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Srimad Bhagavatam Series- #1- Symptoms of Kali Yuga and How to Hear Srimad Bhagavatam

29:09
#1853
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Bhagavatam vidhi.
  • Bhagavatam-katha is only about Radha Krsna.
  • Discussion about the assembly of Saunakadi Rsis and Suta Gosvami.
  • Discussion about kaliyuga's situation.
  • Narada Muni meeting with bhakti-devi and Saunaka Rsi.
  • The way of hearing Srimad Bhagavatam for grihasthas and for the devotees.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 1 : कलियुग के लक्षण और श्रीमद्भागवत को सुनने की विधि

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 27 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज भगवान् की महती कृपा से यहाँ पर रसमयी श्रीमद्भागवत की कथा [प्रारम्भ] होने जा रही है। पिछले साल यहाँ पर भागवत की कथा हुई थी, तो लोगों की इच्छा थी कि इस वर्ष भी पुनः वही कथा हो। तो परम भाग्यवान श्रीरामप्रकाश अग्रवालजी के हृदय में यह प्रेरणा हुई कि वे हरिकथा, भागवत-कथा सुनेंगे और उनके हृदय में [अन्य] सब लोगों को भी सुनाने की आकांक्षा है। हमको यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा और हमने इसकी अनुमति दे दी। उसी के फलस्वरूप आज हम लोग पुनः यहाँ पर श्रीमद्भागवत की रसमयी कथा प्रारम्भ करने जा रहे हैं।

मैं श्रीराधाविनोदबिहारीजी के श्रीचरणों में, श्रीश्रीगिरिराजधरणजी के चरणकमलों में, श्रीश्रीयमुनाजी के चरणकमलों में, मथुरापुरी और व्रज के चरणकमलों में, और विशेषतः कृष्णस्वरूप श्रीमद्भागवत के चरणकमलों में प्रार्थना करता हूँ कि हम सब लोगों का संकल्प—कि हम लोग दस दिनों तक श्रवण करेंगे—वह निर्विघ्न और सुष्ठ रूप में सम्पन्न हो। श्रीमान शुभानन्दजी आप लोगों को कथा सुनायेंगे। मैं निरन्‍तर तीन घण्टे बैठकर बोलने में असमर्थ हूँ, इसलिये प्रतिदिन आरम्भ या अन्त में मैं कुछ उसकी सार बातें सुनाया करूँगा और सारी कथा श्रीमान शुभानन्दजी ही सुनायेंगे।

हम लोग किसी भी अन्य लालसा से यह भागवत नहीं कर रहे हैं। श्रोता भी परीक्षित् महाराज की भाँति केवल राधा-कृष्ण का प्रेम ही चाहते हैं, और हम वक्ता लोग भी संसार की कोई भी, कुछ भी [वस्तु] नहीं चाहते—धर्म, अर्थ, काम, यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं; वैकुण्ठ की भी कोई लालसा नहीं। केवल गोलोक में राधा-कृष्ण युगल की प्रेममयी सेवा की प्राप्ति हो—इसी [उद्देश्य]के लिए हम लोग [यह भागवत] कर रहे हैं। आप सभी श्रोता-लोग भी यही संकल्प रखेंगे और कोई लालसा नहीं करेंगे। केवल शुद्धरूप में राधा-कृष्ण के चरणकमलों की प्राप्ति हो, और वह [भाव निरन्‍तर] बढ़े—इसी लालसा से हम लोग भागवत सुन और कर रहे हैं।

अन्य [स्थानों पर] भागवत-[कथाओं] में, हरिकथा के माध्यम से कुछ अर्थ-उपार्जन की दृष्टि से बीच-बीच में रुक्मिणी विवाह, वामनजी का अवतार, कृष्ण का प्रकाश आदि और-और बहुत-सी लीलाएँ [प्रस्तुत की जाती] हैं, जिनमें कुछ अर्पण करने की विधियाँ दिखलायी जाती हैं। भागवत में भी लिखा है। रुक्मिणी-विवाह में तरह-तरह के कपड़े, अलंकार, शृङ्गार के साधन, विवाह में जो दिया जाता है, वह सब देने की भी विधि है। और भी [उल्लेख है जैसे] वामनजी के अवतार के समय में छाता, खड़ाऊँ, चावल इत्यादि देने की विधि है। कृष्ण-जन्मोत्सव और अन्नकूट-उत्सव के समय में बहुत कुछ देने की विधियाँ साधारण रूप में देखी जाती हैं।

किन्तु हम विचार करते हैं कि शुकदेव गोस्वामी ने क्या दक्षिणा ली, और परीक्षित् [महाराज] ने क्या दक्षिणा दी? और जिस समय वे परीक्षित् महाराजजी को श्रीमद्भागवत की कथा सुना रहे थे, उस समय क्या अन्नकूट या रुक्मिणी-विवाह के अवसर पर वैसे ही उपढौकन (उपहार) आये, [जैसे आजकल होते हैं?] उस समय ऐसा होता था? उस समय हुआ? मैं समझता हूँ कि वहाँ हरिकथा के अतिरिक्त ये सब बातें नहीं थी। ये सब चीजें सकाम भक्तों को आकर्षित करने के लिए और उनमें कुछ श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए हैं।

हम लोग [अन्य] नियमों को तो निभा देंगे, किन्तु इस विषय में नहीं पड़ेंगे—दान, दक्षिणा, दहेज, उपहार देना-लेना। यह नहीं [करेंगे।] हम लोग आप लोगों को भगवान् की विशुद्ध कथाएँ उपहार देंगे। उनमें उदाहरण भी होंगे। उनमें भागवत, उपनिषद्, पुराण, गीता आदि के सब उपदेश रहेंगे। सांसारिक ये सब उदाहरण जैसे कि अन्य सब कथाओं में मनोरञ्‍जन के लिए देते हैं, और उनमें आध्यात्मिक बात भी जोड़ देते हैं, [वैसा हम लोग नहीं करेंगे।] हम लोग आध्यात्मिक बात भी जोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। हम लोग केवल विशुद्ध कृष्णप्रेम की तरफ में रखेंगे। इसलिये आप लोग बड़े प्रेम के साथ में [कथा] सुनेंगे। अभी उपस्थिति कम है, किन्तु मैं समझता हूँ कि जब आप लोग लौट करके सब लोगों को कहेंगे, तो [और भी लोग आयेंगे।] एक-एक व्यक्ति पाँच-पाँच और व्यक्तियों को लाइये, तथा बहुत अच्छी तरह से सब कथा सुनिये। भागवत में ऐसी सब बातें लिखी हैं। हम प्रसङ्गानुसार इन सबकी बातें करेंगे।

कलियुग आ रहा था—[और] अब तो वह पूर्णरूप से आ गया है। कलियुग की अवस्था को देखकर हमारे ऋषि-महर्षि नैमिषारण्य में उपस्थित हुए। उनके अगुआ (अग्रणी) शौनकजी थे। उनके साथ 80 हज़ार या 88 हज़ार ऋषि वहाँ पर कलियुग के भय से आये थे। उनके शरीर बाहर और भीतर से काले हो गये थे। बहुत यज्ञ हो रहे थे। द्वापर युग का अन्त था, इसलिये [निरन्‍तर] यज्ञ और “स्वाहा-स्वाहा” [के उच्चारण] से धुएँ के कारण उनके भीतर सब कुछ काला पड़ गया था। इतने में सूत गोस्वामी वहाँ पधारे।

शौनकादि सब ऋषियों ने उनकी पूजा की और कहा— “अच्छा हुआ कि आप पधारे। हम लोग कलियुग के भय से भीत होकर यहाँ पर आये हैं। कलियुग की जो अवस्था हमने देखी है, उसमें सब वस्तुओं का सार निकल गया है। ब्राह्मणों में ब्रह्मत्व नहीं रहा, क्षत्रियों में क्षत्रियत्व नहीं रह गया, वैश्यों में उनकी [स्वाभाविक] वृत्ति नहीं रही, और शूद्रों में सेवा करने की प्रवृत्ति नहीं रही। स्त्रियों में जो गुण होने चाहिये, वे गुण नहीं रहे। पुरुषों में जो गुण रहने चाहिये, वे सब गुण नहीं रहे। अधर्म के कारण चारों ओर यही स्थिति फैल रही है। पृथ्वी इस भार को सहन नहीं कर पा रही है। इसलिये हम लोगों को आप कुछ ऐसी कथा सुनायें, जो वेद, वेदान्त, उपनिषद् आदि सब [शास्त्रों] का सार हो और जिससे [सम्पूर्ण] जगत् का मङ्गल हो।”

शौनकादि ऋषियों की बातें सुनकर सूत गोस्वामीजी बड़े प्रसन्न हुए। तब उन्होंने कुछ कथा-प्रसङ्ग कहना आरम्भ किया— “मैं वही बातें कहूँगा, जो मैंने अपने गुरुदेव से श्रवण की हैं।” ऐसा कहकर पहले सूत गोस्वामी ने वन्दना की—

यं प्रवव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु–
स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.2.2)

[श्रीसूत गोस्वामी ने कहा—जन्म के साथ ही उपनयनादि संस्कार के अनुष्ठान से रहित अपने पुत्र श्रीशुकदेवजी को संन्यास के उद्देश्य से अकेले ही वनमें जाते देखकर विरहकातर श्रीव्यास ने ‘पुत्र-पुत्र’ कहकर उन्हें उच्चस्वर से पुकारा था। उस समय शुकभावमय (अर्थात् शुक में तन्मय) वृक्षों ने ही प्रतिध्वनि के छल से विरह में कातर पिता को उत्तर दिया था। अपने योगबल के प्रभाव से सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान उन श्रीशुकदेव मुनि को मैं प्रणाम करता हूँ। (जिस प्रकार उन्होंने जड़ वृक्षों में प्रविष्ट होकर प्रत्युत्तर दिया था, उसी प्रकार वे मेरे भी अन्तःकरण में प्रवेश करके मेरे मुख से भागवत कहें)] GVP

[सूत गोस्वामी ने शुकदेव गोस्वामी] को प्रणाम किया और कहा— “मैंने अपने गुरुजी से जो कुछ सुना है, वही मैं आपको बतला रहा हूँ। [इसके श्रवण से] इस कलियुग का भय जाता रहेगा और जितने भी श्रोता हैं, उनके हृदय में पूर्णरूप से शान्ति तथा भगवान् के प्रति पूर्णरूप से प्रेम उदित होगा।” यह कहकर उन्होंने [कथा का] आरम्भ किया।

जब नारद ऋषि घूमते-घामते सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—इन चारों भाइयों से मिले, तो उन्होंने [नारदजी से] प्रश्न किया— “अरे, तुम्हारा चित्त कुछ खेदग्रस्त देख रहे हैं। तुम्हारा मन ऐसा क्यों है? उदास क्यों है? तुम तो समस्त शास्त्रों के तात्पर्य को जाननेवाले हो, [फिर] तुमको ऐसा खेद क्यों हुआ?”

[तब] नारदजी ने कहा— मैं भूमण्डल का भ्रमण करता हुआ आ रहा हूँ। हरिद्वार, पुरीक्षेत्र, श्रीरङ्गम्, सेतुबन्ध, सब तीर्थों में गया। सब जगह देखा कि सभी लोग कलियुग से अत्यन्त त्रस्त हैं और उससे प्रभावित है। अब यहाँ पर सत्य, तप, शौच, दया, दान—कुछ भी नहीं है। अन्ततः दया तो होनी चाहिये, [किन्‍तु] वह दया भी नहीं रही; दान इत्यादि तो सब समाप्त ही हो गये हैं।

जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हैं। वे असत्यभाषी, आलसी, मन्दबुद्धि, भाग्यहीन और उपद्रवग्रस्त हो गये हैं। राजाओं से भी सब समय डर [बना] रहता है; कोई भी शान्ति से नहीं [रह रहा।] जो साधु-सन्त कहे जाते हैं, वे भी पूरे पाखण्डी हो गये हैं। औरों की तो बात क्या? उनका केवल साधु-सन्तों का वेश है। वे साधु-सन्त लोग भी भगवान् की भक्ति की आड़ में अपने भोगों में व्यस्त हैं। उनका केवल वेश ही सार रह गया है। देखने में विरक्त हैं, किन्तु स्त्री और धन का परिग्रह करते हैं।

घरों में स्त्रियों का राज्य है। साले सलाहकार बने हैं। माता-पिता के प्रति कोई आदर नहीं [रहा।] लोग कन्याओं की भी बिक्री करने लगे हैं। [विवाह में] कन्याओं की बिक्री होती है; कन्यादान अब नहीं होता। चार-पाँच लाख रूपये, दस लाख, बीस लाख रूपये हों, [तभी विवाह होगा।] गरीब के घर में भी एक लाख रूपये नहीं देने से वह बेची नहीं जायेगी। स्त्री-पुरुषों में कलह है। महात्माओं के आश्रम, तीर्थ और नदियों पर यवनों का अधिकार हो गया है। [भगवान् की] जन्मभूमि, कृष्ण-जन्मभूमि और काशी इत्यादि जितनी भी [धर्मस्थलियाँ हैं,] सर्वत्र ही यवनों का अधिकार है। उन दुष्टों ने देवालयों को नष्ट कर दिया है। इस समय न तो कोई योगी है, न सिद्ध है, न ज्ञानी हैं, और न सत्कर्म करनेवाला कोई है। सारे साधन इस समय कलि के दावानल में जल करके भस्म हो गये हैं।

कलियुग में सभी देशों के निवासी अब बाज़ारों में अन्न बेचने लगे हैं। ब्राह्मण भी अन्न बेचते हैं—वैश्यों की तो बात ही क्या है? ब्राह्मण लोग पैसे लेकर वेद पढ़ते हैं। इस प्रकार पृथ्वी की जितनी भी वस्तुएँ हैं, सबका सार सब समाप्त हो गया है। यहाँ तक कि भागवत का सार भी निकल गया है। क्यों? ब्राह्मण लोग या दूसरे लोग… ब्राह्मणों की तो बात क्या, अब दूसरे जाति के लोग भी ब्राह्मण बनकर व्यवसाय (business) के लिए भागवत पाठ करते हैं और उसी को रोजगार-धन्धा बनाकर अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। कथा-श्रोता [अर्थात्] जो श्रवण करनेवाले हैं, वे भी अब अपनी दरिद्रता को दूर करने के लिए, रोगों को दूर करने के लिए, तरह-तरह की वस्तुओं [की प्राप्ति] के लिए, [और विविध] कामनाओं [की पूर्ति] के लिए भागवत सुनने लगे हैं। [इस प्रकार] पृथ्वी पर पाखण्ड और अधर्म बढ़ जाने से पृथ्वी का भी जो सार था, वह भी समाप्त होने लगा है। इसी प्रकार पृथ्वी की सब वस्तुओं का सार एकदम निकाल गया है।

इस प्रकार कलियुग के इन दोषों को देखते हुए और विचरण करते हुए मैं यमुना के तट पर पहुँचा। वहाँ पर मैंने देखा कि एक सुन्दर, सुकान्त [तरुणी] स्त्री बड़ी उदास बैठी है और उसके पास दो बूढ़े-बूढ़े व्यक्ति सोये हुए हैं। उनको कोई चेतना नहीं है और वह तरुणी स्त्री उन दोनों बूढ़ों को उठाने के लिए बहुत प्रयत्न कर रही है, किन्तु प्रयत्न में उसको सिद्धि नहीं मिल रही। मैंने देखा भाई कि ये क्या हो रहा है? मैं वहाँ पर पहुँचा और उससे पूछा— “तुम्हारी यह क्या दशा है?”

वह रोने लगी और बोली—“आज हमारा सौभाग्य है कि आप मिल गये; आप नारद ऋषि हैं। आप हम पर करुणा करें। ये दोनों कोई और नहीं, मेरे दोनों पुत्र हैं—ज्ञान और वैराग्य। मैं भक्ति हूँ। ये दोनों बूढ़े हो गये हैं और बूढ़े होकर अब इनको चेतना भी नहीं रहती। मेरे रहते हुए, मेरी तरुणी अवस्था में ही ये बेचारे बूढ़े हो गये हैं। मैं इनको किसी प्रकार से उठा नहीं पा रही हूँ। यह लज्जा की बात है कि मैया तो रहे युवती, और बच्चे हो जायें बूढ़े।”

इन सबके सम्बन्ध में शुभानन्दजी और विस्तृत रूप से बतलायेंगे। मैं संक्षिप्त में ही बतला रहा हूँ।

[नारदजी ने चतुःसन से कहा—] “इसलिये मैं चिन्ता कर रहा हूँ कि मैं क्या करूँ।”

उस समय सनक, सनन्दन, [सनातन] और सनत्कुमार ने उनको कुछ बातें बतलायीं। [उन्‍होंने कहा—] “अरे, आप तो भक्तिरस के आचार्य हैं और आप नहीं जानते हैं? आप सब कुछ जानते हैं। यदि इन लोगों को श्रीमद्भागवत की कथा सुनायी जाये, तो जो कुछ आप चाहते हैं, वह सब कुछ हो जायेगा। इसलिये [आप इन्‍हें] भागवत की कथा सुनाइये। आपको स्मरण नहीं कि जब व्यासजी बड़े दुःखी थे, तब आपने ही उन्हें चतुःश्लोकी भागवत के रूप में यह कथा सुनायी थी, [और उससे] उनकी क्या गति हुई, यह आप [भलीभाँति] जानते हुए भी मुग्ध की भाँति हमसे पूछ रहे हैं। इसलिये आप ऐसा कीजिये कि इनको भागवत सुनाइये। भागवत की कथा ऐसी है कि इससे सभी प्रकार के लोगों का कल्याण हो जायेगा। महाअधर्मी, विधर्मी कलियुग के जितने भी लोग हैं—यदि वे केवल श्रद्धापूर्वक इस कथा का श्रवण करें, तो उनके समस्त दुःख दूर हो जायेंगे, भगवान् के चरणों में उनकी अहैतुकी भक्ति होगी, और अन्त में उनका जीवन सार्थक हो जायेगा।”

जब [नारदजी] भागवत की महिमा-कथा सुनाने लगे, तो सुनाते ही देखा कि भक्तिदेवी अपने दोनों पुत्रों के सहित वहाँ पर पहुँच गयीं। भक्तिदेवी ने परम रमणीय रूप धारण कर लिया और उनके दोनों पुत्र भी एकदम पूर्णरूप से स्वस्थ हो गये। उसी समय वहाँ पर उद्धवजी भी उपस्थित हो गये और अर्जुन इत्यादि भक्तलोग भी उपस्थित हो गये। [तत्क्षण वहाँ] बहुत उच्च स्वर से कीर्तन होने लगा। इतने में भगवान् कृष्ण भी राधाजी के साथ वहाँ पर उपस्थित हो गये और वहाँ पर उच्च स्वर से कीर्तन होने लगा। कैसे कीर्तन होने लगा?

थोड़ा-सा कीर्तन करो…

जो नित्य भगवान् की कथाओं को सुनते हैं, जो वैष्णव लोग हैं, उन लोगों के लिए सप्ताह-विधि नहीं है। किन्‍तु जिन लोगों को सब समय भागवत पढ़ने-सुनने का समय नहीं है, विशेष करके जो लोग गृहकार्यों में व्यस्त रहते हैं, उन लोगों के लिए यह सप्ताह-विधि कुछ दी गयी है। सात दिन ही क्यों सुनें? नियमपूर्वक, उपवासपूर्वक अथवा केवल एक बार कुछ ग्रहणकर या दूध इत्यादि के द्वारा रहकर अथवा परीक्षित् महाराजजी ने जिस प्रकार सात दिनों तक पानी पीना इत्यादि सब कुछ छोड़ करके बहुत श्रद्धापूर्वक चित्त को निविष्टकर भागवत की कथा सुनी, वैसा होना सबके लिए, सब समय के लिए, बड़ा भारी कठिन है। इसलिये नारद ऋषि को हमारे सनक, सनन्दन, [सनातन] और सनत्कुमार [सप्ताह-विधि के लिए] कह रहे हैं।

अच्छा, जैसे वैष्णव लोग नित्य-निरन्तर भगवान् की कथा कहते और सुनते हैं, वैसा सब लोगों के लिए सम्भवपर नहीं है। नियमपूर्वक, उपवासपूर्वक या एक बार उपवास करके या केवल ऐसी वस्तुएँ लें, जिससे कि आलस्य प्रमाद न आये और घरबार के सब कामों को छोड़ करके केवल भगवद्-चिन्तन करते हुए [कथा] सुनना—ये सब लोगों के लिए सब समय सम्भवपर नहीं है।

इसलिये अन्ततः ऐसे लोग यदि नियमपूर्वक सात दिन भी सुनें, तो [उनका मङ्गल अवश्य होगा।] अब नियम कैसे हों? सवेरे में उठना, स्नान इत्यादि कार्य से निवृत्त होना, अपना आह्निक और पूजा-पाठ कर लेना और फिर सवेरे में [कथा-श्रवण के लिए] बैठना। उपवास रहना चाहिये; [किन्‍तु] जो लोग उपवासी न कर सकें, वे अन्ततः दूध, दही का शरबत आदि वस्तुएँ [ले सकते हैं।] इससे भी यदि सम्भवपर नहीं हुआ तो दिन या रात में केवल एक बार लघु आहार करें। ऐसा आहार करें जिससे पेट में वायु इत्यादि [विकार न उत्पन्न हों] और [व्यक्ति] अच्छी तरह से, निरालस्य हो करके कथा का श्रवण कर सके।

यहाँ तक श्रीमद्भागवत की महिमा बतायी गयी है कि पूरे श्रीमद्भागवत का तो कहना ही क्या—[यदि कोई] एक श्लोक भी [सुन ले], और [यदि] एक श्लोक [भी सम्भव] न हो सके, तो उस श्लोक के एक चतुर्थांश को ही श्रवण कर ले, [तो उसका कल्याण होगा।] और यदि अर्थ को समझ करके सुने और पढ़े तो बात ही क्या—अवश्य ही उसका कल्याण हो जायेगा। [यहाँ तक कहा गया है कि] यदि कोई सुन नहीं रहा, किन्‍तु उसने मात्र इस कथा का समर्थन ही किया— “बहुत सुन्दर हरिकथा हो रही है”—ऐसा समर्थन भी किया, तो उसका कल्याण ही कल्याण है। ऐसी यह भागवत की कथा है।

एक बात और समझनी चाहिये। इसलिये आप लोग ऐसे ही रहने की चेष्टा करेंगे। कथा के समय आप लोग उपवास में रहेंगे ही। [लगभग] दस बजे के बाद जब कथा समाप्त हो जाये, उस समय कुछ थोड़ा-सा लघु आहार कर लिया। अथवा यदि उपवास करना चाहें तो दूध इत्यादि लेकर अथवा उसी तरह की चीज़ें ले करके रहेंगे। [मुख्य बात यह है कि] आलस्य और प्रमाद नहीं होना चाहिये। [इसलिये] इस रूप में रहिये, जैसी विधि है।

और दूसरी बात—श्रीमद्भागवत की कथा वेद और उपनिषदों के सार से बनी हुई है। [तब प्रश्न होता है कि] पृथकरूप से भागवत-कथा सुनने की क्या आवश्यकता है? तो उसके लिए कहते हैं कि भागवत की कथा सार है। जैसे गन्ना है, उसे हम सीधे चूस सकते हैं। उसमें भी मिठास आती है। किन्तु उसको पेरकर, उसका रस निचोड़कर, उसको शुद्धकर, उसे गुड़ बनाकर, फिर गुड़ को साफ़ करके खाँड बना दिया जाये और खाँड को भी और साफ़-सुथरा करके मिश्री बना लिया जाये और मिश्री को भी और सुधार करके सितोपल बना दिया जाये, और उसमें कर्पूर तथा सुन्दर सुगन्ध इत्यादि देकर रसमय जैसे बना करके रसाला कोई हो और उसको पान किया जाये, तो उसमें कितना माधुर्य आ जाता है, जो खाँड में नहीं है। है न?

जिस प्रकार से वृक्ष में भी तो रस है न? आम का वृक्ष है, उसमें भी रस है। तो यदि आपको रस की आवश्यकता है, तो अलग से [रस] न लेकर वृक्ष को ही चूस लीजिये। [किन्‍तु] उसमें रस नहीं मिलेगा। वृक्ष अपनी जड़ों से नीचे से रस खींचता है। अब सर्वत्र उसमें रस भर गया। अब उसके पत्तों में भी रस चला गया। पेड़ में सर्वत्र रस ही रस है, किन्तु पत्तों से, डालियों से कोई रस नहीं चूसता। वही आम का फल लग जाता है, फिर पक जाता है। पूर्णरूप से पकने के बाद वह अत्यन्त मधुर हो जाता है, और यदि किसी शुक ने उसको चख करके छोड़ दिया, और उसमें उसका मुखामृत (मुख की सुधा) लग गया, और वह वृक्ष से नीचे चू (गिर) गया, तो वह कितना रसाल हो जाता है!

उसी प्रकार वेद और शास्त्र वृक्ष के समान हैं, और भागवत कैसा है? [उस पूर्ण] पके हुए आम [के समान है]—जिसमें छिलका गुठली कुछ भी न हो। ऐसा सुन्दर रसाल श्रीमद्भागवत है। इसके श्रवण करने से ही भगवद्‍ अर्थात् राधा-कृष्ण युगल का जो रस है, उसका आस्वादन होने लगता है। वेदों और शास्त्रों से यह कभी सम्भवपर नहीं है। इसलिये आप लोग बड़े प्रेम के साथ श्रीमद्भागवत का आस्वादन करेंगे।

इसके बाद अब हमारे शुभानन्द ब्रह्मचारीजी [श्रीमद्भागवत की कथा] प्रारम्‍भ करेंगे। वे संक्षेप में इसके माहात्म्य से आरम्भ करेंगे और हम लोग इसे दस-ग्यारह दिनों में पूरा करेंगे। द्वादशी के दिन हम लोग इसको पूरा करेंगे।

इसलिये आज कौनसी तारीख है?

भक्त: सत्ताईस

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज सत्ताईस, अट्ठाइस, उनतीस, तीस, फिर एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः—और छः को समापन मानते हुए, सात को सवेरे हम इसे पूर्ण करेंगे। इसके बाद हवन आदि करके, जैसा विधिवत होता है, वैसे ही हम लोग करेंगे। इसलिये इसमें हम लोग पहले नौ स्कन्धों का संक्षेप में [वर्णन करेंगे;] किन्तु दशम स्कन्ध के लिए तीन या चार दिन रखेंगे, और एक दिन एकादश तथा द्वादश [स्कन्ध के लिए देंगे।] इसलिये हम लोगों ने इसको बढ़ा दिया है ताकि दशम स्कन्ध के लिए कुछ अधिक समय रहे। आप लोग उसी प्रकार से बहुत प्रेम के साथ में श्रवण कीजिये। आप सब उसी प्रकार बड़े प्रेम के साथ श्रवण करें।

गौर प्रेमानन्दे!

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