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Srimad Bhagavatam Series- #24- Explanation of satyam-parama-dhimahi & Essence of Srimad Bhagavatam

18:02
#1884
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 55%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Conclusion of Srimad Bhagavat-saptah.
  • Explanation of the verse "satyam-param-dhimahi".
  • Conversation between Takshaka snake and Kasyapa-Rsi when the later was going to the assembly of Sukadeva Gosvami to save Pariksita Maharaja.
  • Conversation between King Pariksita and his mother.
  • Crux of Srimad Bhagavatam is the love of Srimati Radhika for Krsna.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 24 : ‘सत्यं परं धीमहि’ की व्याख्या एवं श्रीमद्भागवत का सार

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 5 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

[0:00 से 8:16 तक कीर्तन एवं श्रीपाद तीर्थ महाराज द्वारा कथा…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्णद्वैपायन व्यास ने ‘सत्यं परं धीमहि’ [#1] से कथा का आरम्भ किया। आदि-रस के जो प्रवर्तक हैं, जो [सम्पूर्ण] विश्व-ब्रह्माण्ड का सृजन, प्रलय और स्थिति करनेवाले हैं, तथा आद्य-शृङ्गार-रस के प्रवर्तक कृष्ण, अथवा राधा-कृष्ण [युगल], अथवा केवल श्रीमती राधिका हैं—उन परब्रह्म को ‘सत्यं परं धीमहि’, उन कृष्ण को ‘सत्यं परं धीमहि’, उन युगल किशोर-किशोरी को ‘सत्यं परं धीमहि’, और अन्ततः श्रीमती राधिका को ही ‘सत्यं परं धीमहि’ के रूप में प्रणाम किया गया है।

कथा समाप्त करके... समाप्त क्या करते हैं; समाप्ति में भी वही कहते हैं—‘सत्यं परं धीमहि’। कहते हैं—

कस्मै येन विभासितोऽयमतुलो ज्ञानप्रदीप: पुरा
तद्रूपेण च नारदाय मुनये कृष्णाय तद्रूपिणा।
योगीन्द्राय तदात्मनाथ भगवद्राताय कारुण्यत-
स्तच्छुद्धं विमलं विशोकममृतं सत्यं परं धीमहि ॥
-श्रीमद्भागवतम् (12.13.19)

[जिन्होंने कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्माजी के निकट इस ज्ञान-प्रदीप (श्रीमद्भागवत) को प्रकाशित किया था, अनन्तर ब्रह्माजी के रूप में महर्षि नारदजी को, नारदजी के रूप में महर्षि वेदव्यास को, वेदव्यास के रूप में योगीन्द्र शुकदेवजी को और शुकदेव के रूप में करुणापूर्वक अनुग्रह-वर्षण करते हुए शापोपविष्ट विष्णुरात महाराज परीक्षित् के लिए प्रकाशित किया था, उसी विशुद्ध, विमल, शोक-रहित, अमृत, परम-सत्यस्वरूप श्रीनारायण तत्त्व का हम ध्यान करते हैं।] GVP

बस फिर वहीं पर [अर्थात् सत्यं परं धीमहि पर] ले आये। वही जो जगत् की सृष्टि, पालन और ध्वंस करनेवाले हैं, अथवा जिनसे मधुर-रस का प्राकट्य होता है। अन्वय और व्यतिरेक, अर्थात् संयोग (मिलन) और वियोग में जिस रस की व्युत्पत्ति होती है, और अन्त में उसी रस में इनके अतिरिक्त कोई जाननेवाले नहीं हैं, ऐसे श्रीकृष्ण अथवा ऐसे राधा-कृष्ण युगल अथवा, केवल श्रीमती राधिका [का मैं ध्यान करता हूँ।]

श्रीमती राधिका रसस्वरूपिणी हैं। कृष्ण से उनको पृथक् (minus) कर देने पर कुछ भी नहीं रह जाता। इसलिये श्रीमद्भागवत का प्रतिपाद्य विषय राधिकाजी का कृष्ण के प्रति प्रेम है। इसी प्रेम को लक्ष्य करके चलना चाहिये। महाराज परीक्षित् ने इसी प्रेम को शुकदेव गोस्वामी से प्राप्त किया।

शुकदेव गोस्वामीजी जब [महाराज परीक्षित् को श्रीमद्भागवत सुनाकर वहाँ से] चले गये, उसी समय तक्षक एक ब्राह्मण का वेश बना करके आ रहा था। मार्ग में उसकी भेंट कश्यप नामक एक ब्राह्मण से हुई।

[तक्षक ने पूछा—] “कहाँ जा रहे हो?”

[कश्यप ने कहा—] “मैं महाराज परीक्षित् की सभा में जा रहा हूँ।”

[तक्षक ने पूछा—] “क्यों जा रहे हो?”

[कश्यप ने] कहा— “जब तक्षक उन्हें काटेगा, तब मैं उसी समय चुटकी बजाते ही उन्हें [पुनः] जीवित कर दूँगा।”

तक्षक बोला— “तुम ऐसा नहीं कर सकोगे। देखो, मैं वही तक्षक हूँ।” [इतना कहकर उसने अपना वास्तविक] तक्षक का रूप धारण कर लिया और कहा— “मैं इस लम्बे-चौड़े विशाल बरगद के पेड़ को काटता हूँ। यदि तुम इसको बचा दो, तो मैं मान जाऊँगा।”

कश्यप ने कहा— “अच्छा, ठीक है। तुम काटो।”

बस तक्षक ने अपना भीषण फन प्रकट किया और वृक्ष की जड़ में काट लिया। [देखते-ही-देखते वह विशाल वृक्ष] जड़ (मूल) से अन्त (शिखर) तक सबकुछ एक सेकण्ड के भीतर में जलकर स्वाहा हो गया, भस्म हो गया।

तक्षक ने एकदम गर्व से उनकी तरफ में देखकर [कहा—] “अच्छा, तो तुम इसे [पुनः] जीवित करो।”

बस कश्यप ने अपनी जड़ी-बूटी निकाली, उसे घोटा और भगवन् नाम से, मन्त्र से पूतकर (अभिमन्‍त्रित कर) उसको अपने हाथ में लिया और राख के ऊपर में दे मारा। मारते ही देखा कि उसमें से अंकुर [फूट पड़े,] पत्ते [निकल आये,] और देखते-ही-देखते एक सेकण्ड के भीतर में वह विशाल पेड़ हो गया।

[तक्षक] ने कहा— “महाराज! आपने तो अद्भुत कार्य कर दिया। आप तो निश्चय ही महाराज परीक्षित् को भी बचा लेंगे। यह देखिये—मैं आपके सामने हीरे-जवाहरात [और स्वर्ण]-मोहरों की ढेरी लगा देता हूँ। या तो परीक्षित् महाराज को बचाइये, या इसे लीजिये।”

उस ब्राह्मण के मुख से पानी निकलने लग गया। बस उसने रुपये-पैसे ले लिये और लौट गया। उस समय धर्म ने उस ब्राह्मण को [धिक्कारते हुए] ऐसे कहा— “आज से तुम्हारा मन्त्र अब कोई काम नहीं करेगा। तुमने पैसे के लोभ से अपनी चिकित्सा को छोड़ दिया; और पैसा ही तुम्हारे लिए प्रधान हो गया।”

तो जिस किसी कार्य में [अर्थ ही प्रधान हो जाये,] भागवत-[कथा] में यदि अर्थ प्रधान हो गया, औषधि [और चिकित्सा के कार्य में] यदि अर्थ प्रधान हो गया, तो [उसका प्रभाव नष्ट हो जाता है] आजकल के चिकित्सक की बातें देखते हैं न— वे कहते हैं— “अभी एक लाख रुपये लाओ, नहीं तो हमारे यहाँ से चले जाओ।” ऐसे-ऐसे बड़े-बड़े चिकित्सकों [के विषय में] हमने सुना है। वे निष्ठुर-निर्दय होते हैं। [इस प्रकार के लोभ के कारण] मन्त्रविद् आज समाप्त हो गये हैं। उसी समय से मन्त्र-विद्या प्रायः चली गयी।

तक्षक आया, किन्तु उससे पहले ही महाराज परीक्षित् ने अपना चित्त भगवान् में लगा दिया। उन्होंने मन को ब्रह्माण्ड से [ऊपर उठाकर] राधा-कृष्ण के युगल चरणों में लगा दिया। और उसमें से [आत्मा को] निकालकर राधा-कृष्ण [की सेवा में और इस प्रकार वे] गोलोक वृन्दावन में चले गये। [पीछे केवल] शरीर रह गया—निरस और बिना आत्मा का, सूखा भूसा जैसा। अब तक्षक आया और उसने इसी [शरीर] को काटा। वह भूसा तो ऐसे ही जला हुआ था, उसको कुछ नहीं कर सका और वह जलकर समाप्त हो गया। उससे पहले ही महाराज परीक्षित् उस भाव में गोलोक वृन्दावन धाम में [पहुँच चुके थे,] जिस भाव को देने के लिए शुकदेव गोस्वामी आये थे। वे क्या देने के लिए [आये थे?]—गोपी-प्रेम। वे उस गोपी-प्रेम में [निमज्जित हो गये।]

महाराज परीक्षित् पहले से ही भगवान् के परिकर थे; अब थोड़ा और भी शुद्ध होकर,भगवान् के प्रेम में मत्त होकर, वे वहाँ पर परिकर होकर चले गये। ऐसा मत समझना कि परीक्षित् महाराजजी को साँप ने डँस दिया। उन्हें इस जगत् की कोई भी वस्तु स्पर्श नहीं कर सकती। इस प्रकार महाराज परीक्षित् वहाँ पर चले गये।

[उनके जाने से] थोड़ा-सा पहले उनकी मैया [उत्तरा देवी] वहाँ आयीं। मैया ने कहा— “बेटा! मैं स्त्री-बुद्धि की हूँ। इतने तत्त्व-विज्ञान इत्यादि को मैं समझ नहीं सकी। मेरे लिए संक्षेप में इस श्रीमद्भागवत का भी सार कहो। भागवत तो वैसे भी ‘निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् [#2]’ है ही, किन्तु उसमें भी जो सारवस्तु है, वह मुझे बताइये।”

तब उन्होंने मैया को दो उपाख्यानों के द्वारा [श्रीमद्भागवत का भी सार] बतलाया, जिसमें गोपकुमार का उपाख्यान और नारद ऋषि का उपाख्यान बताया। अन्त में उसके द्वारा बतलाया— “मैया! अब मैं तुमसे क्या लज्जा करूँ, और तुम भी मुझसे क्या लज्जा करो? अब लज्जा करने की आवश्यकता नहीं है। इन कृष्ण को तुम अपना परम प्रियतम समझो, जैसे गोपियों ने समझा था; और जिस प्रकार गोपियों ने उनकी आराधना की, उसी प्रकार [तुम भी उनकी] आराधना करो। यह मैंने तुम्हें श्रीमद्भागवत का गुप्त सार बताया।” [यह सुनकर] वे कृतकृतार्थ हो गयीं और वे भी शरीर को छोड़कर गोलोक वृन्दावन में पहुँच गयीं। ऐसा है यह श्रीमद्भागवत।

सूत गोस्वामीजी अपने गुरुजी को प्रणाम करके अन्त में कहते हैं—

नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।
प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (12.13.23)

[जिनका नाम-संकीर्तन समस्त पापों का विनाश करनेवाला है और जिनके प्रति किया गया नमस्कार समस्त दुःखों को हर लेनेवाला है, मैं उन परमपुरुष श्रीहरि को प्रणाम करता हूँ।] GVP

उस हरि को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनका नाम-संकीर्तन करने से संसार के सब दुःख दूर हो जाते हैं और श्रीराधा-कृष्ण के चरणों में एकान्तिक प्रेम उत्पन्न होता है।

ऐसे श्रीमद्भागवत को प्रणाम करके हम लोग आज इस समय के लिए कथा का समापन कर रहे हैं। किन्तु ऐसा मत समझिये कि आज कथा समाप्त हो गयी; आज से आरम्भ करेंगे। भागवत का जो सार हम लोगों ने बतलाया—गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम—उसके प्रति आप लोगों का लोभ हो, आपका जीवन सार्थक हो।

इन दस दिनों की कथा में यदि किसी को किसी प्रकार का मनः क्षोभ हुआ हो, तो वे हम लोगों को क्षमा करें। वे हमारी त्रुटियों को दूर करेंगे और इस कथा का जो सार है, उसे आप लोग श्रवण करके और ग्रहण करके जायेंगे। इस कथा में [जिन्होंने किसी भी प्रकार से] योगदान दिया—इसमें कुछ भी, एक माला, फूल, तुलसी, चन्दन किसी प्रकार से लाये; [जिन्होंने] कथा का श्रवण किया, कथा कही, किसी प्रकार से अनुमोदन किया; विशेषकर [जिन्‍होंने] नीचे आप लोगों के जूतों की रखवाली की, मैं उन सबको [प्रणाम करता हूँ।] जिन लोगों ने इतने सुन्दर-सुन्दर कीर्तन किये और इस कथा को सब समय रोचक बनाया, [उन सबको भी मेरा प्रणाम।] महिलाओं में भी मैं सबको प्रणाम करता हूँ। आप सब व्रजवासी लोग हम लोगों पर कृपा करेंगे कि श्रीमद्भागवत का सार, जो गोपीप्रेम है, उसके प्रति हम लोगों का थोड़ा-सा लोभ हो। मैं यही प्रार्थना करके अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ।

अब श्रीमान् सुरेशजी एक कीर्तन करेंगे, और उसके बाद हम लोग भागवत की आरती उतार करके समाप्त करेंगे। जैसा कि बतलाया गया है, कल आप लोग आकर कथा में पूर्ण आहूति प्रदान करेंगे। बोलो—जय श्रीराधे!

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्‍
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्‍ति यत् सूरयः।
तेजो-वारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.1.1)

जिन परमेश्वर से इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) तथा विनाश कार्य अन्वय और उसके विपरीत व्यतिरेक रूप में साधित होते हैं, जो जगत् के कर्त्ता के धर्म से सम्पूर्ण रूप में अवगत हैं, जिनमें स्वतःसिद्ध ज्ञान स्वयं विराजमान है, जिन्होंने आदिकवि ब्रह्मा के हृदय में सङ्कल्प के द्वारा तत्त्व-वस्तु को प्रकाशित किया है, जिन परमेश्वर के सम्बन्ध में ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता भी मोह में पड़ जाते हैं; तथा जिस प्रकार तेज, जल और मिट्टी में परस्पर एक के बदले दूसरी वस्तु का सत्य की भाँति भ्रम होता है (अर्थात् जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का सत्य की भाँति भ्रम होता है), उसी प्रकार जिन परमेश्वर में सत्त्व, रज और तम गुणों का अवस्थान सत्य की भाँति प्रतीत होनेपर भी वस्तुतः जिनमें जड़धर्म सम्भव ही नहीं है, जो माया और माया के कार्य-कपटता से सर्वदा मुक्त हैं, समस्त जीवों के हृदय में विराजित तथा सर्वदेशकालवर्ती उन्हीं सत्यस्वरूप-लक्षणमय परमेश्वर का हम ध्यान करते हैं। (GVP)

#2
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.1.3)

हे भगवत्-प्रीतिरस-रसिकजनो! हे अप्राकृत रसविशेष की भावना में चतुर भक्तो! श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पतरु का परमानन्दरसमय परिपक्व फल है। यह छिलका, गुठली आदि कठिन हेय-अंश से रहित, तरल होने के कारण पान करने योग्य है। श्रीशुकदेव गोस्वामी के मुख से निकलकर शिष्य-प्रशिष्यादि की परम्पराक्रम से स्वेच्छा से पृथ्वीपर अखण्ड रूपमें अवतीर्ण इस फल को आपलोग मुक्त अवस्था में भी पुनः-पुनः पान करते रहें। स्वर्ग के सुखों की उपेक्षा करनेवाले परम मुक्तपुरुष भी इस रसमय फल (श्रीमद्भागवत) की उपेक्षा न करके नित्यकाल ही इसका सेवन किया करते हैं। (GVP)

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