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Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.29-41: Mother Rohini Glorifies the Vrajavasis' Love for Krsna

39:36
#247
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 55%
Barely Audible

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Sri Brhad-bhagavatamrtam, Canto 1, Chapter 6, verse 29-41
  • Uddhava’s visit to Vraja was a deeply transformative experience, during which he realized the glorifies of the gopis as the most fortunate ones, due to their unparalleled love for Sri Krsna.
  • He was struck by the intensity of their devotion, especially in light of how Krsna had left them in Vraja, engaged in His pastimes in Mathura, appearing outwardly indifferent to their mood of separation.
  • Moved by Uddhava’s grief-stricken words, Mother Rohini gently urged him to glorify the unparalleled devotion of the Vrajavasis.
  • She glorified the selfless love of the vrajavasis for Krsna
  • Krsna brought joy to the hearts of the vrajavasis through four expressions of His divine sweetness (madhurya): His enchanting form (rupa), His transcendental qualities (guna), His playful pastimes (lila), and the melodious sound of His flute (venu).
  • Among all devotees, the gopis stand supreme. To illustrate this, he quoted the foundational verse on uttama-bhakti: 'anyābhilāṣitā-śūnyaṁ'

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.6.29–41 : रोहिणी मैया द्वारा व्रजवासियों के कृष्णप्रेम की महिमा का वर्णन

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 26 अगस्त 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धवजी ने भगवान् के कृपापात्रों का सर्वोत्तम भाव सिद्ध करने के लिए यह बतलाया, जबकि रोहिणीदेवी की भी यही इच्छा है। क्या? [यही] कि भगवान् के जो सबसे श्रेष्ठ कृपापात्र हैं, उनकी घोषणा की जाये। कृष्ण के हृदय की भी यही इच्छा है, इसलिये उन्होंने नारदजी को वहाँ बुलाया। नारदजी घूमते-घामते द्वारका तक पहुँचे हैं और यहाँ तक कि रुक्मिणी के राजभवन की देहरी पर पहुँचे हैं। उस समय यह बतलाया कि कृष्ण किसी कारण से बड़े शोकमग्न होकर कपड़े से मुँह ढ़क करके सो रहे हैं।

जब नारदजी ने यह बतलाया कि उद्धवजी भगवान् के सबसे श्रेष्ठ कृपापात्र हैं, तो उद्धवजी ने कहा— “मैं भी ऐसा ही समझता था कि मैं ठीक ऐसा ही योग्य हूँ और मुझसे बढ़कर कृष्ण का कृपापात्र कौन होगा; किन्तु मेरा यह स्वप्न भङ्ग हो गया। जब मैं व्रज में गया, तो मेरा यह भ्रम चकनाचूर हो गया। मैंने देखा कि मैं तो गोपियों की कृपा पाने योग्य भी नहीं हूँ। गोपियों के समान विश्व में कोई भी कृष्ण का प्रिय नहीं है, (3:00 अस्पष्ट) कृष्ण की उन पर बड़ी कृपा है।” इस तरह से [उन्‍होंने कहा।]

यह सुनकर रोहिणीजी कुछ क्रोधित हो गयीं और क्रोधित होकर के बोलीं— “उद्धव, तुम यह क्या कह रहे हो? यदि संसार में कोई दुर्भागिनी या दुर्भागा है, तो वे गोप और गोपियाँ हैं। उनसे [अधिक] दुर्भाग्यशाली इस विश्व में और कोई नहीं है। उनमें कृष्ण के कृपापात्र होने का क्या लक्षण है? क्या लक्षण है? वे दिन-रात विलाप करते हैं, रोते रहते हैं। वे कितने दुःखी हैं! कृष्ण के विरह में इतने दुःखी हो रहे हैं कि प्राण छोड़ रहे हैं। बछड़े दूध नहीं पीते, गायें घास नहीं खातीं और व्रजवासी लोग उनके विरह में तड़प रहे हैं। आज भी मर रहे हैं कि अभी [जीवित]हैं, अगले पल का पता नहीं। जिस समय मैं व्रज से मथुरा आ रही थी, उस समय यशोदाजी कैसा विलाप कर रही थीं! उसे सुन करके पशु-पक्षी तक द्रवित हो गये; पत्थर भी पिघल गये; वज्र भी पिघल गया, किन्तु बस एक व्यक्ति का हृदय नहीं पिघला। वे तुम्हारे सामने सो रहे हैं अर्थात् वे कृष्ण हैं। मैंने वहाँ से आकर कृष्ण से कहा कि गोपियाँ सब मर रही हैं, बछड़े-गाय भी मर रहे हैं और व्रज सूना-सूना हो गया है, मेरा मन नहीं लगता, गोपियाँ (4:58 अस्पष्ट)—सब सूना हो गया। कुछ दिनों के बाद वे सब जीवित रहेंगे या नहीं, यह भी निश्चित नहीं। मैंने [यह सब] कृष्ण से कहा, [किन्तु] उनका चित्त द्रवित नहीं हुआ। और तुम बतला रहे हो कि वे बड़े कृपापात्र हैं!”

कैसे कृपापात्र हैं—[इसे] कैसे सिद्ध करोगे?

भक्त: ये रुक्मिणी कह रही हैं कि पद्मावती कह रही हैं?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रोहिणी मैया [कह रही हैं।] और कैसे?

[वे कहती हैं—] “कृष्ण ने गोपियों और व्रजवासियों के लिए क्या किया? जब तक वे वहाँ थे, उससे पहले से ही मैं व्रज में थी। जब कृष्ण वहाँ पर पैदा हुए, उससे पहले ही मैं गोकुल में थी। इसलिये मैं सब कुछ जानती हूँ। कृष्ण के व्रज से चले आने के बाद भी मैं वहीं पर थी; बाद में [मथुरा] आयी हूँ, इसलिये मैं सब कुछ जानती हूँ। कृष्ण जब तक वृन्दावन में रहे, तब उन्होंने गोपियों और व्रजवासियों के लिए क्या किया? कुछ किया? कोई भी उपकार नहीं किया। और जब बड़े हो गये, तो भी कुछ नहीं किया। जब मथुरा आ गये, तब क्या करेंगे? बड़े-बड़े देवता लोग उनकी वन्दना करते हैं, स्तुति-स्तव करते हैं। अब मथुरा के राजा बन गये, सम्राट बन गये। अब तो गोपियों को भूल गये थे, (6:36 अस्पष्ट) गोपों को, व्रजवासियों को सबको भूल गये थे। नन्दगाँव, बरसाना वृन्दावन, गोवर्धन, राधाकुण्ड—सबको भूल गये थे। ऐसा निष्ठुर व्यक्ति हमने कहीं नहीं देखा।”

यहाँ तक (6:54-7:13 अस्पष्ट)

[7:14-10:36 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धव, तुम क्या जानते हो? मैंने वहाँ रहते समय जो अपनी आँखों से देखा है, वह बतला रही हूँ। जब कृष्ण का जन्म नहीं हुआ था, तब व्रज में कोई भी उत्पात नहीं था, कोई भी उपद्रव नहीं था। सब लोग बड़ी शान्ति और प्रेम के साथ में रह रहे थे। किन्तु जिस दिन से यशोदाजी के गर्भ से कृष्ण का जन्म हुआ, तब से व्रज में नाना प्रकार के उत्पात होने लगे।

क्या हुआ? दो-चार दिनों के बाद ही पूतना नाम की राक्षसी आयी। वह व्रजवासियों के बच्चों को पकड़-पकड़ कर खा जाती, बच्चों का रक्तपान करती। और तृणावर्त्त [आया और इतना] उपद्रव मचाया कि सारे व्रज में धूलि छा गयी, पेड़-उखड़ करके गिरने लग गये, सबकी आँखों में धूल भर गयी, यशोदा मैया बाद में कुछ न कर सकीं। वे रोने लग गयीं और अन्त में एक असुर आकर कृष्ण को, इस [छोटे से] बच्चे को उठा करके ले गया। व्रजवासी लोग अपने लिए दुःखी नहीं हुए। वे किसके लिए दुःखी हुए? कृष्ण के लिए। इसके लिए व्रजवासी बड़े दुःखी हुए थे। शकटासुर [आया।] आकाश [से आकर उसने] शकट के नीचे दबा दिया। तब व्रजवासी लोग कृष्ण को देख करके ऐसे बड़े विरह में व्याकुल हो करके रोने लगे और उनको सम्भालना मुश्किल हो गया।

उसके बाद अजगर [आया] कौन? अघासुर। [वह भी] व्रज में उत्पात करने लगा। वह सबको निगलने लगा और व्रजवासियों के बच्चों को भी निगल गया और उनकी गाय-बछड़ों का जो भोजन था, उनको भी निगल गया। इस प्रकार व्रज में उपद्रव होने लग गये। और भी [उपद्रव हुए—] यमलार्जुन-भञ्‍जन। कृष्ण बच्चों के साथ खेल रहे थे। तब ओखल को खेंचते हुये बाहर आये तब ये कंस के अनुचर, वे कौन? यमलार्जुन—नलकूबर और मणिग्रीव, जो शापग्रस्त थे, वे यदि कृष्ण के ऊपर में गिर जाते, तो न जाने क्या हो जाता? और [उन वृक्षों के गिरने से] हजारों बच्चे दब कर मर जाते, किन्तु भगवान् ने रक्षा क्यों की? इसी प्रकार व्रजवासियों ने कृष्ण की बात मानकर इन्द्र की पूजा छोड़ दी और गोवर्धन की पूजा की। उस समय इन्‍द्र ने सारे व्रज में मूसलाधार वृष्टि कर दी। इन्द्र सबको चकनाचूर कर देना चाहता था। सब व्रजवासी लोग डूबने लगे और बड़ी ठण्ड से काँपने लगे। यह सब किसके लिए हुआ? यह सब तुम्हारे प्रभु के कारण ही हुआ।

इसके अतिरिक्त कालिय नाग [आया।] वह क्या कर रहा था? किसलिये? वह भी कंस के द्वारा भेजा गया था—ऐसा उसमें कह रहे हैं। ये भी एक महानाग था। वह व्रजवासियों का इतना वैरी हो गया कि कितने व्रजवासी लोग और उनके गाय-बछड़े भी [उसके विष के प्रभाव से पीड़ित होने लगे, और यमुना का जल तक विषाक्त हो गया।] किसलिये? ये तुम्हारे प्रभु के लिए! किन्‍तु इतना उपद्रव होने के बाद भी कभी व्रजवासी लोग हताश नहीं हुए, उन्‍होंने कभी यह नहीं कहा कि इसको व्रज में नहीं रहने दो, इसके कारण हमें दुःख आ रहे हैं। उन व्रजवासियों ने अपने दु:ख को [को दूर करने या उसे] सुख में बदलने की कोई चेष्टा नहीं की।

यही भक्ति का लक्षण है।

अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्‍धु (1.1.11)

श्रीकृष्ण को सुखी करने की स्पृहा के अतिरिक्त, समस्त प्रकार की अभिलाषाओं से रहित, ज्ञानकर्मादि के द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए ही कायिक, मानसिक और वाचिक– समस्त चेष्टाओं और भाव के द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गति से जो कृष्ण का अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओं को) उत्तमा-भक्ति कहते हैं। (GVP)

यह कृष्णानुशीलन है। समस्त इन्‍द्रियों के द्वारा, तन-मन-बुद्धि और भाव से, सबके द्वारा भगवान् कृष्ण की सेवा करना। व्रजवासियों से बढ़ करके और कौन [कृष्ण की] निःस्वार्थ रूप में सेवा कर रहे हैं? किन्‍तु (15:45-15:49 अस्पष्ट) व्रजवासियों ने कृष्ण की इतनी सेवा की, उसीके लिए अपने प्राण रखे, और वे कष्ट पा रहे हैं, कितने प्रकार के उपद्रव हो रहे हैं, तो भी अपने दुःख को दूर करने के लिए कोई [प्रयास] नहीं करते। कृष्ण का उपद्रव कैसे मुक्त हो—नन्‍दबाबा की बैठक में यही विचार होता था। क्या [विचार] होता था? “भाई, ये शकटासुर, बकासुर, अघासुर, केशी दैत्य इत्यादि सब आ रहे हैं। ये सब इस बच्चे को मार डालने का उपक्रम कर रहे हैं। इसे कैसे बचाया जाये?” हम अपने को कैसे बचायें, वे यह नहीं [सोचते थे। वे तो यही चिन्ता करते थे कि] कृष्ण को कैसे बचाया जाये? वे कृष्ण के [हित की चिन्‍ता करते रहते थे।]

‘अन्याभिलाषिता शून्यं’— अपने लिए नहीं, किसके लिए? केवल कृष्ण की प्रीति के लिए और कृष्ण के लिए ही। अपनी सारी इन्द्रियों की सारी चेष्टाएँ और भाव— [सब कुछ कृष्ण के लिए।] गोपियाँ का प्रेम कहाँ तक पहुँचा हुआ है। वे प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव पार कर चुकी हैं। और नन्‍दबाबा इत्यादि अनुराग की सीमा तक पहुँच गये हैं। और राधिका इत्यादि तो महाभाव (17:11-17:13 अस्पष्ट) पहुँच गयी हैं। किसके लिए?

भक्त: कृष्ण

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सेवा, जो कृष्ण को भी नहीं मिलती।

इसलिये कृष्ण से पहले [व्रज में] उत्पात नहीं थे। ये सारे उत्पात कृष्ण के कारण ही हुए, किन्‍तु कभी भी उन लोगों ने इसके प्रतिकार के लिए कोई भी चेष्टा नहीं की। क्यों?

[17:54-22:06 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:

मोहिता इव कृष्णस्य मङ्गलं तत्र तत्र हि।
इच्छन्ति सर्वदा स्वीयं नापेक्षन्ते च कर्हिचित्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.39)

[व्रजवासी श्रीकृष्ण के माधुर्य से मोहित होकर केवल उनके कल्याण की ही कामना करते थे, कभी भी अपने कल्याण की चिन्ता नहीं करते थे।] GVP

ओह! व्रजवासी मोहित तो नहीं हुए किन्‍तु ‘मोहिता इव’ मोहित की भाँति वशीभूत हो गये। किसके? कृष्ण के। कैसे वशीभूत हो गये? जैसे कोई इन्‍द्रजाली व्यक्ति जादूगर अपने जादू से सबको वशीभूत कर दें। जो नहीं हुआ, उसको भी दिखा देता है। जैसे कोई एक नजर बाँधनेवाला जादूगर, उसने अपने बेटे को बुला दिया और उसका गला तलवार से काट दिया। और उसके सिर को एक सन्‍दूक में बन्‍द करके तीन-चार ताले लगा दिये गये, सब लोगों ने यह देखा। और [उसने कहा—] “बेटा, शीघ्र आ जाओ, शीघ्र आ जाओ।” और उसका बेटा उधर से दौड़ता हुआ उसके सामने आ गया। उसका सिर तो वहाँ पर है, मरा हुआ था। और वह दौड़ता-दौड़ता आ गया। सब लोग देख कर आश्चर्यचकित हुए और उसको पुरस्कार मिला।

क्या तात्पर्य? नजर बाँधने का कार्य जैसा जादूगर जैसे करते हैं। कृष्ण ने भी अपनी योगमाया से उनके नजरों को बाँधकर उनको अपने प्रेम के वशीभूत कर दिया। किस प्रकार से? अपने सौन्‍दर्य(रूप)-माधुरी से, अपनी वेणु-माधुरी से, अपने प्रेम-माधुरी से, अपनी लीला-माधुरी से। कृष्ण की चार असाधारण माधुरियाँ हैं। उन व्रजवासियों को मानो अपने जादू से [मोहित करता है।] ‘मोहिता इव’ किसलिये कहा? ये जो व्रजवासी हैं, उनपर जादू-टोना नहीं चल सकता। नहीं चलता—कभी सम्भव नहीं है। साधारण भक्तों के ही ऊपर जादू नहीं चल सकता। वे देवताओं की और असुरों की माया से मुग्ध नहीं हो सकते। वे तो कृष्ण के प्रेम के वशीभूत हैं। इसलिये कभी भी अपने मङ्गल की कामना नहीं करते थे।

कृष्ण की कैसे रक्षा हो? कृष्ण का कल्याण हो, कृष्ण के ऊपर जितनी विपत्तियाँ आयें, और उसका विमोचन करने के लिए उसका सारा दुःख हमें [मिले।] मङ्गल-आरति का तात्पर्य क्या है?— “हमारे लाला की जितनी भी विपत्तियाँ हैं, हम सब उसका विमोचन करते हैं और इसका सब उपद्रव इत्यादि शान्‍त हो जाये।” व्रजवासियों ने जो कुछ भी संसार में उनका प्रिय है, वह सब कृष्ण के—नन्दनन्दन के सुख के लिए अर्पित कर रखा है। अपने पिता-माता, भाई-बन्धु, स्त्री, पति, धन, बाग-बगीचा, पशु जो कुछ भी संसार में प्रिय हो सकता है, वह किसके लिए किया? सब कुछ त्याग दिया, किसके लिए? हम दुर्भागे ऐसा नहीं कर सकते। हम तो वैष्णव सङ्ग ही छोड़ देते हैं सांसारिक सुखों के लिए—दुर्भागे! इतनी सुन्दर कथाएँ हो रही हैं, किन्‍तु दुर्भाग्य है कि इतना रस पीने के लिए जी नहीं चाहता है, जी चाहता है कि हम भोग भोगें (sense gratification) स्त्रियों के साथ में, पुरुषों के साथ में मिलन से जो सुख है, यही बहुत बड़ा [सुख मानते हैं।] वे दुर्भागे मर क्यों नहीं जाते? सुख भी तुम लोगों को ऐसे नहीं आयेगा, व्रजवासियों जैसे। इसलिये कृष्ण के सुख के लिए सब कुछ त्याग करो। देह-दैहिक, यहाँ तक कि खाना-पीना, शृंगार करना भी कृष्ण के सुख के लिए ही है या उसका त्याग भी कृष्ण के सुख के लिए है।

[27:20-32:08 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रोहिणी मैया कह रही हैं— “वे लोग कृष्ण को केवल नन्दनन्दन या यशोदानन्दन ही मानते हैं। इसलिये वे उन्हें नन्दनन्दन अथवा व्रजेन्द्रनन्दन के रूप में ही जानते हैं; [इसके अतिरिक्त] वे कुछ नहीं जानते। उन्होंने कभी उन्हें भगवान् के रूप में नहीं देखा और न ही कभी उन्हें वसुदेवनन्दन या देवकीनन्दन समझा। उनको केवल नन्दलाला ही समझा। इसलिये वे व्रजवासी बड़े स्वाभाविक और परम प्रेम के साथ कृष्ण के प्रति व्यवहार करते थे।” अब (33:04 अस्पष्ट) बोल रहे हैं। रोहिणी मैया अपने कथनों का उपसंहार कर रही हैं।

तदानीमपि नामीषां किञ्‍चित् त्वत् प्रभुणा कृतम्।
इदानीं साधितस्वार्थो यच्चक्रेऽयं क्व वच्मि तत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.41)

[जिस समय तुम्हारे प्रभु अपने स्वार्थ के लिए व्रज में वास कर रहे थे, उस समय भी उन्होंने व्रजवासियों के लिए कुछ नहीं किया। किन्तु अब जब उनके सभी स्वार्थ पूर्ण हो गये हैं, वे जो कुछ कर रहे हैं, उस विषय में मैं किससे क्या कहूँ?] GVP

वे कह रही हैं— “जब तुम्हारे प्रभु अपना स्वार्थ साधन करने के लिए मथुरा चले गये और वहाँ जाकर अब वे देवकी के पुत्र और वसुदेवजी के पुत्र बन गये, [तब उन्‍होंने] व्रज के जितने भी चिह्न थे, उन सबका परित्याग कर दिया—वंशी भी छोड़ दी, मोर-मुकुट भी छोड़ दिया। गोप-गोपियों और व्रजवासियों की तनिक भी चिन्‍ता नहीं करते और मथुरासियों और यादवों के लिए कंस को मारा। अब तो वहाँ के राजा बन गये। उनका स्वार्थ साधन हो गया। इसलिये गैया चरानेवाले गोपों और गैया दुहनेवाली गोपियों के लिए वे अब वह क्या करेंगे? [वहाँ मथुरा में तो] बड़े-बड़े देवता लोग भी उनकी स्तुति कर रहे हैं। यादवों की सभा में उग्रसेन जैसे बड़े-बड़े [राजा], अक्रूर इत्यादि बड़े-बड़े मन्‍त्री बैठते हैं और कृष्ण को सम्मान देकर उनका अभिनन्‍दन करते हैं। व्रजवासियों ने क्या (34:43-34:48 अस्पष्ट)

तुम्हारे प्रभु ऐसे में अपने स्वार्थसिद्ध के लिए जब व्रज में थे, तब भी उन्‍होंने कुछ नहीं किया। क्या किया? उनके घर का मक्खन लिया, उनकी गोदी में खेले। अपने स्वार्थ साधन करके सिद्ध करने वाले और जब-जब कोई कष्ट होता, उनकी गोदी में बैठते। तब तो [उनके द्वारा] ये करा लिया और अब विशेषतः अपने ज्ञाति बन्धुओं के साथ में मथुरा में निवास कर रहे हैं। [ज्ञाति-बन्धु] कौन? माता-पिता, भाई-बन्धु। अब उनका विवाह भी होने वाला है। इस प्रकार से तुम्हारे [प्रभु ने] व्रजवासियों को छोड़कर कौन-सा कर्म किया? [तुम्हारे प्रभु का] यही सब कर्म है? गोपियों के साथ में उनका कितना निष्ठुर व्यवहार! और अधिक क्या कहूँ? मैं किसके सामने कहूँ? कहूँ तो किससे? कौन सुनेगा? यहाँ सुनने वाले भी तो नहीं हैं। इसलिये यहाँ पर कोई योग्यपात्र व्यक्ति नहीं है जो सुने। अथवा कृष्ण की अपकीर्त्ति की बात मैं क्या कहूँ—उनकी निष्ठुरता और निर्दयता की? क्या बात है? और किससे कहूँ? इसलिये रोहिणी देवी डर (भय) से संक्षेप में अपने वक्तव्य का उपसंहार कर रही हैं।

(36:45 inaudible) Oh I am going, just because they have reached. I am giving classes and kirtana. From tomorrow again I will come.

[37:11-39:35 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

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