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Srimad Bhagavatam Series- #21- Krsna & Balarama Go To Mathura

31:00
#13
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Srimad-bhagavatam day 9
  • After killing Kamsa, Krsna handed over the kingdom of Mathura to King Ugrasena.
  • Residents of Mathura kept Krsna and Balarama busy so that they could not meet Nandababa.
  • Somehow Krsna-Balarama found an opportunity to meet Nandababa after two days.
  • Krsna Baladeva's meeting with Nand Baba after killing Kamsa and sending him to Vraja after consoling him.
  • Why Krsna left Vraja and went to Mathura despite receiving immense love in Vraja.
  • Why didn't Krsna keep the Vrajavasis with him in Mathura?
  • Description of Krsna's upanayana samskara (thread ceremony).
  • Krsna always resides in Vraja in one form and in Mathura in another form.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 21 : कृष्ण और बलदेव का मथुरा-गमन

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 5 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवान् की बड़ी कृपा है। [श्रीमद्भागवत कथा के] आठ दिन समाप्त हुए और आज नौवाँ दिन चल रहा है। इसमें हम लोगों की व्रज की लीलाएँ प्रायः समाप्त होने को हैं। अब उत्तरार्ध की लीलाएँ प्रारम्भ होंगी। पूर्वार्ध में 49 अध्याय हैं और परार्ध (उत्तरार्ध) [अर्थात्] दूसरा जो आधा भाग है, उसमें 41 [अध्याय हैं।] कल भागवत के एक विद्वान पण्डित वसन्तलालजी पूछ रहे थे कि एक में इधर 49 अध्याय हैं और उधर में 41 अध्याय हैं। तो इसे पूर्वार्ध (पूर्व अर्ध) और परार्ध (पर अर्ध) कैसे [कहा जाये?] बीच से [आधा-आधा] होना चाहिये न? यदि श्रीमद्भागवत [के दशम-स्कन्‍ध] में 90 अध्याय हैं, तो 45-45 [अध्याय] होने चाहिये, तभी तो पूर्वार्ध और परार्ध होंगे।

यह स्थूल, मोटी बुद्धि का कार्य है। वह आधे का अर्थ केवल [संख्या के आधार पर, ठीक] आधा-आधा ही समझती है। [किन्तु यहाँ] आधा इस प्रकार नहीं है। भगवान् की लीलाओं में आधे [का विभाजन] ऐश्वर्य-लीला और माधुर्य-लीला [के आधार पर] होता है। जब तक भगवान् व्रज में रहे, तब तक यह निःसन्देह उनकी नर-लीलावत् माधुर्य-लीला है। यदि असुरों को भी मारा है, तो छोटे बच्चे हो करके ही [किया है।] कोई बड़ा भयंकर रूप धारण करके अथवा किसी भी अस्त्र-शस्त्र से दैत्य या दानव को नहीं मारा। [इस प्रकार व्रज में रहकर] मधुर लीलाएँ कीं। जहाँ तक 46वें-47वें अध्याय का [प्रसंग] है, उसमें भ्रमरगीत इत्यादि हैं। कृष्ण मथुरा आये हैं। अक्रूरजी उनको मथुरा ले आये हैं। नन्दबाबा भी साथ में गये हैं और गोपाल बालक भी वहाँ पर गये हैं। उस समय कृष्ण का चित्त कैसा है? व्रज का भाराक्रान्‍त है; केवल व्रजभाव [ही उनके हृदय में है।]

कंस के मारे जाने के बाद नन्दबाबा मथुरापुरी से बाहर यमुना के तट पर खेमे में ठहरे हुए हैं। बैलगाड़ियों के बीच ही खेमा लगा हुआ है। पास ही एक पेड़ है, और वे उसी के नीचे बैठे हैं। वे कंस का कर इत्यादि दे चुके हैं। कंस का वध हो गया है। कृष्ण और बलदेवजी ने सहजरूप में ही कंस, चाणूर, [मुष्टिक,] और शल-तोषल इत्यादि [असुरों] का वध कर दिया। कंस की देह का भी संस्कार करा दिया। फिर गताश्रम-टीले में बैठे और [कुछ] श्रम भी दूर किया। इधर वसुदेवजी, देवकी, अक्रूर, कंस के पिता उग्रसेन तथा मथुरा के जितने लोग और प्रौढ़ा स्त्रियाँ इत्यादि हैं, वे सभी कृष्ण और बलदेवजी को घेर करके बैठ गये।

वे सभी उन्हें एक मिनट के लिए भी अकेले नहीं छोड़ते कि कहीं यह नन्दबाबा के पास न चला जाये और [वे स्त्रियाँ] उन्‍हें “लाला, लाला!” कहते हुए कहती हैं— “यह देवकी और वसुदेवजी का ही लाला है। [इसका जन्म तो] यहाँ पर ही हुआ था [किन्तु कंस के भय से] इसे गोकुल भेज दिया गया।” और वे सभी उस समय मानो बिछुड़े हुए पुत्र को गोदी में लेकर एकदम कसकर बाँध रही हैं और अपना प्रेम और स्नेह दे रही हैं। [किन्‍तु यह सब देखकर] कृष्ण और बलदेवजी का हृदय अत्यन्त विषाद से भर जाता है। [उनके लिए तो] मानो यह सब बिच्छू के डंक से भी अधिक [पीड़ादायक हो रहा है।] वे तो शीघ्र-से-शीघ्र गोकुल, वृन्दावन पहुँचना चाहते हैं। विशेषकर जब वे सभी कहती हैं— “अरे, देखो तो यह देवकी का लड़का है, देवकी का लाला है, वसुदेव का लड़का है।” जब ऐसा कहती हैं, तो उनके हृदय में और भी अधिक वेदना होती है। किन्तु वे किसी से कुछ कह भी नहीं सकते।

कृष्ण का राज्याभिषेक करने के लिए कंस के पिता उग्रसेनजी आये। सोने के थाल में भरकर अभिषेक की सारी वस्तुएँ लायी गयीं कि कृष्ण को ही यहाँ का राजा बना दिया जाये। किन्तु कृष्ण ने बड़ी नम्रता से उन्हीं सब सामग्रियों से उग्रसेनजी का ही अभिषेक कर दिया। [उन्होंने सोचा कि] कहीं कोई यह न समझे कि मैंने राज्य के लोभ से कंस को मारा है। इसलिये वह सब उनको दे दिया। “और यदि मैंने राज्य ले लिया, तो फिर यहीं रहना पड़ेगा। हमें तो शीघ्र-से-शीघ्र व्रज लौटना है—मैया के पास और बाबा के पास लौटना है।” इसलिये यह राज्य-वाज्य कुछ भी नहीं लिया। अब यह (राज्याभिषेक) भी हो गया।

कृष्ण ने उग्रसेन को राज्य देकर कहा— “मैं स्वयं सब समय आपकी सेवा में उपस्थित हूँ। आपको किसी प्रकार का भय [करने की आवश्यकता] नहीं है। [यदि आप कहें तो] यम को भी आपके लिए उपहारस्वरूप लाकर आपके चरणों में प्रदान करें। साधारण राजाओं की तो बात क्या!” किसी प्रकार कृष्ण के कहने पर उन्होंने राज्य ले लिया।

[इस प्रकार] करते-करते दो दिन बीत गये। राजा तो [उग्रसेनजी] बने हैं, किन्तु जितनी प्रशंसा और जो कुछ होता, सब कृष्ण और बलदेवजी [का होता और सभी उनके] पास आते।

[उधर नन्दबाबा की] रात कैसे कटी? [वे विचार कर रहे हैं—] “दो शब्द हमें कहने के लिए, सान्त्वना देने के लिए भी कोई नहीं आया? अपना पुत्र तो अपना पुत्र [बलराम], हमारे पुत्र को भी वहीं रख लिया। न जाने उसकी क्या इच्छा है?” उन्‍होंने लोगों के मुख से सुना— “बाबा! यह तो बड़ा भारी गड़बड़ हो रहा है। मथुरावाले सभी कहते हैं कि कृष्ण देवकी और वसुदेवजी का पुत्र है।”

अब तो नन्‍दबाबा को यशोदाजी और व्रजवासियों से कही हुई बातें याद आने लगीं— “मैंने उन्‍हें कहा था कि कल ही कृष्ण को ले आयेंगे, नहीं तो परसों अवश्य ले आयेंगे।” [किन्तु अब उनके मन में विचार आने लगा—] “क्या ये सचमुच हमारे साथ धोखा कर रहे हैं? या क्या बात है?”

शाम हो गयी। कोई नहीं आया। एक दिन [बीत] गया, दो दिन [बीत] गये। [सोचते रहे—] “अब आयेंगे…! अब आयेंगे…! अन्ततः कृष्ण और बलदेव तो मुझे बोल ही सकते थे? आज वे भी [नहीं आ रहे।] विधाता वाम होने पर ऐसा ही होता है। हमारा बेटा कृष्ण भी नहीं आ रहा! बलदेव तो मुझे ही ‘पिता’ कहता है और वह भी नहीं आया! इसलिये बड़े अन्यमनस्क [चिन्तित, अनमना] होकर बड़े दुःखी हो गये।

शाम हो गयी। चन्द्र निकल आया, तारे भी निकल रहे हैं। नन्‍दबाबा को न नींद है और न कुछ है। थोड़ा-सा अन्धकार हुआ, तो देखा कि श्याम और राम दोनोंं उपस्थित हैं।

बाबा को इस स्थिति में देख करके [दोनों के हृदय द्रवित हो गये।] बाबा का चेहरा उतरा हुआ था, वे बड़े दुःखी थे। और जैसे ही उन्होंने कृष्ण और बलदेवजी को देखा, उनकी आँखों में आँसू छलछला आये।

कृष्ण और बलदेवजी सचमुच सोच रहे हैं— “हमारा यह अपराध हो गया। दो दिन हो गये, और हम लोग बाबा के यहाँ नहीं आये, पिताजी के यहाँ नहीं आये। हमने बहुत ही अन्याय कर दिया।”

नन्दबाबा को इस प्रकार रोते देखकर [दोनों] चुपचाप उनकी गोद में बैठ गये—दाहिनी ओर बलदेवजी और बायीं ओर कृष्ण। और [दोनों ने अपने हाथों से] बाबा की आँखों के आँसू पोंछे। [किन्तु] उस समय नन्दबाबा और भी [अधिक] रोने लगे। [उन्हें रोता देखकर] कृष्ण और बलदेवजी भी रोने लगे।

बलदेवजी ने पूछा— “पिताजी! आप रोते क्यों हैं?” कृष्ण को तो कुछ पूछने का भी साहस नहीं हुआ।

उस समय बलदेवजी कहते हैं— “पिताजी! आप कुछ दूसरी बात क्यों समझ रहे हैं? हम तो आपके ही पुत्र हैं। यद्यपि मैं आपका औरस पुत्र नहीं हूँ, किन्तु जब लोग कहते हैं कि तुम दोनों वसुदेव के पुत्र हो, तब मेरी समझ में नहीं आता कि वे ऐसा क्यों कहते हैं। मान लिया कि मैं रोहिणी मैया का पुत्र हूँ, किन्‍तु मेरे पिताजी [तो आप ही] हैं। हमने तो कभी वसुदेवजी को अपना पिता और देवकी को अपनी मैया नहीं माना। हमने सब समय आप ही को अपना जाना। हमको पता नहीं कि हमारा जन्म कहाँ हुआ। हमारा जन्म तो गोकुल में ही हुआ। हमने रोहिणी मैया और यशोदा मैया को ही अपनी मैया समझा। कृष्ण (कन्हैया) को अपना भैया समझा। मुझे और तो कुछ पता नहीं।”

[फिर बलदेवजी कहने लगे—] “पिता भी बहुत प्रकार के होते हैं। एक जन्म देनेवाला पिता होता है। दूसरा पालन-पोषण करनेवाला [पिता होता है।] तीसरा यज्ञोपवीत (उपनयन) करानेवाला [पिता होता है।] चौथा गुरु-मन्त्र देनेवाला गुरु, जो सबसे श्रेष्ठ पिता है। विवाह कराकर अपनी कन्या को देनेवाला भी पिता कहलाता है [अर्थात्] ससुर को भी पिता कहा जाता है। और जो देश का राजा अन्न इत्यादि के द्वारा [प्रजा का] पालन और रक्षा करता है, शत्रुओं से प्राणों की रक्षा करता है, वह भी पिता कहलाता है। हमने देखा कि सब प्रकार से आप ही हमारे पिताजी हैं। यदि वसुदेवजी हमारे [जन्मदाता] भी हों, तो भी उन्होंने हमारा पालन-पोषण नहीं किया। मैंने तो उन्हें कभी पिताजी नहीं कहा। कभी मैंने उन्हें देखा नहीं, अब देख रहा हूँ। देवकी माता को भी आज ही देख रहा हूँ। इसलिये आप ही हमारे पिता हैं और जीवनभर आप ही हमारे पिता रहेंगे। सर्वत्र, सब समय और चिरकाल के आप ही हमारे पिता हैं।”

[यह सुनकर] अब थोड़ा-सा उनका कण्ठ खुला। वे भी कुछ बातचीत करने लगे। उन्होंने कहा— “देखो, वसुदेव के तो छह पुत्र मारे गये। सातवाँ गर्भस्राव हो गया। उन्‍होंने बहुत दुःख और कष्ट पाया। और आठवीं जो सन्तान हुई, वह लड़की हुई। इसलिये यदि तुम दोनोंं अभी हमारे साथ चल दोगे, तो वसुदेव, देवकी और यहाँ के सभी लोग मर जायेंगे। इसलिये मेरी इच्छा यह है कि तुम (बलदेव) अभी दो-चार दिन यहीं ठहर जाओ और मैं कन्हैया को लेकर व्रज चला जाता हूँ।”

[फिर उन्‍होंने कृष्ण से कहा—] “कन्हैया! यह कैसी बात है? ठीक है?”

तो कन्हैया थोड़ा-से चुप हो गये और चुप हो करके फिर कहते हैं— “पिताजी! मैं [एक बात कहना] चाहता हूँ। बलदेव मेरे बिना एक क्षण नहीं ठहर सकेगा। इसलिये यदि मैं आपके साथ चलता हूँ, तो बलदेव भी हमारे साथ चला आयेगा। और यदि बलदेव चले जायेंगे, तो वसुदेव, देवकी और जितने लोग हैं, वे सब मारे जायेंगे। इसलिये यदि आप आदेश दें तो मेरी ऐसी इच्छा है कि हम दो-तीन दिन और यहीं ठहर जायें और ठहरने के बाद यहाँ के लोगों को सान्‍त्वना देकर फिर आपके [पास चले आयेंगे।] ये सब आपके ही सगे-सम्बन्धी हैं, आप ही से इनका सम्बन्ध है; इसलिये मेरे साथ भी इनका सम्बन्ध है। नहीं तो [इसके अतिरिक्त], इनसे हमारा कोई भी सम्बन्ध नहीं है। इसलिये पहले इन लोगों को सान्‍त्वना ही दे दें और फिर हम बलदेव को लेकर [आपके पास व्रज में] पहुँच जायेंगे।

कृष्ण ने ऐसा कहा। [किन्तु] बलदेवजी ने कहा— “मैं नहीं रहूँगा। मैं तो बाबा के साथ ही जाऊँगा।” नन्दबाबा ने उनको समझाया।

अच्छा, कृष्ण की बात सुन करके [नन्‍दबाबा] रह तो नहीं सके। उनका हृदय उमड़-घुमड़कर बादलों की भाँति बरसने लगा, किन्तु [उन्होंने विचार किया कि] भैया [और अन्य सभी] के प्राणों की रक्षा भी करनी है। भाई माने वसुदेवजी। अब मन्त्रणा हो रही है। अन्त में यही तय हुआ, [किन्‍तु] यह नन्दबाबा ने नहीं किया, कृष्ण ने ही यह निर्णय किया— “दो-चार दिन अथवा दस दिन [यहाँ रहकर] सबको सान्त्वना दे दें और फिर हम दोनों भैया [व्रज] लौट आयेंगे।”

यहाँ एक प्रश्न उठता है। जहाँ प्रेम की भूमि होती है, वहीं अच्छा लगता है। जहाँ अधिक स्नेह, ममता और प्रेम मिलता है, वहीं कोई व्यक्ति रहना चाहता है। मथुरा भी प्रेम की भूमि है, [किन्तु] व्रज जैसा मधुर [प्रेम कहीं और नहीं है।] उससे बढ़कर कोई [स्थान] नहीं है। वृन्दावन के सभी लोग, व्रज के सभी लोग कृष्ण से अत्यन्त ममता और प्रेम करते हैं। [गोपियों का] वह महाप्रेम महाभाव को भी स्पर्श कर देता है और श्रीमती राधिका का महाप्रेम महाभाव की [चरम सीमा मादनाख्य महाभाव तक] पहुँच जाता है। मथुरा में ऐसा प्रेम नहीं है। वहाँ सब समय ऐश्वर्य की भावना है। ऐश्वर्य के द्वारा शिथिल प्रेम से कोई कृष्ण को वशीभूत नहीं कर सकता।

ऐसी स्थिति में कृष्ण को व्रज में रहना चाहिये। एक तो [प्रश्न यह है कि] कृष्ण प्रेमभूमि [व्रज] को छोड़ करके मथुरा क्यों आये? [और जब] मथुरा आ ही गये, तो कंस को मार करके तुरन्‍त वृन्दावन लौट जाते, किन्तु नहीं लौटे। [क्यों नहीं लौटे? उन्होंने कहा—] “कल आऊँगा, नहीं तो परसों आऊँगा।” फिर बरसों बीत गये, किन्‍तु नहीं आये। श्रीमद्भागवत में स्पष्टरूप से उनके व्रज में लौटने का कोई भी [वर्णन] नहीं है। हाँ, परोक्षरूप में कुछ [इङ्गित है।] परोक्षरूप में व्याख्या की जा सकती है—ऐसे कुछ स्थल हैं। तो कृष्ण प्रेमभूमि को छोड़ करके आये, [और फिर क्यों] नहीं लौटे?

कृष्ण ने मथुरा में कभी यह नहीं कहा— “देवकी मैया! मुझे मक्खन दो।” वे बड़े लज्जित रहते थे, संकुचित रहते थे। किसी से नहीं कह सकते थे। केवल यदि रोहिणी मैया आ जातीं, तो उनसे कुछ कह लेते। नहीं तो किसी को “मैया”, “पिताजी” [नहीं कहा] और स्वच्छन्द गति तो उनकी उसी दिन समाप्त हो गयी, जिस दिन वे मथुरा पहुँचे। तो फिर कृष्ण लौटकर [व्रज क्यों] नहीं गये?

अच्छा, यदि सब समय के लिए नहीं लौट सकते थे, तो एक-दो दिन के लिए ही वृन्दावन चले जाते? अच्छा, तो उन्‍हें सान्त्वना देने ही चले जाते। किन्‍तु सान्त्वना देने भी नहीं गये। सान्त्वना देने के लिए अपने दूत को भेजा; स्वयं नहीं गये।

क्या दूत से सान्त्वना होगी? क्या मट्ठे से दूध का स्वाद आयेगा? जिस प्रकार द्रोणाचार्य ने अपने पुत्र को दूध के बदले आटे को पानी में घोलकर, [उसे दूध जैसा] सफेद दिखाकर पिला दिया था, क्या उससे [तृप्ति] होती है? दूत को भेजा, स्वयं क्यों नहीं गये? [स्वयं भी] रो रहे हैं, तड़प रहे हैं; किन्तु फिर भी नहीं जा रहे। क्यों नहीं जा रहे? ये सब प्रश्न हैं। इन प्रश्नों का उत्तर देगा कौन? स्वयं मथुरादेवी देंगी। मथुरा के प्रतिनिधि उद्धवजी हैं। उद्धवजी व्रज में जायेंगे और समझेंगे। कृष्ण उनको भेजेंगे— “तुम व्रज का माहात्म्य समझो। तुम मथुरा हो, तुम द्वारका हो। जाओ! देखो कि व्रज कैसा है?”

दूसरी बात, एक और हो सकती है। भले ही कृष्ण [व्रज में] न जायें, [किन्‍तु जब] बाद में उन्होंने सोलह हजार कन्याओं के साथ विवाह किया, तो सोलह हजार कन्याएँ हों या एक करोड़ गोपियाँ भी हों, तो क्या उसमें आता-जाता है?

जितने मथुरावासी थे—करोड़ों-करोड़ों लोग—उनके लिए एक रात में ही विश्वकर्मा [के माध्यम से] [द्वारका में] भवन बनवा दिये। बनाये न? और किसी को पता भी नहीं चला कि रात में सोते हुए वे कब वहाँ पर पहुँच गये। [प्रातः उठकर] देखा तो [चारों ओर] सुन्दर वाटिकाएँ, एक-एक घर के सामने सुन्दर-सुन्दर बगीचे, सरोवर और चौरास्ते [चौराहे।] बच्चों के पढ़ने के लिए विद्यालय, सब प्रकार की सुविधाएँ जो इन्द्रपुरी [स्वर्ग] में भी नहीं हैं, उससे भी अधिक हो गयी। [जब हम लोग] जयपुर गये तो देखा कि कैसे सुन्दर-सुन्दर चौरास्ते, फूल-बगीचे इत्यादि।

[यदि कृष्ण स्वयं व्रज में नहीं जा पा रहे थे तो] फिर गोपियों को भी [मथुरा में ही] बुला लेते, नन्दबाबा और यशोदा मैया आदि को भी वहीं बुला लेते, और सबके लिए वहीं कहीं एक-एक घर बनवा देते, तो उसमें क्या बिगड़ता? उन्हें बुलाया क्यों नहीं? क्यों नहीं बुलाया?

श्रीमद्भागवत में इसका उत्तर तो दिया है, किन्तु उसे समझने के लिए कान चाहिये, वैसी बुद्धि और वैसी दृष्टि भी चाहिये। साधारण बुद्धि से इस विषय को नहीं समझा जा सकता। यदि गोपियों को, यशोदा मैया को और नन्दबाबा को मथुरा ले आते, तो उसमें हानि क्या थी? [किन्तु] हानि वैसी ही होती, जैसी कमल, गुलाब, बेली या चमेली के फूल को अपने वृन्त [डण्ठल या डण्डी] से तोड़ लिया जाये और दूसरी जगह लाया जाये, तो [क्या वह पहले जैसा ही] चहकता हुआ फूल रहेगा? कब तक [खिला] रहेगा? थोड़ी ही देर में मुरझा जायेगा।

नन्दबाबा मथुरा या द्वारका में रह सकते हैं या नहीं? एक सेकण्ड भी नहीं रह सकते। भले ही कृष्ण वृन्दावन को छोड़कर चले जायें, किन्‍तु व्रज को छोड़कर न तो नन्दबाबा जायेंगे, न यशोदा मैया जायेंगी, न व्रज के गोपाल जायेंगे, न व्रज की ग्वालिनें जायेंगी, न कोई गोपी आदि [जायेगी।] क्यों? भले ही तड़पती हुई मर जायेंगी [किन्तु वहाँ से कभी नहीं जायेंगी।] कृष्ण की सारी स्मृतियाँ कहाँ जुड़ी हुई हैं? व्रज से जुड़ी हुई हैं। [मथुरा में रहने से] कृष्ण को देखकर उन्‍हें कुछ-कुछ धीरज हो जायेगा, किन्तु जब वहाँ पर देखेंगे कि वसुदेव और देवकी कृष्ण को गोदी में लेकर प्रेम कर रहे हैं, और यदि उनको कृष्ण नहीं मिला तो क्या होगा? बस प्राण छोड़ देंगे।

देखो! कृष्ण का उपनयन-[संस्कार] हो रहा है। सारे लोगों को बुलाया गया, सबको निमन्त्रण किया गया। इधर के लोगों में विवाह से अधिक खर्च [उपनयन-संस्कार] में होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य [समाज] में उपनयन में अधिक खर्च होता है। यदि विवाह में एक लाख [खर्च] होगा, तो जनेऊ-[संस्कार] में भी एक लाख से कम नहीं होगा। तो बड़े समारोह के साथ कृष्ण और बलदेवजी का उपनयन हो रहा है। [वसुदेव और देवकी ने] इतनी शीघ्रता क्यों मचा दी? क्यों शीघ्रता कर रहे हैं? [कारण यह है कि] यदि नन्दबाबा आ गये, तो कृष्ण और बलदेव लौटकर व्रज चले जायेंगे। उन्‍हें सब समय यह भय बना हुआ है। इसलिये शीघ्र-से-शीघ्र उनका उपनयन कराकर उनमें क्षत्रिय अभिमान लाना है। और “ये मेरे [क्षत्रिय के] बेटे हैं”, इसलिये उपनयन करा रहे हैं।

व्रज में तो [उनका उपनयन] नहीं हुआ। ग्वाले का हो न हो, कोई बात नहीं। यदि [ग्वाल-बाल का उपनयन] बारह वर्ष या अठारह वर्ष के बाद भी हो, तो कोई बात नहीं। इसलिये कहा— “शीघ्र करो, दो-एक दिन के भीतर ही इनका उपनयन करा दो। जिससे वे यह समझ जायें कि “मैं क्षत्रिय बालक हूँ, मैं ग्वाल-बाल नहीं हूँ।

[इस उपनयन-संस्कार में] कहाँ-कहाँ से लोग आये! हस्तिनापुर से [लोग आये।] पाण्डव आये, कुन्तीजी आयीं। विदेश से आये। मिथिला से भी अनेक लोग आये। किन्तु व्रज तक निमन्त्रण नहीं पहुँचा। निमन्त्रण भेजा भी गया या नहीं, यह भी पता नहीं। पहले तो [यह होता] था कि [निकट में रहनेवाले] किसी को [विधिवत्] निमन्त्रण न भी जाये [तो कोई बात नहीं, बस] घर से बुला लो जल्दी से। किन्तु आज [व्रज में किसी भी प्रकार से] निमन्त्रण नहीं जा रहा। उपनयन आरम्भ हो गया। कृष्ण और बलदेवजी का मुण्डन कर दिया गया। उन्हें लकड़ी की खड़ाऊँ दी गयी, [हाथ में] दण्ड भी दे दिया और एकदम ब्रह्मचारी-[वेष धारण करा] दिया गया।

गुरुजी ने कहा— “भिक्षा ले आओ। [माताओं से] कहना— ‘भवति भिक्षां देहि।’ और पुरुषों से कहना— ‘भवान् भिक्षां देहि।’”

उन्हें झँगुली (छोटे बच्चे का ढीला-ढाला कुर्ता या झबला) जैसे पीले पोशाक पहना दिये गये। कृष्ण और बलदेवजी कितने सुन्दर लग रहे हैं! श्याम [और गौर] वर्ण के ऊपर ये पीले वस्त्र बड़े फब [शोभायमान हो] रहे हैं। और मुण्डन हो गया है न, इसलिये बड़े सुन्दर और सुकान्त दिख रहे हैं। करोड़ोंं कामदेवों को लज्जित करनेवाले ये दोनोंं बालक हैं।

तब गुरुजी ने कृष्ण को भिक्षा माँगने का आदेश दिया। [उनके कन्धे पर भिक्षा की] झोली बाँध दी गयी। देवकी मैया ने सोने के थाल में हीरे-जवाहरात भरकर रखे हैं कि सबसे पहले कृष्ण हमारे पास आयेगा। वहाँ उपस्थित अन्य माताएँ और पुरुष लोग भी [भिक्षा] देने के लिए प्रस्तुत हैं। किन्तु कृष्ण वहाँ जाकर केवल खड़े हो गये और [उसी क्षण उन्हें] व्रज की याद आ गयी। अभी व्रज की याद आ रही है। इसलिये जा करके बस केवल कहा— “मैया! मैया! और मैया!” [और ऐसा कहते-कहते ही] बस कटे हुए केले के पेड़ की भाँति [गिर पड़े।]

सब लोग दौड़े। कृष्ण ने देखा कि मैया तो यहाँ है ही नहीं। [उस समय उन्‍हें स्मरण हो आया—] “मेरी मैया यशोदा ने [एक समय] कहा था कि जब तुम्हारा उपनयन कराऊँगी, तो तुम्हारी झोली में सर्वस्व ले करके भर दूँगी। तुम उसे अपने गुरुजी को देना।” [अब वे सोचने लगे—] “आज मेरी मैया कहाँ है? यशोदा मैया कहाँ है?” [यह स्मरण होते ही वे] एकदम गिर पड़े। सब लोगों ने जाकर उन्‍हें उठाया, किन्तु उनका भावावेश नहीं बदला।

इसलिये मथुरा में रहते हुए भी कृष्ण का भावावेश व्रज से ही जुड़ा हुआ है। तो यदि गोपियाँ मथुरा या द्वारका आ भी जायें, [उनके लिए] राजभवन बन भी जायें, तो भी वे अपने वृन्त [आधार] वृन्दावन को छोड़ करके वहाँ पर नहीं रह सकतीं—एक सेकण्ड भी वहाँ नहीं रहेंगी। इसलिये वे [मथुरा या द्वारका] नहीं जा सकतीं। कृष्ण ने मथुरा आकर कंस को मारा और [अभी वहीं रह रहे हैं, किन्‍तु] अभी भी भावाविष्टता वैसी ही है।

[कंस-वध के दो-तीन दिन बाद, जब कृष्ण नन्दबाबा से मिले और उनसे कहा— “मैं और बलदेव कुछ दिन यहाँ के लोगों को सान्त्वना देकर व्रज लौट आयेंगे,”] तब नन्दबाबा ने क्या किया? उन्होंने कहा— “अच्छा, ठीक है।” कृष्ण ने उन्‍हें कुछ आभूषण दिये। [नन्दबाबा की उन्हें] लेने की इच्छा नहीं थी। [क्योंकि उनके मन में विचार आया—] “यशोदा कहेगी कि इन आभूषणों के बदले तुमने अपने बेटे को बेच दिया।” तो भी उन्होंने ले लिये। कृष्ण ने पिताजी के गमछे में बाँध दिये।

टीकाकार कहते हैं कि यह कैसे सम्भव है कि कृष्ण व्रज को छोड़ करके मथुरा में रहेंगे? उन्हें तो अवश्य ही व्रज लौटना चाहिये। [किन्तु] देखते हैं कि कृष्ण व्रज में नहीं लौटे। तो यह कैसे हुआ? [फिर इसका समाधान क्या है?]

[टीकाकारों ने यह बताया] कि कृष्ण और बलदेव एक स्वरूप अर्थात् ‘यशोदानन्दन-कृष्ण’ और ‘रोहिणीनन्‍दन-राम’ स्वरूप से मथुरा से नन्दबाबा के साथ व्रज में लौट आये। उस ‘अप्रकट-प्रकाश’ को किसी ने नहीं देखा। वे उनके साथ [व्रज में] चले आये।

दूसरे ‘प्रकट-प्रकाश’ में, बाह्यरूप से नन्दबाबाजी उनको [मथुरा में ही] छोड़कर रोते-धोते व्रज में आये। तो बाहरी लोगों ने बाह्यवेश को ही देखा। उन्होंने यही देखा कि नन्दबाबा अकेले आये हैं; कृष्ण और बलदेवजी नहीं आये।

[किन्‍तु] जो अन्तरभाववाले थे, उन्होंने देखा कि अप्रकट-प्रकाश में [कृष्ण] यहाँ पर नित्यकाल ही [विराजमान हैं। वे] वृन्दावन को छोड़ करके कभी नहीं जा सकते। अन्यथा शास्त्र की बातों का उल्लंघन हो जायेगा। शास्त्र में क्या कहा है? “वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।” — [अर्थात् कृष्ण वृन्दावन को छोड़कर] एक पग भी नहीं जा सकते। [इसी प्रकार] यह भी बतलाया गया है— “मथुरा भगवान् यत्र नित्यं सन्निहितो हरिः।” [#1] इसलिये ऐश्वर्ययुक्त कृष्ण और बलदेव, जो वसुदेवजी के पुत्र हैं, वे एक प्रकट-प्रकाशरूप में वहीं मथुरा में रह गये और नन्दबाबा के साथ अप्रकट-प्रकाशवाले [कृष्ण और बलदेव] व्रज लौट गये।] इस तरह …

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
राजधानी ततः साभूत् सर्वयादवभूभुजाम्।
मथुरा भगवान् यत्र नित्यं सन्निहितो हरिः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.1.28)

उसी समय से वह मथुरापुरी यदुवंशीय राजाओं की राजधानी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। उस मधुपुरी में भगवान् श्रीकृष्ण नित्य विराजमान रहते हैं। (GVP)

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