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Srimad Bhagavatam Series- #14- Teachings of Prahlada

30:12
#1865
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • God is merciful to all but why He favours demi-gods.
  • Example of a hungry calf crying for mother cow; we should cry for God like the calf.
  • Explanation of 'priyatama vishutanya vishanna'.
  • Difference between the love of wife & girlfriend.
  • 4 kinds of relationship with Krsna.
  • How Citraketu received the form of a demon.
  • Moral of Citraketu-Upakhyan is to achieve gopi bhava.
  • There are some anarthas left in bhava stage also.
  • Guru should be bonafide otherwise fall down of disciple is certain.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 14 : श्रीप्रह्लादजी के उपदेश

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 1 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज प्रातःकाल हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद महाराजजी के उपाख्यान का वर्णन किया गया है। इसके कुछ रहस्य भी हैं, उन्हें भी समझने की चेष्टा करनी चाहिये। जैसे प्रह्लाद-चरित्र के प्रारम्भ में यह बतलाया गया है कि भगवान् समदर्शी हैं। वे सबके प्रति समभावापन्न हैं; उनका किसी के प्रति न तो द्वेष है, न विशेष प्रेम है। तो [प्रश्न उठता है कि] भगवान् देवताओं का पक्ष लेते हैं, सन्‍तों का पक्ष लेते हैं और असुरों के विरोधी होते हैं, उन्हें मारते हैं, उनकी हत्या करते हैं, उनका वध करते हैं— ऐसा क्यों होता है?

[इसके उत्तर में] कहते हैं कि यह ठीक ही है। किन्तु यह देखने का भ्रम है कि भगवान् देवताओं का पक्ष लेते हैं और असुरों का विनाश करते हैं। वास्तव में वे किसी का विनाश नहीं करते; वे सबके प्रिय हैं, सबके सुहृद हैं।

तब जब देवता और दानवों में युद्ध होता है, तो वे देवताओं का पक्ष क्यों लेते हैं? तो इसी [को समझाने] के लिए उसमें प्रह्लाद महाराजजी का यह उपाख्यान वर्णन किया गया है। जैसे आग किसी की शत्रु नहीं होती; किन्तु यदि कोई व्यक्ति आग में जलकर मर जाये, तो यह किसका दोष है? आग का दोष है या उस व्यक्ति का? [उसी प्रकार] यमुना नदी सबको जल (पानी) देती है, जीवन देती है; किन्‍तु इसी यमुना में यदि कोई आत्महत्या कर ले, डूबकर मर जाये, तो यह यमुनाजी की उसके प्रति शत्रुता तो नहीं है। कोई यहाँ पर बैठा है। सूर्य आकाश में उदित हो रहे हैं। जहाँ पर कोई बाधा नहीं है, वहाँ पर सूर्य की रोशनी पड़ती है। तो इसका यह मतलब नहीं है कि घर [के भीतर] बैठे लोगों को भी वे प्रकाश दें। उनका तेज तो वहाँ नहीं आयेगा, धूप नहीं आयेगी। तो यदि धूप लेनी है, तो बाहर में जाओ।

ऐसे ही भगवान् का स्वरूप आनन्दमय और विशुद्धसत्वमय है। तो भगवान् को पाने के लिए उसमें भी वैसे ही शुभ, अप्राकृत गुण होने चाहिये; तभी वह उन्हें समझ सकता है, अन्यथा नहीं। इसलिये भगवान् का किसी के प्रति द्वेष नहीं है। जो कुछ भी होता है, वह काल के द्वारा होता है।

जैसे अभी दिन है। आप लोग सो क्यों नहीं जाते? अभी आधी रात हो जाये न, तो क्या होगा? अन्धकार रात हो जाये, कोई बातचीत न करे, तो अपने आप व्यक्ति सो जाता है। इसलिये काल के द्वारा व्यक्ति जागता और सोता है। काल के अनुसार व्यक्ति जन्म लेता है और मरता है। इसमें किसी का दोष नहीं है। भगवान् साक्षीरूप में केवल व्यवस्था करते हैं। इसलिये सब कुछ भगवान् ही नहीं कराते। कुछ लोग कहते हैं कि बिना भगवान् की इच्छा के पत्ता तक नहीं डोलता। बात तो ठीक है।

एक ओर दुर्योधन है और दूसरी ओर अर्जुन। दुर्योधन कहता है— “हे प्रभु! आप विश्व-ब्रह्माण्ड के नायक हैं; हम तो कठपुतली हैं और आप कठपुतली को चलानेवाले हैं। भीतर-बाहर आप ही हैं; आप जैसा चलाते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ। ‘जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।’ मैं धर्म जानता हूँ, किन्तु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है; अधर्म भी जानता हूँ, किन्तु उससे मेरी निवृत्ति नहीं होती। आप जैसे नचाते हैं, वैसा ही मैं नाचता हूँ। इसमें न हमारा कोई दोष है, न गुण है। और यदि कुछ दोष है भी, तो ‘क्षम्यताम्’—आप क्षमा करें। आपने जो कुछ कराते हैं, वैसे ही मैं करता हूँ। आपने लड़ाया, मैंने लड़ लिया; आपने भीतर से कहा कि धोखा दो, तो हमने धोखा दे दिया। हमने पाण्‍डवों को जलाया, उन्‍हें कुछ नहीं दिया। यह सब आपकी ही लीला है। इसमें हमारा कोई दोष नहीं।”— ऐसे असुर लोग कहते हैं।

भक्त लोग क्या करते हैं? भक्त लोग कहते हैं— “यदि हमने कुछ अन्याय किया, तो वह हमारी स्वतन्‍त्रता का [दोष है], हमारा दोष है और जो भी अच्छा कर्म हुआ, वह आपने प्रेरणा दे करके कराया। वह आपकी प्रेरणा से हुआ।” इसलिये अभी [बद्ध अवस्था में] हम जो कुछ कर रहे हैं, वह अपनी स्वतन्‍त्र इच्छा से कर रहे हैं। और जब हम प्रभु के भक्त हो जायेंगे—प्रह्लादजी जैसे, हनुमानजी जैसे [मुक्त अवस्था में] हो जायेंगे—उस समय जो कुछ वे मुक्त महापुरुष लोग करते हैं, वह उनके द्वारा प्रभु कराते हैं। भरतजी, चित्रकेतु महाराजजी और जय-विजय—इनसे प्रभु ने कराया, तब उन्होंने किया; अपने मन से नहीं किया। इसलिये उनका दोष नहीं—यह बात तो ठीक है। किन्तु अभी हम जो पाप कर्म करते हैं, पुण्य करते हैं, [वह प्रभु हमसे नहीं करवाते।] प्रभु ने हमें स्वतन्‍त्रता दी है। किन्तु यदि इस स्वतन्‍त्रता का असद्-व्यवहार करेंगे, तो उसका [फल] भोग करना पड़ेगा। तुम्हें चक्की में एकदम पीस देंगे, नहीं तो हलवा बना देंगे—छोड़ेंगे नहीं। एक-एक कर्म का विचार करेंगे। इसलिये इन सब [बातों पर] विचार करके हमको चलना चाहिये।

चित्रकेतु महाराजजी अब भगवान् के परिकर हो गये थे। पुत्र के मरने के बाद साधन-भजन करके वे शिवजी के बन्धु और सखा जैसे हो गये थे। वे परम मुक्त थे; उनकी वस्तु-सिद्धि भी हो गयी थी। इसलिये उस समय उनके जो भी व्यवहार थे, वे भगवान् की इच्छा के अनुसार ही होते थे।

भगवान् ने देखा कि उनके द्वारा जगत् के लोगों को शिक्षा देनी चाहिये। इसलिये जो कुछ उन्होंने किया, भगवान् की प्रेरणा से किया। इसलिये यह मत समझना कि उन्होंने शंकरजी की निन्दा की और इसलिये उन्‍हें दुर्गति हो करके वृत्रासुर होना पड़ा। नहीं, [उनके द्वारा भगवान् ने जगत् में यह दिखलाया कि] असुर-[योनि] में भी भगवान् का भजन हो सकता है। प्रह्लाद महाराजजी तो असुर ही थे। वृत्रासुर साधारण नहीं था—[वे वही] चित्रकेतु महाराज थे। वे इन्द्र से लड़ाई कर रहे हैं और उस अवस्था (असुर-योनि) में भी, उस समय (युद्ध करते हुए) परम महाभागवत के समान भक्ति की अन्‍तिम [सार] बातें कह रहे हैं।

इसलिये चित्रकेतु महाराजजी का देवीजी के चरणों में या शंकरजी के चरणों में अपराध नहीं हुआ। बल्कि जो देखनेवाले हैं, वे [देखेंगे कि] यह देवी का दोष हुआ। किन्तु देवी का दोष भी नहीं ले सकते। क्यों? अरे! वे शंकरजी की अर्धांगिनी हैं। वे भी परम मुक्त हैं। इसलिये उनका दोष हो सकता है? नहीं। उस समय भगवान् ने योगमाया की शक्ति से उनके विचारों को मोहित करके, उनके द्वारा जगत् की शिक्षा के लिए ऐसा करा लिया। ऐसा ही समझना; नहीं तो कहीं चित्रकेतु महाराजजी के चरणों में दोष हो जायेगा, अपराध हो जायेगा या देवी के चरणों में अपराध हो जायेगा। इसलिये अत्यन्‍त सावधानी से [विचार करना चाहिये।]

भरतजी को आसक्ति नहीं हो सकती—क्यों? क्योंकि वे सिद्ध हो गये थे। भागवत में लिखा है कि जब वे हिरण हो करके जन्मे, तो उनको अपने पूर्वजन्म की बातों का स्मरण था; और जब वे ब्राह्मण के बालक हो करके आये, [तब भी] उनकी पूर्वजन्मों की सिद्धि थी अर्थात् [उन्‍हें] सब स्मरण था। हमको, आपको, दूसरों को, या बड़े-बड़े महात्माओं को पूर्वजन्म की बातें क्यों याद नहीं आतीं? [उन्‍हें इसलिये स्मरण था क्योंकि] वे भावावस्था में सिद्ध थे।

भगवान् उनके द्वारा यह दिखलाना चाहते थे कि भावावस्था में [पहुँच] जाने पर भी, जब तक प्रेम नहीं आयेगा, तब तक कुछ-कुछ त्रुटियाँ रह जाती हैं, कुछ-कुछ अनर्थ [शेष] रह जाते हैं। और उस समय यदि वे अनर्थ बढ़ गये, साधु-सन्तों के चरणों में यदि कुछ अपराध हो गया, तो वहाँ से पतन की सम्भावना है। इसलिये साधकों को सब समय सावधान रहना चाहिये। इस शिक्षा के लिए [भगवान् ने] उनके द्वारा ऐसा [आचरण] कराया।

जय-विजय की बात तो क्या—मैं समझता हूँ कि जय-विजय बड़े हैं या सनक, सनन्दन, सनातन बड़े हैं? कौन बड़े हैं? सनक, सनातन [आदि ऋषि] ‘क्वचित्’ कभी-कभी वैकुण्‍ठ में जा सकते हैं, किन्तु भगवान् के चरणों की सेवा करना, उनकी सेवा में सब प्रकार से दिन-रात निमग्न रहना—यह इन लोगों के लिए सम्भव नहीं है। यह [बात] बाद में सनक, सनन्‍दन, सनातन ने ही कही।

जब योगमाया का प्रभाव भगवान् ने हटा लिया, [तब सनकादि ने विचार किया—] “अरे, हमने यह क्या कर डाला! भगवान् के नित्य-परिकरों को, जो नित्य भगवान् की सेवा करते हैं, हमने उन्‍हें न समझने के कारण अन्याय से अभिशाप दे दिया। ये क्यों हुआ? आज तक तो हमने किसी को अभिसम्पात नहीं किया, इन्‍हें क्यों दे दिया?” उस समय उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना की—“प्रभु! हमारा इनके चरणों में अपराध हो गया।”

बात क्या थी? बात यह थी कि भगवान् तो सभी रसों के नायक और विषय हैं। उन्होंने विचार किया— “मैंने सब रसों का आस्वादन किया—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य अथवा हास्य, अद्भुत, करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स। सबका मैंने आस्वादन किया, किन्तु वीररस का आस्वादन नहीं किया। कुछ वीररस का आस्वादन करना चाहिये।”

प्रभु के भीतर इस भाव को देखकर उनके प्रिय एवं एकान्तिक सेवकों जय-विजय [ने सोचा—] “ओह! प्रभु की लड़ने की इच्छा हो रही है।”

क्यों [इच्छा] हो गयी? [भगवान्] परम स्वतन्‍त्र हैं, स्वराट् हैं। उनकी क्यों, कब, कैसी इच्छा हो जाये, क्योंकि उनसे कैफियत (स्पष्टीकरण) माँगनेवाला कोई नहीं है। इसलिये उनकी इच्छा हो गयी, तो इच्छा हो गयी। कृष्ण को मधुररस आस्वादन की इच्छा क्यों हो गयी? हो गयी, क्योंकि वे सब रसों के विषय हैं, इसलिये हो गयी। उनसे कोई स्पष्टीकरण नहीं माँग सकता। इसलिये [भगवान् की] वीररस आस्वादन की इच्छा हुई, तो उनके प्रिय सेवकों जय-विजय ने सोचा— “प्रभु की इच्छा को पूर्ण करना है, नहीं तो सेवक [किस बात के?] किन्तु यह बड़ा कठिन काम है। प्रभु के साथ में यदि अभिनय करके लड़ें, तब तो गड़बड़ हो जायेगा। क्योंकि [इससे] उनका मन भरेगा नहीं। इसलिये सचमुच में शत्रु का आवेश भाव रखकर प्रभु से लड़ें, और उनके भी छक्के छुड़ा दें, उनको भी वीररस का आस्वादन करवा दें, तो हमारा ये भक्त भाव है।”

जैसे कृष्ण सोचते हैं कि आज तक तो लक्ष्मीजी का प्रेम मिला, सत्यभामा और रुक्मणी का भी भाव [आस्वादन किया,] किन्तु कोई ऐसा मिले जो मुझको चोर, चोट्टा, धूर्त कहे। तो ऐसा कहने के लिए राधाजी का एक भाव हुआ। उन्होंने उनको सब कुछ कह दिया। कृष्ण को यह रस आस्वादन हुआ। उसी प्रकार [भगवान्] वीररस का आस्वादन करना चाहते हैं। इसलिये [जय-विजय ने] सोचा— “अभिनय से नहीं होगा कि प्रभु आइये, हमसे कुश्ती लड़ें। सचमुच में उनके साथ उस भाव से कुश्ती लड़ा जाये और युद्ध करें। किन्तु हो कैसे? हम इनके विरोधी कैसे बनें?”

वे प्रभु से मन-ही-मन में कह रहे हैं— “प्रभु! यह आपके द्वारा ही सम्भव है कि हमें उस रूप में बना करके, और तब हमसे युद्ध करें।” उन्होंने कहा— “सेवक की इच्छा हुई कि मैं इनके साथ में युद्ध करूँ और इनको वीररस आस्वादन करा दूँ।” इसलिये प्रभु ने योगमाया का आकर्षण किया।

योगमाया ने आ करके ठीक उचित समय पर अपनी सेवा की। योगमाया परम निर्विकार उन ऋषियों को आकर्षण करके वैकुण्‍ठ में ले आयीं। यह योगमाया ने बुलाया [अन्यथा] सनातन [आदि ऋषियों] को [वैकुण्ठ] जाने की क्या आवश्यकता थी? और द्वार (gate) पर [जय-विजय] को भी आकर्षण कर दिया। वे द्वार पर खड़े हो गये। [सनकादि ऋषि] नंग-धड़ंग वहाँ पर पहुँचे। इन्होंने बेंत (बेंत की लकड़ी से बनी छड़ी जो द्वारपालों द्वारा प्रयुक्त होनेवाली एक प्रकार का दण्ड या लाठी होती है) अड़ा दिया। क्यों बेंत अड़ाया? अब अपना यहाँ पर कर्तृत्व नहीं रह गया। उस लीला का सम्पादन करने के लिए योगमाया अब करा रही हैं। इसलिये योगमाया ने [जय-विजय] के भीतर प्रवेश करके उसी समय उनको लायी और उनके भीतर अभिमान जैसी कोई वस्तु पैदा की। उनका यह सात्विक, राजसिक या तामसिक अभिमान नहीं था, [क्योंकि इन अभिमानों के साथ] वैकुण्‍ठ में वह जा ही नहीं सकता है।

तो वहाँ पर [जय-विजय ने]देखा— “सनकादि ऋषि नंग-धड़ंग हो करके, धूल-धूसरित हो करके आ रहे हैं। इनको कोई ज्ञान ही नहीं है कि अन्‍ततः कपड़े पहन करके, चतुर्भुज हो करके, परम दैदीप्यमान शरीर ले करके आते।” इसलिये उनके सामने बेंत अड़ा दिया कि “आप लोग भीतर नहीं जा सकते।”

और योगमाया ने उनके (सनकादि ऋषियों के) भीतर क्या किया? ऐसे ही कुछ राजस भाव को लायी। राजस भाव कौन-सा? यह [प्रकृति का राजसगुण] नहीं। यह योगमाया का, वैकुण्‍ठ का भाव था। वह यह राजस नहीं। अर्थात् वह लीला करानी थी, इसलिये [उनके भीतर यह राजसभाव प्रकट किया।] और आ करके उन्होंने क्या किया? उनके समझ में कुछ नहीं आया कि योगमाया अपना काम करा रही है।

सनकादि ऋषियों ने [जय-विजय से] कहा—“तुम वैकुण्ठ में रहने के योग्य नहीं हो। प्रभु को किससे डर है? किस बात का [डर] है कि तुम [हमें] रोक रहे हो? तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो; तुम्हारे भीतर राजसिक भाव [आ गया है।”] और बस…

राजसिक भाव किसके भीतर है? इनके भीतर या उनके भीतर? [वास्तव में] किसी के भीतर नहीं था, किन्तु योगमाया ने [लीला के लिए] ऐसा करा दिया। बस साथ-ही-साथ उनको क्रोध आया, जो क्रोध वैकुण्‍ठ में नहीं होना चाहिये या इस जगत् में भी भावुक भक्तों को क्रोध नहीं होना चाहिये। उनको क्रोध आया और अभिसम्पात किया— “जाओ, तीन जन्मों के लिए तुम असुर हो जाओ।”

तो यह दोष किसका है? जिस समय भगवान् ने दोनों पर से योगमाया [का आवरण] हटा लिया, तब सनकादि ऋषि जय-विजय के चरणों में गिरने लगे और जय-विजय सनकादि ऋषियों के चरणों में गिरने लगे—दोनों मिलकर भगवान् के चरणों में आकर [कहने लगे—] “यह क्या हो गया? हम लोगों को कभी क्रोध नहीं आता, न ही कभी ऐसी राजसिक भावना होती है; [फिर आज यह सब कैसे हो गया? हम] आज यहाँ पर कैसे आये?”

तब प्रभुजी ने कहा—“कोई चिन्ता मत करो। [यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है।] मेरी वीररस का आस्वादन करने की इच्छा थी, और इन दोनों की भी यही इच्छा थी। इसलिये मैं जगत् में कुछ ऐसी लीला करूँगा कि इनकी भी इच्छा पूर्ण हो जाये, मेरी भी इच्छा पूर्ण हो जाये, और साथ-साथ में जगत् का भी कल्याण हो। जो लोग इन लीलाओं का वर्णन करेंगे और सुनेंगे, उन सब लोगों का ही कल्याण हो जायेगा। ऐसी लीला मैं करूँगा।”

इस प्रकार इसमें न इनका कोई दोष है, न उनका कोई दोष है। इसलिये तत्त्वज्ञानी लोग इन घटनाओं को इस रूप में दर्शन करते हैं। इसलिये भरतजी, चित्रकेतु महाराज और जय-विजय—इन लोगों में कोई दोष नहीं था; वह तो भगवान् की लीला अवतरण कराने के लिए उन्होंने ऐसा किया।

दूसरी बात—आज हम लोगों ने हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष की कथा सुनी। ‘हिरण्यकशिपु’ [और ‘हिरण्याक्ष’] का क्या अर्थ है? क्यों नाम दिया गया? ये तो जय-विजय थे। इनका शुद्ध नाम तो जय और विजय है। तो जब उन्‍होंने इस जगत् में जन्म लिया, तो [उनका नाम] हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष क्यों हुआ? असुर किसको कहते हैं?

द्वौभूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैवआसुर एव च।
विष्णुभक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः॥
-पद्मपुराण

[इस संसार में दैव और आसुर के भेद से जीवों की सृष्टि दो प्रकारकी है। विष्णु भक्तजन दैव एवं जो विष्णु विरोधी हैं, वे ठीक इसके विपरीत अर्थात् आसुर स्वभाववाले हैं।] GVP

असुर की पूँछ और सींग होते हैं, ऐसी बात नहीं है। वे बड़े सुन्दर और सुकान्त होते हैं। हिरण्यकशिपु भी ऐसा ही था। बलि महाराज थे, प्रह्लाद महाराज थे— वे बड़े सुन्दर और सुकान्त थे। किन्तु [उन्‍हें असुर] इसलिये कहा जाता है क्योंकि असुर लोग भगवान् के विरोधी होते हैं और देवता लोग भगवान् के भक्त होते हैं।

अब असुर किसे कहते हैं? असुर [उन्‍हें] कहते हैं जो यह समझते हैं कि “जितनी सुख और शान्ति है, यह सब कुछ अर्थ पर निर्भर करती है। अर्थ माने सोना, [धन।] जिसके पास जितना अधिक सुवर्ण (अर्थ) है, वह उतना [बड़ा] जगत् का प्रभु होगा और उतना ही सुखी और शान्त होगा।” इसलिये जितने [लोग] इस विचार को रखनेवाले हैं, वे सब हिरण्यकशिपु हैं। उस समय एक था और इस समय 99.99% तक सब असुर हैं। यहाँ तक कि जो लोग घर-बार, स्त्री-पुत्र छोड़ करके आये हैं, वे भी बैंक में और जेब (pocket) में रुपया रखते हैं। वे सोचते हैं कि इसी से हमको शान्ति और सुख होगा।

इसलिये जिनकी आँख “हिरण्य” [पर लगी रहती है—वे हिरण्याक्ष हैं।] हिरण्याक्ष—हिरण्य+अक्ष। “हिरण्य” माने स्वर्ण [और “अक्ष” माने आँख।] इसलिये जिनकी सोने पर ही दृष्टि है, वे हिरण्याक्ष हैं। और “कशिपु” माने होता है—सोना, बिछौना, खाट, पलंग, खाना-पीना, भोग। [इसलिये जो लोग] खाने-पीने, सोने, भोग करने [में ही लगे रहते हैं]— “eat drink and be merry" — खूब खाओ, पियो, मौज करो—[वे ही “हिरण्यकशिपु” हैं। इन लोगों का विचार है कि] इतना मद्यपान करो कि मद्यपान करते-करते [जब तक भूमि पर न गिर जायें।]

पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले।
उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते॥

[असुरों का विचार है—पीते रहो, बार-बार पीते रहो, जब तक कि भूमि पर गिर न जाओ। गिरने के बाद उठकर फिर से पियो, क्योंकि पुनर्जन्म नहीं होता है।]

[वे तब तक पीते हैं जब तक] वे पृथ्वी पर न गिर जायें और कुत्ते उनका मुख-टूख न धो दें। कुत्ते उनका मुख कैसे धोयेंगे? तो वे ऐसी स्थिति में [पड़े रहते हैं। इनके लिए] यह बड़ा सुख है। कहाँ सोये हैं, क्या कर रहे हैं? इन सब लोगों का नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष है।

प्रह्लाद महाराजजी कौन हैं? [प्रह्लाद—प्र+ह्लाद।] प्र—प्रकृष्टरूपेण, और ह्लाद—ह्लादिनी शक्ति से युक्त वह चिन्मय, अप्राकृत आनन्द। जो उस [आनन्‍द] को अपने हृदय में धारण किये हुए हैं, वे प्रह्लाद हैं। उनको किसी भी स्थिति में निरानन्द नहीं होता। वे भोगों के लिए ललकते नहीं है। जिसमें जितनी अधिक भोग-[वासना होती] है, वह उतना ही अशान्त रहता है।

प्रह्लाद महाराज को भगवान् [नृसिंहदेव वरदान] दे रहे हैं और [प्रह्लाद महाराज] कह रहे हैं— “मैं बनिया नहीं हूँ। मैंने बनियागिरी करने के लिए आपसे प्रेम नहीं किया।” यदि माँगने की भी इच्छा है तो वे समस्त [कामनाएँ] दूर हो जायें। इसलिये प्रह्लाद महाराजजी बनिये नहीं हैं। हम लोग बनिये हैं।

रंगेश्वर मन्दिर में शंकरजी के दरवाजे पर पहुँच करके सवेरे-सवेरे चौखट दाबते हैं न— “बम-बम बम-बम बम-बम भोलानाथ-भोलानाथ आशुतोष-आशुतोष” कहते हुए चौखट दबाते हैं—किसलिए? “हमारा लड़का पास हो जाये, हमारा रोग दूर हो जाये, लड़के-लड़की का विवाह हो जाये, उसका असाध्य रोग दूर हो जाये।” किन्‍तु ये सब भक्ति नहीं है।

जितनी ही अधिक कामनाएँ रहेंगी, उतना ही व्यक्ति दुःखी होगा— यह निश्चित रूप में है। इस संसार को देखो और समझ लो। जो कोई इस संसार में लौकिक वस्तुओं के द्वारा शान्ति चाहता है, वह मूर्ख है। शान्ति कब होगी? एक तो वह इन विषयों को छोड़े। “त्यागानाम् अनन्तरं शान्तिः”—[अर्थात् त्याग के बाद ही शान्ति आती है। इसलिये] त्याग करो।

और सुख कैसे मिलेगा? भगवान् की सेवा के द्वारा सुख मिलेगा। जब तक तुम संसार की वस्तुओं को ग्रहण करोगे, तब तक तुम हिरण्यकशिपु के सैन्य-सामन्‍त तुल्य हो, उनके सिपाही हो। और जिस समय यह सब छोड़कर भगवान् की सेवा की ओर आयेंगे, तब तुम प्रह्लाद के दलवाले, कीर्तन करनेवाले बच्चे हो, तब तो तुमको शान्ति मिलेगी। इस बात को अच्छी तरह से समझो। यह मत सोचो कि संसार में सुख-शान्ति है। यह [संसार] तो कारागार है। भगवान् को भूलने से हम इस कारागार में बद्ध हैं। यदि कोई कारागार में शान्ति चाहता है, तो यहाँ नहीं मिलेगी। [यदि वास्तविक शान्ति चाहिये, तो] कारागार से छुटकारा पाना पड़ेगा। है न?

दूसरी बात—प्रह्लादजी पढ़ने के लिए कहाँ गये? वे शुक्राचार्य के पुत्र शण्ड और अमर्क [के पास गये।] “शण्ड-अमर्क” का क्या अर्थ है? बरसात-कालीन हरी-हरी घास या हरे-हरे पौधों को खाकर पतला मल त्याग करनेवाला जो साँड होता है, उसको शण्‍ड कहते है। उसका गोबर पाथा भी नहीं जा सकता। बरसात का गोबर लीपने के काम में भी नहीं आयेगा। तो ऐसा साँड [शण्‍ड कहलाता है] अर्थात् ऐसे कर्मकाण्‍डी जिनका कोई भी काम भगवद्‍-भक्ति में नहीं आयेगा, उनको शण्ड कहते हैं।

और “अमर्क” किसको कहते हैं? “शण्ड” [का एक और] अर्थ भी है—जिनकी इन्‍द्रियाँ वशीभूत नहीं हैं। कभी बाजार में जाता हूँ, तो देखता हूँ कि वहाँ दो साँड हैं—एक काला और एक लाल। वे जहाँ साग-[सब्ज़ी] देखते हैं न, वहाँ जाकर ऐसे मुख लगाते हैं और दुकानदार पहले से लाठी लेकर तैयार बैठे रहते हैं। ज्योंहि आया, एक लाठी मारा। उस समय तो ऐसा (मुख पीछे) कर दिया, फिर [मुख] लगा दिया। फिर वहाँ से अगली दुकान में गया, वहाँ पर भी मुख लगाया और वैसे ही उसे वहाँ भी मारते हैं। तो ये अवशीभूत, अजितेन्द्रिय लोग हैं, जो विषयों में ऐसे हाथ लगाते हैं, मुख लगाते हैं और [उनके लिए] यम के दूत या जितने रोग, कष्ट, दुःख ये सब आते हैं। इसलिये जितेन्द्रिय होना चाहिये; नहीं तो [साँड की तरह बार-बार लाठी पड़ती रहेगी।] तो [जो अजितेन्द्रिय है, वह] शण्‍ड है।

और “अमर्क” का क्या अर्थ है? “अर्क” का अर्थ है—सूर्य, और सूर्य का अर्थ है प्रकाश। जहाँ प्रकाश नहीं है—अर्थात् ज्ञान नहीं है, भगवद्‍-भक्ति का भाव नहीं है—तो वह “अमर्क” है, अर्थात् अन्‍धकार। अन्‍धकार अर्थात् अविद्या और अज्ञान। जो लोग इस [अज्ञान] से भरे पड़े हैं, जिन्हें तत्त्वज्ञान नहीं है और न ही भगवद्-भक्ति का भाव है—ऐसे व्यक्तियों को “अमर्क” कहते हैं। [इस प्रकार] “शण्ड” और “अमर्क”— ये दोनों कौन हैं? ये लोग हिरण्यकशिपु के गुरु शुक्राचार्य के पुत्र हैं। सब समय परामर्श देते हैं। ये लोग क्या परामर्श देंगे? किस वस्तु का परामर्श देंगे? केवल सांसारिक वस्तुओं के लिए ही परामर्श देंगे।

इसलिये प्रह्लाद महाराजजी ने कहा—

मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।
अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (7.5.30)

[गृहासक्त व्यक्ति अपनी असंयमित इन्द्रियों के कारण संसाररूपी घोर अन्धकारमय नरक में ही लिप्त रहते हैं। ये देहात्मबुद्धि वाले चबाये हुए को फिर से चबा रहे हैं। इन गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि न तो दूसरों के सिखाने से, न अपनी चेष्टाओं से और न ही इन दोनों के संयोग से भगवान् में लग सकती है।] GVP

प्रह्लाद महाराज से हिरण्यकशिपु ने पूछा। [उससे] पहले [उसने] गुरुपुत्रों से कहा—“शण्ड-अमर्क! [यदि] तुम मेरे गुरु के पुत्र न होते, तो आज मैंने तुम्हारा वध कर दिया होता। तुमने मेरे बच्चे की बुद्धि बिगाड़ दी है।”

[तब शण्ड-अमर्क ने उत्तर दिया—] “हमने ऐसा [कुछ] नहीं किया। हम ऐसा क्यों करेंगे?”

देखो, ये हिरण्यकशिपु के अनुचर नहीं है। शुक्राचार्य की एक लड़की थी न—याद है शुक्राचार्य की लड़की?

भक्त: देवयानी

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: देवयानी। उसका किससे विवाह हुआ?

भक्त: ययाति महाराज

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ययाति महाराज से। उस लड़की [अर्थात् देवयानी] ने जा करके अपने पिता [शुक्राचार्य] से कहा— “अरे, आपने मेरा विवाह कराया और राजा वृषपर्वा की लड़की को कहा कि मेरी नौकरानी हो करके रहेगी, दासी बन करके रहेगी। किन्‍तु इसको पुत्र कैसे हो गया? तो कुछ गड़बड़ी है। मैं वहाँ नहीं जाती। आप मेरे पति को दण्‍ड दीजिये कि ऐसा क्यों किया?”

[उससे पूर्व में] शुक्राचार्य ने वृषपर्वा के पास जाकर कहा था— “वृषपर्वा! तुम्हारी लड़की मेरी लड़की की बराबरी करेगी। अभी अभिसम्पात दे दूँगा।” [वृषपर्वा] थर-थर काँपने लगा। [शुक्राचार्य ने] कहा— “मेरी लड़की का विवाह होगा, [तो तुम] अपनी लड़की को वहाँ पर दासी बना करके भेजना।”

[वृषपर्वा ने] डर से थर्रा करके किया या नहीं? इसलिये यह [हिरण्यकशिपु] गुरुपुत्रों से डरेगा। गुरुपुत्र से नहीं डरेगा, तो उनके पिता से तो डरेगा न? यदि [गुरु-पुत्रों पर] कुछ शासन कर दिया, कुछ गड़बड़ कर दिया, तो उनके पिता शुक्राचार्य जब सुनेंगे, तो क्या करेंगे? यदि [शुक्राचार्य ने] अंगुली उठाई और उनकी ओर वक्र हो करके देखा, तो भस्म हो जायेगा। इसलिये वह डरता है। इसलिये उनको अधिक [से अधिक यह कहा—] “अरे, आपने ऐसा क्यों किया? हमारे बच्चों को बिगाड़ दिया?”

[शण्ड-अमर्क ने उत्तर दिया—] “अरे प्रभु! हमने तो बिगाड़ा नहीं। यह तो ‘नैसर्गिकीयं बालः वदति’ यह तो स्वाभाविक रूप से ऐसा कहता है। यह जन्म के पहले से सीखा या कब सीखा—हमें पता नहीं।”

[हिरण्यकशिपु ने बालक प्रह्लाद से कहा—] “अरे दुष्ट! [यह तूने] कहाँ से सीखा—बतला? कौन सिखाया? क्या इन लोगों ने सिखलाया? या कोई छिपे हुए वेश में आकर [तुझे सिखा गया?] कहीं नारद तो नहीं आ गया, या कोई और तो नहीं आया?”

[प्रह्लादजी ने कहा—] “‘मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा’ — अरे, जो शण्‍ड-अमर्क स्वयं ही गृह-अन्धकूप में डूबे हुए हैं, वे मुझको क्या शिक्षा देंगे? ‘अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं’— अदान्तगोभिः अर्थात् जिनकी इन्द्रियाँ [वश में नहीं हैं। ऐसे] अजितेन्द्रिय व्यक्ति विषयों में डूबे रहते हैं और चर्वित को भी चर्वण करते हैं। [अर्थात् जो पहले भोग चुके हैं, उसी को बार-बार भोगते रहते हैं।] जैसे कुत्ते ने कुछ खा लिया, फिर घास खा ली, घास खा करके उलटी कर दी और थोड़ी देर के बाद में जाकर फिर उसी को खाने लगता है। ऐसी [ही अवस्था] संसार के विषयी लोगों की है। एक लड़का मर गया, तो फिर दूसरा लड़का [हो गया।] अच्छा, एक लड़के का विवाह हो गया, फिर दूसरे का भी हो जाये, तीसरे का भी हो जाये, नाती का विवाह देख लूँ, परनाती का विवाह देख लूँ, उसको भी बाल-बच्चा हो जायेगा, तब हम जायेंगे। इसी तरह से ‘अदान्तगोभिर्विशतां तमिस्रं’ चर्वित (चबाये हुए) को चबानेवाले ये गुरुजी (शण्‍ड-अमर्क) हैं।”

और दूसरा क्या है? “अन्‍धा यथान्‍धैरुपनीयमानाः [#1]” — एक अन्‍धा दूसरे [अन्धे] को रास्ता दिखलाने के लिए जा रहा है। इतने में गड्ढा आया, वह स्वयं भी [गड्ढे में] गया और [जिसे ले जा रहा था, वह भी गिर पड़ा—] वे दोनों ही मरे। गुरु भी गया और चेला भी मरा। जो पकड़ करके ले जा रहा था, वह भी और जिसको ले जा रहा था, वह भी--- दोनों मरे न? जिसका गुरु शुद्ध नहीं है, तत्त्वज्ञान-सम्पन्न, रसिक वैष्णव नहीं है—वह गुरु और चेला दोनों मरेंगे।

इसलिये यदि पानी पीते हैं, तो कैसे पीते हैं? [छानकर पीते हैं।] और [यदि] दो पैसे की एक हाँड़ी भी बाजार से लेनी है, तो जैसी-तैसी [हाँड़ी दुकानदार] दे देगा, तो ले लेंगे? [नहीं लेंगे।] उसके पास में एक डण्‍डा रहता है। डण्‍डा ले लो और [हाँड़ी को] बजाओ तो। यदि वह “ठन-ठन” करती है, तो पैसे दो और ले लो। यदि “खन-खन” किया, तो [उसे छोड़ दो और] फिर “ठन-ठन” बजनेवाली लो।

जब दो पैसे की हाँड़ी लेते [समय इतनी जाँच-परख करते हैं,] तो जहाँ पर समस्त जीवन उनके चरणों में अर्पित करना होता है, सर्वस्व उनके चरणों में दे रहे हैं, और [वहाँ] बिना बजाये अर्थात् [बिना परीक्षा लिए, बिना समझे किसी को भी गुरु धारण कर लिया। उन्‍होंने] जो कुछ कहा बस ग्रहण कर लिया—ऐसा नहीं; अन्यथा वह गुरु तो जायेगा ही और तुम भी उसके पीछे-पीछे रसातल में चले जाओगे।

[प्रह्लादजी ने कहा—] “तब ये जो शण्‍ड-अमर्क हैं, ये सब विषयों में लिप्त हैं; ऐसे लोग मुझे पथ नहीं दिखला सकते। इन लोगों के कहने से मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ।”

किन्तु [प्रह्लादजी ने] यह नहीं बतलाया कि किसने कहा। किसने बतलाया था? नारदजी ने बतलाया था। [किन्‍तु] वे समझेंगे नहीं। बिना महत् पुरुषों की [कृपा के] भगवान् के चरणों में प्रीति नहीं होती है।

[हिरण्यकशिपु ने कहा—] “अरे! तेरा गुरु नहीं जानता है और तू हमसे भी…

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः।
अन्‍धा यथान्‍धैरुपनीयमानास्तेऽपीशतन्‍त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (7.5.31)

बहिरर्थमानी (विषय सुखरूपी अनर्थों को ही अर्थ अर्थात् प्रयोजन समझनेवाले), दुराशय (दुष्ट अन्तःकरणवाले अर्थात् विषयासक्त), ईशतन्त्रीमें दृढ़ (कर्म-काण्डात्मक वेदरूपी दीर्घ रज्जु द्वारा बन्धे हुए), बद्धजीव और अन्धों के पीछे अन्धे की तरह चलनेवाले व्यक्ति यह नहीं जानते कि श्रीविष्णु ही जीव की एकमात्र स्वार्थ-गति अर्थात् वास्तविक गति हैं। (GVP)

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