Raya Ramananda Samvada (6): Expl. of Different Types of Servants, CC Madhya 8.70-71
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Topics
- Note: The lecture starts abruptly.
- Explanation of adhikrta-dasa (appointed servants) and asrita-dasa (surrendered servants).
- In adhikrta-dasa, the mood of awe and reverence is prominent. Brahma, Sankara, Indra, and others are called adhikrta (appointed) dasas. They perform duties delegated by Krsna.
- To explain the concept of adhikrta-dasa, Srila Gurudeva gave an example of the conversation between Kalindi and Jambhavati, who observed demigods circumambulating, praising, and offering respect to Krsna at Dvaraka.
- There are four types of asrita-dasa: 1) saranya (those who have surrendered to the Lord as their protector); 2) jnani-cara (those who were previously jnanis but later understood the superiority of the form and qualities of the Lord); 3) seva-nistha (those who are fixed in service, appreciating the Lord’s sweetness); 4) parisadas (followers or members of the Lord).
- An example of 'saranya’ is Sudama mali (florist). When Krsna went to Mathura, Sudama Mali, who offered flower garland to Krsna, received prema bhakti.
- The sages headed by Saunaka who gave up the desire for liberation and surrendered to the Lord are called jnani-caras.
- Examples of seva-nistha are King Candradhvaja and King Bahulasva.
- In Dvaraka, devotees like Uddhava, Daruka, and Bhadra are known as parisadas.
- The servants of Ayodhya are superior to those in Vaikuntha. Superior to them are the servants in Mathura and Dvaraka, and among all servants in Vraja are the topmost.
- The service of the dasya-bhaktas, Jaya and Vijaya, in Vaikuntha is composed of feelings of pure awe and reverence.
- Superior to Jaya Vijaya are associates of Ayodhya. Amongst all of the servants there, Sri Hanumana is the topmost. Hanumana serves his Lord, Sri Rama, with his full life force.
- Srila Gurudeva explained the service mood of Hanumana through one pastime.
- Hanumana cannot live without seva, but on the contrary, we feel burdened when seva is assigned to us.
- We should utilise this body in seva; this will keep us blissful, and we will gradually progress in bhakti.
Transcript
राय रामानन्द संवाद (6): विभिन्न प्रकार के दासों का वर्णन, चैतन्यचरितामृत मध्यलीला 8.70-71
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 9 जून, 1992 को श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिये वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …दास्य भाव में सम्भ्रम-प्रीति रहेगी, हाथ जोड़ना इत्यादि। लालत्व [लालन-पालन भाव] में हाथ जोड़ना नहीं रहेगा। उसमें गौरव रहेगा कि ‘हमारे लिए लालक-पालक हैं’—ये बुद्धि रहेगी। किन्तु झट उनके कन्धे पर बैठ जायेंगे, गोदी में बैठ जायेंगे। उनकी ठोड़ी पकड़ लेंगे और उनसे जिद्द करेंगे कि हमको ये चाहिये। और ये लोग [दास्य भाववाले] वर इत्यादि की प्रार्थना—बस यहीं तक कर सकते हैं। अधिक से अधिक…. कुछ और भी बतलाया। ये लोग ‘अधिकृत-दास’ हैं। अब इसको और बतला रहे हैं।
ब्रह्मा इत्यादि ‘अधिकृत-दास’ हैं। उन्हें [भगवान् ने जगत् सम्बन्धी कार्यों के लिए] अधिकार दिया है। अधिकृत अर्थात् [जिन्हें अधिकार दिया।] ब्रह्मा, शंकरजी और इन्द्र [—ये सभी अधिकृत-दास हैं।] इन्द्र के ऊपर में क्या भार दिया? इनको स्थूल रूप में जगत् का लालन-पालन [का भार] दिया [गया है—जैसे] बरसात और और सब जो चीज़ें हैं, इनका इन्द्र के ऊपर में भार दिया। इसलिये ये अधिकृत-दास हैं। और शंकरजी क्या करते हैं? जगत् का ध्वंस इत्यादि करते हैं और ब्रह्मा इत्यादि [क्या करते हैं?] ये लालन-पालन, विश्व की सृष्टि इत्यादि करते हैं। इस तरह से ये ‘अधिकृत-दास’ हैं।
कह रहे हैं— कभी द्वारका में कालिन्दीजी और भालू की लड़की?
भक्त: जाम्बवती
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जाम्बवती बैठी थी। कृष्ण राजसभा में बैठे हैं और कालिन्दीजी जंगले से झांकती हुई कृष्ण को देख रही हैं।
जाम्बवतीजी ने [कालिन्दीजी पूछा—] “[कृष्ण] क्या कर रहे हैं? वहाँ पर [राजसभा में] कौन-कौन बैठे हैं? क्या हो रहा है?”
कालिन्दीजी बतला रही हैं— “अरि! वह देखो न, एक साष्टाङ्ग प्रणाम कर रहा है।”
[जाम्बवतीजी ने पूछा—] “ये साष्टाङ्ग प्रणाम कौन कर रहा है?”
[कालिन्दीजी ने कहा—] “इन्द्र, जिसको देखकर के सब हंस रहे हैं।”
वहाँ के वो यदुवंशी जो ये हैं न? साम्ब और ये सब जितने लड़के हैं, सब [इन्द्र को] देख करके हँस [रहे हैं।]
[जाम्बवतीजी ने पूछा—] “और जो परिक्रमा कर रही हैं?”
[कालिन्दीजी ने कहा—] “ये अम्बिकाजी (दुर्गाजी) है, उनकी परिक्रमा कर रही हैं।”
[जाम्बवतीजी ने पूछा—] “ब्रह्मा क्या कर रहे हैं?”
[कालिन्दीजी ने कहा—] “स्तव कर रहे हैं।” जैसे भागवत में स्तव है न?
[जाम्बवतीजी ने पूछा—] “और शंकरजी क्या कर रहे हैं?”
[कालिन्दीजी ने कहा—] “ध्यानस्थ हैं, कृष्ण को देखकर भी।”
[कालिन्दीजी ने] सबको दिखलाया। ये सब अधिकृत-दास हैं। अधिकृत-दास में सम्भ्रमभाव अधिक रहेगा। स्तव-स्तुति, दण्डवत-प्रणाम इत्यादि सब सम्भ्रमभाव से [करेंगे।] ये अधिकृत-दास हैं। किन्तु अभी सिद्ध नहीं हैं। अभी आगे-आगे बढ़ रहे हैं।
दूसरे जो होते हैं— आश्रितदास। आश्रितदास अर्थात् ये दास कृष्ण के आश्रित हैं। उसमें शरण्य, ज्ञानिचर और सेवानिष्ठ— तीन प्रकार के होते हैं। [दास चार प्रकार के हैं— अधिकृत, आश्रित, पारिषद और अनुगत। और उनमें आश्रितदास तीन प्रकार के हैं—शरण्य, ज्ञानिचर और सेवानिष्ठ।]
शरण्य कौन हैं? जो भगवान् के शरणागत हो गये हैं। जैसे कृष्णचन्द्रजी जब मथुरा में पधारे, तो सुदामा माली के यहाँ गये। तो उसने क्या किया? झट माला गूँथ करके, गजरे का हार कृष्ण के गले में अर्पित कर दिया। उनका शरणागत हो गया और कृष्ण ने उसको प्रेमाभक्ति दी।
भक्त: ये लोग अनुगत-दास हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये शरण्य हुआ। ये शरण्य हैं। ये आश्रित के अधीन हैं। कृष्ण के जो आश्रित हैं, ये उसके अधीन में, शरण में हैं। और शौनकादि ऋषि जो हैं, ये ज्ञानिचर हुए। और बहुलाश्व, चन्द्रध्वज राजा [सेवानिष्ठ-आश्रितदास हैं।] जनकपुरी के वह थे बहुलाश्व। बहुलाश्व न?
भक्त: हाँ
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये सब राजा जो हैं, ये सेवानिष्ठ हैं। कैसे कृष्ण की, बलदेवजी की सेवा की? ये सेवानिष्ठ हैं।
और पारिषद में वहाँ (द्वारकापुरी) के नन्द, उपनन्द, जो यदुकुलवाले हैं। यहाँ वृन्दावनवाले नहीं। ये सब [पारिषद] हैं।
श्रीपाद माधव महाराज: नन्द, उपनन्द कौन हैं तब?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वे वहाँ के यदुकुल के जन्म लेनेवाले हैं। वहाँ पर नन्द, उपनन्द, [उद्धव, दारुक, सात्यकि] और और सब [पारिषद-दास हैं।] और यहाँ वैकुण्ठ में—वैकुण्ठ, मथुरा, द्वारका और व्रज—इन चारों को लिया। वैकुण्ठ में कौन हैं? जय-विजय इत्यादि। ये क्या करते हैं? नारायण की सब प्रकार से सेवा करते हैं। किन्तु सब समय सम्भ्रमभाव इनके अन्दर में रहता है। गौरव नहीं, गौरव होगा— लाल्य में। ये सम्भ्रमभाव से [सेवा करते हैं।]
यहाँ पर मथुरा और द्वारका में उद्धव प्रभृति [दास हैं।] उद्धव दासों में सबसे श्रेष्ठ हैं और कृष्ण के बहुत अन्तरङ्ग सेवक हैं, दास हैं। उनमें थोड़ा-सा कुछ दास्यभाव भी है। उनका कार्य क्या है? वे लोग क्या करते हैं? कृष्ण को सब प्रकार से परामर्श देते हैं। उनके सङ्ग में रहेंगे। उनकी इच्छानुसार काम करते हैं। जब कृष्ण की कभी इच्छा हुई, तो जो [इन सेवकों में] सबसे शुद्ध हैं, उन उद्धवजी को व्रज में गोपियों के पास भेजा। और जो व्रज के सेवक हैं न—वे और भी बहुत उन्नत हैं और उनमें रक्तक, पत्रक और दूसरे सब हैं। [उनमें] रक्तक सबसे प्रधान हैं। रक्तक में भी…
अब चलें, पहले से [अर्थात् वैकुण्ठ से] अब चलें। [वैकुण्ठ में] जय-विजय हुए। उन्होंने भगवान् की सेवा करने के लिए अपने एक अंश से भले ही असुरत्व जन्म ग्रहण किया, किन्तु असुर जन्म ग्रहण करके भी भगवान् की इच्छा की ही पूर्ति की—[उन्हें वीररस का आस्वादन कराया।] चित्रकेतु कौन थे? [उन्होंने] वृत्रासुर के रूप में भगवान् की सेवा की। ऐसे ये सब सेवक हैं। अपना कुछ भी विचार नहीं करते। बस प्रभु की सेवा और प्रीति ही उनको उद्दिष्ट है। ये वैकुण्ठ के सेवक हैं। ये सेवासुख-उत्तरावाले हैं।
भक्त: प्रेमसेवा-उत्तरा
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: प्रेमसेवा-उत्तरा [वाले हैं।] इन लोगों की यही विशेषता है। जैसे भी हो प्रभु की सेवा करेंगे। इनसे बढ़ करके अयोध्या में हनुमानजी का दासत्व पूर्ण है। इनका दासत्व कैसा है?
भक्त: प्रेमीभक्त हनुमान
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हनुमानजी का दासत्व] इनसे भी बढ़ करके, वैकुण्ठ में जय-विजय से भी बढ़ करके है। कैसा? उनकी सेवा के प्रति इतनी निष्ठा है! सेवावासना है! और सुख भी अपने लिए नहीं, सुख प्रभु के लिए है। ये दोनों वस्तुएँ हैं।
जब रामचन्द्रजी रावण पर विजय प्राप्त करके, लंका विजय के बाद में अयोध्या में पधारे, उनका राज्याभिषेक हो गया। सब सेवाएँ चलने लगीं। उस समय में सीताजी, भरतजी, लक्ष्मणजी, शत्रुघ्नजी, सबने मिल करके विचार किया— “ये हनुमान हम लोगों की सेवा में बाधक है। सब सेवा यही हनुमान करता है। [हमको] कोई सेवा नहीं करने देता।”
अभी हम लोगों को देखो। यदि कोई एक व्यक्ति सेवा करने लगा तो बाकी चादर तान करके सो जायेंगे—हमारे जैसे। [हम लोग सोचते हैं कि] जितना बचकर के रहा जाये सेवा से, उतना ही अच्छा है। छल से, बल से, कल से, चतुराई से, क्रोध करके भी जितना बच लिया जाये [सेवा से।] कभी-कभी क्रोध भी कर देते हैं कि हमको कोई सेवा के लिए मत बोलो।
भक्त: (8:29 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कुछ लोग सोचते हैं—] “यह और किसी की सेवा है, [हमें करने की क्या आवश्यकता है? क्या] सब सेवा हम करें?” ये सेवा कौन करेगा? प्रेम-लाभ करने के लिए जिसके हृदय में ममत्व-भाव जागृत हो गया है, वह सबको छोड़ करके यह [भाव रखेगा—] “मैं यह सब सेवा करूँगा; गुरुजी, वैष्णवों, और भगवान् को प्रसन्न करूँगा।”
अब इसीका विचार हनुमानजी [के सम्बन्ध में] करो। उनमें यह भावना अन्तिम सीमा तक [विद्यमान] है। उनमें अपने सुख की कोई भावना नहीं; सब समय केवल प्रभु की प्रीति की ही भावना रहती है। अपने सुख का तनिक भी, लेशमात्र [भी विचार] नहीं होता।
अब उन चारों ने देखा कि हनुमान ही [रामचन्द्रजी को] पंखा ढुलाता है। हनुमान ही पानी लाता है। हनुमान ही पैर दबाता है। जब भी किसी सेवा की आवश्यकता होती, तो प्रभु कहते— “हनुमान, इधर आ जाओ।” सब समय हनुमान [को ही पुकारते हैं।] बिना हनुमान के उनका कोई काम नहीं चलता और हनुमान चौबीसों घण्टा उनकी सेवा में रहता है।
उन चारों ने कहा— “एक बात किया जाये। [ऐसा चलता रहा तो हमें] उनकी [रामजी की] तो कोई सेवा मिलेगी नहीं। तब फिर [यहाँ] रह करके क्या होगा? इसलिये आज से हम चारों लोग उसकी समस्त सेवाओं को बाँट लें। हम लोग चार व्यक्ति हैं। दिन-रात मिला करके चौबीस घण्टे में छह-छह घण्टा बाँट लें और हनुमान को कोई भी सेवा करने नहीं देंगे। नहीं तो, वह सब करने लग जायेगा।”
इसलिये चारों ने मिल करके उनकी समस्त सेवाओं को ले लिया और करने लगे। हनुमानजी को कह दिया कि तू बाहर जाकर बैठ। बस हनुमानजी तो बहुत दु:खी हुए कि मुझे कुछ सेवा तो मिली नहीं। वे बड़े दुःखी हुए।
हनुमानजी ने इन लोगों से कहा— “अच्छा! एक बात है। जो कोई सेवा आप लोगों को पसन्द नहीं है, अन्ततः वह कोई एक सेवा हमको दे दो।”
[उन्होंने] कहा— “अच्छा, तुम माँगो तो। क्या चाहते हो? किन्तु हम अपनी सेवा में से कोई सेवा नहीं देंगे।”
हनुमानजी ने कहा— “अच्छा, आप लोगों की सेवाओं में से बाहर, मैं बाहर में बैठूँगा। कोई सेवा नहीं, किन्तु जब उनको जम्हाई आ जाये, तो मुझको चुटकी बजाने की ये सेवा दे दीजिये।” जब जम्हाई आती है, तो राम-राम कहो और नहीं तो अपने आप चुटकी बजा दो। अब इधर में है ऐसी कोई प्रथा? हमने देखा है…
भक्त: बहुत जगह ऐसे चुटकी बजाते हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यहाँ चौबेजी और बहुत लोगों को ऐसा देखा है
भक्त: मुम्बई में भागवत में बहुत देखा, [जम्हाई आने पर लोग] राम-राम [बोलते हैं।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अच्छा, जम्हाई आयी, ऐसा करो [अर्थात् चुटकी बजाओ।]
[हनुमानजी ने कहा—] “तो ये चुटकी बजाने का काम मुझको दे दिया जाये। मैं ये करूँगा।”
[उन्होंने] बोला— “ठीक है। जब राम को कभी आज तक जीवन में कोई जम्हाई नहीं आयी, तो ऐसा ही काम दे दो। न जम्हाई आयेगी, न वह [चुटकी] बजायेगा।”
भक्त: न रहेगा बाँस, [न बजेगी बाँसुरी।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: फिर हनुमानजी बाहर बैठे और विचार किया— “प्रभु को न जाने [कब जम्हाई आ जाये?] अब मैं तो दूर हूँ। [प्रभु को] देख नहीं रहा। कब जम्हाई आ जाये?”
इसलिये सब समय [चुटकी] बजाने लगे। और ज्योंहि चुटकी बजायी तो उधर राम को जम्हाई आने लगी। अब सब समय चौबीसों घण्टा उनको जम्हाई [आने लगी।] चारों को कोई [सेवा नहीं मिल रही। रामचन्द्रजी] न पानी पी रहे हैं। न पैर दबवाने का काम है। कोई काम ही नहीं है। सब [समय] जम्हाई आ रही है और (11:37 अस्पष्ट) हैं और ये चुटकी बजा रहे हैं।
भक्त: चुटकी बजाना बन्द नहीं हुआ।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [उन चारों ने कहा—] “अरे! ये क्या कर दिया इसने? इनको सब समय जम्हाई आ रही है। हम लोग कोई सेवा ही नहीं कर पा रहे हैं।”
तो फिर उन लोगों ने विचार किया— “[प्रभु] ये सब हनुमान के लिए कर रहे हैं। इसलिये जब [हनुमान] सब समय चुटकी बजाता है, [तो इनको जम्हाई आती है।”]
[उन लोगों ने हनुमान से] कहा— “सब समय चुटकी मत बजाया करो। जब उनको जम्हाई आये, तब चुटकी बजाना।”
[हनुमान ने] कहा— “हमको ये कैसे मालूम होगा? हमको तो यहाँ पर घर से बाहर कर दिया है। हमको पता ही नहीं है। कब उनको जम्हाई आ जाये, कोई पता नहीं। इसलिये मैं सब समय [चुटकी] बजा रहा हूँ।”
अन्त में [उन लोगों ने] देखा कि “भाई! इसको कोई सेवा देनी चाहिये, नहीं तो सब गड़बड़ कर देगा।” इसलिये फिर से सब लोगों ने उनको बुलाया। बुला करके उनको सेवा में लगाया। ऐसे हनुमानजी बिना सेवा के रह नहीं सकते। और हम सोचते हैं कि “भगवान् ने नर तन दिया। इसको सेवा में [लगाकर] क्यों बेकार नष्ट करें? जितना आराम कर लो इस जगत् में, वह अच्छा।”
अरे! एक दिन सड़-गल करके ये [शरीर] खत्म हो जायेगा। ये भगवान् की सेवा करने के लिए (12:38 अस्पष्ट) मिला है। स्वचालित (automatic) घड़ी है, तुम सेवा नहीं करेगा, शीघ्र मरेगा। और यदि सेवा करेगा तो खुश रहेगा, सुखी रहेगा। जो सेवा करेगा न, उसका सब समय मुख प्रसन्न रहता है। जो सेवा नहीं करेगा, दूसरों से लज्जा करेगा और उसका मन सब समय [अशान्त रहेगा।] इसलिये खूब सेवा करो, खूब हरिकथा सुनो। और इसको एक-एक [वस्तु को भगवान् की सेवा में लगाओ।] जितने गुण दिये है (13:05 अस्पष्ट), सबको भगवान् की सेवा में, वैष्णवों की सेवा में, गुरु सेवा में लगाओ। देखो कि अभी से प्रसन्नता मिलेगी और भक्ति भी। ये हनुमानजी में है। अब इसीसे [आगे] द्वारकावालों का बतलाऊँगा।
भक्त: कल होगा। [अभी] 7:30 बज गया।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और फिर व्रज की सेवा के सम्बन्ध में बतला करके और फिर ‘आगे कह आर’।
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
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