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Srimad Bhagavatam Series- #10- Story of Lord Vamana & Bali Receives Special Mercy

11:00
#1861
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Pastimes when Krsna, Bhima, Arjuna disguised as brahmana and went to Jarasandha.
  • Vamana-deva asked 3 steps land from Bali Maharaja.
  • Explanation of why Vamana-deva disguised as brahmana instead of fighting or ordering Bali Maharaja.
  • Vamana-deva gave land to Indra but gave bhakti to Bali Maharaja and went with him to patala-loka.
  • How Laksmi-devi came to patala-loka to get Vamana-deva.
  • Those who ask for materialistic things from God are actually deceived.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 10 : भगवान् वामनदेव की कथा और बलि महाराज पर विशेष कृपा

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 30 अप्रैल 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …[वामनदेव बलि महाराज के पास] जाते हैं और कहते हैं — “मैं तुमसे भिक्षा माँग रहा हूँ।”

[बलि महाराज] कहते कि “क्या भिक्षा माँग रहे हैं? [तो वामनदेव कहते हैं— “पहले] तुम संकल्प कर दो।” [यदि भगवान् राम भी रावण को संकल्प करने को कहते] तब रावण भी संकल्प कर देता। [संकल्प कराने के बाद कहते—] “देखो, सीताजी को हमको लौटा दो।” तो हो सकता था कि रावण लौटा देता, कि‍न्तु [भगवान् राम ने] ऐसा तो किया नहीं। [कृष्ण] कंस से भी सन्धि कर सकते थे; शिशुपाल, द‍‍न्तवक्र और जरास‍न्ध से भी सन्धि कर सकते थे, [किन्‍तु ऐसा नहीं किया।]

जिस समय [कृष्ण] भीम और अर्जुन को साथ ले करके जरास‍न्ध की नगरी में पहुँचे, तब तीनों ने ब्राह्मणों का वेश बनाया और उसके पास जा करके क्या माँगा?— “रणं देहि, रणं देहि, युद्धं देहि।” [यह सुनकर जरासन्‍ध] हँसने लगा— “अरे! ये ब्राह्मण बने हैं और हाथ में प्रत्यञ्‍चा का चि‍ह्न है!” वह हँसने लगा [और बोला—] “तुम लोग कौन हो?”

कृष्ण ने कहा—“मैं कृष्ण हूँ, यह अर्जुन है, और यह भीम है।”

[जरासन्‍ध ने कहा—] “तो [कृष्ण] तुम तो डरपोक व्यक्ति हो, बार-बार लड़ाई से भागनेवाले, स्त्रियों के साथ में रहनेवाले, तुम [जैसे] भीरू व्यक्ति से मैं युद्ध नहीं करूँगा। [और यह अर्जुन] आधा नारी आधा पुरुष—इससे मैं क्या लडूँगा? हाँ, भीम से लडूँगा। [यद्यपि] भीम भी मुझसे बल और बुद्धि सब प्रकार से कम है, तो भी इसने कभी युद्ध में पीठ नहीं दिखायी। तो हाँ, यह थोड़ा-सा मेरे टक्कर का है, इससे तो मैं लड़ लूँगा।” तो इस प्रकार से यहाँ गये और असुरों, दैत्यों, दानवों और दुष्टों का संहार किया।

[किन्‍तु] “वाह रे प्रभु! यहाँ (बलि महाराज के यज्ञ-मण्डप) पर भिक्षुक बन करके गये, छोटे से बालक बनकर तीन पग भूमि माँगी। क्या आवश्यकता पड़ी थी?” इस पर जब गम्‍भीर रूप से विचार करते हैं, तो अभी तुरन्‍त एक विचार मेरे हृदय में आया। सोचा कि उसे लोगों के सामने प्रकट कर दूँ। यदि अच्छा समझेंगे तो ले लेंगे और अच्छा नहीं समझेंगे तो नहीं [लेंगे;] मैं अपनी बात लौटा लूँगा। इसलिये मैंने यह कहना उचित समझा।

तो वह बात यह है कि [बलि महाराज के पास भगवान्] भिक्षुक बन करके क्यों गये? इसका कारण प्रह्लाद हैं। प्रह्लाद एक अप्रतिम (अतुलनीय, अद्वितीय) भक्त हैं और उन्हीं के कुल में बलि महाराज आये हैं। [प्रभु को] इ‍न्द्र इत्यादि को राज्य देना है, क्योंकि वे राज्य चाहते हैं। इन दोनों (बलि और इन्‍द्र) में युद्ध हो रहा है। बलि महाराज इतने वीर हैं कि उन्‍होंने रणक्षेत्र में इ‍न्द्र इत्यादि समस्त देवताओं को भगा दिया और उनका राज्य इत्यादि सब कुछ अपने अधिकार में ले लिया।

प्रभु को वह राज्य इ‍न्द्र को लौटाना है। वे चाहते तो एक हुँकार में, या थोड़े-से युद्ध में ही बलि को मार सकते थे, कि‍न्तु ऐसा नहीं किया—क्योंकि वे भक्त के परिवार में हैं। इसलिये उन्होंने क्या किया? उन्होंने सोचा कि सहज तरीके से बलि से वह राज्य लेकर इ‍न्द्र को दे दिया जाये। और [साथ ही,] बलि प्रह्लादजी के वंश में हैं न—इसलिये उनको इस राज्य के बदले अपनी अपूर्व भक्ति देकर मैं इसका ऋणी बन जाऊँगा।

यहाँ जो हुआ, उसमें [भगवान् वामन] ने बलि का बन्‍धन नहीं किया; बल्कि बलि ने अपनी भक्ति की डोर से प्रभु को ही बाँध लिया। यहाँ पर उलटी बात हो गयी। इसी कारण [प्रभु] भिखारी के रूप में गये, हाथ जोड़कर उनसे माँगा, संकल्प के द्वारा माँगा। उन्होंने [संकल्प] करवाकर तीन पग भूमि माँगी। बलि ने और भी देना चाहा, किन्तु उन्होंने लिया नहीं। उनके साथ में छल चतुराई की और केवल तीन पग भूमि ही माँगी।

तीन पग भूमि में, एक पग से उन्होंने पृथ्वी को माप लिया; दूसरे पग से समस्त ब्रह्माण्ड और पाताल से सब ले लिया। तीसरे पग के लिए [बलि महाराज से]कहा— “इसे मापने के लिये हमको स्थान चाहिये।” देखो, क्या मापा? पहले [पग] से स्थूल पृथ्वी को [मापा]; दूसरे से जहाँ तक मन की गति है, उस ब्रह्माण्ड तक को [माप दिया]; और तीसरे [पग के लिए बलि महाराज ने] अपने आप को दिया अर्थात् अपनी आत्मा को दिया, उसको भगवान् ने मापा।

[भगवान् वामनदेव ने] एक [पग] से स्थूल को मापा और उस स्थूल वस्तु को किसको दे दिया? — “इन्‍द्र! यह तुच्छ [राज्य आदि] तुम ले जाओ।” उसको लेकर रखा नहीं। [दूसरे पग से] उसके मन को [नाप लिया,] ब्रह्मा आदि के ब्रह्मलोक तक यह सब मन की गति है; जहाँ स्थूल शरीर नहीं जा सकता। मानसिक वस्तु, मानसिक सूक्ष्म-लि‍ङ्ग से भी प्रभु का कोई सम्पर्क नहीं है। और तीसरी वस्तु आत्मा है। [बलि महाराज ने] अपने मस्तक को दे करके, अपने को दे करके—मैं कौन हूँ? मैं शरीर नहीं, मैं [मन नहीं,] आत्मा हूँ—[इस प्रकार] बलि ने सर्वस्व आत्मनिवेदन किया। आत्मनिवेदन माने क्या? स्थूल शरीर और मन देने पर भी यदि आत्मा नहीं दी गयी, तो [मानो] खजाना दे दिया [किन्‍तु] चाबी अपने हाथ में है।

बलि महाराज से प्रभु ने उनकी आत्मा को ही ले लिया—उन्‍हें अपना बना लिया, अपना परिकर बना लिया। इ‍‍‍न्द्र को दिया कुछ? उनके हाथ में [मानो] बच्चों जैसा लोला पकड़ा दिया। लोला किसको कहते हैं? लकड़ी का खिलौना होता है न—बच्चे रोते हैं, तो उनको रिझाने के लिए, प्रसन्न करने के लिए लोला दे दिया जाता है। [जैसे] स्तन या दूध देने के स्थान पर बच्चा लकड़ी चूसता रहता है, वैसे ही इ‍न्द्र को लकड़ी चूसा दी [अर्थात् स्वर्ग आदि तुच्छ वस्तु दे दी;] और बलि महाराज को क्या दिया? भक्ति दे दी।

[इस प्रकार प्रभु] उनके [प्रेम के] बन्‍धन में बँध गये और कहाँ गये? पाताल में उनके साथ चले गये। और उनके पचास दरवाजे वाले महल के पचासों दरवाजों पर [अलग-अलग] रूप धारण करके खड़ा रहना पड़ा। कब बलि महाराज [किस दरवाजे पर] आ जायें? [जब भी बलि महाराज किसी भी द्वार से आयें, तो उन्हें दर्शन मिल सके।] इस प्रकार सब समय उन्‍हें दर्शन देने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस प्रकार यहाँ पर [भगवान्] भक्तों के वशीभूत हो गये।

[भगवान् वामनदेव] अपने आप ब‍न्ध गये और ऐसे ब‍न्ध गये [कि न जाने] कितने कल्प बीत गये और कितना क्या हो गया, वे वहीं पर [खड़े रहते।] बलि महाराज दिन-रात सोते नहीं, कभी इधर से उधर जाते और प्रभु सब समय यहीं दरवाजे पर खड़े रहते।

लक्ष्मीजी ढूँढ रही हैं— “हमारे प्रभु कहाँ चले गये? बहुत दिन बीत गये!” नारदजी ने उनको बतलाया— “भक्तों को ठगने के लिए गये।” [लक्ष्मीजी ने] नारदजी से पूछा— “प्रभु कहाँ गये?”

[तो नारदजी ने कहा—] “प्रभु भक्तों को छलना करने के लिए, ठगने के लिए गये थे किन्‍तु वहाँ पर स्वयं ही ठगे गये; वहीं पर ब‍न्ध गये हैं, इसलिये [लौटकर] नहीं आ रहे।” अब तो [लक्ष्मीजी व्याकुल होकर] रोने लगीं और बोलीं—“आप ही कोई उपाय बताइये।” तब नारदजी ने कुछ उपाय बतला दिया।

लक्ष्मीजी वृद्धा तपस्विनी का वेश बनाकर बलि महाराज के पास पहुँचीं। वहाँ जाकर पीछे बैठ गयीं। लाखों लोग दान लेने के लिए प्रस्तुत हैं [और बलि महाराज सबको दान] दे रहे हैं और वे चुपचाप धैर्य धारण करके पीछे बैठी हैं। जब सब लोगों की विदायी हो गयी, [तब बलि महाराज की दृष्टि उन पर पड़ी।] उन्‍होंने देखा कि उनका अपूर्व तेज है। बस उनको प्रणाम किया [और पूछा—] “माताजी, आप कौन हैं? आप क्या चाहती हैं? किसलिये आयी हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि आप कुछ दान लेने के लिए आयी हैं।”

जब वामन देवजी [छल करके] आये थे, उस बात को [बलि महाराज] भूल गये। बहुत दिन हो गये न—इसलिये वामनदेव को दिये हुए दान की बात को भूल गये। तो [बलि महाराज ने लक्ष्मीजी] से पूछा। तब उन्होंने कुछ लज्जित होते हुए कहा— “पहले तो आप संकल्प लीजिये कि जो मैं माँगूँगी, उससे आप पीछे नहीं हटेंगे।”

अब झट उन्‍हें वह बात याद आ गयी—एक वे (प्रभु) थे और देखते हैं कि अब यह दूसरी कौन आ गयी जो मुझे संकल्प में बाँधना चाहती है? वे सुसावधान हो गये; तो भी मुख से बात निकल गयी थी— “माँग लो, जो कुछ माँगना हो।” तो लक्ष्मीजी ने कहा— “पहले संकल्प लीजिये।”

इस बार शुक्राचार्यजी भी सावधान थे—एक आँख गयी थी, दूसरी आँख भी न चली जाये; इसलिये उन्होंने मना नहीं किया, चुपचाप लीला देखते रहे। जब बलि महाराज ने संकल्प कर लिया, तब कहा— “बतलाइये देवीजी, आपको क्या दूँ?”

[लक्ष्मीजी प्रभु की] ओर संकेत करके कहती हैं— “वह जो दरवाजे पर बैठे हैं, हमें उनकी आवश्यकता है।” [यह सुनकर बलि महाराज] समझ गये कि यह हमें ठगने के लिए आयी है; [फिर भी] अन्त में वे बड़े प्रसन्न हो गये।

[बलि महाराज ने] भगवान् के चरणों में निवेदन किया—“प्रभु, ये आपकी लक्ष्मीजी आयी हैं और [आपको] ले जाना चाहती हैं, किन्‍तु मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता। अब आप ही कोई ऐसा उपाय बतलाइये कि मैं आपको छोड़ूँ भी नहीं, और [मुझे] लक्ष्मीजी को भी जो देना है, वह वरदान भी मेरा पूरा हो जाये।”

प्रभु मुस्कुराये और बोले— “ठीक है, मैं एक स्वरूप से यहीं तुम्हारे पास बँधा रहूँगा, और दूसरे स्वरूप से मैं लक्ष्मीजी के साथ चला जाऊँगा। [इस प्रकार] तुम्हारी भी बात रह जायेगी और इनकी भी बात रह जायेगी।”

इससे यह देखा जाता है कि इस प्रकार भगवान् के चरणों में आत्मसमर्पण करना चाहिये। बलि महाराज ने सम्‍पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण किया। प्रभु ने उनका ऊपरी दान नहीं लिया, बल्कि [उन पर विशेष कृपा की। प्रभु] जिस पर कृपा करते हैं, ऐसे ही कृपा करते हैं। यही प्रभु की [वास्तविक] कृपा है। उन्होंने इ‍न्द्र को वञ्‍चित कर दिया। इ‍न्द्र वञ्‍चित रह गया। तो जो लोग भगवान् को पाकर भी उनके चरणकमलो में शुद्ध-भक्ति, प्रेम-भक्ति नहीं माँगते, [बल्कि] सांसारिक [वस्तुएँ—जैसे] स्त्री, पुत्र, परिवार, धन, जन, सुख और स्वर्ग आदि माँगते हैं, वे [वास्तव में] ठगे जाते हैं। इसलिये प्रभु की बलि महाराज पर बड़ी कृपा है। आप लोग इस कृपा को समझने की चेष्टा करेंगे।

गौर प्रेमान‍न्दे! हरि हरि बोल!

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