Detailed explanation of Guru-vandana, Sri Guru-carana-padma
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- Detailed explanation of mangalacarana, guru-vandana, 'vande 'ham sri-guroh sri-yuta-pada-kamalam'.
- Offering prayers to both diksa and siksa gurus.
- Krsna is one, but He reveals Himself in three forms to us. Madana-mohana (Sambandha), Govinda (Abhidheya), Gopinatha (Prayojana).
- Srila Sanatana Gosvami taught us sambandha jnana (relationship with Krsna) and Srila Rupa Gosvami taught us abhidheya tattva, the process to attain Krsna. Mahaprabhu gave different responsibilities to each gosvami.
- Siksa and diska gurus are equal.
- We should always respect our patha-pradarsaka-gurus - people who have guided us and brought us to our diksa guru.
- Which title is bigger? Vaisnava, Siksha Guru or Diksa Guru?
- All of our gosvamis are Vaisnavas; never try to compare one with another.
- There is a section of non-qualified people who say that we will only listen to our Gurudeva and not to other Vaisnavas; they do not understand the philosophy correctly.
- The process of offering obeisances starts from Sri Guru, Sri Siksa Guru, entire Guru Parampara, associates of Mahaprabhu, Sri Radha-Krsna with all associates, Sri Radha-kunda Syama Kunda, Sri Govardhana, Srimati Vrnda Devi etc. Vrnda Devi has whole and sole authority to take us to Nikunja lila; we must pray for her mercy.
- Detailed explanation of 'sri guru carana padma'.
- Guru is an eternal associate of Sri Krsna and Srimati Radhika.
- Difference between mood of opulence and mood of spontaneous loving service.
Transcript
गुरु-वन्दना एवं श्रीगुरुचरण-पद्म की विस्तृत व्याख्या
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 20 जनवरी, 1996 को दिल्ली में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। सम्पादित संस्करण के नीचे शाब्दिक प्रतिलेखन उपलब्ध है।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सबसे पहले ‘वन्देऽहं’– मैं वन्दना करता हूँ। ‘श्रीगुरोः श्रीयुतपदकमलं’– मैं अपने दीक्षागुरु के श्रीचरणकमलों की वन्दना करता हूँ। इसके बाद ‘गुरुन्’– जो हमारे शिक्षागुरु हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ। शिक्षागुरु कौन हैं? दीक्षागुरु कौन हैं? जो मन्त्र देकर कृष्ण के साथ में हमारा सम्बन्ध स्थापित कर देते हैं, वह दीक्षागुरु हैं और वही यदि हमें भजन-मार्ग की शिक्षाओं को प्रदान करें, कृष्ण की लीला-कथाओं को सुनायें, कैसे उसमें हम प्रवेश कर सकते हैं, इसको बतलायें तो वह शिक्षागुरु हैं।
श्रील सनातन गोस्वामी को दीक्षागुरु [सम्बन्ध-तत्त्व के आचार्य] माना गया है और श्रील रूप गोस्वामी को शिक्षागुरु [अभिधेय-तत्त्व के आचार्य] बताया गया है। किस प्रकार से? [सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन के लिए] श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्द और श्रीगोपीनाथजी के तीन मन्त्र और हमारे हैं।
कृष्ण एक ही हैं। जब सबसे पहले गुरु [हमारा] उनसे सम्बन्ध जोड़ते हैं कि तुमको कृष्ण का भजन करना चाहिये। वे अपने रूप से, गुणों से, माधुर्य से मदन को भी मोहित करनेवाले हैं, तब वह मदनमोहनजी हैं और जब उनसे सम्बन्ध होने के बाद में उनकी सेवा आरम्भ होती है, तो वह गोविन्दजी हैं और जब वह सेवा के द्वारा वशीभूत हो जाते हैं, तब वह कौन हैं? गोपीनाथजी। [वास्तव में] एक ही कृष्ण हैं।
[यद्यपि कृष्ण] योगियों के ध्यान में नहीं आते, किन्तु ऐसे भक्त [जिन्होंने उन्हें वशीभूत कर लिया है, उनके] लिए वह ‘देही पदपल्लवमुदारम्’ [भी कह देते] हैं। वे कृष्ण राधाजी को कहते हैं– “मैं तुम्हारे चरणों का दास हूँ”– [ऐसा] कहने में वे लजाते नहीं हैं। ये हो गये– गोपीनाथजी। जब कृष्ण प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं, तो वह गोपीनाथ हैं। जब तक [कृष्ण से] सम्बन्ध [स्थापित] हो रहा है, तब तक वह मदनमोहन हैं और जब हम उनकी सेवा प्राप्त करने लगते हैं, तो वह गोविन्दजी हैं।
सनातन गोस्वामीजी सम्बन्ध जोड़नेवाले हैं। [इसलिये ये सम्बन्ध-तत्त्व के आचार्य हैं।] कैसे उनकी सेवा की जाती है, इसको देनेवाले रूप गोस्वामी हैं। इसलिये ये शिक्षागुरु हैं [अर्थात् अभिधेय-तत्त्व के आचार्य हैं।] और जब सेवा आरम्भ होने के बाद में [कृष्ण] वशीभूत हो जाते हैं, इन्हीं का रूप फिर बदल जाता है [और ये गोपीनाथ कहलाते हैं।]
रूप गोस्वामी सभी [तत्त्वों के आचार्य] हैं। वे सम्बन्ध भी दे सकते हैं, अभिधेय भी दे सकते हैं और प्रयोजन भी दे सकते हैं। सनातन गोस्वामी भी सभी दे सकते हैं। किन्तु महाप्रभुजी ने एक-एक व्यक्ति के ऊपर में एक-एक सेवा का भार दिया। [ऐसा] लग सकता है कि रूप गोस्वामी जितना जानते हैं, सनातन गोस्वामी [उतना] नहीं जानते हैं। किन्तु यह समझो कि सनातन गोस्वामीजी रूप गोस्वामी के गुरु हैं। इसलिये उनको कम मत समझना।
शिक्षागुरु छोटे हैं और दीक्षागुरु बड़े हैं, ऐसा मत समझना। किसी-किसी स्थिति में शिक्षागुरु बहुत ऊँचे (श्रेष्ठ) होते हैं। बहुत ऊँचे होते हैं। जब कृष्ण ही शिक्षागुरु हैं, चैतन्य महाप्रभु शिक्षागुरु हैं, ललिता-विशाखाजी शिक्षागुरु हैं, तो देखो [शिक्षागुरु] कितने बड़े, [कितने] ऊँचे हुए, जो दीक्षागुरु भी नहीं हैं। इसलिये इस [श्लोक] में [वन्दना करने का एक] क्रम दिया गया। पहले दीक्षागुरु [की वन्दना की गयी है] क्योंकि उन्होंने सम्बन्ध दिया। इसके बाद में शिक्षागुरु [की वन्दना की गयी है] और शिक्षागुरु को ही वे बतला रहे हैं, ये यहाँ [इस श्लोक में]। अन्त तक बतलायेंगे। और उन शिक्षा-गुरुओं की वन्दना में भी एक क्रम है।
‘श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरुन्’– [यहाँ पर] ‘गुरुन्’ कौन? शिक्षागुरु। कुछ पथ-प्रदर्शक गुरु होते हैं। एक चैत्यगुरु होते हैं, [जो अन्तर्यामी के रूप में हमारे] पथ को प्रदर्शित करनेवाले होते हैं। उनको भी महत्ता देनी चाहिये। यदि किसी ने हमको हरिकथा बतला करके गुरुजी के समीप ला दिया– ये पथ-प्रदर्शक गुरु कहलाते हैं। उनको भी यथायोग्य सम्मान देना चाहिये। आप लोगों को जिन लोगों ने हरिकथा सुना करके गुरु के पास में लाया है, उनको भी सब समय सम्मान देना चाहिये।
आजकल कुछ ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं– “उनको (पथ-प्रदर्शक गुरु को) सम्मान देने की कोई आवश्यकता [नहीं हैं। उनको सम्मान] देने की क्या आवश्यकता है? वह तो हमारा ऐसा भाग्य था, हमारा ऐसा संस्कार था कि हम गुरुजी से [मिले,] किन्तु उनके माध्यम से आये थे। इसलिये उनके प्रति हमारा कोई भी आदर इत्यादि देने की आवश्यकता नहीं है।” किन्तु ये अपराध है। ऐसा नहीं होना चाहिये।
गुरु भी वैष्णव हैं, ये समझो। गुरु क्या हैं? वैष्णवों में प्रधान एक हैं। अब उसी को ले करके ये बतला रहे हैं। ‘श्रीरूपं’ [अर्थात्] श्रीरूप गोस्वामी। ‘साग्रज’ – उनके अग्रज अर्थात् सनातन गोस्वामी। ‘सहगणरघुनाथन्वितं सजीवम्’ अर्थात् [अपने गणों के सहित] श्रील रघुनाथभट्ट गोस्वामी, श्रील रघुनाथदास गोस्वामी और श्रील जीव गोस्वामी इत्यादि जितने हैं। ये सब जो गण हैं। किनके? इन छह गोस्वामी लोगों के। इनको यदि वैष्णव मानते हैं, तो दीक्षागुरु बड़े हुए या वैष्णव लोग बड़े हुए?
यदि रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथदास गोस्वामी, रघुनाथभट्ट गोस्वामी यदि वैष्णव हैं और हमारे गुरु हैं। अभी मान लेंगे जो हमारे गुरु ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज हैं, उनके गुरु श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर हैं। अब हमारे गुरु ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज हैं, [तो यहाँ पर गुरु एवं वैष्णव में कौन श्रेष्ठ हैं?] अच्छा, हम उनसे प्रार्थना करते हैं– “हे गुरुदेव! हमको रूप मञ्जरी के, रूप गोस्वामी के चरणों में ले करके अर्पित कर दें।” क्यों कहते हैं? रूप गोस्वामी की कुछ महिमा है कि नहीं है? तो ये यदि वैष्णव हैं, इनको रूप गोस्वामी को, रघुनाथदास गोस्वामी, जीव गोस्वामी इत्यादि को हम वैष्णव मानते हैं, तो ये वैष्णव बड़ा पद है या दीक्षागुरु और शिक्षागुरु का? कौन सा [पद बड़ा] है? वैष्णव [पद ही बड़ा है।] इसलिये इन सब में ‘कौन छोटा है? कौन बड़ा है?’ – यह विचार मत करो। दीक्षागुरु का महत्व यह है कि वह हमको चोटी से पकड़ करके इस संसार से ले आये हैं, किन्तु वह कृष्ण से, राधाजी से तो बड़े नहीं हो जायेंगे?
हम अभी उनके चरणों की पूजा करेंगे [क्योंकि वह हमको] उनके चरणों तक लाये हैं। इसलिये हम सबके आभारी हैं, हम सबके [प्रति] कृतज्ञ हैं। जिस समय हमारे गुरु हमको ले करके श्रील रूप गोस्वामी के चरणों में अर्पित कर देंगे। कैसा सौभाग्य है? अरे, हमारी बात तो छोड़ दो, नरोत्तम ठाकुरजी कह रहे हैं। किसको? [श्रील लोकनाथ गोस्वामी को]
प्रभु लोकनाथ कबे सङ्गे लइया जाबे
श्रीरूपेर पादपद्मे मोरे समर्पिबे।
[वह दिन कब आयेगा जब श्रीलोकनाथ गोस्वामी मुझे साथ ले जाकर श्रील रूप गोस्वामी के श्रीचरणों में समर्पित कर देंगे।] GVP
[लोकनाथ गोस्वामीजी] रूप गोस्वामी के चरणों में समर्पित कर देंगे। बतलाओ तो? तो ये तो गुरु की महिमा घट गयी ना? नहीं, बढ़ गयी। ऐसा मत समझो कि गुरु की महिमा घट गयी। आजकल के कुछ नौसिखिये (अनुभवहीन), जो भक्ति में अभी प्रवेश नहीं किये हैं, यही सब विचार करते हैं। यही लोग कहते हैं कि हम अपने गुरु के अतिरिक्त और किसी की बात नहीं मानेंगे। उनको भक्तिरस का, सिद्धान्त का कोई भी ज्ञान नहीं है।
अब देखो, ये तो वैष्णवों [के सम्बन्ध] में बतलाया। अब वैष्णवों के बाद में महाप्रभुजी के गणों को ले लिया। ‘साद्वैतं’ – श्रीअद्वैताचार्य। ‘सावधूतं’– [श्रीनित्यानन्द प्रभु।] पहले अद्वैताचार्य का नाम लिया, इसके बाद में नित्यानन्द अवधूत [का नाम] लिया। तो पहले जिसका नाम लिया वही बड़ा हो गया और पीछेवाला छोटा हो गया? ऐसा मत सोचो। [साद्वैतं–] अद्वैताचार्य, [‘सावधूतं’–]अवधूत नित्यानन्द प्रभु– बलदेव प्रभुजी।
‘परिजन सहितं कृष्ण-चैतन्य देवम्’ [अर्थात् परिजनों सहित श्रीकृष्णचैतन्य देव।] अब ‘परिजन सहित’ माने कौन हुए? स्वरूप दामोदर, राय रामानन्द, रूप गोस्वामीजी, सबसे अधिक गदाधरजी, और भी कितने सब हैं। ये इनके परिजन हैं।
अब अद्वैताचार्य का महत्व एक है और ये परिजन लोग हैं, भजनराज्य में किसका महत्व अधिक होगा? परिजनों का महत्व अधिक होगा। अद्वैताचार्य क्या हैं? महाविष्णु। और नित्यानन्द प्रभु स्वयं बलदेव हैं। [रस विचार से भजनराज्य में] हमको बलदेव प्रभुजी की अधिक आवश्यकता है? या गदाधर पण्डित, स्वरूप दामोदर, राय रामानन्द हमारे निकट हैं? कौन हैं? ये विचार सब रहना चाहिये। और यदि [साधक की] ऐश्वर्य की ओर अधिक [रूचि] है, [वह] कहे– “अद्वैताचार्य! बलदेव प्रभु!” बस। वे हमारे लिए प्रणम्य हैं, बहुत दूर से। कुछ दूर से वे प्रणम्य हैं। यदि दूसरे वेश में आ जाये, तब तो फिर वे निकटतम हैं। किस वेश में?
भक्त: अनङ्ग मञ्जरी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, अनङ्ग मञ्जरी के रूप में आ जायें, तब तो फिर बहुत [निकट हैं।] वे हमारे [लिए] परिजन हो गये। इसलिये इन सबका विचार होना चाहिये। सब में वैशिष्ट्य है। भक्तिराज्य में ये सब वैशिष्ट्य नहीं रहने से केवल भीम, अर्जुन, नकुल– ये सब बनने से नहीं होगा। भक्तिराज्य में प्रवेश करने के लिए, विशेष करके महाप्रभु जिस भक्ति को देने आये हैं, ये सब विचार होना चाहिये। जो गुरु इन सब वस्तुओं को देता है, वह [वास्तविक] गुरु है। जो गुरु इन सब वस्तुओं को नहीं दे सकते, वे गुरु नहीं हैं। वे वैष्णव हो सकते हैं। वे मान्य है, बस इतना ही। किन्तु गुरु में ये सब ज्ञान [होना चाहिये।] हमारे सम्प्रदाय का गुरु ऐसा होना चाहिये।
अब देखो अन्त में ले आते हैं, ‘श्री राधाकृष्ण पादान् सहगण’। सहगण अर्थात् यहाँ पर राधाकृष्ण के [गण] हुए। कृष्ण से भी आगे राधाजी को लगा दिया। राधाकृष्ण और उनके सहगण। उनकी ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रङ्गदेवी, सुदेवी और उनसे भी अधिक रूपमञ्जरी इत्यादि सब हैं। महाप्रभु के भजन में इन सब का विचार है। इन सबको एक ही श्लोक में प्रणाम किया गया है। एक ही श्लोक में सबका प्रणाम सब जगह नहीं मिलता है। इसलिये इसको अवश्य ही याद करके, [इसके माध्यम से] प्रतिदिन वन्दना करना चाहिये। यदि अधिक [श्लोक] ना याद हो, तो इससे भी [वन्दना] हो जायेगी।
अब इसी को नीचे में बढ़ा करके ले आये हैं। कहाँ तक? वह अन्तिम तक–
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
वह पूरा सब ले आये। इसी का ये विस्तार है।
वन्दना करते समय ये भी करना चाहिये। अपने गुरुजी की वन्दना करने के बाद में [परमगुरुदेव की वन्दना] भी होनी चाहिये। क्यों? यदि हम परमगुरुदेव की वन्दना नहीं करेंगे, तो हमारे गुरुजी प्रसन्न नहीं होंगे। तो प्रसन्न नहीं है, तो फिर क्या हुआ? हमारे गुरुजी कहेंगे– “हमारी वन्दना मत करो। हमारे गुरुजी की वन्दना करो।” इसलिये हम दोनों की करेंगे।
और प्रभुपादजी क्या कहेंगे– “हमारे गुरुजी की वन्दना की?”
[हम–] “नहीं तो”
[प्रभुपादजी–] “तो जाओ, हम [अपनी वन्दना भी] निरस्त (cancel) कर देते है।”
इस प्रकार से [श्रील गौरकिशोरदास बाबाजी महाराज,] श्रील भक्तिविनोद ठाकुर, श्रील जगन्नाथदास बाबाजी महाराज, श्रील बलदेव विद्याभूषणजी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी, श्रील नरोत्तम ठाकुरजी, उनके बाद में श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीजी, इसके बाद में छः गोस्वामी, इसके बाद में स्वरूप दामोदर, राय रामानन्द, इसके बाद में पञ्चतत्त्व, पञ्चतत्त्व [की वन्दना] करेंगे और इसके बाद में तब श्रीश्रीराधाकृष्ण गोप-गोपीगण, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, गिरिराज गोवर्धन [की वन्दना करनी चाहिये।] इस तरह से वन्दना करनी चाहिये। वन्दना करने के बाद में खाट से उतरो। तब फिर अपनी नित्य-क्रियाओं में लगो। इस तरह से दैनन्दिन अपना कार्य [करो।] पहले पहल जैसे उठे ना? तो ऐसे-ऐसे करके लोग [अपनी दोनों हथेलियों को] देखते हैं। तो ऐसे नहीं। ये दर्पण लगाओ– अपनी गुरु परम्परा, महाप्रभुजी को, राधाकृष्ण को– सबको प्रणाम करते हुए [तब खाट से उतरो।] ये सब समय याद रखना। कृष्ण और उनके परिकरों के पहले महाप्रभु और उनके परिकरों की [वन्दना करेंगे।] ये सब वन्दना हो करके तब फिर [कृष्ण और उनके परिकरों की वन्दना] करेंगे, नहीं तो कृष्णलीला ठीक रूप से हृदय में नहीं आयेगी। ये सब परम्परा ठीक रखनी चाहिये [अर्थात् गुरु-परम्परा की वन्दना क्रमपूर्वक करनी चाहिये।]
इसमें अभी हम लोग छोटा-बड़ा तो नहीं देखेंगे। हाँ, वैशिष्ट्य देखेंगे। किसका कैसा वैशिष्ट्य है? वैशिष्ट्य के अनुसार में हम किसके पास में अधिक रहें? बलदेव प्रभुजी का बहुत [विशेष तत्त्व है, उनका] कृष्ण ही के समान तत्त्व है। किन्तु गोपियाँ उनको देख करके क्या करती हैं? उनको प्रणाम कर लेती हैं, दूर से घूँघट भी निकाल लेती हैं और राधाजी के पास में, कृष्ण के पास में चली जाती हैं। ठीक ऐसे ये सब भाव हम लोगों के अन्दर में आने चाहिये।
भक्त: महाराज! दण्डवत करेंगे या जय जयध्वनि देंगे?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अरे! इसको कर लीजिये। इसके बाद में जय दीजिये या जय दे करके फिर इनको अन्ततः कर लीजिये। इसके बाद में फिर अपना दन्त-धावन इत्यादि जो कुछ करना है, [उसको] करके फिर अपना विधिवत भजन आरम्भ कीजिये। वृन्दाजी को अन्त में या जब हो, उनको भी अवश्य ही प्रणाम करना चाहिये।
वृन्दाजी कौन हैं? कृष्ण की योगमाया। योगमाया ही पूर्णिमादेवी हैं। योगमाया [ब्रज की] समष्टिगत लीलाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। याद रखो। ब्रज में कृष्ण की जितनी भी लीलाएँ है, प्रकट से लेकर के और जितनी भी लीलाएँ हैं, सबकी समष्टिगत अधिष्ठात्री देवता पूर्ण रूप से ये पूर्णिमाजी हैं– योगमाया हैं। और उन्हीं का एक विशेष [प्रकाश] ये वृन्दाजी हैं। वृन्दावन में कृष्ण की गोपियों के साथ में जो लीलाएँ संगठित होती हैं, इसमें वृन्दाजी का [योगदान] है।
भक्त: (16:43 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: समस्त लीलाओं को। समस्त लीलाओं को पुष्टि करानेवाली पूर्णिमाजी हैं और राधाकृष्ण को [मिलानेवाली] या जीवों को कृष्ण से मिलानेवाली, जितनी कुञ्ज इत्यादि की सेवाएँ हैं, वृन्दावन में विचरण की लीलाएँ हैं– ये सब वृन्दाजी करती हैं। बिना वृन्दाजी की कृपा के कोई कृष्ण से, राधाजी से, युगल रूप में नहीं मिलेगा। कृष्ण से अकेले में जितनी भी उनकी लीलाएँ हैं, सखाओं के साथ में हैं, माता इत्यादि के साथ में, उन सबमें योगमाया का प्राधान्य है और गोपियों के साथ में कृष्ण की जितनी भी लीलाएँ हैं, इसमें केवलमात्र वृन्दाजी का विशेष (special) [अधिकार] है। दोनों का अपनी-अपनी जगह में महत्व होने पर भी समष्टिगत है। समष्टिगत अर्थात् कृष्ण के जन्म से ले करके अन्त तक समस्त लीलाओं को करानेवाली, ये योगमाया है। गोपियाँ जो कात्यायनी इत्यादि व्रत कर रही हैं, वह योगमाया का काम है [अर्थात् योगमाया] कर रही हैं। किन्तु कृष्ण की लीला में उनको ले जाने के लिए, ये कौन ले जायेगा? वृन्दाजी ले जायेंगी। वृन्दाजी ले जायेंगी उनसे मिलन करायेंगी। इसलिये वृन्दाजी का हम लोग सब प्रकार से, जब भी कोई वन्दना होगी, उनकी अवश्य ही वन्दना इत्यादि करते हैं।
वृन्दायै तुलसी देव्यै प्रियायै केशवस्य च।
कृष्णभक्ति-प्रदे देवि सत्यवत्यै नमो नमः॥
[श्रीकृष्ण की अतिशय प्रिया होने से कृष्णभक्ति को प्रदान करनेवाली तथा वृन्दा एवं सत्यवती के नाम से प्रसिद्ध, हे तुलसीदेवि! आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है।] IGVP
और एक है-
भक्त: भक्त्या विहीना…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
भक्त्या विहीना अपराध-लक्षैः, क्षिप्ताश्च कामादि तरङ्ग मध्ये।
कृपामयि! त्वां शरणं प्रपन्ना, वृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम्॥
-श्रीवृन्दादेव्यष्टकम् (8)
[हे कृपामयी देवि! वृन्दे! हम तुम्हारे चरणारविन्दों को भावपूर्वक प्रणाम करते हैं; क्योंकि हम सब श्रीहरिभक्ति से विहीन हैं, अतएव लाखों प्रकार के अपराधों से काम आदि दुस्तर समुद्रों की तरंगों में फेंके जा रहे हैं, अतएव आपकी शरण में आ रहे हैं।] GVP
अब इस बार इसका अर्थ के साथ में संकलन करेंगे कि सभी लोग इसको समझ सके, ऐसा करेंगे। इसमें ये जहाँ तक हो सके, अन्ततः नहीं याद है, तो देख करके भी ये सब प्रणाम-मन्त्र इत्यादि करना चाहिये।
‘श्रीगुरुचरण-पद्म, केवल भकति-सद्म’– ‘भक्ति-सद्म’, गुरुजी के चरणकमल जो हैं, ‘केवल भकति-सद्म’। केवल अर्थात् एकमात्र। गुरुजी के चरणकमल एकमात्र भक्ति के भवन हैं, घर हैं, खजाने हैं। इसलिये गुरुजी की सेवा को उस रूप में, विश्रम्भ रूप में ही करें। एक होता है– गौरव के साथ में और एक होता है– विश्रम्भ रूप में। अर्चन में गौरव का प्राधान्य है अर्थात् पूज्य बुद्धि। वे बड़े हैं, हम छोटे हैं। किन्तु बड़े सरल, स्वाभाविक रूप में उनकी सेवा होनी चाहिये। कहीं भी डर की बात नहीं। जिनका हृदय निश्छल होगा, वे तो ऐसा कर सकेंगे। वह भक्ति का खज़ाना है। उसकी कुञ्जी उनके हाथों में है। वह खोल देंगे, तब तो आगे बढ़ेंगे। तो गुरु भी ऐसा होना चाहिये। वह क्या [कहावत है कि] छान कर...
भक्त: पानी पियो छान कर। गुरु करो जान कर।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, पानी पियो छान कर और गुरु करो जान कर। जान करके, समझ करके करो। ऐसे नहीं कि पीछे पछताना पड़े। ऐसा नहीं। समझो। भले ही देरी हो जाए, किन्तु [गुरु] तत्त्वविद् हो। अन्धविश्वास से नहीं, समझ-बूझ करके [गुरु करो। गुरु] तत्त्वविद् हो, जो इन तत्त्वों को आसानी के साथ में हमारे हृदय में पहुँचा सके। जो राधाकृष्ण के तत्त्व को, गुरुवर्गों के तत्त्व को, चैतन्य महाप्रभु के तत्त्व को, प्रेम-तत्त्व को, कृष्ण-तत्त्व को अच्छी तरह से हमें समझा सकें। ‘वन्दों मुँइ सावधान मते।’…
‘केवल भकति-सद्म’ का एक अर्थ और हुआ। [पहला अर्थ है–] केवल भक्ति का घर और एक है– ‘केवल भक्ति-सद्म’। केवल अर्थात् क्या? शुद्धा-प्रेम, प्रेमा भक्ति का घर। कौनसा प्रेम? केवल भक्ति कौनसी हो सकती है? गोपियों की जो भक्ति है। ब्रज, वृन्दावन की जो गोपियाँ हैं, कृष्ण की जो प्रेयसियाँ हैं, इनकी भक्ति ही केवलमात्र ‘केवल’ है और बाकी संकुला है। संकुला अर्थात् क्या? मिश्र। बलदेव प्रभुजी की भक्ति कैसी है? उसमें चार-पाँच भक्तियाँ मिली हुई हैं। उसमें दास्य भी है, वात्सल्य भी है, सख्य भी है और अनङ्ग मञ्जरी में केवल वह केवला है। इसी तरह से सबमें केवल भक्ति कहने से उसी का होगा। साधारण रूप में केवला-भक्ति कहने से इस जगत् में दार्शनिक पद्धति से केवला-भक्ति केवल कृष्ण के प्रति अनन्या-भक्ति है। [केवला-भक्ति] और किसी की नहीं, [केवल] कृष्ण की भक्ति है।
[श्रील गुरुदेव किसी भक्त को शोर करने से निषेध करते हैं...]
तो गीता में जो अनन्य-भक्ति का, केवला-भक्ति का बतलाया गया है– ‘अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।’ [#1] [वह इसी ‘केवला भक्ति’ के विषय में बताया गया है।] देखो, गीता में दूसरे और तीसरे अध्याय में जिस ज्ञान की व्याख्या की गयी है, बतलाया गया है...
[श्रील गुरुदेव किसी भक्त को उनके निकट में बैठने के लिए कहते हैं...]
गीता के दूसरे और तीसरे [अध्याय] में [अध्यात्मज्ञान की बातें हैं।] पहलावाला जो [अध्याय] है, वह भूमिका है। पहले का जो अध्याय है, एक तरह से भूमिका है। दूसरे-तीसरे अध्याय में जिस ज्ञान की अवतारणा की गयी है, बतलाया गया है– ये अध्यात्मज्ञान है। कुछ लोग अध्यात्मज्ञान को कृष्ण की भक्ति, जो ब्रजवाली है, एकदम वहाँ तक ले जाते हैं। ऐसा ठीक नहीं है। वहाँ तक [ले जाना] ठीक नहीं है। यद्यपि आत्मा को भगवान् के लिए भी कहा जा सकता है, कृष्ण के लिए भी [कहा जा सकता है]। किन्तु साधारण रूप में आत्मा कहने से जीवात्मा का [बोध] होता है। ब्रह्म कहने से कृष्ण का भी बोध हो सकता है। शब्द के रूढ़ि[वृत्ति] जो अर्थ हैं, ये सब विचार हैं। किन्तु ब्रह्म कहने से ही कृष्ण के अङ्ग की प्रभा का नाम अथवा ब्रह्म का जो असम्य प्रकाश है, कृष्ण की उसी [अङ्गकन्ति] को ब्रह्म कहते हैं। उसी तरह से यहाँ पर...
हाँ, क्या बतला रहा था?
भक्त: गीता के दूसरे और तीसरे अध्याय में...
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, तो इसमें जिस ज्ञान की बात बतलायी गयी है, सीधा-सीधा यही बतलाया गया कि मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मरता, बिगड़ता, बनता है और आत्मा नित्य, शाश्वत, अजर-अमर है। वह कृष्ण का दास है। बस इतना ही कह सकते हैं। इसलिये इसको गुह्यज्ञान कहते हैं। सातवें और आठवें अध्याय में जो बतलाया गया, वह शुद्ध-भक्ति और अशुद्ध-भक्ति; केवला भक्ति और उससे नीचे जो मिश्रा-भक्ति है, गुणीभूता भक्ति [के विषय में बतलाया गया है।] गुणीभूता माने कर्म[मिश्रा], ज्ञानमिश्रा-भक्ति। कर्ममिश्रा-भक्ति, ज्ञानमिश्रा भक्ति उन लोगों के लिए है, जो कुछ ज्ञान की ओर जा रहे हैं। उन लोगों के लिए है। यदि सद्वैष्णवों का सङ्ग हो गया, तब तो वे पराभक्ति की ओर जायेंगे और नहीं तो, पराभक्ति की ओर नहीं जायेंगे। और नौवें अध्याय में जो बतलाया गया, वह बतलाया गया निर्गुणा-भक्ति का, कृष्ण के प्रति अनन्या भक्ति का। किन्तु इसमें रसगत कुछ नहीं बतलाया गया, बस तत्त्वगत बतलाया गया। वहाँ से एक प्रकार से भक्ति आरम्भ हुई। इसको गुह्यतम बतलाया। दूसरे और तीसरे अध्यायवाले को गुह्य बतलाया गया और सातवें-आठवें [अध्याय] वाले को गुह्यतर बतलाया गया। और नौवें [अध्याय] को गुह्यतम बतलाया गया। किन्तु अभी भक्ति इससे भी बहुत ऊपर है। अठारहवें अध्याय के अन्त में सर्वगुह्यतमम् [बतलाया गया।] गुह्यतम तो है ही है, [किन्तु ये] सर्वगुह्यतमम् अर्थात् सबसे अधिक [गुह्यतम।] वह ‘मन्मना भव’ [#2] इत्यादि [श्लोक में वर्णन किया गया।] उसमें भी नाम नहीं लिया। ब्रज की भक्ति सभी उसमें आयेंगी। किन्तु पराकाष्ठा रूप में, अन्त तक कौन आयेगा? गोपियों की भक्ति। इसलिये गोपियों की जो भक्ति है, ये एकमात्र ‘केवला’ है। ये केवला होना बड़ा भारी कठिन है। उसमें यही बतलाया गया कि दूसरों की, देवताओं की पूजा नहीं कर, दूसरे किसी इष्टदेव की पूजा नहीं करके कृष्ण की ही पूजा करो और कृष्ण की प्रीति के लिए [करो।] वहाँ पर नौवें अध्याय में इसी को गुह्यतम बतलाया गया। किन्तु ऊपर की बातें नहीं बतलायी गयीं। चैतन्य महाप्रभु उस चीज़ को देने के लिए आये, जो कृष्ण ने गीता में नहीं दिया था। वह है– ‘केवल भक्ति सद्म।’ केवलभक्ति को एक साथ में जोड़ दो और सद्म को अलग कर दो। केवलभक्ति और सद्म अर्थात् ऐसे ‘केवल’ भाव से जो गोपियों का भाव है, क्योंकि गुरु-रूपी सखी का वर्णन इत्यादि इसमें देखा जाता है।
‘वन्दों मुइ सावधान मते’— मैं उनके चरणों की वन्दना करता हूँ। किसलिये? किसलिये चरण की वन्दना करता है? इसलिये इसीमें कारण दिखलाया गया। केवल भक्ति है ना? मैं आपसे केवल भक्ति चाहता हूँ– ब्रज की भक्ति। ब्रज की भक्ति में भी क्या चाहता हूँ? जिसको चैतन्य महाप्रभु देने के लिए आये थे, बस उसी को चाहता हूँ।
कहा कि “चैतन्य महाप्रभु ने तो बाघ-भालूओं को भी प्रेम दिया। तो वैसा चाहिये?”
“नहीं, नहीं, हमको वैसा नहीं चाहिये। आपने जो रूप गोस्वामी को शिक्षा दी, मैं वह चाहता हूँ। प्रयाग में रह करके रूप गोस्वामी को जो आपने शिक्षा दी थी, बस वही चाहता हूँ।”
“और? और कोई विशेषण?”
“हाँ, हाँ, आपने राय रामानन्द को अन्त में जो वस्तु बतलायी थी, मैं वही आपसे चाहता हूँ।”
गुरु ये वस्तुएँ देने में समर्थ हो, तो पक्के गुरु हैं। और नहीं तो कभी-कभी साधारण रूप में, मध्यम अधिकारी या कनिष्ठ अधिकारी [के विषय में] भी नहीं जानने से उसको गुरु के रूप में वरण कर लेता है। ठीक है। किन्तु यदि किसी का पूर्व जन्म का संस्कार वैसा पक्का है, तो उसका पेट कहीं नहीं भरेगा। कहीं भर ही नहीं सकता। पेट भरेगा कहाँ? [यदि] इस वस्तु को पायेगा तो।
हम लोगों ने भी खोजते-खोजते, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते, ढूँढ़ते-ढूँढ़ते, हिमालय के जंगलों में छाँका और कहाँ-कहाँ गये खोजते-खोजते खोजते-खोजते...। हम लोग सोच रहे थे [कि गुरु] जटाजूट में, एकदम यहाँ लम्बी-लम्बी जटाएँ होंगी और लंगोटी पहने होंगे, शायद वह गुरु हों। [किन्तु] कहीं भी रुचि नहीं हुई। अन्त में गुरुजी के चरणों में रुचि हुई। तो ऐसे ही जिनका सौभाग्य है, कृष्ण इसकी व्यवस्था करते हैं। यह पूर्व जन्म के संस्कार पर निर्भर करता है। विशेष करके ऐसी भक्ति जिसके बारे में [मैं] बतला रहा हूँ, [इसके लिए] उस जन्म का संस्कार जमा (plus) इसी जन्म का संस्कार भी [चाहिये।] दोनों प्रकार का संस्कार होगा, तो ऐसे शुद्ध गुरु-वैष्णव मिलेंगे। कृष्ण भी इसकी व्यवस्था करेंगे। नहीं तो, पात्र ही नहीं रहेगा तो ये भक्ति ठहरेगी नहीं। उसमें दोष देखेगा कि “अरे! ये तो ऐसी-ऐसी बातें करते है।” उसमें रुचि नहीं [होगी], बल्कि उनकी निन्दा करेंगे।
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई।
भक्त: (30:00 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, ऐसा भी होता है।
भक्त: (30:10 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: पहुँच तो गये, [किन्तु] कुछ गड़बड़ हो जाता है। हम लोगों के गुरुजी के पास में कितने आये, कितने चले गये? श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती [गोस्वामी के पास में भी ऐसे ही?] अरे! महाप्रभुजी के पास में वह काला कृष्णदास आ करके और कहाँ सरक गया? (30:27 अस्पष्ट)
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई, कृष्ण प्राप्ति हय जाँहा हइते’— ‘जाँहार प्रसादे’, जिनकी कृपा से ‘ए भव तरिया जाई’, सहज ही, सुख से इस सागर को –भवसागर को तर जाता है। भव माने क्या? होना। क्या होना? क्या होना? जन्म और मरण।
[किसी के देरी से आने पर श्रील गुरुदेव उन्हें कुछ कहते हैं…]
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई’
[हरिकथा में अचानक कटौती...]
...से गुरु मिल गये। गोष्पद अर्थात् [गाय के बछड़े के खुर से बना छोटा-सा गड्ढ़ा।] गाय का बछड़ा, कहीं कीचड़ में जा रहा हो, दलदल जमीन में, दलदल माने कोमल जमीन में और उसका खुर [पड़ने से] उसमें गड्ढा निकल आया और उसमें पानी भर आये, तो व्यक्ति जैसे चलते-फिरते, वह [गड्ढा] ना जाने कहाँ है, नहीं है और पार हो जाता है। कब पार किया? कोई पता नहीं।
भक्त: समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारे।
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.14.58)
[जो व्यक्ति पुण्यकीर्त्ति मुरारि श्रीकृष्ण के ब्रह्मा-शिवादि महत्जनों के आश्रय-स्वरूप चरणकमलरूपी तरणी (नौका) का आश्रय लेते हैं, उनके लिए यह भवसमुद्र बछड़े के खुर से बने गड्ढे के समान हो जाता है, जिसे वे अनायास ही पार कर लेते हैं। उन्हें परमपद वैकुण्ठ की प्राप्ति हो जाती है, जो समस्त प्रकार की विपत्तियों से मुक्त है।] GVP
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो वह ऐसे ही गोखुर की भाँति संसार को पार कर गया। कब पार कर गया? पता नहीं। आप लोग भी ऐसे ही होओ। कब संसार दूर हो गया, कुछ पता नहीं। ये बिल्वमङ्गल, कब तर गया? कहाँ नीचे था? किन्तु पूर्वजन्म का संस्कार नहीं होता ना, तो ऐसा नहीं होता। उसके पूर्वजन्म का संस्कार था। फिर इस जन्म में भी कुछ संस्कार हो गया। चिन्तामणि ने जो बाकी-छाकी था, उसको पूरा कर दिया। देखो, वैश्या भी मिली, तो ऐसी वैश्या मिली, जिसने कृष्ण की ओर में ठेल दिया– “हमारे हाड़-मांस के चाम में तुम्हारी इतनी प्रीति है? तुमको कृष्ण के चरणों में इतनी प्रीति नहीं थी? तुम बहुत दुर्भागे हो।” बस ऐसी ठेस लगी, ऐसा ठेला कि एकदम वृन्दावन में आ करके गिर पड़े।
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई, कृष्ण प्राप्ति हय जाँहा हइते’— कृष्ण प्राप्ति सहज रूप में हो जाती है।
‘गुरुमुखपद्म वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्य’— गुरुजी के मुख से जो बातें निकलती हैं, [उन्हें हृदय में धारण चाहिये।] पहले ही ये देख लिया कि ये सद्गुरु हैं। कौन से सद्गुरु हैं? सवेरे हमने बतलाया था, इन लोगों ने भी बतलाया था। वेद-शास्त्र इत्यादि के जितने भी विचार हैं, उनको हृदयङ्गम हैं, सबमें पारङ्गत हैं और [उन्हें] कृष्ण की अनुभूति है और संसार से परम विरक्त हैं– ये गुरुजी के लक्षण हैं। यदि ये लक्षण नहीं हैं, तो फिर उसको यदि सौभाग्य होगा, तो फिर उच्च-कोटि के गुरु मिलेंगे। नहीं तो ऐसे भक्ति में प्रवेश नहीं कर सकता। और नहीं तो फिर जैसे जिस गुरु की हमने दस वर्ष तक सेवा की और वह कहीं लुढ़क गये, एक सौन्दर्य को देखा, उसी में लुढ़क गये। कहीं रुपया-पैसा भी देखा, उसकी ओर लुढ़क गये। कहीं प्रतिष्ठा की ओर लुढ़क गये। संसारी कामना-वासनाओं की मृगतृष्णा में फँस गये। ऐसा गुरु नहीं चाहिये, नहीं तो भक्ति-जीवन और परमार्थ-जीवन बर्बाद हो जाता है। ऐसा गुरु नहीं चाहिये।
‘चित्तेते करिया ऐक्य’— ऐसे गुरु को करना चाहिये और नहीं तो बिना गुरु के रहे, तो भी ठीक है। नहीं तो गुरु करे, तो ऐसा। किन्तु ऐसा गुरु अपनी इच्छा पर निर्भर है कि ये मिल जायेंगे? नहीं, पूर्वजन्म की सुकृति ऐसी रहेगी, संस्कार रहेगा, तो मिल जायेंगे, ये भी बात है। तो भी कृष्ण से प्रार्थना करें कि हमको शुद्धगुरु मिल जाये। यदि सद्गुरु हैं, तो ऐसे गुरु के मुख से जो वचन-उपदेश निकलते हैं, उन्हें निश्चित रूप में समझो कि ये वेद-शास्त्रों का सार है। उसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम विचार कब करेंगे? एक तो सन्दिग्ध अवस्था में, [जब हम] बहुत नीचे रहेंगे [अर्थात् बहुत निम्नाधिकार के हैं,] तब विचार कर सकते हैं और जिन [गुरु] के वचन शास्त्रों के अनुसार में मेल नहीं खाते, तब तो उसपर विचार करना आवश्यक है। आजकल के अधिकांश गुरु ऐसे ही हैं। विचार करना पड़ता है। किन्तु जब ये सद्गुरु हैं, [तो उनके वचनों पर संशय मत करो।]
हम तो सद्गुरु का यही लक्षण समझते हैं कि जो गुरु-परम्परा की धारा को मान करके चलते हैं, उनका अपना कोई नया विचार नहीं है। वे श्रीमन् महाप्रभुजी, श्रीरूप-सनातन, इसके बाद में अभी तक हमारे श्रीभक्तिविनोद ठाकुर, श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती की परम्परा के अनुसार में चलते हैं, तब तो वह सद्गुरु है। अब तुम उनपर विचार मत करो। एकमात्र उन्हीं के वाक्यों को हृदय में धारण करो। क्यों? शास्त्र, गुरु और वैष्णव— तीनों की बातों को लेकर के चलना चाहिये। यदि गुरु शास्त्र के विपरीत और वैष्णवों के भी विपरीत कहते हैं, वैष्णव कहते हैं कि ये बात ठीक नहीं है अर्थात् वैष्णव और शास्त्र एक ओर हैं और गुरु कुछ दूसरा [विचार] कह रहे हैं, उस समय में क्या करेंगे? विचार करेंगे। भाई ऐसा क्यों? यदि वे सन्तुष्ट (satisfy) करते हैं, तो ठीक है और सन्तुष्ट नहीं करते हैं, तब इसको समझो कि ये गलत विचार हैं। शास्त्र के अनुकूल होना चाहिये। वैष्णव और गुरु एक बात कहते हैं, शास्त्र में कुछ और लिखा गया है, तो समझो ये शास्त्र का गूढ़ उद्देश्य [बतला रहे हैं।] ये जो गूढ़ रहस्य बतला रहे हैं, यही ठीक है। और यदि गुरु और शास्त्र एक ओर हैं, वैष्णव दूसरी [बात] कह रहे हैं, तो गुरु का ही वचन सुनना चाहिये। इन सबका अच्छी प्रकार से विचार करके हम चलेंगे।
यहाँ कहते है कि यदि गुरु ऐसे हों, तो फिर इन सब तीनों चीज़ों को करने की आवश्यकता नहीं है। उन गुरु के चरणों में, गुरु के वचनों में ही ये तीनों चीज़ें समाहित हैं।
भक्त: यदि सद्गुरु है, तो फिर…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अब उसमें कोई विचार करने की आवश्यकता [नहीं है।] वहीं पर है– ‘गुरोराज्ञा हि अविचारणीया।’ वहाँ पर गुरु के [आदेश पर] विचार मत करो। सब ठीक है। जैसे रूप गोस्वामी ने कह दिया, अब हमको शास्त्र के पृष्ठ (page) उलटने की आवश्यकता नहीं है, किसी से पूछने की आवश्यकता [नहीं है।] हम लोगों के गुरुजी थे, [उन्होंने] जो कह दिया, तो हम लोग शास्त्र उलट कर नहीं देखते थे। ‘याद करने के लिए, ये कौन से श्लोक में कैसा क्या है?’ – इसके लिए हम लोग शास्त्र देखते थे। बस मान लेते थे कि यही पक्का है, इसके बाद में दूसरा नहीं हो सकता। अभी तक हम देखते हैं कि कभी-कभी किसी विषय में बहुत से लोग भ्रम (confusion) में रहते हैं। हमें किसी विषय में भ्रम नहीं रहता, क्योंकि हमने गुरुजी से सुना है। बहुत से लोगों से, हमसे बहुत बड़े senior (वरिष्ठ) सब वैष्णव हैं, उनसे भी हम लोगों का कुछ विचार हो जाता है। उसमें उन लोगों को हम प्रणाम करते हैं, किन्तु कहते हैं– “नहीं, हम इस विषय में आपकी बात को नहीं मानेंगे।” क्यों? गुरुजी बहुत ही युक्ति से, शास्त्र के अनुसार और हमारी परम्परा के अनुसार में विचार करके कहते थे। इसलिये अभी तक देखते हैं कि बड़े-बड़े लोग सब इधर-उधर हो जाते हैं, किन्तु हम लोग जो कहते हैं, हम लोगों की बातें ठीक रहती हैं। ये गुरुजी की कृपा है। आप लोग भी ऐसे ही एक लक्ष्य रख करके चलेंगे।
भक्त: महाराज! इसलिये हम लोग गुरुजी की बात पर विचार करने जैसी (38:32 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, जैसे कि एक बार गुरुजी ने हमसे कहा– “देखो, मधुररस दो प्रकार का होता है– एक स्वकीय, एक पारकीय। जो स्वकीय है, वह मधुररस नहीं है। वह दास्यरस है। मधुररस गोपियों का ही है।”
तो मैंने कहा– “रूप गोस्वामीजी ने तो ऐसे लिखा है।” मैंने गुरुजी से ही पूछा। सन्देह करके नहीं, दृढ़ता के लिए पूछा– “उन्होंने तो लिखा है कि स्वकीय भी मधुररस है और पारकीय भी मधुररस है। स्वकीय [भाव] जैसे द्वारिका की महिषियों का है, सीताजी का है और गोपियों का पारकीय भाव है।”
[गुरुजी ने] कहा– “अभी नहीं समझेगा, कुछ दिनों के बाद में समझेगा। वे सब दास्यभाव है। सीधा-सादी दास्यभाव है।” तो मैंने जैसे उनका (श्रील रूप गोस्वामी का) [ग्रन्थ] निकाला, देखने लगा, देखते-देखते-देखते देखा कि “नहीं, गुरुजी ठीक कह रहे हैं। यही तो गोपियों का वैशिष्ट्य है।” इसलिये ‘चित्तेते करिया ऐक्य’, चित्त में बस एक विचार करके [धारण कर लो।] ऐसे सद्गुरु मिलें, तो अब कहीं देखने के लिए आवश्यकता नहीं है। किन्तु हाँ, पुष्टि के लिए, प्रमाण के लिए हम कहीं देख सकते है। उसका प्रमाण ढूँढ़ करके हम ठीक करेंगे।
हम लोगों के मठ में राधाकृष्ण दोनों ही सफेद [रङ्ग] के हैं। उस सफेद को गौर मान लिया जाये, गौरवर्ण। राधिकाजी का रङ्ग [गौरा है।] गोरी हैं न? वह गौरी हैं। तो कृष्ण [विग्रह] भी गोरे रङ्ग के हुए। तो वहाँ पर राधा-कृष्ण दोनों को ही गोरे रूप में ही रखते हैं। तो बहुत से लोगों ने आपत्ति की– “कृष्ण काले हैं, और राधाजी गोरी हैं। तो [दोनों को] एक रङ्ग में ऐसे क्यों कर दिया?” इसके लिए गुरुजी ने संस्कृत में एक अष्टक लिखा और अष्टक में बतलाया–
राधा-चिन्ता-निवेशेन यस्य कान्तिर्विलोपिता।
श्रीकृष्ण-चरणं वन्दे राधालिङ्गित-विग्रहम्॥
श्रीश्रीराधाविनोदविहारि-तत्त्वाष्टकम् (1)
[श्रीमती राधारानी के मान करने पर उनके विरह में अतिशय निमग्न होने से जिनकी कृष्णवर्णरूप कान्ति विलुप्त होकर श्रीमती राधा जैसी हुई थी, उन राधा के चिह्नोंसे (कान्तिसे) युक्त-विग्रह–श्रीकृष्ण के चरणकमलों की मैं वन्दना करता हूँ। अथवा (मान भङ्ग होने पर) श्रीमती राधाद्वारा आलिङ्गित श्रीकृष्ण के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ।] GVP
हाँ, क्या? कहाँ से आरम्भ? ‘राधा चिन्ता निवेशेन’। अधिकांश लोग जो हैं, [वे इस वस्तु को] नहीं समझते। बहुत उच्चकोटि के भक्त लोग भी कृष्ण को ही प्रधानता देते हैं। राधाजी को क्या मान लेते हैं? कृष्ण के अधीन, उनकी शक्ति है, बस यहीं तक। अधिकांश अर्थात् 99% तत्त्वज्ञ भक्त लोग भी, रसिक भक्त भी [ऐसा ही मानते हैं।] हमारे आश्रम में भी ऐसे कुछ लोग हैं। वे कहते हैं– “राधाजी सब समय कृष्ण-तत्त्व के अधीन हैं। इसलिये हम लोग कृष्ण को ही अधिक सम्मान देंगे। कृष्ण की प्रधानता (superiority) रहेगी। तत्त्व में जहाँ भी देखो, तहाँ पर कृष्ण, कृष्ण-भक्ति, कृष्ण का भजन करना चाहिये, कृष्ण का अनन्य भजन होना चाहिये– ये सब सर्वत्र है। ‘एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ [#3] ये दिया गया है।”
यहाँ तक तात्विक और ये सबका विचार है, यहाँ तक तो ये ठीक है। किन्तु इससे ऊपर भी कुछ बातें हैं, जो चैतन्य महाप्रभु लाये। उनके परिकरों ने, रूप गोस्वामी इत्यादि ने भी बताया।
तो किस विषय में कह रहा था? भूल गया।
भक्त: राधाजी गोरा रङ्ग
अन्य भक्त: ‘राधा चिन्ता निवेशेन’
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, तो गोरा रङ्ग के लिए। अब गुरुजी ने कहा कि ‘राधा चिन्ता निवेशेन’, कृष्ण राधाजी की चिन्ता में हैं, या राधाजी कृष्ण की चिन्ता कर रही हैं? भागवत तक में भी ये स्पष्ट रूप से दिखलाया गया। [उसमें] ऊपर से दिखलाया गया कि राधाजी प्रेम में बिलबिला रही हैं, मूर्च्छित हो रही हैं, हाय-हाय कर रही हैं और कृष्ण द्वारका चले गये, [और राधाजी] दिन-रात विरह में तड़फड़ा रही हैं। बल्कि उद्धवजी ब्रज में गये, तो राधाजी को इसी रूप में देखा कि वह बिलबिला रही हैं, रो रही हैं। [वे उनको] विप्रलम्भ की अवस्था में देख रहे है।
गुरुजी ने कहा– “अरे! हम लोग रूप गोस्वामी के अनुगत हैं। राधाजी कृष्ण के विरह में रो रही हैं, हम लोग ये पसन्द नहीं करते हैं। ऐसा हो सकता है, किसीकी भावना है। [किन्तु] हम तो ये चाहते हैं कि कृष्ण ही राधाजी के विरह में रो रहे हों और राधाजी को खोज रहे हैं, राधाजी को सन्देश भेज रहे हैं, उनसे कभी भी रहा नहीं जाता। इसलिये ‘राधा चिन्ता निवेशेन’, कृष्ण राधिका के चिन्तन में एकदम प्रमत्त हो गये। अपने शरीर की कान्ति, शरीर भी भूल गये। राधा-राधा करते-करते, करते-करते, करते उनकी अङ्गकान्ति भी कैसी हो गयी? काले से बदल करके गौर रङ्ग बन गया। ‘राधालिङ्गित विग्रह’ राधा के द्वारा भीतर से भी, बाहर से भी आलिङ्गित। उनका हृदय ही राधामय हो गया। ये इमलीतला में ऐसा हुआ था। सेवाकुञ्ज में मिलन के बाद [इमलीतला] में ऐसा हुआ। वहाँ सेवाकुञ्ज में तो [कृष्ण ने राधाजी का] शृङ्गार किया। शृङ्गार करने के बाद में [कृष्ण] अन्तर्धान हो गये। राधाजी वहाँ सेवाकुञ्ज इत्यादि में उनके पीछे विलाप कर रही हैं। और इमलीतला में [कृष्ण] विरह में [विलाप] कर रहे हैं। इसके बाद में सेवाकुञ्ज में उनका मिलन हुआ और कृष्ण उनके चरणों में प्रणत हो रहे हैं। तो गुरुजी ने ऐसा लिखा। बहुत से लोगों ने गुरुजी को प्रश्न किया, तो गुरुजी ने इसका बहुत [सुन्दर] समाधान किया।
हमारे ही मठ के, हमारे एक बड़े गुरुभाई हैं, उन्होंने कहा– “ऐसा शास्त्र में कहाँ लिखा है?”
मैंने कहा– “शास्त्र में ऐसा लिखा है।” गुरुजी के अप्रकट के बाद में वह मुझसे कह रहे थे। मैंने कहा– “बहुत जगहों में ऐसा है।”
[उन्होंने कहा–] “हाँ तो, आप दिखलायें।”
तो मैंने उनको शास्त्र से ले करके दिखलाया कि गुरुजी का ये लिखना परमसत्य है। उस समय मुझको एक [विचार] आया कि इन श्लोकों पर एक व्याख्या होनी चाहिये। यदि भगवान् ऐसा सुयोग देंगे, तो इसपर कभी व्याख्या लिखेंगे।
ये पद्मपुराण में भी ऐसा है। बृहद्भागवतामृत में ऐसा है। कृष्णभावनामृत में ऐसा है। स्वप्नविलास में ऐसा है। हमारी गुरु-परम्परा की ऐसी रीति है। उसमें सब बतलाया गया है।
कृष्ण राधाजी के लिए विलाप कर रहे हैं और चिन्तन करते-करते करते उनका रङ्ग गोरा हो गया। तो इसलिये कह रहे हैं– ‘चित्तेते करिया ऐक्य’, ऐसे गुरुजी के वचनों में एकदम पूर्णरूप से विश्वास करके भजन-राज्य में आगे बढ़ना चाहिये।
‘श्रीगुरुचरणे रति’– श्रीगुरु के चरणों में केवल श्रद्धा ही मत करो। क्या करो?
भक्त: रति
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रति अर्थात् क्या करो? पहले श्रद्धा, श्रद्धा से गुरु-पदाश्रय, गुरु-पदाश्रय से दीक्षा-शिक्षा, विश्रम्भरूप में गुरुजी की सेवा। भजन (सेवा) करते-करते उत्तमा-भक्ति का जब हम अनुष्ठान करेंगे, तो उससे क्या होगा? अनर्थ दूर हो जायेंगे। उत्तमा-भक्ति नहीं होने से नहीं होगा। उत्तमा-भक्ति का साधन करने से [अनर्थ दूर होंगे।] किन्तु हम अभी अनाधिकारी हैं, नीचे की ओर हैं, इसलिये धीरे-धीरे, धीरे-धीरे हम ऊपर उठेंगे। तो फिर वह होगा, अनर्थ-निवृत्ति हो जायेगी। जो अर्थ नहीं है, उसी को हम अर्थ कर रहे हैं, मान रहे हैं, उन अनर्थों से हमारी निवृत्ति हो जायेगी। ‘ये संसार सच्चा है, यहाँ के सम्बन्ध सच्चे हैं, यहाँ के जो भौतिक पदार्थ हैं, अर्थ इत्यादि हमारे लिए आवश्यक है’– अभी हम लोगों ने इन सबको अर्थ बना रखा है। ये सब असल में अनर्थ हैं।
अरे! यहाँ तक की तो बात क्या? शुद्ध भक्तों के लिए, ब्रज [भाव के] भक्तों के लिए, द्वारका की भक्ति भी अर्थ नहीं है।
भक्त: अनर्थ नहीं है, पर अर्थ [भी नहीं है।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, अनर्थ नहीं है, किन्तु अर्थ नहीं है। वही ब्रज की भक्ति, वही राधिकाजी की सेवा, पाल्यदासी का भाव– यहीं तक ये अर्थ है।
‘एई से उत्तमा गति’– ऐसे गुरु हों, तो ऐसी गति, उत्तमा गति हो सकती है।
‘जे प्रसादे पूरे सर्व आशा’– समस्त आशाएँ पूरी हो जायेगी। हमको बहुत से रुपये की, संसार की बहुत-सी वस्तुओं की आवश्यकता है। अच्छा महल, अच्छा घर, अच्छा विवाह, अच्छे लड़का-लड़की, – इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। हमें अच्छे पद की आवश्यकता है, जैसे कि प्रह्लादजी के पिताजी हिरण्यकशिपु को आवश्यकता थी– ऐसी कितनी कामनाएँ हैं? किन्तु एक ऐसी कामना [है, जिसके पूर्ण होने से समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायेंगी।] जैसे कि इस जगत् में कामना पूर्ण करने के लिए एक चिन्तामणि की कल्पना की गयी। एक चिन्तामणि मिलने से ही सब कामनाएँ पूर्ण हो जायेंगी। कल्पतरु होने से [सब कामनाएँ पूर्ण] हो जायेंगी। ये कृष्ण वैसे ही हैं। गुरुजी उस कल्पतरु के समान, चिन्तामणि के समान हैं। वे समस्त आशाओं को पूर्ण कर देते हैं। एक राधाजी की दासी होने से समस्त प्रकार की आशाएँ पूर्ण हो जायेंगी। वह अन्तिम बिन्दु है।
‘चक्षुदान दिला जेई, जन्मे-जन्मे प्रभु सेई’– आपने मुझे प्रेम का अञ्जन लगा करके चक्षुदान दिया।
प्रेमाञ्जन च्छुरित भक्ति विलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।
यं श्याम सुन्दरम् अचिन्त्य गुण स्वरूपं
गोविन्दम् आदि पुरुषं तमहं भजामि॥
-श्रीब्रह्मसंहिता (38)
[प्रेमरूप काजल (अञ्जन) के द्वारा रञ्जित भक्तिनेत्रों से सन्तपुरुषगण जिन अचिन्त्य-गुणविशिष्ट श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण को हृदय में अवलोकन करते हैं, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ।] GVP
‘चक्षुदान दिला’– आजकल चक्षुदान, मरे हुए आदमी की आँख ले लेते हैं। और जिसको दिखायी नहीं पड़ता, फिर उसको आँख लगा देते हैं। ये अवश्य ही दया तो है। एक महाभोगी व्यक्ति है, उसको आँख लगा दिया, क्या हुआ? वह अब सांसारिक भोगों में प्रमत्त [हो जायेगा।] यदि वह अन्धा रहता, तो वह सोचता– “हाय! हाय! मैं अन्धा हो गया।”
[तब उसे भक्त समझाते–] “भाई! कृष्ण-कृष्ण का भजन करो, तुम अन्धे हो गये।” वह जो सुयोग था, वह भी निकल गया। आज के [समय में] हम लोग जो ये वैज्ञानिक पद्धति को वरदान समझते हैं, मेरी समझ से वह वरदान नहीं है।
एक लड़की का विवाह हुआ। अभी [विवाह को] एक महीना हुआ था कि उसका पति मर गया। अब घर के लोग सोचते हैं कि उसके लिए एक नए वर को देख करके उसका विवाह कर दिया जाये, तो इसके लिए वरदान होगा। हमारी प्राचीन पद्धति कहती है– “क्या आवश्यकता है? देख लिया तो एक महीना? अब कृष्ण को अपना पति बनाओ और उसीका भजन करो।” और यदि ऐसा कर लेती, तो सारे परिवार की, देश की, समाज की वह देवी बन जाती थी। अब आजकल तो वह सबसे मान्य है, जिन्होंने विधवा-विवाह को चालू कराया?
भक्त: राजा राममोहन राय
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: राजा राममोहन राय और दयानन्द सरस्वती– ये सब बड़े-बड़े दयालु लोग हैं। ये दयालु नहीं, बल्कि और गले में छुरी देनेवाले हैं। किसी प्रकार से भगवान् की ओर उनकी वृत्ति ले जानी चाहिये। जो भोगों की प्रवृत्ति दे, वह क्या है? वह हलाहल करनेवाला है। जैसे मुर्गी का पालन करनेवाला, वे जो चाचाजी होते हैं ना? मुर्गे को और अच्छी-अच्छी बकरियों को पालन करते हैं। बस खूब खिलाते हैं। जो अपने [आप] नहीं खाते, उसको भी खिलाते हैं। जब मोटे हो जाते हैं, तो बकरीद के दिन में उनका ज़बह (गला काटकर प्राण लेने की क्रिया) करते हैं। इसलिये बक़रीद है, बक़रीद। तो उनका पालन करना क्या है? वह दया का परिचय नहीं है, बल्कि वह किस चीज का परिचय है? महानृशंस का। इतने दिन प्यार से पुत्र की भाँति, कन्या की भाँति पालन करके, फिर उसको काट दिया। ये सब दया का परिचय नहीं है। ये संसार में सब दयाएँ ऐसी ही हैं– “भई! ये लड़की अभी-अभी तो विधवा हुई है, इसका विवाह कर दो।” अरे! कृष्ण से विवाह करो। फिर उसको विवाह करने की आवश्यकता नहीं होगी। वह जन्म-जन्मान्तर [के लिए] सुखी हो जायेगी। गुरु लोग ऐसे ही होते हैं। कृष्ण से सम्बन्ध करके उसे नित्यकाल के लिए सुखी और शान्त बना देते हैं। दिव्यज्ञान का हृदय में [सञ्चार करते हैं] कि ये दिव्यज्ञान है।
‘प्रेमभक्ति जाँहा हइते, अविद्या विनाश जाते’– प्रेमभक्ति का प्रकाश कर देते हैं, जिससे सहज रूप में ही अविद्या दूर हो जाती है।
‘वेदे गाय जाँहार चरित’– वेदों में सर्वत्र उनका गान किया गया है।
‘श्रीगुरु करुणासिन्धु, अधम जनार-बन्धु’– हैं ऐसे गुरु, किन्तु बड़े कृपालु हैं। अधमों के वे बन्धु हैं। अधमों के, पापियों के, निम्न (नीचे) जो चले गये हैं, उनके एकमात्र बन्धु कौन हैं? ऐसे परम दयालु गुरु। वे यह नहीं [पूछते] कि “अच्छा! तुम किस जाति से हो? तुम कौनसे कुल में जन्मी हो? तुम पूर्व में कैसी थी? वेश्या थी या क्या थी? तुम उच्च घर में जन्मी हो?” ये सब कुछ नहीं पूछते हैं। क्या पूछते हैं? उसको देखते हैं कि उसके अन्दर में श्रद्धा है कि नहीं, बस यही देखा। और उसको झट कृष्णनाम दे करके, और ऊपर उठा देते हैं। आत्मा सब समय पवित्र है। वह मन के सम्बन्ध से कुछ पतित हो गया, [तो] इसका उनकी [दृष्टि] में कुछ मूल्य नहीं है। यदि सर्वगुण-सम्पन्न कोई सदाचारी व्यक्ति, साधक है, [वह] गुरु के पास में गया और एक दुराचारी [व्यक्ति है,] किन्तु जो दुराचारी है, उसमें अपने पापों के लिए अधिक ग्लानि है और उसमें कृष्ण के प्रति श्रद्धा है, तो [गुरु] उसी को कहेंगे कि ये श्रेष्ठ है। सदाचारी, उसमें अभिमान रहेगा, “मैं बड़ा भारी सदाचारी हूँ। मैं बड़ा भारी गुणी हूँ। मैं शास्त्रज्ञ हूँ। मैं शास्त्रों का सब सार जानता हूँ।” [किन्तु] नहीं, वह देखेंगे कि जिसकी [हरि, गुरु, वैष्णव के] प्रति श्रद्धा है, वह निरक्षर व्यक्ति भी प्रेम का अधिकारी है, यदि उसमें श्रद्धा है।
‘लोकनाथ लोकेर जीवन’– लोकनाथ, ऐसे लोकनाथ हमारे गुरु हैं। कौन कह रहा है?
भक्त: नरोत्तम दास ठाकुर।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और दूसरे [अर्थ] में, ‘लोकनाथ लोकेर जीवन’, कृष्ण ही लोकनाथ हैं। दोनों अर्थ लिया। हमारे गुरुजी लोकनाथ हैं। ‘लोकेर जीवन’, लोकों के जीवन है। किसलिये जीवन? प्रेमाभक्ति को देनेवाले हैं, इसलिये ये जगत् के जीवन हैं।
‘हा हा प्रभु कर दया’– हे लोकनाथ प्रभु! हे गुरुदेव!
‘हा हा प्रभु कर दया, देह मोरे पदछाया, तुया पदे लईनु शरण’– हम आपके चरणों में शरण लेते हैं। ऐसा होना चाहिये।
आप लोगों के भी ऐसे भाव हो, गुरु के प्रति ऐसी निष्ठा हो। अब एक ही घाट में स्नान करेंगे, दूसरे घाट में नहीं। दूसरे घाट [में नहीं,] बस इसी घाट पर। उस घाट में स्नान करेंगे, जहाँ पर एकदम सीधे ब्रज में निकलेंगे। ये गुरु की महिमा है। ऐसे ही सब इसमें ‘कृपाबिन्दु दिया, करो एई दासे, तृणापेक्षा अति हीन’ इत्यादि सब कीर्तन हैं।
अभी सवेरे की बात थी, इसमें कुछ लोग लिख करके पुष्पाञ्जलि ले आये हैं। उनको थोड़ा-सा पढ़िये और बाकी जो रह गये हैं, इसके बाद में दो-चार व्यक्ति बोलें। थोड़ा-थोड़ा विश्राम करके नहीं बोलने से [कुछ शारीरिक असुविधा हो सकती है।]
एक घण्टा भी हो गया?
भक्त: (54:22 अस्पष्ट)
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
-श्रीभगवद्गीता (9.30)
यदि सुदुराचारी व्यक्ति भी अनन्य-भजनपरायण होकर मेरा भजन करता है, तो वह भी साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह मेरी भक्ति में निश्चयात्मिका-बुद्धिवाला है। (GVP)
#2
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
-श्रीभगवद्गीता (18.65)
तुम मुझे चित्त समर्पण करो, मेरे नाम-रूप लीला आदि के श्रवण-कीर्तन आदि परायण होकर मेरे भक्त होओ, मेरी पूजा करनेवाला होओ और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त करोगे। मैं तुम्हें यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो। (GVP)
#3
एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.3.28)
पहले कहे गये समस्त अवतारों में से कोई-कोई पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरि के अंशावतार, कोई कलावतार और कोई शक्त्यावेश-अवतार हैं। प्रत्येक युगमें जब भी जगत् असुरों से पीड़ित होता है, तब असुरों के उपद्रवसे जगत् की रक्षा करने के लिए ये अवतार हुआ करते हैं। किन्तु, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण तो साक्षात् स्वयं-भगवान् (अवतारी) हैं। (GVP)
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शाब्दिक प्रतिलेखन (VERBATIM TRANSCRIPT)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सबसे पहले ‘वन्देऽहं’, मैं वन्दना करता हूँ। ‘श्रीगुरोः श्रीगुरोः श्रीयुतपदग.. प..पदकमलं’ मैं अपने दीक्षा, दीक्षा-गुरु के श्रीचरणकमलों में की मैं वन्दना करता हूँ। इसके बाद में ‘गुरुन्’, जो हमारे शिक्षागुरु हैं, उनकी मैं वन्दना करता हूँ। शिक्षागुरु कौन हैं? दीक्षागुरु कौन हैं? जो मन्त्र देकर कृष्ण से साथ में हमारा सम्बन्ध कायम कर देते हैं, वो दीक्षागुरु हैं और वही यदि हमें भजन-मार्ग की शिक्षाओं को प्रदान करें, कृष्ण की लीला-कथाओं को सुनायें, कैसे उसमें हम प्रवेश कर सकते हैं, इसको बतलायें, तो वो शिक्षागुरु हैं।
सनातन गोस्वामी को दीक्षागुरु माना गया है और रूप गोस्वामी को शिक्षागुरु बनाया गया। किस तरह से? वो तीन मन्त्र और हमारे हैं, मदन-मोहन, गोविन्द और गोपीनाथजी का। कृष्ण एक ही हैं। जब सबसे पहले गुरु उससे सम्बन्ध जोड़ता है कि तुमको कृष्ण का भजन करना चाहिये, वो मदन को भी मोहित करने वाले हैं अपने रूपों से, गुणों से, माधुर्य से, तब वो मदनमोहनजी हैं और जब उनसे सम्बन्ध होने के बाद में उनकी सेवा आरम्भ होती है, तो वो गोविन्दजी हैं और जब वो सेवा के द्वारा वशीभूत हो जाते हैं, तब वो कौन हैं? गोपीनाथजी।
एक ही कृष्ण। योगियों के ध्यान में नहीं जाते। किन्तु ऐसे भक्तों के लिए वो ‘देही पदपल्लवमुदारम्’ हो जाते हैं। राधाजी को कहते हैं वो कृष्ण, “मैं तुम्हारे चरणों का दास हूँ” कहने में डरते, ये लजाते नहीं हैं। ये हो गये गोपीनाथजी। जब प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं, तो वही गोपीनाथ हैं। जब तक सम्बन्ध हो रहा है, तब तक वो मदनमोहन हैं। और जब उनकी सेवा हम प्राप्त जब करने लगते हैं, तो वो हैं गोविन्दजी। सनातन गोस्वामीजी सम्बन्ध जोड़ने वाले हैं। रूप गोस्वामी, कैसे उनकी सेवा की जाती है, इसको देने वाले हैं। इसलिये ये शिक्षागुरु हैं और इन्हीं का रूप फिर बदल जाता है जबकि सेवा आरम्भ होने के बाद में वशीभूत हो जाते हैं।
रूप गोस्वामी सभी हैं, सम्बन्ध भी दे सकते हैं और अभिधेय भी दे सकते हैं, प्रयोजन भी दे सकते हैं। सनातन गोस्वामी भी सभी दे सकते हैं। किन्तु महाप्रभुजी ने एक-एक चीज एक-एक व्यक्ति के ऊपर में उसका भार दिया। लगता है कि रूप गोस्वामी जितना जानते हैं, सनातन गोस्वामी नहीं जानते हैं। किन्तु यही समझो, जे सनातन गोस्वामीजी रूप गोस्वामी के गुरु हैं। हम्म..इसलिये उनको कम मत समझना।
शिक्षागुरु छोटा है और दीक्षागुरु बड़ा है, ऐसा मत समझना। किसी-किसी स्थिति में शिक्षागुरु बहुत ऊँचा होता है, बहुत ऊँचा होता है। जब कृष्ण ही शिक्षागुरु हैं, चैतन्य महाप्रभु शिक्षागुरु हैं, ललिता-विशाखाजी शिक्षागुरु हैं, तो तो देखो कितना बड़ा, ऊँचा, जो दीक्षागुरु भी नहीं हैं। हम्म… इसलिये इसमें क्रम दिया गया, पहले गुरु, दीक्षागुरु क्योंकि वो सम्बन्ध दिया। इसके बाद में शिक्षागुरु और शिक्षागुरु को ही वो बतला रहे हैं, ये ये यहाँ तक, अन्त तक बतलायेंगे। और उस शिक्षागुरुओं की वन्दना में भी क्रम एक है। शिक्षा अअ…‘श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरून्’। गुरु कौन? शिक्षागुरु।
कुछ पथ-प्रदर्शक गुरु होता है। एक चैत्त्य गुरु होते हैं, पथ को प्रदर्शन करने वाले। उनको भी महत्ता देनी चाहिये। यदि किसी ने हमको गुरुजी के पास में, हमको हरिकथा बतला करके और गुरुजी के समीप ला दिया, ये पथ-प्रदर्शक गुरु कहलाता है। उनको भी यथायोग्य सम्मान देना चाहिये। आप लोगों को जिन लोगों ने हरिकथा सुना करके गुरु के पास में लाया, उनको भी सब समय सम्मान देना चाहिये।
“क्या? उ…उनको सम्मान देने की कोई जरूर…” आजकल कुछ ऐसे लोग हैं कहते हैं “क्या देने की जरूरत है? वो तो हमारा ऐसा भाग्य था, हमारा ऐसा संस्कार था कि हम गुरुजी से होते, किन्तु उनके माध्यम से आये थे। इसलिये उनके प्रति हमारा कोई भी आदर इत्यादि देने की जरूरत नहीं है।” किन्तु ये अपराध है। ऐसा नहीं होना चाहिये। गुरु भी वैष्णव हैं, ये समझो। गुरु क्या हैं? वैष्णव में प्रधान एक हैं। अब उसी को लेकर के ये बतला रहे हैं, ‘श्रीरूपं ’। यदि श्रीरूप गोस्वामी कहा उनके ‘स अग्रज’ अग्रज माने सनातन गोस्वामी। ‘सहगण’– ‘सहगण’ माने रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी इत्यादि जो जितने हैं, जीव गोस्वामी हैं। हम्म…ये सब जो हैं, गण हैं। किनके? इन लोगों के, छह गोस्वामी लोग। इनको यदि वैष्णव मानते हैं, तो दीक्षागुरु बड़े हुए ना वैष्णव लोग बड़े हुए? यदि रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट यदि वैष्णव हैं और हमारे गुरु हैं, अभी मान लेंगे जो हमारे गुरु ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज हैं, उनके गुरु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती महा…। अब हमारे गुरु ये हैं, ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी। अच्छा, हम उनसे प्रार्थना करते हैं कि “हे गुरुदेव! हमको रूप मञ्जरी के, रूप गोस्वामी के चरणों में लेकर के अर्पित कर दें।” क्यों कहते हैं? रूप गोस्वामी की कुछ महिमा है कि नहीं है? आ… तो ये यदि वैष्णव हैं, इनको रूप गोस्वामी को, रघुनाथ दास गोस्वामी इत्यादि को, यदि हम जीव गोस्वामी को वैष्णव मानते हैं, तो ये वैष्णव बड़ा पद है ना दीक्षागुरु और शिक्षागुरु? कौन सा है? वैष्णव। इसलिये इन सब में कौन छोटा, कौन बड़ा, ये विचार मत करो। दीक्षागुरु का महत्व ये है कि हमको संसार से चोटी पकड़ करके, ले आ करके आये हैं। किन्तु कृष्ण से, राधाजी से तो बड़े नहीं हो जायेंगे? हम पूजा करेंगे अभी। ये उनके चरणों को, उन्होंने उनके चरणों तक लाया है। इसलिये सबका हम आभारी हैं, सबके हम कृतज्ञ हैं। हम्म...। यदि जिस समय हमारे गुरु हमको लेकर के और रूप गोस्वामी के चरणों में हमें अर्पित कर देंगे, कैसा सौभाग्य है! अरे, हमारी बात तो छोड़ दो, नरोत्तम ठाकुरजी कह रहे हैं। किसको? कबे… प्रभु लोकनाथ क…। कबे मोरे…
भक्त: सङ्गे लइया जाबे।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: शय्या ले आ…लइया जाबे?
भक्त: श्रीरूपेर पादपद्मे मोरे…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम्म… रूप गोस्वामी के चरणों में समर्पित कर देंगे। बतलाओ तो? तो तो ये तो गुरु की महिमा घट गयी ना? नहीं, बढ़ गयी। ऐसा मत समझो। आजकल के कुछ नौसिखिये, भक्ति में अभी प्रवेश नहीं किये हैं, ऐसे… यही सब विचार करते। यही लोग कहते हैं कि हमारे गुरु के अतिरिक्त और किसी की बात नहीं मानेंगे। हम्म… उनको भक्ति रस का, सिद्धान्त का कोई भी ज्ञान नहीं है। अब देखो, ये तो वैष्णव को बतलाया। ‘साद्वैतं’– अद्वैत। अब इसके बाद में ले लिया, वैष्णव को बाद में, महाप्रभुजी के गणों को, अद्वैताचार्य। ‘सावधूतं’। पहले नाम लिया अद्वैताचार्य का, इसके बाद में लिया नित्यानन्द, अवधूत। तो पहले जिसका नाम लिया वही बड़ा हो गया और पीछे वाला छोटा हो गया? ऐसा मत सोचो। अद्वैताचार्य, अवधूत नित्यानन्द प्रभु, बलदेव प्रभु जी।
‘परिजन सहितं कृष्ण चैतन्य देवं’– अब ‘परिजन सहित’ माने कौन हुए? स्वरूप दामोदर, राय रामानन्द, रूप गोस्वामीजी, गदाधरजी सबसे अधिक, और भी कितने सब हैं, ये इनके परिजन हैं। परिजन…अब अद्वैताचार्य का महत्व एक है और ये परिजन लोग हैं, महत्व किसका अधिक होगा भजन राज्य में? परिजनों का महत्व अधिक होगा। नित्यानन्द और अद्वैताचार्य क्या हैं? महाविष्णु और नित्यानन्द प्रभु स्वयं बलदेव। हमको बलदेव प्रभुजी से यद्… अधिक आवश्यकता है? ना गदाधर पण्डित, स्वरूप दामोदर, राय राम… राय रामानन्द हमारे निकट हैं? कौन है? ये विचार सब रहना चाहिये। और यदि ऐश्वर्य का अधिक ये है की तरफ़ में, कहे अद्वैताचार्य, बलदेव प्रभु, बस। वो हमारे लिए प्रणम्य हैं, बहुत दूर से। कुछ दूर से वो प्रणम्य हैं। यदि दूसरे वेश में आ जाए तब तो फिर वो निकटतम है। किस वेश में?
भक्त: अनङ्ग मञ्जरी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, अनङ्ग मञ्जरी के रूप में आ जाये, तब तो फिर बहुत हमारे परिजन हो गये वो। इसलिये ये सबका विचार होना चाहिये। सब में वैशिष्ट्य है। भक्ति राज्य में ये सब वैशिष्ट्य नहीं रहने से केवल भीम, अर्जुन, नकुल, ये सब बनने से नहीं होगा। हम्म… भक्ति राज्य में प्रवेश करने के लिए, विशेष करके महाप्रभु जिस भक्ति को देने आये हैं, ये सब विचार होना चाहिये। गुरु इन सब चीज़ों को देता है, वो गुरु है। जो गुरु ये सब चीज़ को नहीं दे सके, वो गुरु नहीं है; वैष्णव हो सकते हैं, वो मान्य है, बस इतना ही। किन्तु गुरु में ये सब ज्ञान, हमारे सम्प्रदाय का गुरु ऐसा होना चाहिये।
अब देखो अन्त में ले आते हैं, ‘श्री राधाकृष्ण पादान् सहगण’। सहगण माने यहाँ पर राधाकृष्ण तो हुए, कृष्ण से भी आगे राधाजी को लगा दिया। राधाकृष्ण और उनके सहगण, उनकी ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, अअ… तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रङ्गदेवी, सुदेवी और उनसे भी अधिक हम्म… रूपमञ्जरी इत्यादि सब हैं। महाप्रभु के भजन में ये सब का विचार है। इन सबको प्रणाम एक ही श्लोक में किया गया है। एक ही श्लोक में सबका प्रणाम सब जगह नहीं मिलता है। इसलिये इसको जरूर याद करके प्रतिदिन वन्दना करना चाहिये। अधिक ना याद हो, तो इससे भी यह हो जायेगा।
अब इसी को नीचे में बढ़ा करके ले आये हैं, कहाँ तक? वो अन्तिम तक श्रीमहाप्रभु तक, अअ… हरे कृष्ण हरे। वो पूरा सब ले आये। इसी का ये विस्तार है। हम्म… वन्दना करते समय ये भी करना चाहिये, अपने गुरुजी की वन्दना करने के बाद में परम गुरुदेव भी होना चाहिये। क्यों? यदि हम परम गुरुदेव की वन्दना नहीं करेंगे, तो हमारे गुरुजी प्रसन्न नहीं होंगे। तो प्रसन्न नहीं है, तो फिर क्या हुआ? हमारे गुरुजी कहेंगे “जैसे हमारी वन्दना मत करो, हमारे गुरुजी की वन्दना करो।” इसलिये हम दोनों की करेंगे। और प्रभुपाद जी क्या कहेंगे? “हमारे गुरुजी की वन्दना किया?” नहीं तो। “तो जाओ, हम cancel कर देते हैं।”
इस तरह से भक्तिविनोद ठाकुर, जगन्नाथ दास बाबाजी महाराज, बलदेव विद्याभूषणजी, विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी, उससे नरोत्तम ठाकुरजी, उनके बाद में कृष्णदास कविराज गोस्वामी, इसके बाद में छह गोस्वामी, इसके ऊपर में स्वरूप दामोदर, राय रामानन्द, इसके बाद में पञ्चतत्व। हम्म…पञ्चतत्व करेंगे और इसके बाद में तब श्रीश्रीराधाकृष्ण गोप-गोपीगण, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, गिरिराज गोवर्धन। इस तरह से वन्दना करनी चाहिये। वन्दना करने के बाद में खाट से उतरो। तब फिर अपने नित्य क्रियाओं में लगो। हम्म… इस तरह से दैनन्दिन अपना कार्य। पहले पहल जैसे उठे ना, तो ऐसे-ऐसे करके लोग देखते हैं। तो ऐसे नहीं, ये ये दर्पण लगाओ। अपने गुरु परम्परा सबको प्रणाम करते हुए राधाकृष्ण को, महाप्रभु जी को। ये सब समय याद रखना। कृष्ण और उनके परिकरों के पहले महाप्रभु और उनके परिकरों की ये सब वन्दना हो करके तब फिर उनका करेंगे। नहीं तो कृष्णलीला ठीक रूप से हृदय में नहीं आयेगी। हम्म… ये सब परम्परा ठीक रखनी चाहिये।
इसमें अभी हम लोग छोटा-बड़ा तो नहीं देखेंगे। हाँ, वैशिष्ट्य देखेंगे। किसका कैसा वैशिष्ट्य है? वैशिष्ट्य के अनुसार में हम किसके पास में अधिक रहें? बलदेव प्रभुजी का बहुत कृष्ण ही के समान तत्व है। किन्तु गोपियाँ इनको देख करके क्या करती हैं? इनको प्रणाम कर लेती हैं, दूर से घूँघट भी निकाल लेती हैं और राधाजी के पास में, कृष्ण के पास में चली जाती हैं। ठीक ऐसे ये सब भाव हम लोगों को अन्दर में आना चाहिये।
भक्त: महाराज दण्डवत करेंगे या जय जयध्वनि देंगे?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अरे इसमें कर लीजिये, इसके बाद में जय दीजिये या जय दे कर के फिर इनको अन्ततः कर लीजिये। इसके बाद में फिर अपना दन्त-धावन इत्यादि जो कुछ करना है कर करके फिर अपना विधिवत फिर अपना भजन आरम्भ कीजिये। वृन्दाजी का ज़रूर, अन्त में या जब हो, ज़रूर उनको प्रणाम करना चाहिये।
वृन्दा जी कौन है? कृष्ण की योगमाया। योगमाया ही पूर्णिमा देवी हैं। योगमाया हमारी समष्टिगत लीलाओं की अधिष्ठात्री देवी है। याद रखो। कृष्ण की जितनी भी लीला है ब्रज में, प्रकट से लेकर के और जितनी भी लीलाएँ हैं सबकी समष्टिगत अधिष्ठात्री देवता है, ये पूर्ण रूप से ये पूर्णिमाजी हैं, योगमाया हैं। और उन्हीं का एक विशेष ये वृन्दाजी है। यह वृन्दावन में जो लीलाएँ संगठित होती हैं, गोपियों के साथ में कृष्ण की, इसमें वृन्दाजी का है।
भक्त: (16:43 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: समस्त लीलाओं को। समस्त लीलाओं को पुष्टि कराने वाली ये हैं पूर्णिमाजी। और राधाकृष्ण को या जीवों को कृष्ण से मिलाने वाली, जितनी कुञ्ज इत्यादि की सेवाएँ हैं, वृन्दावन में विचरण की लीलाएँ हैं, हम्म… ये सब वृन्दाजी का है। बिना वृन्दाजी की कृपा के कोई कृष्ण से, राधाजी से युगल रूप में नहीं मिलेगा। हम्म… कृष्ण से अकेले में जितनी उनकी भी लीलाएँ हैं, सखाओं के साथ में हैं, माता इत्यादि के साथ में, उनमें सब योगमाया का प्राधान्य है और गोपियों के साथ में कृष्ण की जितनी भी लीलाएँ हैं, इसमें केवलमात्र वृन्दाजी का special है। दोनों का अपने-अपने जगह में महत्व होने पर भी समष्टिगत है। समष्टिगत माने समस्त लीलाओं को कराने वाली, ये योगमाया। कृष्ण का जन्म से लेकर के अन्त तक। गोपियों को, जो कात्यायनी इत्यादि व्रत कर रही हैं, वो योगमाया का क… काम है, कर रही हैं। किन्तु कृष्ण के लीला में उनको ले जाने के लिए, ये कौन ले जायेगा? वृन्दाजी ले जायेंगी। वृन्दाजी ले जायेंगी उनसे मिलन करायें। इसलिये वृन्दाजी का हम लोग सब प्रकार से जभी कोई वन्दना होगी, उनका ज़रूर वन्दना इत्यादि करते हैं। हम्म…
वृन्दायै तुलसी देव्यै प्रियायै केशवस्य च।
कृष्णभक्ति-प्रदे देवि सत्यवत्यै नमो नमः॥
और एक है-
भक्त: भक्त्या विहीना…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
भक्त्या विहीना अपराध-लक्षैः, क्षिप्ताश्च कामादि तरङ्ग मध्ये।
कृपामयि! त्वां शरणं प्रपन्ना, वृन्दे नुमस्ते चरणारविन्दम्॥
अब इस बार इसका संकलन करेंगे, अर्थ के साथ में जे सभी लोग इसको समझ सकें, ऐसा करेंगे। इसमें ये जहाँ तक हो सके, अन्ततः नहीं याद है तो देख कर के भी ये सब प्रणाम मन्त्र इत्यादि करना चाहिये।
‘श्री गुरु चरण पद्म केवल भक्ति सद्म’– ‘भक्ति सद्म’, गुरुजी के चरण कमल जो हैं, केवल भक्ति सद्म, एक मात्र केवल माने। है ना… एक मात्र भक्ति का वो भवन है, घर है, खजाना है, गुरुजी का चरण कमल। इसलिये गुरुजी की सेवा जो उस रूप में, विश्रम्भ ही रूप में करे। गौरव के साथ में एक होता है और एक होता है, विश्रम्भ रूप में। अर्चन में गौरव का प्राधान्य है, माने पूज्य बुद्धि, बड़े हैं, हम छोटे हैं। किन्तु बड़े सरल, स्वाभाविक रूप में उनकी सेवा होनी चाहिये। कहीं भी डर की बात नहीं। जिसका हृदय निश्छल होगा, वह तो ऐसा कर सकेंगे। वो भक्ति का खज़ाना है। उसकी वो कुञ्जी उनके हाथों में, वो खोल देंगे, तब तो आगे बढ़ेंगे। तो गुरु भी ऐसा होना चाहिये। वो क्या है जे छान कर?
भक्त: पानी पियो छान कर, गुरु करो जान कर।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आआ… पानी पियो
भक्त: छान कर
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: छान कर और गुरु करो
भक्त: जान कर
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जान करके, समझ करके करो। ऐसे नहीं जे पीछे पछताना न… पड़े। ऐसा नहीं। समझो, भले ही देरी हो जाए, किन्तु तत्वविद्, अन्धविश्वास से नहीं, समझ-बूझ करके। तत्वविद् हो, जो हमारे हृदय में इन तत्वों को आसानी के साथ में हृदय में पहुँचा सके। राधाकृष्ण के तत्व को, गुरुवर्गों के तत्व को, चैतन्य महाप्रभु के तत्व को, प्रेम-तत्व को, कृष्ण-तत्व को अच्छी तरह से हमें सम… समझा सकें।
‘वन्दों मुँइ सावधान मते’– इसका एक अर्थ औ… और हुआ। ‘केवल भक्ति सद्मम्, केवल भक्ति का घर और एक है, ‘केवल भक्ति सद्म’ केवल माने क्या? शुद्धा प्रेम, प्रेमा भक्ति का ये घर। कौन सा प्रेम? केवल भक्ति कौन हो सकती है? ज्यों गोपियों की जो भक्ति है। ब्रज, ब्रज वृन्दावन की जो गोपियाँ हैं, कृष्ण की जो प्रेयसियाँ हैं, इनकी भक्ति ही केवल मात्र, केवल है और बाकी संकुला है। संकुला माने क्या? मिश्र। बलदेव प्रभुजी का भक्ति कैसे है? उसमें पाँ… चार-पाँच भक्तियाँ मिली हुई हैं। अअ… उसमें दास्य भी है, वात्सल्य भी है, सख्य भी है और अनङ्ग मञ्जरी में केवल वो सं… केवला है। हम्म… इसी तरह से सब में केवल केवल भक्ति कहने से उसी का होगा। साधारण रूप में केवला-भक्ति कहने से इस जगत् में दार्शनिक पद्धति से केवला-भक्ति है कृष्ण के प्रति केवल। अनन्या-भक्ति, और किसी की नहीं कृष्ण की ही भक्ति है। न… अब खटर-पटर मत करो। धीरे-धीरे काम करो। disturb मत करो।
तो गीता में जो बतलाया गया है, अनन्यभक्ति का, केवला भक्ति का, ‘अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’ देखो, गीता में दूसरे और तीसरे अध्याय में, जिस ज्ञान की व्या… व्याख्या की गयी है, बतलाया गया है... आप यहाँ आ जाइये। हमारे एकदम निकट में यहाँ पर बैठिये। नीचे मत बैठिये, ऊपर में बैठिये, और इधर आ जाइये।
गीता के पह… दूसरे और तीसरे, पहला वाला जो है वो भूमिका है। ओ.. पहले का जो अध्याय, ये एक तरह से भूमिका है। दूसरे-तीसरे अध्याय में जिस गाँव ज्ञान की अवतारणा की गयी है, बतलाया गया है, ये अध्यात्म-ज्ञान है। कुछ लोग अध्यात्म-ज्ञान को एकदम कृष्ण की भक्ति, जो ब्रज वाली है वहाँ तक ले जाते हैं। ऐसा ठीक नहीं है। वहाँ तक ठीक नहीं है। यद्यपि आत्मा को भगवान् के लिए भी कहा जा सकता है, कृष्ण के लिए भी, किन्तु साधारण रूप में आत्मा कहने से जीवात्मा का होता है। ब्रह्म कहने से कृष्ण का भी बोध हो सकता है। हम्म… शब्द की जो अर्थ की जो रूढ़ी ये सब विचार है। किन्तु ब्रह्म कहने से ही कृष्ण के अङ्ग की प्रभा का नाम अथवा असम्य प्रकाश जो है ब्रह्म का, उसी को ब्रह्म कहते हैं, कृष्ण कहते हैं। उसी तरह से यहाँ पर, हाँ…, क्या बतला रहा था?
भक्त: गीता के दूसरे और तीसरे अध्याय में...
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, तो इसमें जिस ज्ञान की बात बतलायी गयी है, ये बतलाया गया सीधा सा अभी कि मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मरता, बिगड़ता-बन… बनता है और आत्मा नित्य, शाश्वत है, अजर-अमर है, वो कृष्ण का दास है। बस इतना ही कह सकते हैं। इसलिये इसको गुह्य-ज्ञान कहते हैं। सातवे और आठवे अध्याय में जो बतलाया गया, वो शुद्ध-भक्ति और अशुद्ध-भक्ति, केवला भक्ति और उससे नीचे जो मिश्रा भक्ति है, गुणीभूता भक्ति। गुणीभूता माने कर्म, ज्ञान मिश्रा भक्ति। कर्ममिश्रा भक्ति, ज्ञानमिश्रा भक्ति उन लोगों के लिए है जो कुछ ज्ञान की तरफ़ में जा रहे हैं। उन लोगों के लिए। यदि सद्-वैष्णवों का सङ्ग हो गया, तब तो वो परा-भक्ति के तरफ़ में जायेंगे और नहीं तो परा-भक्ति के तरफ़ में नहीं जायेंगे। और नौवें अध्याय में जो बतला...अभी मत जलाओ, आँख में आयेगा। उसको बन्द कर दो, उधर वाले को। हाँ, छोड़…
भक्त: नवाँ अध्याय में
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नवाँ अध्याय में जो बतलाया गया, वो बतलाया गया, निर्गुणा भक्ति का, अनन्या भक्ति का कृष्ण के प्रति। किन्तु इसमें ये नहीं बतलाया गया, रसगत कुछ नहीं बतलाया गया, तत्वगत बस बतलाया। हम्म… वहाँ से भक्ति एक तरह से आरम्भ हुई। इसको बतलाया गुह्यतम। गुह्य पहला बतलाया, दूसरा और तीसरा अध्याय वाला और सातवाँ-आठवे वाले को बतलाया गया गुह्यतर। और नौवें को बतलाया गया गुह्य, गुह्यतम। किन्तु इससे भी बहुत ऊपर है अभी भक्ति। अठारहवें अध्याय के अन्त में सर्वगुह्यतमम्। गुह्यतम तो है ही है, सर्वगुह्यतमम्, सबसे अधिक। वो ‘मन्मना भव’ इत्यादि। उसमें भी नाम नहीं लिया। ब्रज की भक्ति सभी उसमें आयेंगी, किन्तु पराकाष्ठा रूप में, अन्त रूप तक वो ओ… कौन आयेगा? गोपियों की भक्ति। इसलिये गोपियों की जो भक्ति है, ये केवला है, एकमात्र। ये केवला होना बड़ा भारी कठिन है।
उसमें यही बतलाया गया कि दूसरों की, देवताओं की पूजा नहीं कर, दूसरे किसी इष्ट देव की पूजा नहीं कर करके कृष्ण की ही पूजा करो और कृष्ण की प्रीति के लिए, वहाँ पर इसी को गुह्यतम बतलाया गया नौवें अध्याय में। किन्तु ऊपर की बातें नहीं बतलायी गयी। चैतन्य महाप्रभु उस चीज़ को देने के लिए आये, जो कृष्ण नहीं दिये थे गीता में। हम्म… वो है केवल भक्ति सद्म। केवल भक्ति को एक साथ में जोड़ दो और सद्म को अलग कर दो। तो भक् केवल भक्ति और सद्म माने ऐसे केवल भाव से, जो गोपियों का भाव है...हम्म… क्योंकि गुरु-रूपी सखी का वर्णन इत्यादि इसमें देखा जाता है।
‘वन्दों मुइ सावधान म…’– मैं उनके चरणों की वन्दना करता हूँ। किसलिये? इसलिये चरण की वन्दना करता है, इसलिये इसी में कारण दिखलाया गया। केवल भक्ति है ना? मैं आपसे केवल भक्ति चाहता हूँ, ब्रज की भक्ति। ब्रज की भक्ति में भी क्या चाहता हूँ? जिसको चैतन्य महाप्रभु देने के लिए आये थे, बस उसी को चाहता हूँ। हम्म… कहे जे चैतन्य महाप्रभु तो बाग-भालूओं को भी प्रेम दिया, तो वैसा चाहिये? नहीं, नहीं, हमको वैसा नहीं चाहिये। आपने जो रूप गोस्वामी को शिक्षा दी, वो मैं चाहता हूँ। हम्म… प्रयाग में रह कर के, रूप गोस्वामी को जो आपने शिक्षा दी थी, बस वही चाहता हूँ। और? और कोई विशेषण? हाँ, हाँ, आपने राय रामानन्द को अन्त में जो चीज़ बतलायी थी, मैं वही आपसे चाहता हूँ। गुरु चीज ये देने में समर्थ हो, तो गुरु हैं पक्के। नहीं तो कभी-कभी साधारण रूप में, मध्यम अधिकारी या कनिष्ठ अधिकारी भी नहीं जानने से उसको गुरु के रूप में वरण कर लेता है। ठीक है। किन्तु यदि किसी का पूर्व जन्म का संस्कार वैसा पक्का है, वो उसकी पेट उसका पेट कहीं नहीं भरेगा। कहीं भर ही नहीं सकता। पेट भरेगा कहाँ? इस चीज़ को पायेगा तो। हम लोग भी खोजते-खोजते, ढूंढते-ढूंढते, ढूंढते-ढूंढते हिमालय के जंगलों में छाँका और कहाँ-कहाँ गये, खोजते खोजते खोजते खोजते। हम लोग सोच रहे थे जटाजूट में, एकदम यहाँ लम्बी-लम्बी जटाएँ होंगी और लंगोटी पहने होंगे, शायद वो गुरु हों। कहीं भी रुचि नहीं हुई। अन्त में गुरुजी के चरणों में रुचि हुई। तो ऐसे ही जिनका सौभाग्य है, कृष्ण इसकी व्यवस्था करते हैं। पूर्व जन्म के संस्कार पर निर्भर करता है। विशेष करके ऐसी भक्ति जिसके बारे में बतला रहा हूँ। ये उस जन्म का संस्कार plus इसी जन्म का संस्कार भी, हम्म…। दोनों का संस्कार होगा, तो ऐसे शुद्ध गुरु-वैष्णव मिलेंगे। कृष्ण भी इसकी व्यवस्था करें…। नहीं तो पात्र ही नहीं रहेगा तो उस पर ये भक्ति ठहरेगी नहीं। उसमें दोष देखा जे “अरे… ये तो ऐसी-ऐसी बातें करते है।” हम्म… उसमें रुचि नहीं है, बल्कि उनकी निन्दा करेंगे।
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाइ’-
भक्त: (30:00 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, ऐसा भी होता है।
भक्त: (30:10 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम्म, कुछ गड़बड़ हो जाता है। पहुँच तो गये। हम लोगों के गुरुजी पास में कितने आये, कितने चले गये। भक्ति सिद्धान्त सरस्वती। अरे! महाप्रभु जी के पास में वो काला वैष्णव काला कृष्णदास आकर के और कहाँ सरक गया? (30:27 अस्पष्ट)
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई, कृष्ण प्राप्ति हय जाँहा हइते’– ‘जाँहार प्रसादे’ जिनकी कृपा से ‘ए भव तरिया जाई’, सहज ही, सुख से इस सग… सागर को, भव-सागर को तर जाता है। सागर माने क्या? भव माने। भव माने? होना। क्या होना? क्या होना?
भक्त: जन्म…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जन्म और मरण। हाँ, बहुत समय नष्ट करके आ रहे हैं। धीरे-धीरे हाथ डुलाते हुए… कहा जे चार बजे से आरम्भ होगा, अब आ रहे हैं। हम्म…
‘जाँहार प्रसादे भाई, ए भव तरिया जाई’– से गुरु मिल गये। गोष्पद्धा, गोष्पद माने? गाय के बछड़ा कहीं कीचड़ में जा रहा हो, दलदल जमीन में। दलदल माने कोमल जमीन में और उसका खुर उसमें निकल आया और उसमें पानी भर आये। तो आदमी जैसे चलता-फिरता, वह ना जाने कहाँ है, नहीं है और पार हो जाता है। कब पार किया, कोई पता नहीं।
भक्त: समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारे:। भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्॥
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो वो ऐसे ही, गोखुर के भाँति में, वो संसार को पार कर गया। कब पार कर गया? पता नहीं। आप लोग भी ऐसे ही हो। कब संसार दूर हो गया, कुछ पता नहीं। ये बिल्वमङ्गल, कब तर गया? कहाँ था नीचे! किन्तु पूर्व जन्म का संस्कार नहीं होता ना, तो ऐसा नहीं होता। इसमें पूर्व जन्म का संस्कार है। फिर इस जन्म में भी कुछ संस्कार हो गया। चिन्तामणि जो बाकी-छाकी थी उसको पूरा कर दिया। देखो, वैश्या में भी मि…, तो ऐसी वैश्या मिली जो कृष्ण के तरफ़ में ठेल दिया। हम्म… “हमारे हाड़-मांस के चर्म में तुम्हारा जितना प्रीति है, तुमको कृष्ण के चरणों में इतनी प्रीति नहीं थी? तुम बहुत दुर्भागा है।” बस ऐसी ठेस लगी जो ऐसा ठेल बा… ठेला एकदम वृन्दावन में आ करके गिर पड़े।
‘जाँहार प्रसादे भाई ए भव तरिया जाई, कृष्ण प्राप्ति हय जाँहा हइते’– कृष्ण प्राप्ति सहज रूप में हो जाती है।
‘गुरुमुख पद्म वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्य’– गुरुजी के मुख से जो बातें निकलती हैं, पहले ही ये देख लिया, ये सद्गुरु हैं। कौन से सद्गुरु हैं? सवेरे हमने बतलाया था, इन लोगों ने भी बतलाया था। वेद-शास्त्र इत्यादि के जितने भी विचार हैं, उनको हृदयङ्गम है, सबको पारङ्गत हैं, और कृष्ण की अनुभूति है और संसार से परम विरक्त हैं। ये गुरुजी का लक्षण है। यदि ये लक्षण नहीं हैं, तो फिर उसको, यदि सौभाग्य होगा, तो फिर उच्च-कोटि के गुरु मिलेंगे। नहीं तो, ऐसे भक्ति में प्रवेश नहीं कर सकता। हम्म… और नहीं तो फिर जैसे जिस गुरु की हमने पच… दस वर्ष तक सेवा की और वो कहीं लुढ़क गये, एक सौन्दर्य को देखा, उसी में लुढ़क गये। कहीं रुपया-पैसा भी देखा, उसके तरफ़ में लुगढ़…। कहीं प्रतिष्ठा की तरफ़ में लुढ़क गये। संसारी कामनाओं-वासनाओं के मृग-तृष्णा में फंस गये। ऐसा गुरु नहीं चाहिये। नहीं तो भक्ति-जीवन और परमार्थ-जीवन बर्बाद हो जाता है। ऐसा गुरु नहीं चाहिये।
‘चित्तेते करिया ऐक्य’– ऐसे गुरु को करना चाहिये और नहीं तो बिना गुरु के रहे, तो भी ठीक है। नहीं तो गुरु करे तो ऐसा। किन्तु ऐसा गुरु अपने इच्छा पर निर्भर है जे मिल जायेंगे? नहीं, पूर्वजन्म की सुकृति ऐसी रहेगी, संस्कार रहेगा, तो मिल जायेगा, ये भी बात है। तो भी कृष्ण से प्रार्थना करें कि हमको शुद्ध गुरु मिल जाए। ऐसे गुरु के जो मुख से जो वचन-उपदेश निकलते हैं, वो निश्चित रूप में समझो, यदि सद्गुरु हैं, वेद-शास्त्रों का सार है, उसमें विचार करने की कोई ज़रूरत नहीं है।
विचार कब करेंगे हम? एक तो सन्दिग्ध अवस्था में नीचे बहुत रहेंगे, तब विचार कर सकते हैं और जिनके वचन शास्त्रों के अनुसार में मेल नहीं खाते, तब तो उसको विचार करना ज़रूरी है। आजकल के अधिकांश गुरु ऐसे ही हैं। विचार करना पड़ता है। किन्तु जब ये सद्गुरु हैं, जिन्होंने अ… सद्गुरु का हम तो यही लक्षण समझते हैं जो गुरु परम्परा की धारा को मान करके चलते हैं। अपना कोई नया विचार नहीं है। महाप्रभुजी ने, रूप-सनातन ने, इसके बाद में अभी तक हमारे भक्तिविनोद ठाकुर, भक्तिसिद्धान्त सरस्वती की परम्परा के अनुसार में चलते हैं, तब तो वो सद्गुरु हैं। अब उन पर तुम विचार मत करो। एक मात्र उन्हीं के वाक्यों को हृदय में धारण करो। क्यों? शास्त्र, गुरु और वैष्णव, तीनों के बातों को लेकर के चलना चाहिये। शास्त्र के विपरीत यदि गुरु करते हैं और वैष्णवों के भी विपरीत। वैष्णव कहते हैं, ये बात ठीक नहीं है, अर्थात् वैष्णव और शास्त्र एक तरफ़ हैं और गुरु कुछ दूसरे कह रहे हैं, उस समय में क्या करेंगे? विचार करेंगे। भाई ऐसा क्यों? यदि वो satisfy करते हैं, तो ठीक है और satisfy नहीं करते हैं, तब समझो ये इसको गलत विचार हैं। शास्त्र के अनुकूल होना चाहिये। वैष्णव और गुरु एक बात कहते हैं, शास्त्र में कुछ और लिखी गयी है, तो समझो ये शास्त्र का गूढ़ उद्देश्य, ये गूढ़ जो रहस्य ये बतला रहे हैं, यही ठीक है। और यदि…
भक्त: गुरु शास्त्र…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गुरु और शास्त्र एक तरफ़ में हैं, वैष्णव दूसरा कह रहे हैं तो गुरु का ही वचन सुनना चाहिये। ये सबको अच्छी तरह से विचार करके हम चलेंगे। यहाँ कहते है कि यदि गुरु ऐसे हों, तो फिर ये सब तीनों चीज़ों की करने की ज़…, वो गुरु के चरणों में ही, गुरु के वचनों में ही ये तीनों चीज़ें समाहित हैं।
भक्त: यदि सद्गुरु है, तो फिर…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कोई अब वो उसमें विचार करने की ज…। वहीं पर है, ‘गुरोराज्ञा हि अविचारणीया।’ वहाँ पर गुरु के विचार को मत करो। सब ठीक है। जैसे रूप गोस्वामी ने कह दिया, अब हमको शास्त्र का page उलाटने की ज़रूरत नहीं है, किसी से पूछने की ज़रूरत...। हम लोगों के गुरुजी थे, जो कह दिया, तो हम लोग वो शास्त्र उलाट कर के नहीं देखते थे। याद करने के लिए, ये कौन सा श्लोक में कैसा क्या है, इसके लिए हम लोग शास्त्र देखते थे। बस मान लेते थे कि यही पक्का है, इसके बाद में दूसरा नहीं हो सकता। अभी तक हम देखते हैं, कभी-कभी बहुत से लोगों को, confusion में रहते हैं किसी विषय में। हमारा किसी विषय में confusion नहीं रहता क्योंकि गुरुजी से हमने सुना है। हम्म…बहुत से लोगों से, हमसे बहुत बड़े senior सब वैष्णव हैं, उनसे भी हम लोगों का कुछ विचार हो जाता है। उसमें उन लोगों को हम प्रणाम कहते हैं, करते हैं, किन्तु कहते हैं जे नहीं, हम इस चीज की आपकी बात को नहीं मानेंगे। क्यों? बहुत ही युक्ति से, शास्त्र के अनुसार और हमारी परम्परा के अनुसार में विचार करके गुरुजी कहते थे। इसलिये अभी तक देखते हैं कि हम लोग जो कहते हैं, बड़े-बड़े लोग सब इधर-उधर हो जाते हैं, हम लोगों की बातें ठीक रहती हैं। हम्म… ये गुरुजी की कृपा है। आप लोग भी ऐसे ही एक लक्ष्य रख करके चलेंगे।
भक्त: इसलिये हम लोग महाराज, गुरुजी की बात पे विचार करने जैसी (38:32अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, जैसे कि एक बार गुरुजी ने हमसे कहा– “देखो, मधुर रस दो प्रकार का होता है, एक स्वकीय, एक पारकीय। अअ… जो स्वकीय है, वो मधुर रस नहीं है, वो दास्य रस है। मधुर रस गोपियों का ही है।” तो हमने कहा “जैसे रूप गोस्वामी ने तो ऐसे लिखा है।” उनसे, गुरुजी से ही पूछा। सन्देह होकर के नहीं, दृढ़ता के लिए पूछा। उन्होंने तो लिखा है जे स्वकीय भी मधुर रस है और पारकीय भी मधुर रस है। स्वकीय में जैसे द्वारका की महिषियों का है, सीताजी का है और गोपियों का पारकीय भाव है।
कहा ये अभी नहीं समझेगा, कुछ दिन के बाद में समझेगा। वो सब दास्य भाव है, सीधा-सादी दास्य भाव है। तो हमने जिस उनका निकाला, देख रहे हैं, देखते, देखते, देखते, दिखाई दिया, नहीं वो ठीक कह रहे हैं, यही तो गोपियों का वैशिष्ट्य है। इसलिये ‘चित्तेते करिया ऐक्य’, चित्त में बस, एक विचार करके ऐसे सद्गुरु मिलें, अब कहीं देखने के निये ज़रूरत नहीं है। किन्तु हाँ, पुष्टि के लिए, प्रमाण के लिए हम देख सकते हैं कहीं। उसका प्रमाण ढूंढ करके हम ठीक करेंगे। हम लोगों के मठ में राधा-कृष्ण दोनों ही सफेद के हैं। उस सफेद को गौर मान लिया जाए, गौर वर्ण। राधिका जी का रङ्ग गोरी है ना? गौरी है। तो कृष्ण भी गोरे रङ्ग के हुए। तो राधा-कृष्ण दोनों को ही गोरे रूप में ही वहाँ पर रखते हैं। तो बहुत से लोगों ने आपत्ति की, कृष्ण काले हैं और राधाजी गोरी हैं, तो एक रङ्ग में ऐसे क्यों कर दिया? इसके लिए गुरुजी ने, संस्कृत में एक अष्टक लिखा और अष्टक में बतलाया-आ…
राधा चिन्ता निवेशेन यस्य कान्तिर्विलोपिता।
श्रीकृष्ण चरणं वन्दे राधालिङ्गित विग्रहम्॥
हाँ, क्या, कहाँ से आरम्भ?
भक्त: राधा चिन्ता निवेशेन
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ‘राधा चिन्ता निवेशेन’– अधिकांश लोग जो हैं नहीं समझते, बहुत उच्च कोटि के भक्त लोग भी कृष्ण की ही प्रधानता देते हैं। राधाजी को, उनको क्या मान लेते हैं? उनके अधीन, उनकी शक्ति है, बस यहीं तक। अधिकांश, माने 99%, तत्वज्ञ भक्त लोग भी, रसिक में भी। हमारे आश्रम के भी ऐसे कुछ लोग हैं, वो कहते हैं कि “राधा जी सब समय इनके अधीन हैं, कृष्ण तत्व के। इसलिये हम लोग कृष्ण को ही हम लोग अधिक सम्मान देंगे, superiority रहेगी कृष्ण की ही। तत्व में जहाँ भी देखो, तहाँ पर कृष्ण, कृष्ण-भक्ति, कृष्ण का भजन करना चाहिये, कृष्ण का अनन्य भजन होना चाहिये, ये सब सर्वत्र ‘एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ ये दिया गया है।”
यहाँ तक तात्विक और ये सबका विचार है, यहाँ तक तो ठीक है ये। हम्म… किन्तु इससे ऊपर भी कुछ बातें हैं, जो चैतन्य महाप्रभु लाए, उनके परिकरों ने, रूप गोस्वामी इत्यादि ने। तो हाँ, किस विषय में कह रहा था? भूल गया।
भक्त: राधाजी गोरा रङ्ग
अन्य भक्त: ‘राधा चिन्ता निवेशेन’
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, तो गोरा रङ्ग के लिए। अब गुरुजी ने कहा कि “राधा चिन्ता निवेशेन”, कृष्ण राधाजी की चिन्ता में हैं, ना कि राधाजी कृष्ण की चिन्ता कर रही हैं। भागवत तक में भी ये स्पष्ट रूप से दिखलाया गया, ऊपर से जो दिखलाया गया, जो राधा जी बिलबिला रही हैं, प्रेम में, मूर्छित हो रही हैं, हाय-हाय कर रही हैं और कृष्ण द्वारका चले गये, दिन-रात विरह में तड़फड़ा रही हैं। बल्कि उद्धवजी गये ब्रज में तो राधाजी को इसी रूप में देखा, बिलबिला रही हैं, रो रही हैं, विप्रलम्भ की अवस्था में दिखा रहे हैं। गुरुजी ने कहा, “अरे, हम लोग रूप गोस्वामी के अनुगत हैं, राधाजी रो रही हैं कृष्ण के विरह में, हम लोग ये पसन्द नहीं करते हैं, हो सकता है ऐसा, किसी की भावना। हम तो ये चाहते हैं, जे कृष्ण ही राधाजी के विरह में रो रहे हों और राधाजी को खोज रहे हैं, राधाजी को सन्देश भेज रहे हैं, उनसे रहा नहीं जाता कभी। इसलिये ‘राधा चिन्ता निवेशेन’, राधिका के चिन्तन में एकदम प्रमत्त हो गये कृष्ण। अपने शरीर की कान्ति, शरीर भी भूल गये, राधा-राधा करते-करते, करते-करते, करते उनका अङ्ग-कान्ति भी कैसा हो गया? काला से बदल करके, गौर रङ्ग बन गया।
‘राधालिङ्गित विग्रह’– राधा के द्वारा आलिङ्गित, भीतर से भी, बाहर से भी। उनका हृदय ही राधामय हो गया। ये इमलीतला में ऐसा हुआ था। सेवाकुञ्ज में, मिलन के बाद में ऐसा हुआ। सेवाकुञ्ज में तो वहाँ शृंगार किया, शृंगार करने के बाद में अन्तर्ध्यान हो गये। राधाजी वहाँ पर विलाप कर रही हैं, सेवाकुञ्ज इत्यादि में उनके पीछे और इमलीतला में वो विरह में कर रहे हैं। इसके बाद में सेवाकुञ्ज में उनका मिलन हुआ, उनके चरणों में प्रणत हो रहे हैं कृष्ण। तो गुरुजी ने ऐसा लिखा। बहुत से लोगों ने प्रश्न गुरुजी को किया। तो गुरुजी ने इसका बहुत समाधान किया। हमारे ही मठ के, हमारे बड़े गुरुभाई एक हैं। उन्होंने कहा जे– “ऐसा शास्त्र में कहाँ लिखा?” हमने कहा जे– “शास्त्र में लिखा है ऐसा।” गुरुजी के अप्रकट के बाद में हमसे वो कह रहे थे। हमने कहा जे बहुत जगह में ऐसा है। “हाँ तो, आप दिखलायें।” तो हमने उसको शास्त्र से लेकर के दिखलाया, ये गुरुजी का ये लिखना परम सत्य है। उस समय मैं मुझको एक हुआ, जे इस पर एक व्याख्या होनी चाहिये, इन श्लोकों पर। यदि भगवान् ऐसा सुयोग देंगे, तो इस पर व्याख्या लिखेंगे कभी।
ये पद्म पुराण में भी ऐसा है, बृहद्भागवतामृत में ऐसा है, कृष्ण-भावनामृत में ऐसा है,
भक्त: स्वप्न-विलास में…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: स्वप्न-विलास में ऐसा, हमारी गुरु परम्परा की ऐसी रीति है। उसमें सब बतलाया है। हम्म… कृष्ण विलाप कर रहे हैं उनके और चिन्तन करते-करते-करते ये इनका रङ्ग गोरा हो गया। तो इसलिये कह रहे है ‘एई से उत्तमा-गति’ न चित्तेते ते… ऐसे गुरुजी के वचनों में एकदम पूर्ण रूप से विश्वास करके भजन-राज्य में आगे बढ़ना चाहिये।
‘श्रीगुरु-चरणे रति’– गुरु के चरणों में, केवल श्रद्धा ही नहीं मत करो। क्या करो?
भक्त: रति
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रति माने क्या करो? पहले श्रद्धा, श्रद्धा से गुरु-पदाश्रय, गुरु-पदाश्रय से दीक्षा-शिक्षा, विश्रम्भ रूप में गुरुजी की सेवा। भजन करते-करते अन… उत्तमा-भक्ति का हम सेवा जब अनुष्ठान करेंगे, तो उससे होगा क्या? अनर्थ दूर हो जायेंगे। उत्तमा-भक्ति नहीं होने से नहीं होगा, उत्तमा-भक्ति का साधन करने से। किन्तु हम अभी अनाधिकारी हैं, नीचे की तरफ़ हैं। इसलिये धीरे-धीरे, धीरे-धीरे हम ऊपर उठेंगे। तो फिर वह होगा, अनर्थ निवृत्ति हो जायेगी। जो अर्थ नहीं है, उसी को हम अर्थ कर रहे हैं, मान रहे हैं, उन अनर्थों से हमारी निवृत्ति हो जायेगी। ये संसार सच्चा है, यहाँ के सम्बन्ध सच्चे हैं, यहाँ के भौ… भौतिक जो पदार्थ हैं, अर्थ इत्यादि हमारे लिए ज़रूरी हैं। ये सब अभी हम लोगों ने इसको अर्थ बना रखा है। ये सब है असल में अनर्थ। अरे, यहाँ तक की तो बात क्या, शुद्ध भक्तों के लिए, ब्रजवासियों के भक्तों के लिए, द्वारका की भक्ति भी अर्थ नहीं है।
भक्त: अनर्थ नहीं है पर अर्थ भी ऐसे…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, अनर्थ तो नहीं है, किन्तु अर्थ नहीं है। वही ब्रज की भक्ति, वही राधिकाजी की सेवा, पाल्यदासी का भाव, यही तक ये अर्थ है।
‘एइ से उत्तमा-गति’– ऐसे गुरु हों, तो ऐसी गति, उत्तमा गति हो सकती है।
‘ये प्रसादे पूरे सर्व आशा’– समस्त आशाएँ पूर्ण हो जायेंगी। हमको बहुत से रुपए की ज़रूरत है। हम्म… संसार के बहुत सी चीजों की, अच्छा महल, अच्छा घर, अच्छी शादी, अच्छी लड़का-लड़की, ये सब चीज की ज़रूरत है। अच्छे ओहदे की ज़रूरत है, जैसे कि उसको, अअ… प्रह्लादजी के पिताजी को हिरण्यकशिपु की ज़रूरत थी। ऐसे कितनी कामनाएँ हैं? किन्तु एक ऐसी कामना, जैसे कि इस जगत् में कामना पूर्ण करने के लिए एक चिन्तामणि की कल्पना की गयी। एक चिन्तामणि मिलने से ही सब कामना पूर्ण हो जायेगी, कल्पतरु होने से हो जायेगी। ये कृष्ण वैसे ही। गुरुजी उस कल्पतरु के समान हैं, चिन्तामणि के समान, समस्त आशाओं को पूर्ण कर देते हैं। एक राधाजी की दासी होने से समस्त प्रकार की आशाएँ पूर्ण हो जायेंगी। अन्तिम वो बिन्दु है।
‘चक्षुदान दिला जेई, जन्मे जन्मे प्रभु सेई’– आपने मुझे चक्षुदान दिया, प्रेम का अञ्जन लगा करके-
प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं…
‘चक्षु दान दिला'– आजकल चक्षु दान, मरे हुए का आदमी की आँख ले लेते हैं। और उसको फिर ज… वो उसो दिखाई नहीं पड़ता, उसको आँख लगा देते हैं। ये दया है तो है ज़रूर। हम्म… एक महाभोगी व्यक्ति, उसको नाक, आँख लगा दिया, क्या हुआ? सांसारिक भोगों में अब प्रमत्त। कहाँ वो अन्धा रहता, तो सो… “हाय! हाय! हम अन्धा हो गया। कृष्ण-कृष्ण का भाई भजन करो, तुम अन्धा हो गया।” वो जो सुयोग था, वो भी निकल गया। आज के लिए, जो ये वैज्ञानिक पद्धति से, जिसको हम लोग वरदान समझते हैं, हमारे समझ से वो वरदान नहीं है। एक लड़की की शादी होनी थी। अभी एक महीने का हुआ था कि वो उसका पति मर गया। अब घर के लोग सोचते हैं कि उसके लिए एक नए वर को देखकर के उसका विवाह कर दिया जा… तो इसके लिए वरदान होगा। हमारी प्राचीन पद्धति कहती थी, “क्या ज़रूरत है? तो देख लिया तो एक महीना? अब कृष्ण को अपना पति बनाओ और उसी को भजन करो।” और यदि ऐसा करने लेती ती, तो सारे परिवार का, देश का, समाज का वो देवी बन जाती थी। अब आजकल तो, वो सब से मान्य है, विधवा-विवाह को जिन्होंने चालू कराया,
भक्त: राजा राममोहन राय
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मोहन राय और ये हाँ दयानन्द सरस्वती, ये सब बड़े-बड़े दयालु लोग हैं। ये दयालु नहीं, बल्कि और गले में छुरी देने वाले हैं। किसी प्रकार से भगवान् के तरफ़ में उनकी वृत्ति ले जानी चाहिये। भोगों की प्रवृत्ति जो दे, वो क्या है? वो हलाहल करने वाला है। हम्म… जैसे मुर्गी का पालन करने वाला, वो जो चाचा जी होते हैं ना? मुर्गे को और अच्छी-अच्छी बकरियों को पालन करते हैं। बस खूब खिलाते हैं। जो अपने नहीं खाते, उसको भी खिलाते हैं। जब मोटे हो जाते हैं, तो ये बक़रीद के दिन में ज़बह करते हैं उनका। हाहा… इसलिये बक़रीद है, बक़रीद। तो उनका पालन करना क्या हुआ? वो दया का परिचय नहीं है, बल्कि वो क्या चीज का परिचय है? महानृशंस का। इतने दिन प्यार से, पुत्र की भाँति, कन्या की भाँति पालन करके, फिर उसको काट देना। हम्म… ये सब दया का परिचय नहीं। ये संसार में दयाएँ ऐसी ही है सब, “ये लड़की अभी-अभी, अभी तो विधवा हुई, इसकी शादी कर दो।”
अरे शादी करो कृष्ण से, फिर उसको शादी करने की ज़रूरत नहीं है। वो जन्म-जन्मान्तर में वो सुखी हो जाये। गुरु-लोग ऐसे ही होते हैं। तो फिर से सम्बन्ध करके, नित्य काल के लिए उसे सुखी और शान्ति बना देते हैं। दिव्य-ज्ञान का हृदय में, ये दिव्यज्ञान है।
‘प्रेम-भक्ति जाँहा हइते, अविद्या विनाश जाते’– प्रेम भक्ति का प्रकाश कर देते हैं, जिससे सहज रूप में ही अविद्या दूर हो जाती है।
‘वेदे गाय जाँहा…’ वेदों में सर्वत्र उनका गान किया गया है।
‘श्रीगुरु करुणा-सिन्धु, अधम जनार बन्धु’– हैं ऐसे गुरु, किन्तु बड़े कृपालु हैं, अधमों के वो बन्धु हैं, अधमों का, पापियों का, निम्न जो चले गये हैं नीचे, उनके एक मात्र बन्धु कौन हैं? ऐसे परम दयालु गुरु। ये नहीं जे “अच्छा, तुम किस जाति से आया? हम्म… तुम कौन कुल में जन्मी थी? तुम कैसी थी पूर्व में, वेश्या थी या क्या थी? तुम उच्च घर में जन्मी है?” ये सब कुछ नहीं पूछना। क्या पूछते हैं? उसकी देखते हैं कि उसके अन्दर में श्रद्धा है कि नहीं, बस यही देखा और उसको झट कृष्ण नाम दे करके और ऊपर उठा देते हैं। आत्मा सब समय पवित्र है। वो मन के सम्बन्ध से कुछ पतित हो गया या इसका उनके इसमें मूल्य कुछ नहीं है। यदि सदाचारी सब गुण-सम्पन्न कोई व्यक्ति है साधक, गुरु के पास में गया और एक दुराचारी, किन्तु दुराचारी जो है, उसमें अधिक अपने पापों के लिए ग्लानि है और उसमें कृष्ण के प्रति श्रद्धा है, तो उसी को कहेंगे, “ये श्रेष्ठ है।” सदाचारी, उसमें अभिमान रहेगा, “मैं बड़ा-भारी सदाचारी हूँ। हम्म… मैं बड़ा-भारी गुणी हूँ। मैं मैं शास्त्रज्ञ हूँ। मैं शास्त्रों का सब सार जानता हूँ।” नहीं। वो देखे नहीं जे जिसके प्रति श्रद्धा है। वो निरक्षर व्यक्ति भी प्रेम का अधिकारी है, यदि उसमें श्रद्धा है।
‘लोकनाथ लोकेर जीवन’– लोकनाथ, ऐसे लोकनाथ हमारे गुरु हैं। कौन कह रहा है?
भक्त: नरोत्तम ठाकुर।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और दूसरे में, ‘लोकनाथ लोकेर जीवन’– कृष्ण ही लोकनाथ। हम्म… दोनों अर्थ लिया। तो हमारे गुरुजी लोकनाथ हैं। ‘लोकेर जोवन’– लोकों के जीवन हैं। किसके जीवन? प्रेमा-भक्ति को देने वाले हैं, इसलिये जगत् के ये जीवन हैं।
‘हा हा प्रभु कर दया’– हे लोकनाथ प्रभु! हे गुरुदेव!
‘हा हा प्रभु कर दया, देह मोरे पदछाया, तुया पदे लईनु शरण'– हम आपके चरणों में शरण। ऐसा होना चाहिये। ऐसे आप लोगों के भी भाव हों, गुरु के प्रति ऐसी निष्ठा हो। अब एक ही घाट में स्नान करेंगे, दूसरे घाट में नहीं। दूसरे घाट में, बस इसी घाट पर। उस घाट में स्नान करेंगे जहाँ पर एकदम सीधे ब्रज में निकलेंगे। ये गुरु की महिमा है। ऐसे ही सब इसमें, “कृपा बिन्दु दिया, करो एई दासे, तृणापेक्षा अति हीन,” इत्यादि सब कीर्तन हैं। अभी सवेरे की बात थी, इसमें कुछ लोग लिख कर के दे आये हैं, पुष्पाञ्जली। तो उनको थोड़ा सा पढ़िए और बाकी जो रह गये हैं, दो-चार आदमी बोले इसके बाद में। थोड़ा विश्राम करके नहीं बोलने से…आ… एक घण्टा हो भी गया?
भक्त: (54:22 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आ…
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