Srimad Bhagavatam Series- #18- Teachings from Brahma Vimohana & Cira-harana Pastime
31:20This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Krsna came to Vrndavana from Gokula.
- First, they all came to Chattikara. They saw a beautiful forest, Yamuna, birds, and animals.
- Pastime of deliverance of Aghasura. King Kamsa sent Aghaksura to kill Krsna and his friends. Krsna killed Aghasura, seeing this pastime Lord Brahma got astonished and had the desire to see more such wonderful pastimes.
- The stealing of the boys and calves by Brahma.
- Fulfillment of the wishes of the gopis, mothers and cows of Vraja through the pastime of Brahma’s bewilderment.
- Baladeva Prabhu realized there is something beyond maya sakti during the one year when Brahma stole the calves and gopas.
- Brief about past life of sadhana-siddha gopis and how they got siddhi (perfection in bhajana).
- Explanation of Parkiya-rasa.
- Brief about Cira-harana pastime (Krsna Steals the Garments of the Gopis)
- Gopis worshiped Katyayani devi and got darsana of Krsna.
- Krsna is everywhere so why be ashamed of Him? Krsna stole the gopis' clothes, there's nothing wrong with Krsna's actions.
- Krsna wrapped himself around Draupadi all over in the form of a sari. One can question where is Draupadi's lajja (shame) now? But Krsna actually protected Draupadi's shame in the assembly.
- Sadhana-siddha gopis invited nitya-siddha gopis on the last day of the Katyayini vrata, because of this Krsna gave them darsana and fulfilled their desire.
- Gopis are the topmost devotees, we can achieve our highest goal only under the guidance of the gopis.
Transcript
श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 18 : ब्रह्मविमोहन लीला तथा चीरहरण लीला से प्राप्त शिक्षाएँ
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 3 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज प्रातःकालीन हरिकथा में [बताया गया कि] कृष्ण अपने परिजनों के साथ गोकुल से वृन्दावन आये। वृन्दावन के अन्तर्गत छटीकरा में उन सबने गाड़ियों का चक्रव्यूह बनाकर अपनी-अपनी पर्णकुटियाँ बना लीं। उस समय वहाँ के [मनोहर] दृश्य को देखकर कृष्ण और बलदेवजी बड़े मुग्ध हो गये। पास ही यमुना नदी बह रही थी। निकट ही गिरिराज गोवर्धन [विराजमान थे।] सुन्दर पशु-पक्षी, कोयल, मयूर और मृग स्वच्छन्द गति से विचरण कर रहे थे, तथा पक्षी कलरव कर रहे थे। इस वृन्दावन में सदा वसन्त ऋतु ही छायी रहती है।
कृष्ण ने सबसे पहले छोटे-छोटे बछड़ों और बछड़ियों को चराना आरम्भ किया। वे [ग्वाल]-बालकों को साथ लेकर वन-वन में विचरण करते, उनके साथ [विविध] खेल इत्यादि करते। आज सवेरे [हरिकथा में] यही सब बतलाया गया।
कंस का अनुचर और सखा अघासुर विराट अजगर का रूप धारणकर उन सबको मारने के उद्देश्य से वहाँ आया। उसने विराट रूप धारण किया! [उसे देखकर] ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई [विशाल] पर्वत हो, उसमे कन्दराएँ हैं, और क्या-क्या चीजें हैं। उसके मुख से बड़ी तीव्र दुर्गन्ध आ रही थी, क्योंकि उसने अनेक सड़े-गले पशुओं को निगल रखा था और विष निकल रहा था।
कृष्ण के मना करने पर भी ग्वालबाल, बछड़ों के सहित, उत्कण्ठावश [उसके मुख के] भीतर प्रवेश कर गये। [अघासुर ने] तब तक अपना मुख बन्द नहीं किया, जब तक कि कृष्ण [स्वयं वहाँ] नहीं आ गये। कृष्ण ने [पहले तो] सोचा— “अब क्या किया जाये? ये सब तो इसके मुख [के भीतर] घुस गये हैं।” फिर कुछ विचार करके वे भी उसके मुख के भीतर चले गये।
योगीजन [कठोर] तपस्या करते हैं और ध्यान में जिस भगवान् को अपने हृदय में धारण करने की चेष्टा करते हैं, और भगवान् नहीं आते; [किन्तु वही भगवान्] आज स्वयं अपने समस्त परिकरों सहित अघासुर के मुख के भीतर प्रवेश कर गये।
[तब] अघासुर ने अपना मुख बन्द कर लिया। [उसी समय] कृष्ण धधकते हुए लोहे के गोले के समान होकर उसके गले में अटक गये। [परिणामस्वरूप उसके शरीर के सभी द्वारों के रुक जाने से श्वासवायु परिपूर्ण होकर सारे शरीर में भर गयी और] उसके प्राण [ब्रह्मरन्ध्र को भेद करके बाहर] निकल गये। उसकी [देह से निकली दिव्य] ज्योति आकाश में तब तक घूमती रही, जब तक कि कृष्ण उसके मुख से [बाहर] नहीं निकल आये। ज्योंहि कृष्ण बाहर निकले, त्योंहि वह ज्योति उनके चरणकमलों में समा गयी।
इन्द्र, ब्रह्मा इत्यादि सभी देवतागण [अपने-अपने] विमानों पर बैठकर यह दृश्य देख रहे थे। ब्रह्माजी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। [उन्होंने सोचा—] “अहो! बड़े-बड़े ज्ञानी पुरुषों को भी जो ब्रह्मगति प्राप्त नहीं होती, वही गति इस अघासुर को प्राप्त हो गयी। हमारे प्रभु तो बड़ी विचित्र लीलाएँ कर रहे हैं। इनकी दो-एक और विचित्र लीलाओं का भी मैं दर्शन करूँ।”
यदि [लीला-दर्शन कराने का कार्य ब्रह्माजी श्रीकृष्ण पर ही] छोड़ देते, तो कोई [समस्या की] बात नहीं थी; किन्तु उन्होंने सोचा कि इनकी और लीलाएँ देखने के लिए मुझे [स्वयं] कुछ प्रयास करना चाहिये। इसलिये अपना प्रयास किया। तब ब्रह्माजी ने सोचा— “यदि इन बछड़ों और ग्वालबालों को कहीं छिपा दिया जाये, तो [देखूँ कि] प्रभु क्या करते हैं?” [जैसाकि कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्माजी को कृष्ण के भगवान् होने पर शंका थी अथवा वे उनकी परीक्षा करना चाहते थे तो यह] न तो किसी प्रकार की शंका की बात थी और न ही [इसमें भगवान्] की परीक्षा की बात थी।
जिस प्रकार भगवान् योगमाया के प्रभाव से नारद इत्यादि अपने परिकरों [को निमित्त बनाकर] विभिन्न प्रकार की लीलाओं को प्रकट करते हैं, [उसी प्रकार] आज कृष्ण की कुछ इसी प्रकार की लीला-क्रीड़ा करने की इच्छा हुई। उन्होंने योगमाया से ब्रह्माजी को वहाँ बुला लिया और [उनके मन में यह] प्रेरणा दी कि इनके बछड़ों और ग्वालबालों को हरण करो। यह ब्रह्माजी की योजना (plan) नहीं थी। यह किसकी योजना थी?
भक्त: कृष्ण की।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: किन्तु ब्रह्माजी ने सोचा कि यह मेरी योजना है। यही उनकी गलती हुई। उनकी कृष्ण की लीलाओं को अपने प्रयास से देखने की इच्छा हुई। [उन्होंने सोचा—] “देखें, [बछड़ो और ग्वालबालों का हरण करने पर] वे क्या करते हैं?
कृष्ण विचार कर रहे हैं— “हमारे गाँव की गोपियाँ मुझे अपने पुत्रों से भी अधिक प्रेम करती हैं। वे सोचती हैं कि कृष्ण हमारा पुत्र बने और हम उसे अपने स्तन का दूध पिलाये और उसका लालन-पालन करें।” तो कृष्ण कल्पतरु हैं— “वाञ्छा कल्पतरु” तो क्या उनकी इच्छाओं को पूर्ण नहीं करेंगे? [कृष्ण ने मानो कहा—] “अच्छा, ठीक है। ठहर जाओ। थोड़ा-सा धैर्य रखो। [मैं तुम सबकी इच्छा पूर्ण करूँगा।”] और [व्रज की] जितनी गायें थीं, वे अपने बछड़ों से भी अधिक कृष्ण को प्रेम करती थीं। [मानो कृष्ण उनसे भी कह रहे हों—] “अच्छा, अच्छा ठीक है। तुम लोग भी ठहर जाओ। मैं तुम सब लोगों की इच्छा पूर्ण करूँगा।”
जितनी गोपकुमारियाँ थीं, वे अभी तो छोटी-[छोटी बालिकाएँ ही] थीं। जैसे [आज भी हम] देखते हैं कि 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13 और 14 वर्ष की लड़कियाँ यहाँ से झुण्ड बनाकर रङ्गेश्वर मन्दिर में कीर्तन करती हुई जाती हैं। यहाँ तक कि पाँच-छह वर्ष की [छोटी-छोटी] बच्चियाँ भी हाथों में कलश लेकर उसमें पानी भरती हैं और शंकरजी पर जल चढ़ाने जाती हैं। विशेषकर कार्तिक महीने में, भोर के समय जब थोड़ा-थोड़ा जाड़ा पड़ रहा होता है, उस समय किशोरियों की तो बात क्या, वे छोटी-छोटी बच्चियाँ भी स्नान करके [शंकरजी पर जल चढ़ाने] जाती हैं।
उस समय [जितनी गोपकुमारियाँ थीं, वे] कृष्ण को देखकर मन-ही-मन लुब्ध हो रही थीं। वे सभी कह रही थीं— “यदि पति मिले, तो कृष्ण जैसा ही मिले।”
और भी व्रजवासी लोगों की भिन्न-भिन्न प्रकार की कुछ इच्छाएँ थीं। इसलिये [कृष्ण ने] ब्रह्माजी को एक बहाना बनाया और ब्रह्माजी के निमित्त [व्रजवासियों की] इन सब वाञ्छाओं को पूर्ण करने की लालसा से ब्रह्माजी को आकर्षण करके आकाश-मार्ग में ले आये। ब्रह्माजी ने सोचा कि मैं भी देखूँ। भक्तों के लिए बहुत से ऐसे काम होते हैं या हम लोगों में भी, जो प्रभु कराना चाहते हैं और वह करना पड़ता है। तो ब्रह्माजी आये और उनकी लालसा हो गयी कि इनकी और लीलाओं को देखूँ। [इसलिये उन्होंने] बछड़ों को चुराने का प्रयास किया। किन्तु [वास्तव में यह] काम योगमाया का था। योगमाया ने ब्रह्मा के द्वारा बछड़ों और ग्वालबालों को हर लिया और कृष्ण उनको [न] देखकर [सोचने लगे—] “कहाँ गये?”
पहले जब बछड़ों का हरण किया, तो ग्वालबाल बोले— “अरे! ये बछड़े किधर चले गये?” कृष्ण ने कहा— “तुम यहीं ठहरो, मैं अभी उन्हें ले आता हूँ। एक बार वंशी बजाऊँगा, तो सब आ जायेंगे।”
[ग्वालबालों ने] उनकी बात पर विश्वास किया और वे [निश्चिन्त होकर] खाते रहे। कृष्ण [बछड़ों को ढूँढ़ते हुए] आगे निकल आये। उनको ढूँढ़ते रहे, [किन्तु] कहीं नहीं पाया। फिर उन्होंने सोचा कि [कहीं बछड़े लौटकर] वहीं तो नहीं आ गये। फिर लौटकर उस स्थान पर आये, तो देखा कि अब ग्वालबाल भी वहाँ नहीं हैं। [तब उन्होंने सोचा—] “अब ये ग्वालबाल कहाँ चले गये?” [ब्रह्माजी ने] बछड़ों [के साथ-साथ ग्वालबालों] को भी चोरी कर लिया।
उस समय कृष्ण के हाथों में दधि-अन्न का ग्रास था। हाथों में टेटी का अचार, मिर्च की पकौड़ी आदि वस्तुएँ ले रखी थीं, जैसे स्वाभाविक रूप में रखते हैं। उनका मुख सूखा हुआ है, और वे ढूँढ रहे हैं— “कहाँ गये? कहाँ गये?” उस समय ब्रह्माजी ने देखा [और सोचा]— “अच्छा, तो ठीक है। मैं थोड़ा घूम आता हूँ।” एक निमिष के लिए वे अपने लोक गये और वहाँ से आकर देखा कि कृष्ण [तो ग्वालबालों और बछड़ों के साथ पहले की भाँति] खेल कर रहे हैं। [फिर उन्होंने जहाँ ग्वालबाल और बछड़े छिपाये थे, वहाँ] देखा कि वहाँ हैं या नहीं? वहाँ पर भी हैं और यहाँ भी देख रहे है। [यह देखकर वे अत्यन्त विस्मित हो गये और सोचने लगे कि] इनमें से वास्तविक बच्चे कौनसे हैं? जिनको हमने चुराया था, वे कौन हैं? अब वे [कुछ भी] समझ न सके। बहुत [देर तक] वहाँ पर खड़े रहे, समाधि लगायी, ध्यान लगाया, किन्तु कोई निर्णय नहीं कर सके। [जो ग्वालबाल और बछड़े] सुमेरु पर्वत की कन्दरा में मूर्च्छित होकर पड़े हैं, [वे असली हैं?] अथवा जो ग्वालबाल कृष्ण के साथ [खेल रहे हैं,] और बछड़े चर रहे हैं, [वे असली हैं?] इन दोनों में से असली कौन हैं और नकली कौन हैं? ये (सुमेरु पर्वत की गुफावाले ग्वालबाल और बछड़े) नकली हुए, तो कैसे हुए? उन्होंने बहुत [विचार किया], समाधि में भी गये, व्रत इत्यादि किये, किन्तु उनको पता नहीं चला। और उधर में…
हमारे श्रीमान् शुभानन्दजी ने [यह प्रसङ्ग] बताया। जब एक वर्ष होने वाला था, तो बलदेवजी भी उनकी बातों को जान गये। [उन्होंने देखा कि] कि जिन गायों के एक वर्ष से अधिक [आयु] वाले पुराने बछड़े थे, उनकी ममता नये बछड़ों की अपेक्षा उन्हीं [पुराने बछड़ों] पर अधिक थी। [स्वाभाविक रूप से तो गायों की] ममता नये बछड़ों पर अधिक होनी चाहिये, वह न हो करके पुराने बछड़ों पर अधिक ममता थी। [और व्रज की वात्सल्यवती गोपियों की अब अपने पुत्रों के प्रति कृष्ण के ही समान ममता थी।]
[हरिकथा में अचानक कटौती…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [बलदेवजी ने] विचार करके देखा— “यह तो देवताओं की माया नहीं है और न ही यह माया की माया है। यह ब्रह्माजी की भी माया नहीं हो सकती। [यहाँ तक कि] विष्णु आदि किसी अन्य की भी यह माया नहीं हो सकती।” उन्होंने बहुत विचार किया तो देखा— “अरे! ये सभी बछड़े तो स्वयं कृष्ण हैं। ये सब तो कृष्ण ही बने हुए हैं।”
तब उन्होंने मुस्कराकर कृष्ण से कहा— “भैया! क्या एक ही मैया का दूध पीने से तुम्हारा पेट नहीं भरा? इतने गौओं को अपनी माँ बना लिया और इतनी गोपियों को भी मैया बना लिया, और सबका दूध पान कर रहे हो! यह तो बड़ी विचित्र बात है। ऐसा क्यों किया?”
और साथ ही [हमारे श्रीमान् शुभानन्दजी ने] आपको गर्गाचार्यजी का प्रसङ्ग भी सुनाया। उसी समय गर्गाचार्यजी ने आकर घोषणा कर दी— “इस वर्ष बहुत ही शुभ लग्न है। जो [इस वर्ष] अपनी कन्याओं का विवाह कर देगा [अथवा] वाग्दान कर देगा, जैसे भी कर देगा, उनका मङ्गल होगा। [उन कन्याओं का अपने] पति से कभी वियोग नहीं होगा, वे सदा परम सुन्दरी बनी रहेंगी तथा उन्हें सब प्रकार की रिद्धि-सिद्धि [की प्राप्ति] होगी।
बस जितने ग्वालबाल थे, उन्हीं के साथ [उन गोपकुमारियों का] विवाह कर दिया गया। किन्तु कृष्ण ही सभी ग्वालबाल बने हुए थे। [इस प्रकार] प्रकारान्तर रूप में सब गोपियों का विवाह कृष्ण के साथ ही सम्पन्न हुआ, किन्तु कोई भी यह नहीं समझ सका। गोपियाँ भी यही समझती रहीं कि उनका विवाह ग्वालबालों के साथ हुआ है; किन्तु वह विवाह कृष्ण के साथ ही हुआ था। यही परकीया का रहस्य है। उनका किसी अन्य से विवाह नहीं हुआ, कृष्ण से ही हुआ है, किन्तु घरवाले समझ रहे हैं कि उनका विवाह ग्वालबाल से हुआ।
योगमाया ने अपने प्रभाव से ये सब काम करा दिये। उनका अपने पतियों के साथ कभी मिलन भी नहीं हुआ। योगमाया ने नहीं करने दिया, [बल्कि] उनका मिलन कृष्ण के साथ कराया। इन समस्त लीलाओं को पूर्ण करने के लिए कृष्ण ने ब्रह्माजी [को निमित्त बनाया और उनके] माध्यम से इन सब लीलाओं को किया। इस प्रकार उन्होंने एक ही साथ कितनी लीलाओं का विस्तार किया! इस प्रकार अन्य-अन्य लीलाओं के सम्बन्ध में भी ऐसा ही समझना चाहिये।
अब समय अधिक हो गया है। हरिकथा में अभी केवल तेरह-चौदह अध्याय ही हुए हैं। दशम स्कन्ध के लगभग नब्बे अध्याय अभी शेष हैं, और [उसके बाद] पूरा एकादश तथा द्वादश स्कन्ध भी है। इसलिये मैं अपना वक्तव्य संक्षेप में ही समाप्त करता हूँ। अब कथा सुनिये। ये संक्षेप में ही सब कथाओं को और उनका सार बतलायेंगे। हम कभी-कभी यदा-कदा कुछ बतलायेंगे।
गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
[हरिकथा में अचानक कटौती…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …उनके चित्त को मुग्ध कर रहे हैं। उधर किशोरीजी भी तो कुछ कर रही होंगी? एक दिन वे नन्दगाँव गयीं और किसी गोपी के घर चली गयीं। तब वह गोपी उनसे कुछ पूछ रही हैं— “किशोरी! तेरा नाम क्या है? तू कौन है?” [अब इस प्रसङ्ग को] कीर्तन में सुनिये। शीघ्र कीजिये।
[14:09-15:09 तक कीर्तन…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गोपियों का यह प्रेम पूर्वराग कहलाता है। अभी कृष्ण से गोपियों का साक्षात् मिलन नहीं हुआ है। जब पूर्वराग में ही यह स्थिति है, तो मिलन होने पर उनकी क्या स्थिति होगी!
कैसा सुन्दर वर्णन किया है! समय रहने पर हम लोग इसमें (वेणुगीत) से दो-एक श्लोकों की और भी अच्छी तरह व्याख्या करेंगे, किन्तु अभी बहुत-सी लीलाएँ शेष हैं। इसलिये अभी एक छोटा-सा कीर्तन होगा और कीर्तन के बाद हम लोग फिर अपने प्रसङ्ग पर लौटेंगे।
आप लोग इस समय जाने के लिए चञ्चल हैं, तो भी मैं केवल दो मिनट लूँगा।
ये गोपियाँ, ये गोपकुमारियाँ कौन थीं? ये साधारण गोपियाँ [अथवा] केवल बालिकाएँ ही नहीं हैं। कृष्ण उनसे ठिठोली कर रहे हैं और उन्हें निर्वस्त्र होने के लिए कहा। उनके वस्त्र लेकर वे [वृक्ष पर] चढ़ गये और वे [जल में] नग्न खड़ी रहीं। कृष्ण ने कहा— “पानी से निकल आओ।” वे निकल रही हैं, तो अपने अङ्गों को छिपाकर टेढ़ी होकर निकल रही हैं। कृष्ण ने कहा— “ऐसे नहीं। सीधी खड़ी होकर हमें प्रणाम करो।”
इन सब लीलाओं [को सुनकर] कामभरी दृष्टिवाले लोगों के हृदय में कुछ काम का भाव आता है। वे नानाप्रकार से कृष्ण-लीलाओं में अनुचित भाव और अन्याय भाव देखते हैं। किन्तु यह [दोष] कृष्ण और गोपियों में नहीं है; देखनेवाले के हृदय में ही वह काम है।
इसे इस प्रकार समझ सकते हैं। दण्डकारण्य के साठ हजार ऋषि लोग तथा श्रुतियाँ—वेद के मन्त्र, जो ब्रह्मा के मुख से निकलते हैं, वे [वास्तव में] कृष्ण की ही वाणियाँ हैं— उन्होंने मूर्तिमान रूप धारण करके [तपस्या की।] उन्होंने एक-दो वर्ष नहीं, केवल एक-दो हजार वर्ष नहीं, एक-दो लाख वर्ष भी नहीं, बल्कि न जाने कितने ब्रह्मा पलट गये। एक-दो ब्रह्मा नहीं, [अनेक] ब्रह्मा पलट गये, और उतने समय तक वे [निरन्तर] तपस्या करते रहे। उसके फलस्वरूप उन्हें वह वस्तु-सिद्धि प्राप्त हुई। [पहले] स्वरूपसिद्धि हुई, स्वरूपसिद्धि के बाद तब वे गोपी-कुल में छोटी-छोटी बालिकाओं के रूप में आयी हैं। किन्तु अभी कृष्ण ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि अभी उनमें कुछ भाव-दोष है। उस भाव-दोष को कैसे शुद्ध करेंगे? अपने विरह से और नित्यसिद्धा गोपियों के सङ्ग से। इसीलिये कात्यायनी-पूजा की व्यवस्था की गयी। ये कात्यायनी और कोई नहीं, बल्कि राधाजी का ही प्रकाश योगमाया-स्वरूपिणी हैं।
दूसरी बात एक देखो। [यदि] मान भी लिया जाये कि उन्होंने कात्यायनी अर्थात् दुर्गादेवी की पूजा की थी, तो जिस देवी की पूजा की जाती है, वही देवी तो प्रसन्न होकर वर देने आयेंगी। तो एक महीने के बाद जब पूजा समाप्त हुई, तो कात्यायनी देवी को [स्वयं] आकर उन्हें वर देना चाहिये था, [किन्तु] कौन आया? आया कौन? उनको वरदान किसने दिया? कृष्ण ने। इसलिये यह समझो कि यह कात्यायनी भी कृष्ण हैं। इसलिये कृष्ण प्रकट हुए। नहीं तो, कात्यायनी देवी अष्टभुजा के रूप में उनके सामने प्रकट हो जातीं। ऐसा मत समझना कि यह गोपियों की आराधना थी। बल्कि यदि [आराधना करनी] होगी, तो वह योगमाया [स्वयं गोपियों की आराधना] कर लेंगी। कृष्ण स्वयं गोपियों की आराधना करते हैं। [उन्होंने स्वयं कहा है—] “न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां” [#1]
जब [स्वयं] कृष्ण ही उनकी आराधना करते हैं, तब फिर और [किसी की] तो बात ही क्या है? इसलिये [ये गोपियाँ] साधारण नहीं हैं। [असंख्य वर्षों] तक तपस्या करके [वे इस स्थिति को प्राप्त हुई हैं,] और अब स्वयं कृष्ण उनकी इच्छा को पूर्ण करने जा रहे हैं।
बतलाओ तो, ऐसा कौनसा व्यक्ति है, ऐसी कौनसी स्त्री है, जो कृष्ण से अपने अङ्गों को नहीं दिखला सकती? है कोई? उनके भीतर भी, बाहर भी—सर्वत्र ही तो कृष्ण हैं। और यह तो जड़ शरीर है, वे तो आत्मा के भी साक्षी हैं। क्या उनसे कोई वस्तु छिपी रह सकती है? हम जिसको नहीं देखते हैं, उसको भी कृष्ण देखते हैं।
हम देखते हैं कि साधारण एक माता-पिता अपनी छोटी-सी बच्ची को स्नान कराते हैं। मैया की अनुपस्थिति में पिता भी अपनी बेटी को [स्नान कराता है।] यदि बेटी ने मल-मूत्र कर दिया, तो पिता क्या करेगा? क्या वह उसके अङ्गों को धोयेगा नहीं? क्या उसके भीतर कोई काम का विकार आ जाता है? नहीं तो।
तो [फिर] कृष्ण तो सबके अन्तर्यामी हैं, घट-घटवासी हैं। [वे सबके भीतर और बाहर विराजमान हैं। इस विषय को] आप एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं।
द्रौपदीजी का चीर दुःशासन खींच रहा है। दस हजार हाथियों का बल लेकर [वह उनके वस्त्र खींच रहा है।] कर्ण देख रहा है। दुर्योधन कह रहा है— “शाबाश! शाबाश! इसे निर्वस्त्र करके मेरी जाँघ पर बैठा दो। यह हमें कहती थी कि अन्धे का पुत्र अन्धा होता है। ठीक है, इसे शीघ्र लाओ। देखते हैं कि अन्धे का पुत्र अन्धा होता है [या नहीं।”]
दुःशासन उन्हें रजस्वला स्थिति में खींच करके ले आया। पतियों के सामने, गुरुजनों के सामने उन्हें लज्जित करना चाहता था। वस्त्र अब केवल थोड़ा-सा ही है। [दुःशासन ने वस्त्र] खींच रखा है। बस एक बार खींच देने से ही सब खुल जायेगा। [द्रौपदी ने] देखा कि मेरे पति लोग मेरी रक्षा नहीं कर सके। हमारे पितामह और गुरुजन भी मेरी रक्षा नहीं कर सके। तब उन्होंने हाथ जोड़कर प्रभु से प्रार्थना की— “हे गोविन्द! राखो शरण, अब तो जीवन हारी। अब मेरी लज्जा तुम्हारे हाथ में है।” वे मन-ही-मन कह रही थीं।
उधर द्वारका में कृष्ण [यह सब] सुनकर छटपटा रहे हैं, [किन्तु तत्काल] जा नहीं रहे हैं। रानियों ने पूछा— “आप इतने छटपटा क्यों रहे हैं?"
[कृष्ण ने कहा—] “हमारे भक्त पर [विपत्ति आ] पड़ी है। मैं जाना चाहता हूँ, [किन्तु अभी] जा नहीं पा रहा हूँ।”
[रानियों ने पूछा—] “क्यों?”
[कृष्ण ने कहा—] “अभी उसे अपने ऊपर थोड़ा-सा विश्वास है। वह अपने आञ्चल को दाँतों के तले दबाये हुए है और हाथ से भी पकड़े हुए हमसे प्रार्थना कर रही है। अभी उसे अपने दाँतों [और हाथों] पर भरोसा है। मैं उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब वह हाथों से भी छोड़ दे, अपने समस्त प्रयासों को छोड़ दे, और ‘त्राहि! त्राहि!’ कहकर सम्पूर्ण रूप से हमारे चरणों में अनुगत हो जाये। उस समय तुरन्त मैं उसकी रक्षा करूँगा।”
द्रौपदी ने देखा— अब दाँतों से काम नहीं चलेगा, हाथों से काम नहीं चलेगा। उन्होंने हाथ ऊपर उठा दिये, आँखें बन्द कर लीं, दाँतों के तले से [भी आञ्चल] छोड़ दिया [और पुकार उठीं—] “हा नाथ! हा नाथ!” उन्होंने ऐसा किया।
कृष्ण तो कहीं दूर नहीं थे। वे तो उनके भीतर और बाहर सर्वत्र थे। अब जो वह कपड़ा निकलने लगा—कौनसा कपड़ा है? कृष्ण ही वस्त्र बन गये। जब वे वस्त्र बन गये, तो उनके अङ्गों में लिपट गये। तो कृष्ण से उनकी लज्जा कहाँ रही? वस्त्र तो कृष्ण हैं न? तो वहाँ तो कहते हैं कि द्रौपदी की लज्जा रखी। हम तो देखते हैं कि तुम्हारे जैसे कामुक लोगों की दृष्टि में द्रौपदी की लज्जा कहाँ रही? वह तो कृष्ण कपड़े बनकर लिपट रहे हैं। क्या वे देख नहीं रहे? क्या उनको काम भाव नहीं होगा? इसलिये नहीं, ऐसा मत समझो।
कृष्ण जगत्-पिता हैं। वे सबके प्रभु हैं। ये गोपियाँ साधारण नहीं हैं। बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि कोटि-कोटि ब्रह्मा की आयु के [समान दीर्घकाल] तपस्या करके तब उस स्थिति में आये हैं। गोपियाँ साधारण नहीं हैं। इसलिये गोपियों के बहाने [कृष्ण] हम लोगों को दिखला रहे हैं कि यदि अपना सर्वस्व, काम इत्यादि जो कुछ भी है, कृष्ण के चरणों में अर्पण करेंगे और सम्पूर्ण रूप से उनकी सेवा का व्रत लेंगे, तो कृष्ण की कृपा हो सकती है।
अभी जैसे हमने समर्पण किया। क्या? एक फूल कृष्ण को दिया, वस्त्र दिये, धन-सम्पत्ति, सब कुछ कृष्ण को अर्पण किया। किन्तु क्या तुमने अपने आपको अर्पण किया? या केवल फूल ही अर्पण कर रहे हो? इस पर विचार करो। कोई दूसरी वस्तु अर्पण करने से नहीं होगा। “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा” [#2] अर्थात् पहले अपने को अर्पण करो। [जब अपने को अर्पण कर दोगे,] तब फिर [अलग से किसी वस्तु को] अर्पित करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। तुम्हारा सर्वस्व [अपने-आप ही] कृष्ण के चरणों में अर्पित हो जायेगा।
इन्हीं सब शिक्षाओं को देने के लिए [यह लीला है।] ये गोपियाँ साधारण नहीं हैं। उनकी मनोभिलाषा को पूर्ण करने के लिए ही अगले शरद्ऋतु में उनके साथ रास करने की एक पीठ—भूमिका (platform) बनायी। इन बातों को अच्छी प्रकार से समझो। गोपियों का आदर्श ग्रहण करो। गोपियों के आनुगत्य के बिना व्रज में कृष्ण की प्राप्ति नहीं होती—इस तत्त्व को [भलीभाँति] समझ लेना चाहिये।
ये गोपियाँ अपने [व्रत के] अन्तिम दिन राधाजी, ललिताजी और विशाखाजी को बुला लायीं और उनका सङ्ग प्राप्त किया। तब फिर उस समय कृष्ण वहाँ आये और सबके साथ उनका सङ्ग होने से तब उनकी अभिलाषा को पूर्ण किया। इसलिये गोपियों के आनुगत्य के बिना गोपियों जैसा व्रजप्रेम नहीं हो सकता है। और ऐसे [प्रेम के] बिना कोई भी कृष्ण को वशीभूत नहीं कर सकता है। श्रीमद्भागवत की यही सार वस्तु है। इससे बढ़कर श्रीमद्भागवत में कोई और प्रेम नहीं है। यह प्रेम ही हम लोगों के लिए एकमात्र प्रयोजन है। इस भागवत को सुन करके जिसके हृदय में गोपियों जैसा प्रेम उमड़े, [अथवा] जिसे प्राप्त हो—यही श्रीमद्भागवत का चरम और एकमात्र फल है।
आज इसी वक्तव्य के साथ [कथा को विराम देते हैं।] समय अधिक हो गया है। मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ। ननुमलजी, अभी एक कीर्तन [कीजिये।]
भक्त : गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
[25:33-31:20 तक भक्तों द्वारा कीर्तन…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.22)
हे वल्लभाओ! मेरे साथ तुम्हारा जो संयोग है, वह निर्मल, निर्दोष एवं विशुद्ध प्रेममय है। तुमलोगों ने दुर्जय गृह-बन्धनों का छेदनकर मुझसे प्रेम किया है; इसके लिए मैं देवताओं के समान दीर्घायु प्राप्त करके भी उसका प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं हो सकता। तुम्हारे साधु-कृत्य एवं सौम्य स्वभाव मुझे उऋण कर सकते हैं, पर मैं तो तुम्हारे इस प्रेम का सर्वदा ऋणी ही हूँ। (GVP)
#2
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा।
क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (7.5.23-24)
श्रीप्रह्लादजी ने कहा— भगवान् विष्णु के नाम, रूप, गुण और परिकरों की लीलादि का श्रवण, कीर्तन एवं उनका स्मरण करना, उनके ही चरणकमलों की सेवा-परिचर्या करना, षोडशोपचार के द्वारा अर्चन करना, दास बन जाना, सख्यभाव स्थापित करना और चरणों में अपना सर्वस्व समर्पण कर देना—ये भक्ति की नौ विधियाँ हैं। जो मनुष्य भगवान् विष्णु को समर्पण करके इस नवविधा भक्ति का साक्षात् अनुष्ठान करता है, मेरे विचार से उसने ही उत्तम शिक्षा प्राप्त की है। (GVP)
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