PURE BHAKTI ARCHIVE
Subscribe to the Daily Harikatha & Short Videos in Hindi & English @Gaudiya Rasamrita

Srimad Bhagavatam Series- #4- Conversation Between Vidura-Dhrtarastra, Instruction by Bhisma

26:07
#14
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • We should listen harikatha very carefully.
  • Saunakadi Rsi asking questions to Sri Suta Gosvami.
  • Conversation between Vidura and Dhrtrashtra.
  • People’s tolerance weakened in the present times, they are unable to tolerate little hunger and thirst.
  • Dhrtrashtra, Gandhari and Kunti went to Rsikesa.
  • Vidura gave mantra to Dhrtrashtra and he did austerity.
  • How to do harinama, sitting at one place
  • How a Vaisnava should be tolerant.
  • Meeting of Krsna, Pandavas with Bhishma Pitamaha lying on a bed of arrows.
  • Why did Bhishma Pitamah keep the Pandavas near his feet and Krsna near his head while giving his last instructions?
  • Jiva himself is responsible for his sufferings, story of an old lady and her boy who got bit by a snake.
  • Try to apply “tat te ’nukampam su-samiksamano” verse in your life.
  • Sufferings which came to Ambarisa Maharaja, Draupadi, Haridasa Thakura, Mirabai are not the fruits of their karmas.
  • Note: Some sound issues from 15:40 till17:58 cannot be corrected

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 4 : विदुर–धृतराष्ट्र संवाद तथा भीष्म पितामह के उपदेश

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 28 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल हम लोगों का भागवत पाठ प्रारम्भ हुआ और प्रथम स्कन्ध की कथाएँ बतलायी गयीं। उसमें विशेष-विशेष जो उपदेश की बातें हैं, वे भी सब बतलायी गयीं। उन कथाओं में कुछ विशेष-विशेष जो बातें हैं, संक्षेप में उनका वर्णन करूँगा। आप लोग ध्यान देकर सुनिये।

कल मैंने जो कथा बतलायी, बहुतों से पूछा, तो वे कोई उत्तर ही नहीं दे सके। मैंने कहा था कि कलियुग के तीस वर्ष बाद एक कथा हुई, और कलियुग के दो सौ तीस वर्ष बाद एक कथा हुई, और उसके तीस वर्ष बाद फिर एक कथा हुई। परन्तु बहुत लोग बता ही नहीं सके। तो जिन्‍होंने [ध्यानपूर्वक] कथा सुनी, उनके लिए तो देवताओं के विमान आयेंगे; और जिन्‍होंने कथा नहीं सुनी, उन्हें ले जाने के लिए यमदूत भैंस-गाड़ी लेकर आयेंगे। इसलिये बहुत अच्छी तरह से सुनो।

विशेष करके अब क्या कहूँ, लज्जा आती है। लोगों को बहुत सावधानी से सुनना चाहिये। इसमें से मैं एक बात कहता हूँ, बतलाता हूँ। कल शुभानन्द ब्रह्मचारीजी ने ‘नैमिषारण्य’ शब्द का अर्थ बतलाया—दो-तीन प्रकार से बतलाया। वहाँ ऋषि लोग यज्ञ करने के लिए आये। सूत गोस्वामीजी से उनकी भेंट हुई। उन्होंने [सूत गोस्वामी से] निवेदन किया— “आप तो समस्त शास्त्रों के वेत्ता हैं, अतः हमें कथा सुनाइये” और उनसे प्रश्न किया।

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ...[घर की स्त्रियाँ] सब विधवा हो गयीं और तुम निर्लज्ज अब किस काम के लिए यहाँ पड़े हो?” [यह सुनकर धृतराष्ट्र] का मुख नीचे हो गया।

[धृतराष्ट्र ने कहा—] “मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?”

[विदुर ने कहा—] “क्या करूँ? अभी भी समय है। तुरन्त घर से निकलो, मेरे साथ चलो।”

गान्‍धारी ने कहा— “मैं भी चलूँगी।”

कुन्तीजी वहाँ [यह सब] सुन रही थीं। कुन्तीजी बोलीं— “मैं भी चलूँगी।”

[विदुर ने कहा—] “चलो, आज ही। [अब यहाँ] एक क्षण (second) भी नहीं [ठहरना है।] अब इस घर का पानी भी नहीं पीना है। चलो।”

बस, सबको पीछे के रास्ते से निकालकर वे चले गये। वहाँ से होते हुए किसी वनप्रदेश में पहुँचे, और फिर धीरे-धीरे कुछ दिनों में एक जंगल में जा पहुँचे। वहाँ दो-तीन दिन तक वे एक ऋषि के आश्रम में ठहरे और कुछ विश्राम किया। इतने में भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि सबको इसका पता लग गया। वे लोग श्रीकृष्ण को साथ लेकर उन्हें मनाने के लिए वहाँ पहुँचे।

विदुर ने कहा— “खबरदार! एक केश [प्रमाणमात्र] भी इधर मत खिसको। हमने जो कहा है, उसी प्रकार चलो; तुम्हारा कल्याण होगा।”

जब भीम और सभी लोग उनके चरणों में गिरने लगे [और कहने लगे—] “चाचाजी, आप राजभवन में चलिये। हम आपकी सेवा करेंगे। हमसे कौन-सी त्रुटि हो गयी?”

[तब धृतराष्ट्र ने कहा—] “कोई त्रुटि नहीं हुई। त्रुटि केवल मेरी ही है। अब तुम लोग आदेश दो कि मैं जाकर अपने पापों का प्रायश्चित करता हुआ…”

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …हरिद्वार में पहुँचे। वे सब स्थान सम्भवतः अभी भी [विद्यमान] हैं। गङ्गा के किनारे, एक ऊँची भूमि पर, जंगल के बीच उन्होंने एक स्थान देखकर कुटी बनायी। ऋषिकेश से और ऊपर, और वहाँ पर निकट ही गङ्गाजी [बहती] हैं, और [चारों ओर] घनाघोर जंगल था, जिसमें कोई ऋषि कदाचित् आता-जाता था। अब वे वहाँ पर निराहार रहने लगे और अभ्यास करने लगे। कभी सूखी हुई घास खा लेते या कभी कोमल-कोमल पत्तों को खा लेते, और पानी पी लेते। अधिकांश समय [तो केवल] हवा का आहार करते।

हम लोग तो अभी पाठ कर रहे हैं। [वास्तव में तो] अभी निर्जला होकर पाठ करना चाहिये। तो भी लस्सी-फस्सी, और-और सब की आवश्यकता पड़ेगी; नहीं तो गला सूख जायेगा। वह सब मँगायेंगे? आजकल के व्यक्तियों ने शरीर ऐसा बना रखा है, कि उनके प्राण किसमें हैं? पहले तो प्राण हड्डियों में होते थे, फिर मेद और मज्जा में रहते थे; और आजकल तो प्राण केवल अन्न में रह गये हैं। एकादशी के दिन भी यदि [उपवास] करना है, तो मर जायेंगे। ऐसी तो स्थिति हमारी है। कोई सहिष्णुता नहीं है।

पहले के लोग कितनी कठोरता से भजन-साधन करते थे। अरे, रूप गोस्वामीजी तक भी कितना, रघुनाथदास गोस्वामीजी तक भी कितना कठोर साधन किया! और अब हम लोगों के प्राण ऐसे अन्नगत हो गये हैं कि थोड़ा-सा न मिले, तो मर जायेंगे। बहुत कम ऐसे लोग होंगे, जो उपवास करके सात दिन की कथा सुनते हों। पहले से ही सोच लेते हैं कि कैसे बैठना है, कुछ खाकर बैठें ताकि कोई असुविधा न हो; तीन घण्‍टे बाद तो फिर मिल ही जायेगा। भाई, ऐसा मत करो। देख-सुनकर भजन करो। इसे एक साधन बनाओ।

अब विदुरजी [उन्हें अपने साथ] ले करके चले गये और उनको कृष्ण-सम्बन्धी मन्‍त्र दिया। वह मन्‍त्र क्या होगा? मन्‍त्र क्या समझते हैं? श्रीमद्भागवत में वह मन्‍त्र दिया गया है—नारायण सम्बन्धी “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”। साधारण लोगों के लिए यही मन्‍त्र है। यह मन्‍त्र उनको दिया।

[विदुरजी ने] कहा कि अपने स्थान पर बैठ करके पहले आसन-शुद्धि करो। आसन ठीक [प्रकार से] जमा करके बैठो। एक घण्टा, दो घण्टा, तीन घण्टा, चार घण्टा, पाँच घण्टा, चाहे दस घण्टे तक बैठे रहो, तो बैठे रहो; हिलो-डोलो नहीं। शरीर को साध लो। एकदम सीधा बैठ जाओ। हिलाने-डुलाने की आवश्यकता नहीं। आसन सिद्ध हो जाने पर यम-नियम आदि सबको ठीक करो। यम माने अन्तःकरण में कोई इच्छा न रहे और बाहर की इन्द्रियों को भी साध लो। जब इतना अन्ततः… यह भक्ति के विरुद्ध नहीं है। भक्ति के अनुकूल है। ऐसा नहीं होने से एक आसन पर बैठ करके दिन-रात पड़ रहे हैं।

किसी को मान लिया कि तीन लाख हरिनाम करना है, तो वह कैसे बैठेगा? कैसे बैठकर हरिनाम करेगा? क्या चलते-फिरते करेगा? [इस प्रकार तो] शुद्ध नाम नहीं होगा। क्या ऐसे अंगड़ाई ले करके करेगा? शुद्ध नाम करने के लिए भावना के साथ, ऐसे शुद्ध रूप से बैठ करके तब भजन होगा। आसन, यम, नियम, प्राणायाम इत्यादि की भी आवश्यकता है। प्राणायाम की उस रूप में नहीं, वह तो अपने-आप हो जाता है। इस प्रकार जम करके [अर्थात् एक आसन पर बैठकर] साधन और भजन होना चाहिये।

ऐसा नहीं कि हरिनाम की माला ली, एक नाम किया, मन नहीं लगा तो फिर उठकर (9:34 अस्पष्ट) करने लगे, इधर-[उधर] घूमने लगे। उससे भी नहीं हुआ, तो दो-चार लोग जहाँ बैठे हैं, वहाँ जाकर हरिनाम [करते-करते परचर्चा करने लगे—] “आप अच्छे हैं? कहाँ से आये हैं? हरे कृष्ण हरे कृष्ण…” ऐसे हरिनाम नहीं होता। ग्रन्थ खोल करके बैठे हैं, इधर भी देख रहे हैं, [उधर भी] देख भी रहे हैं और [मन में दूसरी] चिन्ताएँ भी चल रही हैं—क्या ऐसे होगा? परीक्षित् महाराज और धुन्धुकारी की भाँति [ध्यानपूर्वक कथा श्रवण करनी चाहिये।] इस प्रकार से साधन-भजन होता है।

[विदुरजी ने] उनको बैठा दिया। सचमुच में वे तीनों लोग बैठ गये। अभी कुछ ही दिन हुए थे कि इतने में वन में दावाग्नि (भयंकर आग) लगी। वह इतनी भयंकर थी कि चारों ओर से आग [ने उन्‍हें] घेर लिया; कहीं भी निकलने का कोई मार्ग नहीं था। जब आग एकदम निकट आ गयी, तब उन्होंने भागने-दौड़ने की सारी चेष्टाएँ बन्द कर दीं। [वे विचार करने लगे—] “कहाँ जायेंगे भाग करके? अब जीवन में हमारा क्या रखा है? क्या करना है?” बस वे चुपचाप समाधिस्थ हो गये। भगवान् में चित्त को लगा दिया। फिर आग आयी और जैसे एक लकड़ी को जलाती है, वैसे जला करके चली गयी। यह उनकी अन्तिम दशा हुई।

[इस प्रकार भगवद्-स्मरणरूपी] शुद्ध आग में—भगवान् में अपने चित्त को लगाया। वह एक मिनट का [भगवान् में] चित्त लगाया हुआ और [उसी अवस्था में वे] आग में जल गये, फिर दूसरी कोई चिन्ता नहीं। उनका दूसरा जन्म [नहीं हुआ] या उन्हें अच्छे जन्म [की प्राप्ति हुई।]

इसके बाद नारद ऋषि की कृपा से पाँचो पाण्डवों को यह सब समाचार [ज्ञात हुआ।] पाँचों पाण्डव वहाँ गये, उनका संस्कार इत्यादि किया, और ब्राह्मणों आदि का जैसा सम्मान करना चाहिये, वह सब किया। हम लोगों को ऐसी घड़ियाँ…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …भीष्म पितामहजी ने [द्रौपदी से] कहा— “बेटी, तू ठीक कह रही है। मैंने दूषित अन्न खाया और उससे मेरे भीतर असुर [अर्थात् आसुरी प्रवृत्ति] प्रवेश कर गयी। उस अन्न …

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …पीठ पर ही झाड़ू देगा। अरे, झाड़ू की झाड़ू नहीं, वचनों की झाड़ू देता है, कटुक्तियों की झाड़ू देता है, और सह लेते हैं। भगवान् का भजन करने का [विचार] नहीं आता। कितने प्रकार के कष्ट झेलते हैं। मरना तो निश्चित है। इस जगत् से एक सुई और सूता (धागा) भी [साथ] ले करके नहीं जा सकते। तो क्या कमाई की? इतना धन जो कमाया है, क्या उसे ले करके जाओगे? या स्त्री, पुत्र और परिवार को [साथ] ले करके जाओगे? एक सुई का धागा भी तुम साथ ले करके नहीं जाओगे। क्या ले जाओगे? [इसलिये] ऐसा कुछ करो जो तुम्हारे [परमार्थ के] लिए पाथेय [सहारा] हो। सब लोगों को ऐसा भजन करना चाहिये। और [किसी] दूसरे का भजन करने से नहीं होगा। एकमात्र कृष्ण ही मुक्ति दे सकते हैं और मुक्ति में भी विशेष मुक्ति [अर्थात्] प्रेमभक्ति दे सकते हैं। जिनकी आराधना ब्रह्मा, शंकर, नारद, गणेश आदि सभी देवता करते हैं, उन प्रभु की आराधना करनी चाहिये।

इसमें एक और शिक्षा है, संक्षेप में बतलाता हूँ—भजन करनेवाले व्यक्ति को, वैष्णवों को, सहिष्णु बनना चाहिये। सहिष्णु किसे कहते हैं? किसी बच्चे ने या किसी व्यक्ति ने कुछ इधर-उधर कर दिया, और [तुरन्त] उठकर उसे तमाचा मार दिया, बिगड़ गये—[यह सहिष्णुता नहीं है।]

हमारे एक महाराजजी थे। वे रसोई बना रहे थे। तो रसोई में अभी चूल्हे में लकड़ी दे रहे थे, और उसे जला रहे थे। तो चूल्हे के ऊपर हण्‍डिया भी रख दी, और उसमें पानी भी भर दिया। चावल सब रखा है, पकाया जायेगा। तो वह जला रहे थे, किन्तु लकड़ी गीली थी। एक दियासलाई पूरी समाप्त हो गयी, किन्तु वह जली नहीं। फिर केरोसिन का तेल भी डाल दिया, फिर भी नहीं जली। अब रहा-सहा धैर्य दूर हो गया। उन्होंने पास से एक लठिया उठायी, और चूल्हे पर रखी हण्‍डिया और उसके नीचे (13:55 अस्पष्ट) पर दस बार वार करके लकड़ियों और हण्‍डियों को इधर-उधर फेंक दिया और बिगड़कर अपने घर में जाकर सो गये।

ऐसा नहीं [होना चाहिये।] सहिष्णु बनना चाहिये। भजन में भी ऐसे सहिष्णु होना चाहिये। घर के कामों में भी सहिष्णु होना चाहिये। सहिष्णुता वैष्णवता का प्रथम सोपान है।

जो लोग वैष्णव होकर भी सहिष्णु नहीं हुए, [उनके यहाँ] प्रतिदिन वाद-वितण्डा लगता है [अर्थात् कलह और विवाद होता रहता है।] जिस कुल में एक भी वैष्णव अथवा वैष्णवी जन्म ले ले, वह घर स्वर्ग और वैकुण्ठ बन जाता है। और जिन घरों में पाँच-छः वैष्णव या वैष्णवियाँ पैदा हों, [फिर भी] प्रतिदिन लड़ाई लगती है, तो वह क्या है, अब मेरी समझ…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …कहीं पाँचों पाण्डवों में लड़ाई देखी? ऐसा नहीं होना चाहिये। बहुत शान्ति के साथ में भजन करना चाहिये। कैसे? अब इसको बतलाता हूँ।

महाभारत का युद्ध हुआ। इसी में वर्णन किया गया है। महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया। दोनों ओर के [प्रायः] सभी लोग मारे गये। विदुरजी भी धृतराष्ट्र आदि को लेकर चले गये। अब पाँचों पाण्डवों को बड़ी ग्लानि हो रही थी कि हमने राज्य-भोग के लिए इतने लोगों को मारा और मरवाया। वे अब आत्महत्या करने [का विचार करने लगे। [तब] श्रीकृष्ण ने कहा— “भाई, ऐसा मत करो। चलो, भीष्म पितामह के यहाँ तुम्हें ज्ञान दिलायेंगे।”

भीष्म पितामह के यहाँ सब लोग गये, द्रौपदी भी गयीं। उस समय वे शर-शय्या पर थे और उत्तरायण की राह देख रहे थे। वैष्णवों के लिए उत्तरायण और दक्षिणायन का कोई भी विचार नहीं होता; ये विधान तो स्मार्त लोगों के लिए हैं। [फिर भी] वे उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। इतने में कृष्ण, अर्जुन, भीम आदि पाँचों भाई और द्रौपदी वहाँ पर आये। साथ ही नारद, पराशर, शुकदेव, व्यास इत्यादि बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि और-और जितने वैष्णव थे, वे सभी आये। वे यह सुनने के लिए आये कि क्या बातें हो रही हैं।

उस समय जब सब वहाँ पहुँचे, तब भीष्म पितामह ने अपनी आँखों के माध्यम से कृष्ण को प्रणाम किया, और उन्हें अपने सिरहाने बैठने का निवेदन किया। पाँचो पाण्डवों को उन्होंने उस ओर बैठने का आदेश दिया, जिधर उनके पैर थे। क्यों? पैरों की ओर रहने से [वे उन्हें] आँखों से [सहजरूप से] दिखायी देंगे। और कृष्ण को अपने सिरहाने की ओर इसलिये बैठाया क्योंकि पैर की ओर बैठने से उनके पैर उधर में हो जायेंगे, यह उचित नहीं है। उनको मर्यादा देने के लिए [सिरहाने की ओर बैठाया।]

अब कृष्ण ने बात को छेड़ करके कहा— “ये लोग बड़े दुःखी हैं। इन लोगों के कारण अठारह अक्षौहिणी सेना मारी गयी हैं। उन सबका पाप इन पर पड़ गया है। इसलिये ये बड़े दुःखी हैं। आप इनको कुछ समझाइये।”

भीष्म पितामह ने भगवान् से कहा— “आप तो स्वयं भगवान् हैं। आप [स्वयं ही इन्हें] समझा सकते थे, फिर मेरे पास क्यों लाये?”

कृष्ण ने कहा— “नहीं, मेरे समझाने से ये नहीं समझेंगे; आप ही इन्हें समझाइये।”

तो जब [भीष्म पितामह उन्‍हें] समझाने लगे तो द्रौपदी आञ्‍चल की आड़ में हँस दीं। शुभानन्दजी ने कल [यह प्रसङ्ग] बतलाया था।

[भीष्म पितामह ने कहा—] “बेटी, तुम क्यों हँस रही हो?”

[द्रौपदी ने कहा— “मैं यह सोचकर हँस रही हूँ कि आज आप इतने ऊँचे धर्म और ज्ञान की बातें कह रहे हैं, परन्तु जब दुर्योधन की सभा में मेरा चीरहरण हो रहा था, तब यही धर्मज्ञान कहाँ चला गया था? उस समय तो आप सब कुछ देखते हुए भी मौन बैठे रहे।”

तब भीष्म पितामह ने विनम्रता से कहा— “बेटी! तुम्हारा कहना सत्य है। उस समय मेरी बुद्धि दूषित हो गयी थी, क्योंकि मैं दुर्योधन के अन्न का सेवन करता था। जैसा अन्न होता है, वैसी ही बुद्धि हो जाती है। दुष्टों का अन्न खाने से मेरा विवेक ढक गया था; इसीलिये मैं उस समय धर्म का निर्णय नहीं कर सका।]

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …[दुर्योधन का अन्न खाने से भीष्म पितामह] बाध्य हो गये [और अधर्मियों का साथ देना पड़ा।] इसलिये यदि भजन करना है, तो विषयी लोगों का अन्न इत्यादि मत खाइये।

तो [भीष्म पितामह] अब कह रहे हैं— “मेरे शरीर में जो उनके [दूषित] अन्न का रस था, जो रक्त, मज्जा और मेद के रूप में अब तक [स्थित] था, वह धीरे-धीरे इन घावों और बाणों के छिद्रों से निकल गया। जो थोड़ा-बहुत शेष रह गया था, वह भी सूखकर समाप्त हो गया। और आज मुझे उपवास करते हुए भी कितने दिन हो चुके हैं, इसी कारण अब मेरी बुद्धि कुछ-कुछ ठीक हुई है, [यद्यपि अभी] पूरी [ठीक] नहीं हुई; क्योंकि यह शरीर अभी भी उसी [अन्न] से बना हुआ है। इसलिये पूरी [शुद्ध] नहीं हुई है, कुछ-कुछ शुद्ध हुई है। इसलिये मैं तुम्हें कुछ उपदेश दे रहा हूँ।” वे उन्‍हें बतलाने लगे—

एक बुढ़िया थी। [उसका पति, जो] एक ब्राह्मण था, मर गया था। बुढ़िया रह गयी थी। उसका एक छोटा-सा बच्चा था। उसके घर-द्वार सब बिक गये थे। [तब वह] जंगल में एक कुटी बनाकर बच्चे के साथ रहने लगी और किसी प्रकार जीवन-निर्वाह कर रही थी। वह धार्मिक [स्त्री] थी, इसलिये प्रतिदिन ठाकुरजी की पूजा किया करती थी।

एक दिन वह छोटा-सा बच्चा पास ही के बगीचे में अन्धकार के समय पुष्प चयन करने के लिए गया। [वह पुष्प] चयन करके ला रहा था कि इतने में एक काले सर्प ने उसे काट लिया। साथ-ही-साथ विष चढ़ गया और वह मर गया।

[उसी समय] एक बहेलिया [उधर से] जा रहा था। उसने मन्त्र के द्वारा उस साँप को वशीभूत कर लिया, उसे एक घड़े में डालकर ढक दिया और घड़े को कन्धे पर उठा लिया। मरे हुए बच्चे को दूसरे कन्धे पर रख लिया और बुढ़िया के पास पहुँचा [और बोला—] “बूढ़ी मैया! मैया! देखो, यह क्या हो गया? यह कैसी विडम्बना है! तुम्हारा लड़का मर गया। वह फूल चुन रहा था, [तभी] इस दुष्ट सर्प ने उसे काट लिया। [देखो,] मैं उस साँप को भी ले आया हूँ।”

बुढ़िया ने देखा कि उसका लड़का मर गया है। [उसका शरीर] एकदम काला पड़ गया है। उसने उसे नीचे जमीन पर रख दिया और बुढ़िया रोने लगी। सिर पीटने लगी, पेट पीटने लगी— “अब मैं रह करके क्या करूँगी? [इससे] पहले तो मैं ही मर जाती!”

[कुछ देर बाद,] जब उसका रोना थोड़ा शान्त हुआ, तब बहेलिये ने कहा— “मैया, मैं इस साँप को बोटी-बोटी काटकर तुम्हारे सामने जला देता हूँ। फिर [यह किसी] दूसरे को नहीं काटेगा।”

[जब बहेलिये ने] दो-चार बार ऐसा कहा, तो बुढ़िया ने कहा— “बेटा, [यदि] तुम इसे बोटी-बोटी काट दोगे, तो क्या मेरा बच्चा जीवित हो उठेगा?”

[बहेलिये ने कहा—] “नहीं, [ऐसा तो नहीं होगा।”]

[बुढ़िया ने कहा—] “तो फिर इसे क्यों काटना? इसे छोड़ दो, जाने दो।”

[बहेलिये ने कहा—] “छोड़ दूँ? यह [फिर किसी] दूसरे को काटेगा, फिर तीसरे को काटेगा। मैं इसे नहीं छोड़ सकता।”

बुढ़िया के मना करने पर भी [वह नहीं माना।] बुढ़िया तो [अब कुछ] शान्त हो गयी। [उसने सोच लिया—] “अब मेरा लड़का लौटनेवाला नहीं है।” अतएव अब वह उस लड़के का प्रवाह आदि [संस्कार] करायेगी और निश्चिन्त होकर अपना भगवद्भजन करेगी।

किन्तु यह दुष्ट, यह तो क्षूद्र है न—शरीर के लिए शोक करनेवाला। बस उसने साँप को [बाहर] निकाला और मारने की तैयारी में है।

साँप ने कहा— “मुझे क्यों मारते हो? मेरा क्या दोष है?”

[बहेलिये ने कहा—] “हाँ, तुमने ही तो उसे काटा है।”

[साँप ने कहा—] “मैंने [अपने आप] तो नहीं काटा। मुझे काल ने कहा कि इसे काटो, इसलिये मैंने काटा। इसका काल आ गया था। सभी लोग अपने-अपने काल के अनुसार मरते हैं। किन्तु कोई निमित्त होता है। इसलिये मैं तो केवल निमित्त था। यथार्थ में इसको मारनेवाला तो काल है।”

इतने में काल [भी वहाँ] दौड़ करके आ गया [और कहने लगा—] “अरे मूर्ख! इसमें मेरा क्या दोष है? मैंने तुम्हें थोड़े ही नियुक्त किया था! इसका [अपना] कर्म ही [इसके लिए] काल हुआ है। पूर्वजन्म में इसने भी ऐसे [ही किसी] दूसरे को मारा था। अब वही दूसरा [जीव] साँप बन गया, और यह बच्चा बन गया। अब उसी [कर्म] का यह बदला ले रहा है। ‘tit for tat’—जैसा कर्म करेंगे, उसका [वैसा] फल भी भोगना पड़ेगा। इसलिये [वास्तव में] इस बच्चे ने अपने को ही अपने-आप मारा है। इसमें किसी दूसरे का दोष नहीं है।”

[भीष्म पितामह ने कहा—] “महाराज युधिष्ठिर! इसी प्रकार ये कौरव लोग अपने-आप मरे हैं। आपकी सेना के लोग भी अपने-आप मरे हैं; वे आपके कारण नहीं मरे। यही इनके लिए काल बना। काल माने क्या? अपने कर्मों का फल।”

यदि [वास्तव में] भजन करना है, तो इस बात को अच्छी तरह समझो। एक व्यक्ति गाली दे रहा है। जो गाली दे रहा है या मार रहा है, तो उसके प्रति तुम कुछ मत सोचो। यह सोचो कि हमने पूर्वजन्म में ऐसे कर्म किये हैं, इसलिये वह [आज हमारे साथ] ऐसा कर रहा है। हमको आगे से ऐसा कोई कर्म नहीं करना है, जो हमको कोई तंग कर सके। यदि यह भावना आयेगी, तो भजन होगा।

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्‍जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.14.8)

[अतएव जो अपने किये हुए कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुःख का अनासक्त भाव (निर्विकार मन) से भोग करते हुए, क्षण-क्षण में बड़ी उत्सुकता से आपकी करुणा की प्रतीक्षा करता है तथा पुलकित शरीर, प्रेमपूर्ण हृदय और गद्‍गद-वाणी से आपके चरणों में प्रणत होकर जीवन धारण करता है, वह व्यक्ति मुक्तिपद का दायभागी अर्थात् आपके चरणों की प्रेमसेवा का अधिकारी बन जाता है।] GVP

[जब एक] व्यक्ति के ऊपर क्लेश आते हैं, तो वह विचलित हो उठता है। [किन्तु] धीर पुरुष, बुद्धिमान पुरुष और भजन करनेवाला यह समझता है— “मैंने पूर्वजन्म में जो कर्म किये थे, उसीका फल आ रहा है। इसको [चाहे] हँसकर भोगूँ या रोकर, भोगना तो पड़ेगा ही। फिर रोकर क्यों भोगूँ? हँसते हुए भोगूँगा। और जो नये कर्म करूँगा, वे अच्छे कर्म करूँगा, जिससे उनका अच्छा फल प्राप्त हो, और भगवान् का भजन करूँगा।”

और शुद्ध भगवद्भक्त लोग क्या सोचते हैं? [वे यह विचार करते हैं—] “हमने जीवन में एकबार तो नामाभास किया ही होगा, या अब कर रहे हैं। एक नामाभास से ही पूर्वजन्म के समस्त पाप अवश्य दूर हो जाते हैं।”

सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.2.14)

[शास्त्रतत्त्वविद् महात्मा जानते हैं कि चाहे (पुत्रादि) अन्य वस्तुओं को लक्ष्य करके हो, किसी का उपहास करने के छल से हो, गीत-आलाप पूर्ण करने के लिए हो अथवा अश्रद्धा से ही क्यों न हो, वैकुण्ठ-वस्तु भगवान् का नाम लेने से सम्पूर्ण पापों का विनाश हो जाता है।] GVP

“‘अशेषाघहरं’—अशेष रूप में जितने पाप हैं, उस नाम के द्वारा शेष हो जाते हैं। मैंने भी अवश्य ऐसा नाम किया है, और करूँगा, जिससे मेरे सब पाप ध्वंस हो जायेंगे।”

भगवान् के नाम की ऐसी महिमा है। इसलिये पाप तो नहीं है, फिर कैसे उनका सुख-दुःख [दिखायी देता] है? भक्तों के कर्मफल तो समाप्त हो गये हैं। [जब कर्मफल समाप्त हो जाते हैं,] तब शरीर भी समाप्त हो जाना चाहिये; [किन्‍तु] भगवान् उनके कर्मफल की वैसे ही रचना कर देते हैं कि वह आगे भगवान् का भजन कर सके। इसलिये [भजन का] सुयोग देने के लिए उसकी आयु को बढ़ा देते हैं। इसलिये कह रहे हैं।

इसलिये प्रह्लाद महाराज के ऊपर जो दुःख आया था, वह कर्मफल नहीं था। द्रौपदी के ऊपर जो दुःख आया, वह कर्मफल नहीं था। अम्बरीष महाराज के ऊपर जो दुःख आया, वह कर्मफल नहीं था। मीराबाई के ऊपर जो दुःख आया, वह दुःख नहीं था। हरिदास ठाकुर को बाईस बाजारों में मारा गया, वह दुःख [वास्तविक] दुःख नहीं था। भगवान् ने ऐसे कर्मों को बना करके जगत् को शिक्षा दी है कि इस स्थिति में भी, मरने की स्थिति में भी, इतना क्लेश पा करके भी कैसे स्थिर हो करके भजन करना चाहिये। इसलिये हम लोगों को भी संसार में जितने भी दुःख आयें, उनसे घबराना नहीं चाहिये; स्थिर हो करके [भगवान् का भजन करना चाहिये—]

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

इससे भी नहीं बनता है, तो सबको बुला लो। कृष्णदास को बुलाओ, हमारे नन्नुमलजी हैं, दामोदरजी हैं, उसका नाम तो याद नहीं। वक्रेश्वरजी हैं, सबको बुलाओ। और मृदङ्ग और खोल करताल [के साथ कीर्तन करो।] अभी लगाओ तो एक। हाँ, माइक दे दो।

We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.