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Srimad Bhagavatam Series- #5- Radhaji's Name in Bhagavatam, Explaining 'nigama-kalpataror', Krsna Winding Up His Pastimes.

33:45
#15
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Brief summary of third canto- a summary of Krsna’s pastime.
  • About Srimati Radhika's name in Srimad Bhagavatam.
  • Tenth canto of Srimad Bhagavatam is full of transcendental mellows.
  • Explanation of Srimad Bhagavatam 1.1.3 “nigama-kalpa-taror galitam phalam”.
  • Meaning of “nigam”- vedas, upanisadas, srutis etc. are called nigams.
  • The fruit of Srimad Bhagavatam is received through the Guru-parampara and is very sweet and ripened and full of mellows, there is no kernel and peel in this fruit.
  • Meaning of “rasika bhuvi”- Those who are raganuga devotees are referred as bhavuka here like Bilvamangala Thakura and devotees like Narada Rsi, Sukadeva are rasika-bhakta.
  • Meaning of “alayam”, listen Srimad Bhagavatam till you faint out of transcendental love.
  • Meaning of “alayam” as per impersonalists is that until you merge in the impersonal brahma. Refuting impersonalist explanation of the word “alayam”.
  • Srimati Radhika’s name is kept secret in Srimad Bhagavatam even though it is everywhere in every verse.
  • Those who are eligible will relish these indirect names mentioned in Srimad Bhagavatam and those who are ineligible will not even see these names in Srimad Bhagavatam.
  • Brief explanation of Rasa-lila.
  • Verses from Srimad Bhagavatam mentioning Srimati Radhika’s name.
  • Krsna ordered Uddhavaji to go to Badrikashram.
  • Krsna ordered Arjuna to take all His wives to Hastinapura.
  • Dvaraka got submerged into the sea and Krsna completed his pastimes.
  • Arjuna lamenting after Krsna’s disappearance.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 5 : श्रीमद्भागवत में राधाजी का नाम, ‘निगमकल्पतरोः’ की व्याख्या, तथा श्रीकृष्ण की संवरण-लीला

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 28 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवद्-कृपा से कल और आज सवेरे निर्विघ्न [रूप से] श्रीमद्भागवत-कथा सम्पन्न हुई। कल हम लोगों ने प्रथम स्कन्ध की लीलाओं का संक्षेप में समापन किया, उसका माहात्म्य बतलाया; और आज सवेरे द्वितीय स्कन्ध की लीलाओं का वर्णन किया।

श्रीमद्भागवत के जो दस लक्षण बतलाये गये हैं, वे विद्वानों के लिए हैं, साधारण लोगों के लिए नहीं। किन्‍तु उसमें एक प्रकार से सर्ग और विसर्ग का वर्णन आया। हमने सर्ग के [विषय में] कुछ बतलाया। अब तृतीय स्कन्ध भी आरम्भ हो गया है, और आज सवेरे तृतीय स्कन्ध का भी कुछ बतलाया गया। अभी तो दशम स्क‍न्ध नहीं आया, कि‍न्तु तृतीय स्क‍न्ध में ही हम देखते हैं कि कृष्ण की अनेक लीलाओं का वर्णन उसमें आ गया। लगभग जन्मलीला से लेकर दशम स्क‍न्ध की द्वारका-लीला तक, सभी लीलाओं को सूत्र [रूप में] उसमें भर दिया गया है।

इसी प्रकार किसी-किसी का कहना है कि श्रीमद्भागवत में कहीं भी राधाजी के नाम का उल्लेख नहीं है, और कृष्ण की लीलाओं वर्णन केवल दशम स्कन्ध में ही है, और स्थान पर नहीं है। व्यासजी ने इस प्रकार का एक श्लोक भी लिखा है, कि‍न्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है। कि‍न्तु [ऐसा] प्रतीत होता होता है।

कथा इमास्ते कथिता महीयसां
विताय लोकेषु यश: परेयुषाम्।
विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो
वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (12.3.14)

[हे राजन्! मैंने तुम्हारे निकट विज्ञान (महनीय प्रियव्रतादि महीपालों का भगवत्-अनुभव) एवं वैराग्य का विकास करने के उद्देश्य से इन प्रतापी महापुरुषों के चरित का वर्णन किया है (जिससे विषयी की असारता का ज्ञान और संसार से वैराग्य हो जाये)। इस जगत् में ये यश का विस्तार करते हुए परिणाम में मृत्यु दशा को प्राप्त हए हैं। यह समग्र चरित-वर्णन वाग्-विलासमात्र है, पारमार्थिक-सत्य नहीं।] GVP

इस श्लोक का साधारण रूप से यह तात्पर्य है कि इसमें हमने बड़े-बड़े राजपुरुषों के चरित्र लिखे हैं—जैसे पृथु महाराज, ऋषभदेव, भरत महाराज, सूर्यवंश और चन्‍द्रवंश के बड़े-बड़े नरेशों का, यदु इत्यादि का नाम उल्लेख किया है। महाराज हरिश्चन्‍द्र तथा दशरथ इत्यादि का भी नाम इसमें उल्लेख किया है। किन्‍तु इसमें सभी परमार्थ नहीं है; ये तो ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि के लिए उदाहरण देने के लिए [वर्णन किये गये]हैं। “वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम्” — ये वाक्‌-विभूति है।

वाक्-विभूति का क्या अर्थ है? [जैसे कोई कहे—] “यह घोड़ा जो जा रहा है, यह आकाश में उड़ रहा है।” अरे! घोड़ा कभी आकाश में उड़ता है? यह तो वाक्‌-विभूति है। [या कोई कहे—] “आकाश में रङ्ग-बिरङ्गे फूल खिल रहे थे।” यह भी वाक्‌-विभूति है। “न तु पारमार्थ्यम्”—इसमें परमार्थ नहीं है; केवल ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा देने के लिए [इनका वर्णन किया गया है।] किन्‍तु दशम स्क‍न्ध के लिए बाद में यह लिखा गया है कि उसमें [तो रस ही] रस भरा पड़ा है। यदि कोई व्यक्ति भवसागर को पार करके अन‍न्तकाल के लिए वैकुण्ठ और उससे भी ऊपर गोलोक-वृन्‍दावन में भगवान्‌ के चरणों का रसास्वादन लाभ करना चाहता है, तो उसे दशम स्क‍न्ध की लीलाओं, कथाओं का नित्य श्रवण, चिन्‍तन और मनन करना चाहिये। यह संक्षेप में बतलाया गया। कि‍न्तु हमारे श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी और श्रील सनातन गोस्वामी इत्यादि जो [अन्य] टीकाकार हैं, उन्होंने कहा है कि श्रीमद्भागवत के प्रथम अध्याय के तीसरे श्लोक में ही यह लिखा गया है—

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.1.3)

हे भगवत्-प्रीतिरस-रसिकजनो! हे अप्राकृत रसविशेष की भावना में चतुर भक्तो! श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पतरु का परमानन्दरसमय परिपक्व फल है। यह छिलका, गुठली आदि कठिन हेय-अंश से रहित, तरल होने के कारण पान करने योग्य है। श्रीशुकदेव गोस्वामी के मुख से निकलकर शिष्य-प्रशिष्यादि की परम्पराक्रम से स्वेच्छा से पृथ्वीपर अखण्ड रूपमें अवतीर्ण इस फल को आपलोग मुक्त अवस्था में भी पुनः-पुनः पान करते रहें। स्वर्ग के सुखों की उपेक्षा करनेवाले परम मुक्तपुरुष भी इस रसमय फल (श्रीमद्भागवत) की उपेक्षा न करके नित्यकाल ही इसका सेवन किया करते हैं। (GVP)

श्रीमद्भागवतम् क्या वस्तु है? — “निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्”

‘निगम’ का अर्थ है वेद, उपनिषद् तथा जितनी भी श्रुतियाँ हैं, इन सबको ‘निगम’ कहते हैं। [‘निगम’ शब्द का प्रयोग अन्य अर्थों में भी होता है, जैसे] एक निगम की स्थापना हुई है। माने क्या? [अर्थात् किसी संस्था, संगठन या कॉर्पोरेशन (Corporation) की स्थापना हुई है। जैसे— नगर निगम, विद्युत निगम, परिवहन निगम इत्यादि।] यह निगम से समझो। एक तरह से अर्थ इत्यादि के लिए भी ‘निगम’ [शब्द] का प्रयोग होता है। निगम-आगम कहते हैं, तो श्रुति और स्मृतियाँ ये सब निगम और आगम हैं। ये वृक्ष [के समान] हैं, उपनिषद् आदि इसकी शाखाएँ हैं। गोपाल-तापनी इत्यादि उपनिषद् इसके पत्तों के समान हैं। और उसमें फल लग गया, वह फल क्या है? भागवत के नवम स्क‍न्ध तक [उसमें लगा हुआ फल है], और दशम स्क‍न्ध क्या है? वही [पूर्णतया] पका हुआ फल हो गया। इस फल में गुठली नहीं है और इसमें रेशे भी नहीं हैं, जो दाँतों में फँस जाते हैं, और न कोई छिलका है। इसमें फेंकने योग्य कोई भी वस्तु नहीं है। तो [इसलिये कहा गया—] “निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्”

यह फल गोलोक-वृन्दावन से आ रहा था, गिर रहा था। [अब प्रश्न हो सकता है] कि इतनी दूर से गिरने पर फट करके इसका रस इधर-उधर क्यों नहीं बिखर गया? इसलिये नहीं बिखर गया, [क्योंकि यह] वहाँ से हमारी गुरु-परम्परा के माध्यम से आ रहा है।

शुकजी कौन हैं? कल बतलाया था न—वे तो गोलोक-वृन्दावन के ही हैं। उनको यदि (8.10 अस्पष्ट) भी दिया जाये, तो कृष्ण स्वयं इस फल को देनेवाले हैं। कृष्ण के चरणकमलरूपी वृक्ष की टहनियों पर प्रेम की लता फैली हुई है, प्रेम की डालियाँ हैं और वहाँ पर यह फल पकता है और [नीचे] गिरता है। जब वह फल गिरा तो ब्रह्माजी ने उसे अपने हाथों में ले लिया। फिर उन्होंने छोड़ दिया तो वह नारदजी के हाथों में आया। वहाँ से उन्होंने [आगे गिराया।] वे खड़े है। [इसी प्रकार] वहाँ गोलोक से कतार लगी हुई है। वहाँ से वे दे रहे हैं, ऐसे लिया और इस हाथ से नीचे दे रहे हैं। ब्रह्माजी ने नारदजी को दिया, नारदजी ने अपने दाहिने हाथ से लेकर बायें हाथ में रख करके नीचे व्यासजी को दे दिया। व्यासजी ने लिया और शुकदेव गोस्वामी को दिया। शुकदेव गोस्वामी ने सूत गोस्वामी को दिया।

इस प्रकार [गुरु-परम्परा से] होते-होते यह [फल] माधवेन्‍द्रपुरीजी के पास में आया और माधवेन्‍द्रपुरीजी ने ईश्वरपुरीजी को दिया। ईश्वरपुरीजी ने महाप्रभु चैतन्यदेव को दिया और चैत‍न्यदेव ने ले करके स्वरूप दामोदर और रूप-सनातन को दिया। इस प्रकार क्रमशः [गुरु-परम्परा] से होते-होते अभी यह हम लोगों के गुरुजी के पास में आया है। उन्होंने देखा कि ये सब [शिष्य अभी] कच्चे हैं। [उन्होंने सोचा—] “ये कच्चे हैं, तो क्या करें? यह फल दिया जाये या न दिया जाये?” [ऐसा] विचार ही करते थे, तो भी हम लोगों को… “अच्छा, अभी तुम लोग छोटे हो, अभी उत्तराधिकारी नहीं बने। अभी उम्र अधिक नहीं हुई है…” क्या कहते हैं उसको?

भक्त: नाबालिग

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [गुरुजी कहते थे—] “अभी तुम लोग नाबालिग हो। अभी इसे मत देखना। यह जो बक्सा है, इसे अभी मत खोलना। खबरदार! भागवत मत पढ़ना।” वे कहते थे न—क्यों कहते थे? [क्योंकि वे जानते थे कि] ये (शिष्य) अभी छोटे बच्चे हैं, अबोध हैं, [अभी] नहीं समझेंगे। इसलिये यह कहा कि “तुम जब बड़े हो जाओगे, तब इसको खोलना।”

तो बेटा क्या करेगा? जब बड़ा हो जायेगा—बीस, बाईस, चौबीस वर्ष का— तो देखा, “भाई, घर में तो खाने के लिए कुछ नहीं है। पिताजी ने हमारे लिए कुछ छोड़ा या नहीं?” तब किसी ने [कहा—] “भाई, तुम्हारे पिताजी तो बड़े धनी थे।” [तो उसने कहा—] “किन्‍तु उन्होंने तो कुछ छोड़ा नहीं।” [उस व्यक्ति ने कहा—]“अरे पूर्व [दिशा] की ओर थोड़ा खोदकर देखो। दक्षिण [दिशा] में मत खोदना। यदि दक्षिण में खोदोगे तो क्या होगा? [वहाँ] खड्डे हैं और भीमरूल इत्यादि निकलेंगे और तुम्हें काट देंगे। उत्तर [दिशा] में खोदोगे, तो वहाँ यक्ष है, [वह तुम्हें] खा जायेगा।” और?

भक्त: पश्चिम में अजगर

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: “पश्चिम [दिशा] में एक अजगर है; यदि वहाँ खोदोगे, तो वह काट लेगा। [इसलिये] पूर्व दिशा में थोड़ी-सी जगह पर खोदो।” [#1]

हम लोगों को थोड़ा-सा सन्‍धान मिला—थोड़ा-सा ही, अधिक नहीं—[किन्‍तु] वह हम लोगों के लिए बहुत यथेष्ट हो गया। इस प्रकार वह [फल] फूटा नहीं। जब तक शुकदेव गोस्वामी का है, तब तक का इसमें वर्णन है, उसके बाद का वर्णन नहीं है।

तो सूत गोस्वामीजी अपनी गुरु-परम्परा के माध्यम से इस फल की वन्दना करते हैं—“निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्।” यह फल कैसा है? कच्चा नहीं है। सूर्य की किरणों से तपकर आकाश में ही एकदम पीला और नरम (कोमल) हो गया है, सुगन्‍ध से भरपूर हो गया है।

शुक [पक्षी] को कोई दे या न दे, वह अपने आप लुब्ध हो करके वहाँ पर पहुँच गया और उसने उसमें अपनी चोंच भिड़ा दी। उससे [वह फल और भी अधिक] सु‍न्दर एवं मधुर स्वाद [वाला हो गया।] इसमें न गुठली है और न छिलका; इसलिये कहते हैं— “रसिका भुवि भावुकाः” क्या?

भक्त: पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: “पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः” — कहते हैं— अरे! यह तो रस से भरा पड़ा है। यह घर में कार्बाइड (carbide) देकर पकाया हुआ फल नहीं है। आजकल आम, केला, अमरूद आदि जितने भी फल हैं, वे कार्बाइड दे करके पकाये जाते हैं; उनमें कोई स्वाद (taste) नहीं रहता, रस नहीं रहता। [किन्तु] यह फल सूर्य की किरणों से पका हुआ है। विरह ही वहाँ सूर्य की किरणें हैं और कृष्ण वहाँ सूर्य हैं। और उनके विरह से पका हुआ यह मधुर फल है। इसमें कोई भी रेशा, [गुठली आदि त्याज्य वस्तु] नहीं है; केवल रस ही रस वहाँ से आ रहा है। [यदि यह सीधे] नीचे गिरता, तब तो फटता? [किन्‍तु यह] एक के मुख से दूसरे के मुख तक— इस प्रकार एकदम चलता हुआ आया है।

इसके [विषय में]कहते हैं— “हे रसिक! हे भावुक लोग! आप आलय तक इसका पान करो।” आलय माने?

भक्त: मूर्च्छा तक।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इस जगत् में देहावसान होता है, लोग मरते हैं; कि‍न्तु इस जगत् में मरते [समय] तक [श्रीमद्भागवत को] पढ़ो या इसकी कथा मृत्यु तक एक दिन [के लिए] भी मत छोड़ो। इसका निर‍न्तर पान करो। यह [अर्थ] साधारण लोगों के लिए है।

और रसिक तथा भावुक [जनों] के लिए [इसका क्या अर्थ है?] रसिक कौन हैं? कृष्ण ही रस हैं, वे अखिलरसामृतसि‍न्धु हैं। इस रस का सबसे अधिक पान कौन करता है? व्रज की गोपियाँ पान करती हैं। उससे थोड़ा-सा जो [शेष] रह जाता है, उसका यशोदा-मैया, न‍न्द-बाबा आदि वात्सल्यरस में पान करते हैं। उससे थोड़ा-सा और जो छिटका हुआ है, उसे श्रीदाम, सुबल इत्यादि [सखा] पान करते हैं। उनसे भी जो [शेष] रह गया, उसे चित्रक, पत्रक इत्यादि [दास्यरस के] भक्त लोग पान करते हैं। उनसे भी थोड़ा-सा जो रह जाता है, अत्य‍न्त थोड़ा-सा, तो उसे सनक, सन‍न्दन, [सनातन,] सनत्‍कुमार इत्यादि समाधि में थोड़ा-सा अनुभव करते हैं। वे उसका पान नहीं करते, [केवल] अनुभव करते हैं। यह ऐसा सु‍न्दर रस है। कि‍न्तु कहते हैं— “हे रसिकजन!...”

रसिक कौन हैं? जो उनके आनुगत्य में भजन करते-करते अभी रागानुगा हैं, उन्हें ‘भावुक’ कहा गया है, क्योंकि वे लोग भावावस्था तक हो सकते हैं। और रसिक कौन हैं? जिनकी वस्तुसिद्धि हो गयी है और वे लोग यदा-कदा इस संसार में घूमते हैं, जैसे नारद इत्यादि। वे सहज ही नहीं घूमते; कि‍न्तु यदि कथा होती है न, और यदि शुद्धभक्त लोग उस कथा को कहते हैं, तो किसी-न-किसी रूप में [वे अवश्य उपस्थित होते हैं—जैसे] हनुमानजी हैं, शंकरजी भी हैं, ब्रह्माजी भी हैं। नारदजी तो मान नहीं सकते, [वे तो अवश्य ही उपस्थित होते हैं।] हो सकता है कि शुकदेव गोस्वामीजी भी अपना वेश बदल करके वहाँ आ जायें। यह सम्‍भावना है क्योंकि हम लोगों ने तुलसीकृत रामचरितमानस में पढ़ा है कि जब रामच‍न्द्रजी का जन्म होता है, तब शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं— “देखो, मैं तुम्हें एक बड़ी विचित्र और गुप्त बात बतलाऊँ? जिस समय रामचन्द्रजी का जन्म हुआ और बधाई के कीर्तन होने लगे, दान आदि होने लगे, उस समय वहाँ हम दोनों व्यक्ति थे—मैं और काकभुशुण्डि। [हम दोनों ने] मनुष्य का वेश [धारण] कर लिया था, इसलिये कोई हमें पहचान नहीं पाया। उस समय हम लोग [वहाँ उपस्थित] थे।”

उसी प्रकार जब हरिकथा होती है—अरे, औरों की तो बात ही क्या, स्वयं कृष्णच‍न्द्र रह नहीं सकते, [वे भी वहाँ उपस्थित होते हैं।] और जब राधा-कृष्ण की कथाएँ होंगी, तो क्या राधाजी भी रह सकेंगी? वे लोग नहीं रह सकते। तो उनके रसिक-भक्तों की बात ही क्या! तो उन [भक्त] लोगों को रसिक [की श्रेणी में] रख दो। और हमारी समझ से भावुक [की श्रेणी में वे भक्त लोग आयेंगे,] जिनको अभी भाव उत्पन्न हुआ है, जैसे बिल्वमङ्गल इत्यादि। वे भावुक हो सकते है। और नहीं, तो यदि मुक्त-प्रग्रह वृति (किसी शब्द या वाक्य को पूर्ण स्वतन्त्रता देने और उसके सभी सम्भावित अर्थों को उनकी चरम सीमा तक निकालने की एक बौद्धिक व दार्शनिक प्रक्रिया) से लिया जाये, तो रसिक और भावुक दोनों एक ही हैं। जो भगवान् की लीलारूपी रस का पान करनेवाले ऐसे दुर्लभ महात्मा हैं, उन सबके लिए ये दोनों [शब्दों] का प्रयोग हो सकता है।

और वे लोग कब तक [इस श्रीमद्भागवतरूपी रस का] पान करेंगे?—जब हरिकथा सुनते-सुनते उनकी आँखों से आँसू बरसने लगेंगे, तब तक तो सुनेंगे; जब गला रुद्ध हो जाये, तब तक सुनेंगे; जब शरीर में पुलक और रोमाञ्च हो जाये, तब तक सुनेंगे। किन्तु यदि ‘प्रलय’ हो गया—अर्थात् मूर्च्छा की अवस्था आ गयी—तब तो वे गिर पड़ेंगे; उस समय न कुछ समझ सकेंगे और न सुन सकेंगे। इसलिये मूर्च्छा नहीं आने तक सुनते रहो।

कुछ-कुछ अद्वैतवादी ‘आलयम्’ [का एक भिन्न] अर्थ करते हैं। [उनके अनुसार] ‘आलयम्’ माने क्या?—[ब्रह्म में लय हो जाना। उनका कहना है कि] हम जीव भी ब्रह्म हैं। जैसे एक ‘घटाकाश’ है और एक ‘पटाकाश’ है। पटाकाश क्या है? एकदम सम्‍पूर्ण ये जितना आकाश है वह अखण्ड ब्रह्म। और उसमें हम जो जीव हैं, घटाकाश की तरह ब्रह्म हैं। [उनकी यह बात] भी गलत है कि माया के कारण हम किसी प्रकार से अभी जीव जैसे दिखते हैं, कि‍न्तु जब ज्ञान होगा, तो ज्ञान के द्वारा माया हट जायेगी और हम भी ब्रह्म में मिल जायेंगे। जैसे समुद्र में एक बूँद पानी मिलने से वह भी समुद्र बन जाती है, ऐसे ही [हम भी ब्रह्म में मिलकर एक हो जायेंगे।]

कि‍न्तु ये सब उदाहरण बहुत गलत हैं। [वास्तव में] ऐसा कभी नहीं होता। आज तक ऐसा कभी हुआ ही नहीं। इतना बड़ा समुद्र [होने पर भी उसमें] एक बूँद पानी दे दिया जाये, तो वह बढ़ेगा या नहीं बढ़ेगा? जो मूर्ख हैं, वे कहेंगे कि बढ़ा नहीं, [किन्तु] अवश्य ही बढ़ेगा, कम नहीं होगा। एक गिलास पूरा पानी से भरा हुआ है, उसमें एक बूँद पानी दे दो, तो क्या होगा? एक बूँद पानी [बाहर] गिर जायेगा, क्योंकि उसमें [और] रखने की क्षमता (capacity) नहीं है। उसी प्रकार यदि जीव ब्रह्म में मिलेगा, तो यह जीव पहले क्या था? ब्रह्म था या जीव था? और क्यों यह अज्ञानी हुआ? माया नाम की तीसरी वस्तु कहाँ थी? या अब कहाँ है? इन पर विचार करने से ऐसा ज्ञात होता है कि भागवत में जो कुछ लिखा है, यही परम सत्य है। [अद्वैतवादियों का मत आदि] ये सब सत्य नहीं है। इसलिये ‘आलय’ का अर्थ यह नहीं है कि जब तक ब्रह्म में लय नहीं हो जाते, तब तक इस ग्र‍न्थ का रसास्वादन करो।

देखो, एक व्यक्ति रसिक है, वह रस का पान करता है। एक व्यक्ति रस को बना करके देनेवाला, और एक व्यक्ति उसे पीनेवाला है। पीने पर ही रस का आस्वादन होता है। यदि केवल रस ही रस रहे, और रसिक न रहे [तो आस्वादन कौन करेगा?] पहले तो यह प्रश्न होगा कि यह रस आया कहाँ से? कहाँ से आया? अपने आप कहाँ से आयेगा? अरे भई, [किसी ने तो] रस बनाया होगा न— इसलिये रस की [स्वतन्‍त्र] स्थिति नहीं बनती। [और यदि] मान भी लिया कि रस है, किन्‍तु पीनेवाला नहीं है, तो उसका रसास्वादन कौन करेगा? इसलिये यह अर्थ तो [उचित] नहीं बनता कि “आलय अर्थात् ब्रह्म में जीव मिल गया, ब्रह्म बन गया और तब तक [पान करते रहो।] उस समय [अर्थात् ब्रह्म बनने पर] आवश्यकता नहीं, उसको छोड़ दो।”

इसलिये अद्वैतवादी कहते हैं— “सीढ़ी की आवश्यकता है, [किन्‍तु] कब तक आवश्यकता है? [जब तक] छत पर न चढ़ जाओ। छत पर चढ़ जाने के बाद सीढ़ी की कोई आवश्यकता नहीं। साधन करो। साधन की आवश्यकता तब तक है, जब तक वह मिल नहीं जाये। गुरु की आवश्यकता कब तक है? जब तक वे साधन बतला रहे हैं। जब मैं [स्वयं] ब्रह्म हो जाऊँगा, तब गुरु की क्या आवश्यकता होगी?”

[उनके अनुसार] वह गुरु भी तो ब्रह्म हैं। [यदि] गुरु भी ब्रह्म हैं और शिष्य भी ब्रह्म हैं, तो वे दोनों एक [ही हुए—] फिर वे कैसे उपदेश देंगे? इसलिये ये सब बातें गलत हैं।

इसलिये [वास्तव में] रस की स्थिति स‍म्पूर्ण है। कृष्ण रसिक हैं और राधाजी रसिका हैं, और दोनों [के मध्य] जो प्रेम है, वह रस है। भक्त लोग उस [रस] का छक-छक करके (पेट भर-भर करके) पान करते हैं। उनकी लीलाएँ ही रस हैं, और भक्त लोग, भावुक तथा रसिक-भक्त उसका आलय तक पान करते हैं।

इस प्रकार हमारी कथा आरम्भ हुई। श्रीमद्भागवत में ऐसी कोई भी जगह नहीं है जहाँ दशम स्कन्ध की लीलाओं का वर्णन न हो। सूत्ररूप से राधाजी का नाम [कहीं-न]-कहीं अवश्य आया है। मैं तो समझता हूँ कि प्रत्येक श्लोक में ही राधाजी और कृष्ण के युगल-नाम [किसी-न-किसी रूप में विद्यमान] हैं। जैसे [रामचरितमानस की] प्रत्येक चौपाई में किसी-न-किसी रूप में “र”, “आ”, “म” [अक्षर मिल ही जाते हैं।] “र” उसमें लग गया “आ”, [तो हो गया] “रा” और “म”— “आ” कार भी रहेगा, “र” भी रहेगा, “म” भी रहेगा—सीधे या उलटा करके देखो, कहीं-न-कहीं से अवश्य मिल जायेगा। ऐसे ही चौपाईयाँ बनी हैं। अवश्य ही “राम” बनेगा। उसी प्रकार श्रीमद्भागवत में ऐसा कोई श्लोक नहीं है जिसमें राधाजी और कृष्ण [के नाम] किसी-न-किसी रूप में [उपस्थित न हों।]

कुछ लोग कहते हैं कि राधाजी का नाम प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पञ्‍चम, षष्ठ, [सप्तम,] अष्टम, [नवम,] दशम, एकादश अथवा [द्वादश] स्कन्ध में कहीं भी नहीं है। किन्तु वे लोग न तो रसिक हैं और न भावुक; फिर वे इस शास्त्र [के गूढ़ रहस्य] को कैसे समझ सकते हैं? इसलिये उन लोगों को शपथ दी गयी है कि जो रसिक और भावुक नहीं हैं, वे इस ग्रन्थ को न देखें—विशेष करके दशम स्कन्ध न देखें।

नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः।
विनश्यत्याचरन् मौढ़याद्‍ यथारुद्रोऽब्धिजं विषम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.33.30)

[परन्तु जो अनीश्वर–असमर्थ है, उन्हें मन से भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीर से करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वर की इस लीला का अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट–पतित हो जायेगा। भगवान् शिव ने समुद्र से उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, किन्तु उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।] GVP

मन के द्वारा भी [उसका] चिन्तन न करें। क्यों? क्योंकि उसके जो गूढ़ रहस्य हैं, वे उन्हें ज्ञात ही नहीं होंगे।

एक [व्यक्ति] ने पूछा— “तुम्हारा नाम क्या है?” किसी का नाम पूछा। उसने कोई नाम कहा [अर्थात् अपना नाम बता दिया।] अब इसी को कुछ दूसरे रूप में कहा जाये— “हमारे यहाँ एक व्यक्ति आये हैं। उनके यहाँ (मस्तक) पर तिलक है। जहाँ प्रवचन होता है, वहाँ दो ग्र‍न्थ रखे गये हैं, और वे उनके ठीक बीचो-बीच सामने बैठते हैं। उनके ठीक सामने प्रदीप जलता रहता है। वे जैकेट पहन करके [आये हैं] और मन लगा करके [कथा] सुनते हैं। उनके पास ही एक ओर उनका बेटा सुरेश बैठा है, दूसरी ओर उनकी पत्नी बैठी हैं, और चारों ओर उनके सब नाती-पोते बैठे हुए हैं। अच्छा बतलाओ तो वे कौन हैं? उनका क्या नाम हैं? क्या नाम है?”

तुम बतला सकते हो कि क्या नाम है? ऐसा कोई नहीं है जो बतला सकता है। यदि कोई पूछे कि आपका नाम क्या है? तो वे रामप्रकाश ही कहेंगे। किन्‍तु जब कोई इस रूप से [अपरोक्षरूप से] पूछे, तो दोनों में माधुर्य किसमें है? इसमें माधुर्य है। वह तो सीधे-सीधे (direct) हो गया, उसमें कुछ रस-वस [नहीं है।]

इसी प्रकार राधाजी के नाम को भी [भागवत में अपरोक्षरूप से] ऐसे रखा गया है कि हर कोई उसे न समझ सके, और [फिर भी रसिकजन] बड़े सहज रूप में उसे समझ जायें।

रास हो रहा था। कृष्ण ने गोपियों को आकर्षण किया। [वे सब अपने-अपने] घरों से आ रही थीं जल्दीबाजी में थीं, एकाएक [अचानक] व‍ंशी की ध्वनि हुई। अभी पूर्णिमा का चन्द्रमा पूर्व दिशा में थोड़ा-थोड़ा उदित हुआ था। उसकी किरणें लाल-लाल हो रही थीं। सारी वृक्षावलियाँ और वहाँ का दृश्य मानो सि‍‍न्दूरी रङ्ग से एकदम उन्होंने लाल कर दिया। [ऐसा लग रहा था मानो चन्द्रमा ने] अबीर हाथ में लेकर अपनी प्रेयसी पूर्व दिशा के मुखमण्‍डल पर [लाल रङ्ग] लगा दिया हो। सभी कुछ [लालिमायुक्त हो गया।] नदियों, समुद्र या जलाशयों में उगते हुए च‍न्द्रमा की जो सु‍न्दर आभा पड़ रही थी, वह कैसी रही होगी? लाल-लाल न!

थोड़ी देर के बाद [कृष्ण ने] व‍ंशीवादन किया। उसे सुन करके लाखों-लाखों गोपियाँ दौड़ पड़ीं। कोई किसी को नहीं देख रही थी; सब अकेली-अकेली ही दौड़ पड़ीं। [किसी को] सुधबुध नहीं थी। कोई एक [गोपी आँख में] काजल लगा रही थी—एक आँख में आधा लगाया [और वंशीध्वनि सुनते ही] बस छोड़ दिया [और दौड़ पड़ी,] आधी आँख में ही काज़ल लगाया। कोई एक आँख में काजल लगाये [चली आयी।] किसी ने गले में पहनने के लिए हार उठाया था, इतने में व‍ंशी बज गयी और मन दूसरी ओर चला गया। [वह समझ ही नहीं पायी कि] कहाँ क्या पहनना चाहिये; उसने जल्दी से कमर में पहन लिया। कोई जा रही थी, अभी आँचल को सिर पर नहीं रखा; बस आँचल घसीटता हुआ [पीछे] चलने लगा और वह दौड़ करके आ गयी। किसी ने कमर में पहनने के लिए करधनी उठायी, किन्‍तु उसको पहना नहीं, [पहनना भी भूल गयी।] इस प्रकार विपर्यय-भाव से, बेसुध होकर सब [गोपियाँ] चली आयीं।

वहाँ आने पर कृष्ण ने उन्हें बहुत समझाया—“अरे! [अब तुम सब अपने]-अपने पतियों के पास चली जाओ। तुम लोगों का स्वागत है। मैं तो ब्रह्म हूँ न, कृष्ण हूँ; [सम्भवतः] तुम मुझे देखने के लिए आयी हो। [तुम लोग] पूर्ण च‍न्द्रमा का दृश्य देखने के लिए, वन का दृश्य देखने के लिए आयी हो। अब [अपने-अपने] घरों को लौट जाओ।”

वे सब चुपचाप [खड़ी रहीं,] कुछ बोल नहीं रहीं। सिर नीचे कर लिया और पैरों की उँगलियों से भूमि कुरेदने लग गयीं। [वे समझ नहीं पा रही थीं कि] कृष्ण ठिठौली कर रहे हैं या सचमुच में कह रहे हैं। कुछ निश्चित न कर सकीं। वे प्रतीक्षा कर रही हैं कि [कृष्ण] आगे कुछ और कहें, तब कुछ समझ में आये और वे उत्तर दें।

[फिर कृष्ण ने कहा—] “देखो, अब घर लौट जाओ; नहीं तो तुम्हारे पति तुम्हें खोजते [हुए यहाँ आ] जायेंगे और फिर गड़बड़ हो जायेगी। शीघ्र लौट जाओ। [यदि किसी] स्त्री का पति धनवान न हो, मूर्ख भी हो, कुछ कमानेवाला न हो, लँगड़ा-लूला भी हो, निर्धन भी हो—तो भी स्त्री के लिए उचित यही है कि वह अपने पति की सेवा करे। दूसरे पुरुष के पास जाना उचित नहीं है, यह महाअधर्म है। यह स्वर्ग से भी भ्रष्ट कर देनेवाला है और यहाँ पर (इस लोक में) भी बदनामी करनेवाला है। यह जीवन को चौपट करनेवाला है। [इसलिये] लौट जाओ।”

[किन्तु गोपियों ने उनकी बात] नहीं सुनी। उन्होंने ऐसा उत्तर-प्रत्युत्तर किया— “अरे! आप तो गुरु हैं। गुरुजी की बात मान लेनी चाहिये। हम [आपकी बात] मानते हैं। ऐसा गुरु किसको मिलेगा, जो इतना सु‍न्दर उपदेश देगा? कि‍न्तु शास्त्र में ऐसा लिखा है कि पहले गुरुजी की सेवा करो, तब भगवान् की सेवा करो। तो इसलिये पहले गुरुजी की ही सेवा हो जाये—आप इसको ग्रहण करें। और यदि भगवान् और पति से पहले गुरु की सेवा नहीं करते हैं, तो प्रत्यवाय [दोष] लगेगा।” इस प्रकार [गोपियों ने] कृष्ण को अपने वचनों में बाँध लिया।

इसके बाद रास आरम्भ हुआ। रास होते-होते… सब गोपियाँ और कृष्ण आनन्दपूर्वक रास करने लगे। कृष्ण ने उतने ही रूप बनाये [जितनी गोपियाँ थीं,] और एक-एक गोपी के साथ एक-एक कृष्ण [उपस्थित] हो गये। ऐसी अद्भुत रीति कि दो कृष्ण के बीच में एक गोपी और दो गोपियों के बीच में एक कृष्ण [हो गये।] एक गोपी और एक कृष्ण—अद्भुत निराला दृश्य! तीनों चीजें एक साथ में हो गयीं—दो गोपियाँ नृत्य कर रही हैं और बीच में कृष्ण हैं; दो कृष्ण नृत्य कर रहे हैं अपने दोनों हाथों को दोनों गोपियों को दिये; एक कृष्ण [एक गोपी] एक-दूसरे के कन्धे पर हाथों में हाथ लगा करके [नृत्य कर रहे हैं।] बड़ी विचित्र बात हुई कि जितनी गोपियाँ थीं, [उतने ही कृष्ण हो गये।] [#2]

[प्रत्येक] गोपी ने सोचा— “आज [कृष्ण] सब गोपियों को छोड़कर मेरे साथ ही नृत्य कर रहे हैं।”

राधाजी ने कहा— “अच्छा, मैं तुम्हें नहीं जानती क्या? तुम मेरे पास में हो और जब उधर देखती हूँ तो उनके पास चले जाते हो, सबके पास जाते हो और [मुझे] कहते हो कि तुम ही मेरी सबसे बड़ी प्रियतमा हो।” बस [राधाजी को] मान हो गया और गोपियों को सौभाग्यमद हो गया। राधाजी ने रास छोड़ दिया और रास से निकल गयीं— “मैं तुम्हारे साथ नृत्य नहीं करूँगी।”

[वहाँ पर कहा गया कि] एक गोपी ने कहा— “मैं इसके साथ नृत्य नहीं करूँगी।” तो इसमें स्पष्टरूप से नाम नहीं बताया कि किसने ऐसा कहा। और दूसरी गोपियोंको सौभाग्यमद हुआ [कि हमारा बड़ा सौभाग्य है कि कृष्ण मेरे ही साथ रास कर रहे हैं।] कृष्ण उसको (मान करनेवाली गोपी को) ढूँढने के लिए चले और अन्य गोपियों को छोड़ दिया।

[तब गोपियों ने देखा—] “अरे! हम सबको छोड़कर वे जिस गोपी को ढूँढने जा रहे हैं, वही सबसे श्रेष्ठ गोपी है।” और उसके पास में पहुँच करके उन लोगों ने देखा कि [कृष्ण स्वयं] उसके केशों का शृङ्गार कर रहे थे, और सब कर रहे हैं, उन्हीं के साथ [एकान्‍त] में जा रहे है, तो उन्होंने कहा—

अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।
यन्नो विहाय गोविन्‍दः प्रीतो यामनयद्‍ रहः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.30.28)

[इस भाग्यवती रमणी ने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरि की यथार्थरूप में आराधनाकर उन्हें विशेषरूप से सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?] GVP

निश्चितरूप में इसने भगवान् की अराधना की है, जिससे हमारे प्रियतम कृष्ण उसी गोपी के साथ [चले गये।] वह गोपी कौन है? राधाजी। इसलिये [स्पष्ट] कहने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार प्रथम स्क‍न्ध से [लेकर] दशम स्क‍न्ध, एकादश और द्वादश स्कन्ध तक, एक-एक कड़ी में किसी-न-किसी रूप में राधाजी और कृष्ण का अवश्य ही नाम है। कि‍न्तु जो रसिक और भावुक हैं, [वे ही इसको समझ सकते हैं। जो साधारण] लोग है, वे इसको समझ नहीं पाते हैं। आप लोग इसको समझने की चेष्टा करें।

अभी-अभी यह प्रसङ्ग आया कि उद्धवजी द्वारका से चले। कृष्ण ने उन्हें आदेश दिया—“तुम बदरिकाश्रम चले जाओ। अब हम अपनी लीला का संवरण करेंगे। [यहाँ] कोई भी नहीं रहेगा। शीघ्र अर्जुन को बुलाओ।”

अर्जुन आये। कृष्ण ने कहा— “अर्जुन! हमारी पत्नियों को लेकर शीघ्रातिशीघ्र राजभवन से निकालो और उन्हें अपने पास हस्तिनापुर ले जाओ। वहाँ उनकी रक्षा और सेवा करना।”

अर्जुन गये और उनको निकाला। निकालते ही अभी आये ही थे, एकदम निकट ही थे कि इतने में समुद्र ने गर्जन किया और सबको अपनी गोद में समा लिया। द्वारकापुरी की कोई निशानी नहीं रही; एकदम सम्‍पूर्णरूप से भीतर डूब गया। अर्जुन हाहाकार करने लगे।

इधर कृष्ण ने उद्धव को बुलाकर उपदेश दिया और कहा—“तुम बदरिकाश्रम जाओ, कुछ दिन वहाँ रहो।” इसके बाद उन्‍हें यह भी उपदेश दिया कि आगे चलकर श्रीमद्भागवत का प्रकाश किस प्रकार होगा। [उद्धवजी] वहाँ से आते हैं और कृष्ण ने अपनी लीला का संवरण कर लिया।

इसके बाद [उद्धवजी] कुरुजाङ्गल देश में यमुना के किनारे आये। [वहाँ पर उनकी] विदुर से भेंट हुई। विदुर से भेंट होने [वाला जो प्रसङ्ग है, उसके] दो-चार श्लोकों का शुभान‍न्दजी ने सवेरे पाठ किया। उसमें कृष्ण की बाल्यकाल से लेकर द्वारका तक की समस्त लीलाओं का बड़े सुन्‍दर रूप में वर्णन किया है। उसमें पूरा भागवत ही आ गया है।

उद्धवजी कहते-कहते प्रेम में अधीर हो गये और बोले— “आज कृष्ण ने हमें वञ्‍चित कर दिया। कृष्ण के बिना हम रह नहीं सकते थे। ओह! जिन्होंने व्रज में जाकर कैसी वंशी बजायी, रास इत्यादि के द्वारा समस्त व्रजवासियों को मुग्ध कर दिया; जिन्होंने द्वारका में आकर हमको इतना स्नेह दिया, सब लोगों को स्नेह दिया— वे आज हमें ठग करके चले गये। आज उनके अभाव में हममें कोई शक्ति नहीं रही।”

अर्जुन के [विषय में] तो सुना है न—जब वे इन स्त्रियों (महिषियों) को लेकर जा रहे थे, तब कुछ ग्वाल-बाल लाठियाँ लेकर आ गये। उन्होंने अर्जुन का धनुष आदि तोड़-फोड़ दिया [और उन स्त्रियों को वैसे ही हाँककर ले गये,] जैसे कोई गायों को हाँककर ले जाता है। अर्जुन भी विलाप करने लगे।

इस प्रकार जितनी भी शक्ति है, वह सब कृष्ण की ही शक्ति है। उन्हीं की शक्ति से [सब कार्य हो रहे हैं।] और वह शक्ति कौन है? श्रीमती राधिकाजी पूर्ण शक्ति हैं। वही अपनी आंशिक शक्ति से जगत् को बचाये हुए रखती हैं।

इसलिये [उद्धवजी] कृष्ण-लीलाओं का स्मरण करके रो रहे हैं, विलाप कर रहे हैं…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
इस विषय में श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (20.127–136) द्रष्टव्य है।

#2
[श्रीरासपञ्चाध्यायी 10.33.3 सारार्थदर्शिनी टीका - 'तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः प्रविष्टेन'—इस वाक्य की व्याख्या द्वारा श्रीकृष्ण और गोपियों की अवस्थिति दो प्रकार से कही गई है—
(1) एक-एक गोपी के बीच में प्रवेश, तथा
(2) कुछ आचार्यों के अनुसार दो-दो गोपियों के बीच में प्रवेश।

प्रथम पक्ष—अर्थात् एक-एक गोपी के बीच में प्रवेश—की व्याख्या के अनुसार, एक गोपी के दोनों ओर दो श्रीकृष्णों का प्रकाश तथा एक गोपी के कन्धों पर दो श्रीकृष्णों की भुजाओं का स्पर्श—इस प्रकार की क्रिया में किसी प्रकार की अनुचितता की आशंका करना उचित नहीं है। क्योंकि यहाँ योगमाया ने ही प्रत्येक गोपी के गले में श्रीकृष्ण की अनेक रूपों में प्रकाशमान भुजाओं के स्पर्श का अनुभव करा दिया था।

अब दूसरे पक्ष—‘दो-दो गोपियों के बीच में प्रवेश’—की व्याख्या में भी कोई असामञ्जस्य नहीं है, क्योंकि समस्त व्रजस्त्रियाँ स्वयं को ही श्रीकृष्ण के सर्वाधिक निकट अनुभव करने लगीं। अर्थात् श्रीकृष्ण दो-दो गोपियों के बीच इस प्रकार अवस्थित हुए कि प्रत्येक गोपी यह अनुभव करने लगी—
“मैं ही श्रीकृष्ण द्वारा आलिङ्गित हो रही हूँ, और श्रीकृष्ण मेरे ही निकट हैं।”]

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