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Sri Brhad-Bhagavatamrta 1.6.57-68: Krsna’s Longing for Vraja

01:13:17
#246
Vrndavana
Lecture
Hindi
English
Bengali
Srila Gurudeva 80%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Discussion of verses 57–68 from Canto 1, Chapter 6 of Sri Brhad-Bhagavatamrta, revealing the inner heart of Sri Krsna.
  • Srimati Rukmini and Satyabhama discuss the profound pain of separation Krsna feels from Vraja and the gopis.
  • Every night, Sri Krsna weeps in the solitude of His palace in Dvaraka, overwhelmed by remembrance of the Vrajavasis. Reaction of the Dvaraka queens towards this.
  • Sri Baladeva Prabhu becomes upset with Krsna for avoiding a return to Vraja, despite the Vrajavasis’ unbearable sorrow. He and Mother Rohini pleaded with Krsna to go to Vraja to pacify the hearts of the vrajavasis, but Krsna sidestepped their requests.
  • Baladeva's visit to Vraja
  • Srila Gurudeva unveils the deeper reasons behind Krsna’s decision to stay in Dvaraka: to protect Vraja from demonic attack; to avoid inflaming the gopis’ grief by leaving again; and to glorify their transcendental love, so the world might one day aspire for such divine bhakti.
  • Pariksita Maharaja's question — how could the Supreme Personality of Godhead cry like a mere mortal? The answer: Krsna is eternally conquered by the pure love of His devotees. His tears are not weakness, but the highest expression of prema.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.6.57-68: ब्रज के लिए कृष्ण की तड़प

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 29 अगस्त, 2003 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मैंने बतलाया था कि रोहिणी मैया की बात सुनकर रुक्मिणीजी बोलीं– “आर्यपुत्र का हृदय कितना कोमल है, मक्खन से भी [अधिक,] आप नहीं समझतीं। इसलिये आप [कृष्ण के लिए निष्ठुर, अकृतज्ञ आदि कठोर वचन कह रही हैं।” रुक्मिणीजी ने] और किस प्रकार से बतलाया? [रुक्मिणीजी बोलीं–] “रात में वे कैसे हमारे वस्त्रों को खींचकर ‘हे ललिते! हे विशाखे!’ [पुकारते हैं,] कभी गइया चराने का भान करते हुए गायों को बुलाते हैं, कभी नन्द-यशोदाजी को बुलाते हैं, स्वप्न में ही बुलाते हैं।”

इसको सुन करके सत्यभामाजी कुछ रुष्ट हो गईं और सापत्‍न्‍य-भाव से बोलीं। [किन्‍तु] रुक्मिणीजी तो परम गम्भीर हैं। इसलिये उनके [हृदय में] गोपियों के चरणों [के प्रति] श्रद्धा थी। वे [गोपियों के प्रति] सापत्‍न्‍य-भाव नहीं रखती थीं। किन्तु सत्यभामा कुछ राधाजी की छाया हैं, इसलिये उनमें कुछ सापत्‍न्‍य-भाव है। इसलिये वे सह न सकीं और बोलीं- “बहन! ये तुम क्या कह रही हो? यह अनुचित है। हमलोग तो नाममात्र की भार्या हैं। वास्तव में उन गोपियों की दासी की दासी की दासी होना भी हमारे लिए सम्भव नहीं है। जितना कृष्ण उनसे प्रीति करते हैं, [उतनी] तनिक भी प्रीति हम लोगों से नहीं [करते।”]

इतना सुन करके परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं–

अशक्तस्तद्वचः सोढुं गोकुलप्राणबान्धवः।
रोहिणीनन्दनः श्रीमान् बलदेवो रुषाब्रवीत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.57)

[महाराज श्रीपरीक्षित् ने कहा– महिषियों की इन बातों को सुनकर गोकुल और गोकुलवासियों के प्राणों के बन्धु रोहिणीनन्दन श्रीमान् बलदेवजी रोषपूर्वक इस प्रकार कहने लगे।] GVP

परीक्षित् महाराजजी ने कहा– “सत्यभामा की बात सुनकर बलदेव प्रभु, जो गोकुल के प्राण थे, ब्रजवासियों के प्राण थे, उनके प्रिय बान्धव थे, वे रोहिणीनन्दन [कहने लगे।]”

[यहाँ पर परीक्षित् महाराजजी ने] देवकीनन्दन नहीं कहा, रोहिणीनन्दन कहा। श्रीमान् बलदेवजी बड़े रोष के साथ कहने लगे। बलदेवजी ने नहीं कहा कि ‘कृष्ण का हृदय कोमल है।’ [यह तो] सत्यभामा और रुक्मिणीजी ने [कहा था] और उस [बात] को सुनकर बलदेवजी अपने क्रोध को रोक न सके और रोषपूर्वक कहने लगे। क्यों? क्योंकि वे रोहिणीनन्दन हैं, ब्रजवासियों के बड़े प्रिय हैं। ब्रजवासी लोग [उन्हें] अपना प्राण समझते हैं। वे भी ब्रजवासियों को अपना प्राण [समझते हैं।]

बलदेवजी यहाँ (मथुरा अथवा द्वारका में) रहने पर भी अपने को नन्दनन्दन ही समझते थे। वे नन्‍दबाबा को ही [अपना] पिता समझते थे। इसलिये जब नन्दबाबा मथुरा में कृष्ण और बलदेव के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे—[जिस समय] उन दोनों ने कंस [और उसके अनुचरों] का वध किया था— तो [कंस-वध] के पश्चात् नन्दबाबाजी मथुरा नगर के बाहर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय में उस दिन तो वसुदेव, देवकी और उग्रसेन इत्यादि ने उनको आने नहीं दिया। [वसुदेव और देवकी कृष्ण और बलदेव को] कहने लगे– “तुम हमारे पुत्र हो।” किन्तु दूसरे दिन ये दोनों भाई छिप करके वहाँ (नन्दबाबा के पास) आये।

उस समय नन्दबाबा कृष्ण को देखकर बोले– “क्या तुम समझते हो कि तुम मेरे पुत्र नहीं हो? तुम दोनों भाई वसुदेव और देवकी के [पुत्र] हो? भले ही बलदेव कह सकता है कि हाँ, मैं उनका पुत्र हूँ, किन्तु क्या तुम भी यही समझते हो?”

[यह सुनकर] कृष्ण रोने लगे। [तभी] बलदेवजी ने पहले ही [नन्‍दबाबा से] कहा– “आप ही हमारे पिता हैं। पिता वही [होता] है, जो [पुत्र का] पालन करता है। केवल जन्मदाता होने से ही [कोई] पिता नहीं होता। यदि [कोई जन्मदाता] पुत्र को कहीं फेंक दे, उसका पालन-पोषण न करे, उसका त्याग करे—तो [वह पिता नहीं है।] यद्यपि वसुदेवजी हमारे [जन्मदाता] हैं, यह ठीक है, किन्तु वे हमारे पिता नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने तो हमें बचपन में ही त्याग कर दिया। इसलिये मैंने आपको ही पिता के रूप में देखा है। यशोदा को मैया के रूप में, रोहिणी को मैया के रूप में देखा है और मैं वसुदेवजी को पिता नहीं मानता। पिता किसको कहते हैं? पत्नी के पिता को भी [पिता] कहते हैं और गुरु को भी पिता कहते हैं, तो ये सब [भी तो] पिता [कहलाते] हैं। केवल जन्मदाता [होने से] ही तो वे पिता नहीं [हो सकते हैं,] क्योंकि उन्होंने बचपन में ही हमारा त्याग [कर दिया, हमारा पालन नहीं] किया।”

इसलिये ये बलदेवजी ‘रोहिणीनन्दन’ हैं। ये ब्रजवासियों के अत्यन्त प्रिय हैं। वे बड़े रोष से बोले–

वध्वः सहजतत्रत्यदैन्यवार्ताकथापरान्।
अस्मान् वञ्चयतो भ्रातुरिदं कपटपाटवम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.58)

[श्रीबलदेवजीने कहा–अयि वधुओं! हमलोग ब्रजवासियों के सहज दुःखपूर्ण वृत्तान्त के सम्बन्ध में वार्तालाप कर रहे हैं, इसलिये मेरे भ्राता श्रीकृष्ण ने हमारी वञ्चना के लिए इस प्रकार स्वप्न-चरित्ररूप कपट-चातुरी का प्रकाश किया है।] GVP

बलदेवजी बड़े रोष से बोले– “अरे वधुओं! बहुओं! बहुएँ माने कृष्ण की [पत्नियाँ।] हमलोग अभी परस्पर यह कह रहे थे कि ‘ब्रजवासी कृष्ण के विरह में कैसे तड़प-तड़प करके मर रहे हैं, व्याकुल हैं, उनको शरीर की सुध-बुध नहीं है।’ मेरी मैया [अर्थात्] रोहिणी मैया और मैं कह रहा था और तुम लोग भी यह सुन रही थीं। तो भ्राता कृष्ण अभी घर में पलंग के ऊपर में सोये हैं और ये रुक्मिणी कह रही है कि वे रो रहे हैं, कपड़े (पीताम्बर) से अपना मुख ढककर रो रहे हैं। [किन्‍तु] ये सब हमारी वञ्‍चना [करने] के लिए है, हमें ठगने के लिए है। वे बड़े कठोर और क्रूर हैं। इतने क्रूर हैं कि बार-बार हम लोगों ने कहा—हमारी मैया [ने कहा] और मैंने भी कहा कि ब्रज के लोग, ब्रज की गायें, ब्रज के पशु-पक्षी सब उनके [विरह में] तड़प-तड़प करके मर रहे हैं— [फिर भी] उनका हृदय [तनिक भी] नहीं पसीजा। ये तो केवल हमको ऊपर से ठगने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं। अरे! व्यवहार ही [भावना को व्यक्त करता है,] कार्य ही कारण का प्रतीक होता है। उनके भीतर की भावना क्या है—ये कैसे [प्रकट] होगा? उनके व्यवहार से पता चलता है। यदि वे cruel (क्रूर) नहीं होते, तो हमारी बातें सुन करके अन्‍तत: एक बार तो ब्रज में जाते, ब्रजवासियों को सान्‍त्वना देकर आते। अरे वधुओं! हम लोग [यहाँ] ब्रज की बातें कर रहे थे और भ्राता वहाँ से सुन रहा है [और] सुन करके [केवल] ठगने के लिए ही मुख ढक करके रो रहा है। वास्तव में रो नहीं रहा है, वह तो [केवल] अपनी चातुरी प्रकाश कर रहा है।”

[बलदेवजी ने कहा–] “तत्र मासद्वयं स्थित्वा– मैंने स्वयं कितनी बार इसको [कहा कि] मेरे साथ में एक बार चलो। देख तो आओ, उनको कुछ सान्‍त्वना मिल जायेगी। [किन्‍तु] वह माना नहीं और मुझे भेज दिया। मैं ब्रज में गया और वहाँ दो महीने रहा। विविध प्रकार के प्रबोध वाक्यों से ब्रजवासियों को सान्‍त्वना देने की चेष्टा की।” कैसे? कैसे-कैसे चेष्टा की?

[बलदेवजी] ब्रजवासियों के साथ में दो महीने रहे। नन्दबाबा के पास रहे, गोपियों के पास [रहे], यशोदा मैया के पास में रहे। उन [सब]को सान्‍त्वना देने की चेष्टा की। बसन्‍त ऋतु में गये और वहाँ प्रबोध-वाक्यों [से उनको सान्‍त्वना देने की चेष्टा की।] माने क्या? व्यवहार से और वचनों से भी प्रबोध।

व्यवहार से माने? — मैया के पास रहना, पिताजी के पास में रहना, वहाँ खाना-पीना [करना।] और गोपियों को भी व्यवहार से सान्‍त्वना देना। [यहाँ तक कि उन्होंने] गोपियों के साथ में रास भी किया। किसलिये? उनको सन्तुष्ट करने के लिए कि वे अपने दुःख को भूल जायें।

[बलदेवजी रुक्मिणी आदि महिषियों से कहने लगे–] “मैंने शपथ खाकर [गोपियों से] कहा था कि अवश्य ही कृष्ण को ले करके आऊँगा। इस प्रकार से आचरण करके, मैंने वहाँ रह करके, रासलीला करके, उनको तरह-तरह से प्रबोध वाक्य दिये और समझाने की चेष्टा की। किन्तु [हुआ क्या?] उनकी विरह की आग और [अधिक] भभक उठी। मानों उनको याद कराने से कृष्ण की और [अधिक] स्मृति आयी और वे तीव्र विरह के साथ में तड़पने लगीं। इसलिये मैं यह समझा हूँ कि [जब तक मेरा] यह भाई [स्वयं] वहाँ नहीं जायेगा, तब तक उनको सान्‍त्वना नहीं होगी और [वे इसी तरह] विरह में तड़पती रहेंगी। इसलिये जब मैं वहाँ से आ रहा था, तो उन लोगों ने मुझे आने नहीं दिया। मैं तो शपथ खाकर, जबरदस्ती [आया।] मैंने हजारों बार शपथ खायी कि ‘मेरे लिए विश्व में सबसे बड़ा, मेरा प्रिय भाई है—उसकी शपथ लेकर, सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि बहुत शीघ्र ही उसको ले करके आऊँगा।’ मैंने गोपियों से कहा—‘समझो कि मैं उसको लेकर आ ही गया हूँ।’ तब [जाकर वे] कुछ सन्तुष्ट हुईं और प्रतीक्षा करने लगीं कि कब बलदेवजी हमारे कृष्ण को लेकर [आयेंगे।”]

[15:01-27:21 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद और कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [ब्रज से लौटने के पश्चात्] बलदेवजी ब्रज के गोप-गोपियों की विरह की वार्ता को सुनाकर कृष्ण से बोले– “भैया! यदि तू ब्रज में नहीं जायेगा, तो वहाँ के पशु-पक्षी, कीट-पतंग कोई भी [जीवित] नहीं बचेंगे। वे सभी [तेरे विरह में] तड़प-तड़पकर मर जायेंगे। इसलिये कोई भी बहाना बना करके [अवश्य ही ब्रज में] जाओ। क्या बहाना? जैसे दन्तवक्र को मारने का बहाना बनाओ या और कोई बहाना बनाओ। कुरुक्षेत्र-[यात्रा] का बहाना बना करके [अथवा] जैसे भी हो, कोई भी बहाना बना करके [ब्रज में] जाओ। नहीं तो नन्दबाबा, यशोदा [मैया] और ब्रजवासियों को तुम किसी तरह से जीवित नहीं देख सकोगे।”

[बलदेवजी रुक्मिणी आदि महिषियों से कहने लगे–] “मेरी बात को सुनकर वह कहता तो है कि ‘मैं जाऊँगा, मैं अब चलने के लिए प्रस्तुत हो जाऊँगा।’ किन्तु उसके हृदय का भाव—अन्‍तर और बाहरी अलग-अलग हैं, एक नहीं हैं। यदि [वास्तव में] जाने की इच्छा होती, तो किसी-न-किसी प्रकार से बहाना बनाकर [अवश्य] ही जाता। किन्तु क्यों नहीं जाता? जाता क्यों नहीं? इसलिये कार्य के द्वारा हृदय के भाव की अभिव्यक्ति होती है। जैसे हृदय में भाव होगा, वैसे ही बाहर में अभिव्यक्ति होगी। मैं तो ये कहते-कहते थक गया [किन्‍तु वह] नहीं गया। और [अब तो] लज्जा के मारे मैं भी मुख दिखलाने के लिए ब्रज में फिर नहीं जाऊँगा, लज्जा के कारण। मैं नन्दबाबा, यशोदा मैया और गोप-गोपियों को कौनसा मुख दिखलाऊँगा?”

बलदेवजी ने बड़े रोष से, किन्तु द्रवित चित्त से इस प्रकार से कहा कि रुक्मिणी के घर में जो पलंग के ऊपर में [कृष्ण] सोये थे, वे अब सो नहीं सके। रोते-रोते वे बिछौने से उठे और जहाँ ये सब निगूढ़ बातें कर रहे थे, वहीं पर उपस्थित हुए और बड़े ज़ोर से रोने लगे।

[कृष्ण] बहुत ज़ोर से रोये। किसलिये रो रहे हैं? [क्योंकि] ब्रज की याद आ रही है—नन्दबाबा की, यशोदा [मैया] की याद आ रही है और ब्रजवासियों की याद आ रही है। वहाँ से कभी-कभी सन्देश भी आ रहे हैं।

एक हंस के माध्यम से ललिता सखी कृष्ण को सन्देश भेज रही हैं। कौन-कौन रास्ते से हंस जायेगा ये रास्ता भी [उसको] बतला रही हैं। [ललिताजी] हंस को रास्ता बतला रही हैं— “देखो, वंशीवट की ओर से जाना, [किन्‍तु] उसको दूर से प्रणाम करना, [उसके] निकट में मत जाना। क्यों? वह वृक्ष कृष्ण के विरह में अब सूख रहा है। जहाँ [पहले वह] सदा पल्लवित और पुष्पित रहता था, जहाँ पर हजारों पशु-पक्षी शरण ले रहे थे, [अब] वह क्रमश: लुप्त हो रहा है। [और अब वह] मानो उच्च स्वर से सिर [उठाकर] देख रहा है कि कृष्ण क्यों नहीं आ रहे हैं?”

[ललिताजी हंस से कहतीं—] “भाण्डीरवन में जाकर भाण्डीरवट को देखना और उनको प्रणाम करना। किसलिये प्रणाम करना? [क्योंकि वहाँ पर] कृष्ण की सब लीलाएँ हुईं। [मथुरा पहुँचकर] कृष्ण को स्मरण कराना कि [क्या उनको] भाण्डीरवन की बातें याद नहीं हैं? वहाँ पर गान्धर्व-विवाह हुआ था, वहाँ पर मल्ल-क्रीड़ा में श्रीमती राधिकाजी ने उनको परास्त किया था, उनका मधुर पराजय हुआ—ये सब उनको स्मरण कराना। [कृष्ण को] गोवर्धन की बातों का स्मरण कराना। तुम गोवर्धन के मार्ग से जाना। इस तरह से ऊधा (जिस समय उद्धवजी कृष्ण का सन्देश लेकर मथुरा से नन्दगाँव आ रहे थे, उस समय रास्ते में उन्होंने यहाँ कुछ देरतक विश्राम किया था। इसलिये उद्धवजी के ठहरने से इस स्थान का नाम ऊधा हआ है।) इत्यादि ये सब गाँव हैं, उन सब से होते-होते मथुरा में जाना।”

इस तरह से ललिताजी कह रही हैं। कृष्ण को और क्या कहना? “यदि कुछ दिन में नहीं लौटोगे तो देखोगे कि इनका ये विरह-ज्वर ही इन्हें जला करके भस्म कर देगा। उनको आग की आवश्यकता नहीं होगी। उनकी विरह-अग्नि ही उनको जला करके भस्म कर देगी।” इस तरह से [ललिताजी हंस के माध्यम से] उनको संवाद दे रही हैं। इस प्रकार से कृष्ण को ये सबका स्मरण हुआ और स्मरण करके बड़े ज़ोर से रोने लगे। जैसे बच्चे रोते हैं, उस प्रकार से [वे रोने लगे।]

बलदेवजी कह रहे हैं– “बड़ा निष्ठुर! यह [केवल] दिखलाने के लिए रो रहा है। अभी भी ये [झूठमूठ] रो रहा है।”

और रोहिणी मैया देख रही हैं– “नहीं, ये झूठमूठ का बहाना कर रहा है।”

किन्तु [वास्तव में] कृष्ण परम अनुग्रहशाली हैं। कृष्ण बड़े कृपालु हैं। [तो फिर] क्यों नहीं गये [ब्रज में]? इसका कारण हमने पहले [भी] बतलाया था। यदि उसी अवस्था में [वे ब्रज में] जायेंगे, तो [उस समय] जरासन्‍ध का आक्रमण हो रहा था। और यदि वे जाते तो जरासन्‍ध समझता कि ब्रज के नन्‍दबाबा ही उनके पिता और यशोदाजी ही माता हैं। [और तब वह] वहीं पर आक्रमण करता। वहाँ पर न किला, न सैनिक, न कुछ [सुरक्षा]—सारे ब्रज को [जरासन्‍ध] नष्ट-भ्रष्ट कर देता।

और किसलिये [कृष्ण ब्रज में नहीं गये?] उसमें एक गूढ़ रहस्य था। क्या? [यदि कृष्ण] ब्रज में जायेंगे, तो [क्या वास्तव में] गोपियों को सान्‍त्वना मिल जायेगी? [नहीं।] बाद में ये सब बोलेंगे। गोपियों का विरह-ज्वर और बढ़ जायेगा। [वह कैसे?] जैसे एक जलते हुए लाल तवे के ऊपर में एक बूँद पानी छिटक दिया जाये, तो उसका वाष्प (vapour) जो उठता है, किसीको लग जाये, तो फफोले पड़ जाते हैं। उसी प्रकार से गोपियों का विरह अत्यन्त अधिक है। इसलिये [कृष्ण के] एक दिन जाने से शान्त नहीं होगा। तो फिर वहीं रहें। तो जितने दिन रहेंगे, गोपियों को और इतना विरह होगा कि उनको कृष्ण शान्त नहीं कर सकते। वह [कृष्ण ने] प्रेम-सरोवर और [अन्य] जगहों में [प्रत्यक्ष] देखा।

राधिकाजी कृष्ण की गोदी में रहते हुए भी भावी-विरह में छटपट करती हुईं कृष्ण को भूल गयीं, अपने को भूल गयीं—‘मैं कहाँ हूँ? कृष्ण कहाँ हैं?’ [इस दशा को देखकर कृष्ण ने समझा कि] ‘मैं [इन्‍हें] सान्‍त्वना नहीं दे सकता।’

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी ने अपनी टीकाओं में यह बतलाया तो है, किन्तु मैं नहीं जानता था कि श्रील सनातन गोस्वामी ने पहले ही उसकी भूमिका रचकर उनके लिए क्षेत्र प्रस्तुत [कर दिया है।] मूल गुरु श्रील सनातन गोस्वामी हैं; इन्हीं के भावों को हमारे श्रील जीव गोस्वामी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर और [अन्य रूपानुग-वैष्णवों ने विस्तार किया है।] मूल में यही श्रील सनातन गोस्वामीजी ही हैं।

तो ये सनातन गोस्वामीजी अपने भावों को प्रकट कर रहे हैं कि कृष्ण में यह एक ऐसी बात है कि यदि वे ब्रज में रहेंगे, तो गोपियों को, विशेषकर [श्रीमती राधिकाजी को] दुःख ही दुःख होगा— [उन्हें] सान्‍त्वना मिल ही नहीं सकती। क्योंकि अधिरूढ़ के बाद में मादनाख्या-भाव में वे ऐसे दिव्योन्माद [की अवस्था में पहुँच जाती हैं कि] जल्प, प्रजल्प आदि में व्यस्त हो जाती हैं। [उस समय] उनका मरना और बचना एक समान है। इसलिये [कृष्ण] जान-बूझकर [ब्रज में] नहीं जाते हैं। वे बहाना करते हैं कि उनके [अभी] कुछ और शत्रु हैं, उन्हें मारकर तब ब्रज में जायेंगे। किन्तु बात यह नहीं है। ये ऊपर की बात है। [वास्तव में] विरह की बात है—गोपियों को सान्‍त्वना तो दे ही नहीं सकते, बल्कि [उनके जाने से] उनका विरह का ताप और भी बढ़ जायेगा। इसलिये कृष्ण बड़े अनुग्रही हैं।

[कृष्ण] व्याकुल हैं, किसलिये? [क्योंकि] वे चाहते हैं कि विश्व में गोपियों की महिमा का प्रचार हो। मुझसे मिलन में उन्हें जितना आनन्द है, [उतना ही] विरह में फिर वह ज्वाला है—इस वस्तु को जगतवासी लोग समझें। इसलिये वे इन लीलाओं को अपने पीछे छोड़ जाते हैं और शुकदेव गोस्वामी जैसे भक्तों को भी छोड़ जाते हैं [अर्थात्] भक्त-भागवत और ग्रन्‍थ-भागवत [को छोड़ जाते हैं,] जिससे कि लोग उसे सुन करके इस विषय से परिचित हों और उनको उस विषय में लोभ उत्पन्न हो कि गोपियों का प्रेम कैसा है। और जिनको लोभ है, उनको क्या होगा? वे उस वस्तु को अनुभव करें। और जो अनुभव करते हैं, उनके भाव भी ठीक गोपियों जैसे हो जायें– इसके लिए। इसलिये कृष्ण बड़े दयालु हैं। वे एक ही साथ में कितने-कितने कार्यों को कर रहे हैं ‘एक लीलाय प्रभु करे पाँच-सात कार्य’ वे बहुत से कार्यों को एकसाथ [करते हैं।]

इसलिये आज कृष्ण उनके विरह में अपनी आँखों से आँसुओं की झड़ी लगा रहे हैं। वह रोना बन्द नहीं होता और गद्‍गद स्वर से, [शब्द] निकल नहीं रहे, तो भी सावधानी के साथ में भगवान् कह रहे हैं। [यहाँ ‘भगवान्’ शब्द का प्रयोग] क्यों [हुआ]? ये भगवान् हैं। यहाँ पर ‘भगवान्’ शब्द का उल्लेख किया। भगवान् होने पर भी वे प्रेम के इतने वशीभूत हो जाते हैं कि ये नहीं समझते हैं—‘मैं स्वयं ब्रह्म हूँ।’ वे यह भूल जाते हैं। वे केवल यही [मानते हैं]—‘मैं यशोदानन्दन हूँ, गोपीनाथ हूँ, राधानाथ हूँ।’

तब कृष्ण रोते हुए बोले— “सचमुच बलदेव भैया जो कह रहे हैं, रोहिणी मैया जो कह रही हैं, [यह] अक्षरश: सत्य है। मेरा हृदय वज्र का बना हुआ है। यदि वज्र का नहीं होता तो क्या होता? मेरा चित्त द्रवित हो जाता और उनका विरह [सहन] न कर सकने के कारण मैं भी मर जाता; किन्तु वज्र का हृदय होने से मेरा हृदय दो टुकड़ों में विभक्त नहीं होता। ब्रजवासियों ने बचपन से ही मुझे पाला और ऐसे पाला! कैसे पाला? जैसे आँख की पुतली हो। [उन्होंने] अपने दुःख में भी दुःख नहीं समझा। उन्‍होंने अपने दुःख को दूर करने के लिए कोई चेष्टा नहीं की। सब समय भगवान् से प्रार्थना की, गिरिराजजी से प्रार्थना की, नारायण से प्रार्थना की— “कृष्ण की रक्षा करो।” इस प्रकार से वे सब समय उसीकी चेष्टा में लगे रहे।”

यशोदा मैया कृष्ण को ठीक रखने के लिए योगमाया-पूर्णिमा के परामर्श से प्रतिदिन जावट से राधाजी को बुलाया करती थीं। [राधाजी] रसोई करने के लिए जा रही हैं—[किसी] दूसरों की बहू को नहीं बुलाना चाहिये, किन्तु [यशोदा मैया] किसलिये बुला रही हैं? वे लोक-लज्जा की परवाह छोड़ करके कि लोग क्या कहेंगे, उनकी सास क्या कहेगी, [वे राधाजी को कृष्ण के लिए रसोई बनाने के लिए बुलाती हैं।] घर के जितने रूपये-पैसे, द्रव्य, सोने-हीरे-जवाहरात के अलंकार सब भेज देतीं। किसलिये? “कृष्ण मेरा ठीक रहे, स्वस्थ रहे।”

उनका प्रेम असाधारण है—साधारण नहीं, लौकिक लोगों की भाँति नहीं। ऐसे प्रेम के उदाहरण केवल वही हैं, दूसरा कोई नहीं। कोई दूसरा नन्दबाबा के, यशोदा मैया के समकक्ष नहीं हो सकता। कोई दूसरा गोपियों के समकक्ष नहीं हो सकता।

[कृष्ण रोते हुए कहने लगे—] “मैंने जीवनभर [इन्‍हें दुःख ही दिया है।] इन गोप-गोपियों ने [मेरा] पालन-पोषण किया, [मुझे] आँखों की पुतली की भाँति रखा, [किन्‍तु] मैं जब तक [ब्रज में रहा] उनका कोई भी हित साधन नहीं कर सका—उनकी भलाई के लिए, कल्याण के लिए, सुख के लिए कुछ न कर सका। ये बलदेव भैया ठीक कह रहे हैं, रोहिणी मैया भी ठीक कह रहीं हैं [कि मैंने] क्रूर और निष्ठुर हो करके मृदुल स्वभाव की गोपियों को बहुत दुःखी किया, केवल दुःख दिया। वहाँ पर रहते हुए भी दुःख दिया और सबसे अधिक अब यहाँ रह करके भी मैं दुःख ही दे रहा हूँ। वे तड़प रही हैं—मैं सुन रहा हूँ। ‘आमाइ जे दो भाइया, मइया जन अकुलायन्ते’—[अरे! दोष तो मुझमें ही है, इसलिये मैया व्याकुल हो रही हैं।”]

‘मैं आऊँगा’—[कृष्ण] ये तो कह रहे हैं और सन्देश [भी] भेज रहे हैं, [किन्‍तु कब आयेंगे?] ब्रज से किसीने सन्देश भेजा—“तुम्हारी गइयाँ सब मर रही हैं। [यशोदा] मैया भी आकुल-व्याकुल होकर मर रही हैं। नन्दबाबा अब चलने-फिरने में अशक्त हो गये हैं।”

[यह सुनकर कृष्ण] वहाँ से सन्देश तो देते हैं— “हम दोनों भाई आयेंगे। गइयों की थोड़ी-सी रखवाली करना, गइयाँ न मर जायें, बछड़े न मर जायें। मैं बहुत शीघ्र आ रहा हूँ।” किन्तु वे आये कब?

इस प्रकार से [कृष्ण] कह रहे हैं—“मैंने उन लोगों को सदा दुःख दिया; अब भी दुःख ही दे रहा हूँ। ब्रजवासियों को मेरे [कारण] कितना [कष्ट सहना पड़ा।] अघासुर से, बकासुर से, तृणावर्त से, पूतना से, शकटासुर से, केशीदैत्य इत्यादि सबसे कितने दुःख सहने पड़े। [वहाँ रहकर] उनको उस तरह से दुःख दिया और अब मैं वहाँ से आ करके भी उनको दुःख दे रहा हूँ। भाई! उद्धव तुम सर्वज्ञ हो और मेरे बड़े प्रिय हो। मेरे हृदय को जानते भी हो—अब बतलाओ, मैं क्या करूँ?”

भ्रातरुद्धव सर्वज्ञ प्रेष्ठश्रेष्ठ वद द्रुतम्।
करवाणि किमित्यस्माच्छोकाब्धेर्मां समुद्धर॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.68)

[हे भ्राता उद्धव! तुम सर्वज्ञ हो तथा मेरे भी अत्यन्त प्रिय हो। जल्दी से कहो, अब मैं क्या करूँ? इस शोकसागर से मेरा उद्धार करो।] GVP

हे उद्धव! तुम मेरे बड़े प्रिय हो और तुम वहाँ पर गये भी हो और तुम सब जानते हो। इसलिये मुझे बतलाओ... और सर्वज्ञ हो, सर्वज्ञ माने मेरे हृदय की बात और उन गोप-गोपियों की बातों को जाननेवाले हो, शीघ्रता से बोलो कि मेरे लिए क्या कर्तव्य है? मैं क्या करूँ? तुम मेरा शोक-सागर से उद्धार करो। ‘समुद्धर’ — शोक-सागर से उद्धार करो।

परीक्षित् उवाच। परीक्षित् जी कह रहे हैं

You can speak.

[44:20-53:02 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परीक्षित् उवाच।

इसके बाद परीक्षित् महाराजजी बोले—

नन्दपत्नी-प्रियसखी देवकी पुत्रवत्सला।
आहेदं दीयतां यद्यदिष्यते तै: सुहृत्तमैः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.69)

[इसके पश्चात् श्रीनन्द महाराज की पत्नी श्रीयशोदाजी की प्रियसखी पुत्रवत्सला श्रीदेवकीजी ने कहा– ‘वे सुहृत ब्रजवासी जो-जो अभिलाषा करें, तुम उनकी उन सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करो और वे जो कुछ भी चाहें, उन्हें प्रदान करो।’] GVP

अभी उद्धवजी ने उत्तर नहीं दिया था। कृष्ण ने उनसे कहा– ‘तुम बतलाओ कि क्या करना चाहिये?’ और वे कुछ बोलने ही वाले थे कि इतने में देवकीजी बीच में ही [बोल पड़ीं।] क्यों? [उनके बीच में] बोलने का कारण यह था कि उद्धव तो यही कहेंगे कि ‘ब्रज में चलो। तुम्हारे बिना वह कार्य कोई नहीं कर सकता।’ और यदि कृष्ण वहाँ पर चले गये, तो फिर लौट नहीं सकते—कभी [भी] नहीं लौट सकते। किसीको यदि कोई काम होता है तो वह वहाँ से काम करके लौट आता है। इसलिये [कृष्ण] किसी काम से आये थे—कंस को मारने के लिए और अपने पिताजी-माताजी को कैद से छुड़ाने के लिए। तो इसके बाद तो जाना ही चाहिये था। किन्तु ब्रज में [कृष्ण को] कोई काम नहीं है। [वहाँ] क्या है? सब समय [केवल] रस का आस्वादन। इसलिये कृष्ण वहाँ जाने के बाद में काम करके लौट आयेंगे– यह तो सम्भवपर नहीं। [देवकीजी यह बात] समझ रही हैं। इसलिये [उन्होंने] सोचा– ‘यदि कृष्ण चला गया तो फिर नहीं आयेगा, तो फिर हम अपना जीवन-धारण कैसे करेंगे?’ इसलिये रोने लगीं और रो करके कहने लगीं। [उन्होंने] उद्धवजी को बोलने का अवसर ही नहीं दिया, नहीं तो कृष्ण [उद्धव की बात] सुनकर साथ-ही-साथ चले ही जायेंगे। इसलिये बीच में ही देवकीजी ने टोक करके कहा।

‘नन्दपत्नी प्रियसखी देवकी’— [देवकी,] यशोदा की प्राणप्रिय सखी हैं, यह तो बात ठीक है; किन्तु साथ-ही-साथ वे पुत्रवत्सला भी तो हैं। इसलिये प्रियसखी को दरकिनार करके उनकी थोड़ी-सी उपेक्षा करके सोचा—“हमारे लिए अपने पुत्र को छोड़ना तो असम्भव है।” इसलिये वे उनको कुछ भूल गईं। [उन्होंने] यशोदाजी के इस दुःख को नहीं देखा कि वे भी अपने पुत्र के लिए मर रही हैं—ये नहीं सोचा। [उन्‍होंने स्वार्थी होकर यही सोचा—] “हम कैसे बचे रहेंगे?

यशोदाजी निःस्वार्थ हैं। उन्होंने देखा कि यदि हमारे पुत्र को अपना पुत्र मान करके वे लोग सुखी हैं, [तो वे] सुखी रहें—इसलिये उन्‍होंने कुछ नहीं कहा। [भीतर] में तड़पती हुई मर रही हैं, नन्दबाबा की भी वैसी [अवस्था है,] किन्तु इन लोगों (देवकी–वसुदेव) के लिए [ऐसा निःस्वार्थ भाव] सम्भव नहीं। इसलिये जब भी कृष्ण ब्रज में जाने के लिए प्रस्तुत होते, तो देवकीजी रोने लगती थीं और वसुदेवजी भी रोने लगते थे। ब्रजवासियों का दुःख इन लोगों ने कभी भी अनुभव नहीं किया। अनुभव करके भी इनका [कृष्ण के प्रति] ऐश्वर्यज्ञान है। इसलिये वे कुछ कर न सके।

[उन्हें यह भय सताने लगा]—कृष्ण कहीं चला न जाये, [क्योंकि] वहाँ तो केवल प्रेम का आस्वादन है, इसलिये वहाँ से वह लौटेगा नहीं।” ये समझ करके उनका हृदय विदीर्ण हो गया और वे पहले ही कहने लगीं। क्या कहने लगीं?

“‘आहेदं दीयतां यद्यदिष्यते तै: सुहृत्तमैः’ —वे हमारे परम सुहृद हैं। यशोदा मेरी प्रिय सखी है और नन्‍द मेरे पति वसुदेवजी के भी परम सुहृद भैया हैं—नन्द बड़े भैया हैं। इसलिये वे जो कुछ चाहते हैं, उनको दे दो।” “किन्तु जाना मत”– ये नहीं कहा। [यह भाव] भीतर ही भीतर है।

“जो कुछ देना है, जो कुछ वे चाहती हैं और चाहते हैं– सब कुछ दे दो।” और [“किन्तु जाना मत” –यह भाव मन के] भीतर में ही रखा।

ततः पद्मावती राज्यदानभीता विमूढ़धी:।
महिषी यदुराज्यस्य वृद्धा मातामही प्रभो:॥
अप्युक्ताश्रवणात् पूर्वं राममात्रावहेलिता।
स्वभर्त्तू रक्षितुं राज्यं चातुर्यात् परिहासवत्॥
व्याहारपरिपाट्यान्यचित्ततापादनेन तम्।
यदुवंश्यैकशरणं विधातुं स्वस्थमब्रवीत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.70-72)

[यह सुनकर श्रीउग्रसेन की महिषी, श्रीकृष्ण की मातामही, मूढ़मति वृद्धा पद्मावती, जो पहले श्रीबलराम की माता श्रीरोहिणीदेवी के द्वारा उपेक्षित होने पर भी, इस भय से कि कहीं श्रीकृष्ण व्रजवासियों को सारा राज्य न दे दें, अपने पति श्रीउग्रसेन के राज्य की रक्षा के लिए और यह समझकर कि ऐसा करने से यदुवंशियों के एकमात्र आश्रय श्रीकृष्ण का चित्त दूसरी ओर लगकर स्वस्थ हो जायेगा, परिहास करती हुई चतुरतापूर्वक इस प्रकार कहने लगी।] GVP

ओह! पद्मावती, वही पद्मावती–कंस की माता। ‘विमूढ़धी:’– कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान नहीं, मूर्ख। ‘राज्यदानभीता’– कहीं कृष्ण सारा राज्य दान [न कर दें।] राजपाट, धन-दौलत, खजाना—जो कुछ है—सब ब्रजवासियों को न दे दें। इसलिये वह बहुत भयभीत हो गयी। ये यदुराज उग्रसेन की महिषी थी और परम वृद्धा थी और प्रभु जो कृष्ण हैं, उनकी मातामही थी। उसने सोचा—“कहीं यदि [कृष्ण ने ब्रजवासियों को] राज्य दे दिया तो हम लोग यहाँ रह करके क्या करेंगे?” किन्तु ये मूर्ख नहीं जानती कि ब्रजवासियों को धन नहीं चाहिये। इसलिये [पद्मावती को] मूर्ख कहा। ब्रजवासियों को क्या चाहिये? [उन्‍हें] बस कृष्ण चाहिये और किसी तरह से वे सन्तुष्ट नहीं हो सकते।

[जगन्नाथ पुरी में] हेरा-पञ्‍चमी के दिन श्रीवास पण्डित और स्वरूप दामोदर—इन दोनों [के बीच] वृन्दावन की सम्पत्ति के [सम्‍बन्‍ध में] वार्तालाप हो रहा है। स्वरूप दामोदर [कह रहे हैं—] “तुमको याद नहीं आता कि वृन्दावन में क्या है? वहाँ के जो तरु-लताएँ हैं, वे [सब] कल्पतरु हैं; उनसे सारी इच्छाएँ पूर्ण हो सकती हैं। किन्तु [गोपियाँ] क्या करती हैं? उनके पत्तों से, पुष्पों से, मञ्‍जरियों से अपने सिर को सजाती हैं अथवा अपने पैरों में सजाती हैं। इसके अतिरिक्त उनको कोई भी आवश्यकता नहीं है।” जहाँ पर कृष्णप्रेम से वे धनी हैं, वहाँ पर उनको क्या चाहिये?

महाप्रभुजी कह रहे हैं—

प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र जीवन!
‘दास’ करि’ वेतन मोरे देह’ प्रेमधन!!’’
-श्रीचैतन्यचरितामृत अन्‍त्यलीला (20.37)

[प्रेमधन के बिना दरिद्र जीवन व्यर्थ है। प्रभो! आप मुझे सेवक के रूप में ग्रहणकर वेतन के रूप में अपना प्रेमधन प्रदान करें!!] IGVP

ब्रजवासियों को किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं है। महाराज नन्द तो राज्य से [सर्वथा] उदासीन थे, किन्तु जब कृष्ण पैदा हुए, तो उन्होंने गोवर्धन से प्रार्थना की—“हमको धन दो।” क्यों? [केवल इसलिये कि] कृष्ण का लालन-पालन करना है। वे कृष्ण के पालन-[पोषण] करने के लिए सब कुछ कर सकते हैं।

इसलिये यह मातामही इन विषयों को न जानने [के कारण] मूर्ख है। उसने सोचा कि कृष्ण राज्य दे देंगे और ब्रजवासी सब ले लेंगे—यही [इसकी मूर्खता है।] जैसे एक बच्चे को एक कोई फल दे दो और फिर माँगो, तो देगा? नहीं देगा। जिसने [वह फल] दिया, उसीको नहीं देगा, माता-पिता को भी नहीं लौटायेगा। वह यह नहीं समझता कि इससे भी अधिक हमको दे देंगे। इसलिये ये नहीं समझ रही।

‘अप्युक्ताश्रवणात् पूर्वं राममात्रावहेलिता’— रोहिणी मैया ने उसकी बातों की उपेक्षा की थी [कि ये] मूर्ख है और यह प्रेम समझती नहीं है।

अब पद्मावती अपने पति के राज्य की रक्षा के लिए, और चतुरता से, परिहास की भाँति—कहने लगी। क्या? किसलिये कहने लगी? [पद्मावती ने सोचा—] “कृष्ण अभी बड़े दुःखी हैं। उनके दुःखी होने से सारे द्वारकापुरी के यादव लोग और यादवी (यादव-स्त्रियाँ) भी अत्यन्‍त दुःखी हैं। इसलिये कृष्ण को प्रसन्न करना चाहिये। इसलिये कुछ परिहास उक्ति करना चाहिये।” ऐसा [सोचकर] हँसी-मज़ाक की बातें करने लगी, जिससे कि कृष्ण का चित्त थोड़ा-सा बदल जाये। इसलिये कृष्ण के लिए ऐसा कर रही हैं, कि वे स्वस्थ हो जायें। इसलिये चतुरता के साथ में सिर कम्पन करती हुई “रे! रे! रे! मैं सब समझ गई” — ऐसा करते हुए वह कहने लगी।

[62:36-67:24 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एक बात स्मरण रखो। कृष्ण ने कहा— “मेरा हृदय वज्र का है। ये अभी फट नहीं जाता।” क्यों? कृष्ण ने ये क्यों नहीं कहा कि “मैं बड़ा भारी कृपालु हूँ। गोपियों पर, ब्रजवासियों के ऊपर में कृपा करने के लिए ही ऐसा कर रहा हूँ।” यह बात भी तो ठीक है। कृष्ण उनकी [महिमा] को चारों तरफ में फैलाने के लिए, उनकी प्रतिष्ठा के लिए और उनके लिए ही नहीं जा रहे हैं [क्योंकि कृष्ण के] जाने से उनको और भी दुःख होगा। इसलिये [कृष्ण] ये नहीं कह रहे हैं कि “मैं बड़ा कृपालु हूँ। इसलिये जानबूझ करके नहीं जाता हूँ।” क्या बोले? “ओह! मेरा हृदय वज्र का है। ये सुन करके भी कि सभी लोग मेरे विरह में मर रहे हैं, [तब भी] मेरा हृदय फट नहीं जाता।”

[कृष्ण] दीनता से अपने को ऐसा कह रहे हैं। [इन सब प्रसङ्गों से] शिक्षाएँ लो। अपनी प्रतिष्ठा कभी भी अपने आप मत करो। यदि अपनी प्रतिष्ठा, अपनी प्रशंसा अपने-आप करते हो—मैं बहुत अच्छा बोलता हूँ, मैं बहुत ऐसा करता हूँ—तो वह मरने से भी अधिक है।

भक्त: Sanātana Gosvāmīpāda wrote [this] in his commentary.

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये लिखा है कि जो व्यक्ति अपनी प्रशंसा करता है, वह क्षण-क्षण में मरता है।

भक्त: 69:04 (अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हमने बड़े-बड़े वैष्णवों को देखा है। सनातन गोस्वामी स्वयं जगन्नाथजी के मन्दिर में तो क्या, उस रास्ते में भी नहीं जाते थे और कहते थे कि “मैं दीन-हीन हूँ, मुसलमान से भी बदतर हूँ।” हरिदास ठाकुर से बड़ा कौन होगा? किन्तु [वे दीनतावशतः कभी भी जगन्नाथजी के मन्दिर] नहीं गये। इसलिये दीन-हीनता रहनी चाहिये। खबरदार! अपनी प्रशंसा मत करो और नहीं तो वह व्यक्ति मरे हुए के समान है। युधिष्ठिर महाराजजी का भी देखा, महाभारत की नीतियों को भी देखा, उसमें सब यही कह रहे हैं कि [स्वयं की प्रशंसा करना मृत्यु के समान है।]

खबरदार! मत करो। सबसे बड़ी [दिखायी देनेवाली] प्रतिष्ठा, ये क्या है? शूकरेर विष्ठा। शूकरेर विष्ठा माने क्या?

[Pratiṣṭhā is like the] stool of hogs and pigs. We should try to avoid all these things, otherwise our bhakti will go far away.

[प्रतिष्ठा सूअर के मल के समान है। हमें इन सब वस्तुओं से बचने का प्रयास करना चाहिये, अन्यथा हमारी भक्ति बहुत दूर चली जायेगी।]

इसलिये इसमें जो-जो बाते हैं... कृष्ण के प्रति जिसकी जितनी ममता है, उतना ही [विरह में] उनके लिए दुःख होगा। जिसको कृष्ण के प्रति ममता नहीं है, उसे दुःख भी नहीं होगा। देवकी मैया की कृष्ण के प्रति ममता है, किन्तु किस रूप में है? वे स्वार्थी हैं; और यशोदा मैया की ममता है, किन्तु वे स्वार्थी नहीं हैं। वे अपना सब कुछ लुटाकर भी, [दूसरों] को देकर भी किसी प्रकार से अपने दुःख को सह लेती हैं। इसलिये वैष्णवों को ऐसा होना चाहिये। इसलिये उनका चरित्र सुन करके हमें कुछ-कुछ ग्रहण करना चाहिये। जो ग्रहण नहीं करता है, उसका सुनना व्यर्थ है। ऐसी कथाओं को सुन करके भी जिनका चित्त कृष्ण में नहीं लगता, उनको शत-शत बार धिक्कार है, उनके श्रवण को भी धिक्कार है। कृष्ण के प्रति ममता की वृद्धि हो—ऐसा ही भाव हम लोगों के हृदय में आये।

[71:35-73:10 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एक कीर्तन करो तो।

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