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Sri Damodarastakam (8): Verse 4-5, What Benediction to Ask For

06:44
#1669
Vrndavana (?)
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Damodarastakam Verse 4 continued
  • What benediction to ask from the Lord
  • Starts explaining verse 5

Transcript

श्रीदामोदराष्टकम् (8): श्लोक 4–5 — कौनसा वरदान माँगना चाहिये?

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 29 अक्तूबर 1994 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराजः

इदन्ते मुखाम्भोजमव्यक्त-नीलै–
र्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध–रक्तैश्च गोप्या।
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥
-दामोदराष्टकम् (5)

[हे देव! अत्यन्त श्यामलवर्ण और कुछ–कुछ लालिमा लिए हुए घुँघराले बालों से घिरा हुआ तथा माँ यशोदा के द्वारा बारम्बार चुम्बित आपका मुखकमल और पके हुए बिम्बफल की भाँति अरुण अधर–पल्लव मेरे हृदय में सर्वदा विराजमान रहें। मुझे लाखों प्रकार के दूसरे लाभों की आवश्यकता नहीं है।] GVP

कल उन्होंने (श्रीसत्यव्रत मुनि ने) प्रार्थना की कि मैं सांसारिक भोग नहीं चाहता, मोक्ष नहीं चाहता। यहाँ तक कि मोक्ष की अवधि वैकुण्ठ तक की प्राप्ति भी नहीं चाहता। इसके अतिरिक्त, अन्य जितने भी प्रकार के वर हैं, मैं उन सबको भी नहीं चाहता।

और वे वर क्या हैं? नाम-संकीर्तन, नवधा-भक्ति और इनका फल, जैसे वैकुण्ठ की प्राप्ति अथवा अयोध्या में रामचन्द्रजी की सेवा, द्वारकाधीश की सेवा इत्यादि—ये सब अन्य वरों में ही आ जाते हैं। मैं तो केवल यही वर चाहता हूँ कि मेरे हृदय में आपके बालगोपाल रूप की सदा स्फूर्ति हो। इसके अतिरिक्त मैं कुछ भी नहीं चाहता।

यहाँ पर बता रहे हैं। वे मन के लिए कह रहे हैं कि हमारे मन में ही [बालगोपाल रूप की] स्फूर्ति हो। मन बहुत प्रकार के होते हैं। अभी हमारा मन विषयों में फँसा हुआ है। स्थूल वस्तुओं के दर्शन [और सांसारिक विषयों के सम्पर्क से] हमारा जो वर्तमान मन बना हुआ है, उससे भगवत्-स्मरण नहीं हो सकता।

किन्तु साधुसङ्ग में रहकर, भगवान् के नाम का कीर्तन करते-करते, हरिकथा सुनते-सुनते और विषयों का त्याग करते-करते मन शुद्ध हो सकता है। [जब मन शुद्ध होगा,] तब [वास्तविक] साधुसङ्ग होगा [और उसके प्रभाव से] कभी-कभी अपने स्वरूप और भगवत्-स्वरूप की झलक भी प्राप्त हो सकती है।

तो भी अभी बद्धदशा है और जब यह स्थूल-शरीर तथा मन सहित सूक्ष्म-शरीर सम्पूर्ण रूप से दूर हो जाते हैं, उस समय आत्मा का मन प्रकाशित होता है। उस अवस्था में आत्मा का अपना शरीर, आत्मा का अपना मन, आत्मा की अपनी बुद्धि, आत्मा का अपना भाव—अर्थात् आत्मा का अपना सब कुछ रहता है। किन्तु यहाँ पर कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि [इस वर्तमान] मन के द्वारा ही हम भगवान् का दर्शन कर लेंगे।

गोपकुमार का प्रसङ्ग लेकर इस बात को समझाया गया है। आँखों से दर्शन नहीं होता, हम पैरों से नहीं चलते और न ही दिमाग से सोचते हैं। इन सबके भीतर मन [की भूमिका होती] है। यदि मन नियन्‍त्रण (control) में है, तो मन के साथ रहने से ही पैर चलते हैं। मन इन्द्रियों का राजा है। मन में कुछ घटने-बढ़ने की शक्ति होती है, इसलिये इसे चेतनाभास कहते हैं।

इसीलिये योगी लोग मन में ही भगवान् का दर्शन करने की चेष्टा करते हैं। किन्‍तु गोपकुमारजी कहते हैं— “मैं तो अपने नेत्रों से ही आपके इस रूप का दर्शन करना चाहता हूँ।”

पिप्पलायन आदि ऋषियों के साथ उनका बहुत वार्तालाप हुआ। ऋषियों ने उन्हें बहुत समझाया कि मन के द्वारा ही भगवान् का दर्शन करना चाहिये। किन्तु गोपकुमार ने कहा— “हम तो इन्हीं नेत्रों से भगवान् का दर्शन करेंगे। जब प्रह्लादजी ने इन्हीं नेत्रों से भगवान् को देखा और अन्य लोगों ने भी देखा, तो हम भी इन्हीं नेत्रों से दर्शन करेंगे।”

ऋषियों ने उन्हें कई प्रकार से समझाया कि आप मन के द्वारा ही भगवान् का दर्शन कीजिये। किन्तु गोपकुमार अन्त तक सन्तुष्ट नहीं हो सके। [इसके समर्थन में उन्होंने] बहुत-से तर्क और कारण दिये हैं। हम समयानुसार आगे उनका वर्णन करेंगे। अभी हम लोगों को आगे चलना है। इसलिये अगले श्लोक में इस बात को थोड़ा और [स्पष्ट करके] कह रहे हैं—

इदन्ते मुखाम्भोजमव्यक्त-नीलै–
र्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध–रक्तैश्च गोप्या।
मुहुश्चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥
-दामोदराष्टकम् (5)

[हे देव! अत्यन्त श्यामलवर्ण और कुछ–कुछ लालिमा लिए हुए घुँघराले बालों से घिरा हुआ तथा माँ यशोदा के द्वारा बारम्बार चुम्बित आपका मुखकमल और पके हुए बिम्बफल की भाँति अरुण अधर–पल्लव मेरे हृदय में सर्वदा विराजमान रहें। मुझे लाखों प्रकार के दूसरे लाभों की आवश्यकता नहीं है।] GVP

हमें अन्य लाखों-लाखों वरों की भी आवश्यकता नहीं है। आपका जो मुखकमल सब समय यशोदाजी के द्वारा वात्सल्य-भाव से और गोपियों के द्वारा चुम्बित होता रहता है, वही बालगोपाल रूप हमारे हृदय में सदा आविर्भूत हो। हमें लक्ष-लक्ष (लाखों-लाखों) वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।

श्रील सनातन गोस्वामीजी ने टीका में बताया है कि यहाँ ‘गोप्या’ अर्थात् ‘गोपी’ शब्द से यशोदाजी को भी ग्रहण किया जा सकता है और ‘गोपी’ शब्द से श्रीमती राधिका आदि मधुररस की गोपियों को भी ग्रहण किया जा सकता है। अर्थात् यहाँ वात्सल्यरस और मधुररस—[दोनों का संकेत है।]

आपका यह सुन्दर मुखारविन्द अलकाओं से आवृत्त होकर अत्यन्त सुशोभित हो रहा है। यही बालगोपाल रूप हमारे हृदय में सदा के लिए आविर्भूत हो। लक्ष-लक्ष और जितने भी वर हो सकते हैं, उनमें से मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। आप सब प्रकार से वर देने में श्रेष्ठ हैं, किन्तु हमें किसी अन्य वर की आवश्यकता नहीं है।

आज यहीं तक रहे।

वाञ्छा–कल्पतरुभ्यश्च कृपा–सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां  पावनेभ्यो  वैष्णवेभ्यो  नमो  नमः॥

[6:07-6:44 तक कीर्तन…]

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