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Srimad Bhagavatam Series- #13- Story of King Citraketu

38:20
#1864
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Citraketu Maharaja's pastimes.
  • Explanation of 1st sloka of Vritrasura stuti with examples.
  • Never ask anything in bhakti.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 13 : चित्रकेतु महाराज का उपाख्यान

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 1 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवान्, गुरु और गौराङ्ग की अशेष कृपा से हम लोगों का भागवत तीन दिनों तक निर्विघ्न और सुष्ठु रूप से सम्पन्न हुआ। आज चतुर्थ दिवस है। कल हम लोगों ने अजामिल-उपाख्यान, हरिनाम की महिमा तथा चित्रकेतु महाराज की कथा [का श्रवण किया।]

चित्रकेतु महाराज की कथा के दो खण्ड किये जा सकते हैं। [प्रथम खण्ड में] उनका पूर्व जीवन [आता है]—चित्रकेतु महाराज पुत्र न होने के कारण [अत्यन्त] दुःखी थे। जब पुत्र उत्पन्न हुआ और पाँच वर्ष की अवस्था में उस सुन्दर एवं सुकान्‍त बालक को विष दे दिया गया, तब वे विरह में अत्यन्त कातर हो गये और रोने लगे। तब उनकी समझ में आया कि पुत्र नहीं होता तो ही अच्छा था। शेष जो [मोह] रहा, उसे अङ्गिरा ऋषि और नारदजी ने आकर दूर कर दिया। पुत्र का मोह सदा के लिए छूट गया।

फिर नारदजी की कृपा से चित्रकेतु महाराज ने बलदेवजी अर्थात् संकर्षण को अपना उपास्य माना और शंकरजी के गुरुभ्राता बने। चित्रकेतु महाराज शंकरजी के गुरुभाई हैं। शंकरजी भी राम के उपासक हैं और ये भी राम के उपासक हैं।

दूसरा खण्ड— वे वृत्रासुर के रूप में आये। [उस समय] उन्होंने भगवान् की कैसी सुन्दर-सुन्दर स्तुतियाँ कीं, जो दूसरों के लिए असम्भव हैं। इसलिये जब श्रीमद्भागवत का परिचय दिया गया अथवा लक्षण बताया गया, [तब कहा गया कि] जिसमें वृत्रासुर का उपाख्यान वर्णित हो, वही श्रीमद्भागवत है। दूसरी जगह में इसका वर्णन नहीं किया गया। तो इसका कुछ कारण रहा होगा; ऐसे ही नहीं लिख दिया। वह कारण उनकी स्तुतियों से समझा जा सकता है।

यदि भीष्म पितामह को [देखें तो] उन्होंने कृष्ण के साथ युद्ध करते हुए अपने बाणों से उनके हृदय को छलनी अर्थात् चालनी कर दिया। कृष्ण के अङ्गों से रक्त टपकने लगा। किन्तु भीष्म पितामह जैसे ज्ञानी-भक्त ने उस [दृश्य] को किस रूप में लिया? उसे किस रूप में [ग्रहण किया?] हमारे श्रील चक्रवर्ती ठाकुर आदि [आचार्यों ने उस भाव को अत्यन्त सुन्दर ढंग से] व्यक्त किया है।

अच्छा, ये जो भीष्म पितामहजी थे, उन्हें कृष्ण की बाल्य-लीलाओं का ज्ञान था या नहीं था? उन्हें किसीने कहा होगा या नहीं। कृष्ण की बाल्यलीला से आरम्भ कर रासलीला तक [उन्होंने ये लीलाएँ सुनी होंगी या नहीं?] यदि हम लोगों को कृष्ण की बाल्य-लीलाएँ, रासलीला, गोपियों के साथ उनके परस्पर अनुराग, प्रेम और प्रणय [की कथाएँ सुनने का] इतना सुयोग प्राप्त है, और [उन्हें सुनकर] हम लोगों को भी थोड़ा-थोड़ा सा लोभ हो सकता है—हो या न हो, वह दूसरी बात है—तो भीष्म पितामह को लोभ हुआ होगा या नहीं? [और यदि] लोभ न भी हुआ हो, [तो उन्होंने ये लीलाएँ] सुनी तो होंगी?

ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जिसे कृष्ण की रासलीला इत्यादि इन सब कथाओं को सुनकर, गोपियों और गोपों के साथ उनके प्रेम की बातों को सुनकर अच्छा न लगे? यह तो जगत् के लोगों के लिए स्वाभाविक [आकर्षण] है। बल्कि ऐसा भी कहा गया है— “स्वयोगमायाबलं दर्शयता गृहीतम्” [#1] कृष्ण ने ऐसी मनोरम लीलाएँ कीं, जो जगत् के लोगों के अनुकूल हों।

जगत् तो रूप, रस, गन्ध और स्पर्श में ही व्यस्त रहता है; उसी में तो [रमा] रहता है। [इसलिये जगत् के उन लौकिक अनुभवों से] कुछ समता होने के कारण कृष्ण की वे लीलाएँ लोगों को बड़ी प्यारी कथाएँ लगती हैं।

तो क्या भीष्म पितामहजी को यह [ज्ञात] नहीं होगा कि कृष्ण के साथ में गोपियों का पूर्वानुराग था, कृष्ण ने उनके कपड़े चुरा लिए थे, उनके मन को कृष्ण ने रङ्ग दिया था, उनके साथ रास इत्यादि [लीलाएँ] कीं, उनके घर्म-बिन्दुओं को पोंछा, [गोपियों ने प्रेमावेश में] कृष्ण का मुख भी नोंच दिया होगा? क्या यह सब उनको पता नहीं था? इसलिये उसके साथ में तुलना दे करके श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी ने भीष्म पितामहजी के मन के भावों को जगत् के सामने व्यक्त कर दिया। हमारे सनातन गोस्वामीजी ने भी [उन भावों को] व्यक्त किया। अन्यथा ये सब [गूढ़] अर्थ प्रकाशित नहीं होते।

चित्रकेतु महाराजजी जब राजा थे, तब उनकी आयु हजारों-लाखों वर्षों की थी। और जब वे मुक्त हो गये तथा शंकरजी से उनका बन्धुत्व हो गया, तब वे उनके सखा बन गये और उनके साथ समान स्तर (parallel line) पर बैठने-उठने लगे। शंकरजी उनका [अत्यन्त] सम्मान करते थे।

जब पार्वतीजी ने चित्रकेतु महाराजजी को अभिसम्पात दिया, तब शंकरजी ने कहा— “अरी सुश्रोणि! अपने रूप के अभिमान में मत्त होकर तुमने इन महापुरुष को नहीं पहचाना? इनको तो तुमने अभिसम्पात दे दिया, [किन्‍तु देखो,] इनके मुख पर तो मुस्कुराहट नाच रही है। यदि ये चाहते, तो कहते— “नहीं, यह अभिसम्पात तुम्हीं को लौट जाये।” लौट जाता या नहीं? या कह देते— “जाओ, तुम भी पाषाणी हो जाओ” अथवा “आसुरी योनि में चली जाओ।” तो क्या होता? निश्चय ही [आसुरी योनि में] चली जातीं। ऐसे वे महात्मा थे।

किन्तु उन्होंने [केवल इतना] कहा— एवमस्तु। स्वर्ग और नरक—सर्वत्र मेरे लिए बराबर हैं। मुझे तो केवल भगवान् की कथा चाहिये, भगवान् की लीलाओं की स्फूर्ति होती रहे—बस मुझे यही चाहिये। [जो हुआ,] ठीक [ही हुआ।] इससे लोगों को शिक्षा भी मिलनी चाहिये कि साधु-सन्तों के प्रति कभी उदण्डता न करें, किसी की निन्दा न करें, और विषयी लोगों की प्रशंसा भी न करें। ये सब हम लोगों का आदर्श होना चाहिये।

यद्यपि चित्रकेतु महाराजजी मुक्त-पुरुष हैं, किन्तु मुक्त-पुरुष होकर भी उन्होंने जो अभिसम्पात ग्रहण करने की लीला दिखायी, वह जीवों की शिक्षा के लिए थी। कभी ऐसा मत समझना कि उनका पतन हुआ या उन्होंने शंकरजी के चरणों में कोई अपराध किया।

यदि ऐसा मान लेंगे, तो फिर गोपियों ने भी कृष्ण के चरणों में अवश्य अपराध किया। [गोपियाँ कृष्ण] को चोर कह रही हैं, चित्रकेतु महाराजजी ने [शिवजी को] चोर तो नहीं कहा। गोपियों ने कृष्ण को लम्पट, लबार, धूर्त कहा। इन सब शब्दों का प्रयोग तो चित्रकेतु महाराजजी ने नहीं किया, किन्तु गोपियों ने सब कहा। यहाँ तक कि यशोदाजी ने कृष्ण के हाथ बाँध दिये [और कहा—] “चोर! घर-घर में चोरी करता है।” गोपियों ने [तो कृष्ण से यहाँ तक] कहा— “अच्छा देखो, तुमने जो ये दोष किये हैं, [उनका प्रायश्चित्त यही है कि तुम] हमारे चरणों की पूजा करो। हमारे चरणों को अपने सिर पर रखो, तो तुम्हारे सब दोष दूर हो जायेंगे।” और कृष्ण ने सचमुच उनके चरणों को [अपने सिर पर धारण किया।]

तो बतलाओ, कृष्ण के प्रति इस अपराध से तो गोपियाँ मरेंगी; उनको तो नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा। किन्तु [हुआ क्या?] कृष्ण ने उन्‍हें नरक में [नहीं, बल्कि] अपने हृदय में स्थान दे दिया और फिर कभी उन्हें [वहाँ से] बाहर नहीं किया। [कृष्ण] ब्रह्मा की स्तुतियों की तो उपेक्षा करते हैं, और [उनकी ओर] देखते भी नहीं; किन्तु गोपियों की ऐसी सब उल्टी-[सीधी,] टेढ़ी-तिरछी बातें सुनने के लिए वे सब समय लालायित रहते हैं। [उनके प्रति] इतना प्रेम है।

तो [क्या] चित्रकेतु महाराजजी को शंकरजी की सभा में, नारद ऋषि तथा [अन्य महापुरुषों] के सङ्ग में इन बातों को सुनने का कभी सुयोग नहीं मिला होगा? उसके बाद तो वे असुर बने हैं। तो क्या असुर बनने पर उन महापुरुष का हृदय भी असुर हो गया होगा? [नहीं।] वह [अभिसम्पात] तो उन्होंने केवल इसलिये ग्रहण किया कि जगत् के लोग उससे सीखें कि इन्द्र के लिए जो [देवयोनि में भी] सम्भव नहीं है, [वह भक्तों के लिए असुरयोनि में भी सम्भव है।] इन्द्र ने कभी भी भगवान् की भक्ति नहीं माँगी। [उन्‍होंने सदैव भगवान् से यही माँगा—] “प्रभु! आप प्रसन्न हों। आप हमारे राज्य की रक्षा करें।” बस इतना ही कहा। उनके चरणों में ऐसी प्रेमाभक्ति [नहीं माँगी कि— “मैं व्रज में कुछ हो जाऊँ।” ऐसी कोई भक्ति नहीं माँगी।

इसलिये चित्रकेतु महाराजजी (वृत्रासुर) जो स्तव कर रहे हैं, उसे देखनेमात्र से ही ऐसा प्रतीत होता है कि वे कोई साधारण [पुरुष] नहीं हैं। बल्कि उनका लक्ष्य क्या है? [उन्होंने प्रत्यक्षरूप से] नाम नहीं लिया। जैसे श्रीमद्भागवत में राधिकाजी का नाम [प्रत्यक्षरूप से] नहीं आया है, उसी प्रकार उन्होंने भी नाम नहीं लिया, किन्तु [उनके हृदय] में जो कुछ [भाव] था, वह सब इन चार श्लोकों में व्यक्त कर दिया। ये चारों श्लोक श्रीमद्भागवतम् के देदीप्यमान प्रदीप के समान हैं। जो समझेगा, वही समझेगा; [और जो] नहीं समझेगा, तो वह दुर्भागा है। पहले श्लोक में क्या कहा?

अहं हरे तव पादैकमूल—
दासानुदासो भवितास्मि भूयः।
मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते
गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.11.24)

[वृत्रासुर ध्यान में आविर्भूत भगवान् को देखकर प्रार्थना करने लगा— “हे हरे! जो आपके चरणकमलों के आश्रय में रहते हैं, क्या मैं पुन: आपके उन दासों का अनुदास बन सकूँगा, हे प्राणपति! जिससे मेरा मन सदैव आपके गुणों का स्मरण करता रहे, वाणी सदैव आपके गुणों का गान करती रहे और शरीर आपकी सेवा में सदा-सर्वदा नियुक्त रहे।”] GVP

पहले ही श्लोक में उन्होंने बहुत सुन्दर [भाव व्यक्त किया]—“तव पादैकमूल”— भगवान् को बिना साधुसङ्ग के प्राप्त [नहीं किया जा सकता।] और उनमें भी उत्तम महाभागवतों की कृपा के बिना भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती, नहीं हो सकती और नहीं हो सकती। इस बात को [भलीभाँति] समझो।

सुग्रीव इत्यादि को भगवान् हनुमानजी की कृपा से मिले। प्रह्लाद और ध्रुव को भगवान् किसके द्वारा मिले? नारदजी जैसे महाभागवत की कृपा से। भक्तों की कृपा के बिना आज तक किसी ने भगवान् को नहीं पाया, और न कभी पायेगा। ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है। यहाँ तक कि खग, मृग, जटायु, गिद्ध, अजामिल और दुराचारी वाल्मीकि जैसे लोगों ने [भी भगवान् को] कैसे पाया? नारदजी की कृपा से, या अन्य भक्तों की कृपा से। किसी ने हनुमानजी की कृपा से श्रीराम को पाया। इसलिये बिना भगवद्‍-[भक्तों की] कृपा के [भगवान् की प्राप्ति नहीं हो सकती।]

इसीलिये [वृत्रासुर] कहते हैं—“अहं हरे तव पादैकमूलदासानुदासो भवितास्मि भूयः” अर्थात्, कोटि-कोटि जन्मों तक, जब तक मेरा जन्म होता रहे, मैं पुन: पुन: आपके चरणकमलों के दासों के भी दासों का अनुदास बन सकूँ। मैं उनके चरणों की धूलि बन सकूँ और उनके आनुगत्य में मेरी वाणी सब समय आपके गुणों का अनुवाद (कीर्तन) करती रहे, मेरा हृदय और मन निरन्तर आपकी उन्हीं प्रेममयी लीलाओं का स्मरण करते रहें। और मेरा शरीर (काय) क्या करे? भगवान् की जिन लीलाओं का मेरा मन स्मरण कर रहा है और जिनका मेरी वाणी कीर्तन कर रही है, उन्हीं लीलाओं के अनुसार मैं आपकी सेवा कर सकूँ।

और बाकी क्या रह गया? तन, मन और वचन—जीव के पास यही तीन तो हैं। इसलिये मैं इन तीनों को आपकी सेवा में लगा सकूँ; इसके अतिरिक्त मैं कुछ भी नहीं चाहता।

प्रभु ने देखा— “यह तो हमारी बड़ी सुन्दर स्तव-स्तुति कर रहा है।” बस झट उसी समय [भगवान्] युद्धभूमि में [प्रकट हो गये।] वे इन्द्र को नहीं दिखाई दिये, किन्‍तु उन्‍होंने वृत्रासुर को दर्शन दिया और कहा— “वरं ब्रूहि! वरं ब्रूहि! वरं ब्रूहि! जो कुछ तुमको माँगना है, माँग लो।”

उन्‍होंने कहा— “अच्छा!”

[भगवान् ने कहा—] “पृथ्वी का एकछत्र राज्य ले लो। इन्द्रपद भी तुम्हें दे देता हूँ।”

[उन्होंने कहा—] “नहीं लूँगा।”

[भगवान् ने कहा—] “अच्छा, ब्रह्मपदवी दे देता हूँ। विश्व की सृष्टि और संहार का कार्य तुम्हारे अधीन रहेगा। तुम्हारे चार मुख हो जायेंगे और तुम सबके पितामह बन जाओगे। [तुम्हारा] विराट ऐश्वर्य हो जायेगा।”

[उन्होंने कहा— “नहीं, मुझे नहीं चाहिये।”]

[भगवान् ने कहा—] “अच्छा, एक बात करो। संसार में सबसे दुर्लभ वस्तु मुक्ति है—आवागमन को पार कर जाना। [वह मुक्ति तुम्हें प्रदान करता हूँ।”]

[उन्होंने कहा—] “ प्रभु! वह तो [मेरे लिए] नरक के समान है। मुझे वह भी नहीं चाहिये।”

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
समञ्जस त्वा विरहय्य कांक्षे॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.11.25)

[हे सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपकी सेवा त्यागकर ध्रुवलोक, ब्रह्मलोक, पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य एवं अणिमादि अष्टयोग-सिद्धियाँ, यहाँ तक कि मोक्ष भी प्राप्त नहीं करना चाहता। आपके विरह में मेरे प्राण रह भी जायें, तो ये सब मुझे क्या सुख प्रदान करेंगे।] GVP

“विरहय्य कांक्षे” — अर्थात् मैं आपकी सेवा को छोड़कर [और कुछ भी नहीं चाहता।] विरह माने सेवा। मैं अपने अङ्गों के द्वारा आपकी सेवा छोड़ करके, आपके भक्तों की सेवा छोड़ करके, हृदय और मन के द्वारा आपकी लीला-कथाओं का चिन्तन करना छोड़ करके और वाणी के द्वारा आपका गुणानुवाद छोड़ करके दूसरा कुछ भी [नहीं चाहता।] यह ‘विरहय्य कांक्षे' का तात्पर्य है।

[मैं इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहता]—न स्वर्ग, न ब्रह्मपद, न इन्द्रपद, न रसातल का वह पद, जहाँ बलि महाराज बड़े आनन्द के साथ वामनदेव की पूजा करते हैं; उसकी भी मुझे लालसा नहीं है। और क्या? और से इत्यादि समझ लो। वैकुण्ठ की भी [मुझे इच्छा] नहीं है। मुक्त-प्रग्रह-वृत्ति से और ऊपर चले जाओ, उनकी भी मुझे कोई आवश्यकता नहीं है।

[भगवान् ने कहा— “तो फिर] क्या चाहते हो? स्पष्टरूप से बोलो।”

[वृत्रासुर ने कहा—] “प्रभु! मैं यह चाहता हूँ कि मैंने आपसे पहले जो तीन वर माँगे थे—तन, मन और वचन [के द्वारा आपकी सेवा—वही मुझे प्राप्त हो।] अब मैं आपको बतलाता हूँ कि तन से, मन से और वचन से मैं कैसे आपकी सेवा कर सकूँ। सबसे पहले मन से कैसे आपकी सेवा करूँ? कैसे सब समय आपका स्मरण करता रहूँ?”

इसके लिए बतला रहे हैं। क्या?

भक्त: अजातपक्षा

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:

अजातपक्षा इव मातरं खगाः
स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोऽरविन्‍दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.11.26)

हे कमललोचन! जिनके अभी पंख भी उत्पन्न नहीं हुए हैं, ऐसे पक्षी-शावक जिस प्रकार अपनी माता के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं; जैसे रस्सियों से बँधे छोटे-छोटे बछड़े भूख से पीड़ित होनेपर गाय के दुहे जाने की प्रतीक्षा करते हैं और जैसे वियोगिनी प्रियतमा अपने प्रवासी प्रियतम के दर्शन के लिए उत्कण्ठित रहती है, उसी प्रकार मेरा मन भी आपके दर्शन के लिए व्यग्र हो रहा है। (GVP)

“अजातपक्षा इव मातरं खगाः”— चिड़िया (पक्षी) होती है, जिसके अभी डैने (पंख) नहीं उगे हैं, [अर्थात् बहुत ही छोटा है।] अभी-अभी अण्डे से निकले हैं। चार-पाँच [बच्चे] एक साथ [उत्पन्न हुए हैं, घोंसले] में बैठे हैं। आँखें अभी थोड़ी-थोड़ी निकली है, डैने अभी नहीं निकले। कुलबुल-कुलबुल कर रहे हैं। मैया दाना चुगने के लिए चली गयी। जहाँ कहीं कीड़े-मकोड़े आदि मिलेंगे, उन्हें अपनी चोंच से रगड़कर मुलायम करके उसे लम्बा-चौड़ा कर देगी [और बच्चों के लिए ले आयेगी।] जब वह आयेगी, तो बच्चे ऐसे-ऐसे फुदकने लगेंगे। अभी उनके पँख तो निकले नहीं हैं, इसलिये फुदकने लगेंगे।

अब जब वही [चिड़िया] दाना चुगने और [बच्चों के लिए आहार] लाने के लिए बाहर चली गयी, तब बच्चे [सोच रहे हैं—] “मैया कहाँ गयी? मैया कहाँ गयी?” उन्‍हें [बिल्कुल] शान्ति नहीं है, वे मैया की चिन्ता कर रहे हैं। किसलिये? सबसे पहले तो उन्‍हें यह भय है कि कहीं उल्लू [आकर उन्‍हें] खा न जाये, कौए आ करके उन्हें खा न जाये या कोई शिकारी उन्हें पकड़ न ले। प्रत्येक मनुष्य को यह भय लगा हुआ है। जीवमात्र को यह भय लगा है। विशेषकर मृत्यु से सबको भय है। इसलिये उन्‍हें भय है— “मैया तो चली गयी। अभी [कहीं] उल्लू, बाज या दूसरे पक्षी जो हमारी टोह में रहते हैं, [आकर हमें न खा जायें।”]

ये जो बादुर (चमगादड़) होते हैं न, ये भी बड़े तेज होते हैं। फिर बाज होते हैं, उल्लू होते हैं, ये रात में चले जायेंगे और जब पक्षी सोये रहेंगे, तब उन्‍हें पकड़ करके खा जायेंगे। इसलिये उन [बच्चों] को भय है। इसलिये [बच्चों को यही चिन्ता रहती है कि] मैया शीघ्र लौट आये। पत्ता भी खड़-खड़ [करता है तो वे चौंककर देखने लगते हैं—] “मैया आयी, मैया आयी!” कोई शब्द सुना, [तो समझते हैं कि] मैया आ गयी। [इस प्रकार वे अपनी] मैया के चिन्तन में तन्मय रहते हैं। और जैसे ही मैया आ जाती है, उनका भय दूर हो जाता है। मैया उनके फुदकते हुए मुख में थोड़ा-सा [आहार डाल] देती है, और बस वे एकदम शान्त होकर बैठ जाते हैं।

ऐसे [उन चिड़िया के बच्चों के जैसे] ही मैं भगवान् का सब समय चिन्तन करूँ। भगवान् के आने से क्या होगा? भगवान् के दर्शन से मृत्यु का भय, रोग का भय, सब प्रकार के भय और जन्म-जन्मान्तरों के भय दूर हो जायेंगे। और क्या होगा? हमारी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण हो जायेंगी। प्रभु! इसलिये मैं सब समय [आपका] स्मरण करूँ। किन्तु तभी हृदय में यह भाव आया— “इसमें तो कुछ कामना रह गयी, ये तो भक्ति नहीं हुई।”

अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्‍धु (1.1.11)

[श्रीकृष्ण को सुखी करने की स्पृहा के अतिरिक्त, समस्त प्रकार की अभिलाषाओं से रहित, ज्ञानकर्मादि के द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए ही कायिक, मानसिक और वाचिक— समस्त चेष्टाओं और भाव के द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गति से जो कृष्ण का अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा की जाती है, उसे उत्तमा-भक्ति कहते हैं।] GVP

यह तो भक्ति ही नहीं है; उत्तमा-भक्ति तो बहुत दूर की बात है। जिस भक्ति में कोई कामना हो—“पुत्रं देहि; सुन्दरं पतिं देहि; सुन्दरीं भार्यां देहि; प्रचुरं धनं देहि; मुक्तिं देहि”— तो यह क्या हो गया? भक्ति बिक गयी। जैसे एक घड़े दूध में थोड़ा-सा सुरा—अर्थात् मदिरा—डाल दी जाये। बस, सब समाप्त। भक्तिदेवी अत्यन्त कोमल हैं। यदि कोई अपने लिए थोड़ी-सी भी कामना रखे, तो वह शुद्ध-भक्ति नहीं रह [जाती। तब वह भक्ति] प्रेम नहीं देगी; जो सांसारिक [वस्तु] तुमने चाही है, वही दे देंगी। क्योंकि वे तो कल्पवृक्षस्वरूप हैं, [इसलिये जो माँगोगे,] वही अवश्य देंगी।

इसलिये खबरदार! कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त किसी भी प्रकार की जागतिक अथवा पारलौकिक कामना अथवा भावना नहीं रहनी चाहिये।

[वृत्रासुर ने विचार किया—] “अरे! इसमें तो भय की बात [भी है। अर्थात् उल्लू, बाज, चमगादड़, शिकारी आदि के भय के कारण बच्चे अपनी मैया का स्मरण कर रहे हैं] और दूसरी बात…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

…यही रखो। जिस प्रकार वे बच्चे अपनी मैया का स्मरण करते हैं, वही स्मरण [के भाव को] इसमें से ले लो और बाकी को हटा दो। किन्तु इससे भी उनको तृप्ति नहीं हुई। तब वे [आगे] कहते हैं—

“स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः”—बछड़ा भूखा है। उसकी मैया चरने के लिए गयी हुई है। शाम हो गयी, किन्‍तु बच्चे के पेट में कुछ भी नहीं गया। पुकारे भी तो कहाँ? मैया तो सुनेगी नहीं। इसलिये वह मन मार करके, मन मसोसकर बैठा है। उसे बड़ी भूख लगी है। शाम हुई, उसने गैयाओं का दल देखा कि वे सब आ रही हैं। उसकी मैया डकरने लगती है और यह बछड़ा भी डकरने लगता है। [बछड़े ने] देखा कि उसकी मैया आ रही है, किन्‍तु उसके आते ही गृहस्थ ने उस [बछड़े] को पकड़ करके खूँटे में बाँध दिया कि मैया के आते ही यह उसका [सारा] दूध पी जायेगा। इसलिये उसे बाँध दिया। और गैया के आते ही उसे [मैया के सामने ही] बाहर बाँध दिया। अब मैया और बछड़ा दोनों [आमने]-सामने हैं। बछड़ा दूध पीने के लिए उछल रहा है, किन्तु जा नहीं सकता।

[उधर गृहस्थ] दूध दुहने के लिए घर से मटकी लेकर आ गया। और बछड़ा मैया के पास जाने के लिए उछल रहा है, डकर रहा है, और मैया भी [उसे देखकर] डकर रही है। उस समय बछड़ा जो डकरता है, किसलिये? [केवल] दूध पीने के लिए डकरता है। इसलिये जब गृहस्थ उसे [गैया के पास जाने के लिए] सीधे छोड़ता है, तो [उसके गले में] जो रस्सी बँधी होती है, पहले उसे गले से ऐसे खींचकर, पकड़कर ढीली करके तब खूँटे से उसकी रस्सी को खोलता है [ताकि एकदम से भागते समय उसका गला न घुट जाये।]

खोलने के बाद बछड़ा सीधा कहाँ जाता है? [क्या वह] मैया के मुख [के पास जाकर] प्यार करने या प्यार पाने के लिए जाता है? अथवा वह कहाँ जायेगा? वह एकदम जोर से दौड़ करके उसके स्तनों तक पहुँच जाता है। बड़े जोर से उसको धक्का देगा और मैया प्रेम के साथ में अपना दूध छोड़ देती है। फिर वह बड़े आराम से दूध पीने लगता है। जब पूरा [दूध] पी लिया, तो क्या करेगा? मैया को छोड़ करके इधर-उधर टहलने के लिए चला जायेगा। फिर मैया की कोई आवश्यकता नहीं।

वृत्रासुर ने सोचा— मैं अपनी वाणी से भगवान् का गुणानुवाद करूँगा। कैसे? इस बछड़े के समान, जो अत्यन्त विह्वल होकर, हृदय के अन्तिम कोर से डकरता है। किन्तु इसमें थोड़ा-सा दोष आ गया। बछड़ा किसलिये [पुकार रहा है?] दूध के लिए। तो क्या मैं भी भगवान् को अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए पुकार रहा हूँ? नहीं।

इसलिये इसमें से क्या लिया जाये? केवल वाणी वाला अंश [अर्थात् उसकी पुकार] और बाकी [उसके भाववाला अंश] छोड़ दो। जैसे वह पुकारता है न— “अब मरा, मैं मरा। जल्दी से दूध पिला दो, मैया!” [वह दूध] के लिए पुकारता है।

हम लोग भगवान् को पुकारते हैं, क्या बछड़े जैसा पुकारते हैं? नहीं। कभी कोई दुःख आ गया, तो थोड़ा-सा उसमें पुकार लिया; किन्तु हम लोग वैसा [अर्थात् उस बछड़े जैसा] बड़ी आसक्ति के साथ कि उनके बिना हम जीवित नहीं रह सकते—इस प्रकार हम भगवान् को नहीं पुकारते।

इसलिये यदि पुकारना हो, तो वाणी के द्वारा भगवान् का गुणानुवाद उसी प्रकार होना चाहिये, जैसे कोई [व्यक्ति] कुएँ में गिरकर [अत्यन्त व्याकुल होकर] पुकारता है—“बचाओ! बचाओ! बचाओ!” ऐसे भगवान् का नाम पुकारो। इसलिये [उन्होंने इस दृष्टान्त में केवल] वाणी का अंश लिया, बाकी को छोड़ दिया, क्योंकि उन्होंने देखा कि उसमें तो कामना है।

तीसरा [दृष्टान्‍त] लिया— “प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा।”

“व्युषितं विषण्णा माने…” विषण्णा माने क्या होता है? विषण्ण हो गयी। विषण्ण माने क्या? विरह से व्याकुल। और व्युषितं माने क्या? व्युषितं माने परदेस; उसका प्रियतम परदेस गया हुआ है। यहाँ प्रिया है और उसका प्रियतम है, किन्तु वह परदेस चला गया है। जब परदेस गया तो, उसकी प्रियतमा [विरह में अत्यन्‍त व्याकुल हो जाती है।]

यहाँ पत्नी नहीं, प्रियतमा कहा गया है। इसलिये यहाँ प्रियतमा और प्रिय कहा; पति और पत्नी नहीं कहा गया। [ऐसा इसलिये कि] पत्नी के प्रेम में कुछ गड़बड़ी हो जाती है, [वहाँ प्रेम के साथ अनेक अन्य अपेक्षाएँ भी जुड़ जाती हैं। जैसे—]गहने ले आओ, सुन्दर कपड़े ले आओ, और-और वस्तुएँ दो। उसमें भी सौन्दर्य चाहिये। पति यदि कुछ नहीं देगा और पति भी यदि उससे [कुछ] नहीं पायेगा, तो प्रेम टूट सकता है। विवाह होने से उनमें प्रेम है और विवाह नहीं होने से प्रेम नहीं रहता। इसलिये उसमें इन सब वस्तुओं की भी आवश्यकता रहती है। यदि पत्नी कुछ नहीं [करती], जल गयी, कुरूप हो गयी, काम नहीं कर सकती, तो पति दूसरा विवाह कर लेगा। इसलिये पति-पत्नी की उपमा यहाँ नहीं दी गयी।

पत्नी [के सम्बन्ध में] एक और विशेष बात है। जब तक विवाह हुआ है और बच्चे पैदा नहीं हुए, तब तक तो पति के साथ बहुत प्रीति है। पहला बच्चा हुआ, तो उसके [प्रेम का] एक अंश बच्चे में बँट गया। फिर दो बच्चे हुए, तीन बच्चे हुए—तो वह [प्रेम] और भाग [में बँटता] चला गया। अब यदि पाँच-छह बच्चे हो गये, तो पति की कोई आवश्यकता नहीं है; बच्चों पर ही सब प्रेम आ गया। पति प्रेम के लिए भूखा ही रह गया।

इसी कारण यहाँ पति [शब्द का प्रयोग] नहीं किया गया, बल्कि प्रिय और प्रियतम कहा [गया है।]

इसलिये कहते हैं कि जिस प्रकार कोई प्रिया विदेश-परदेस या सुदूर प्रवास में गये हुए अपने प्रियतम की चिन्ता करती है… कैसी चिन्ता करती है? पहलेवाले [दृष्टन्‍त से] भी लाख गुणा अच्छा…

भक्त: बछड़ा

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, पक्षीवाला।

[वह पक्षी-शावक] से भी कोटि गुणा अधिक [अपने प्रियतम की] चिन्ता करती है। और बछड़ा जिस प्रकार पुकारता है, उससे भी अधिक [व्याकुल होकर पुकारती है।] जो भी [सखी] मिलती है, [उससे पूछती है—] “सखि! अभी तक आये नहीं? आज तो आने की बात थी। क्या गाड़ी में विलम्ब हो गया? कहीं गाड़ी उलट तो नहीं गयी? कहीं [कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी?”]

[ज्यों-ज्यों उनके] आने का समय [बीतता] जाता है, [त्यों-त्यों उसका] हृदय [और अधिक] व्याकुल होता जाता है। कभी घर [के भीतर जाती है,] कभी बाहर निकलकर देखती है— “अभी तक नहीं आये।” उसने देखा कि स्टेशन से तो सभी गाड़ियाँ चली गयीं, टाँगे और रिक्शे सब चले गये। उनकी गाड़ी तो आ गयी होगी। अवश्य कहीं कोई दुर्घटना (accident) हो गयी होगी या कुछ न कुछ हो गया। [इस प्रकार वह अत्यन्त] व्याकुल हो जाती है। ऐसे ही हृदय से [साधक] व्याकुल रहे और वैसे ही [व्याकुल हृदय से भगवान् को पुकारे]…

यदि [घर में] बच्चे हैं, तो उनसे कहेगी— “अरे, बेटा! तुम्हारे पिताजी [अभी तक] नहीं आये। क्या हो गया?” और यही नहीं, शरीर से जो सेवा [की भावना] है, [वह भी उसमें रहती है।] उनके आने के समय से पहले, ठीक समय पर रसोई प्रस्तुत है, सुशीतल जल रख दिया है, झलने के लिए पँखा भी रख दिया है, सब प्रकार की [व्यवस्था कर दी है,] बैठने [और विश्राम करने] के लिए पलङ्ग भी व्यवस्थित कर दिया है। घर को लीप-पोत करके सब ठीक कर दिया है। [ये सब] अङ्गों से [की जानेवाली] सेवाएँ हैं।

इसमें ये तीनों बातें हैं— [मन से चिन्ता, वाणी से व्याकुल पुकार और शरीर से सेवा।] इसलिये यहाँ पर तीनों बातें अन्य दोनों उदाहरणों से बहुत श्रेष्ठ है। विशेषकर प्रिया-प्रियतम का जो भाव है, वही कृष्ण और गोपियों का है। इसका इङ्गित हमारे श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी ने इस श्लोक की [टीका] में दिया है। श्रीमद्भागवत में [दशम-स्कन्‍ध] के आरम्भ होने से पहले चित्रकेतु महाराजजी [के प्रसङ्ग में] पूर्वराग से भी पहले, गोपीभाव का इङ्गित किया है।

यदि भगवान् के साथ में प्रीति हो, तो कैसी होनी चाहिये? सबसे पहले वह कामना-वासना शून्य हो। केवल कृष्ण के चरणों में प्रीति हो और उनकी सेवा पा सकें—[यही लालसा हो।]

दूसरी बात, भगवान् के साथ चार प्रकार के सम्बन्ध कैसे हो सकते हैं, या होते हैं?

पहला [सम्बन्ध है—दास्यभाव] जैसे हनुमान का राम के साथ था—दास और प्रभु का, [अर्थात्] सेवक और सेव्य का सम्बन्ध। जितने भी भक्त लोग हैं, उनमें से अधिकांश इसी [भाव] में रहते हैं; लगभग 90% भक्तों का भाव यही समझिये।

दूसरा [सम्बन्ध है—सख्यभाव।] जैसे सखा का सखा के प्रति भाव होता है। इसमें दोनों के हृदय मिल जाते हैं। सखा [अपने सखा के] पलङ्ग पर भी बैठ जायेगा। जैसे हनुमानजी [अपने प्रभु रामचन्‍द्रजी को] अपने कन्धे पर तो बैठा लेते हैं, सब कुछ करेंगे; किन्तु रामचन्द्रजी के पलंग पर बैठ जायेंगे, यह कभी नहीं होगा। [हनुमानजी] उनके कन्धे पर बैठ जायेंगे, यह कभी नहीं होगा। [वे रामचन्‍द्रजी को अपने] कन्धे पर बैठायेंगे, किन्तु [स्वयं उनके कन्धे पर] नहीं बैठेंगे।

किन्तु व्रज के सखा क्या करेंगे? “धत तेरी!” कहकर कृष्ण के कन्धे पर बैठ जायेंगे। सखा का जैसा [व्यवहार होता है, विश्रम्भ-भाव से वैसा करते हैं।] वे अपना खा रहे हैं, और यदि कुछ अच्छा लगा, तो अपना जूठा कृष्ण के मुख में दे देंगे। क्या हनुमानजी ऐसा करेंगे? या शबरी करेगीं? कोई भी नहीं करेगा। शबरी ने रामचन्‍द्रजी को अपने जूठे फल नहीं दिये। [वे केवल] पेड़ का फल चखकर देखती थीं, और [जिस पेड़ का फल] मीठा होता था, दूसरे दिन उसी पेड़ से [मीठे फल तोड़कर] उनके लिए रखती थीं। अपना जूठा नहीं रखती थीं। हमारी विदुरानीजी ने भी अपना जूठा नहीं दिया। वे कृष्ण को अपना सेव्य मान रही हैं।

जूठा खिलाने के लिए उनके सखा लोग हैं, उनकी मैया और बाबा हैं। नन्दबाबा और यशोदाजी खिला रहे हैं, कुछ खाया, कुछ बच्चे को खिलाया, [फिर स्वयं] कुछ खाया, फिर उनको खिलाया। एक और भी हैं, जो जूठा खिला देती हैं। कौन हैं? गोपियाँ हैं। वे सखाओं से भी अधिक [कृष्ण की अन्‍तरङ्ग हैं।] इसलिये दूसरा हुआ—यह [सख्यभाव।]

और तीसरा [सम्बन्‍ध] है—वात्सल्यभाव। भगवान् के साथ प्रेम-प्रीति करना चाहते हो, तो यशोदा मैया और नन्दबाबा जैसा [भाव हो।] जिसे देखकर उद्धवजी भी बड़े आश्चर्यचकित रह गये [और कहने लगे—] “ऐसा भाव मुझमें नहीं आया।” नारदजी देखकर कहने लगे—“ऐसा भाव हमें नहीं आया।”

कृष्ण आँगन में खेल रहे हैं। अभी यशोदा मैया ने उन्हें स्नान कराया था, [और वे फिर] धूल में लोट-पोट हो गये। बस मैया उन्हें आँगन में खड़े हो करके डाँट रही हैं— “अब तुझे गोद में नहीं लूँगी, दूध नहीं पिलाऊँगी!” कृष्ण देख करके मचल रहे हैं कि मैया गोदी में उठा लें, किन्‍तु मैया उनको उठा नहीं रही हैं। ऐसे हाथ दे करके डपट रही हैं और उन्‍हें दूध नहीं पिलायेंगी।

[उस समय] नारदजी आये और देखकर [चकित हो गये]— जिस परब्रह्म को ब्रह्मा, शंकर और हम लोग ध्यान में भी नहीं पाते हैं, वही परब्रह्म आज मूर्ति धारण करके यशोदा मैया का दूध पीने के लिए और उनकी गोदी में चढ़ने के लिए मचल रहा है, ललक रहा है। वह रो रहा है, आँखों से आँसुओं की धारा गिर रही है और यशोदा मैया उसे डाँट-डपट रही हैं! मृत्यु भी जिससे भय पाती है, [उसे मैया डाँट रही हैं।]

ऐसा वात्सल्यभाव कृष्ण के साथ में जोड़ें। इसलिये बाल-गोपाल हुए हैं। बाल-गोपाल की बहुत से लोग सेवा करते हैं।

और सबसे उन्नत है—मधुररस, जो गोपियों का भाव है। यह एक प्रतिशत (one percent) से भी कम लोगों में है। वे परम सौभाग्यवान लोग होंगे, जिन पर गोपियों की कृपा होगी, व्रज की धूलि की कृपा होगी और व्रजरसिक रसिकों की कृपा होगी; बस वही इस भाव को पायेंगे, दूसरे नहीं पायेंगे।

हम लोगों की कथा का मूल उद्देश्य यही है—गोपियों की भावना। चैतन्य महाप्रभु इसी भाव को देने के लिए आये। “अनर्पितचरीं चिरात्” [#2] श्लोक में [इसीका वर्णन है।] यही सर्वोत्तम भाव है। यदि कृष्ण और गोपियों के इस भाव के प्रति लोभ हो जाता है, तो यही भागवत सुनने का सबसे उत्तम से उत्तम फल है। इसी को यहाँ पर बतला रहे हैं कि इन चारों भावों में से कोई एक भाव हो।

जब हम अच्छी तरह से विचार करेंगे, तो देखेंगे—चित्रकेतु महाराजजी ने कितने दिनों तक साधुसङ्ग किया था? कितने दिन? उनकी आयु कितनी थी? करोड़ों वर्ष। [क्या इन] करोड़ों वर्षों में उन्‍हें नारदजी कभी नहीं मिले होंगे? और [क्या उन्‍हें] उस समय के बड़े-बड़े रसिक भक्तों में से कोई भी नहीं मिला होगा? पहले जो द्वापरयुग बीत गया है, तो क्या चित्रकेतु महाराज ने गोप-गोपियों की कथाएँ नहीं सुनी होंगी? क्या भागवत भी उस समय लुप्त हो गया होगा? यदि बाहर से लुप्त हो [भी गया हो, तो] भक्तों के हृदय में [तो वह विद्यमान] होगा ही। इसलिये इसी भावना को लेकर यहाँ पर “प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा” यह श्लोक आ रहा है।

इसलिये श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि भागवत का यह लक्षण है कि उसमें वृत्रासुर-उपाख्यान में चित्रकेतु महाराजजी के इन भावों की उद्दीपना हुई है। यह उद्दीपन का भाव है। इसलिये श्रीमद्भागवत में पहली बार यहाँ पर एक इङ्गित मिला कि यदि भगवान् के साथ प्रेम करना है, तो सबसे ऊँचा भाव प्रिया-प्रियतम का भाव है— “मैं उनकी प्रियतमा हूँ, और वे हमारे प्रियतम हैं।”

तो यह भाव क्यों न आये? इसलिये चित्रकेतु महाराजजी का यह उपाख्यान बहुत ही सुन्दर है। हम लोग इसी से यह शिक्षा लेंगे। इसके बाद में हम लोगों की कथा यहाँ से आरम्भ होगी।

गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …भक्त लोग “त्राहि! त्राहि!” करने लगे। उन लोगों ने विचार किया कि इस [असुर] के अत्याचार से हम लोग कैसे बचें? नारदजी भी उनमें सम्मिलित हो गये। नारदजी ने कहा— “भगवान् को प्रकट कराने के लिए बस एक उपाय है। यदि प्रेमपूर्वक संकीर्तन किया जाये, तो वे बहुत शीघ्र ही आ जायेंगे। वे असुर को मार करके शान्ति प्रदान करेंगे। भगवान् की जो नींद है, वह कीर्तन से ही खुलती है। इसलिये सभी लोग मिल करके [कीर्तन करेंगे।] अभी वक्रेश्वरजी कीर्तन करेंगे जिससे कि सब लोग भी उठ जायें।

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …[छोटा बच्चा] नये बाँस की तरह होता है, जैसे नवा दो, वह नव जायेगा अर्थात् जैसे मोड़ दो मुड़ जायेगा और बाँस के पुराना होने पर, सूख जाने पर वह टूट जायेगा, किन्तु नयेगा नहीं [अर्थात् बदलेगा नहीं।] इसलिये बच्चों के ऊपर बहुत प्रभाव पड़ता है। उन्होंने [बालको ने] प्रह्लाद महाराजजी से पूछा— “भगवान् को प्रसन्न करना तो बहुत-बहुत कठिन है। तो हम लोग उनका भजन कैसे करें?”

प्रह्लाद महाराजजी ने कहा— “प्रयास करना बहुत कठिन नहीं है। एक काम करो, [भगवान्] बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जायेंगे। अभी सब लोग मिल करके उनके गुणों का कीर्तन करो। देखना, भगवान् तुरन्त प्रसन्न हो जायेंगे।”

तब प्रह्लाद महाराजजी सब बच्चों को ले करके [कीर्तन करने लगे।] उस दल में मनसुखा भी था और सभी लोग मिल करके बहुत सुन्दर कीर्तन करने लगे।

इधर आ जाओ। जल्दी से कीर्तन कराओ तो।

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-
मायाबलं दर्शयता गृहीतम्।
विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः
परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (3.2.12)

भगवान् ने प्रपञ्च जगत् में योगमाया के बल से अपनी जिस श्रीमूर्ति को प्रकटित किया था, वह मर्त्यलीला के लिए बहुत ही उपयोगी थी। वह श्रीमूर्ति इतनी मनमोहक थी कि स्वयं श्रीकृष्ण भी उसे देखकर विस्मित हो जाते थे, अर्थात् उस रूप में सौभाग्य और सौन्दर्य की चरमसीमा प्रदर्शित थी। वह श्रीमूर्ति समस्त लौकिक दृश्यों में भी परम अलौकिक तथा समस्त भूषणों की भी भूषणस्वरूप थी। (GVP)

#2
अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतोज्जवल-रसां स्वभक्तिश्रियम्।
हरिः पुरटसुन्‍दरद्युतिकदम्बसन्‍दीपितः
सदा हृदय-कन्‍दरे स्फुरतु वः शचीनन्‍दनः॥
-विदग्धमाधव (1.2)

सुवर्ण कान्तिसमूह द्वारा दैदीप्यमान श्रीशचीनन्दन गौरहरि तुम्हारे हृदय में स्फूर्ति लाभ करें। जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरस का दान जगत् को चिरकाल तक नहीं दिया, उसी स्वभक्ति-सम्पत्ति का दान करने के लिए वे कलियुग में अवतीर्ण हुए हैं। (IGVP)

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