PURE BHAKTI ARCHIVE
Subscribe to the Daily Harikatha & Short Videos in Hindi & English @Gaudiya Rasamrita

Sri Damodarastakam (5): Verse 2, Extracting Krsna's Mercy

26:26
#1661
Vrndavana (?)
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Explanation of Sri Damodarastakam verse 2 'rudantam muhur netra-yugmam mṛjantam'.
  • Pastime of Mother Yasoda running after Krsna and catching Him.
  • Teaching from the pastime: to catch Krsna you need to run faster than Krsna.
  • Practice your devotional practices - that will force Krsna to give you mercy.
  • Deliverance of the sons of Kuvera.

Transcript

श्रीदामोदराष्टकम् (5): श्लोक 2 — कृष्ण की कृपा प्राप्त करना

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 25 अक्तूबर 1994 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कहाँ तक हुआ था कल? हो गया था?

रुदन्तं मुहुर्नेत्र-युग्मं मृजन्तं
कराम्भोज–युग्मेन सातंक-नेत्रम्।
मुहुःश्वास-कम्पत्रिरेखांक-कण्ठ–
स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्तिबद्धम्॥
-श्रीदामोदराष्टकम् (2)

[मैया के हाथ में छड़ी को देखकर मार खाने के भय से डरकर, जो रोते–रोते बारम्बार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मल रहे हैं, जिनके नेत्रयुगल भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रोदन के आवेग से बारम्बार श्वास लेने के कारण जिनके त्रिरेखायुक्त कण्ठ में धारण की हुई मोतियों की माला आदि कण्ठाभूषण कम्पित हो रहे हैं और जिनका उदर (माँ यशोदा की वात्सल्य–प्रेमरूप) रस्सी से बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्दस्वरूप दामोदर की मैं वन्दना करता हूँ।] GVP

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततो द्रुत्यगोप्या॥
-श्रीदामोदराष्टकम् (1)

[जिनके कपोलोंपर दोदुल्यमान मकराकृत कुण्डल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल नामक अप्राकृत चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दधिभाण्ड फोड़ने के कारण माँ यशोदा के भय से भीत होकर ओखल से कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिन्हें माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेगपूर्वक दौड़कर पकड़ लिया है, ऐसे उन सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।] GVP

कल हमने वर्णन किया था कि यशोदाजी कृष्ण को पकड़ने के लिए उनके पीछे-पीछे दौड़ रही हैं। और [कृष्ण यह सोचकर भयभीत हैं कि,] “मैंने दधि के भाण्‍ड को तोड़ दिया है, इसलिये मैया मुझे अवश्य पकड़कर मारेगी।” इसी डर के मारे [वे बहुत तेजी से आगे-आगे भाग रहे हैं।] ब्रह्मा, शंकर इत्यादि तपस्या के द्वारा पवित्र हुए हृदय में भी जिनके चरणकमलों का ध्यान नहीं कर पाते, आज गोपी यशोदाजी उन्हीं कृष्ण को पकड़ने के लिए [उनके पीछे दौड़ रही हैं।] कृष्ण जितना तेज दौड़ रहे हैं, यशोदाजी उनसे भी अधिक तेजी से दौड़कर उन्हें पकड़ने की चेष्टा कर रही हैं।

कालयवन, जरासन्‍ध जिनको नहीं पकड़ सके, और ये गोपी यशोदाजी उनको—परब्रह्म को, समस्त ईश्वरों के ईश्वर को आज पकड़ने के लिए दौड़ रही हैं। कृष्ण छोटे से बच्चे हैं। [मैया को लग रहा है कि] अब पकड़ा, अब पकड़ा किन्तु झट इधर से उधर हो करके भाग जाते हैं। यशोदा मैया का स्थूल शरीर, नितम्ब नीचे बहुत भारी, ऊपर में वक्ष:स्थल भी भारी, बीच में कमर ऐसी पतली-सी, ज्ञात होती है, टूट न जाये— ऐसी परम सुन्‍दरी! और वे कृष्ण के पीछे-पीछे दौड़ रही हैं। पसीने से तर-बतर हो गयीं। केश में जो फूल लगाये गये थे, वे धीरे-धीरे एक-एक करके गिरने लगे और वे दौड़ रही हैं। यदि कृष्ण से अधिक तेजी से न दौड़ें तो कृष्ण को पकड़ेंगी कैसे? इसलिये कृष्ण जितना तेज दौड़ रहे हैं उससे दुगुनी (double) गति से दौड़ना चाहिये। बराबर दौड़ने से भी पकड़ में नहीं आयेंगे, दूरी उतनी ही—बराबर रह जायेगी। इसलिये यशोदाजी बहुत तेजी से दौड़ीं।

केश में [संलग्न पुष्प] एक-एक करके गिर रहे हैं, मानो कह रहे हैं— “मैया तुम अकेली नहीं हो, हम तो तुम्हारे साथ में है, कदम में कदम मिला करके हम भी आ रहे हैं।” फूल गिर रहे हैं सब, और यशोदाजी दौड़ रही हैं। कृष्ण ने देखा कि मैया तो पसीने से तर-बतर हो गयी हैं। उनका चित्त द्रवित हुआ। यशोदा ने जैसे ही लठिया उठायी और मारने के लिए दौड़ीं त्योंहि कृष्ण ने कहा— “मैया मुझे मत मार। किसलिये मार रही है?”

[यशोदा मैया ने कहा—] “तूने मटका क्यों फोड़ा?”

[कृष्ण ने कहा—] “मैंने नहीं फोड़ा। वह तो तुम्हारे पैर के कडुला से— जो मोटे-मोटे चाँदी के तुमने पहने हैं, उसीसे ठोकर लगी और टूट गया।”

[यशोदा मैया ने कहा—] “अच्छा? मुझसे ही टूट गया। बन्‍दरबन्‍धो! चोर!”

[मैया ने चोर कहकर सम्बोधित किया तो कहने लगे—] “चोर मेरे वंश में नहीं हुआ है। यदि होगा तो तेरे वंश में हुआ होगा, हमारे वंश में चोर नहीं।” यशोदाजी फिर लठिया ले करके दौड़ीं और कृष्ण को पीछे से ले करके पकड़ लिया।

[इस लीला में शिक्षा यह है कि] भगवान् की हमारे प्रति जो दया है, हमारे प्रति उनका जो प्रेम है यदि उससे अधिक हमने कृष्ण से प्रेम नहीं किया, तो कृष्ण कभी भी पकड़ में नहीं आयेंगे— ये चीज समझो।

इसके बाद यशोदा मैया ने कहा— “अच्छा, तू रो रहा है!” [चल, अब मैं] डण्डा छोड़ देती हूँ। किन्‍तु तुझे बाँध करके रखूँगी, कहीं तू—अशान्‍त लड़का—कहीं तू भाग न जाये।”

[यशोदा मैया ने सोचा—] “इस समय कृष्ण क्रोध की अवस्था में है, इसलिये इसको पकड़ करके अभी ओखल से बाँध देती हूँ। ओखल बहुत भारी है; इसे लेकर वह भाग नहीं सकता।”

[ऐसा सोचकर यशोदाजी कृष्ण को] रस्सी से बाँधने लगीं, किन्तु [रस्सी] दो अंगुल छोटी पड़ गयी। कल हमने यह पाठ किया था। इसलिये आज यह प्रसङ्ग संक्षेप में आपको सुना रहा हूँ।

रस्सी दो अंगुल कम पड़ रही है। सबसे पहले यशोदाजी ने अपने [केशों में संयुक्त] रेशम की डोरी से कमर बाँधनी चाही, तो वह दो अंगुल कम पड़ गयी। कृष्ण की कमर इतनी-सी मोटी, द्वादश अंगुल—यशोदाजी के अंगुल-प्रमाण से केवल बारह अंगुल की थी। और उनकी ये रेशम की डोरी, कम-से-कम तो दो-तीन हाथ लम्‍बी है, किन्‍तु बाँधने में नहीं आयी।

यशोदाजी ने [आश्चर्य से] कहा— “यह क्या बात है? सखी, एक रस्सी लाओ तो।” वह सखी गो बाँधने की रस्सी ले आयी। उस रस्सी को उस रेशम की डोरी में जोड़ दिया और फिर उससे बाँधने लगीं, किन्तु फिर भी देखा कि रस्सी दो अंगुल कम पड़ रही है। लोगों ने [विस्मित होकर] देखा कि ये क्या बात हो गयी!” [कृष्ण की] कमर उतनी की उतनी ही रही और रस्सी लम्‍बी होती गयी— एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह—गोकुल की जितनी भी रस्सियाँ थीं, सब लाकर जोड़ दी गयीं, किन्तु कृष्ण की कमर नहीं बँधी। [प्रत्येक बार रस्सी] दो अंगुल ही कम [पड़ रही थी।]

कृष्ण की योगमाया अचिन्त्य अघटनघटनपटीयसी है। जो नहीं हो सकता, उसे भी वह करवा देती है। कृष्ण ने सोचा— “यदि मैया मुझे बाँध देंगी, तो मैं बच्चों के साथ खेलूँगा कैसे? [मुझे देखे बिना] गैयाँ अपने बछड़ों को दूध नहीं पिलातीं। वे चुपचाप खड़ी हैं और बछड़े दूध नहीं पी रहे। [यदि मैं उनके पास] नहीं जाऊँगा, तो यह सब कैसे होगा? इसलिये मैया मुझे बाँध न सकें।” इतने में साथ-ही-साथ उनकी योगमाया-शक्ति [उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए कार्य करने लगीं।] कमर उतनी की उतनी ही रही, रस्सी लम्बी होती गयी, किन्‍तु [फिर भी वह] दो अंगुल छोटी ही रह गयी।

ये [कृष्ण को बाँधने के लिए रस्सी] दो अंगुल ही किसलिये कम हो रही है? यदि हम साधन नहीं करते— वह एक अंगुल [की कमी है] और दूसरा भगवान् की कृपा नहीं होती ये [दूसरे अंगुल की कमी है।] यदि हम अच्छी तरह से साधन करें, जिससे कि कृष्ण का चित्त द्रवित हो जाये तो ये [रस्सी] एक अंगुल [पूरी] हो सकती है और हमारे कष्टों को देख करके यदि कृष्ण का चित्त द्रवित हो जायेगा तो वह दूसरी अंगुल [भी पूरी हो सकती] है। इसलिये इतना हमको भजन साधन करना है, जिससे कृष्ण का चित्त द्रवित हो जाये। आप केवल साधन करते हैं और ऐसा साधन करते हैं कि कृष्ण का चित्त द्रवित नहीं होता, [तो ऐसे साधन से कोई लाभ नहीं। जब तक प्रीतिमय कठोर साधन नहीं करेंगे,] तब तक लाखों जन्मों में भी कृष्ण द्रवित नहीं होंगे और उनको हम पा नहीं सकेंगे।

भजन में ऐसा परिश्रम करना पड़ेगा और इतना वैराग्य भी होना चाहिये कि कृष्ण द्रवित हो जायें। यशोदाजी [के द्वारा कृष्ण को] बाँधते-बाँधते सवेरे से दस बज गया, किन्‍तु उन्होंने कुछ खाया-पिया नहीं। वे सोच रही हैं— “आज मेरे पेट से निकला हुआ बच्चा [ही मुझसे नहीं बँध रहा है!] आज नहीं, कल नहीं, परसों नहीं, बरसों नहीं, हजारों बरसों तक मैं इसे बाँधती रहूँगी, किन्‍तु अवश्य बाँधूँगी।”

यह है भजन का अर्थ। “जितना भी कष्ट होगा, सह लेंगे। भले ही स्त्री, पुत्र, और परिवार हमको छोड़ दें, किन्‍तु हम भजन अवश्य करेंगे।”— यदि ऐसा भाव नहीं आयेगा तो भगवान् वशीभूत नहीं होंगे।

आप लोगों ने हरिदास ठाकुर के विषय में सुना है। वे अपतित रूप में तीन लाख हरिनाम करते थे। हमारे रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी कैसे भजन करते थे? महाप्रभुजी कैसे भजन करते थे? उन्होंने दिखलाया कि [भजन की परिपाटी क्या है।] भजन करना है तो वैसे करो। गृहस्थ में रहनेवाले राय रामानन्‍दजी, श्रीवास पण्डितजी, और और भक्त लोग जो सब हो गये हैं, श्यामानन्‍द प्रभु हो गये हैं, उन लोगों ने भी वैसे ही भजन किया। कभी सूखी रोटी, कभी चना, कभी वह भी मना। कभी चौबीस घण्टे में से केवल कितना? चौबीस मिनट सो लिया, नहीं तो वह भी नहीं। एक-एक पेड़ के नीचे एक-एक दिन रहते थे। ऐसे रह करके भजन किया।

हम लोग तो अभी गोवर्धन की परिक्रमा करने के लिए व्रजमण्डल में निकले हैं, तो अपना सारा सामान लेकर आये हैं। रजाई भी साथ लाये हैं, तोशक भी लाये हैं, और रहने के लिए ऐसे घर में आये हैं, जहाँ बाथरूम आदि सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इतने [सब प्रबन्ध होने] पर भी हमें असुविधा हो रही है। “संलग्न बाथरूम (attached bathroom) नहीं है, महाराजजी! मोज़े पहनकर जा सकते हैं या नहीं? जूते पहनकर जा सकते हैं या नहीं? हमने तो पहले कभी इतना चला भी नहीं है।”

तो हम ऐसा भजन करेंगे, जिससे कृष्ण द्रवित हो जायें [और सोचें—] “देखो! यह हमारे लिए [कितने प्रेमपूर्वक] ऐसा [कठोर साधन] कर रहा है!” व्रज की धूलि अङ्गों में लगनी चाहिये न? सिर पर लगनी चाहिये। गोवर्धन में ऐसा विश्वास करना चाहिये कि ये गिरराज गोवर्धन कृष्ण के प्रेम को देनेवाले हैं।

तो ये दो अंगुल हैं—[कृष्ण के चित्त को द्रवित करनेवाला साधन-भजन और साथ ही उनकी कृपादृष्टि।] अपने द्वारा भजन के लाख प्रयास करने पर भी कृष्ण नहीं मिलेंगे जब तक कि उनकी कृपा नहीं हो जायेगी। और कृष्ण की कृपा तो सब समय ही बरस रही है किन्तु यदि साधन-भजन नहीं करेंगे, तो भी कोटि-कोटि बरसों में भी कृष्ण नहीं मिल सकेंगे।

यशोदाजी ने कहा— “आज अवश्य ही बाँध करके रहूँगी। नारायण! क्या आप मेरी लज्जा नहीं रखेंगे? मैंने बहुत दिनों तक आपकी सेवा की है।” तब वह प्रार्थना कृष्ण के यहाँ पहुँच गयी, क्योंकि नारायण तो कृष्ण ही हैं। कृष्ण ने देखा— “मैया पसीने से तर-बतर हो रही है। मोती जैसी स्वेद-बूँदें टपक रही हैं, और आँसू आँखों में भर आये हैं।” गोपियों ने ताली बजा करके कहा— “यशोदा! तेरे बेटे के ललाट में बन्धन लिखा ही नहीं है। ब्रह्मा ने लिखा नहीं, तो इसे कैसे तू बाँधेगी?” यशोदाजी ने कहा—“मैं ब्रह्माजी से फिर से नया [भाग्य] बनवा लूँगी किन्तु मैं अवश्य ही बाँधूँगी।” ऐसे ही होना चाहिये। कृष्ण को दया आयी। फिर साथ-ही-साथ क्‍या हुआ? “कृपयासीत् स्वबन्धने।”

भक्त:

स्वमातुः स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रजः।
दृष्‍ट्‍वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत् स्वबन्धने॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.9.18)

[अत्यधिक श्रम के कारण यशोदा का शरीर पसीने से लथपथ हो गया। पड़ोसिन गोपी उनसे कहने लगी कि मणिमय छोटी-सी करधनी से तो इसकी कमर बँधी हुई है, पर घर की सारी रस्सियाँ छोटी पड़ रही हैं! लगता है यशोदे! विधाता ने इसके ललाट में बन्धन लिखा ही नहीं है। यह तुम्हारे बालक का शुभलक्षण है। यशोदा बोलीं—प्रातःकाल से सन्ध्याकाल तक गाँव की समस्त रस्सियाँ जोड़कर इसके उदर की सीमा जानना चाहती हूँ। अन्ततः भक्त के हठ की विजय हुई। भगवान् श्रीकृष्ण ने देखा कि माता शिथिल हो रही हैं, चोटी में संलग्न समस्त पुष्प भी झड़ रहे हैं, तो उन्होंने उनके प्रति अत्युज्ज्वल कृपावर्षण किया। विभुता ऐश्वर्यशक्ति वहाँ से अन्तर्धान हो गयी और श्रीकृष्ण पहलीवाली रस्सी से ही अर्थात् यशोदा की केश-वेणी की डोरी से ही बँध गये।] GVP

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कृष्ण ने यशोदा मैया के अत्यधिक परिश्रम को] देखा और झट उनकी कृपाशक्ति आयी—उनके हृदय में सञ्‍चरित हुई। योगमाया की अघटनघटन-पटीयसी-शक्ति [के प्रभाव से कृष्ण की] समस्त भगवत्ता इत्यादि सब दूर हो गयी और साथ-ही-साथ में कृपाशक्ति ने आकर उनको द्रवित कर दिया और वह शक्ति चली गयी। बस द्वादश अङ्गुल में ही वे बँध गये, केवल सिर में बाँधनेवाली रेशम की डोरी से ही बँध गये और उसमें भी ओखल को लेकर बाँधा। ऐसा बाँधा कि पेट की तरफ में गाँठ नहीं दी, वहाँ से तो खोल देगा। पेट के तरफ से रस्सी को लिया और फिर उसमें यहाँ पर घुमाव दे करके फिर ओखल की ओर बाँधा जिससे कृष्ण का छोटा-सा हाथ वहाँ पर पहुँचे नहीं और खोल न सके। इस प्रकार से उनको बाँध दिया [और कहने लगीं—] “अभी ठहर तू!”

गोपियाँ रोने लगीं। माताओं [मातृस्थानीय गोपियों] ने यशोदाजी को बहुत मना किया। तो ये लड़का बिगड़ जायेगा— इसलिये यशोदा माँ ने उस परब्रह्म को अपना पुत्र मान करके और उनको बाँध दिया और बिगड़ करके दधि-मन्‍थन करने के लिए चली गयीं।

बहुत-से बालक वहाँ पर आ गये थे। जब मैया चली गयीं, तो वे ताली बजा-बजा करके कृष्ण को चिढ़ाने लगे— “कैसा आनन्द आ रहा है? कैसा अच्छा लग रहा है?” कृष्ण की आँखों से अभी तक जो आँसू बह रहे थे, वे अब सूखने लगे। कृष्ण भी उन बालकों के साथ-साथ मुस्कुराने लगे। [उनके कपोलों पर] अभी तक [आँसुओं के] दाग पड़े हुए हैं। गङ्गा-जमुना के जैसे काजल से मिश्रित अश्रु की दो धाराएँ यहाँ से बह रही हैं, वे अब धीरे-धीरे सूखने लग गयीं। तो कृष्ण भी मुस्कुरा दिये।

सखाओं ने कहा— “खोलो, खोल दो, खोल दो! मैया तो चली गयी हैं।”

मधुमङ्गल दौड़ करके खोलने के लिए आया, किन्‍तु खोलता ही रह गया, नहीं खुला। इतने में दूसरे, इतने में तीसरे, एक सेकण्‍ड की देरी [किये बिना] सब लोग खोलने लगे, किन्‍तु वह बन्धन खुला ही नहीं, खुला ही नहीं। बालकों ने कहा— “कृष्ण तुम ही खोल लो।” कृष्ण ने हाथ बढ़ाया, किन्‍तु [गाँठ तक] हाथ ही नहीं आया। मैया का किया हुआ [वात्सल्यरस का] बन्धन सख्यरस से नहीं खुलेगा। इसलिये वह नहीं खुला।

इसलिये जब देखा कि खुलेगा ही नहीं और बहुत चेष्टा करके जब सब बालक हार गये तो फिर कृष्ण को याद आयी— “अहो! हमारे भक्त नारदजी हैं। उन्होंने कुबेर के पुत्र यमलार्जुन—नलकूबर और मणिग्रीव को [उनकी उदण्डता के कारण] पूर्वजन्‍‍म में अभिसम्पात दिया था—“जाओ, तुम वृक्ष हो जाओ और [जब वे अपने कुकृत्य के लिए पश्चाताप करके उनसे क्षमा-याचना करने लगे तो] कहा था— “द्वापरयुग के अन्‍त में कृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे।”

[इनका प्रसङ्ग इस प्रकार है कि] जब ये दोनों कुबेर-पुत्र कुछ अप्सराओं को ले करके हिमालय के एक प्रान्‍त में स्थित मानसरोवर में काम-क्रीड़ा इत्यादि कर रहे थे, तब नारदजी उधर से जा रहे थे। [नारदजी को देखकर] वे अप्सराएँ तो पानी से निकल आयीं, झट से कपड़े पहन लिये और उनको प्रणाम किया, किन्तु ये दोनों उदण्डों के जैसे [उसी अवस्था में बने रहे।] उन्‍होंने नारदजी को कुछ समझा नहीं— “यह बेकार का व्यक्ति [कहाँ से आ गया!”] इस प्रकार उनको गाली देने लगे [और अप्सराओं से कहने लगे— “शीघ्र इधर आ जाओ। यह मरा हुआ न जाने कहाँ से यहाँ आ गया!”

[उनकी ऐसी धृष्टता को देखकर] नारदजी ने [क्रोध प्रकाशित करते हुए] कहा— “तुम तो वृक्ष की भाँति हो गये हो [अर्थात् तुम्हारा आचरण इतना विवेकहीन और निर्लज्ज हो गया है कि तुम वृक्ष के समान जड़ हो गये हो।] ठीक है, तो मैं तुम्हें अभी दण्‍ड देता हूँ।”

जिस व्यक्ति को धन का बल और उसका अभिमान होता है, जिसे उच्चकुल में जन्म लेने का अभिमान होता है, जिसे अपनी सुन्दरता का गर्व होता है और जिसे अपने पाण्डित्य का गर्व होता है—ये लोग कभी भी भगवान् का भजन नहीं कर सकते। ऐसे लोग ‘तृणादपि सुनीच’ [#1] नहीं होंगे। [कुछ] बड़े-बड़े सौभाग्यवान मानो जैसे महाराज अम्बरीष हो गये, वह दूसरी बात रहे। जनक हो गये, नन्‍दबाबा हो गये। ये लोग विशेष (special) लोग हैं, किन्‍तु अधिकांश रूप में [उपरोक्त चार प्रकार के अभिमान] जिनको रहते हैं, वे कभी भी नम्र नहीं होते। इसलिये भजन भी उनका नहीं होता।

[अतएव रूप-यौवन और धन आदि के मद में मत्त कुबेर के उन पुत्रों की धृष्टता को देखकर नारदजी ने कहा—] “मैं तुमको दण्‍ड देता हूँ। तुम सब धन-वैभव से भ्रष्ट हो करके, उच्चजाति से भ्रष्ट हो करके वृक्ष हो जाओ।” बस [अब तो वे] रोने लगे। तब उनके द्वारा क्षमा-याचना करने पर नारदजी ने कहा—] “अच्छा-अच्छा जाओ, गोकुल में वृक्ष हो करके रहो और द्वापरयुग में कृष्ण तुम्हारा उद्धार करेंगे।”

कृष्ण को अब स्मरण हुआ कि [मेरे प्रिय भक्त] नारदजी ने [इन दोनों को मेरे द्वारा उद्धार का वचन दिया है। इसलिये कृष्ण ने उन दोनों वृक्षों को ओखल के द्वारा गिरा दिया।] उनको उद्धार करने के लिए नहीं, बल्कि नारदजी के वचन को रखने के लिए ही [उन्होंने ऐसा किया—] “सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं।” [#2] अतः अपने भक्त की बात की रक्षा करने के लिए कृष्ण ने कहा— “अच्छा ठीक है।” उन्‍होंने [अपने सखाओं से] कहा— “चलो, इस ओखल को ठेलो।”

जब उन लोगों ने ठेलना आरम्भ किया, तो कृष्ण भी [ओखल के साथ-साथ] उसी प्रकार से हो करके चलने लग गये। खींचते-खींचते दरवाजे को पार कर लिया और पास ही में वे दो पेड़ खड़े थे—यमज वृक्ष। बस कृष्ण [तो इन वृक्षों के बीच से] इधर-से-उधर में पार हो गये। पार होने के बाद में उन वृक्षों के बीच में ओखल अड़ गयी, निकल ही नहीं रही। सखाओं ने भी बहुत यत्न किया किन्तु नहीं निकली। तब कृष्ण ने क्या किया? थोड़ा-सा उधर में जा करके और थोड़ा-सा बल लगा दिया, खींच दिया। वस्तुतः खींचा नहीं। [हुआ यह कि] कृष्ण का सम्बन्ध है उस रस्सी से और रस्सी का सम्बन्ध है ओखल से और उस ओखल से वे दोनों वृक्ष छू गये। [बस, इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से स्पर्श होने पर भी वे दोनों वृक्ष] इधर और उधर [दायें और बायें हो करके] एकदम गिर गये।

कृष्ण के चरणों का स्पर्श उनको नहीं मिला। कृष्ण के अङ्गों का, हाथों का सीधा स्पर्श उनको नहीं मिला। कृष्ण का स्पर्श है— उस रस्सी से और रस्सी का स्पर्श है— लकड़ी की ओखल से और उस लकड़ी से ये दोनों वृक्ष छू गये। कृष्ण के शरीर से विद्युत्-धारा (current) निकली और रस्सी के माध्यम से वह विद्युत्-धारा कहाँ आयी? ओखल में और ओखल से दोनों वृक्षों में। बस उसीसे वे गिर गये। वृक्षों के गिरने से एकदम बहुत प्रचण्ड शब्द हुआ। ज्योंहि वह प्रचण्ड शब्द हुआ, वहाँ पर यशोदा मैया [दौड़कर आयीं और कहने लगीं—] “अरि! कृष्ण कहाँ गया? किधर गया?” वहाँ आ करके देखा कि वहाँ तो ओखल नहीं है, कृष्ण भी नहीं है, सखा भी नहीं हैं। किधर गये?

[वह प्रचण्ड शब्द सुनकर] नन्दबाबा भी दौड़कर वहाँ आ गये। उस समय हजारों-लाखों व्रजवासी यमुनाजी की ओर जा रहे थे। उन्होंने देखा कि न तो कोई आँधी आयी है, न तूफान आया है और न ही वर्षा हुई है, फिर ये दोनों वृक्ष कैसे गिर पड़े? साथ-ही-साथ वे सब लोग भी वहाँ पहुँच गये।

उन्होंने देखा कि दो पेड़ गिरे पड़े हैं और कृष्ण कुछ सहमे हुए तथा डरे-डरे से हैं। सखा लोग ऐसे-ऐसे कर रहे हैं— “यह क्या हो गया? यदि ये वृक्ष सीधे गिरते, तो कृष्ण के ऊपर ही गिरते!” सखा लोग भी ऐसे [सहमे से रह गये।]

वह तो वे दोनों वृक्ष ऐसे गिरे और ऐसे गिरे [दायें और बायें] बगल से, जिससे कि बच्चों को कुछ नहीं हुआ। [वृक्षों के गिरने से बहुत] प्रचण्‍ड शब्द हुआ, सब लोग आये। नन्दबाबा आये। नन्दबाबा को देखते ही कृष्ण की घिग्‍घी फिर बँध गयी और वे बहुत ज़ोर से रोने लगे। बाबा का स्नेह [रोने का कारण है।]

नन्‍दबाबा ने कहा— “अरे! यह क्या हो गया?” यशोदा मैया ने आ करके देखा— “अरे! नन्‍दबाबा तो यहाँ पर पहुँच गये हैं और कृष्ण को गोदी में ले रहे हैं। और कृष्ण बहुत जोर से रो रहा है।” यशोदा मैया ने सोचा— “अब तो मुझे डाँट पड़ेगी। हो सकता है कि दो-चार उत्तम-मध्यम भी लग जायें।” इसलिये वे भी डरी-सहमी-सी खड़ी हैं।

सब लोग वहाँ पर खड़े होकर [विचार करने लगे—] “आज देखो तो [यह क्या हो गया!] बड़ी कठिनाई से प्रौढ़ अवस्था में इन्हें एक पुत्र हुआ और उसको भी बाँध दिया! यदि आज यह पेड़ों के नीचे दब जाता, तो न जाने [कितनी बड़ी अनहोनी हो] जाती!”

इसलिये नन्‍दबाबा कह रहे हैं— “बेटा!” वे कृष्ण के सिर पर हाथ रखने लगे और इधर-उधर [से देखकर जाँचने लगे कि कहीं चोट तो नहीं लगी है।] उन्‍होंने देखा कि वास्तविकता क्या है? पूछें। फिर उन्‍होंने कृष्ण से पूछा— “बेटा, क्या हुआ? किसने मारा? किसने मारा? अरे, तुमको इस ओखल से किसने बाँधा?”

तब कृष्ण ने बड़ी कठिनाई से कहा— “मैया ने।”

[नन्‍दबाबा ने कहा—] “मैया ने बाँध दिया, अच्छा!” उन्‍हें बड़ा रोष हो गया। [वे सोचने लगे—] यह कैसी निष्ठुर है! आज तक तो इसका निष्ठुरतापन देखा नहीं था, किन्तु आज तो बड़ी निष्ठुर होकर इसको बाँध दिया!” अब नन्‍दबाबा ने धीरे-धीरे पीछे जा करके बड़ी कठिनाई से [कृष्ण को बन्धन से खोलने लगे—] बड़ी कठिनाई से। [कठिनाई से क्यों?]

वास्तव में नन्‍दबाबा के [वात्सल्य की] गाँठ की अपेक्षा यशोदाजी के [वात्सल्य की] गाँठ अधिक दृढ़ होती है। उनका स्नेह अधिक है। वस्तुतः ये सब साधारण गाँठ-फाँठ नहीं हैं, ये तो स्नेह की गाँठ है, [स्नेह का] बन्धन है। इसलिये नन्दबाबा ने धीरे-धीरे उसको सुलझा करके खोला। नन्दबाबा ने कहा— “बेटा! बाँधा किसने?”

[कृष्ण ने कहा—] “मैया ने।”

[नन्दबाबा ने कहा—] “और खोला किसने?”

[कृष्ण ने कहा—] “बाबा ने।”

नन्‍दबाबा ने गुड़ और चना को मिलाकर बनाया गया एक लड्डू—गुड़घानी कृष्ण को दे दिया। कृष्ण हाथ में लड्डू ले करके भी, अभी भी थोड़ा-थोड़ा सिसक रहे हैं। लम्बी-लम्बी साँसे, किन्‍तु पहले से अब कम हो गयी हैं, रोना भी कम हो गया है। नन्दबाबा ने [कृष्ण और बलदेव] दोनों को कन्‍धे पर उठाया। सब लोग देख रहे हैं। यशोदा मैया बड़ी डर गयीं। सभी लोग [डर गये थे। नन्दबाबा] कृष्ण और बलदेव को ले करके यमुना में स्नान करने चले गये।

यमुना में स्नान-वस्नान करने के बाद में अब सब करते-करते चार बज गया, सवेरे से लेकर। स्नान करके आते-आते, आते-आते पाँच-छह बज गया। अब व्रजवासियों के खाने का समय हो गया था किन्तु आज तो घर में रसोई नहीं बनी। बनाये कौन? सभी बड़े आज दुःखित हैं। नन्दबाबा अपने दरवाजे में आ करके बैठ गये, इतने में नन्दबाबा के बड़े भैया उपानन्‍दजी की स्त्री, रोहिणी मैया और-और सब लोग आ गये।

बहुत-सी कथा है। मैं बहुत संक्षेप में बतला रहा हूँ। अभी हमको निकलना है। अभी हम लोग परिक्रमा के लिए चलेंगे। इसलिये बहुत संक्षेप में बतला रहा हूँ।

इतने में [कृष्ण के निकट] वे सब महिलाएँ आयीं। उन्‍होंने कहा— “कृष्ण चलो, तुम्हारी मैया रो रही है।”

कृष्ण ने कहा—“वहाँ नहीं जायेंगे।” बहुत चेष्टा [करने पर भी जब कृष्ण नहीं माने तो उनके निकट] बलदेव को भेज दिया। बलदेवजी ने कृष्ण को [मैया के पास] ले जाने के लिए ज्योंहि पकड़ा, त्योंहि कृष्ण ने [क्रोध में] उन्हें ऐसा झटका दिया कि आज बलदेव भी छिटककर बहुत दूर गिर पड़े। अन्‍त में उपानन्‍द की पत्नी आयीं और रोहिणीजी निकट आकर बोलीं— “बेटा! मैया के यहाँ नहीं चलेगा?”

अब तो “ऊँहूँ।”

“ खायेगा क्या? रहेगा कहाँ?”

“तो बाबा के यहाँ रहेंगे।”

“खेलेगा किसके साथ में?”

“दाऊ भैया के साथ में।”

“खायेगा क्या?”

“मिश्री और धारोष्‍ण, गैया का [तुरन्त] दुहा हुआ [हल्का गर्म] दूध। बाबा दूध देंगे मुख में, मुख में ही धारा आ जायेगी और मिश्री को लेकर चूस लूँगा बस।”

“ पेट भर जायेगा?”

“तो हाँ हमारा पेट भर जायेगा।”

[“मैया के पास] जायेगा नहीं?”

“तो नहीं”

“नहीं जायेगा और मैया यदि सीताराम जय सीताराम [हो गयी तो]।” माने क्या? “यदि मर जाये तो?”

बस कृष्ण से अब रहा नहीं गया, [धैर्य का] बाँध टूट गया, बहुत विशाल बाँध था, कृष्ण के [धैर्य का] बाँध था न? किन्तु [महावात्सल्यमूर्ति मैया के स्नेह के सामने] कृष्ण का भी धैर्य छूट गया और “मैया मैया” कह करके [रोहिणी मैया की ओर दोनों] हाथ फैला दिये और रोने लग गये।

कृष्ण रोहिणी मैयाजी के गोद में चले गये। रोहिणीजी ने गोदी में ले लिया। यशोदाजी जहाँ पर रो रही थीं, बस उस घर में गयीं और उनकी गोदी में बैठा दिया। डर के मारे उनके तो आँसू सूख गये थे और हृदय भी सूख गया था। किन्तु अब कृष्ण को गोदी में पा करके, उनके अश्रु भी फव्वारे की भाँति फूट पड़े और वे बड़ी ज़ोर से डकर-डकर करके “बेटा-बेटा” कह करके रोने लग गयीं। कृष्ण के मुख में अपना स्तन दे दिया, स्तन से दूध स्वतः झरने लग गया। गोपियाँ सब रोने लगीं। नन्‍दबाबा ने जब उनका रोना सुना तो नन्‍दबाबा भी रोने लग गये। वहाँ पर जितने लोग थे, सभी लोग रोने लग गये। बन्धन भी उनका पहले से खुल ही गया था और रोने के [शान्त होने के] बाद में फिर रोहिणी मैया ने झट खिचड़ी बनायी और खिचड़ी बना करके या रोटी बनायीं और नन्‍दबाबा आदि सबको बुलाया। नन्‍दबाबा आये, उपानन्‍दजी आये, सब परिवार आया, और उनको थोड़ा-थोड़ा परोसा। कृष्ण और बलदेव को नन्‍दबाबा ने अपने दाहिने और बांये जंघे पर बैठा करके पहले उनको खिलाया और फिर स्वयं थोड़ा-सा उच्छिष्ट खाया। इनके खाने के बाद में उन सब लोगों ने भी खा लिया। अब फिर यशोदाजी के यहाँ लाया गया। तब उन्होंने कृष्ण को गोदी में ले करके अपना थोड़ा-सा खाया। इसके बाद में रात में विश्राम किया।

अब आप लोग विश्राम कर चुके हैं। अभी हम लोग परिक्रमा के लिए चलेंगे। बोलो गिरिराज गोवर्धन की जय! दामोदर-बन्‍धन-लीला की जय! यशोदा मैया की जय! नन्दबाबा की जय! बलदेव भैया की जय! रोहिणी मैया की जय! श्रीवृषभानु बाबा की जय! श्रीश्रीकीर्तिदा मैया की जय! अनङ्ग मञ्‍जरी की जय! श्रीदाम भैया की जय! गौर प्रेमानन्‍दे! गिरिराजधरण की जय!

-------------------------------------------------------------

समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥
-श्रीशिक्षाष्टक (3)

सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृण से भी अपने को दीन-हीन नीच समझकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरों को यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा—निरन्तर श्रीहरिनाम संकीर्तन करता रहे। (GVP)

#2
सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं
व्याप्तिञ्‍च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः।
अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन्
स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (7.8.17)

इतने ही में भगवान् श्रीहरि अपने सेवक प्रह्लाद के वचनों को तथा अपनी सर्वव्यापकता को सत्य करने के लिए दैत्य-घातक अति विकराल श्रीनृसिंहरूप धारण करके सभा के भीतर उसी खम्भे में से प्रकट हुए। वह रूप न तो पूर्णरूप से मनुष्य का था और न ही सिंह का। (GVP)

We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.