PURE BHAKTI ARCHIVE
Subscribe to the Daily Harikatha & Short Videos in Hindi & English @Gaudiya Rasamrita

Sri Brhad-bhagavatamrta 1.6.14–27: Uddhava’s Realization About the Matchless Devotion of the Vraja-gopis

56:59
#241
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 70%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • A detailed explanation of Sri Brhad-bhagavatamrta, Canto 1, Chapter 6, Verses 14–27.
  • After hearing the profound glories of Sri Uddhava, Narada Rsi traveled to Dvaraka and began to glorify Uddhava in that divine assembly.
  • Narada Rsi who is Madhumangala in Vraja-lila, is considered the guru of Uddhava.
  • Even in the spiritual world, a sattvika (pure, mode-of-goodness) form of matsarya (jealousy) exists. However, this spiritual jealousy is vastly different from its material counterpart—it is born of love and spiritual intensity, not envy.
  • Narada Rsi declared, “Sri Uddhava has received a level of mercy from Sri Krsna that no previous or present devotee had ever attained. Thus, Bhagavan Himself addressed him as 'Your Majesty' and recognized him as the foremost among His devotees.”
  • Uddhava humbly admitted, “After visiting Vraja, my pride in being the most fortunate was completely shattered. There I came to know the exalted devotees who are the true recipients of His grace. As I offered my humble obeisances to the Vraja-gopis, I prayed:
  • 'etāḥ paraṁ tanu-bhṛto bhuvi gopa-vadhvaḥ' – ‘These cowherd girls alone have perfected their lives on this Earth’ (Bhagavatam 10.47.58). I also prayed: 'āsaṁ aho caraṇa-reṇu-juṣām ahaṁ syām' – ‘Oh, may I take birth even as a bush, creeper, or herb that receives the footdust of the gopis’ (Bhagavatam 10.47.61), and again, 'vande nandavraja-strīṇāṁ pāda-reṇum abhīkṣṇaśaḥ' – ‘Again and again I worship the dust from the lotus feet of the women of Nanda’s Vraja, the vraja-gopis’ (Bhagavatam 10.47.63).”

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.6.14-27: ब्रजगोपियों की अतुलनीय भक्ति के सम्बन्‍ध में उद्धव की अनुभूति

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 15 अगस्त, 2003 को श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जिस दिन नारद ऋषि द्वारका में पहुँचे और महाराज उग्रसेन की सभा में उपस्थित हुए, [वहाँ पर] उग्रसेन और सब यादवों की बातों को सुन करके, उद्धवजी के उत्कर्ष की बातों को सुन करके, उनकी महिमा को सुन करके नारदजी प्रेम में बड़े व्याकुल हो गये और उद्धवजी का स्मरण करते हुए, उनको ढूँढ़ते हुए रुक्मिणी के राजभवन में पधारे। यहाँ तक तो मैंने बतलाया था।

I have told that Nārada went to the courtyard, in the council of Ugrasena, and there he heard about the glories of Uddhava. Then he quickly ran away to meet Uddhava, and he came to the royal palace (rājamahala) of Rukmiṇī, where Kṛṣṇa was.

जब वे वहाँ पर पहुँचे, तो क्या देखा? उद्धवजी, बलदेवजी, रुक्मिणी, रोहिणी मैया, सत्यभामा इत्यादि बहुत से लोग वहाँ पर थे और सभी लोग बड़े उदास थे, क्योंकि किसी मनोव्यथा के [कारण] कृष्ण अभी देर तक सो रहे हैं। इसके बाद में नारदजी को देख करके उन सभी लोगों ने उनके आँसुओं को पोंछा और पोंछकर [कहा–] “महाराज! थोड़ा-सा स्थिर होइये और बतलाइये कि किसलिये आपकी ये दशा है?

उन्होंने स्थिर होने के बाद में कहा– “मुझे उद्धवजी से मिला दो अथवा मुझे उनकी चरणरेणु से स्पर्श करा दो। मेरे लिए इतना ही बहुत होगा।”

उद्धवजी वहीं बैठे हुए हैं किन्तु नारदजी देख नहीं रहे।

Oh! you should note down and…

जबकि उद्धवजी वहाँ पर बैठे हैं और [नारदजी ने उनको] देखा नहीं और ये बातें कहने लगे, तो वहीं पर उद्धवजी थे। वे उनके भावों को समझ गये। क्या भाव था? [उद्धवजी उनके] भावों को समझ गये कि ये किसलिये आये हैं और उनका उद्देश्य क्या है।

नारदजी का उद्देश्य क्या था? इस जगत् में यह घोषणा करनी थी कि कृष्ण के कृपापात्रों में सबसे अधिक श्रेष्ठ कौन है? इसीको वे प्रकाशित करना चाहते थे—कौन? कृष्ण। और उसको (कृष्ण की आन्‍तरिक इच्छा को) जान करके नारदजी ने भूमिका बनायी और प्रयाग से यहाँ (द्वारका) तक पहुँचे और उसीकी अब परिसमाप्ति है। अभी उन गोपियों की महिमा का यहाँ पर वर्णन किया कि गोपियाँ कैसी थीं, नन्दबाबा कैसे थे, उनका कृष्ण के प्रति कैसा अद्भुत प्रेम था! इसीकी भूमिका यहाँ पर बन रही है, [जिसे] नारदजी वहाँ पर बना रहे हैं।

नारदजी ने कहा– “प्राचीन और अर्वाचीन अथवा नये जितने भी भक्त हैं, सभी प्रभु के अनुग्रह के पात्र हैं – [तथापि] उनमें उद्धव श्रेष्ठ हैं।” क्यों? श्रीमद्भागवत में इसका वर्णन किया गया है। सनातन गोस्वामी अपनी व्याख्या में इसीको बतला रहे हैं।

भक्त: (6:16 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: क्योंकि कृष्ण ने स्वयं उद्धवजी को अपनी विभूति बतलाया है कि “भक्तों में मैं उद्धव हूँ।” सम्भवतः ये भी कल बतलाया था।

[नारदजी ने कहा–] “ओह! बड़े विस्मय की बात है! विस्मय की क्या बात है? प्राचीन और आधुनिक जितने भी भक्त हैं, कृष्ण के अनुग्रह पात्र हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन हैं? उद्धव।”

उद्धव मुझसे कम नहीं हैं– “नोद्धवोऽण्वपि मत् न्यूनः” [#1] उद्धव मुझसे कम नहीं हैं। इस श्लोक में बतला रहे हैं–

न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकर:।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्।
-श्रीमद्भागवतम् (11.14.15)

[हे उद्धव! तुम मेरे भक्त होने के कारण मुझे जिस रुप से प्रियतम हो, मेरे पुत्र ब्रह्मा, स्वरूपभूत सखा शंकर, भ्राता संकर्षण, भार्या लक्ष्मीदेवी, यहाँतक कि अपना स्वरूप भी मुझे उतना प्रिय नहीं है।] GVP

क्या?

[भगवान् कह रहे हैं–] “हे उद्धव! तुम भक्त होने के कारण जिस प्रकार से मेरे प्रिय हो, उस प्रकार से मेरा पुत्र ब्रह्मा, मेरा एक स्वरूप शंकर, भ्राता संकर्षण, भार्या रमादेवी और यहाँ तक कि अपना यह जो मेरा स्वरूप है, वह भी उतना प्रिय नहीं है।

यदि [यह श्लोक] कृष्ण कह रहे हैं तो यहाँ पर भार्या किसको लेंगे? राधाजी को मत लेना। उद्धवजी राधाजी से श्रेष्ठ नहीं हो सकते। रुक्मिणी, सत्यभामा से किसी प्रकार से [उद्धवजी श्रेष्ठ] हो सकते हैं। इसलिये [भार्या शब्द से] यहाँ पर लक्ष्मीजी को ही समझो। और [कृष्ण यह बात] किस रूप में कह रहे हैं? नारायण के रूप में कह रहे हैं। इसलिये अपना यह स्वरूप भी मेरा उतना प्रिय नहीं हैं जितना उद्धव [मुझे प्रिय है।] किसलिये? भक्त होने के [कारण] और वह भक्त भी कैसा? परम-भागवत।

श्रीमद्भागवतम् में बतलाया भी गया कि युधिष्ठिर भी हरिदास हैं, उद्धव भी हरिदास हैं और गिरिराज गोवर्धन [भी हरिदास] हैं। अभी गिरिराजजी को मत छूओ, नीचे ही चलो। ये दोनों क्या हैं? हरिदास। उद्धवजी को ‘हरिदासतर’ बतलाया ‘हरिदासतम’ नहीं। [श्रीमद्भागवतम् में महाराज युधिष्ठिर को हरिदास, उद्धवजी को हरिदासवर और गिरिराज गोवर्धन को हरिदासवर्य बतलाया गया है।]

भगवद्वचनान्येव प्रथितानि पुराणतः।
तस्य सौभाग्यसन्‍दोहमहिम्नां व्यञ्जकान्यलम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.16)

[श्रीउद्धव के सौभाग्य की महिमा को प्रकाश करनेवाले श्रीभगवान् के मुखनिःसृत वचन पुराणों में यत्र-तत्र सर्वत्र भरे पड़े हैं तथा वे वचन श्रीउद्धव के प्रति भगवान् श्रीकृष्ण की अद्भुत कृपा का ही प्रदर्शन करते हैं।] GVP

ये उद्धव सौभाग्यराशि की घनीभूत मूर्ति स्वरूप हैं और भगवान् के मुख से ही उनके सम्बन्ध में पुराणों में बहुत से वचन लिखे गये हैं। भगवान् स्वयं रूप में उद्धवजी की महिमा का वर्णन करते हैं। इसलिये कृष्ण की कृपा उद्धवजी के प्रति बहुत अद्भुत (विचित्र) है। उद्धवजी पर कितनी कृपा है, यह इसीसे समझो कि मथुरा में [कृष्ण को] कोई ऐसा [योग्य] व्यक्ति नहीं मिला, जिसको ब्रज में गोपियों के यहाँ पर भेज सकें। इसलिये एकमात्र [उद्धवजी ही चुने गये—जो यद्यपि] (10:12 अस्पष्ट) अभी अपरिपक्व, किन्तु योग्य हैं। उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है, तो क्या करेंगे? उन्हीं को भेजेंगे। इसलिये उद्धवजी को मथुरा से भेजा। कहाँ? ब्रज में। किसके लिए? माता-पिता को सान्त्वना और गोपियों को सान्त्वना [देने] के लिए। इसीसे हम समझ सकते हैं [कि उद्धवजी पर कृष्ण की कितनी कृपा है!]

नारदजी कह रहे हैं– “जो यादवों ने हमसे उस सभा में कहा, उनको अपने कानों से सुनने से हमारे हृदय को उन कथाओं ने चोरी कर लिया। कैसे? हमारा जो धैर्य है वह छूट गया। उनकी महिमा ने हमारे हृदय में प्रवेशकर हमारे हृदय को चुरा लिया।” मतलब क्या है? उद्धवजी की महिमा इतनी अधिक है कि उसको सुनने से उनका हृदय उन्होंने चुरा लिया अर्थात् हृदय को आकर्षण कर लिया।

[11:36-14:18 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नारदजी की बातों को सुनकर, नारदजी के भावों को देखकर उद्धवजी उनके भावों को समझ गये।

अब परीक्षित् महाराजजी अपनी मैया से कह रहे हैं– “मैया! नारदजी ने जब उद्धवजी के सम्बन्ध में ऐसी बातें कही, तो उद्धवजी बड़े लज्जित हो गये और उन्होंने बड़े आदर के साथ में बहुत शीघ्र ही, द्रुत गति से उठकर नारदजी के दोनों चरणों को पकड़ लिया और अपनी गोदी में रखकर उन्हें आलिङ्गन किया और उनके [नारदजी के] हृदगत भावों को समझकर…

क्‍या हैं उनके हृदगत भाव? [यही कि] भगवान् चाहते हैं—संसार में जो उनके सबसे अधिक प्रिय हैं, उनकी घोषणा की जाये, तो अच्छा है। और नारदजी ने उसको समझ करके अभी तक प्रयाग से यहाँ तक यात्रा की है। किसलिये? कृष्ण की इच्छा की पूर्ति के लिए कि हम ये घोषणा करें कि उनका सबसे अधिक प्रिय कौन है? क्या नारदजी नहीं जानते हैं कि गोप-गोपियाँ, ब्रजवासी ही उनके सबसे अधिक प्रिय हैं? नारदजी [भलीभाँति] जानते हैं, किन्तु अब ऋषि-समाज और लोक-समाज में भी इसकी घोषणा की जाये और सबको इसकी प्रतीति हो। इसलिये नारदजी के इन भावों को समझ करके उद्धवजी प्रेम में विवश हो उठे।

[उद्धवजी विचार कर रहे हैं–] “ ओह! नारदजी कैसे भक्त हैं! जो मैं नहीं कर सकता, उससे भी अधिक ये [कर रहे हैं।] हमारे ये गुरु हैं।”

सचमुच में नारदजी उद्धवजी के भी गुरु हैं। ये नारदजी ब्रज में कौनसे सखा हैं? मधुमङ्गल। ये मधुमङ्गल हैं और उद्धवजी मथुरा के उद्धव ही हैं। एक तो ये मधुमङ्गल हैं। कृष्ण की समस्त रहस्य लीलाओं में सुबलजी का और इनका (मधुमङ्गल का) अधिकार है। ये प्रियनर्म सखाओं में भी सबसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये [उद्धवजी] उनके इस भाव को जानकर कि हमारे ये गुरु हैं – इस भाव में विवश हो करके रोने लगे। क्यों रोने लगे? व्यक्ति दुःख से रोता है, सुख में भी रोता है। किसलिये रोने लग गये?

उद्धवजी को स्मृति हुई– “जब मैं ब्रज में गया और वहाँ से लौटा हूँ, तभी मुझे यह प्रतीति और अनुभव हुआ कि गोपियों का प्रेम कैसा है—अथाह, अनन्त समुद्र है! और मैं उसमें क्या हूँ? [केवल] एक कण हूँ। मेरा जो यह अभिमान था कि मुझसे बढ़ करके भगवान् का और कोई प्रिय नहीं है, वह [अभिमान तो] ब्रज में जाने से चूर्ण-विचूर्ण हो गया। [यदि मैं] ब्रज में नहीं जाता, तो गोपियों का ये भाव नहीं [समझ पाता।”]

[उद्धवजी को स्मृति हुई कि] कैसे प्रेम में विवश हो करके गोपियाँ कृष्ण के लिए रो रही हैं, इसलिये वे भी रोदन करने लगे। और भी, क्या? जब स्मृति हुई उन चीजों की– गोपियों के भावों की, विशेष करके राधिका इत्यादि के हृदय की बातों की – तो [उद्धवजी यह सोचकर कि] कहीं वैसा ही दुःख मुझको न हो या दुःख से भाराक्रान्‍त हो करके कि कृष्ण [ब्रज में] जा क्यों नहीं रहे, इसलिये उद्धवजी भी बड़े डकार-डकार करके रोने लगे। जब रोने लगे तब बलदेवजी और दूसरे लोगों ने उद्धवजी को धैर्य बँधाया। और तब फिर उद्धवजी जब कुछ शान्त हुए, तो उनको सात्विक मात्सर्य हुआ। किसके प्रति? नारदजी के प्रति। “नारदजी की ऐसी महिमा! जो हमारे लिए सम्भव नहीं।” – इसलिये [उद्धवजी को] मात्सर्य भाव हुआ। जैसे सत्यभामा और रुक्मिणी का परस्पर कुछ मात्सर्य भाव है। तो रुक्मिणीजी गम्भीर हैं और सत्यभामाजी थोड़ी-सी चञ्‍चल स्वभाव की हैं। तो उनमें मात्सर्य भाव कुछ है। श्रीमती राधिका और चन्द्रावली में मात्सर्य भाव है। तो ये कह रहे हैं कि मात्सर्य में…

ये तो दुःख की बात है। इनमें ये मात्सर्य भावना कैसे हुई? मात्सर्य माने क्या? जलना। किसी के सुख में, किसी के उत्कर्ष को सुन करके जलना, हृदय में जलन होना। ये तो जगत् में ही होता है, वहाँ तो होता नहीं है। साधकों में भी [मात्सर्य भावना] नहीं है। इसलिये कहते हैं कि सात्विक [मात्सर्य हुआ।] सात्विक माने सत्त्व से उत्पन्न। ये सत्त्व क्या है? सत्त्व किसको कहते हैं? शुद्धसत्त्व? भगवान् के परिकरों में वह [शुद्ध] सत्त्व है। उनके आनुगत्य में चिन्तन करने से, भजन करने से वह शुद्धसत्त्व उनमें से दीये की भाँति यहाँ आविर्भूत होता है। उनके हृदय में… उसे क्या कहते हैं? जैसे लोहे में आग…

भक्त: तदात्म

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वह तदात्म हो गयी। तदात्म माने? वह मात्सर्य से तदात्म हो गयी अर्थात् उनके हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न हुई कि “नारदजी कैसे सौभाग्यवान हैं! जिसको वे जानते हैं, उसे मैं नहीं जानता। अच्छा!” यह मात्सर्यभाव। और मात्सर्यभाव से [कह रहे हैं।] माने क्या? माने उनको सावधान कर रहे हैं– “सावधान!” किसलिये सावधान? ये टीका में विस्तृत रूप से आलोचना की गई है।

मैंने अभी बतलाया [कि उद्धवजी] तदीय (कृष्ण की) प्रेमसम्पत्ति के वैभव [अर्थात् गोपियों से सम्बन्‍धित प्रेम का स्मरण करने लगे। वे सोचने लगे–] “गोपियों का कृष्ण के प्रति कैसा अनुराग है! [वे उनके प्रेम में] पागल हो उठती हैं। उनको कृष्ण के प्रेम में दिव्योन्माद हो जाता है और उससे भी अधिक महाभाव उत्पन्न हो जाता है। [उस दशा में वे] अंट-शंट बोलने लगती हैं। इसीको ‘दिव्योन्माद’ कहते हैं। उन्हें दिव्योन्माद होने लगता है।” इस भाव का स्मरण करके उद्धवजी धैर्य नहीं धर सके। वे व्याकुल और विवश हो करके दीन भाव से रोदन करने लगे। उद्धवजी गोपियों की दशा स्मरण करके [रोने लगे।] कृष्ण रोने लगते हैं तो और लोगों की तो बात ही क्या? स्वयं कृष्ण रोने लगते हैं।

यहाँ पर प्रेमसम्पत्ति का वैभव कहने से क्या [तात्पर्य है?] गोपियों की आर्त्ति, नन्दबाबा की आर्त्ति। आर्त्ति को छिपाने के लिए, आर्त्ति को दूर करने के लिए [नन्‍दबाबा] एकान्त वन में जाते हैं, किन्तु वहाँ पर और भी आर्त्ति बढ़ जाती है। गोपियों की भी आर्त्ति ऐसे ही बढ़ जाती है। आर्त्ति को दबाने के लिए, संवरण करने के लिए [गोपियाँ] यमुना के घाटों में जाती हैं और वहाँ कृष्ण की लीलाओं का स्मरण करके गोपियाँ और भी विवश हो जाती हैं। इनको दिन-रात कहीं भी चैन नहीं। जैसे महाप्रभु दिन तो किसी प्रकार से बिता लेते थे, किन्‍तु रात उनकी बीतती नहीं थी। ऐसे ही गोपियों की स्थिति। दिन किसी प्रकार से सखियों के साथ में मन बहल करके कुछ [बीत] जाता है किन्तु रात आते ही [उनका विरहताप बढ़ जाता है।] जितनी ही रात अधिक बढ़ती जाती है, उनका विरह का बुखार और तीव्र गति से बढ़ जाता है अथवा स्वेद, कम्प, पुलकादि सात्त्विक विकार ही प्रेमसम्पद हैं।

अथवा अर्थ कर रहे हैं– गोपियों को कृष्ण के विरह में या जब विरह में मिलन की स्मृति होती है… क्या तात्पर्य है? विरह में कृष्ण की स्मृति अधिक होती है। इसलिये विरह में जब कृष्ण की तीव्र अनुभूति होने लगती है तब स्वेद, कम्प, पुलकादि अष्टसात्विक भावों से जो उनकी प्रेमसम्पत्ति होती है, यह देखकर अथवा विस्ताररूप वैभव [अर्थात्] गोपियों की और जो स्थितियाँ हैं उनको विशेषरूप से स्मरण करके [उद्धवजी रोदन करने लगे। उद्धवजी जब ब्रज में] गये थे [तो गोपियों की स्थिति को] देखा था। भ्रमरगीत में और देखा। भ्रमरगीत के समय में [उन्होंने देखा कि] कैसे [राधिकाजी] पागल हो करके [गान कर रही हैं।] उन्‍हें कभी क्रोध होता है, कभी क्षोभ होता है, कभी वे क्या दस अवस्थाएँ?

भक्त: प्रेमवैचित्त्य

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, नहीं… भागवत में भ्रमरगीत के दस श्लोक हैं। [दस प्रकार के चित्रजल्प हैं–] प्रजल्प, परिजल्प, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प, अभिजल्प, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प। ऐसी राधिका आदि गोपियों के भावों के स्मरण से हृदय में प्रेमराशि आविर्भूत हुई और वे दीनभाव से रोदन करने लगे। अभी भी कृष्ण की लीलाओं का स्मरण [होता है।]

चैतन्य महाप्रभुजी घर छोड़ करके जा रहे हैं। शची मैया काठ जैसी जड़वत् हो गई हैं। महाप्रभुजी ने [जाने से पहले उनको] प्रणाम किया। वे [महाप्रभुजी को] न रोक सकीं, न बोल सकीं, न कुछ [किया।] वे लकड़ी के समान हो गयीं और महाप्रभुजी परिक्रमा करके चल दिये और गङ्गा में कूद गये। विष्णुप्रिया को कैसी दुरावस्था में छोड़ करके गये! उसको सुन करके पत्थर भी पिघल जाते हैं। गोपियों का प्रेम और अधिक है। इन विष्णुप्रिया से भी अधिक है। [उद्धवजी] उसको स्मरण करके रोदन करने लगे। थोड़ी देर के बाद में बलरामजी और नारदजी के यत्‍न से उन्होंने [धैर्य] धारण किया। जो मैंने बतलाया, बाद में नारदजी के प्रति मात्सर्यवशतः उनको सावधान करके कहने लगे। मात्सर्य कैसा? सात्विकभाव से उत्पन्न। इसलिये ये दुःखपूर्ण नहीं है। क्या उन्होंने वर्णन किया? ये गोपियों की महिमा है। साधारण लोगों को इसका नहीं पता।

(26:25-32:35 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धवजी नारदजी से कह रहे हैं। वे उनके चरणों को पकड़ करके आलिङ्गन करके उनके भावों को समझने के बाद में बोल रहे हैं– “हे सर्वज्ञ! अर्थात् सब कुछ जाननेवाले। हे सत्यवादी श्रेष्ठ! अर्थात् सत्यवादी हरिश्चन्‍द्र और उसके बाद में युधिष्ठिर से भी श्रेष्ठ! हरिश्चन्‍द्र लौकिक और युधिष्ठिर पारमार्थिक [सत्यवादी।] हे महामुनि! अर्थात् व्यास, शुकदेव गोस्वामी इत्यादि जो मुनि हैं, उनके भी गुरु! हे प्रभो! आप भगवद्‍-भक्तिमार्ग के आदिप्रवर्तक–गुरु हैं।” नारदजी भक्ति के प्रवर्तक आदिगुरु हैं।

“जो आपने मेरे लिए कहा, वह सब सत्य (ठीक) है और उसकी अपेक्षा मैं कुछ और भी हूँ। जो आपने अभी वर्णन किया, अभी वर्णन करना जो आपका बाकी रह गया है, उससे भी अधिक मेरी महिमा है – मैं जानता हूँ। जो आपने वर्णन नहीं किया, गुप्त रखा है, आप जानते हैं किन्तु गुप्त रखा है। आपने जो कुछ कहा, उससे भी अधिक मुझमें वह सब महिमा वर्तमान है – मैं जानता हूँ। और इस बात को मैं तो जानता ही हूँ, उग्रसेन इत्यादि यादव लोग भी जानते हैं कि कैसी मेरी महिमा है? किन्तु ओह! मैं ब्रज में गया और जो देखा, [उससे] मेरा ये घमण्ड चूर्ण-विचूर्ण हो गया। मैं समझता था कि मैं सबसे अधिक श्रेष्ठ हूँ। मैं वहाँ ब्रज में गया, उनके तो विद्यालय (school) में मेरा प्रवेश (admission) भी नहीं हो सका। उन्‍होंने नहीं लिया, मैं इतना योग्य नहीं था।”

यहाँ पर राधिकाजी प्रधानाचार्य (Principal) हैं। ललिता-विशाखाजी एक-एक विषय के प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष (head of department) हैं।

“वहाँ पर उस समय प्रेम में मेरा नम्बर इतना कम था कि उसमें मेरा प्रवेश उन लोगों ने नहीं किया। केवल विद्यालय को घूम करके मैं चला आया। उसकी जो कुछ हवा लगी, उसीसे मैं उनकी महिमा को [समझ सका। वहाँ पर] जो अनुभव प्राप्त हुआ, उसके द्वारा मेरा ये महासौभाग्य का गर्व चूर्ण-विचूर्ण हो करके खत्म हो गया और जो मैंने अनुभव किया, उसके द्वारा मैंने कृष्ण और उनके कृपाप्रसाद और उनके प्रेम तथा उनके प्रेमभाजन जो कृपापात्र हैं… कौन? ब्रज के गोप-गोपियाँ। इससे बढ़ करके और कोई नहीं हैं। उनकी महिमा माधुरी से मैं कुछ अवगत हुआ हूँ, वह भी पूरा नहीं। कितना? कणमात्र। ब्रजवासियों के दर्शन से मैं धन्य हो गया।”

‘विरहेण महाभागा महान् मेऽनुग्रहः कृतः’[#2] – मैं महासौभाग्यशाली हूँ कि कृष्ण ने मुझे ब्रज में भेजा और वहाँ जा करके गोपियों से कह रहे हैं कि मैं आप लोगों के विरह को देख करके आज धन्य हो गया – “विरहेण महाभागा।” आज मैं महाभागा हो गया, महाभाग्यवान हो गया।

और भी उद्धवजी ने क्या किया? आगे वर्णन करेंगे।

[उद्धवजी कह रहे हैं –] “प्रभु ने मुझे ब्रज में भेज करके मेरे प्रति बहुत कृपा की है। इसलिये मैं समझता हूँ कि मैं भगवान् का– कृष्ण का बहुत बड़ा भारी कृपापात्र हूँ कि गोपियों से मेरा संवाद हुआ, मैं गोपियों को देखने गया। इसलिये [अपने] आपको प्रभु का नितान्‍त कृपापात्र जान करके कि मैं भगवान् के कृपापात्रों में से एक हूँ – ‘तर’ हूँ, ‘तम’ तो गोपियाँ और ब्रज के लोग हैं– ऐसा समझ करके कि मैं उनके भावों को समझनेवाला हूँ, इसलिये आनन्द में मग्न हो करके रोदन कर रहा हूँ।”

[37:39-39:28 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:

गायं गायं यदभिलषता यत्ततोऽनुष्ठितं य–
त्तत् सर्वेषां सुविदितमितः शक्यतेऽन्यन्न वक्तुम।
नत्वा नत्वा मुनिवर मया प्रार्थ्यसे काकुभिस्त्वम्
तत्तद्‍वृत्तश्रवणरसतः संश्रयेथा विरामम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.27)

[ब्रज में जाने से ही मैं आनन्दसागर में निमग्न हो गया था तथा उस समय मैंने बारम्बार जिस उत्कर्ष का गान किया था अथवा जैसी अभिलाषा की थी तथा जैसा आचरण किया था, वह सब जानते हैं। किन्तु इससे अधिक बोलने का सामर्थ्य भी मुझमें नहीं है। हे मुनिवर! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ तथा विनीतभाव से प्रार्थना करता हूँ कि आप उस वृत्तान्त को श्रवण करने के लिए अपने आग्रह का परित्याग करें।]

[उद्धवजी ने कहा–] “मैं ब्रज में गया, आनन्द के समुद्र में निमग्न हो गया। जब तक वहाँ था, आनन्द के समुद्र में डूबा रहा और उस समय गोपियों की इस प्रेमसम्पत्ति को अनुभवकर, उनकी विरह आर्त्ति को देखकर कृतार्थ हो करके मैंने जो वहाँ पर बार-बार उनकी महिमा का गुणगान किया था उससे अधिक मैं और कुछ नहीं कह सकता, नहीं कह सकता।” क्या उन्होंने कहा था?

एता: परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो
गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावा:।
वाञ्छन्ति यद्भवभियो मुनयो वयं च
किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.58)

[इस पृथ्वीपर केवल उन गोपियों का ही शरीर धारण करना सर्वश्रेष्ठ तथा सार्थक है, क्योंकि वे सबके अन्तर्यामी भगवान् श्रीगोविन्द के प्रति रूढ़ नामक महाभाव में स्थित हो गयी हैं। संसार से भयभीत बड़े-बड़े मुनिगण तथा हम भी उस भाव (प्रेम) की वाञ्छा करते हैं। अहो! जिनका श्रीकृष्ण और गोपियों की ऐसी रसमय लीला-कथाओं के प्रति अनुराग नहीं हुआ है, उन्हें ब्रह्मा का जन्म प्राप्त करने से भी क्या लाभ है?] GVP

उस समय मैंने कहा था कि पृथ्वी धन्य है क्योंकि इसमें ब्रज है और ब्रज इसलिये धन्य है क्योंकि उसमें कौन हैं? ये ‘गोपवध्व’ – ये गोपियाँ हैं। इसलिये ये ब्रज धन्य है और कृष्ण के प्रति ऐसा अद्भुत प्रेम होने से ये ब्रज की गोपियाँ ही महा-महाधन्य हैं। क्या?

‘गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावा:’ – अखिलात्मनि जो कृष्ण हैं, अखिलरसामृतसिन्‍धु जो कृष्ण हैं, उनमें इनका रूढ़भाव, महाभाव से भी अधिक रूढ़, अधिरूढ़ और कहाँ-कहाँ तक ये मादनाख्य-महाभाव तक है। ये ब्रह्मजन्म से क्या लाभ है? या ब्राह्मण से या ब्रह्मा के जन्म से [क्या लाभ है?] यदि भगवान् की कथा में रस नहीं है, तो ब्रह्मजन्म की, ब्रह्मयोनि की कुछ भी आवश्यकता नहीं है।

कीट जन्म हउ यथा तुया दास।
बहिर्मुख ब्रह्मजन्मे नाहि आश॥

[बहिर्मुख होकर ब्रह्मा जैसा जन्म लेने की इच्छा नहीं है। परन्‍तु जहाँ आपके प्रिय भक्त हों, वहाँ कीटजन्म भी मुझे स्वीकार है।] GVP

ऐसे जो रसिक वैष्णव हैं, उनका सङ्ग मिल जाये तो जैसे भी हम (42:21 अस्पष्ट) और हम लोग इतने मूर्ख हैं कि ऐसे वैष्णवों का सङ्ग मिलने पर भी उनका सङ्ग छोड़ करके घर में विवाह करने के लिए जा रहे हैं, वह अधिक [जड़]रस भोग करने के लिए। दुर्भागे हैं वे लोग! ऐसा काम [करने के बारे में] मत सोचो। रहो, सुनो, नहीं सुनते हो तब भी समझो। नहीं समझ रहे हो, तब भी बैठो। इसलिये [वैष्णवों के सङ्ग में रहो।]

[उद्धवजी] और कह रहे हैं। क्या कह रहे हैं?

क्वेमा: स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टा:
कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढ़भाव:।
नन्वीश्वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षा-
च्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्त:॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.59)

[अहो! कहाँ तो इन वनचरी गोपियों का श्रीकृष्ण के प्रति रूढ़भावमय परमप्रेम और कहाँ कृष्णभक्ति के विषय में व्यभिचार दोष से दुष्ट, हम जैसे समस्त लोग? किन्तु जिस प्रकार महाऔषधि अथवा अमृत का गुण और महिमा न जानने पर भी उसका सेवन करने से मङ्गल ही होता है, उसी प्रकार इन ब्रजगोपियों की महिमाको न जानने पर भी यदि कोई उनके अनुगत होकर भजन करता है, तो श्रीभगवान् उसका भी साक्षात् कल्याण करते हैं।] GVP

अरे! कहाँ इन गोपियों का कृष्ण के प्रति रूढ़भाव और कहाँ ये लौकिक स्त्रियाँ? कहाँ गोपियों का रूढ़भाव!

‘क्वेमाः वनचरीः’ – [कहाँ] वृन्दावन में विचरण करनेवाली, कुञ्जों-कुञ्जों में विचरण करनेवाली, कृष्ण के साथ में रमण करनेवाली, विहार करनेवाली गोपियाँ और विशेषकर अरुन्‍धति [आदि] ये सब जो पतिव्रता शिरोमणि हैं, कहाँ ये? और-और लोगों की तो बात ही क्या?

‘व्यभिचारदुष्टा:’ – व्यभिचार [शब्द] के लिए हमारे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने क्या व्याख्या की? [व्यभिचार= वि+]अभिचार – ‘वि’ विशेष रूप से कृष्ण से विहार करनेवाली जो गोपियाँ हैं, ये धन्य हैं। कृष्ण का ऐसा ही एक प्रभाव है…

श्रीपाद तीर्थ महाराज: प्रीतिसन्‍दर्भ में जैसा है– वयं तु व्यभिचारिणा (44:33 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बहुत सुन्‍दर सब भाव हैं। तो कृष्ण का ऐसा एक स्वरूप है, अद्भुत महिमा है, कैसी? जैसे औषधि का प्रभाव नहीं जानने से अथवा मणि का स्वभाव नहीं जानने से भी…

भक्त: (45:01 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तीनों का। और नहीं जानने से भी उसका सेवन करने से वैसा फल मिल जाता है, ऐसे कृष्ण का जो सेवन करेगा, वह भले ही लौकिक व्यभिचारी हो, कुब्जा जैसी भी हो, तब भी वह महान उन्नत बन जाता है। कुब्जा में कोई वैसा विशेष गुण नहीं है, किन्तु कृष्ण के प्रति उसकी जो निष्ठा हुई, क्योंकि कृष्ण के अतिरिक्त और दूसरों के प्रति नहीं है। इसलिये उनको ‘साधारणी नायिका’ भी कहा है।

भक्त: (45:34 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वह कृष्ण केवल। कंस के साथ में थी तब तक कुछ नहीं हुआ, किन्‍तु कृष्ण के साथ। कोई व्यभिचारी स्त्री भी यदि कृष्ण से सम्बन्धित हो जाती है तो उसका व्यभिचार कहाँ खत्म हो करके वह परम उन्नत हो जाती है। और– नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः [#3]

रासस्थली में कृष्ण ने गोपियों के गले में अपना हाथ डालकर गोपियों को वह प्रसाद दिया जो कभी किसी को नहीं दिया। लक्ष्‍मी, रुक्मिणी और सत्यभामा – किसी को नहीं दिया।

इसलिये फिर कहते हैं – ‘आसामहो चरणरेणु जुषामहं’ [#4]– वृन्दावन में गोपियों की चरण की रज को सेवन करने के लिए, उससे अभिषिक्त होने के लिए मैं यदि ब्रज में लता-गुल्म इत्यादि भी हो जाऊँ तो हमारा जीवन सार्थक है। जिसको श्रुतियाँ भी करोड़ों वर्ष से ढूँढ करके आज तक नहीं पा सकीं और ये गोपियाँ क्या कर रही हैं? ऐसी गोपियाँ धन्य हैं। अगले श्लोक में वे कह रहे हैं। क्या?

या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-
र्योगेश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।
कृष्णस्य तद् भगवत: चरणारविन्दं
न्यस्तं स्तनेषु विजहु: परिरभ्य तापम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.62)

[स्वयं लक्ष्मीदेवी जिन श्रीकृष्ण की पदसेवा करती हैं, पूर्णकाम और आत्माराम बड़े-बड़े योगेश्वर तथा ब्रह्मा, शंकर आदि परमसमर्थ देवता, जिन श्रीकृष्ण के पादारविन्दों की सेवा करते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों को रासलीला के समय साक्षात् रूप से अपने-अपने स्तनमण्डलोंपर रखकर और उनका आलिङ्गन करते हुए इन गोपियों ने अपने हृदय की विरह-व्यथा को शान्त किया था।] GVP

अब इससे [बढ़ करके] गोपियों की महिमा और क्या हो सकती है? ब्रह्मा, लक्ष्मी इत्यादि लोग कृष्ण की जिस महान कृपा को प्राप्त नहीं कर सके, वे कृष्ण के चरणों का चिन्तन करते हैं और चरणों का चिन्तन भी उनके मन में नहीं आता और गोपियाँ उनके द्वारा मात्र चिन्‍तनीय चरणकमलों को अपने वक्षःस्थल में रख करके अपने हृदय के विरहताप को दूर करती हैं। इससे बढ़ करके और गोपियों की क्या महिमा हो सकती है? और इसलिये मैंने क्या किया?

वन्दे नन्दव्रजस्‍त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.63)

[अतएव मैं श्रीनन्दराज के ब्रज की गोपियों के चरणकमलों की धूलि की बार-बार वन्दना करता हूँ, जिनके द्वारा गान की जानेवाली श्रीकृष्ण कथा त्रिभुवन को पवित्र करती है।] GVP

मैं गोपियों के चरणों की वन्दना करता हूँ। नहीं, चरण की वन्दना नहीं, मैं एक धूलिकणा की दूर से वन्दना करता हूँ। एक धूलिकणा! इसलिये विरह में उनके मुख से जो भगवान् की कथाएँ निकली हैं, वे जगत् को पवित्र करनेवाली हैं।

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीड़ितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.9)

[तुम्हारा कथारूप अमृत तुम्हारे विरह से कातर लोगों के लिए जीवनस्वरूप है। विज्ञ व्यक्ति अर्थात् (ब्रह्मा, शिव, चतुःसन आदि) कविगण भी उसकी स्तुति किया करते हैं। तुम्हारी कथा प्रारब्ध और अप्रारब्ध पापों का नाश करनेवाली, श्रवणमात्र से ही मङ्गल प्रदान करनेवाली, प्रेमरूपी सम्पत्ति को प्रदान करनेवाली तथा कीर्तन करनेवाले के द्वारा विस्तारित होती है। अतएव जो व्यक्ति इस संसार में तुम्हारी कथाओं का कीर्तन करता है, वही सर्वश्रेष्ठ दाता है।] GVP

[महाराज प्रतापरुद्र के मुख से यह श्लोक] सुनकर महाप्रभु चौंक उठे। कहाँ वे विरह में व्याकुल होकर सो रहे थे? [महाप्रभु ने] उठ करके महाराज प्रतापरुद्र को एकदम आलिङ्गन में बद्ध कर लिया [और कहा–] “मैं भिखारी तुमको क्या दूँ? ये आलिङ्गन ही हमारा सर्वस्व है। भाई! और कुछ नहीं, यही है।” और वे प्रेम में पागल हो गये। ऐसी गोपियों की महिमा है। उनके मुख से जो निकला – भ्रमरगीत निकला, गोपीगीत निकला और वेणुगीत जो निकला – ये सब भागवत के रत्न हैं। शुकदेव गोस्वामीजी ने भागवतरूपी समुद्र से मन्थन करके [इन सब रत्नों को] निकाला।

[उद्धवजी ने कहा–] “ये सब मैंने महिमा कही है अब इससे अधिक मैं गोपियों की महिमा कुछ नहीं कह सकता।”

[49:55-55:34 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हो गया? ये तो हमने पहले कहा था न? [पहले भी] बृहद्‍भागवतामृत पाठ किया था। तीन बार हो गया, तो अधिक सुन करके क्या करेंगे? कल से ये सभी वक्ता लोग कृष्ण के तत्त्व के सम्बन्ध में [कहेंगे।]

भक्त: (55:57 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जैसे रूप गोस्वामी का हुआ, बलदेवजी का हुआ और कृष्ण का नहीं होगा? तो क्या करें? यही हो।

भक्त: ये भी कृष्ण की ही तो बात है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, होना भी चाहिये।

भक्त: (56:17 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अच्छा कल [इसका पाठ] करके परसों से [सभी कृष्ण-तत्त्व के सम्ब‍न्‍ध में कहने के लिए प्रस्तुत रहेंगे।]

All should be prepared to speak on Kṛṣṇa-tattva, Kṛṣṇa-rasa, Kṛṣṇa-bhakta, Rādhā-tattva (56:33 inaudible) everything. So you should be prepared. I can ask anyone to [speak.] Understand?

एक कीर्तन करो। राधाजी का या गोपियों के विरह के सम्बन्ध में या उद्धवजी के सम्बन्ध में कुछ हो तो बोलो।

---------------------------------------------------------------

समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दित: प्रभु:।
अतो मद्वयुनं लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥
-श्रीमद्भागवतम् (3.4.31)

उद्धव मुझसे किञ्चित्मात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे गोस्वामी हैं अर्थात् वे विषयों के द्वारा क्षुब्ध नहीं होते। अतः वे ही लोगों में मुझसे सम्बन्धित ज्ञान का उपदेश देते हुए इस जगत् में रहें। (GVP)

#2
सर्वात्मभावोऽधिकृतो भवतीनामधोक्षजे।
विरहेण महाभागा महान् मेऽनुग्रहः कृतः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.27)

हे महाभाग्यवती गोपियों! तुमने अधोक्षज भगवान् श्रीकृष्ण में ऐसी ऐकान्तिकी प्रेममयी भक्ति को प्राप्त कर लिया है, जो ऋषि-मुनियों के लिए भी अतीव दुर्लभ है। इस भक्ति से सभी पदार्थों में सर्वात्मभाव का दर्शन किया जा सकता है। श्रीकृष्ण के विरह में तुमलोगों ने दिव्योन्माद, चित्रजल्प आदि महाभावों का (भगवत्-प्रेम-सुखका) दर्शन कराकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है। (GVP)

#3
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुन्तोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उद्गाद् व्रजवल्लवीनाम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.60)

भगवान् श्रीकृष्ण ने रासलीला के समय उन व्रजाङ्गनाओं के गले में अपनी भुजाओं को डालकर उनके अभीष्ट को पूर्णकर उनके प्रति जैसी कृपा वितरण की थी, वैसी कृपा भगवान् की नित्यसङ्गिनी– वक्षःस्थल पर सर्वदा विराजमान श्रीलक्ष्मीदेवी तथा कमल की जैसी सुगन्ध और कान्ति से युक्त स्वर्ग की देवाङ्गनाओं को भी प्राप्त नहीं हुई, तो फिर अन्य स्त्रियों के सम्बन्ध में क्या कहा जाये? (GVP)

#4
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.61)

मैं तो ऐसी प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस श्रीवृन्दावन में कोई गुल्म-लता या औषधि-जड़ी-बूटी रूप में जन्म ग्रहण करूँ, जिससे मुझे उन ब्रजाङ्गनाओं की चरणधूलि निरन्तर सेवन करने को मिलती रहे। उन ब्रजगोपियों ने दुस्त्यज (जिसे छोड़ना अत्यन्त कठिन है) स्वजन-सम्बन्धियों तथा वेद की आर्य-मर्यादा को परित्यागकर श्रीगोविन्द के उन चरणकमलों का भजन किया है, जिन्हें श्रुतियाँ अभी तक भी खोज रही हैं। (GVP)

We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.