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Srimad Bhagavatam Series- #2- Pariksita Cursed, Story of Atmadeva Brahmana & Gokarna, Bhakti-devi with Her Old Sons

31:32
#1854
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Story of Pariksita Maharaja about how he was cursed.
  • Story of Atmadeva Brahmana, father of Gokarna.
  • How Atmadeva prayed for a son.
  • Story of bhakti-devi and meeting with Narada Muni.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 2 : महाराज परीक्षित् को श्राप, आत्मदेव ब्राह्मण एवं गोकर्ण की कथा, तथा भक्ति देवी अपने वृद्ध पुत्रों के साथ

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 27 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: द्वारका की लीला समाप्त होने पर, जब श्रीकृष्ण स्वधाम चले गये, तब कलियुग का प्रारम्भ हुआ। कलियुग के [लगभग] तीस वर्ष बीत जाने पर महाराज परीक्षित् शिकार खेलने के लिए गये या दिग्विजय के लिए निकले। उसी समय उन्होंने शमीक ऋषि के गले में साँप की माला डाल दी [क्योंकि ऋषि ने उन्हें] पानी नहीं पिलाया।

महाराज परीक्षित् ने सोचा— “साधु-संन्यासियों का काम यह है कि लोगों की प्यास बुझायें। उनको खिलायें-पिलायें, गृहस्थों की सुविधाओं का ध्यान रखें—साधारण लोगों की और [यदि कोई] मर जाये तो उसको श्मशान ले जायें। जो प्यासे को पानी नहीं पिलायेगा, भूखे को नहीं खिलायेगा तो वह साधु कैसा?” इसलिये जब वे उनके आश्रम में गये तो उन्होंने पानी माँगा, किन्तु वे (शमीक ऋषि) तो भगवद्-चिन्तन में मग्न थे, इसलिये पानी नहीं पिलाया—उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया, भगवद्भाव में निमग्न होने के कारण [ऐसा हुआ।]

[इस पर] महाराज परीक्षित् को क्रोध आया— “मैं देश का राजा, चक्रवर्ती सम्राट, इनका पालन-पोषण करनेवाला , और ये मुझे पानी नहीं पिलाते! अच्छा, ठीक है।” तब उन्होंने एक मरे हुए साँप को अपने धनुष के कोने से उठाकर उनके गले में तीन बार कुसुम-माला [की तरह] पहना दिया [और कहा—] “तुम्हारे जैसे साधु-सन्तों के लिए यही पुरस्कार है, ऐसा ही स्वागत करना चाहिये।” [यह कहकर वे वहाँ से] चले आये।

[बाद में उन्‍होंने] सोचा— “अरे, यदि ये सचमुच सन्त हुए, तो मेरी क्या दशा होगी?” इतने में शमीक ऋषि का पुत्र, छोटा-सा—पाँचवर्षीय बालक, [अन्य] बच्चों से सुनकर कि किसी ने उसके पिता के गले में सर्प डाल दिया है, क्रोधित हो उठा। उसने पानी से आचमन किया और ब्रह्मश्राप दे दिया— “जिस व्यक्ति ने मेरे पिताजी के गले में यह सर्प डाला है, उसे सातवें दिन यही तक्षक सर्प अवश्य काटेगा, और वह बच नहीं सकेगा।” [यह कहकर वह अपने] पिताजी की गोद में आकर उच्च स्वर से रोने लगा। तब पिताजी की [समाधि भङ्ग हुई और उनकी आँख] खुली।

शमीक ऋषि ने कहा— “अरे! तू क्यों रोता है?” [फिर समस्त वृतान्‍त जानकर उन्‍होंने अपने पुत्र से कहा—] “तूने अनजाने में एक परम हितैषी और धार्मिक राजा को यह अभिसम्‍पात दे दिया कि सातवें दिन उसे यह सर्प डसेगा? यह बहुत ही अनुचित है। तू ब्राह्मण ही नहीं है। ब्राह्मण में तो धैर्य और सहिष्णुता होनी चाहिये। उसे ‘तृणादपि सुनीचेन’ होना चाहिये।” फिर उन्‍होंने एक बटुक, विद्यार्थी (छात्र) को भेजते हुए कहा— “जाओ, राजा से कहो कि सातवें दिन तुम्हें वही साँप काटेगा, जिसे तुमने उनके गले में डाला था। अब जो कुछ करना हो, कर लो।” [वह बटुक] जाकर रास्ते में [ही राजा से] मिला और उनको बतलाया— “जिस सर्प को आपने [उनके गले में] डाला था, वही आपको सातवें दिन काटेगा। [अतः] आपको जो कुछ करना हो, कर लीजिये।”

परीक्षित् महाराज ने सोचकर देखा— “अरे! यह [कोई] अभिसम्‍पात नहीं है; यह तो भगवान् की विशेष कृपा है जो मेरेऊपर हुई है। आज तक मैं संसार में ही लिप्त था। [मैंने] भगवान् का भजन नहीं किया, भगवद्-चिन्तन नहीं किया। अब श्राप के बहाने भगवान् साक्षात् रूप में मेरे पास [आ गये] हैं। उन्होंने [श्राप देते समय] ऐसा कुछ तो नहीं कहा कि मेरा सर्वनाश हो जाये। उन्‍होंने यह तो नहीं कहा कि मैं भगवद्-भक्ति से विच्युत हो जाऊँ।”

[यह सोचकर] उन्होंने कहा— “यह बड़ी अच्छी बात है।” वे घर नहीं गये, राजघर में नहीं लौटे। वे अपना मुकुट-टुकुट, धनुष-बाण और राजवेश सब छोड़ करके चले आये। उन्होंने किसी को ये भी नहीं कहा कि उनके बाद में कौन राजा होगा। वे गङ्गा के तट पर पहुँच करके सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? और इतने में शुकदेव गोस्वामी वहाँ पहुँचे और उन्‍हें श्रीमद्भागवत की रसमयी कथाओं का आस्वादन कराया। सातवें दिन तक्षक आया, किन्तु उनको नहीं पाया। वे तो उससे पहले ही [परमधाम को] चले गये थे। उस ब्राह्मण की थोड़ी-सी बात रखने के लिए [उस सर्प ने] उनके सूखे शरीर पर फुस [ध्वनि की और प्राणहीन] लकड़ी जैसे शरीर में उसने काट दिया और वह शरीर जलकर समाप्त हो गया।

यह [घटना] कलियुग के तीस वर्ष के बाद में हुई। इस कथा के बाद में दो सौ वर्ष और बीत गये। [दो सौ वर्ष] बीतने के बाद में गोकर्ण और धुन्‍धुकारी की कथा है। [इस प्रकार कुल मिलाकर कलियुग के लगभग] दो सौ तीस वर्ष [के उपरान्त] गोकर्ण और धुन्‍धुकारी [की कथा आती है।]

एक ब्राह्मण था। नाम याद है?

भक्त: आत्मदेव

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आत्मदेव [नामक] ब्राह्मण कुछ धार्मिक व्यक्ति था, किन्तु स्मार्त था। स्मार्त समझते हैं? जो भगवान् की पूजा तो करते हैं, किन्तु अपने सुख-समृद्धि के लिए करते हैं, उनको स्मार्त कहते हैं [अर्थात्] जो स्मृतियों के अनुसार चलते है। तो वह ब्राह्मण धार्मिक था और सत्‍कर्म करने में लिप्त था। उसका विवाह एक परम सुन्दरी, कुलीन स्त्री से हुआ था। किन्तु [उन्‍हें] कोई सन्‍तान नहीं थी। उसकी पत्नी स्वभाव की बड़ी मुखर थी। थी तो कुलीन, किन्तु झगड़ालू प्रवृत्ति (type) की थी, [और प्रायः] झगड़ा करती रहती थी। खैर जैसे-तैसे उनका संसार चल रहा था।

कुछ दिनों के बाद [आत्मदेव ने] देखा कि अब वे वृद्ध होने को आये, [किन्‍तु] पुत्र नहीं हुआ, न कोई सन्तति हुई। वे कहीं गङ्गा इत्यादि के तट पर या वन में कहीं आये और चिन्तन करने लगे कि अब उन्‍हें क्या करना चाहिये। [उन्‍होंने] सोचा— “यदि [मेरा] पुत्र नहीं है, तो [अवश्य ही] मैं पूर्वजन्म का महापापी हूँ। इसलिये पुत्र अवश्य होना चाहिये। मरने के बाद तर्पण कौन करेगा और हमारा उद्धार कौन करेगा? इसलिये पुत्र अत्यन्‍त आवश्यक है।” उस समय वे बहुत चिन्तित हो रहे थे कि इतने में [वहाँ] कोई साधु-सन्त आ गये।

[उन्‍होंने कहा—] “अरे! तू बड़ा दुःखी [दिखायी देता] है, बतलाओ क्यों?”

[आत्मदेव ने कहा—] “महाराज! [मानो] साक्षात् भगवान् ही आपके रूप में आ गये। मैं इसलिये दुःखी हूँ कि इतनी उम्र हो गयी, [फिर भी मुझे] पुत्र नहीं हुआ। आप किसी भी रूप में मुझको एक पुत्र दे दीजिये, [ताकि] मेरा वंश चले और मेरे कुल का उद्धार हो जाये।”

उन्‍होंने कहा— “तुम्हें एक जन्म में नहीं, सात जन्मों तक कोई पुत्र या सन्तति नहीं है। इसलिये तुम इसके लिए चेष्टा मत करो। क्या तुमने कहीं चित्रकेतु महाराज की कथा सुनी है? उन्हें भी पुत्र नहीं होता था, सन्तति नहीं थी।” उनकी कितनी [रानियाँ थीं,] एक लाख न कितनी?”

भक्त: एक करोड़

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उन्होंने एक करोड़ विवाह किये। उनकी आयु भी वैसे ही एक लाख वर्ष की थी, फिर भी इतने समय में किसी भी स्त्री से उन्‍हें कोई पुत्र नहीं हुआ। तब उनके पास एक ऋषि आये—कौन?

भक्त: अङ्गिरा ऋषि

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अङ्गिरा ऋषि आये। चित्रकेतु महाराज ने उनसे कहा— “मुझे एक पुत्र दीजिये। मैं और कुछ नहीं चाहता।”

अङ्गिरा ऋषि ने कहा— “बेटा, तुम्हें पुत्र तो [इस जन्म में] ही नहीं, दस जन्मों में भी नहीं है। पुत्र से सुख-शान्ति नहीं होती; वह तो भगवान् की भक्ति से होती है। इसलिये तुम भगवान् का भजन करो।” [उन्‍होंने] बहुत समझाया और उपदेश दिया, किन्‍तु चित्रकेतु महाराज की समझ में कुछ नहीं आया।

[अन्‍त में] अङ्गिरा ऋषि ने कहा— “तुम्‍हें हर्ष और शोकप्रद पुत्र हो जाये।”

[चित्रकेतु महाराज को एक रानी से] हर्ष और शोकप्रद पुत्र हुआ और अन्त में क्या दुर्गति हुई? अन्य स्त्रियों ने उस बच्चे को विष देकर पाँच वर्ष की अवस्था में ही मार डाला।

[वे साधु आत्मदेव को समझाते हुए कह रहे हैं— “क्या पुत्र प्राप्त करके चित्रकेतु महाराज को] सुख हुआ? ऐसे ही कभी सन्तति से सुख नहीं होता है। भगवान् को ही अपना पुत्र और अपना सब कुछ मान करके भजन करो; तभी तुमको सुख और शान्ति होगी।” [किन्‍तु आत्मदेव] नहीं माना। जब वह नहीं माना, [तो उन साधु ने कहा—] “अच्छा ठीक है।” उन्होंने एक फल लिया, उसमें आवाहन करके कुछ मन्‍त्रपूत कर दिये और कहा— “जाओ, इसे अपनी स्त्री को खिला देना।”

आत्मदेव [फल] लेकर [घर] गया और अपनी स्त्री को देते [हुए बोला]— “देखो, [यदि तुम] इस फल को खाओगी, नियम-सदाचार से रहोगी और भगवद्‍-चिन्तन करोगी, तो तुम्हें बहुत ही सुलक्षणयुक्त, सुन्दर और धार्मिक पुत्र होगा।” [यह कहकर वह फल उसे देकर] वे किसी काम से चले गये।

उसकी पत्नी (धुन्‍धुली) अपनी सखियों के पास गयी और रोने लगी— “अरे! मैं यह फल नहीं खाऊँगी, तू खा ले। मैं नहीं खाती। इसे खाने से मेरा पेट बड़ा हो जायेगा। फिर कुछ खाया-[पिया नहीं जायेगा।] प्राण भी नहीं बचा सकूँगी। इसलिये मैं नहीं खा सकती। और इतने दिन—दस महीने तक इतना कष्ट कौन सहेगा? मैं नहीं खाऊँगी।” उसने उस फल को लेकर अपनी गैया को खिला दिया। अपनी बहन के पास जाकर उसने कहा— “तेरे यहाँ दस महीने में लड़का होनेवाला है, उस लड़के को मुझे दे देना।” उसकी बहन और बहनोई वैसे ही अधार्मिक व्यक्ति थे, भगवान् से उनका कोई भी सम्बन्ध नहीं था।

अब उधर गैया को [वह फल] खिलाया था, तो गैया को भी गर्भ रह गया; और उधर उसकी बहन को भी गर्भ था। अब साधु-सन्तों के दिये हुए मन्‍त्रपूत फल खाने से [गाय को एक] परम धार्मिक पुत्र हुआ—गोकर्ण। और उसकी बहन [के यहाँ जन्म] हुआ—महाधुन्‍धुकारी अर्थात् धुन्‍ध (उपद्रव) मचानेवाला। ज्योंहि उसका जन्म हुआ, उल्कापात होने लगा और घर में क्लेश छा गया। अब उसने अपने लड़के को रात-ही-रात में धुन्‍धुली के यहाँ पर पहुँचा दिया और इसने ऐसा बहाना किया मानो उसी को पुत्र हुआ। [इधर] गैया को जो पुत्र हुआ, वह परम सुन्दर—किन्तु उसके कान कैसे? गैया के जैसे; बाकी सब मनुष्य जैसा परम सुन्दर, सुलक्षण युक्त हुआ।

कुछ दिनों के बाद धुन्‍धुकारी इतना उत्पात करने लगा कि उसने अपने पिता और माता को [लगभग] मार ही डाला। [उसके पिता आत्मदेव भजन करने के लिए वन में चले गये] और उसने अपनी मैया को इतना कष्ट दिया कि वह कुएँ में गिरकर मर गयी। इसके बाद गोकर्णजी वहाँ से तीर्थयात्रा पर निकल गये। वे विभिन्न तीर्थ-स्थलियों में घूमते-घूमते, [दीर्घ समय तक यात्राएँ करते रहे।]

अब माता-पिता रहे नहीं, भैया गोकर्ण नहीं रहा, थोड़े दिनों के बाद यह महाधुन्‍धुकारी [हो गया—] शराब पीना, जुआ खेलना, लोगों के साथ मारपीट करना, डकैती करना— ये उसका काम हो गया। इसके बाद उसे स्त्री की आवश्यकता हुई। वह वेश्याओं पर आसक्त हो गया और [नित्य] नये-नये धन लूटकर, चोरी करके उन वेश्याओं को देता। एक दिन वह बहुत बड़ा भारी माल [लूटकर] लाया। वह सोने के अलंकार इत्यादि और बहुत-सा माल लेकर आया और उन वेश्याओं को दे दिया।

वेश्याओं ने सोचा— “यह इतना अधिक माल है; यदि दूसरों को पता लग गया, या यह स्वयं भी बाद में इसमें से कुछ ले लेगा, [तो कठिनाई हो जायेगी।”] ऐसा सोच करके सबने मिलकर उसे उसी के घर के आँगन में पकड़ लिया। उसे पकड़ करके उसका गला बहुत जोर से दबाया, जिससे वह मर गया। फिर लकड़ियाँ जला करके उसके मुख में एकदम भर दीं और उसके सारे अङ्गों को जलाकर राख कर दिया। [इसके बाद] आँगन में [गड्ढा] खोदकर उसकी लाश वहीं पर दबा करके मिट्टी भर दी और सारा धन लेकर वहाँ से चली गयीं।

ऐसे दुष्ट लोगों की ऐसी ही दुर्गति होती है। इस [प्रसङ्ग] में बहुत बड़ी भारी शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं। ऐसा जीवन नहीं होना चाहिये। कुछ दिनों के बाद वह महाभयंकर पिशाच हुआ और घर में किसी को आने नहीं देता था। जितने आसपास के मुहल्ले के लोग थे, उसने उनको मारना-पीटना, भयानक [रूप धारण करके] भय दिखाना आरम्भ कर दिया। [परिणामस्वरूप] मोहल्ले के सब लोग छोड़ करके वहाँ से भागने लगे।

इधर गोकर्णजी गया, पुष्कर, हरिद्वार और कुरुक्षेत्र [आदि तीर्थों में गये और वहाँ पर] अपने पूर्वजों, वर्तमान रहनेवाले [परिवारजनों] और आगे आनेवाली [पीढ़ियों]—सभी के लिए श्राद्ध किया। ऐसी [शास्त्रीय] विधि है। उन्होंने भी किया किन्तु तब भी धुन्‍धुकारी का कोई कल्याण नहीं हुआ।

कुछ दिनों के बाद [गोकर्णजी] घर लौटे। [वहाँ आकर] देखा— अरे! यह तो भयंकर दृश्य है। धुन्‍धुकारी रात में भयानक रूप धारण करके—कभी भैंसे का, कभी साँड़ का, कभी सूअर का, कभी कुछ, तो कभी अलक्षित रूप से सताने लग गया। वह उन्हें वहाँ से भगाने [का प्रयास करने] लगा, किन्तु वे तो भगवद्‍-भक्त थे। उन पर भूत, पिशाच, या राक्षसों का [कोई प्रभाव नहीं पड़ता।] किसी भी प्रकार की विद्या या कुविद्या [उन लोगों पर] कुछ भी काम नहीं करती, जो भगवान् का नाम करता है, भगवान् की कथा सुनता है और भगवान् का स्मरण करता है। भक्ति पर इन सबका कोई प्रभाव नहीं होता।

कुछ भक्त लोगों को मैंने ऐसा कहते सुना है— “महाराजजी, आप कृपा करें, हमारे ऊपर कुछ ‘हवा’ चल रही है। हमारे घर में भूत आ गया है, हमारे यहाँ डाकिनी आ गयी है।”

मैंने कहा— “तुम मूर्ख व्यक्ति हो। [देखो,] या तो तुम भगवान् का भजन नहीं करते; [और यदि] करते भी हो, तो जैसा करना चाहिये [वैसा] नहीं करते। [वास्तव में] भूत-पिशाच ने तुम्हें आज से नहीं पकड़ा है, [अपितु] कोटि-कोटि जन्मों से तुम्हें पकड़ रखा है। आज यह कोई नई बात नहीं है।”

तो जो भगवान् का भजन करेगा, हरिनाम करेगा और सोचेगा कि उसके ऊपर में ‘ऊपर की हवा’ चल रही है, भूत-पिशाच लगा हुआ है, तो वह एक प्रकार से भगवान् और उनके नाम के प्रति अपराधी है। उसको अवश्य ही भूत लगना चाहिये और डाकिनी लगनी चाहिये। इसलिये ऐसा विश्वास रखिये—जो भगवान् का नाम करेगा, भजन करेगा, उस पर भूत, पिशाच, इधर की हवा, यक्ष, प्रेत, किसी का मन्‍त्र, जादू-टोना कुछ भी नहीं लग सकता। यह पूर्ण विश्वास रखिये। यहाँ पर अभी हम लोग भागवत की कथा कह रहे हैं। यहाँ पर ये सब कुछ भी नहीं आ सकते, या कभी भी नहीं आ सकते—ऐसा विश्वास रखिये।

तो गोकर्णजी वहाँ पर चुपचाप बैठे रहे। [धुन्‍धुकारी ने उन्हें] बहुत तंग किया, तो [भी उन्‍हें] कुछ नहीं हुआ। अन्त में गोकर्णजी ने कुछ मन्‍त्रपूत करके उसके ऊपर पानी छिड़क दिया, तो वह बोला— “भैया! मैं पिशाच हो गया हूँ। वेश्याओं ने मुझे इस प्रकार मार डाला। अब मेरे उद्धार की बात कीजिये।” [ऐसा कहकर वह] बहुत रोने और गिड़गिड़ाने लगा।

गोकर्णजी सूर्यदेव के पास गये [और निवेदन किया—] “इसका कल्याण कैसे होगा? मैंने तो गया, कुरुक्षेत्र, प्रभास [आदि] सभी तीर्थों में इसके लिए पिण्डदान दिया, और अपने पूर्वजों के लिए भी सब कुछ कर लिया, [किन्‍तु] इसको तो कुछ हुआ ही नहीं! आप कुछ [उपाय] बतलाइये?”

सूर्यदेव ने कहा— “तुम इसको श्रीमद्भागवत की [कथा सुनाओ, वही] जो शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित् महाराजजी को आज से [लगभग] दो सौ वर्ष पहले सुनाई थी। इससे इसका पिशाचत्व अवश्य निकल जायेगा, [और इसे] वैकुण्ठ की गति [प्राप्त] होगी।”

तब गोकर्णजी ने बैठ करके उनको [भागवत]-सप्ताह की कथा सुनायी थी। उन्होंने सात गाँठवाला एक बाँस खड़ा कर दिया, उसे मन्‍त्र से पूत करके धुन्‍धुकारी का आह्वान किया— “धुन्‍धुकारी! आगच्छ, आगच्छ! तिष्ठ, तिष्ठ! इस बाँस में [आकर] बैठ जाओ।” बस वह उस बाँस में प्रवेश कर गया और उसको [वहीं] रख दिया [अर्थात् स्थापित कर दिया।]

[यद्यपि] प्रधान श्रोता तो वही था, किन्तु गोकर्णजी ने ब्राह्मण लोगों को भी प्रधान श्रोता बनाया, जो सदाचारी और भक्त थे। किन्तु उनका [वास्तविक] लक्ष्य [धुन्‍धुकारी ही] था। उसको सुनाने के लिए उसको [बाँस में] रख दिया। धुन्‍धुकारी तन, मन, और वचन से एकाग्र होकर उस कथा को सुनने लगा। उस सभा में जो [अन्य] लोग थे, यद्यपि वे भी सुन रहे थे, किन्‍तु वे कैसे सुन रहे थे? कभी आलस्य करते, कभी जम्हाई लेते, कभी मूत्र-त्यागने के लिए जाते, कभी खाने के लिए जाते, कोई पानी पीता, कोई कुछ करता और कथा सुन रहे हैं। कभी-कभी कोई ऊँघ रहे हैं, कोई सो रहे हैं, कभी गिर-पड़ रहे हैं। कोई-कोई लोग सुन भी रहे थे, किन्तु विश्वास के साथ नहीं सुन रहे थे।

इस प्रकार से कथा हुई। पहले दिन भागवत का माहात्म्य बताया गया, जिसका संक्षेप में कुछ [वर्णन] हमारे शुभानन्दजी ने किया, और अभी आगे भी कुछ बतलायेंगे।

[गोकर्णजी ने] माहात्म्य इत्यादि कहकर [कथा] आरम्भ की और शाम हो गयी। शाम के समय बड़े ज़ोर से एक शब्द हुआ और उस बाँस की एक गाँठ फट गयी और [भीतर स्थित धुन्‍धुकारी] नीचे से ऊपर चढ़ गया। इसी प्रकार सात दिन कथा हुई और प्रतिदिन शाम को [उस बाँस की] एक-एक गाँठ फटती गयी। सातवें दिन सभी गाँठें [टूट गयीं, और] वह बाँस दो खण्डों में [विभक्त] हो गया। उसी समय देखा कि एक सुन्दर-सा विमान आया। उस पर भगवान् विष्णु के पार्षद लोग शंख, चक्र, गदा और पद्म लेकर खड़े थे।

[तब धुन्‍धुकारी] गोकर्णजी के चरणों में गिर गया [और बोला—] “आप मेरे भैया ही नहीं, मेरे गुरु भी हैं। आज आपने मुझे इस प्रेतयोनि से उद्धार कर दिया। केवल यही नहीं, जन्म-जन्मान्तर (अनन्त जन्मों) से जो मेरा इस जगत् में आना और जाना लगा हुआ था, वह भी [आपकी कृपा से] समाप्त हो गया। अब आज विष्णु के दूत मुझे वैकुण्ठ ले जाने के लिए आये हैं। आप मेरे ऊपर कृपा करें। आपकी कृपा से ही ऐसा सम्भव हुआ है।”

गोकर्णजी ने विष्णुदूतों से कहा— “प्रभु! यह तो बड़ा भारी अन्याय हुआ। हमने कथा सुनायी और केवल धुन्‍धुकारी के लिए ही विमान आया, और किसी के लिए कोई विमान नहीं आया। न मेरे लिए विमान आया और न इन इतने श्रोताओं के लिए कोई विमान आया। ऐसा अन्याय क्यों हुआ?”

[विष्णुदूतों ने कहा—] “यह अन्याय नहीं है। यह ठीक ही है, न्याय ही हुआ है। जिस प्रकार, जिस लगन और एकाग्रचित्त से, बिना इधर-उधर [ध्यान भटकाये], बिना खाये-पीये, परीक्षित् महाराज की भाँति इसने कथा सुनी है, उस तरह से वक्ता गोकर्ण अर्थात् आपने भी और ये जितने भी श्रोता हैं, किसी ने ऐसे एकाग्र मन से कथा नहीं सुनी। इसलिये एक ही विमान आया है। इस पर केवल धुन्‍धुकारीजी बैठेंगे।” बस [इतना कहकर उन्होंने धुन्‍धुकारी को विमान में] बैठाया और उसे लेकर वे लोग चले गये।

आप लोग भी ऐसे ही, धुन्‍धुकारी की तरह चित्त को तन्मय करके, प्रसन्न चित्त से, एकाग्र करके, एक आसन से, एक मन से [कथा] सुनेंगे और यह विश्वास रखकर—क्या? धुन्‍धुकारी ने जो विश्वास रखा था, उस विश्वास से भी ऊपर चले जाइये। वह तो वैकुण्ठ गया न; [किन्‍तु] हम वैकुण्ठ में [भी नहीं जायेंगे।] यदि विमान आयेगा और [उसमें से दूत] कहें— “चलिये, वैकुण्ठ में चलिये।” तो हम प्रत्याख्यान (अस्वीकार) कर देंगे— “हम इस विमान में नहीं बैठेंगे।” क्यों? नहीं, हम वैकुण्ठ [नहीं जायेंगे। भागवत की कथा सुनेंगे, और वैकुण्ठ में जायेंगे? हम वैकुण्ठ नहीं चाहते, हम तो इसी भौम-व्रज में, वृन्दावन में ही रहना चाहते हैं। और यदि [आप ले जाना] चाहते हैं, तो आप हमें नित्य गोलोक-वृन्दावन जो हैं न, उसमें यदि ले चलें और वहाँ हम राधा-कृष्ण की सेवा कर सकें तब तो हम जायेंगे; और नहीं तो हम यहीं पर रहेंगे। चाहे जन्म-मरण भी होता रहे, कोई भी बात नहीं है। इस प्रकार से यदि कोई सुने न, तब तो कल्याण हो।

तब वे दूत कहेंगे— “अच्छा, तो ठीक है। एक बात करो—तुम्हें वैकुण्ठ से भी ऊपर रामलोक ले चलते हैं।”

“प्रभु, हमें रामलोक भी नहीं चाहिये।”

“अरे, गोलोक में द्वारका है, वहाँ तो चलोगे?”

“प्रभु, उससे भी हम यहीं अच्छे (भले ) हैं। हम यहाँ से टस-से-मस नहीं होंगे।”

“अच्छा, तो ठीक है। आओ, हमारे साथ में, तुम्हें व्रज में ले चलेंगे और वहाँ पर गोपियों के आनुगत्य में राधा-कृष्ण युगल की सेवा का तुम्हें सुयोग देंगे।”

“हाँ, तब ठीक है—[यही हमें स्वीकार है।”]

ऐसे ही यदि आप लोग उस दृष्टि से भागवत को सुनें, तब यह बहुत ही सुन्दर है। नहीं तो, अन्ततः धुन्‍धुकारी की भाँति तो अवश्य ही सुनिये।

इसके बाद उन्होंने [पुनः] सात दिन तक उस विश्वास के साथ और उसी प्रकार से एकाग्रचित के साथ में कथा कही। वहाँ जितने श्रोता थे, सब तन्मय होकर उसी प्रकार सुनने लगे—किसी की आँखों में तन्द्रा नहीं आयी, किसी ने कोई जम्हाई नहीं ली, न ही किसी ने किसी अन्य चिन्‍ता में [मन लगाया।] सबने तन, मन और वचन से अत्यन्त अनुरक्त होकर, तदात्म्य भाव से भगवान् की कथाओं का श्रवण किया। [फलस्वरूप,] सात दिन के बाद वहाँ कोटि-कोटि विमान उपस्थित हुए। जितने लोगों ने वहाँ कथा सुनी थी—यहाँ तक कि जो मच्छर और चींटियाँ भी उस कथा-स्थल पर थीं—सबने चतुर्भुज रूप धारण किया और वैकुण्ठ धाम को पहुँच गये। ऐसी यह कथा हुई।

यह कब हुई? [कलियुग के] 230 वर्ष बीतने पर। उसके बाद फिर धीरे-धीरे कलियुग का महाप्रताप छाया। वे लोग तो चले गये। और तीस वर्ष बीत गये। अब कितने हुए? पहले तीस वर्ष, बीच में दो सौ वर्ष और फिर तीस वर्ष—[इस प्रकार लगभग] 260 वर्ष बीत गये। अब कलियुग का महाप्रचण्ड प्रताप आया।

परीक्षित् महाराजजी भी चले गये हैं। ऐसे-ऐसे सन्त नारद इत्यादि भी सब चले गये हैं। धुन्‍धुकारी भी चले गये हैं। शौनक, सूत गोस्वामी इत्यादि ऋषि लोग भी अब अप्रकट हो गये हैं। अब नारदजी अलक्षित रूप से भ्रमण करते हैं, और भ्रमण करते-करते वे कुरुजाङ्गल देश में यमुना के तट पर कहीं पहुँचते हैं। वहीं पर उनकी भेंट चतुःसन—सनक, सनन्‍दन, सनातन और सनत्कुमार से हुई।

वहाँ पर नारद ऋषि का वही प्रसंग हुआ, जो हमने बतलाया। चतुःसन ने उनसे पूछा— “अच्छा, आप उदास क्यों दिखायी दे रहे हैं?”

तब नारदजी ने यह बतलाया— “अब पृथ्वी पर कोई सार नहीं रह गया है। कोई भी भगवान् का शुद्धरूप से भजन नहीं करता। गृहस्थों की तो बात ही क्या, साधु और संन्यासी भी बड़े पाखण्डी हो गये हैं। ब्राह्मणों में भी कोई सारतत्त्व नहीं रहा; वे केवल घर-गृहस्थी और भोग-विलास में ही मत्त रहते हैं। हरि-कथाओं में भी अब कोई [सार नहीं रह गया है। उस समय से भागवत की सप्ताह-कथा होती है, किन्‍तु कथाओं में भी सार नहीं रह गया। क्यों? क्योंकि दक्षिणा पर अधिक लक्ष्य रहता है और वे बगल में पोथी दबा करके इधर-उधर घूमते हैं।”

बहुत से भागवत-कथावाचक हमारे पास भी आते हैं— “महाराजजी! बम्बई में एक पत्र लिख दीजिये, जो आपका परिचित हो, ताकि वहाँ पर हमारी भागवत की कथा हो जाये और कुछ रुपये आ जाये—लड़की का विवाह करना है, पैसे नहीं हैं।” यह किसलिये भागवत कह रहा है? इसलिये ऐसी भागवत की कथाओं में अब सार नहीं रह गया। इसलिये उनकी भगवद्‍-भक्ति नहीं होती।

स्त्रियों में भी जो स्त्रीत्व होना चाहिये, वह नहीं रहा। सबका प्रेम उठ गया, कुकर्म होने लग गये। लोग अपने साधारण [स्वार्थ के लिए,] तुच्छ वस्तुओं की आशा के लिए भाई, पड़ोसी, यहाँ तक कि नौकर अपने स्वामी की हत्या कर देते हैं। यह तो प्रतिदिन अखबार में पढ़ते ही हैं। ऐसी स्थिति हो गयी थी।

नारदजी ने कहा— “मुझको क्या करना चाहिये? घूमते-घूमते मैंने बड़ा आश्चर्यजनक दृश्य देखा। कहाँ देखा? यमुना के किनारे वृन्दावन में देखा। क्या देखा? एक युवती स्त्री है, और दो वृद्ध व्यक्ति हैं। युवती उनको उठाने की चेष्टा करती हैं, किन्‍तु वे उठते नहीं हैं।”

नारदजी ने उससे पूछा— “तुम कौन हो? और ये कौन हैं? ये क्या बात है?”

उस युवती ने कहा— “मैं भक्ति हूँ। मेरा जन्म दक्षिण प्रदेश में हुआ।” अर्थात् जहाँ पर अन्‍ततः शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, निम्बादित्य इत्यादि का जन्म हुआ और विश्व में भगवद्-भक्ति का प्रचार किया। वहीं से भक्ति का जन्म मानो।

“इसके बाद वहाँ से मैं कर्नाटक गयी, वहाँ पर बड़ी हुई। अर्थात् वहाँ भी भक्ति का कुछ भाव रहा। वहाँ से महाराष्ट्र गयी। महाराष्ट्र माने बम्बई इत्यादि। तो वहाँ पर कुछ और बड़ी हुई। उन लोगों ने भी कुछ आदर किया। इसके बाद मैं गुजरात गयी। गुजरात जाने के बाद में मैं बूढ़ी हो गयी और मेरे लड़के भी बूढ़े हो गये। वे एकदम अज्ञानी बन गये। मैं तो बड़ी दंग रह गयी कि मेरे दोनों लड़के बूढ़े हो गये और मैं भी बूढ़ी हो गयी। तब मैं उन्हें लेकर वहाँ से भागती हुई यमुना के किनारे इस वृन्‍दावन में आयी। यहाँ आते ही मैं अत्यन्त सुन्दर युवती बन गयी, किन्तु मेरे ये लड़के बूढ़े ही रहे और सो रहे हैं। अब मैं इसी दुःख में हूँ। मुझे सब समय हृदय में दुःख है। मेरे बच्चे आज बूढ़े हो गये हैं, किन्‍तु मैं अभी युवती हूँ। अब हमारा कल्याण कैसे होगा—आप ही बतलाइये।”

नारदजी ने यह देखकर उसको बतलाया— “तुम कोई चिन्ता मत करो, मैं इसकी चिन्ता करूँगा।” ऐसा सोचकर उन्होंने वहाँ पर भगवद्‍भक्ति की महिमा का वर्णन किया। यह सुनकर [भक्ति के सभी अङ्ग पुष्ट] हो गये और वे बड़ी सुन्दरी हो गयी, किन्तु उसके दोनों पुत्रों में [चेतना नहीं आयी। तब नारदजी ने] उन्‍हें उठाने की चेष्टा की। उन्होंने उनको वेदान्त, वेद, पुराण आदि सब सुनाया। इससे वे कुछ हिले-डुले, थोड़ा-सा ज्ञान भी आया, किन्तु फिर वे [पुनः] झुककर सो गये, उठे ही नहीं।

नारदजी चतुःसन से कह रहे हैं— “तब मैं उनको छोड़ करके इधर-उधर [उपाय] ढूँढ़ने गया। समस्त तीर्थों में गया, इधर-उधर गया। लोगों से पूछा [कि इसका क्या उपाय है।] तभी आकाशवाणी हुई— “देखो, तुम एक कार्य करो—एक सत्कर्म करो। उसी सत्कर्म से ये दोनों बच्चे, जो बूढ़े हो गये हैं, फिर से नवयुवक हो जायेंगे और बड़े सुन्दर, सुकान्त और अच्छे हो जायेंगे।” [यह सुनकर] मैं सोचने लगा कि वह कौन-सा सत्कर्म है जिसको करूँ? [इसी विचार में] घूमते-घूमते अन्ततः मैं आपके पास आया हूँ। अब आप ही बताइये—वह कौन-सा सत्कर्म है?”

चतुःसन ने कहा—“देखिये, वह सत्कर्म तो आप स्वयं जानते हैं। आप तो भक्ति के आचार्य हैं; किन्तु [लोक-शिक्षा और] जगत् के कल्याण के लिए आप हमारे द्वारा अथवा दूसरों के द्वारा यह प्रकाशित कराना चाहते हो। अरे! आपने ही तो व्यासदेव को यही कथा सुनायी थी और फिर आपकी ही कृपा से शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित् को [श्रीमद्भागवत की कथा] सुनायी, जिससे उनका कल्याण हुआ। क्या आप जानते नहीं हैं? उस सभा में तो आप [स्वयं भी उपस्थित] थे, फिर भूल कैसे गये? आप उनको भागवत की कथा सुनाइये।”

[नारदजी ने दीनतावशतः कहा—] “मैं तो भागवत की कथा नहीं जानता।”

[चतुःसन ने कहा—] “अच्छा, तो हम आपको सुनाते हैं।” तब उन्होंने उनको भागवत की कथा सुनायी। ज्योंहि उसका माहात्म्य आरम्भ किया, वहाँ भक्तिदेवी अपने दोनों पुत्रों [के सहित] प्रकट हो गयीं। उस कथा के माध्यम से उनके दोनों लड़के स्वस्थ और सुन्दर हो गये और भक्ति भी समस्त भक्ति के भूषणों से एकदम भरपूर परम सुन्दरी बन गयीं। बड़ा आनन्द छा गया। इसके बाद कथा आगे बढ़ी और उस कथा के अन्‍त में स्वयं भगवान् [श्रीकृष्ण] राधाजी के साथ प्रकट हुए। वहाँ सब भक्त लोगों का आविर्भाव हुआ। सभी उच्च स्वर से से भगवान् की महिमा का कीर्तन करने लगे। भगवान् बड़े प्रसन्न हुए।

अब थोड़ा एक कीर्तन सुनाइये तो। इसके बाद में आप लोग ठीक चार बजे यहाँ पर उपस्थित हो जायेंगे। चार बजे से लेकर सात बजे तक हमारी कथा रहेगी। बीच-बीच में कुछ कीर्तन होगा और उसके बाद फिर सात बजे आरती होगी। आरती के बाद आप लोग [प्रसाद ग्रहण करें।]

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