Srimad Bhagavatam Series- #12- Story of King Subuddhi & Glories of Harinama
23:25This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Story of 'Subuddhi Raja' who was forcefully contaminated by a Muslim.
- How king Subuddhi went to Banaras & Kanchi but all the great scholars told him that he can’t be purified again.
- Pastimes of when he met Sriman Mahaprabhu.
- Chanting with aparadha will not be fruitful.
- If Sriman Mahaprabhu would not have come then kali-yuga would have taken a more vicious form.
- Explanation of verse 'kaliyug keval naam adhara'.
- Demigods, humans & demons were fighting for slokas; Sankara divided slokas in 3 parts.
- Story of Rama when he was trying to make the stones float on water.
- Hari-Nama mahima with examples.
- Discussion about Srila BV Svami Maharaja who read Prahlada Maharaja's upakhyan 108 times & is very important for bhakti.
Transcript
श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 12 : सुबुद्धिराय की कथा एवं हरिनाम की महिमा
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 1 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: थोड़ा-सा इसमें मैं स्पष्ट कर देना आवश्यक समझता हूँ।
श्रीचैतन्य महाप्रभुजी का समय था। एक राजा था, उसका नाम था सुबुद्धिराय। वे जमींदार सदृश (type) व्यक्ति थे। उनको वर्ष में एक, दो या चार लाख रुपये राजा को देने होते थे। उस समय बङ्गाल का राजा हुसैनशाह बादशाह था। जिस समय हुसैनशाह अभी राजा नहीं बना था, उस समय कोई दूसरा राजा था। तो सुबुद्धिराय उस राजा के अधीन थे और हुसैनशाह उनका [सुबुद्धिराय का] कर्मचारी था। समझे?
[पहले हुसैनशाह सुबुद्धिराय] के अधीन एक मुसलमान कर्मचारी था। वह बड़ा होनहार मुसलमान था। सुबुद्धिराय ने उसको खजाना [कर] वसूल करने के लिए नियुक्त किया। उसने उस समय के चार लाख रुपये वसूल किये और सब हजम कर गया। सुबुद्धिराय को कुछ नहीं दिया। उसको कुछ-न-कुछ तो देना चाहिये था—आधा भी देता, तो कोई बात नहीं थी; लेकिन उसने सब हजम कर लिया।
सुबुद्धिराय ने उसको बुलाया और कहा— “अरे, तू बड़ा दुष्ट है! तुम्हारे ऊपर हमने विश्वास किया और समस्त खजाने का भार तुम्हारे ऊपर दे दिया। तो तुमने एक पैसा भी मुझको नहीं दिया? अकेले ही सब खा गया। अच्छा, देखो—तुमने अपराध किया है कि नहीं?”
[हुसैनशाह ने कहा—] “हुज़ूर, अपराध किया है।”
[सुबुद्धिराय ने कहा—] “ठीक है, इसका मैं दण्ड देता हूँ। इसके बाद ऐसा [मत करना।] कान पकड़ो कि मैं ऐसा नहीं करूँगा।” बस, उन्होंने कोड़े मँगाये—घोड़े वाला कोड़ा। आजकल वह कोड़ा दिखाई नहीं देता। और सटाक से एक कोड़ा यहाँ से नीचे तक ऐसा मारा कि एकदम खाल उठ गयी।
फिर सुबुद्धिराय ने कहा— “जाओ, छोड़ दिया। फिर से काम करना, किन्तु तुम्हारा जो चौथाई भाग है, वह ले लेना और तीन भाग हमें दे देना।” वह कान पकड़कर उनके सामने इस बात को स्वीकार करके चला गया।
कुछ दिनों के बाद [हुसैनशाह] यहाँ की नौकरी छोड़कर जो सुबुद्धिराय के ऊपर का बादशाह था, उसके पास चला गया। धीरे-धीरे उसके [यहाँ काम करते हुए उसने एक दिन] उसका वध कर दिया और स्वयं राजा बन बैठा—पूरे (whole) बङ्गाल का बादशाह बन गया।
अब सुबुद्धिराय उसके अधीन हो गये, न?
एक दिन हुसैनशाह बादशाह बड़े ठाठ के साथ स्नान कर रहा था। बेगम महारानी उसको स्नान करा रही थीं। हजारों दासियाँ उसके चारों ओर थीं। वे स्वर्ण के कलशों में जल भर-भरकर सुन्दर, सुशीतल जल से उसको स्नान करा रही थीं।
बेगमजी ने देखा [और कहा—] “अरे! तुम्हारी पीठ पर यह ऐसा दाग क्यों देख रही हूँ?”
[हुसैनशाह ने कहा—] “अरे, कोई बात नहीं, यह तो ऐसे ही हुआ है।”
[बेगम ने कहा—] “नहीं, आपको बतलाना पड़ेगा। क्यों हुआ?”
[हुसैनशाह ने कहा—] “अरे, ऐसे ही कोई रोग होता ही रहता है। कुछ हो गया था, ऐसे दाग आ गया।”
[बेगम ने कहा—] “आप यदि नहीं बतायेंगे तो मैं विष खाकर अभी मरूँगी।” उसने विष का डिब्बा उठा लिया और खाने चली।
यह बड़ी मुश्किल हो गयी। वह बतलाना नहीं चाहते थे। अन्त में उन्होंने कहा— “देखो, मैं जमींदार सुबुद्धिराय का गुमाश्ता (प्रतिनिधि) था। मैंने उनका जितना खजाना था, सब हड़प लिया और उनको नहीं दिया। उन्होंने मुझको बुलाकर थोड़ा-सा शासन किया और मुझे क्षमा कर दिया। उन्होंने एक कोड़ा मारा था—उसीका दाग यह है।”
[बेगम ने कहा—] “अच्छा! यदि उसके प्राण अभी, एक दिन के भीतर, तुरन्त बुलाकर हमारे सामने नहीं निकाल दिये, उसको फाँसी नहीं दे दी, तो देखो, मैं यह विष लेकर खा रही हूँ।”
अब यह बड़ी गड़बड़ हो गयी। उसने कहा— “भाई, मैं उसका प्राण नहीं ले सकता। तुम जितना भी करो। तुम मरना चाहती हो तो मर जाओ, किन्तु मैं उसके प्राण नहीं लूँगा।”
[बेगम ने कहा—] “[उससे] बदला तो [अवश्य ही] लेना है। [यदि उसके प्राण नहीं ले सकते,] तो एक काम कीजिये। अपने बधने (बधना एक प्रकार का धातु का पात्र या लोटा होता है, जिसमें पानी रखा जाता है। उस समय की मान्यता के अनुसार किसी मुसलमान के पात्र का पानी पीने या पिलाने से हिन्दू का धर्म भ्रष्ट हो जाता था।) का पानी पीकर उसको पिला दीजिये, जिससे उसका हिन्दू धर्म नष्ट हो जाये। वह मुसलमान होकर रहे, तब मैं मान सकती हूँ।”
[हुसैनशाह ने] कहा— “यह बात मैं मान सकता हूँ, किन्तु उसे जान से नहीं मार सकता। मैं उसका ऋणी हूँ।”
अन्त में उन्होंने सुबुद्धिराय को बुलाया। बुलाकर स्वयं बधने का पानी पिया और जबरदस्ती सुबुद्धिराय के मुख में दे दिया।
[फिर हुसैनशाह ने कहा—] “महाराज, मैं आपके प्राण नहीं ले रहा हूँ। आपको छोड़ देता हूँ। किन्तु आपको मुसलमान बनकर रहना होगा। हमारी बेगम की ऐसी ही इच्छा है।”
सुबुद्धिराय बड़ा दुःखी हुआ। [उसने सोचा—] “मर जाता तो अच्छा था। किन्तु आज इन्होंने जबरदस्ती मुझे पकड़कर मेरा धर्म नष्ट कर दिया।”
अब सुबुद्धिराय वहाँ से लौटकर अपनी राजधानी में आया और वहाँ से बनारस आया। बड़े-बड़े पण्डितों को बुलाया, हजारों पण्डितों और शास्त्रियों को बुलाया, बड़े-बड़े पगड़ीवाले लोगों को बुलाया, षड्वेदान्ताचार्यों को बुलाया। सबको बुलाकर उनसे पूछा— “महाराज! मैं हिन्दू था। मुझको बधने का पानी पिला दिया गया, इसलिये मैं मुसलमान हो गया। ऐसी कृपा करें कि मैं फिर हिन्दू होकर अपने प्रभु का स्मरण कर सकूँ।”
एक ने कहा— “एक बहुत सस्ता तरीका है। एक किलो घी को आग पर रखकर एकदम खौलता हुआ कर दो और उस खौलते हुए घी को तुम अपने मुख में [डाल लो।”] मतलब क्या? यदि खोलता हुआ घी कोई व्यक्ति पियेगा, तो मरेगा नहीं? [इसका अर्थ है कि अपने प्राण त्याग दो।]
दूसरे ने कहा— “एक दूसरा भी उपाय है। लोहे को आग में तपाकर एकदम तरल बना लो। जब वह तरल हो जायेगा, तो उसको अपने मुख में डाल लो। इससे तुम परम पवित्र हो जाओगे।”
वह मिथिला में गया। फिर दक्षिण प्रदेश में गया, जहाँ शंकराचार्यजी का स्थान है।
भक्त: श्रीरङ्गम
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीरङ्गम नहीं। हाँ, काञ्ची में गया। दक्षिण भारत में वहाँ बड़े-बड़े स्मार्त ब्राह्मण रहते हैं, बड़े-बड़े विद्वान। उनसे पूछा। उन्होंने कहा— “इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। इस जन्म में तुम्हारी शुद्धि नहीं हो सकती।”
उसी समय चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से लौटकर [कीर्तन करते हुए आ रहे हैं—]
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
वे भाव में विभोर हैं। आँखों से आँसुओं की धाराएँ बह रही है। कभी “कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण” कर रहे हैं। सनातन गोस्वामी वहाँ [काशी में महाप्रभुजी से] मिले थे। उसके पहले [प्रयाग में] रूप गोस्वामी [महाप्रभुजी से] मिले थे। सारी काशी महाप्रभुजी के दर्शन करने के लिए वहीं पर उमड़ पड़ी है। बड़ी भीड़ लगी हुई है। वह दो, चार, पाँच, छह दिन तक देखता रहा—“कैसे उनके पास जाऊँ?” किसी प्रकार से थोड़ा-सा समय पाकर वह झट महाप्रभुजी के चरणों में गया और उनके चरणों में गिर पड़ा।
[सुबुद्धिराय ने] कहा— “महाराज! मैं क्या करूँ? मैं मुसलमान हो गया। मैं क्या करूँ, मुझे कुछ पता नहीं। ये लोग कहते हैं कि घी गर्म करके या लोहा गर्म करके [अपने मुख में डाल] लो, तभी पवित्र होओगे। मैं क्या करूँ?”
महाप्रभुजी ने कहा— “ये पण्डित लोग बड़े-बड़े पण्डित हैं, किन्तु इन्होंने कभी भागवत नहीं पढ़ा। अजामिल का उपाख्यान नहीं पढ़ा।”
जो आपको अभी सुनाया न—नहीं सुनाया?
अरे! भगवान् का नाम ऐसा है कि भूत, भविष्य और वर्तमान में जितने भी पाप हैं—जितना पाप भूतकाल में किया, जो अभी हो रहा है और जो आगे होगा—भगवान् का एक नाम यदि संकेतपूर्वक भी कर दे, तो वे सब जलकर खाक हो जाते हैं। उसको अपने कर्मों का फल नहीं भोगना पड़ता। अजामिल को देखा, न? वाल्मीकि को देखा? कितने पाप किये थे! जगाइ-माधाइ ने कितने पाप किये थे! कहाँ एक क्षण में [भगवान् के नाम से सब पाप ध्वंस हो गये। अजामिल ने तो] अपने बेटे को [लक्ष्य करके] नाम लिया था, भगवान् के लिए नहीं। [तब भी विष्णुदूतों ने आकर उसकी यमदूतों से रक्षा की।] इसको कहते हैं—संकेत [नामाभास।]
“सांकेत्यं पारिहास्यं” [#1] —हँसते हुए, चिढ़ाते हुए भी यदि कोई [भगवान् का] नाम ले, [तब भी उसके पापों का नाश हो जाता है।]
जैसे हमारे गाँव में एक बूढ़ा था। गङ्गा नदी में स्नान करने जाता था। वह गोपजाति का था। लड़के उसको देखकर चिढ़ाते थे। वे “हरे कृष्ण, हरे कृष्ण” करते, “राम-राम” करते और [लड़को के चिढ़ाने पर] लठिया लेकर उनको मारने के लिए दौड़ता, उछलता-कूदता। कभी [उनकी ओर] लठिया भी फेंक देता। लड़के ताली बजाकर कहते— “राम-राम-राम-राम! महात्माजी, राम कहो, राम कहो!”
वह उतना ही बिगड़ता। किसलिये बिगड़ता? [वह बूढ़ा व्यक्ति सोचता था कि] अरे, ऐसे ही ये [लोग भगवान् का नाम] करें! [तो भी इनका मङ्गल होगा।]
इसीको कहते हैं—पारिहास्यं। हँसी-मजाक में भी यदि कोई भगवान् का नाम ले, [तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।]
कीर्तन करते समय ताल और स्वर को पूरा करने के लिए [कोई कह दे—] “राम हो, राम!” ऐसा भी कर दिया, तो यह ताल पूरा हो गया। गा रहा है कुछ और, और [भगवान् का नाम जोड़कर] इसको पूरा कर दिया। इस प्रकार भी भगवान् का कोई नाम ले ले, [तब भी उसका फल होता है।]
[किसीने] अपनी बछड़ी का नाम “राधे” रख दिया, अपने काले कुत्ते का नाम “श्यामसुन्दर” रख दिया। बस, इतने में ही हो गया। काम तमाम हो गया पाप का!
[किन्तु इसमें] बस, एक ही विचार है—वैष्णवों और भगवान् के चरणों में अपराध नहीं होना चाहिये। यदि साधु-सन्तों की निन्दा की, नाम की निन्दा की, भगवान् की निन्दा की, तो लाख बार भगवान् का नाम करेंगे, उसका वह फल नहीं होगा। और यदि अपराध न हो, तो इस प्रकार का किया हुआ भगवान् का नाम भी उसके पापों [को नष्ट कर देगा और] उसको जगत् से तार देगा।
अजामिल ने तो अपने बेटे के लिए “नारायण” कहा था, भगवान् के लिए नहीं। तब भी आयी हुई मृत्यु चली गयी। वह मरा नहीं। जब उसने नाम की महिमा सुनी, तो सोचा— “अरे! मैंने तो अपने पुत्र के लिए ‘नारायण’ कहा और यम के दूत लौटा दिये गये। विष्णुदूतों ने उनको मारकर भगा दिया। यदि मैं सचमुच भगवान् के लिए शुद्धनाम लूँ, तो न जाने क्या हो जायेगा!”
इस प्रकार [यम के दूतों से छूटकर] वह वहाँ से हरिद्वार गया। सांसारिक मोह-[ममता,] नाता सब छोड़कर, अब सचमुच देहाभिमान छोड़कर [उसने स्वीकार किया—] “मैं भगवान् का दास हूँ। कृष्ण ही हमारे प्रभु हैं।” और “नारायण, नारायण, नारायण, नारायण” नाम करने लगा। कुछ दिनों के बाद भगवान् के वही दूत लोग आये और आकर उसको सीधे वैकुण्ठ में ले गये। आप लोगों ने [यह सब] सुना।
ऐसे ही [नाम के सम्बन्ध में] आप चैतन्य महाप्रभु के जीवन-चरित्र में देखेंगे। यदि वे इस जगत् में नहीं आते, तो जगत् में भगवान् के नाम का इस प्रकार प्रचार नहीं होता। आज कलियुग अपनी प्रचण्ड स्थिति में होता।
लोग अपनी लड़कियों को भी बेच रहे हैं, उनको खाते हैं—एक तरह से [उनको बेचना] खाना ही हो जाता है। आज जितना चल रहा है, राजनीति तो देख ही रहे हैं न? कैसी राजनीति है! आज प्रजाएँ घर से भाग रही हैं, करों से मारे हुए हैं। रसोईघर पर कर, चोटी रखने पर भी कर, गले में माला रखने पर भी कर। ऐसा कोई वस्तु नहीं है, [जिस पर कर न हो।] जो ठाकुर की दी हुई हवा है, उस पर भी अब कर लगायेंगे। गैस पर तो लगा ही दिया है, पानी पर कर लग गया। ये पंखे चलायेंगे—ये हवा उनके बाप की है न? किसकी है? थोड़ा-सा एक पंखा लगा दिया और घूम रहा है, बस इसका भी उनको कर दो! कर के मारे सब लोग पिस जायेंगे।
अभी तो [कलियुग की] पहली सन्ध्या भी नहीं गयी। चार लाख बत्तीस हजार वर्षों में से केवल पाँच हजार वर्ष और कुछ वर्ष ही गये हैं। न जाने [आगे] क्या होगा! किन्तु चैतन्य महाप्रभु की यही विशेषता है कि आज [भगवान् के] नाम का जगत् में जैसे भी हो, चारों ओर उसका प्रचार हो रहा है।
आप लोग गले में [तुलसी की] माला पहनने में लज्जा-बोध करेंगे, करेंगी; तिलक नहीं लगायेंगे। [किन्तु] आज पाश्चात्य देशों के लोगों को देखिये—मछली, माँस और न जाने क्या-क्या खानेवाले वे लोग—सब सिर मुण्डनकर, स्त्री, पुरुष, बालक, बालिका, किशोर, किशोरी, गले में माला डालकर, हमारी भारतीय संस्कृति के कपड़े पहनकर—धोती, कुर्ता, साड़ी, ब्लाउज पहनकर—हमारी भारतीय संस्कृति को ग्रहण करके कैसे ठाठ से सिन्दूर भी लगाने लगे हैं और तिलक भी लगाने लगे हैं।
हम लोग तो न गले में माला डालेंगे, न कुछ करेंगे। अरे! [ये सब] नहीं [कर रहे,] तो भी हरिनाम करो। [किन्तु नहीं,] वे पहले दुर्गाजी का नाम, शंकरजी का नाम लेंगे। लो भाई, [किन्तु] गुरु के रूप में उनका [नाम] लो। इसमें कोई बात नहीं है—[उनका नाम] लो। आदर-सम्मान देते हुए [उनका नाम लो,] किन्तु कृष्ण ही हमारे आराध्यदेव हैं—[यह तो समझो।] अन्ततः उनके (पाश्चात्य देशों के भक्तों) जैसा तो बनो! हमारी प्राचीन संस्कृति को तो ग्रहण करो।
इसलिये आप लोगों को डरने की बात नहीं है। कोई भी आप लोगों का कुछ [बिगाड़] नहीं सकता, न कुछ दे देगा। अपनी भारतीय संस्कृति का पालन कीजिये। भगवान् का शुद्ध नाम [कीजिये।]
कृष्ण इस व्रजभूमि में आये। उन्होंने यहाँ क्या-क्या लीलाएँ कीं! ब्रह्मा और शंकर तक उनकी चरणधूलि को स्पर्श करने के लिए सब समय लालायित रहते हैं। आप लोग परम सौभाग्यवान हैं कि इस भूमि में पधारे हैं। यहाँ बिना पैसे ही साधु का सङ्ग हो रहा है। यहाँ पर जो हरिकथा हो रही है, यह पैसेवाली नहीं है। [किन्तु फिर भी यह हरिकथा लोगों का उस प्रकार ध्यान आकर्षित नहीं करती, जिस प्रकार] अभी जो कैमरा या टीबी–कैंसर (टेलीविजन) इत्यादि क्या-क्या आ गये हैं, ये लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। [परम सौभाग्य से] भगवान् ने हमें यहाँ बिना किसी मूल्य के कितना सुन्दर कैसेट [शुद्ध हरिकथा] दिया है, जो कभी नष्ट होनेवाला नहीं है, बिगड़नेवाला नहीं है। [आप इसका लाभ उठायें।]
इसलिये प्रेम के साथ [इस हरिकथा को] सुनो। [यहाँ जो कनक, कामिनी और प्रतिष्ठा की आशा रखनेवाले कपट-कथाकार] आयेंगे, [वे आपका अमूल्य] समय ले लेंगे, [किन्तु आपको कुछ नहीं दे सकेंगे; उल्टा] बर्बाद ही करेंगे। [वास्तव में उनकी उस आडम्बरपूर्ण कथा में किसीके पारमार्थिक कल्याण की कोई भावना नहीं होती। उसमें तो] एक प्रकार की प्रतिष्ठा की आशा ही भरी रहती है [कि जब हमारे आडम्बर से प्रभावित होकर बहुत-से लोग आयेंगे,] तो पीछे से हम दिखायेंगे कि हमारी कथा में कितने लोगों की भीड़ आयी थी। [इसप्रकार कथा को] प्रतिष्ठा के लिए बेच दिया जायेगा और लोगों का आकर्षण [सहजरूप से] उधर चला जायेगा।
हम लोग चाहते हैं कि हमारी इस कथा में आप लोगों का एक पैसे का भी खर्च न हो। बस तुलसी का पत्ता आप लोग ले आयेंगे, और हम लोगों को दे देंगे। हमारी कथा का आप लोग [बस प्रेमपूर्वक] श्रवण करें। हम अन्त में प्रणामी भी नहीं चाहते। जिस दिन कथा समाप्त होगी, एक-एक तुलसी का दल आप लोग ले आयेंगे और हमें दे देंगे। हम बस ऐसा चाहते हैं।
आजकल कथाओं का सार सब इसलिये नष्ट हो गया है [क्योंकि लोग कथाओं के नाम पर अपना व्यापार कर रहे हैं।] आप लोग [हमारी कथाओं के तत्त्वों] को ग्रहण करें। अभी बतलाया न—जो पुण्य से नहीं होगा, तपस्या से नहीं होगा, जो काम और सब साधनों से नहीं होगा, भगवान् के एक नाम से वह सब कुछ हो जायेगा।
एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्।
योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (2.1.11)
[हे राजन्! जो इस संसार से विरक्त होकर ऐकान्तिक-भक्ति कर रहे हैं, जिनकी स्वर्ग अथवा मोक्षादि की कामना है और जो आत्माराम योगी पुरुष हैं, उन सभी के लिए श्रीहरि के नाम और गुणों का पुनः-पुनः श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही परम साधन और साध्य के रूप में पूर्व-पूर्व आचार्यों द्वारा निर्णीत हुआ है।] GVP
इस जगत् में जो कोई कामना रखते हैं, जो कोई कामना नहीं रखते, जो एकान्तिक भक्तिवाले हैं या जो समस्त प्रकार की कामनाओं से भरे पड़े हैं—सब लोगों के लिए बस कलियुग में एक ही उपाय है—कलियुग केवल नामाधारा। [#2]
इसलिये आप लोग इन शिक्षाओं को ग्रहण करें। इसीका नाम भागवत-[श्रवण] है, भागवत-[श्रवण] और दूसरा कुछ नहीं है। इसलिये आप लोग बड़े प्रेम के साथ नाम की महिमा समझकर [आज से ही नाम करें।] जो नाम नहीं करते हैं, वे आज से ही [इस नाम को ग्रहण कीजिये]—
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
[यह नाम] भवसागर से तारनेवाला और कृष्ण-प्रेम को देनेवाला है। इसे बड़े प्रेम के साथ ग्रहण कीजिये। और यदि कोई शुद्ध गुरु मिल जायेगा, तो उनसे यह हरिनाम शुद्ध ब्रह्म, शब्द-ब्रह्म, नाम-ब्रह्म के रूप में ग्रहण करके करें, तो अतिशीघ्र फल [प्राप्त] होगा।
कोई संसार की कामना-वासना न रखें और भगवान् के प्रेम के लिए रोते-रोते, आँसुओं के साथ भगवान् का नाम ग्रहण करें। [ऐसा करते हुए] देखेंगे कि कुछ ही दिनों में आपका हृदय कैसे एकदम बदल जाता है। कलियुग कहाँ भाग जायेगा, पाप और अपराध सब कहाँ भाग जायेंगे— [आपको इसका आभास भी नहीं होगा कि यह सब कैसे हो गया;] आप लोगों का जीवन कृतार्थ हो जायेगा।
गौर प्रेमानन्दे! हरि हरिबोल!
[हरिकथा में अचानक कटौती…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …भगवान् केनाम की इतनी महिमा है कि स्वयं कृष्ण और राम भी नाम की महिमा नहीं कह सकते।
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।
करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
-रामचरितमानस बालकाण्ड
[भगवान् के नाम का जप करने से संसाररूपी भवसागर को पार करना अत्यन्त सरल हो जाता है। हे सज्जनो! इस विषय पर अपने मन में विचार करके देखो।]
उल्टा नाम जपत जग जाना।
वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना॥
-रामचरितमानस बालकाण्ड
[यह संसार जानता है कि उल्टा नाम जपते हुए भी वाल्मीकिजी ब्रह्म के समान हो गये।]
उल्टा नाम…
[हरिकथा में अचानक कटौती…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …जिस समय देवता, मनुष्य और असुर—तीनों ही [आपस में] झगड़ने लगे कि जिसके पास [वाल्मीकि रामायण के] ये श्लोक रहेंगे, वह तो भवसागर से अनायास ही तर जायेगा। इसलिये [सभी कहने लगे—] “सारे श्लोक हमें दे दिये जायें।”
देवता भी कहने लगे, मनुष्य भी कहने लगे और असुर भी [कहने लगे। इस प्रकार तीनों] आपस में झगड़ने लगे। [अन्त में] तीनों शंकरजी के पास गये और बोले—“महाराजजी! हम लोगों में झगड़ा हो रहा है। [आप ही इसका कोई समाधान कीजिये और हमें] शान्त कीजिये।”
शंकरजी ने कहा—“ठीक है, मैं इन श्लोकों के तीन भाग करके तीनों को बाँट देता हूँ।”
शंकरजी वहाँ आकर बैठ गये और उन लोगों को भी बैठा लिया। उन्होंने 33 लाख-33 लाख-33 लाख श्लोक तीनों में बाँट दिये। इसके बाद एक लाख श्लोक बच गये। फिर उन एक लाख श्लोकों में से 33,000-33,000-33,000 श्लोक [तीनों को बाँट दिये।] फिर भी 1,000 श्लोक बच गये।
अब उन्होंने क्या किया? [उन 1,000 श्लोकों के भी] तीन भाग कर दिये। कितना हुआ? 333, 333 और 333 [श्लोक बाँट दिये।] फिर भी एक श्लोक बच गया।
अब जब एक श्लोक बच गया, तो उन्होंने [सोचा कि] एक श्लोक के चार चरण होते हैं। इसलिये तीनों को एक-एक चरण बाँट दिया और एक चरण फिर भी बच गया। एक चरण में आठ अक्षर होते हैं। इसलिये उन्होंने [उस बचे हुए चरण के भी अक्षर बाँटने शुरू किये। तीनों को] दो-दो अक्षर दे दिये—इस प्रकार कुल छह [अक्षर बाँट दिये गये।] अब कितने बच गये?
भक्त: दो [अक्षर बच गये।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तब उन्होंने कहा— “अब [ये दो अक्षर] मैं किसीको नहीं दूँगा। मैंने [इन श्लोकों को बाँटने में] बहुत परिश्रम किया है, इसलिये [ये दो अक्षर मैं] अपने लिए रखता हूँ।”
और वे दो अक्षर थे—‘राम’।
इसलिये समझिये कि समस्त वेद, शास्त्र, उपनिषद् आदि जितने भी [ग्रन्थ] हैं, उन सबका सार कृष्ण-नाम और राम-नाम ही है। जिसने [भगवान् का] नाम ले लिया, [समझो] उसने वेद-शास्त्र पढ़ लिए। और जिसने [भगवान् का] नाम नहीं लिया, उसका भागवत, रामायण, पुराण, वेद-वेदान्त पढ़ना और ब्रह्मज्ञान आदि [प्राप्त] करना—सब व्यर्थ है।
रामचन्द्रजी रावण को मारने के लिए लंका [जाने] के लिए सेतु बना रहे हैं। नल-नील पत्थरों को राम नाम से स्पर्श कर रहे हैं, अंकित नहीं कर रहे हैं। बस स्पर्श कर दिया और [वे पत्थर समुद्र में] तैरने लगे। सेतु लगभग बन चुका है, थोड़ा-सा ही बाकी रह गया।
इतने में रामचन्द्रजी ने सोचा— “अरे! ये लोग मेरा नाम लेकर पर्वत [और पत्थरों को समुद्र में] तैराते हैं। मैं स्वयं ही एक पत्थर लेकर तार दूँ तो!”
[ऐसा सोचकर रामचन्द्रजी] एक झाड़ी के पीछे छिप गये, एक पत्थर उठाया और समुद्र में फेंक दिया। किन्तु वह [पत्थर समुद्र में] डूब गया। [उसी समय] हनुमानजी रामचन्द्रजी को ढूँढ़ते हुए वहाँ [पहुँच गये। उन्होंने पूछा—] “अरे प्रभु! आप यहाँ क्या कर रहे हैं?”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “तुम्हें कोई दूसरा काम नहीं है? [सब समय] मेरे पीछे-पीछे लगे रहते हो!”
हनुमानजी ने कहा—“प्रभु! आपके बिना तो मैं जीवित ही नहीं रह सकता। आप यहाँ छिपकर क्यों चले आये? बताइये, क्या बात है?”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “यह बात तुम्हें बताने की नहीं है।”
[हनुमानजी ने कहा—] “नहीं, फिर भी बतलाइये।”
[रामचन्द्रजी ने कहा—] “अरे! तुम लोग मेरा नाम लेकर पत्थरों को समुद्र में डालते हो, तो वे पत्थर समुद्र के पानी में तैरने लगते हैं। [मैंने सोचा कि मैं भी एक पत्थर उठाकर समुद्र में डालूँ।] मैंने एक पत्थर उठाया और परीक्षा के लिए पानी में छोड़ दिया, किन्तु वह तो डूब गया।”
[हनुमानजी ने कहा—] “प्रभु! इसमें [चिन्ता की] क्या बात है?”
[रामचन्द्रजी ने कहा— “चिन्ता की] बात [क्यों] नहीं है? [इससे मेरी] कितनी कुख्याति [हो जायेगी!”]
[तब हनुमानजी ने कहा—] “प्रभु! हम लोग आपका नाम लेकर तो भवसागर पर भी तैर जाते हैं। यह तो केवल समुद्र है। किन्तु जिसे आप अपने हाथों से छोड़ देंगे, वह तो डूबेगा ही!”
इस वस्तु को समझिये। इसलिये भगवान् के नाम की कितनी महिमा है! इसलिये सभी लोग [भगवान् के नाम का आश्रय ग्रहण करेंगे।] किन्तु कलियुग का बस एक ही नाम है और वह महामन्त्र कहलाता है—
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
इस नाम का आप सभी लोग प्रतिदिन सेवन करें। जीवमात्र का, प्राणीमात्र का इसमें अधिकार है। किन्तु यदि अनाचार और अभिचार करने वाले—[अर्थात् किसीको हानि पहुँचाने के लिए तन्त्र-मन्त्र आदि का अनुष्ठान करनेवाले लोगों से दूर रहकर यदि भगवान् के नाम का सेवन करेंगे, तभी इस नाम का वास्तविक फल प्राप्त होगा।] और यदि सफेद आलू [घटिया आलू जो] बाजार में सस्ते मिल रहे हैं, [उनसे आकर्षित होकर उनको लेने चले गये तो वास्तविक वस्तु से वञ्चित रह जायेंगे। अभिप्राय यह है कि यदि बाहरी चमक-दमकवाले उन कपट कथाकार] लोगों से दूर रहें और [शुद्ध-भक्तों के सङ्ग में] भगवान् का नाम करें, तो अवश्य ही सुफल [प्राप्त] होगा।
जैसे—आग जानकर या अनजान में छूने से जलायेगी ही। पानी जानकर छुओ या अनजान में छुओ, भिगायेगा ही। औषधि जानकर खाओ या बिना जाने खाओ, अपना काम करेगी ही। तो क्या भगवान् का चिन्मय नाम काम नहीं करेगा? अवश्य करेगा— ऐसा विश्वास लेकर आप सभी लोग भगवान् का नाम करें।
विशेष करके जो चित्रकेतु महाराज का उपाख्यान है, इसका सार मैं कल थोड़े-से शब्दों में बतलाऊँगा। आज यहीं पर समाप्त होता है।
कल किनकी कथा होगी?
भक्त: प्रह्लाद महाराज
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: प्रह्लाद महाराजजी का उपाख्यान होगा। बहुत ध्यान से सुनेंगे। हमारे परमगुरुजी प्रभुपादजी ने 108 बार इस कथा का श्रवण किया। और यदि भक्ति करने की लालसा है, तो प्रह्लाद महाराजजी जैसा चरित्र बने। ऐसा सहिष्णु बने। भगवान् के नाम में विश्वास हो, श्रद्धा हो। यदि भक्तों का एकमात्र कोई आदर्श उदाहरण है, तो किसका है? प्रह्लाद महाराजजी का है।
इनका कल उपाख्यान सुनाया जायेगा। नृसिंह भगवान् का कल आविर्भाव होगा। ये सब कथाएँ होंगी।
सुरेशचन्द्रजी, अभी शीघ्र एक कीर्तन कीजिये।
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
सांकेत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.2.14)
[शास्त्रतत्त्वविद् महात्मा जानते हैं कि चाहे (पुत्रादि) अन्य वस्तुओं को लक्ष्य करके हो, किसीका उपहास करने के छल से हो, गीत-आलाप पूर्ण करने के लिए हो अथवा अश्रद्धा से ही क्यों न हो, वैकुण्ठ-वस्तु भगवान् का नाम लेने से सम्पूर्ण पापों का विनाश हो जाता है।] GVP
#2
कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा॥
-रामचरितमानस उत्तरकाण्ड
कलियुग में केवल भगवान् का नाम ही सहारा है, जिसका जप करनेमात्र से मनुष्य भवसागर से पार उतर जाता है।
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