति हैं। भागवत का सार भी राधा-कृष्ण की उपासना में ही [निहित] है। समस्त देवताओं की उपासना मिलकर भी राधा-कृष्ण की उपासना के पासङ्ग में भी नहीं आ सकती—कोटि-कोटि भाग में भी उसका एक भाग नहीं होता। यह बात आप लोगों ने अन्त की कथा में भी श्रवण की है।

गोपियों की आराधना कृष्ण की सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ [आराधना] है। स्वयं कृष्ण ही अपनी प्रियाजी की आराधना करते हैं, इसलिये उनकी आराध्या देवी का नाम “राधिकाजी” है—यह भी आपने सुना है। और यह भी सुना कि भागवत में शुकदेव गोस्वामी ने “राधा” नाम का उच्चारण नहीं किया; क्योंकि राधा नाम उच्चारण करते ही उनके हृदय में प्रेम की ऐसी बाढ़ आ जाती कि वे विह्वल हो जाते—[और तब] भागवत की कथा ही नहीं हो पाती। [इस प्रकार] श्रीमती राधिकाजी का [नाम अत्यन्त] गुप्त और समस्त सारों का सार है।

[अब प्रश्न यह है कि] ऐसा प्रेम [कैसे हो?] अथवा राधिकाजी और कृष्ण के प्रति हमारी ममता कैसे हो? वैसी भक्ति हमको कैसे मिले? इसीलिये भागवतजी का अवतार हुआ है। कृष्ण ही भागवत के रूप में अवतरित हुए हैं। [और यह] कैसे [सम्भव] होगा? इसीके लिए एकादश-स्क‍न्ध बतलाया। यह साधन [का मार्ग बताता है।] अब हम लोगों की उसी एकादश-स्क‍न्ध की कथा आरम्भ होने जा रही है। कैसे हम लोग उन्‍हें प्राप्त कर सकते हैं? [हमने यह तो] सुन लिया कि उनकी उपासना ऐसी रसमयी है, कृष्ण की लीलाएँ ऐसी हैं; [किन्‍तु] हम उन राधा-कृष्ण की, और गोपियों के भाव की सेवा कैसे कर सकते है?

इसीके लिए प्रारम्भ से ही सब उपदेश दिये गये हैं। उन उपदेशों में हम देखते हैं कि पहले नारदजी आते हैं और वसुदेवजी को उपदेश देते हैं कि हम जीव भगवान् की भक्ति कैसे लाभ कर सकते हैं, और ऐसी प्रेम-भक्ति कैसे लाभ कर सकते हैं। उसी प्रेम के लिए लगभग 500 वर्ष पूर्व श्रीचैतन्य महाप्रभु भी अवतरित हुए और अपने परिकरों के द्वारा कृष्णप्रेम का वितरण किया।

[अब प्रश्न है—यह] कैसे होगा? इसके लिए हमें साधन के मार्ग पर चलना पड़ेगा। बिना पेड़ के ऊपर चढ़े उसके फल को ले लेंगे—ऐसा सम्भव नहीं है। अब हम लोगों ने सुना कि कृष्णप्रेम ही सर्वोत्तम वस्तु है, और यही हम लोग लेंगे; कि‍न्तु किस साधन से वे मिलेंगे?

सबसे पहली बात यह है कि गुरु-मुख से यह सुनो कि “मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं यह मन भी नहीं हूँ।” इस संसार में हमारे भोग की जितनी भी सामग्रियाँ हैं—रुपये-पैसे, ब‍न्धु-बा‍न्धव आदि—ये जितने भी हैं, हमको एक सेकण्‍ड के लिए भी सुखी नहीं कर सकते हैं; इन विचारों को समझो।

गृहस्थ [जीवन में] रहते हुए भी ध्रुव और प्रह्लाद की भाँति, तथा महाप्रभु के परिकरो की भाँति, इन सब से निस्पृह रहो—आसक्त मत होओ। इसीलिये अभी हम लोगों ने एकादश-स्क‍न्ध के पहले इस शरीर के सम्ब‍न्ध में बतलाया कि ये काँच के बाजे [के समान] है—ठोकर लगने से ही यह फूट जायेगा। आप लोग देखते हैं न—समाचार-पत्रों में आता है: आज कोई मर गया, कल कोई मर गया; कहीं दस, बीस, यहाँ तक कि हजारों लोग मर गये—ये सब सुनते हैं। इस जीवन का कोई निश्चित [भरोसा] नहीं है—यह भी निश्चित नहीं कि यहाँ से हम चलेंगे तो घर पहुँचेगे या नहीं। इसलिये हम लोगों को अब साधन करना चाहिये।

साधन [के विषय] में हमारे नवयोगेन्द्रों ने महाराज निमि को जो साधन बतलाया, उन साधनों को अब हम लोग आरम्भ करेंगे। आप लोग ध्यान से श्रवण कीजिये। इन साधनों में एकादशी-[व्रत का पालन] भी एक है।

जो लोग एकादशी [का पालन] नहीं करते और साधन-भजन सब करते हैं, कीर्तन भी करते हैं, भागवत भी सुनते हैं, सब कुछ करते है, यदि एकादशी का व्रत नहीं करते तो समझना चाहिये कि उन्हें नाम में भी विश्वास नहीं और भागवत में भी विश्वास नहीं। इसलिये एकादशी अवश्य करनी चाहिये। यदि प्राणों की भी बाजी लग जाये, [तब भी] एकादशी नहीं छोड़नी है।

चैतन्य महाप्रभुजी को पुरी में एक बार प‍ण्डों ने कहा— “यहाँ तो एकादशी उलटी [लटकी] हुई है। यहाँ एकादशी नहीं करते।” [उसी दिन] शाम को [प‍ण्डों ने] ठाकुरजी का जितना अन्न, मालपुआ और विविध प्रकार के छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन थे, वह सब ला करके [उनके सामने] रख दिया। तब महाप्रभुजी ने महाप्रसाद की स्तव-स्तुति करनी आरम्भ की।

एकादशी [का पालन] न करने से बहुत से पाप लगते हैं। उस दिन अन्न खाने से जितने भी विश्व-ब्रह्माण्ड में पाप हैं—ब्रह्महत्या, गुरुहत्या से लेकर गौहत्या तक सब पाप अन्न में प्रवेश करते हैं। इसलिये उस दिन अन्न—गेहूँ, चना, या चावल से बनी हुई कोई वस्तु, या अन्नजातीय पदार्थों को ग्रहण मत करो।

जब महाप्रभुजी [के सामने वह महाप्रसाद] रखा गया, तो उन्होंने अपने भक्तों के साथ उसका गुणगान किया, उसकी परिक्रमा की, स्तव-स्तुति की और 1008 बार उसे प्रणाम किया। कीर्तन करते-करते सारी रात बिता दी। सवेरे समुद्र-स्नान किया और जब सूरज उदय हो गया तथा पारण का समय हो गया, तो महाप्रसाद को अपने भक्तों में बाँटकर [स्वयं भी] ग्रहण किया।

वहाँ पर पण्डे उलटे हुए हैं, भगवान् उलटे नहीं हैं, और एकादशी भी उलटी नहीं होती। पण्डे लोग [स्वयं] उलट गये हैं न—इसलिये उलटने से वे एकादशी को भी उलटा देखते हैं। [वास्तव में] एकादशी सीधी खड़ी है और पण्डे उलट गये हैं। उलट करके नीचे से वे देखते हैं कि एकादशी उलटी हुई है। इसलिये ऐसा देखते हैं। एकादशी कभी नहीं उलटती।

आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष के अन्‍दर—लड़का हो या लड़की, किसी भी जाति का क्यों न हो—सबको [एकादशी-व्रत] अवश्य करना चाहिये। यदि निर्जला उपवास करने में असमर्थ हैं, तो एक बार थोड़ा-सा दूध या कुछ शरबत भगवान् को भोग दे करके [ग्रहण कर सकते हैं।] यदि उससे भी नहीं चलता है, तो… हम लोग कलियुगी जीव हैं, [इसलिये बहाने बनाते हैं। किन्‍तु] इच्छा होने से चल जायेगा। लड़की के विवाह के दिन में सब कैसे उपवास कर लेते हैं? और एकादशी के दिन उपवासी नहीं रहा जायेगा! पति और पत्नी में ठकर और ठुकुर हुई, तो तीन दिन पानी नहीं पिया—ये तो हो जाता है, किन्‍तु भगवान् के लिए एकादशी में [उपवास] नहीं कर सकते?

कोई-कोई कहते हैं—“सिर में दर्द हो जाता है, ऐसा हो जाता है। कुट्टू का हलवा खाने से भी पेट गर्म हो जाता है। हमको सहन नहीं होता है। हमारे घर में इसी दिन एक व्यक्ति मर गया था, इसलिये एकादशी हमारे यहाँ [नहीं करते।]” ये सब बहानेबाजी हैं।

भक्त: और फिर उद्यापन…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और सबसे बड़ी बात— [कुछ लोग ऐसा भी करते हैं कि,] “महारानी एकादशीजी! हमने आपको पाँच वर्ष बड़े कष्ट से किया, अब आप अपने घर को विदा हो जाइये,” और [इस प्रकार] एकादशी का उद्यापन कर देते हैं। [किन्तु] यह सबसे बड़ा दोष है।

जितने भी लोग यहाँ पर हैं, खबरदार—एकादशी का उद्यापन कभी मत कीजिये। [एकादशी का उद्यापन करने से] पहले अपनी मैया और बाप का उद्यापन कर दीजिये कि प्रभु! आप अब विदाई लीजिये, लक्ष्मीजी का पहले उद्यापन कर दीजिये। तो [एकादशी का] उद्यापन नहीं [करना है।] अरे, एकादशी तो लक्ष्मीजी की भी लक्ष्मी हैं, कृष्ण की प्रिया हैं। [ऐसी एकादशी को,] जो हमारे घर आयी हैं, क्या इनको विदा करना चाहिये?

इसलिये कुछ लोगों का ऐसा विचार है कि एकादशी का उद्यापन [करवायेंगे] तो ग्यारह-[ग्यारह वस्तुएँ] आ जायेंगी—ग्यारह गिलास, ग्यारह कपड़े, ग्यारह गमछे, ग्यारह थाले, ग्यारह बाटियाँ और कुछ पैसे, कम-से-कम ग्यारह रुपये तो मिल ही जायेंगे। ये सब करने मत जाओ।

जो यहाँ से सुनकर जायें, वे [कभी] एकादशी समाप्त मत करना। अस्सी वर्ष तक तो अवश्य [पालन] करो और यदि नहीं होगा, तो उस समय देखा जायेगा। और यदि उससे पहले ही मृत्यु हो गयी तो?

एक एकादशी का इतना महत्व है कि वह विश्व-ब्रह्माण्ड के समस्त पापों को ध्वंस कर देती है। हम लोगों ने [ऐसा भी] देखा है कि [कोई व्यक्ति मृत्यु-शय्या पर है—] मर नहीं रहा, प्राण निकल नहीं रहे, बड़े दुःख से दुःखी हो रहा है, छटपट कर रहा है, [बिस्तर पर ही] मल और मूत्र हो रहा है। तब एक व्यक्ति ने कहा कि अच्छा, इसकी मृत्यु नहीं हो रही है। मैं अपनी एकादशियों में से एक एकादशी का फल इसको दे देता हूँ। जहाँ [मृत्यु-शय्या पर लेटे व्यक्ति के] कान में गया— “मैं अपने एक एकादशी-व्रत का फल तुम्हें संकल्प करके देता हूँ”, झट एकदम उसकी आँखे खुल गयी, उसे होश हो गया और बड़े सुख से, सबके देखते-देखते ही भगवान् का नाम स्मरण करते हुए प्राणों को छोड़ दिया।

भक्त: बोलो बाँकेबिहारी लाल की जय! एकादशी महारानी की जय!

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसलिये यहाँ जितने भी उपस्थित हैं—लड़के, लड़कियाँ, वृद्ध, युवा—जो [अभी तक एकादशी का पालन] नहीं करते, वे आज से ही एकादशी करना आरम्भ कर दें। यदि इससे किसी प्रकार का अहित होगा, तो मैं उसके लिए जिम्मेदार रहूँगा; आप लोग आकर मुझसे कहेंगे।

भक्त: गौर प्रेमान‍न्दे हरि हरि बोल!

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि भक्ति लाभ करनी है, यदि भागवत को हृदयङ्गम करना है, यदि कीर्तन करना है और यदि साधन-भजन करना है—तो यही एकादशी से आरम्‍भ करो। इससे तुम्हारे समस्त मनोरथ परिपूर्ण हो जायेंगे। अन्‍ततः आज गाँठ में बाँध करके इस वस्तु को लेकर जाना कि एकादशी [का पालन अवश्य करना है।]

दूसरी बात—एकादशी करने में अगले दिन का भी [विशेष] ध्यान रखना चाहिये। द्वादशी का पहला चरण भी एकादशी ही होता है। इसलिये द्वादशी के पहले चरण के बाद ही पारण करना चाहिये। हमारे यहाँ से छोटी-सी पञ्‍जिका निकलती है, [जिसे] हम बिना पैसा, बिना मूल्य के वितरण करते हैं। उसमें पारण का समय दिया रहता है।

अम्बरीष महाराज और दुर्वासा [ऋषि] में यही तो विवाद का विषय हुआ। पारण का समय [निकला] जा रहा था और दुर्वासाजी आये और अम्बरीष महाराज ने दुर्वासा का ख्याल नहीं करके पारण [के समय को अधिक गुरुत्व] दिया। इसलिये [भगवान् के सुदर्शन] चक्र ने अम्बरीष महाराज की रक्षा की; नहीं तो दुर्वासा उन्‍हें जला देते। इसलिये पारण [नियत] समय के भीतर ही करना चाहिये। सूर्योदय से ले करके जो समय दिया जाता है, उस पर भी ध्यान रखेंगे। उत्तर भारत के लोग पारण पर ध्यान नहीं देते—एकादशी कर ली, [कभी पारण] बारह बजे किया, [कभी] नहीं किया—ऐसा कुछ [उचित] नहीं है।

ठाकुरजी का पाठ-पूजन करके जिन वैष्णवों, भक्तों या ब्राह्मणों को देना है, दे दो और [उसके बाद] स्वयं भी समय के भीतर में पारण कर लो—[भले ही] एक दाना ही हो। इससे तुम्हें पूरा फल मिलेगा और कृष्ण के चरणों में प्रेम मिलेगा। इस प्रकार एकादशी का व्रत पालन करना चाहिये। और भी जो नियम एकादश स्क‍न्ध में आयेंगे, उन नियमों के अनुसार हम साधन-भजन करके इस अत्यन्‍त सु‍न्दर सारयुक्त कृष्ण-प्रेम [की प्राप्ति] के लिए अग्रसर होंगे। अब आगे…

भक्त: एकादशी में चाय नहीं चलती?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एकादशी के दिन चाय मत लेना, भंग (भांग) मत लेना। बहुत से लोग भंग और चाय को देखकर [सोचते] हैं कि यह अन्न तो नहीं है, इसलिये चाय और भंग चल सकता है—[किन्‍तु ऐसा नहीं है।] साबूदाना आजकल आटा मिला करके बनाया जाता है; पहले शुद्ध होता था, इसलिये अब वह भी मना है। साँवा का चावल या पसाई चावल मत लेना—ये सब अन्न के अन्‍तर्गत हैं। इन्‍हें मत लेना। भगवान् ने दूध, घी, फल, मूल, केले प्रचुर मात्रा में दिये हैं—[उन्हीं का सेवन करें।] अरे, कुछ नहीं तो थोड़ा-सा गुड़ लेकर पानी पी लो, इसमें कोई भी दोष नहीं है। यदि [निर्जला-]उपवास कर सको, तो अच्छा है।

इन सब वस्तुओं को ले करके जाओ [अर्थात् पालन करो]—यह भागवत का सुनना हुआ। अब आगे की कथा में हम लोग साधन के सम्ब‍न्ध में विचार करेंगे। यह भागवत में बतलायेंगे। सम्भवतः अब तो समय हो गया है। इसलिये बस छोड़ दो। शाम को हम लोग [पुनः] आयेंगे।

[23:46-23:57 तक कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …करके बोले ‘स्मर-गरल [खण्डनं]…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …कथा का हम समापन करेंगे। यहाँ पर तो [कथा] प्रतिदिन होती ही रहती है, इसलिये समापन तो नहीं; किन्‍तु ये दस दिन का जो हमने समस्त भागवत सुनने का संकल्प किया था, आज हम लोग उसका समापन करेंगे। आप लोग तुलसी का एक-एक पत्ता लायेंगे और भागवत का पूजन करेंगे। हम लोग आरती करेंगे। कल हम लोग पूर्णाहुति में हवन इत्यादि करेंगे। पहले हम लोग एक-आध घण्‍टे भागवत का माहात्म्य वर्णन करेंगे। [उसके बाद प्रातः] 8:00 बजे से हम लोग हवन करेंगे। सम्भवतः 10:00 बजे तक वह समाप्त होगा। फिर जैसा होगा, प्रसाद थोड़ा-सा ग्रहण करेंगे। और [सबसे महत्वपूर्ण बात—] जीवनभर हम इन सभी शिक्षाओं को याद रखेंगे।

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