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Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.1-13: Narada Muni's Ecstasy in Dvaraka & Meeting with Uddhava

54:11
#240
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Explanation of Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.1-13
  • Narada Muni inquires about the topmost loving devotee of Krsna.
  • Narada Rsi travelled from Prayaga, to South India and then visited Indra, Brahma, Siva, Prahlada, Hanumana, Pandavas and then Uddhava.
  • Curse to Narada Muni by Daksa Prajapati that he cannot stay at one place for long.
  • Narada Rsi symptoms of transcendental love.
  • Narada Rsi's visit to Krsna's palace in Dvaraka
  • How Kamsa was born from Padmavati and the demon Drumila.
  • Sri Pariksit Maharaja describes Narada Rsi’s transcendental ecstasies.
  • Sri Narada meets Uddhava
  • Narada's humility.
  • Endeavor to advance in bhakti, at least try to reach at the level of nistha (steadiness).

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.6.1–13 : द्वारका में नारद मुनि का प्रेम-विह्वल परमानन्द तथा उद्धव से उनकी भेंट

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 14 अगस्त, 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नारदजी चालाकी के साथ यह दिखलाने के लिए कि कृष्ण के सबसे बड़े कृपापात्र कौन हैं, [सर्वप्रथम] प्रयाग [पहुँचे।] वहाँ के जमींदार नरेश थे, जो ठाकुरजी की बालगोपाल मूर्ति लेकर पूजा कर रहे थे। [नारदजी ने उनसे] कहा— “आपसे बढ़ करके [भगवान् का कृपापात्र और] कोई नहीं है।” उन्होंने कहा कि “मैं नहीं हूँ। [यदि आप भगवान् के कृपापात्र को देखना चाहते हैं तो दक्षिणदेश के भक्त राजा के दर्शन करें।”]

तो फिर [नारदजी] दक्षिण भारत में उस बड़े राजा के पास में गये। राजा ने कहा— “मैं नहीं, मुझसे बड़े [कृपापात्र] इन्द्र हैं।” फिर इन्द्र ने कहा कि ब्रह्माजी [उनसे अधिक कृपापात्र हैं।] इस प्रकार वे [क्रमशः शंकरजी, प्रह्लाद महाराज, हनुमान और] पाण्डवों के पास में गये और फिर वहाँ पर [द्वारकापुरी के यादवों के सम्‍बन्‍ध में सुना। यादवों से] उद्धव के सम्बन्ध में सुना कि “उद्धवजी भगवान् के अत्यन्त प्रिय हैं, उनसे बढ़करके और कोई प्रिय नहीं है।” यह सुनकर फिर वे द्वारकापुरी के [अन्तःपुर में] पहुँचे—वीणा लेकर गायन करते हुए “उद्धव! उद्धव!” कहते हुए वहाँ पर पहुँचे। महाराज परीक्षित् कह रहे हैं—

I cannot speak in two, three, or four languages. I have spoken so much in English in Western countries, so one of you can translate; otherwise I will become more tired. But here all are Western devotees, knowing English—All top to bottom. Those who are Hindi-speaking have no interest to hear at all.

So Nārada Ṛṣi [wanted] to declare in the whole world that who is the superior most dear to Kṛṣṇa. That is why he began his journey from Prayāga, and then to South India, to Indra, Brahmā, Prahlāda, Hanumāna, and then Pāṇḍavas. Then he came to [Dvārakā.]

[The Yādavas of Dvārakā] said, “Oh! We are not so much fortunate. [You should go] to Uddhava,” and they glorified him.

[मैं दो, तीन या चार भाषाओं में नहीं बोल सकता। पश्चिमी देशों में मैंने बहुत अंग्रेज़ी भाषा में बोल लिया है, इसलिये अब आपमें से कोई एक अनुवाद कर दे, नहीं तो मैं और अधिक थक जाऊँगा। किन्‍तु यहाँ तो ऊपर से नीचे तक सभी पाश्चात्य देशों के भक्त हैं, सब अंग्रेज़ी जाननेवाले हैं। जो हिन्दी बोलनेवाले हैं, उन्हें सुनने में कोई रुचि ही नहीं है।

वस्तुतः नारद ऋषि सम्पूर्ण जगत् में यह घोषणा करना चाहते थे कि कृष्ण के सबसे श्रेष्ठ, सबसे प्रिय भक्त कौन हैं। इसी कारण उन्होंने अपनी यात्रा प्रयाग से आरम्भ की, फिर दक्षिण भारत, फिर इन्द्र, ब्रह्मा, प्रह्लाद, हनुमान और फिर पाण्डवों के पास गये। उसके बाद वे द्वारका पहुँचे।

द्वारका के यादवों ने कहा—“अरे! हम इतने भाग्यशाली नहीं हैं। आपको उद्धव के पास जाना चाहिये।” और उन्होंने उद्धव की बहुत महिमा गान की।]

तच्छ्रुत्वार्ये महाप्रेमरसावेशेन यन्त्रितः।
महाविष्णुप्रियो वीणाहस्तोऽसौ विस्मृताखिलः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.1)

[महाराज श्रीपरीक्षित् ने कहा—हे माता! श्रीउद्धव के माहात्म्य को श्रवणकर भगवान् के प्रिय श्रीनारद महाप्रेमरस में निमग्‍न हो गये। अतएव समस्त विषयों को भूल जाने के कारण हाथ में वीणा होने पर भी उसको बजाने का सामर्थ्य उनमें नहीं रहा।] GVP

परीक्षित् महाराजजी ने कहा— “माताजी! उद्धव का माहात्म्य सुन करके [भगवान् के प्रिय श्रीनारद महाप्रेमरस में निमग्न हो गये।”]

किसके मुख से [श्रवण किया?] युधिष्ठिर महाराज, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कुन्‍ती और द्रौपदी—सबने कहा, “हमारे जैसा दुर्भागा कोई नहीं। हम लोग सबसे दुर्भागे हैं। [यादवगण ही भगवान् के कृपापात्र हैं।” तब नारदजी यादवों के पास गये और उनके मुख से उद्धवजी का माहात्म्य श्रवण किया।] तो उद्धवजी भगवान् के बड़े कृपापात्र हैं, उस सबका वर्णन पञ्‍चम अध्याय में किया गया है।

तो परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं— “माताजी! उद्धवजी का माहात्म्य सुन करके भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े प्रिय नारदजी प्रेमरस के आवेश में मग्न हो गये और देह-दैहिक सब कुछ भूल गये—वीणा बजाना भी भूल गये; वीणा हाथ में रह गयी और वे द्वारकापुरी [के अन्‍तःपुर] में पहुँच गये।

सदा द्वारवतीवासाभ्यस्तान्तः पुरवर्त्मना।
प्रभुप्रासाददेशान्तः प्रवेशाश्‍चर्यवाहिना ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.2)

[श्रीनारद सदैव द्वारका में निवास करते थे। अतः अन्तःपुर का मार्ग गुप्त, अद्भुत, चित्र-विचित्र होने पर भी पूर्व-अभ्यासवशतः वे भगवान् के महल में उपस्थित हुए।] GVP

बात तो ठीक है कि नारदजी प्रेम में सब कुछ भूल गये—वीणा भी नहीं बजा सके और उद्धव की जय-जयकार बोलते हुए चलने लगे, [किन्‍तु पूर्व अभ्यासवशतः उन्‍होंने भगवान् के महल के आन्‍तरिक भाग में प्रवेश किया।]

द्वारकापुरी कैसी है? समुद्र के बीच में, बड़ी-बड़ी वीथियाँ हैं– रास्ता (मार्ग), बड़े-बड़े उद्यान हैं, और सोलह हज़ार रानियों के लिए सोलह हज़ार राजमहल बने हैं। एक-एक महल ऐसे सुन्दर हैं कि साधारण व्यक्ति उसमें जा नहीं सकता, भूल जायेगा। विशेषकर जहाँ रुक्मिणीजी का घर है, जहाँ पर कि कृष्ण रहते हैं, वहाँ पर जाना बहुत कठिन है। और नारदजी प्रेमरस में पागल हो गये, तो भी वे [वहाँ पर पहुँच गये, क्योंकि वे] प्रायः [वहाँ पर] जाते-आते रहते थे। ‘कृष्ण दर्शन लालसा’ [के कारण] वे द्वारकापुरी में और रुक्मिणी के भवन में कृष्ण से मिलने के लिए जाते-आते रहते थे। यद्यपि उनको दक्ष प्रजापति का यह अभिशाप है कि वे एक जगह गौ-दुग्धकाल से अधिक नहीं रह सकते, किन्तु वहाँ कैसे रह गये? कैसे जाते थे? ‘कृष्ण दर्शन लालसा’ [के कारण वे उस] शाप से मुक्त थे।

[9:28- 11:20 तक श्रील गुरुदेव भक्तों को अनुवाद करने के लिए कहते हैं एवं किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: दक्ष प्रजापति के बहुत-से लड़के हुए और उन सब लड़कों (बालकों) को उन्होंने नारदजी के यहाँ पढ़ने के लिए भेजा [और कहा] कि “इनको साम, दाम, दण्ड, भेद इत्यादि पढ़ाइये और पुत्रोत्पत्ति, सन्तति-उत्पन्न करने की भी शिक्षा दीजिये, जिससे हमारी वंश-परम्परा चले।” किन्तु नारदजी ने उनको असली शिक्षा पढ़ायी, जिससे उनके हृदय में भक्ति [उत्पन्न] हुई और उन्होंने संसार को असार समझा। [नारदजी ने] सब लड़कों को ऐसी भक्ति की शिक्षा दी कि वे सब घर-बार छोड़ करके भजन करने के लिए चले गये।

दक्ष प्रजापति आये और बोले— “हमारे लड़के कहाँ गये?”

[नारदजी ने कहा—] “वे तो यहाँ से पढ़-लिख करके चले गये।”

[दक्ष प्रजापति ने पूछा—] “कहाँ गये?”

[नारदजी ने कहा—] “यह तो नहीं जानते। वृन्दावन में चले गये या कहाँ चले गये?”

दक्ष प्रजापति बहुत बिगड़े और कहा— “हम [फिर से] अपने [अन्य] बच्चों को [तुम्हारे पास] भेजेंगे क्योंकि तुम्हारे अतिरिक्त और कोई पढ़ानेवाला नहीं है; किन्‍तु इस बार उनको ऐसी शिक्षा मत देना कि वे घर-बार छोड़ करके चले जायें।”

[नारदजी ने कहा—] “ठीक है।”

[दक्ष प्रजापति ने अपने पुत्रों को] फिर [नारदजी के पास] भेजा, तो उन्होंने इसबार भी ऐसा पढ़ाया कि फिर वे लोग भक्तिमार्ग में चले गये और घर में कोई भी नहीं लौटा। तो दक्ष प्रजापति बहुत बिगड़ा और क्रोध से शाप दिया— “तुम संसार में कहीं भी दो क्षण तक नहीं टिक सकोगे; केवल गो-दोहन काल तक ही एक स्थान पर रह सकोगे। [इससे तुम] किसीको अधिक शिक्षा नहीं दे पाओगे कि जिससे वह घर छोड़ करके चला जाये।”

नारदजी बड़े प्रसन्न हुए और बोले, “आज से मैं इससे मुक्त हो गया। अब मैं सर्वत्र जाऊँगा और भगवान् की शिक्षा तथा भक्ति [का प्रचार करूँगा।”] तो इस प्रकार वे करने लगे; किन्तु जब भी उनकी इच्छा होती कि “कृष्ण का दर्शन करूँ,” तो वे द्वारकापुरी में चले जाते। द्वारकापुरी में अभिशाप नहीं जाता [अर्थात् अभिशाप प्रभाव नहीं करता,] क्योंकि वह कृष्ण की भुजाओं से रक्षित है।

(बाङ्गला भाषा में… ) एक श्लोक है। याद है?

गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः॥
-श्रीमद्भागवतम् (11.2.1)

[श्रीशुकदेव गोस्वामीजी ने कहा—हे कुरुश्रेष्ठ! देवर्षि नारदजी को मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्ण के समीप रहने की बड़ी लालसा थी, इसलिये वे श्रीकृष्ण की भुजाओं से सुरक्षित द्वारका में—जहाँ दक्ष आदि के शाप का कोई प्रभाव नहीं हो सकता था—विदा करनेपर भी पुनः-पुन: आ जाते थे तथा श्रीकृष्ण के समीप वहीं द्वारका में निरन्तर वास करते थे।] GVP

तो जगत् में कोई भी अभिशाप हो, [किन्‍तु] द्वारका जड़-जगत् में नही है—वह अप्राकृत जगत् है। इसलिये दक्ष का शाप वहाँ पर लागू नहीं होता। इसलिये वे स्थिर रह करके, जब तक इच्छा होती, कृष्ण का दर्शन करते और उनकी लीलाओं का भी दर्शन करते। शाप वहाँ नहीं जाता। इसलिये नारदजी वहाँ पर पहुँचे। उनका पहले से अभ्यास था क्योंकि वे बीच-बीच में जाते रहते थे; इसलिये प्रेम में उन्मत्त होने पर भी, उनके पैर अपने आप चल पड़े और वे रुक्मिणी के भवन में पहुँच गये—जहाँ पहुँचना दूसरों के लिए बहुत भारी कठिन था।

[14:45-16:36 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नारदजी…

भूमौ क्वापि स्खलति पतति क्वापि तिष्ठत्यचेष्टः
क्वाप्युत्कम्पं भजति लुठति क्वापि रोदित्यथार्त्तः।
क्वाप्याक्रोशन्प्लुतिभिरयते गायते क्वापि नृत्यन्
सर्वं क्वापि श्रयति युगपत् प्रेमसम्पद्विकारम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.4)

[वे कभी तो लड़खड़ा जाते, कभी भूमिपर गिर पड़ते, कभी चेष्टारहित होकर खड़े रहते, कभी भूमिपर लोटपोट खाते, कभी आर्त्तस्वर से रोने लगते, कभी चीत्कार करते, कभी छलांग लगाकर दौड़ते, कभी-कभी गान और नृत्य करने लगते और कभी-कभी कम्प, स्वेद, पुलक, रोदनादि समस्त प्रेम-विकार एक साथ ही उनके शरीरमें उदित होते थे।] GVP

नारदजी प्रेम में विवश होकर और उद्धव की सेवाओं का चिन्तन करते-करते कभी ज़मीन पर गिर पड़ते हैं, कभी लोटते-पलोटते हैं, कभी चेष्टारहित होकर एकदम चुपचाप स्थिर हो जाते हैं। [इसका] क्या तात्पर्य है? ये प्रेमाभक्ति के लक्षण हैं। कृष्ण की लीलाओं का तथा उद्धव के साथ उनके सम्बन्धों का चिन्तन करते-करते अष्टसात्त्विक भाव उनमें आ गये। इसलिये प्रेम में विवश होकर वे कभी गिर पड़ते हैं, कभी ज़मीन पर लोटते हैं—कभी कुछ, कभी कुछ। इस तरह से वे कभी लोटते-पलोटते हैं, कभी ज़ोर से रोने लगते हैं, चिल्लाने लगते हैं और कभी बहुत ज़ोर से रोते हैं प्लुत-स्वर से। [प्लुत-स्वर ऐसा कम्पगति युक्त स्वर होता है, जिसका उच्चारण दीर्घस्वर से भी अधिक, लगभग तिगुना समय लेता है] कभी कीर्तन करने लगते हैं, कभी नाचने लगते हैं, और कभी युगपत् समस्त प्रेम-विकार एक साथ उनमें उत्पन्न हो जाते हैं।

[Do] one Kīrtana.

[18:45- 20:46 तक कीर्तन]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यह बात तो ठीक है कि नारद ऋषि अष्टसात्त्विक भावों से अभिभूत हो गये—कभी लोट रहे हैं, पलोट रहे हैं, कभी रो रहे हैं, कभी गीत गा रहे हैं, कभी चुपचाप जड़ हो जाते हैं, स्तम्भ, पुलक, रोमाञ्च, कम्प, अश्रु इत्यादि हो रहे हैं—किन्तु रास्ता नहीं भूले। कृष्ण कहाँ रहते हैं? रुक्मिणी के घर में, तो वह रास्ता नहीं भूले।

तात्पर्य क्या है? सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि भगवद्भक्त लोग प्रेम में उन्मत्त होने पर भी भक्ति के मार्ग से विचलित नहीं होते, वे भक्ति के मार्ग पर अवस्थित रहते हैं। वे भक्ति से च्युत नहीं होते। अष्टसात्त्विक विकार होगा, किन्तु भक्ति के विरुद्ध कोई आचरण करेंगे, [भगवन्-मार्ग] भूल जायेंगे—यह नहीं होगा। इसलिये वे कहते हैं कि तत्त्वतः विचार करने पर भी यह समझ में आता है कि प्रेम में वशीभूत होने पर भी उन्‍हें भगवन्-मार्ग विस्मृत नहीं होता, वे भगवन्-मार्ग से विचलित नहीं होते।

उसी तरह… तात्पर्य क्या है? भक्ति से विचलित नहीं होते, परन्तु उस समय लौकिक-रीति या अज्ञ लोगों की दृष्टि से [नारदजी देखने में ऐसे लगते थे] जैसे भूत द्वारा आविष्ट हों। जैसे भूत किसीको पकड़ ले, वैसे दिखेंगे, किन्तु कभी भी भक्ति से च्युत नहीं होंगे। अज्ञ लोग [उन्‍हें] उन्मादग्रस्त देखेंगे, किन्तु वह उन्माद नहीं—वे प्रेम के विकार हैं, सात्त्विक-विकार हैं। सत्त्व से उत्पन्न होता है इसलिये सात्त्विक। सत्त्व क्या है? – शुद्धसत्त्व।

दूसरे लोग देखेंगे कि भूत [के द्वारा] आविष्ट हो गये, कुछ ऐसा हो गया, वैसा [हो गया।] किन्‍तु ऐसा नहीं, वे ठीक रहते हैं। एक विषय को समझो। जैसे कृष्णप्रेम में गोपियाँ या कोई भी भक्त मूर्च्छित हो गया। अब मूर्च्छित हो गया, इसका क्या अर्थ है? बाहर और भीतर सब भूल गया न? नहीं। मुनि लोगों का ऐसा हो जाता है, मुनि लोग समाधि में बाहर और भीतर सब कुछ भूल जाते हैं, किन्तु सन्त लोग, जो भगवान् के भक्त हैं या गोप या गोपियाँ भाव में मूर्च्छित हो जायेंगे तो उस समय कृष्ण की जितनी भी लीलाएँ हैं, वे उनका दर्शन करेंगे कि यह-यह [लीला] हो रही है।

उस मूर्च्छा में भी परमानन्द है, इसलिये आनन्द के मारे मूर्च्छित हो जाते हैं और संसार का सब कुछ विस्मृत हो जाता है। सांसारिक लोग समझते हैं कि जैसे हम मूर्च्छित हो जाते हैं, वैसे [ही इनको भी] कुछ ज्ञान नहीं [रहता।] जैसे किसीका ऑपरेशन करते समय उसे क्लोरोफॉर्म या क्या सुंघा देते हैं, उससे उसकी बाहर-भीतर की सब स्मृति नष्ट हो जाती है, [किन्‍तु] कृष्णभक्ति में ऐसा नहीं। ऊपर से ऐसा दिखता है, किन्‍तु भीतर से क्या [होता है?] उस समय [भीतर से] कृष्ण की लीलाओं का चिन्तन [होता है] और उनको अनुभव होता है कि वे स्पष्टरूप में कृष्ण की लीलाओं का दर्शन कर रहे हैं। ऐसे उनको लोग समझे। बाहर के लोग समझेंगे कि [जैसे किसी] भूत ने इनको पकड़ लिया है और [उनके स्तर के] भक्त लोग यदि देखेंगे न! [तो वे उनकी वास्तविक स्थिति को समझ जायेंगे।] अब इसको उद्धवजी और-और [अन्य उनके जैसे ही भक्त] लोग समझेंगे, और कोई नहीं समझेगा। महापुरुषों के भावों को कनिष्ठ नहीं समझ सकते।

ये आप [अंग्रेजी भाषा में] समझाओ।

[24:54-26:38 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:

हे मन्मातरिदानीं त्वं सावधानतरा भव।
स्थिरतां प्रापयन्ती मां सधैर्यं शृण्विदं स्वयम्॥
-बृहद्भागवतामृतम् (1.6.5)

[हे माता! अब आप पहले से भी अधिक सावधान हो जायें। यदि आप मुझे अस्थिर देखें तो मुझे भी स्थिर करायें तथा स्वयं धैर्यपूर्वक मेरे द्वारा कहे जानेवाले इस विषय को श्रवण करें।] GVP

[महाराज परीक्षित् ने कहा—] “हे मेरी मैया! अब सावधानी से सुनो। अब तक जो सुना, अब उससे भी अधिक सावधानी से सुनो। यदि मैं कहीं मोहित हो जाऊँ, तो मुझे भी धैर्य बँधाना और तुम भी धैर्य से सुनो।”

यहाँ से अब गोपियों, गोपों और ब्रजवासियों के प्रेम का वर्णन होगा—इसका यह तात्पर्य है।

[महाराज परीक्षित् ने कहा—] “इसलिये अब धैर्य धारण करो। यदि मैं धैर्यच्युत हो जाऊँ या बोलते-बोलते भाव में आविष्ट होकर मूर्च्छित हो जाऊँ, तो मुझे धैर्य बँधाना; और धैर्य होने के बाद में फिर से [सुनना।] हे माता! उस दिन जब नारदजी वहाँ पर भूताविष्ट हो करके पहुँचे, और रुक्मिणी के घर पर जब गये, तो देखा कि रुक्मिणी के घर के दरवाजे (द्वारदेश) [के पास] श्रीमान् उद्धवजी कुछ उदास मुख से बैठे हुए थे।”

समझे (Understand)? उद्धवजी कहाँ बैठे थे? रुक्मिणी के घर [के भीतर] नहीं बैठे थे। रुक्मिणी के पलंग पर कृष्ण थे, और उनको छोड़ करके चौखट के पास—दरवाजे के पास में बैठे हुए थे। अन्‍तःप्रकोष्ट में, भीतर कृष्ण सो रहे हैं। दिन उठ आया है, काफी दिन चढ़ गया और कृष्ण सो रहे हैं। ऐसा जान करके उद्धवजी बड़े दुःखी हो करके बैठे हैं और पास ही में श्रीबलदेवजी, देवकी मैया, रोहिणी मैया, रुक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवती इत्यादि सब महिषियाँ बड़े उदास मन से बैठे हुए हैं कि आज कृष्ण को उठने में इतनी देरी [क्यों] हो गयी? ऐसा क्यों हुआ?

और भगवत्-प्रवृत्ति-हारिणी कंस की माँ–पद्मा… पद्मा कौनसी? भगवत्-प्रवृत्ति-हारिणी—भगवान् की भक्ति की प्रवृत्ति को भी नष्ट करनेवाली– कंस की माता पद्मावती और दूसरी-दूसरी दासियाँ सभी चुपचाप, उदास मन से बैठी हैं। वे सब भी बहुत उदास मन से हैं।

इसलिये [महाराज परीक्षित् ने] अपनी मैया से कहा— “अब देखो, यह विरह आयेगा। बहुत सावधानी से सुनना। देखो, उस दिन श्रीमान् उद्धवजी [उदास] बैठे हैं। क्यों बैठे हैं? आज इतनी देर हो गयी, सूरज कहाँ ऊपर चला गया, दिन हो गया, नौ-दस बज गये और कृष्ण [अब तक] क्यों सोये हुए हैं? इसलिये ज्ञात होता है कि उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”

अभी उस चीज को विस्तार से नहीं बतला रहे हैं। अभी इस समय बोलना उचित नहीं, क्योंकि नारदजी, उद्धवजी सभी लोग विरह में और प्रमत्त हो जायेंगे। इसलिये बोलना उचित नहीं समझा। वे हम और आप जैसे नहीं हैं कि उनकी विरह की बात को सुन करके हँस दें, उनको [उस विरह की] अनुभूति होती है। इसलिये अभी भी उस चीज को खोल करके कह देना [उचित नहीं समझा।] अथवा मोह की आशंका से [नहीं कहा।] ‘केनापि’ – किसी कारण से सोये हुए हैं, कारण नहीं बतलाया। किन्‍तु क्या कारण है, वह बाद में बतलायेंगे।

तो क्यों ऐसा हो गया कि आज कृष्ण अभी तक सो रहे हैं? ऐसा बोल करके उद्धवजी भीतर—अन्‍तःपुर से निकलकर बाहर में बैठे। रुक्मिणी के राजमहल से निकल करके वे बाहर बैठ गये और बलदेव प्रभृति—अर्थात् बलदेव प्रभु, देवकीजी, रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, रोहिणी मैया इत्यादि—सब उनके द्वारदेश पर ही बैठे हैं। भीतर कोई नहीं है। कृष्ण भीतर अकेले पलंग पर सो रहे है।

‘सा’ प्रसिद्धा पद्मावती—कौनसी पद्मावती है? ‘प्रसिद्धा’ कहने का उद्देश्य यह है कि उनके पति उग्रसेन थे, किन्‍तु कंस उग्रसेन का पुत्र नहीं था। वह द्रुमिलदैत्य का पुत्र था। कंस की माता बड़ी सु‍न्दरी थी। उग्रसेन की पत्नी बचपन [से ही] बड़ी सु‍न्दरी थी, तो [एक बार जब] वह अपने पीहर में आयी, द्रुमिलदैत्य ने उन्हें देखा और उनका चरित्र भ्रष्ट किया। उसीसे कंस राक्षस हो करके ज‍न्मा। इसलिये कंस उग्रसेन का पुत्र नहीं था। इसलिये उसने अपने पिताजी [उग्रसेन] को कैद किया और भगवान् का विरोध किया, पाण्डवों का विरोध किया, सब लोगों का विरोध किया। इसलिये [परीक्षित् महाराजजी] कह रहे हैं कि वह प्रसिद्धा है। इसलिये वह प्रसिद्धा—कंस की मैया भी वहाँ पर थी, और वह उदास थी। क्यों? इसका कारण बाद में बतलायेंगे।

वह भगवान् की लीलाओं को [केवल] बाहरी रूप से समझ करके, कुछ अपने भाव से उसको बतलाती थी। [पद्मावती का मानना है कि] गोपियाँ चाहती हैं कि कृष्ण गैयाँ चराने के लिए [जायें]—प्रिय होने के नाते नहीं, पुत्र होने के नाते नहीं।” [किन्‍तु वास्तव में] गोपियाँ क्या करती हैं, यह रोहिणी मैया जानती हैं। वह [ब्रजवासियों के] भीतर के भाव को जाननेवाली हैं और पद्मावती बाहर के भाव को जाननेवाली।

साधारण व्यक्ति भक्ति के भावों को नहीं समझता। वह दूसरों को भी अपने जैसा ही समझता है। एक कनिष्ठ अधिकारी या साधारण व्यक्ति उत्तम-अधिकारवाले भक्तों की बातों को क्या समझेगा? शुकदेव गोस्वामीजी जब परीक्षित् महाराजजी की सभा में आ रहे थे, तो [रास्ते में] लड़के उनके ऊपर धूल-कंकड़ फेंक रहे थे, स्त्रियाँ हँस रही थीं कि यह पागल आ गया–नग्न। किन्तु जब वे परीक्षित् महाराजजी की सभा में [पहुँचे, तो] नारद इत्यादि सब [महापुरुष] खड़े हो गये। उन लोगों ने क्या देखा? कोई महाभागवत आ गये। इसलिये देवता लोगों की भी शक्ति नहीं है कि वे वैष्णवों को पहचान सकें; तो और लोगों की तो बात क्या! इसलिये ऐसा मत समझो कि “हम वैष्णवों को ठीक पहचान गये”, या “गुरु को पहचान गये”—ऐसा मत समझो।

[35:40-39:08 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नारदजी जिस प्रकार से अष्टसात्त्विक भावों में विभोर हैं और वहाँपर रुक्मिणी, सत्यभामाजी इत्यादि [उपस्थित] हैं, [तो क्या] वे ऐसी हैं कि नहीं हैं? जिस अवस्था में पहुँच करके नारदजी ज‌मीन पर लोट-पोट रहे हैं, आँखों से आँसुओं की धारा बह रही है, कभी रोते हैं, कभी नृत्य करते हैं, कभी पृथ्वी पर लोटने लग जाते हैं—यह भक्ति की कौनसी स्थिति है? कौनसी स्थिति? नारदजी कौनसी स्थिति में [पहुँच गये] हैं? नारदजी प्रेम की स्थिति में पहुँच गये हैं और यहाँपर प्रेम से भी अधिक स्नेह, प्रणय इत्यादि कुछ लक्षित हो रहे हैं। इसलिये [नारदजी की यह] साधारण स्थिति नहीं है, कि‍न्तु वे अपने से उद्धव को श्रेष्ठ मान रहे हैं। है न? अपने से उद्धव [और अन्य] सबको श्रेष्ठ मान रहे हैं, और अपने को दीन-हीन मान रहे हैं—यही भक्ति का लक्षण है। इसलिये ‘अ‍न्याभिलाषिताशू‍न्यं’[#1] जो श्लोक है, उसमें [आया कि ‘आनुकूल्येन] कृष्णानुशीलनं’ उत्तम-भक्ति है। नारदजी उस स्थिति से कुछ और आगे अग्रसर हो [गये हैं।] यह साधारण नहीं है।

तूष्णींभूताश्च ते सर्वे वर्त्तमाना: सविस्मयम्‌।
तत्र श्रीनारदं प्राप्तमैक्ष‍न्तापूर्वचेष्टितम्‌॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.9)

[वे सभी वहाँ विस्मित होकर मौनावस्था में बैठे थे। उसी समय उन्होंने श्रीनारद को अपूर्व प्रेम-चेष्टाएँ प्रकाश करते हुए उस स्थान पर उपस्थित होते देखा।] GVP

उस समय [उन लोगों ने] नारदजी की अपूर्व चेष्टाओं को देखा कि कभी वे गिर रहे हैं, पड़ रहे हैं, कभी ‘हा-हुताश’ कर रहे हैं। यह देखकर सभी लोग विस्मित और आश्चर्यचकित हो गये। सब लोगों ने उनके पास आकर उन्हें घेर लिया, और उस समय वे लोग उठ करके नारदजी को स्थिर कराने लगे—“जरा स्थिर होइये, कृष्ण सो रहे हैं, उनकी निद्रा भंग न हो जाये”—यह भी एक कारण है।

[तदनन्तर उन्होंने] उठ करके उनके अश्रुओं का मार्जन किया, पानी ले करके उनके मुख को धोया। [इस प्रकार] नारदजी को स्थिर किया। वे कुछ सोचते हुए फिर बोले— “हे ब्रह्मन्‌! आप तो कृष्ण के बड़े कृपापात्र हैं,” वे नारदजी से कह रहे हैं, “आप भगवान् के कृपापात्र हैं। आज हमलोग आपकी ऐसी अपूर्व चेष्टाओं को क्यों [और] कैसे देख रहे हैं? इसका क्या कारण है? आपको यह भूत जैसा क्या हो गया? आप लोट-पोट हो रहे हैं, और कम्प, अश्रु, पुलक [इत्यादि] सब हो रहे हैं। यह क्यों हो रहा है? कारण क्या है? आज से पहले तो हमने कभी ऐसा नही देखा। थोड़ा-सा स्थिर तो होइये और बतलाइये, तो उसके लिए हमलोग कुछ उपचार करेंगे।”

परिक्षित् महाराज कह रहे हैं— “मैया! आगे सुनो! नारद की आँखे आँसुओं से भरी हुई हैं। क्यों? उद्धवजी की कृष्ण-सेवा का स्मरण करके।”

यदि कोई थोड़ी-सी भी अपने गुरु या भगवान् की सेवा करता है, तो शुद्ध-भक्त उसे देखकर भाव में विभोर हो जाता हैं। सेवक वह है, जो दूसरो को अपनी गुरु-सेवा में तनिक-सी भी सेवा दे करके यह समझता है कि इसने बहुत सेवा की, और हम तो कुछ भी नहीं कर सकते या [इसी प्रकार] कोई भगवान् का सेवक हो। जैसे पुलिन्‍द क‍न्याओं ने गोवर्धन में भगवान् की कौनसी सेवा की? हिरण ने क्या सेवा की? कुछ नहीं। किन्‍तु गोपियाँ उन्‍हें कैसे देख रही हैं? [गोपियाँ कहती हैं कि] ये [हिरणियाँ] मूर्ख हैं, [फिर भी] अप्रणय-नेत्रों से उन कृष्ण की वंशी को सुन करके और उनके रूप को देख करके ये मुग्ध हो गयीं। क्या [श्लोक] है?

भक्त: ध‍न्या: स्म मूढगतयोऽपि [#2]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ध‍न्या: स्म मूढगतयोऽपि— ये मूढ़! और कृष्ण से प्रणय की भीख माँग रही हैं और उनके पति पीछे-पीछे [चलते हैं।] ये पुलिन्‍द क‍न्याएँ कृष्ण के चरणों में लगे हुए महावर को देखकर प्रेम से मग्न होकर उसे अपने चारों ओर लेपती हैं—मानों आज [उन्‍होंने] कृष्ण को पा लिया। और हम ऐसी दुर्भागिनी हैं कि ऐसा नहीं कर सकतीं। तो यही होता है श्रेष्ठ भक्तों का दर्शन—यदि वे देखते हैं कि [किसी ने] उनके आराध्य की कुछ भी सेवा की है, तो वे भाव में विभोर हो जाते हैं। यही [गोपियाँ] बोल रही हैं।

तो परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं— “[नारदजी की] आँखो में आँसू भरे हुए हैं और वे नमस्कार करने लगे—किनको? वहाँ पर जो बैठे हुए हैं—उद्धवजी और उन सबको देखकर। और [नारदजी] बड़े कम्पित-कलेवर से, पुलकित हो करके गद्‌गद स्वर से कहने लगे।”

नारदजी ने कहा— “यदि आप लोग मुझको जीवित रखना चाहते हैं और मुझको शा‍न्त करना चाहते हैं, तो महाभागवत उद्धवजी का दर्शन करा दीजिये। भगवान् के ऐसे कृपापात्र [के विषय में] मैंने कहीं नहीं सुना। इसलिये उनका दर्शन करा दें, अथवा आप लोग कृपा करें कि मैं उद्धवजी की चरणधूलि को स्पर्श करके अपने सिर पर लगा लूँ। उसीसे मेरी आत्मा शा‍न्त हो जायेगी। मैंने आज तक [ऐसे कृपापात्र के विषय में नहीं सुना।] प्राचीन हो या अर्वाचीन (नवीन)—जितने भी प्रभु के अनुग्रह के पात्र हैं, भगवान् का ऐसा अनुग्रह किसी ने नहीं पाया।”

जहाँ-जहाँ नारदजी गये हैं, उन सबको अब ले लो। वही प्रयाग से ले करके अब तक पाण्डव इत्यादि जिनके पास भी वे गये हैं, [उन सबमें] प्रभु का [सबसे अधिक] अनुग्रह उद्धवजी को प्राप्त हुआ है। इसीलिये भगवान् ने स्वयं इनको अपनी विभूति कहा है—‘भक्तों में मैं उद्धव हूँ’ – ये विभूति बतलाया है। और भी श्रीमद्भागवत में बतलाया है, जिसे ये आगे बतलायेंगे।

[46:45-49:12 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हमारे जीवन का उद्देश्य ऐसी भक्ति को लाभ करना है। इसलिये चेष्टा करो कि इसी जीवन में हमलोग इस स्थिति को प्राप्त करें। यदि प्राप्त भी नहीं करते हैं, [तो कम-से-कम] उस धारा (line) में तो आ जायें। अन्‍ततः श्रद्धा से निष्ठा और निष्ठा से रुचि में आने की चेष्टा करो। रुचि में आने के बाद में अनिष्ठिता-भक्ति समाप्त हो जाती है; नहीं तो [मन में विचार उठता रहेगा] कि “विवाह करके रहूँ या क्या करूँ? या नारदजी जैसा रहूँ? अरे! प्रह्लाद महाराजजी तो भक्त थे, उन्हो‍ंने भी तो विवाह किया। व्यासजी ने क्या विवाह नहीं किया? तो मेरे करने में दोष हो जायेगा!”

“फिर नारदजी [ने तो विवाह नहीं किया।] अरे! कौन कह रहा है कि नारदजी ब्रह्मचारी हैं कि क्या हैं—वे [इससे भी] बहुत ऊँचे हैं।”

इसलिये हमारे जीवन का उद्देश्य हो कि [कम-से-कम] अनिष्ठिता-भक्ति से निष्ठिता-भक्ति में आयें।

“घर में रह करके पहले करूँ, बाद में करूँ, शादी करूँ कि न करूँ? अभी पुत्र घर में हैं, माता-[पिता] बूढ़े हो रहे हैं, अब क्या करें? अभी इच्छा रह गयी है कि मठवास करें—वह भी करें या यह करें—बड़ी विकट (critical) स्थिति है।”

इन सबको छोड़कर यदि नारदजी जैसा होना चाहते हो, तो नारदजी जैसा बनो। ब्रह्माजी के अभिशाप से नारदजी पूर्वज‍‍न्म में एक हजार गन्धर्वियों कि कितनी करोड़ो गन्धर्वियों के साथ में रहे, कि‍न्तु काम और भोग [उन्‍हें] स्पर्श नहीं कर सके। और फिर दूसरे ज‍न्म में दासी-पुत्र हो करके आये, तब विवाह इत्यादि कुछ नहीं किया और कैसे तपस्या की, भगवान् का भजन किया, वैष्णवों के सङ्ग में रहे—तब ऐसी भक्ति प्राप्त हुई।

इसलिये गृहस्थ में चले जायेंगे और बस झट भक्ति मिल जायेगी, और पाण्डवों जैसे बन जायेंगे—ऐसा मत समझो। इसलिये जीवन का आदर्श बना करके कि तुम लोग कम-से-कम तो इस [जन्म में] अनिष्ठिता से निष्ठिता भक्ति में आओ और [फिर] उससे रुचि आ जाये। धीरे-धीरे नाम में रुचि आयेगी, सेवा में रुचि आयेगी, अर्चन में रुचि आयेगी, ठाकुरजी की रसोई बनाने में रुचि आयेगी, गुरुजी की सेवा में रुचि आयेगी—तुम्हारा जीवन सार्थक [हो जायेगा।]

बस आज यहीं तक रहे।

[52:08-54:01 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एक कीर्तन करो।

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्‍धु (1.1.11)

श्रीकृष्ण को सुखी करने की स्पृहा के अतिरिक्त, समस्त प्रकार की अभिलाषाओं से रहित, ज्ञानकर्मादि के द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए ही कायिक, मानसिक और वाचिक– समस्त चेष्टाओं और भाव के द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गति से जो कृष्ण का अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओं को) उत्तमा-भक्ति कहते हैं। (GVP)

#2
धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता
या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम्।
आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः
पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10:21:11)

दूसरी ब्रजनारियों ने कहा—अहो! ये वन में विचरनेवाली मूढ़ बुद्धिवाली हिरणियाँ निम्न योनि की होनेपर भी धन्य हैं। जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेश धारणकर बाँसुरी बजाते हैं, तब ये उस वंशी की तान सुनकर अपने पतियों कृष्णसार मृगों के साथ मनोहर-वेशधारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ी चली आती हैं और प्रणयभरी दृष्टि से उन्हें निहारा करती हैं। अपनी कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखों के द्वारा वे श्रीकृष्ण के चरणकमलों में पूजा अर्पित करती हैं और श्रीकृष्ण की प्रेममयी चितवन को अपने अभिनन्दन के रूप में स्वीकार करती हैं। (GVP)

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