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Srimad Bhagavatam Series- #27- Bhramara Gita, Uddhava Sees the Divine Love of the Gopis

14:05
#23
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Srimati Radhika is talking to a bumble bee and expressing Her transcendental moods.
  • Quoting “api bata madhu-puryam arya-putro ’dhunaste” Srimati Radhika is saying - O Uddhava! It is indeed regrettable that Krsna resides in Mathura. Does He remember His father’s household affairs and His friends, the cowherd boys? O great soul! Does He ever talk about us, His maidservants? When will He lay on our heads His aguru-scented hand?
  • Uddhava saw the stage of divyonmada (divine madness) and citra-jalpa (variegated speech) of Srimati Radhika and got astonished.
  • Uddhava then prayed at the lotus feet of gopis to become a bush, creeper or herb in Vrndavana “asam aho carana-renu-jusam aham syam”
  • Gopis are the topmost personifications of chastity. Those who are not one-pointed towards Krsna are vyabhicari (adulterers).
  • Before leaving Vraja, Uddhava asked gopis - do you have any message for Krsna? Srimati Radhika said “Don’t tell him anything about our grief; He will be upset. Tell Krsna that we are very happy, and gradually, slowly, you can tell everything (as we know you won’t be able to hide)."
  • Uddhava became afraid that if he stayed longer in Vraja, he would also have to suffer separation from Krsna, so he left.
  • Those who don’t have a separation mood cannot be called sadhakas.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 27 : भ्रमरगीत, उद्धव द्वारा गोपियों के दिव्य प्रेम का दर्शन

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 7 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …[श्रीकृष्ण] किसलिये [उद्धव को व्रज में] भेजते हैं? उद्धवजी कैसे पहुँचे? गोपियों ने उद्धवजी को श्याम [वर्ण] कृष्ण जैसा देखा— श्याम है, किन्तु श्याम नहीं। देखने में श्याम तो है, कृष्ण ही जैसे, किन्तु श्याम तो नहीं। किसलिये उद्धव को भेजा—अभी सुनेंगे। अभी कथा आरम्भ हो रही है। बहुत विलम्ब हो जायेगा। [यदि सुयोग हुआ, तो] मैं शाम को अथवा कथा के अन्त में थोड़ा-सा इसे बतलाने की चेष्टा करूँगा। अभी आप लोग यह कथा सुनें।

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …एक को छोड़कर वह दूसरे को कैसे छोड़ सकेगा? आज एक को छोड़ देगा, फिर दूसरे [को भी छोड़ देगा।] हम तो जानती हैं कि वह छोड़ेगा। वह नये-नये फूलों पर आसक्त रहता है और पुराने को छोड़ता जाता है। और वहाँ तो उनकी संख्या अनन्त है। इसलिये यदि हम वहाँ जायेंगी और उन्हें वहाँ बैठे हुए देखेंगी, तब उस समय क्या होगा?

‘सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते’ [#1] — वहाँ पर हम सह नहीं सकेंगी। बल्कि वहाँ प्रेम के स्थान पर हमें और क्रोध हो जायेगा। [इसलिये] यह सम्भवपर नहीं है [कि हम मथुरा जायें।] अब तुम धीरे-धीरे लौट जाओ। उनसे सन्धि होना सम्भवपर नहीं है।

‘अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते’ [#2]— अच्छा, यह तो बतलाओ—क्या वे अभी मथुरापुरी में हैं? सुना था कि वे गुरुजी के यहाँ पढ़ने के लिए गये हैं। उनके इतने कोमल श्रीचरणकमल, इतना कोमल शरीर और उनके निष्ठुर पिता ने उन्हें सान्दीपनि के यहाँ, एक शैव के यहाँ, निष्ठुर व्यक्ति के यहाँ भेज दिया। वहाँ उन्हें न जूता, न छाता, न कुछ दिया और कोमल चरणों से ही सेवा करने, गौओं की सेवा करने इत्यादि [अनेक कार्यों में] लगा दिया। वहाँ से लौट आये हैं या नहीं? यदि लौट आये हैं, तो क्या यहाँ आ रहे हैं? हम लोग तो उनकी बाट जोह रही हैं। क्या वे मथुरा में हैं? यदि मथुरा में हैं, तो अवश्य आयेंगे।

‘स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्’ — हे सौम्य! यह तो बतलाओ— [कि यदि] वे मथुरापुरी में आ गये हैं और यहाँ पर आनेवाले हैं, तो मथुरा में रहकर क्या वे कभी अपने बन्धुओं और सखाओं को स्मरण करते हैं? कभी गिरिराज पर जो खेलते थे, उन सखाओं और सखियों को याद करते हैं? सबको तो छोड़ा जा सकता है, किन्तु मैया और बाबा को नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि रक्त का सम्बन्ध है न! हमसे तो उनका कोई सम्बन्ध था नहीं, इसलिये हमें छोड़ दिया। किन्तु अपने पिता और मैया को—जो उनके विरह में अत्यन्त दुःखी होकर अब मरने को हैं—क्या उन्हें कभी स्मरण करते हैं? अथवा यदि कभी हम लोगों को भी जो स्मरण करते हैं, क्या कभी इस प्रकार से स्मरण करते हैं? कैसे?

जैसे किसी मथुरा की रमणी ने, प्रेमिका ने सुन्दर वनमाला गूँथकर उनके गले में पहनायी, तो क्या कृष्ण कहते हैं— “अरे, गोपिकाएँ भी [ऐसी मालाएँ] देती थीं, किन्तु तुम्हारी माला बहुत सुन्दर है; उनकी मालाओं में इतनी सुगन्ध, इतनी चित्रकारी और इतना कला-कौशल नहीं था जितना तुम्हारी [माला में है”?] अथवा क्या वे इस प्रकार कहते हैं— “अरे, तुम यह क्या बनाती हो, गोपियों की कला तो अद्भुत थी, उसमें अद्भुत सौन्दर्य था! उनके सामने तुम लोगों का कुछ भी नहीं”? तो क्या वे निन्दा के रूप में या प्रशंसा के रूप में कभी हमें स्मरण करते हैं?

कभी [मथुरा की स्त्रियाँ उन्हें] पान की बीड़ी देती होंगी, तो क्या वे कहते हैं— “इस पान की बीड़ी में उतना आनन्द नहीं, जितना गोपियों [के दिये हुए पान में था”? इस [प्रकार प्रशंसा के] रूप में [हमें स्मरण] करते हैं? या निन्दा के रूप में भी हमें कभी स्मरण करते हैं? ‘क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते’ — [क्या वे] कभी भूलकर भी हम किंकरियों की बात स्मरण करते हैं?”

और ऐसा कहते ही वे उन्मादग्रस्त हो गयीं। उन्‍हें दिव्योन्माद हो गया और वे इस प्रकार हा-हा प्रभु कहने लगीं— “क्या वे कभी अगरु [के समान] सुगन्‍धवाले, सर्पों जैसे अपने हाथों को, जिनमें परम सुगन्ध भरा रहता है, आकर हमारे ऊपर रखेंगे? क्या वे हमारे सिरों पर रखेंगे अर्थात् हमारी विरह-वेदना को शान्त करेंगे? क्या वे चिरदिन के लिए अभय [प्रदान] करेंगे [और हमें पुनः] मिलेंगे?” इस प्रकार कहती हुई वे उन्मादग्रस्त होकर [भूमि पर] गिर पड़ीं।

उद्धवजी दूर में थे, देखकर [स्तब्ध रह गये—] “अहो! मैंने नन्दबाबा का प्रेम देखा, यशोदा मैया का प्रेम देखा; किन्तु यह प्रेम तो उससे भी कोटि-कोटि गुणा ऊपर है। कहाँ यह दिव्योन्माद! नन्दबाबा को दिव्योन्माद नहीं हुआ; उनके भीतर चित्रजल्प, प्रजल्प, सुजल्प इत्यादि भाव नहीं देखे। उनमें ऐसे भाव नहीं है। उनमें अनुराग तक ही देखा जा सकता है किन्तु यहाँ उससे भी ऊपर के भावों को देखकर मैं स्तम्‍भित हो गया हूँ। आज तक मैंने [ऐसे भाव] न कभी शास्त्रों में देखे और न कभी उनका श्रवण किया। इनका प्रेम कितना महान है! अहो! आज इनके इस विरह [को देखकर] मैं अपने को कृतकृतार्थ मानता हूँ। आज मेरे जीवन का परम सौभाग्य है कि इन गोपियों [के श्रीमुख] से उनकी प्रेम की बातों को सुनकर मैं परम कृतार्थ हो गया हूँ। हे गोपियों!...” इसके बाद उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा। अन्त में कहा—

वन्दे नन्दव्रजस्‍त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.63)

[अतएव मैं श्रीनन्दराज के व्रज की गोपियों के चरणकमलों की धूलि की बार-बार वन्दना करता हूँ, जिनके द्वारा गान की जानेवाली श्रीकृष्ण-कथा त्रिभुवन को पवित्र करती है।] GVP

आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.61)

[मैं तो ऐसी प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस श्रीवृन्दावन में कोई गुल्म-लता या औषधि-जड़ी-बूटी रूप में जन्म ग्रहण करूँ, जिससे मुझे उन व्रजाङ्गनाओं की चरणधूलि निरन्तर सेवन करने को मिलती रहे। उन व्रजगोपियों ने दुस्त्यज (जिसे छोड़ना अत्यन्त कठिन है) स्वजन-सम्बन्धियों तथा वेद की आर्य-मर्यादा को परित्यागकर श्रीगोविन्द के उन चरणकमलों का भजन किया है, जिन्हें श्रुतियाँ अभी तक भी खोज रही हैं।] GVP

“यद्यपि मैं तुम लोगों के प्रेम का स्पर्श भी नहीं कर सकता; तो भी मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे चरणों की धूलि से अभिषिक्त होने के लिए मैं व्रजमण्डल में कहीं गोवर्धन की तराई में, अथवा राधाकुण्ड-श्यामकुण्ड के आसपास, घास के रूप में जन्म लूँ। क्यों? जब गोपियाँ अभिसार करती हुई कृष्ण से मिलने जायेंगी, तब कभी न कभी उनके चरणों की धूलि मेरे ऊपर अवश्य पड़ेगी—भूल से भी जायेंगी तो; उस समय मेरा जीवन कृतार्थ हो जायेगा। जो ब्रह्मा आदि के आराध्य हैं, शंकर के आराध्य हैं, और श्रुतियों के भी आराध्य हैं और [जिन्हें प्राप्त करने का सौभाग्य स्वयं] श्रुतियों को भी नहीं मिला—आज उन गोपियों के चरणों में मैं कौनसी श्रद्धापुष्पाञ्जलि अर्पित करूँ? मैं उनकी चरणधूलि [प्राप्त करने] के लिए कहीं भी लता और गुल्म हो जाऊँ तो मेरा जीवन सार्थक हो जायेगा।”

सुनते हैं कि उद्धवजी आज भी कुसुमसरोवर के पास में तृणरूप में स्थित हैं और वे गोपियों के चरणों की धूलि की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बतलाओ, गोपियों का प्रेम कैसा है! इस प्रकार...

[हरिकथा में अचानक कटौती…]

[उद्धवजी कहते हैं—] “जो कोटि-कोटि गोपियाँ हैं, उनके चरणों में से एक के चरण की एक धूलिकणा की मैं वन्दना करता हूँ; जिस दिशा में वह धूलि है, [उस दिशा को भी प्रणाम करता हूँ।”]

तो उन कोटि-कोटि गोपियों में से वे किस एक के चरण की धूलि को चाहते होंगे—यह सहज ही अनुमेय है। [निश्चय ही वे] उनमें जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन्हीं के चरण की धूलि को चाहते हैं अर्थात् श्रीमती राधिकाजी की चरणधूलि को। किन्तु [उन्होंने इसे प्रत्यक्ष रूप से] कहा नहीं, व्यक्त नहीं किया; [क्योंकि] व्यक्त करने से उसका महत्व घट जायेगा। इसलिये व्यक्त नहीं किया और वन्दना करने लगे।

[उद्धवजी ने आगे] कहा— “जो सौभाग्य लक्ष्मीजी को भी प्राप्त नहीं हुआ, जो सौभाग्य सत्यभामा और रुक्मिणी को भी प्राप्त नहीं हुआ, [वही सौभाग्य इन गोपियों को प्राप्त है।] रास के समय कृष्ण स्वयं उनके गले में हाथ डालकर उनसे प्रणय की भिक्षा माँगते हैं और अपने को कृतकृतार्थ मानते हैं। अहो! व्रज की रमणियाँ ही [वास्तव में] धन्य हैं।”

अन्य स्त्रियाँ भले ही पतिव्रता [कही जायें]—जैसे अत्रि-पत्नी अनसूया, लक्ष्मीजी आदि पतिव्रता हैं, किन्तु ये सब पतिव्रता-[धर्म] की शिक्षा कहाँ से प्राप्त करेंगी? गोपियों की चरणधूलि से ही ये शिक्षा प्राप्त करेंगी। यदि [वास्तविक अर्थ में कोई] पतिव्रता हैं, तो एकमात्र गोपियाँ ही हैं। ऐसी पतिव्रता का और कोई भी उदाहरण का स्थल नहीं है; वे स्वयं ही अपने उदाहरण हैं।

अनसूयाजी तो अपने पति को भी और कृष्ण को भी पति मान रही हैं; तो उनका पातिव्रत्य कहाँ रहा? [पतिव्रता कहलानेवाली] और सबके लिए भी ऐसे ही है। द्रौपदीजी, अहिल्या, कुन्ती, तारा, मन्दोदरी सबका ऐसा ही है। जो एकमात्र कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हैं, वे गोपियों के अतिरिक्त और कोई दूसरा नहीं है। और सब कैसी हैं? वनचरी हैं। [गोपियाँ भी] वनचरी हैं, किन्‍तु गोपियाँ कैसी वनचरी हैं? उद्धवजी उनकी वन्दना करते हैं। गोपियाँ ही वनचरी हैं। वनचरी माने— वृन्दावन के वनों में विचरण करनेवाली, कृष्ण को उन्मादित करनेवाली, [और उनके साथ] विलास करनेवाली। और [अन्य] सब [स्त्रियाँ] कैसे वनचरी हैं? [उनके लिए] वनचरी माने— व्यभिचारिणी। और सब [व्यभिचारिणी हैं।] जिनका भी मैंने पतिव्रता के रूप में नाम लिया, वे सभी व्यभिचारिणी हैं। उनका कृष्ण में एकान्तिक अनुराग नहीं है, इसलिये [व्यभिचारिणी हैं।]

अरे! जिनका कैसे भी, किसी भी प्रकार से ऐसे कृष्ण के प्रति प्रेम हो गया, जिनकी कृष्ण के चरणों में प्रीति हो गयी—तो उसका फल नहीं होगा? तुमने पहले ऐसा प्रश्न क्यों किया? यदि एक औषधि की क्रिया होती है—[चाहे उसके विषय में कोई] जाने या सुने नहीं; जैसे मन्त्र की क्रिया होती है; आग को जानो या न जानो, यदि हाथ रखोगे तो वह जला देगी; पानी भी डुबो देगा [चाहे जानो या न जानो]—तो यदि किसी की कृष्ण के प्रति ऐसी भक्ति हो, कामभावना से भी हो, तो क्या उनका कल्याण नहीं होगा? अवश्य होगा। इसलिये गोपियाँ अपने प्रेम की ध्वजा स्वयं हैं। इसलिये ब्रह्मा इत्यादि [देवता,] शुकदेव गोस्वामी, हमारे उद्धवजी, नारदजी और जितने प्रेमी [भक्त] हैं, वे सभी उनके चरणों की वन्दना करते हैं।

गोपियों की बातें सुनकर उद्धवजी ने [वापिस] जाते समय कहा— “आज मैं धन्य हो गया। सचमुच, कृष्ण ने जिस काम के लिए मुझे यहाँ भेजा था, वही हुआ।”

[उन्होंने] गोपियों से कहा—“हे देवियो! मैं प्रभु का कुछ सन्देश लेकर आया था। [क्या मैं] आपका भी कोई सन्देश उनके लिए ले जाऊँ? राम ने सीताजी के लिए अपनी मुद्रिका भेजी थी और सीताजी ने क्या दिया? अपनी चन्द्रिका दी थी। तो मैं भी उनका कुछ सन्देश लाया था; आप भी कुछ सन्देश दें तो उनको मैं दूँ।”

गोपियाँ चुप रहीं। राधिकाजी भी चुप रहीं। [उद्धवजी] फिर बोले, फिर बोले। तब राधिकाजी ने कहा— “उद्धव! तुम अढ़ाई अक्षर का प्रेम नहीं जानते। अभी इतने दिन व्रज में रहने पर भी अभी तक नहीं समझ पाये कि प्रेम कैसा होता है? हम तो बड़ी कठोर हृदय की हैं; किन्तु कृष्ण का हृदय तो मक्खन से भी अधिक कोमल है। यदि उन्होंने सुना कि गोपियाँ उनके विरह में मर रही हैं, तो वे एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकेंगे। इसलिये सावधान! उनसे यह मत कहना कि गोपियाँ आपके विरह में तड़प रही हैं और आपको शीघ्र चलना है।

वे जहाँ हैं, वहीं सुखी रहें। कुब्जा से प्रेम करें, या किसी से, बस सुखी रहें—हम तो यही चाहती हैं। यहाँ आने से फिर उनकी [मथुरावासियों की] चिन्ता करेंगे, दु:खी हो जायेंगे। उनका वह उदास मुख हमसे देखा नहीं जायेगा इसलिये; इसलिये उन्हें वहीं रहने दो। यदि वे अपनी प्रसन्नता से आना चाहें, तो भले ही आ जायें—[किन्तु] यह सब बातें उनसे मत कहना। एक बात करना—तुम मानोगे नहीं, हम जानती हैं कि तुम कहोगे ही; पर यदि कहो भी, तो सब बातें एक साथ मत कहना। जैसे कोई कपड़ा पुराना हो जाता है, भीग जाता है तो कमजोर हो जाता है, तो उसे बहुत बल से मत निचोड़ो, नहीं तो वह फट जायेगा। [उसी प्रकार] कृष्ण से ऐसी बातों को एक ही दिन में मत कहना, हमारे विरह की बातें धीरे-धीरे कहना।

पहले दिन कहना कि वे सुनकर बड़ी प्रसन्न हुईं। जब मैं गया, तो वे बड़ी प्रसन्न थीं। वे कहती हैं कि यदि कृष्ण वहाँ रह सकते हैं और हमें भूला सकते हैं, तो हम भी उन्हें क्यों नहीं भूला सकतीं? उनसे कहना कि गोपियाँ बड़े शृङ्गार में बनी रहती हैं, सब समय हँसती रहती हैं। उन्हें स्मरण नहीं करतीं—यह कहना। यह सुनकर वे प्रसन्न रहेंगे। और फिर धीरे-धीरे, जैसे कपड़े को धीरे-धीरे निचोड़ते हैं—एक बार में निरस नहीं करते, नहीं तो वह फट जायेगा—[वैसे ही धीरे-धीरे हमारे विरह की बातें कहना;] नहीं तो उनका कोमल हृदय फट जायेगा।” धीरे-धीरे [कहना।] उद्धव ने ऐसा ही किया।

जाते समय नन्दबाबा ने कहा— “अहो! ऐसे श्रीकृष्ण में हमारी मति लग जाये।” ऐसा क्यों कहा? विरह-वेदना में तप्त होकर कहा। क्यों? जैसे दूध गरम करते हैं, एक कड़ाहा दूध है और उसमें एक तिनका पड़ गया, तो जब वह बहुत गरम हो जाता है, तो वह नीचे [चला जाता है।] कभी-कभी वह दिखता है और फिर नीचे चला जाता है। ऐसे ही प्रेम में, विरह में कभी-कभी ऐसी बातें आ जाती हैं।

क्योंकि उद्धवजी बार-बार कह रहे हैं—“वे भगवान् हैं, भगवान् हैं।” इसलिये नन्दबाबा ने भी कह दिया— “अच्छा, यदि कृष्ण भगवान् हैं, तो ऐसे कृष्ण में ही हमारी रति और मति सब समय बनी रहे।” यह उन्होंने बड़े दुःख और ग्लानि के साथ कहा।

उद्धवजी आये और सोच रहे हैं— “अजी देखो, व्रजवासियों का कृष्ण के प्रति कितना प्रेम है! किन्तु ये सब बड़े दुःखी हैं। कृष्ण के लिए विह्वल हो रहे हैं, रो-रोकर मर रहे हैं। यदि हम भी यहाँ [अधिक] रहे और कृष्ण से ऐसा विरह हमें भी हो गया, तो हम तो मरेंगे। इसलिये यहाँ से शीघ्र वहीं चलना है; नहीं तो यदि कृष्ण ने हमें भी ऐसे ही त्याग दिया, तो हमारी क्या दशा होगी?” इस डर के मारे उन गोपियों को छोड़कर [चले गये।] क्यों?

[उद्धवजी] मथुरा से है न— मथुरा के प्रतीक हैं, वृन्दावन के प्रतीक नहीं। इतना [विरह] होने पर भी गोपियाँ [वृन्‍दावन छोड़कर मथुरा] नहीं गयीं। किन्तु उद्धवजी लौटकर [मथुरा गये] और कृष्ण से वार्तालाप में उन्होंने सब प्रकार से कहा— “आप शीघ्र [व्रज] पधारें, नहीं तो वे मरनेवाली हैं।”

इस प्रकार श्रीमद्भागवत का यह संवाद दिव्योन्माद का एक जीता-जागता हुआ प्रकाश-स्तम्भ है। इसको ले करके… जिस साधक के हृदय में कृष्ण के प्रति थोड़ी-सी भी ऐसी विरह की भावना नहीं कि कृष्ण नहीं मिले, तो वह साधक अभी साधक नहीं है। सच्चा साधक तो वही है जिसे कृष्ण के विरह, गोपियों की जैसी विरह की अनुभूति हो। इसीका नाम भजन है। अब आप लोग आगे की कथा सुनें। अभी बहुत-सी [कथाएँ] रह गयी हैं। आज कुछ रह जायेगा, तो फिर कल उसे कह करके द्वादश- [स्कन्ध] तक हम लोगों को पहुँचना है।

गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
प्रियसख पुनरागाः प्रेयसा प्रेषितः किं
वरय किमनुरुन्धे माननीयोऽसि मेऽङ्ग।
नयसि कथमिहास्मान् दुस्त्यजद्वन्द्वपार्श्वं
सततमुरसि सौम्य श्रीर्वधूः साकमास्ते ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.20)

भ्रमर कुछ देर के लिए उड़कर कहीं चला गया और पुनः किशोरीजी के चरणों के समीप मँडराने लगा। उसे देखकर किशोरीजी प्रतिजल्प करने लगीं— “हे प्रिय कृष्णबन्धो! जान पड़ता है कि तुम एक बार मथुरा जाकर पुन: लौट आये हो। अवश्य ही हमारे प्रियतम ने हमें मनाने के लिए तुम्हें फिर से भेजा होगा। प्रिय भ्रमर! तुम सब प्रकार से हमारे लिए माननीय हो। तुम अपनी प्रार्थनीय वस्तु को हमसे पुन: माँग सकते हो। बतलाओ, तुम्हारा क्या अभीष्ट है? हमें मधुपुरी ले जाना चाहते हो? तो हे भद्र भ्रमर! देखो! हम वहाँ जाकर करेंगी क्या? लक्ष्मीदेवी जिनकी सहचरी होकर सर्वदा जिनके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं, ऐसे दुष्परिहार्य युग्म-भावको प्राप्त पुरुष के समीप हमें किसलिये ले जाना चाहते हो? वहाँ हमारा निर्वाह कैसे होगा? मत कहो कि वे वहाँ अकेले अवस्थान कर रहे हैं। (GVP)

#2
अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते
स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्।
क्वचिदपि स कथा नः किङ्करीणां गृणीते
भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्‍न्‍यधास्यत् कदा नु ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.21)

(श्रीवृषभानुनन्दिनी मन-ही-मन कहने लगीं— हाय! हाय! मैंने उन्मत्त होकर न जाने क्या-क्या प्रलाप किया, किन्तु मुझे इस दूत से जो पूछना था, वह तो पूछा ही नहीं। इस प्रकार खेद करती हुईं आदर के साथ सुजल्प करने लगीं—) हे सौम्य! हे प्रियतम के प्यारे दूत मधुकर! यह तो बतलाओ, प्रेमसागर-सर्वगुण-मुकुटमणि आर्यपुत्र श्रीकृष्ण गुरुकुल से लौटकर आजकल क्या मधुपुरी में ही रह रहे हैं? कहीं और जाने की इच्छा तो नहीं कर रहे हैं? (यदुवंशियों ने छलपूर्वक उन्हें बुला लिया और अब यहाँ उन्हें व्रज में आने नहीं दे रहे हैं—यह विचार करके कहने लगीं—) वे कभी नन्दालय अथवा गोप-सखाओं का स्मरण करते हैं क्या? प्रिय भ्रमर! कभी हम दासियों के विषय में भी वे बातें करते हैं क्या? प्यारे भौंरे! हमें यह भी बतलाओ कि वे फिर कभी अगरु के समान सुगन्धित अपनी भुजाओं को हमारे मस्तक पर रखेंगे क्या? (यह कहकर किशोरीजु मूर्च्छित हो गयीं) उद्धव प्रेम-ठगे से होकर व्रज में कई मास रह आये। (GVP)

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