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Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.70- 91: Conversation About Vrajavasis Between Krsna and Uddhava

01:21:29
#251
Vrndavana
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 70%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Explaining from Sri Brhad-bhagavatamrtam verses 1.6.70-91
  • Story about Padamavati fearing that Krsna would give the entire kingdom to the vrajavasis and proposing to give due compensation to the vrajavasis for Krsna's upbringing by Nanda Maharaja till the age of 11.
  • Different stages of Krsna's 'kisora-avastha'.
  • Krsna enquires from Uddhava about His duty/obligation towards the vrajavasis.
  • Though Krsna always resides in Vrndavana, he reciprocates to the calling of His devotees.
  • Krsna has both sarvajnata (omniscience) and mugdhata (bewilderment or lack of knowledge) at the same time. Example: Even though Krsna may be absorbed in rasa-lila, still He hears the prayers of His surrendered devotees.
  • Intense feelings of separation exhibited by the vrajavasis when Nanda Baba returned without Krsna
  • Sri Nanda Maharaja's state of grief and assurance to the vrajavasis that Krsna would return soon.
  • Krsna sent Uddhava to Vraja to console the gopis. But the gopis refused the meditation that Uddhava suggested and only desired to see Krsna in person as a remedy for their feelings of separation.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.6.70-91 : कृष्ण और उद्धव के मध्य ब्रजवासियों के सम्बन्‍ध में वार्तालाप

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 30 अगस्त 2003 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल मैंने बतलाया था—रोहिणीजी की बातों को सुनकर और तत्पश्चात् रुक्मिणी और सत्यभामा की बातों को सुनकर मूढ़मति, कृष्ण की मातामही, वृद्धा पद्मावती जो पहले रोहिणी मैया के द्वारा [उपेक्षित] की गयी थी—रोहिणी मैया ने पहले उसकी बातों को सुन करके भी नहीं सुना था—ये पद्मावती इस समय कुछ परिहास-व्यञ्जक भङ्गिमा से—हँसी-मजाक की भङ्गी से कृष्ण का चित्त स्वस्थ करने के लिए बोलने लगी।

उसका यह भी तात्पर्य था कि [कहीं] कृष्ण महाराज उग्रसेन का राज्य भी उन ब्रजवासियों को न दे दें। इसलिये वह सिर कँपाती हुई बोलने लगी। आखिर वह कृष्ण की मातामही है, इसलिये कृष्ण के प्रति उसकी ममता तो है, किन्तु किस रूप में? उसकी ममता स्वार्थमयी है—चाहे ब्रजवासी लोग सब मर जायें, गायें मर जायें, वहाँ के लोग मर जायें, किन्तु कृष्ण मथुरा में ही रहें; और यहाँ रहने पर भी कृष्ण ब्रजवासियों को कुछ ऐसा ना दे दें कि उसके पति उग्रसेन का राज्य भी चला जाये।

इन सब विषयों पर विचार करके थोड़ी यह मुग्ध होने लगी। क्या कहने लगी?

त्वयानुतप्यते कृष्ण कथं मन्मन्त्रितं शृणु।
यदेकादशभिर्वर्षैर्नन्‍दगोपस्य मन्दिरे ॥
द्वाभ्यां युवाभ्यां भ्रातृभ्यामुपभुक्तं हि वर्त्तते।
तत्र दद्यान्न दद्याद्वा गोरक्षाजीवनं स ते॥
सर्वं तद्‍गर्गहस्तेन गणयित्वा कणाणुशः।
द्विगुणीकृत्य मद्भर्त्रा तस्मै देयं शपे स्वयम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.73-75)

[पद्मावती ने कहा—हे कृष्ण! तुम अनुताप क्यों कर रहे हो? मेरी मन्‍त्रणा सुनो! तुम दोनों भाइयों ने ग्यारह वर्ष तक ब्रज में नन्दगोप के घरपर रहकर जो कुछ खाया-पीया, पहना है अथवा जो कुछ उपभोग किया है, उसमें से वे गोचारण और गोरक्षण के लिए तुम्हें प्राप्त होनेवाला (वेतन स्वरूप) कुछ दें अथवा न दें, (उसके लिए मेरा आग्रह नहीं है) किन्तु यदुराज तुम्हारे पालन आदि कार्यों द्वारा उनको जो कुछ प्राप्त होना चाहिये श्रीगर्गाचार्य के द्वारा पाई-पाई तक हिसाब करवाकर उसका दुगुना कर गोपराज को प्रदान कर देंगे—मैं यह शपथ खाकर कह रही हूँ।] GVP

[पद्मावती] कहने लगी— “देखो, तुम लोग कृष्ण के लिए अनुताप क्यों करते हो? [कृष्ण] ब्रज में रहे—ठीक है, रहे। उसके लिए कृष्ण उनको देने के लिए क्यों चिन्तित रहें और तुम लोग क्यों चिन्तित हो गये? देखो, मेरी बात सुनो! मैं जो परामर्श दे रही हूँ, उसे सुनो! देखो, ये दोनों भाई लोग ग्यारह वर्ष तक नन्दब्रज में थे, नन्दबाबा के घर में थे। और जो कुछ उन्होंने खाया-पीया है, उसमें से कुछ तो [कृष्ण और बलराम का] बनता है कि जो बड़े कष्ट से उन्‍होंने नन्दबाबा की गैयों को चराया, तो उसका भी महीने का कुछ [वेतन] लगना चाहिये। खैर वे दें या न दें, कोई बात नहीं। इसकी पाई-पाई गर्ग मुनि से हिसाब-किताब (account) किया जाये और यदि कुछ उनका शेष बचता है—किसका? नन्दबाबा का, ब्रजवासियों का— जो उन्होंने खिलाया-पिलाया है, तो उसका दोगुना दे दिया जाये। किन्तु सारा राज्य देने की कोई आवश्यकता नहीं; केवल दोगुना दिया जाये।” तात्पर्य क्या?

कहते हैं गोपराज को… गोपराज माने नन्दबाबा, जो गोप हैं। अरे, उनके घर में है [ही] क्या? केवल गायों का छाछ, दूध है—बस यही तो। उसका दाम कितना होगा? और वह भी केवल ग्यारह वर्ष तक का हिसाब और वह भी [हिस्सा] काट करके। कौनसा हिस्सा? जब [कृष्ण] से गायें चरवायीं, उसका भी तो कोई महीना या वेतन बनता है। तो उसे निकाल करके क्या बचेगा? हम कौड़ी-कौड़ी का गर्गाचार्य से [हिसाब] करायेंगे—वे महाज्योतिषी हैं, एक पैसे की भी भूल नहीं होगी। मेरे पति का एक पैसा भी नहीं जायेगा—भीतर से उसकी यह भावना है। वे हिसाब करके सब निकाल देंगे। और गोरस का कितना खर्च? वहाँ नन्द-गोकुल में तो गायों का दूध-दही बह रहा है; उसका कोई मूल्य ही नहीं। इसलिये मैं स्वयं शपथ करके कह रही हूँ कि जो कुछ हिसाब निकलेगा, उसका दुगुना करके मैं अपने पति से अवश्य ही नन्द को भिजवा दूँगी।

इसमें एक बात आयी। इसमें लिखा है कि कृष्ण और बलदेवजी ग्यारह वर्ष तक [ब्रज में] रहे। ये जन्म से ले करके है। जन्म से ले करके 10 वर्ष और कितना [महीना?]

भक्त: 8 महीने

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कृष्ण] वहाँ 10 वर्ष 8 महीने रहे। तो 4-5 वर्ष या 3 वर्ष तक तो उन्‍होंने मैया का दूध पिया—वह भी सामने नहीं आना चाहिये। ये भी गये [अर्थात् ये 3 वर्ष भी कम हो गये]। फिर देखो, वह हिसाब कह रही है कि [वह सब सामने] नहीं आना चाहिये। और इसके बाद में बचता क्या है? 11 वर्ष में से 3 यदि चला जाये, तो 9 वर्ष बचता है। तो 9 वर्ष में वह…

भक्त: 8 वर्ष

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, 8 वर्ष [बचता है।] और [इन] 8 वर्षों में मान लिया कि प्रतिदिन एक-एक किलो, दो-दो किलो भी लें, तो महीने में कितना लेंगे? और उस समय गोरस का दाम कितना था? बहुत सस्ता— [लगभग] न के बराबर। सुनते हैं कि नन्दगाँव में एक छाछकुण्ड है। उस समय दही मथने के बाद में छाछ को कोई पीनेवाला नहीं; [सबको] तो मक्खन ही खाना है—मक्खन ही इतना है कि खायेगा कौन? तो वह छाछ का कुण्ड ही [बन गया।] वे फेंक देते थे और वहीं पर छाछ जमा रहता था। वहाँ के गाय-बैल भी [वह छाछ] नहीं पीते थे—इतना [अधिक] छाछ और दूध होता था। इसलिये उसका कोई भी मूल्य नहीं।

दूसरी बात, कोई-कोई कहते हैं कि कृष्ण युवावस्था के प्रारम्भ तक, अर्थात् 15 वर्ष की अवस्था तक [ब्रज में] रहे। तो इस [विषय] में भी सनातन गोस्वामीजी कह रहे हैं कि इसमें कोई असामञ्‍जस्य की बात नहीं है। क्यों? श्रीमद्भागवत में तो देखा जाता है कि एकादश वर्ष [तक ब्रज में रहे।] क्यों लिखा गया कि किशोरकाल तक वहाँ रहे? तो किशोरकाल कितने उम्र तक होता है? 15 वर्ष तक किशोर की स्थिति है। उसमें भी एक चढ़ता हुआ किशोर है—

भक्त: नवकिशोर।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं। वयःसन्धि कहा है। एक मध्य वयःसन्धि है और एक व्यक्त है। [वयःसन्धि, नव्य-वयस, व्यक्त-वयस और पूर्ण-वयस — ये चार अवस्थाएँ मानी जाती हैं।] तो उस समय कृष्ण के लिए तथा गोपों के लिए व्यक्त-वयस 15 वर्ष तक का किशोर माना जाता है और किशोरियों के लिए 13 वर्ष कि 14 वर्ष था। तो उतने वर्षों तक निवास किया। अब इसका सामञ्‍जस्य कैसे होगा? उसके लिए कह रहे हैं कि जिस समय अक्रूर राम और कृष्ण को ले जाने के लिए गोकुल में आये, उस समय उन्होंने कृष्ण का दर्शन किशोर रूप में किया था। और जब कृष्ण कंस के चाणूर और मुष्टिक [नामक] पहलवानों से लड़ने के लिए गये, तो मथुरा की किशोरियों ने उन्‍हें देख करके क्या कहा था? किशोरमूर्ति! कामदेव साक्षात्! [अर्थात्] कामदेव स्वयं किशोरमूर्ति हो गये।

भक्त: [स्त्रीणां] स्मरो मूर्त्तिमान् [#1]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [स्त्रीणां] स्मरो मूर्त्तिमान् [अर्थात्] स्मर (कामदेव) के मूर्त्तिमान् स्वरूप। इसलिये उस समय भी [कृष्ण का] किशोर रूप ही वर्णन किया गया है। वैसे तो कृष्ण जब तक इस जगत् में, धराधाम में रहते हैं, [सदैव] किशोरमूर्त्ति [स्वरूप] ही रहते हैं। वे कभी भी युवावस्था में नहीं होते। उनकी मूँछ और दाढ़ी नहीं होतीं—ऐसा कभी नहीं होगा। ये भगवत्ता का एक विशेष लक्षण है, सब भगवद् [स्वरूपों] के लिए, किन्तु विशेषकर कृष्ण के लिए। रामचन्द्रजी [के विषय में] भी ऐसा देखा जाता है— वे 11 हज़ार वर्ष की आयु में भी वृद्ध नहीं हुए, वृद्ध नहीं हुए; वे एकदम युवा जैसे ही दिखते रहे। और कृष्ण तो एकसौ वर्ष की उम्र में भी एकदम युवक—किशोर ही दिखते हैं।

उस समय का कैशोर-कलेवर का वर्णन भी श्रीमद्भागवत में आता है। अतएव जिस समय कृष्ण ने कंस के अनुचरों को मारा, तब यौवन का पदार्पण अभी नहीं हुआ था। और कैशोर कहने से [साधारणतः] एकादश वर्ष ही समझ में आता है; किन्तु कृष्ण मक्खन, दूध और मलाई खा करके ग्यारह वर्ष की उम्र में ही ऐसे हो जाते हैं, मानो 15-20 वर्ष के हो गये हों।

भक्त: (13:37 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [विशेषकर ग्यारह वर्ष की आयु में ही क्षत्रियों का उपनयन-संस्कार होता है,] इसलिये बलराम-कृष्ण ने कंस-वध के पश्चात् यज्ञोपवीत धारण किया था। और [जब कृष्ण-बलराम ने] रङ्गभूमि में वसुदेव-देवकी को प्रणाम किया और कहा— “हम आपके पुत्र हैं।” तो उस ऐश्वर्य को देख करके कि ये कितने बलवान हैं, स्वयं भगवान् हैं, इसलिये [वसुदेव-देवकी का] पुत्रभाव समाप्त हो गया और [उनके हृदय में यह भावना आ गयी कि] ये भगवान् हैं।

तो वे कह रहे हैं— “हम लोग आपके पुत्र हैं। आपने हमारी बाल्य, पौगण्ड और किशोर उम्र की लीलाओं का अनुभव नहीं किया—आप लोगों ने कुछ उपभोग नहीं किया। उस समय तो हम वृन्दावन में थे। पुत्र होने पर भी—हम आपके पुत्र थे—किन्‍तु आप लोग उस भाव [अर्थात् बाल्य,] पौगण्ड और कैशोर अवस्था की हमारी लीलाओं से वञ्चित रहे।” क्योंकि मथुरा में आते ही कृष्ण ने परम-ऐश्वर्य प्रकट किया। अब वहाँ वे मथुराधीश हो गये। उन्होंने जरासन्ध से कितनी ही बार युद्ध किया। इसलिये वहाँ पर ऐश्वर्य भाव [प्रधान रहा।] कभी-कभी वे शंख, चक्र, गदा और पद्म भी धारण करते हैं।

यहाँ भी वैसा ही बाल्य… जब कृष्ण बालक रहते हैं, तो भी किशोर उम्र रहती है। उसके लक्षण सब बतलाये गये।

भक्त: बाल्येऽपि भगवान् कृष्णः (15:26 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उज्‍ज्वलनीलमणि में उसके उदाहरण दिये गये हैं। किन्तु साधारण लोग उन्‍हें सुनने के योग्य नहीं है।

[विशेषकर] कृष्ण ने नित्य-कैशोर [स्वरूप को] स्वीकार [किया है,] इसलिये वे नित्य-कैशोर अवस्था में ही रहते हैं।

अथवा किसी-किसी ने ऐसा भी कहा है कि कैशोर के पञ्चदश (पन्‍द्रह) वर्ष में भगवान् गोकुल से मथुरापुरी आये। सनतान गोस्वामी कहते हैं—यह भी ठीक है। क्योंकि पन्‍द्रह वर्ष तक किशोर की शेष अवस्था रहती है और यही शृंगार-रस का समय है। इसके बाद मथुरा आने पर शृंगार-रस उनका समाप्त हो जाता है, वह नहीं रहता। इसलिये पद्मावती ने जो कहा, वह ठीक ही कहा—वह न्यायसङ्गत है।

[16:56-23:00 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परीक्षित् महाराजजी ने अपनी मैया से कहा— “हे माताजी! कृष्ण ने पद्मावती की बात सुन करके भी उस पर कोई ध्यान नहीं दिया, मानो [उन्‍होंने] सुना ही नहीं। इसलिये उद्धवजी से पूछा— ‘ब्रजवासियों के प्रति मेरा क्या कर्तव्य है?’ [उन्‍होंने] इस प्रकार से पूछा कि मानो वे कुछ जानते ही नहीं हैं, [मानो] अज्ञानी व्यक्ति हैं, कुछ भी नहीं जानते।”

इसका भी कोई विशेष कारण है। वह कारण यह है कि [कृष्ण विचार कर रहे हैं—] “मैं तो ब्रज में जाना चाहता हूँ, किन्तु यहाँ माताजी, पिताजी और मथुरा के लोग हैं, वे दुःखी होंगे। इसलिये यदि उद्धव कह देगा कि ‘ब्रज में आपका जाना ही उचित है; आपके बिना वे मर जायेंगे’, तब फिर मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

इसलिये ऐसा [विचारकर] कृष्ण ने उद्धवजी से कहा— “तुम ही बोलो।”

भो विद्वद्वर तत्रत्याखिलाभिप्रायविद् भवान्।
तेषामभीष्टं किं तन्मे कथयत्वविलम्बितम् ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.77)

[हे विद्वानों में श्रेष्ठ श्रीउद्धव! तुम ब्रजवासियों के समस्त अभिप्रायों को जानते हो। उन लोगों के अभीष्ट क्या-क्या है, शीघ्र ही मुझे बतलाओ।] GVP

“आप ब्रज में गये। वहाँ बहुत दिन रहे। ब्रजवासियों से, नन्दबाबा से, गोपियों से भी घुले-मिले। और उसके बाद में उनकी भावनाओं को आप अच्छी तरह से जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं। [इसलिये] आप उन्हीं सबका विचार करके हमें बतलाइये कि मैं उन्हें क्या दूँ? कैसे वे प्रसन्न होंगे?”

क्योंकि देवकीजी ने भी ऐसा कहा था कि “तुम उनको जो देना है, सो दे दो।” इसलिये [भी कृष्ण ने उद्धवजी से ऐसा] पूछा कि “देवकी मैया का भी अभिप्राय आप [जानते] हैं, तो यदि मैं अपने मन से करूँगा, तो फिर गड़बड़ हो जायेगा। इसलिये उद्धव ही बतलाये और तब फिर मैं कहूँगा कि उद्धव तो हमारा मन्त्री और सुहृद है। इसने जैसा कहा, वैसा ही मैंने पालन किया। हमारे ऊपर में दोष नहीं आयेगा, वह उद्धव के प्रति ही आयेगा।”

‘तत्श्रुत्वा’ — इसे सुन करके उद्धवजी हृदय से बड़े दुःखित हुए। कृष्ण की बातें सुन करके वे बहुत दुःखी हुए। क्षणभर तक लम्बा, दीर्घ नि:श्वास छोड़ करके फिर बोले—बड़े अनुताप के साथ में दुःख करते हुए बोले। क्यों? क्योंकि उद्धव प्रेम में विवश हैं। वे ब्रज में गये थे, उन्होंने गोपियों की दशा देखी, गायों की दशा देखी, सारे ब्रज [की स्थिति] देखी—एकदम सूना! और जब से लौटे हैं [तब से उनके मन में यह चिन्‍ता थी कि] बछड़े, गायें [जीवित] हैं कि मर गयीं; गोपियाँ भी कुछ हैं कि नहीं। इसलिये वे सोच रहे थे कि यदि कृष्ण... हमने भी ब्रजवासियों से प्रतिज्ञा की थी कि कृष्ण को ले करके हीं आऊँगा। और जब यहाँ आया, कृष्ण दुःखित तो हुए, किन्तु गये नहीं। और फिर वही बातें वे हमसे पूछ रहे हैं!

मतलब क्या? भगवान् इस विषय को जानते हैं, कृष्ण इस विषय को जानते हैं कि ब्रजवासियों का अभीष्ट क्या है, गोपियाँ क्या चाहती हैं। [क्या वे] राज्य चाहती हैं? या ब्रजवासी लोग [राज्य] चाहते हैं? [क्या] नन्दबाबा इत्यादि राज्य चाहते हैं? नहीं। वे क्या चाहते हैं? किसी प्रकार से हमारा बेटा ब्रज में लौट आये; किसी प्रकार से हमारे प्राणवल्लभ कृष्ण लौट करके आयें। इसके अतिरिक्त वे लोग और कुछ भी नहीं चाहते हैं। कृष्ण यह अच्छी तरह से जानते हैं, किन्तु फिर भी उद्धवजी से उन्होंने पूछा। उद्धवजी भी यह समझ करके कि “देखो तो, कृष्ण कैसे चतुराई से बात कर रहे हैं! भीतर से तो निष्ठुर हैं! जानते हैं कि उनके [ब्रज में] जाये बिना ब्रजवासियों को सान्त्वना नहीं होगी, किसीको भी सान्त्वना नहीं होगी, यहाँ तक कि गायों और बछड़ों को भी नहीं, गोप-गोपियों की तो बात ही क्या है! तथापि हमसे पूछ रहे हैं। इसलिये ये अनजान की भाँति क्यों पूछ रहे हैं? सम्भवतः [कृष्ण की] जाने की इच्छा नहीं है; कुछ टाल–बहाना कर रहे हैं।”

इसलिये गोपियों के प्रेम से विवश हृदय होकर और उनके भाव को समझ करके उद्धवजी ने कुछ विचार किया कि “कृष्ण ने यह क्यों कहा? उनके कहने का तात्पर्य क्या है?” और फिर समझ करके बड़ा विषाद करते हुए, दुःख प्रकाश करते हुए बोले। ‘तत्श्रुत्वा’ [इत्यादि श्लोक से] यही बतला रहे हैं।

भगवान् सर्वज्ञ हैं—चाहे वे ब्रज में हों या चाहे जहाँ [कहीं] भी हों। दो बातें उनके साथ में रहती हैं। [एक ओर] वे मधुररस का आस्वादन करते हैं, फिर भी उनकी ऐश्वर्यमयी शक्तियाँ भी [उनके साथ] रहती हैं। [यद्यपि वे] माधुर्य के द्वारा आच्छादित रहती हैं, किन्तु समय-समय पर वे प्रकटित हो जाती हैं। इसलिये कृष्ण में सर्वज्ञता और मुग्धता दोनों बातें एक ही साथ [विद्यमान] हैं। [कृष्ण] सर्वज्ञ हैं। वे वृन्दावन में रास कर रहे हैं और [उसी समय] कोई भक्त उनको पुकारता है, [तो क्या वह पुकार उनके कानों तक नहीं पहुँचेगी?] यदि द्रौपदी ने करुण-स्वर से पुकारा, तो वह पुकार उनके कान में जायेगी कि नहीं? [अवश्य]जायेगी। इसलिये वे सर्वज्ञ भी हैं और साथ-साथ में क्या हैं?

भक्त: मुग्ध

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मुग्ध। ‘मुग्ध’ माने क्या? ओह! अबोध की भाँति [व्यवहार करना—] मानो कुछ नहीं जानता हूँ। [जबकि वस्तुतः] वे सर्वज्ञ और परम-दयालु-शिरोमणि भगवान् हैं।

कृष्ण की इन बातों को सुन करके उद्धव बड़े दुःखित हुए और उन्होंने सोचा कि— “ये वञ्चनामात्र है। केवल ये वञ्चना कर रहे हैं। [इनकी ब्रज में] जाने की इच्छा नहीं है, इसलिये ये ऐसा कह रहे हैं। नहीं तो इनको चले जाना चाहिये था—जिस दिन मैं ब्रज से लौटा और इनको [ब्रजवासियों की विरहमय स्थिति के विषय में] बतलाया, उसी दिन इनको चलना चाहिये था। [किन्तु ये] गये नहीं।”

तात्पर्य क्या है? क्यों वञ्चना कर रहे हैं? तादृश (उनके) प्रियजन अर्थात् जो ब्रज के लोग हैं—नन्दबाबा, यशोदा मैया, सखा लोग, सखियाँ—उनके प्रति कृष्ण का ऐसा व्यवहार! ऐसा निष्ठुर (rude) व्यवहार! यह विचार करके [उद्धवजी] विस्मित हो गये— “मैंने सोचा था [कि उनके विषय में सुनकर मेरी भाँति] इनका चित्त भी द्रवित हो जायेगा, किन्‍तु नहीं हुआ। ऐसा क्यों हुआ?”

ब्रजवासियों के सङ्ग से अक्रूर का [चित्त द्रवित] नहीं हुआ, और लोगों का नहीं हुआ। किन्तु उद्धवजी का क्यों हुआ? उनमें कुछ तो ब्रज का भाव आयेगा ही; उनके प्रति सहानुभूति आयेगी, क्योंकि उन्होंने [गोपियों की चरणधूलि की] वन्दना की थी— ‘आसामहो चरणरेणुजुषामहं’[#2], ‘वन्दे नन्दव्रजस्‍त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:’[#3], ‘या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामैः’[#4] इत्यादि इन सब श्लोकों में उनकी [ब्रजगोपियों की] महिमा बतलायी। इसलिये [ब्रजप्रेम को समझने की] कुछ [योग्यता] तो उनके अन्दर में है। इसलिये ये विस्मित [हो गये]— “ऐसे ब्रजवासी जो उनके लिए विरह में बड़े कातर हो रहे हैं, उनकी ये वञ्चना [क्यों] कर रहे हैं! ऐसा ये क्यों कर रहे हैं? — ये इनकी समझ में नहीं आया।

हाँ, किन्तु कृष्ण के भीतर में जो भावना है कि ‘मेरे जाने से भी ब्रजवासियों को सान्त्वना नहीं होगी’, सम्भवतः उद्धवजी इस बात को नहीं समझ रहे। इसलिये वे क्या कहने लगे?

उद्धव उवाच—
न राजराजेश्वरताविभूतीर्न दिव्यवस्तूनि च ते भवत्तः।
न कामयन्‍तेऽन्यदपीह किञ्चिदमुत्र च प्राप्यमृते भवन्‍तम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.79)

[श्रीउद्धव ने कहा—वे ब्रजवासी न तो चक्रवर्ती राजराजेश्वरता चाहते हैं और न विभूतियाँ, वे न तो स्वर्ग की सम्पत्ति चाहते हैं और न ही इस लोक की किसी सम्पत्ति को प्राप्त करने की इच्छा करते हैं; वे तो केवल आपको ही चाहते हैं।] GVP

वे नन्दबाबा, ब्रजवासी और गोपियाँ—आपसे कुछ भी नहीं चाहते, कुछ भी नहीं। उनका प्रेम कैसा है? निःस्वार्थ। गोपियाँ ‘अन्याभिलाषिता शून्यं’ [#5] की चरमसीमा तक हैं; उनसे बढ़ करके और कोई नहीं है। और लोगों की कुछ [‘अन्याभिलाषिता’] हो सकती है, किन्तु गोपियों का [प्रेम] एकदम अन्याभिलाषिता रहित है। वे तन-मन-वचन से निरन्‍तर कृष्ण के प्रति सेवामय हैं, और उनका [प्रेम] पराकाष्ठा तक है। वे [अथवा कोई भी ब्रजवासी] कोई भी विभूति, राज्य, ऐश्वर्य अथवा पारिजात इत्यादि स्वर्गीय वस्तुओं की अपेक्षा नहीं करते। द्वारकावासी [कुछ] चाहते हैं, इसलिये कृष्ण सत्यभामा के लिए पारिजात पुष्प लाये और उन [यादव] लोगों के लिए स्वर्ग की राजसभा [सुधर्मा सभा] वहाँ पर ले आये। किन्‍तु ब्रजवासियों की तनिक भी कोई कामना-वासना नहीं है। आपके अतिरिक्त, आपकी विजय के अतिरिक्त अर्थात् आपके ब्रज में जाने के अतिरिक्त, उनकी कोई भी लौकिक और पारलौकिक, किसी भी भोग-द्रव्य की कदापि कामना नहीं है। इसलिये ब्रजवासीजन [आपके अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त करने की अभिलाषा नहीं रखते हैं।] यहाँ तक कि गोपियाँ कहती हैं—

आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मामदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥
-शिक्षाष्टकम् (8)

वे (कृष्ण) लम्पट अपनी सेवा में अनुरक्त मुझ दासी को प्रगाढ़ आलिङ्गन द्वारा आह्लादित करें या पैरों तले रौंद डालें अथवा अपना दर्शन न देकर मुझे मर्मान्तिक पीड़ा प्रदान करें या उनकी जैसी भी इच्छा हो, करें, यहाँ तक कि दूसरी प्रियाओं के साथ मेरे सामने ही रमण करें; फिर भी वे ही मेरे प्राणनाथ हैं। उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है। (GVP)

[गोपियाँ कहती हैं—] “यदि कृष्ण को मथुरा में रहकर, मथुरावासियों के साथ में रहना पसन्द है; यदि उसमें ही उनका जी चाहता है—तो वहीं रहें, यहाँ पर लौट करके न आयें। चाहे हम उनके विरह में छटपटा करके मर भी जायें, तो भी जहाँ उनको सुख मिलता है, वहीं रहें।”

ना गणि आपन दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख,
ताँर सुख—आमार तात्पर्य।
मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महासुख,
सेइ दुःख—मोर सुखवर्य॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत अन्‍त्यलीला (20.52)

[मुझे अपने कष्टों की तनिक भी चिन्ता नहीं है, मैं सदा-सर्वदा श्रीकृष्ण के सुख की ही कामना करती हूँ। उन्हें सर्वप्रकार से सुखी रखना ही मेरे जीवनका मूल उद्देश्य है। यदि मुझे दुःख देने से उन्‍हें सुख मिले, तो वह दुःख ही मेरे लिए परम सुख है।] IGVP

[गोपियाँ कहती हैं—] “यदि कृष्ण हमारे हृदयों को दुःखों से पीस दें, हमारे सामने ही अन्य बालाओं से मिलें, महालम्पट दुराचारी भी हों—तो भी वे हमारे [प्राणनाथ] हैं; दूसरा कोई नहीं।”

इसलिये कभी गोपियों के भीतर ऐसी कोई भावना नहीं आयी। [उनकी भावना है—] “यदि कृष्ण मथुरा में या द्वारका में सुखी हैं तो सुखी रहें। हम लोग दुःख से मर जायेंगी, किन्तु वे वहीं पर रहें।”

ब्रज से मथुरा लौटते समय उद्धव ने श्रीमतीजी से पूछा— “उन्होंने तो आपके लिए सन्‍देश दिया था, किन्तु क्या आपका भी कुछ सन्‍देश कृष्ण के प्रति है?”

तो वह बोलीं— “नहीं।”

फिर उन्‍होंने दूसरी बार कहा, दूसरी बार। फिर तीसरी बार भी पूछा— “यदि आपका कोई ऐसा सन्‍देश हो कि कृष्ण शीघ्र ही यहाँ पर लौट आयें, तो मैं उनसे कहूँ।”

तब वह बोलीं— नहीं, यह मत कहना। यह भी मत कहना कि आपके विरह में गोपियाँ तड़प-तड़प करके मर रही हैं। कृष्ण का हृदय मक्खन से भी कोमल है। मक्खन हाथ में लेते ही पिघल जाता है, कृष्ण का हृदय उससे भी अधिक [कोमल है।] इसलिये कृष्ण हम लोगों का दुःख सह नहीं सकेंगे। हो सकता है कि तुरन्त शरीर को छोड़ दें। इसलिये मत कहना। वे वहाँ सुखी हैं। हम लोग भी उनको भूल चुकी हैं। यदि उनको नहीं आना है, तो आने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

उद्धव [कृष्ण से] कह रहे हैं— “इस प्रकार से ब्रजवासी आपके अतिरिक्त और कोई भी राज्य, ऐश्वर्य, विभूति इत्यादि की [तनिक] भी कामना नहीं करते। आप ध्यान से सुनिये, मैं निवेदन कर रहा हूँ। और सुनने के बाद में स्वयं विचार कीजिये और विचार करके जो कर्तव्य है, आप वही करें। आप मेरी बात को सुनिये; यदि अच्छी लगे तो करिये और अच्छी न लगे तो मत करिये”

[पुनः] कृष्ण को [कह रहे हैं—] जब आपने कंस को मारा, नन्दबाबा मथुरा नगरी के बाहर यमुना के तट पर गाड़ी के साथ में प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब कृष्ण-बलदेव आयेंगे। उस समय आप दोनों नहीं आये। [बाद में जब आप लोग वहाँ पहुँचे, तब नन्‍दबाबा] बोले— ‘देखो, बलदेव तुम हमारे पुत्र हो—यह बात ठीक है। किन्तु तो भी देवकी और वसुदेव के सारे पुत्र मारे गये हैं—केवल तुम ही बचे हो। यदि तुम यहाँ नहीं रहोगे, तो वसुदेव और देवकी दोनों मर जायेंगे। इसलिये मेरी इच्छा है कि तुम यहाँ कुछ दिन वास करो।’”

बलदेव बोले— “यह असम्भव है। मैं कृष्ण को छोड़ करके एक सेकण्ड भी कहीं इधर-उधर नहीं जा सकता। इसलिये आप कृपा करके कृष्ण के साथ में हमें [भी ले चलिये।”]

तब कृष्ण [नन्दबाबा से] बोले— “आपके बन्धु तो वसुदेव और देवकी हैं। मैं जानता हूँ कि [यदि] बलदेव [यहाँ से चले] जायेंगे, तो वे मर जायेंगे, और उनका दूसरा कोई नहीं है। इसलिये बलदेव का [यहाँ] रहना ही अच्छा है। किन्तु बलदेव [मेरे बिना] रह नहीं सकते। इसलिये यदि आप आदेश दें, तो मैं भी कुछ दिन—दो-चार दिन बलदेव के साथ में यहीं पर ठहर जाऊँ। और फिर काम होने के बाद में हम दोनों भाई ब्रज में लौट आयेंगे।”

नन्दबाबा बड़े दुःखी हुए। कृष्ण राजभवन से बड़े-बड़े बेशकीमती हीरे-जवाहरात इत्यादि के आभूषण और वस्त्र—स्वर्णिम वस्त्र इत्यादि ले आये और उनको दिये [और उनसे कहा—] “ये मैया को दे देना, और मैया गोपियों को दे देंगी।”

नन्दबाबा मन-ही-मन में सोच रहे हैं— “ये क्या हुआ? एक तो ये जा नहीं रहा है। यशोदा से मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं कृष्ण और राम को अवश्य ही ले करके आऊँगा। एक तो मैं [उन्‍हें] ले जा नहीं सका, और [ऊपर से] ये गहने-अलंकार ले जा रहा हूँ। इनको देने से वे कहेंगे— ‘तू बेच करके आया! कृष्ण और बलदेव को बेच करके आया है!’ मैं कैसे मुख दिखाऊँगा?”

किन्तु कृष्ण के अनुरोध करने पर [नन्दबाबा वे आभूषण] ले तो गये, और यशोदा मैया तथा गोपियों से बोले— “देखो, ये आभूषण, स्वर्ण-अलंकार इत्यादि कृष्ण ने [भेजे हैं।] उसके सुख के लिए तुम लोग इन्‍हें ग्रहण करो। और कुछ दिनों में ही वह अवश्य आयेगा, क्योंकि मेरा बेटा झूठ नहीं बोलता—परमसत्यवादी है। इसलिये जब वह आयेगा और देखेगा कि तुमने इन्‍हें धारण नहीं किया तो वह बड़ा दुःखी होगा। इसलिये तुम लोग [उसकी प्रीति के लिए इन्हें धारण कर लो।”]

तो इसलिये कृष्ण की प्रीति के लिए ही उन लोगों ने [वे अलंकार] धारण किये। किन्तु पहले वे बोली थीं— “क्या आप इन आभूषणों के बदले कृष्ण को बेच करके यहाँ पर आये हैं?” नन्दबाबा उस दिन से कभी घर से [बाहर] नहीं निकले—कभी निकले नहीं।

इसलिये [उद्धवजी कृष्ण से] कह रहे हैं— “मैं जो कह रहा हूँ, निवेदन कर रहा हूँ, आपके चरणों में—आप बड़ी सावधानी से सुनें। यदि आपको अच्छा लगे तो करें और यदि अच्छा न लगे तो मत कीजिये। मैं उसमें कर ही क्या सकता हूँ? यह आपकी इच्छा के ऊपर निर्भर है।”

[40:27-53:16 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद और भक्तों के द्वारा कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Suppose Kṛṣṇa is totally absorbed in tasting rāsa-līlā — totally absorbed. And at that time, if anyone, even a śaraṇāgata-bhakta, is praying to Kṛṣṇa…

‘Ṣaḍ-aṅga-śaraṇāgati hoibe yāhāra,
tāhāra prārthanā śune Śrī-Nanda-kumāra.’

If Kṛṣṇa is totally absorbed in Vṛndāvana, in rāsa-līlā—day and night—serving Śrī Rādhikā there, [serving] Her lotus feet… and if anyone, any bhakta like Draupadī, any bhakta like Gajendra, or any śaraṇāgata-bhakta, is praying from the core of their heart — [then] who will hear? Because Kṛṣṇa is totally absorbed there. Who will hear? Anyone may say that the manifestation of Kṛṣṇa as Paramātmā — who is sākṣī — He will hear. But that devotee is not praying to Nārāyaṇa, nor to Paramātmā Kṣīrodakaśāyī. He is not praying there. He is praying to Kṛṣṇa, Nanda-kumāra. And Kṛṣṇa is bound to hear.

That is why I told that He is sarvajña, and at the same time He is mugdha. He is mugdha. Because at that time Yogamāyā is serving Him. She is [always] finding, searching for any occasion by which she can serve — and she serves. Kṛṣṇa does not know all these things; but even then, she does that.

[मान लीजिये कि कृष्ण रासलीला के आस्वादन में सम्‍पूर्ण रूप से निमज्जित हैं—सम्पूर्ण रूप से निमग्न। और उसी समय यदि कोई भी, यहाँ तक कि कोई शरणागत-भक्त भी कृष्ण से प्रार्थना कर रहा हो…

‘षडङ्ग-शरणागति हइबे जाँहार।
ताँहार प्रार्थना सुने श्रीनन्दकुमार॥

जिसकी छः प्रकार की शरणागति होगी, श्रीनन्‍दनन्‍दन कृष्ण एकमात्र उसीकी प्रार्थना सुनते हैं। (GVP)

यदि कृष्ण वृन्दावन में दिन-रात रासलीला में श्रीराधिकाजी की सेवा में, उनके चरणों की सेवा में पूर्ण रूप से निमग्न हों… और यदि कोई भी — द्रौपदी जैसे भक्त, गजेन्द्र जैसे भक्त, या कोई भी शरणागत-भक्त — अपने हृदय की गहराई से प्रार्थना कर रहा हो, तो कौन सुनेगा? क्योंकि कृष्ण तो वहाँ पूर्ण रूप से निमग्न हैं। कौन सुनेगा?

कोई कह सकता है कि कृष्ण का परमात्मा रूप, जो साक्षी है — वह सुनेगा। परन्तु वह भक्त न तो नारायण से प्रार्थना कर रहा है, न क्षीरोदशायी परमात्मा से। वह तो नन्दकुमार कृष्ण से ही प्रार्थना कर रहा है और कृष्ण को सुनना ही होता है।

इसीलिये मैंने कहा कि वे सर्वज्ञ भी हैं और साथ ही साथ मुग्ध भी। जब वे मुग्ध हैं, उस समय योगमाया उनकी सेवा कर रही होती हैं। वह सदैव कोई अवसर ढूँढ़ती रहती हैं कि किस प्रकार सेवित किया जाए — और वह सेवा करती भी हैं। कृष्ण को इन सब बातों का ज्ञान नहीं रहता; फिर भी योगमाया यह सब करती रहती हैं।]

अब हम लोग अपने विषय पर आते हैं।

उद्धव [कृष्ण से] कह रहे हैं— “नन्दबाबा गहने ले आये, अलंकार ले आये और ले करके गोप-गोपियों के सामने रख दिये। उनको देख करके ब्रजवासी या गोपियाँ कह रही हैं— ‘बड़े कष्ट की बात है, बड़े दुःख की बात है। हम लोगों के जीवन को धिक्कार है, बहुत धिक्कार है! अभी [इस अवस्था में भी] हम लोग बच कैसे रही हैं? अन्त में कृष्ण ने [क्या हमारे विषय में] यही सोचा है कि हम उनसे आभूषणों की अपेक्षा करते हैं; हम उनको नहीं चाहती हैं। [क्या कृष्ण ने यही समझा कि हम चाहती हैं] कि वे वहाँ रहें और अलंकार, रुपया, पैसा यहाँ भेजते रहें!”

जैसे कोई एक व्यक्ति विदेश में नौकरी (service) के लिए गया—वहाँ पर रुपया कमा रहा है। और रुपया कमा करके मनीआर्डर से अपने घरवालों को भेज रहा है। घरवाले कहते हैं— “अच्छा है, यदि रुपया नहीं भेजता तो हमारा जीवन कैसे चलता?’ यह स्वार्थ है।

ऐसे ही गोपियाँ कह रही हैं— “धिक्कार है हमें कि कृष्ण ने यही समझा! हमारे प्रेम का यही मूल्य है—आभूषण!—ये सोचा। धिक्कार है हमें! हमारे प्राण इसको देख करके निकल नहीं रहे हैं, धिक्कार है! धिक्कार है! हमारा हृदय वज्र से निर्मित है। कृष्ण को छोड़ करके ये वसन और भूषण—नन्दबाबा हमारे लिए लाये, और कृष्ण ने भेजा। इन नन्दबाबा को भी धिक्कार है!”

[गोपियाँ] अपने को तो धिक्कार दे रही हैं, नन्दबाबा को भी धिक्कार [दे रही हैं।] और कृष्ण के लिए सोच रही हैं कि— ‘कृष्ण ने हमारे प्रेम का यही मूल्य समझा!’

[उद्धवजी ने कहा—] “हे प्रभु! आपकी मैया यशोदा और उनके साथ में समस्त ब्रजवासी  आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ‘आयास्य इति’ [#6] आपने प्रतिज्ञा करके उनसे कहा था— ‘मैं आऊँगा; कल नहीं तो परसों अवश्य आऊँगा।’ इसीलिये वे अपने प्राणों को धारण कर रही हैं कि [कृष्ण] आयेंगे और यदि हम मर गयीं तो [उनका] क्या होगा?”

उसी को चैतन्यचरितामृत में बतलाया गया है कि— ‘हम तो मर गयी होतीं; मरती क्यों नहीं हो? इसलिये कि यदि वह आयेगा और फिर देखेगा कि हम [जीवित] नहीं हैं, तो वह भी मर जायेगा।’

तो वही प्रिया धन्य है, जो [अपने प्रियतम का हित चाहती है।] चैतन्यचरितामृत में आया— ‘सेइ [सती—प्रेमवती।’] अर्थात् वे प्रिया और प्रियतम दोनों धन्य हैं जो [अपने प्रिय का हित चाहते हैं।] वह प्रियतम धन्य है जो प्रिया के लिए अपने जीवन को रखता है; और जो प्रियतमा अपने प्रिय के लिए ही जीती है, वह धन्य है। चैतन्यचरितामृत एक अद्भुत ग्रन्थ है।

भक्त: सेइ सती—प्रेमवती [#7]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वही प्रेमवती है, जो मर नहीं जाती, बल्कि उनके लिए जीवन धारण करती है।

देखो, राधिकाजी तो यह कहती हैं— “हे मालती! हमने तुम्हें लगाया।” [राधिकाजी ने] मालती का पौधा [लगाया।] अब वह पुष्प देने योग्य हो गया। तो विरह में कहती हैं— “देखो, अब तो मैं मर रही हूँ। जब कृष्ण आयेंगे तो अपने [फूलों] को मिला करके ये फूलों का हार कृष्ण को पहना देना। और कहना कि तुम्हारी चिन्ता करते-करते…” देखो, कितना विरह व्यथा जीवन!

[उद्धवजी ने कहा—] “तो उस समय में यशोदा मैया ने जब अलंकार देखे, तो ‘तुम आओगे’ — इस आशा को उन्होंने सम्पूर्ण रूप से छोड़ दिया, अब नहीं आयेंगे। अब तक आशा थी क्षीण [आशा]— आयेगा, अवश्य आयेगा; किन्तु अब वह आशा भी लिप-पुत (मिट) गयी। और मृतक की भाँति, मृतप्राय हो करके अनशन-व्रत पर बैठ गयीं। खाना,पीना, सोना—सबकुछ यशोदा मैया ने छोड़ दिया।” उन गोपियों की क्या दशा होगी? यदि यशोदा मैया की यह दशा है, तो उन गोपियों की क्या दशा होगी?

कृतापराधवन्नन्दो वक्तुं किञ्चिद्दिनत्रयम्।
अशक्तोऽत्यन्तशोकार्त्तो व्रजप्राणानवन् गतान्॥
भवतस्तत्र यानोक्तिं ग्राहयन् शपथोत्करै:।
दर्शयन् युक्तिचातुर्यममूनेवमसान्त्वयत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.79)

[श्रीनन्द महाराज अपने को अपराधी समझकर तीन दिन तक कुछ भी बोल नहीं पाये। फिर शोक के कारण विह्वल ब्रजवासियों के प्राणों को निकलता देखकर उनकी रक्षा के लिए अनेक प्रकार की सौगन्ध खाकर ‘कृष्ण ब्रज में आयेंगे’ उनको ऐसा विश्वास दिलाया है तथा अनेक प्रकार की युक्ति-चातुरी के द्वारा उन्होंने किसी प्रकार उनको सान्त्वना दी है।] GVP

[उद्धवजी ने कहा—] “नन्दबाबा जब ब्रज में गये, तो अपने को ब्रजवासियों का अपराधी समझा— ‘हमने बहुत बड़ा भारी अपराध किया। ये अलंकार ले करके क्यों आया? कृष्ण के अनुरोध से तो ले आया, किन्तु इन्‍हें देखने से इनके प्राण विकल हो रहे हैं कि अब कृष्ण नहीं आयेगा। मैं इनको कैसे समझाऊँ।’ [नन्‍दबाबा] विकल हो गये। तीन दिन तक [किसीसे] कोई बात नहीं की। ‘किञ्चिद्दिनत्रयम्’ — किसीसे कुछ भी बात नहीं की। औंधे मुख हो करके घर में ही पड़े रहे। फिर बाद में, [जब उन्होंने] ब्रजवासियों को अत्यन्त शोकार्त, अत्यन्त कातर — मानो उनके प्राण कण्ठ तक आ गये हों — [इस दशा में] देखा, तो उनकी प्राण-रक्षा के लिए तीन दिन के बाद में शपथ लेकर बोले— ‘हमारा बेटा अवश्य आयेगा। वह परम सत्यवादी है। आप लोग चिन्ता न करें—अवश्य आयेगा, अवश्य आयेगा।’ [नन्‍दबाबा ने] किसी प्रकार से विश्वास उत्पन्न कराया—कैसे? विविध प्रकार की चातुरी से किसी प्रकार से उनको सान्‍त्वना दिया। ये ब्रज की [स्थिति है।”]

Now you can.

[62:23-66:15 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धवजी ने कहा कि— “आपने स्वयं नन्दबाबा से कहा था। क्या कहा था? ‘ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्’ [#8] सुहृदां माने होता है–बन्धुबान्धव। [आपने स्वयं नन्दबाबा से कहा था—] ‘आपके जो मित्र या भाई, जो वसुदेव, देवकी इत्यादि यादव लोग हैं, उनका कुछ दिन तक सुख-विधानकर, मैं ‘ज्ञातीन्’ आप जो हमारे रक्त-सम्बन्‍ध (blood relation) से युक्त, आत्मीय स्वजन हैं, आत्मा से सम्बन्धित—आप लोगों को देखने अवश्य जाऊँगा।’ नन्दबाबा ब्रजवासियों को यही [वचन] उद्धरित कर रहे हैं और सान्‍त्वना दे रहे हैं। शपथ [लेकर] कह रहे हैं— ‘देखो, हमारा पुत्र बड़ा सत्यवादी है। उसने ऐसा कहा है कि इन सुहृद लोगों का सुख-विधानकर अविलम्ब ही, बहुत शीघ्र ही आप जो हमारे आत्मीय हैं, आपसे जो मैं पैदा हुआ हूँ, आपका पुत्र हूँ—मैं आप लोगों का दर्शन करने के लिए आऊँगा। तो वह अवश्य आयेगा। वह कभी भी झूठ नहीं बोल सकता।’ इसलिये नन्दबाबा तरह-तरह की युक्ति इत्यादि का अवलम्बन करके उनको समझा रहे हैं।

द्रव्याण्यादौ प्रेमचिह्नानि पुत्र एतान्यत्र प्राहिणोत् सत्यवाक्यः।
शीघ्रं पश्चादागमिष्यत्यवश्यं तत्रत्यं स्वप्रस्‍तुतार्थं समाप्य॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.87)

[महाराज श्रीनन्द ने कहा—मेरा पुत्र कृष्ण सत्यवादी है, ब्रज में आने से पहले ही उसने प्रेम के चिह्न के रूप में इन वस्तुओं को भेजा है। वहाँ का आवश्यक कार्य शीघ्र समाप्त करके वह अवश्य ही ब्रज में आयेगा।] GVP

[नन्‍दबाबा ने कहा— “कृष्ण ने कहा है कि] ‘हमारा अभी कुछ काम रह गया है—दुष्टों का संहार करना, जैसे जरासन्ध, पौण्‍ड्रक इत्यादि का भी संहार करना बाकी है। यह काम पूरा करके मैं अवश्य आऊँगा।’ इसलिये आप लोग उसपर विश्वास रखिये। हमारा पुत्र कभी भी झूठा नहीं हो सकता। इस प्रकार वे नाना प्रकार की युक्तियों से [ब्रजवासियों को] समझाने लगे। ‘द्रव्याण्यादौ प्रेमचिह्नानि’ और यह जो अलंकार उसने भेजा है, यह तो प्रेम का चिह्न है और कुछ नहीं। जिसको हमारे पुत्र ने [स्वयं] भेजा है। तो इसे देख करके तुम लोग विरह-अग्नि में क्यों तड़पती हो? यह तो प्रेम का चिह्न है। इसलिये उसने जो ‘प्रेम-चिह्न’ भेजा है, उसे आप लोग धारण करें। जब वह [लौटकर] आयेगा और देखेगा कि उसकी भेजी हुई वस्तुओं को आपने धारण किया है, तो वह [अत्यन्‍त] प्रसन्न होगा। इसलिये आप लोग तनिक भी शोक मत करो।”

[69:12-70:26 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ब्रजवासी लोग बड़े सरल चित्त के होते हैं।

श्रुत्वा ते तत्र विश्वस्य सर्वे सरलमानसा:।
भवत्प्रीतिं समालोच्यालङ्करान् दधुरात्मसु॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.88)

[श्रीउद्धव ने कहा—सरल चित्तवाले ब्रजवासियों ने श्रीनन्द की बात पर विश्वास कर लिया तथा आपकी प्रीति की बात को विचार करके उन्होंने उन आभूषणों को भी अपने अङ्ग में धारण कर लिया।] GVP

ब्रजवासी लोग बड़े सीधे-साधे होते हैं। वे छल-कपट, राजनीति इत्यादि से बहुत दूर रहते हैं; [वे तो] केवल प्रेम ही जानते हैं। इसलिये उन्होंने सरल रूप से नन्दबाबा के वचनों पर विश्वास कर लिया और कृष्ण द्वारा भेजे गये उन अलंकारों को भी धारण कर लिया कि वे हमको [ये अलंकार पहना हुआ] देख करके [अवश्य] प्रसन्न होंगे।

भवान् स्वयमगत्वा तु यं सन्देशं समर्प्य माम्।
प्राहिणोत्तेन ते सर्वे बभूवुर्निहता इव॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.90)

[किन्तु आपने स्वयं वहाँ न जाकर मेरे द्वारा सन्‍देश भेजा, इसलिये वे सब ब्रजवासी मृतप्राय हो गये हैं।] GVP

और इधर आप कैसे हैं? वे तो सरल-चित्त हैं और आप ऐसे कुटिल चित्तवाले हैं कि उन सरल ब्रजवासियों का भी चित्त दुखा रहे हैं। अब वे मृतप्राय हो गये हैं। क्यों? इतना सुन करके भी आप ब्रज में नहीं गये, लौटे नहीं और आपने मेरे द्वारा संवाद भिजवाया। मैंने उनको सान्‍त्वना तो दी किन्‍तु उसका यह फल हुआ कि उस सान्‍त्वना से उनकी विरह-अग्नि और भी अधिक बढ़ गयी और उन्होंने यह निश्चित कर लिया कि अब कृष्ण कभी नहीं आयेंगे। इसलिये अब तो ब्रजवासी लोग एकदम मरने के कगार पर हैं।

उद्धवजी मन में चिन्ता कर रहे हैं— “ओह! ब्रजवासियों का कृष्ण के प्रति इतना अगाध प्रेम, और कृष्ण का उनके प्रति ऐसा कुटिल व्यवहार!”

इसीके लिए उद्धवजी कह रहे हैं— “आपने मेरे द्वारा संवाद भिजवाया। क्या संवाद भिजवाया? ‘अरे! मैं कहाँ नहीं हूँ? मैं तो सर्वत्र हूँ। ध्यान लगाने से ही मुझे सभी लोग सभी स्थानों पर देख सकते हैं। जैसे मिट्टी के घड़े में मिट्टी का कोई भी अभाव नहीं, सर्वत्र मिट्टी ही मिट्टी है—उसी प्रकार यह [समस्त] जगत् मुझसे उत्पन्न है, सारा लोक-समाज मुझसे ही प्रकट हुआ है। तत्त्व मैं ही हूँ; ज्ञान दृष्टि से देखो। मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसलिये तुम लोग मुझसे अलग नहीं हो। तुम लोग इच्छा करने पर भी मुझसे अलग नहीं रह सकतीं क्योंकि [तुम लोग] मुझसे ही बनी हो।’” और आप लोग बने हैं।

यह जो ज्ञान है, तत्त्वज्ञान है। किन्तु गोपियों ने इसका क्या किया? इसी वृन्दावन में उसकी गुदड़ी कर दी—फाड़-फूड़कर उसे यमुना में बहा दिया। और फिर वह यमुना में बहते-बहते-बहते [कहाँ] गया?

भक्त: खार समुद्र में

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: पहले प्रयाग में गया। वहाँ गङ्गा में मिल गया और फिर गङ्गा ने [उसे] ले करके क्या किया? अतल समुद्र में उस ज्ञान की गुदड़ी को बहा दिया। ब्रज में ये [तत्त्वज्ञान इत्यादि] सब चीजें सम्भव नहीं हैं, [वहाँ इनका कोई मूल्य नहीं।]

इसलिये [उद्धवजी] कह रहे हैं— [जब मैंने आपका सन्‍देश सुनाया]—“मैं अन्तर्यामी हूँ, मैं सर्वत्र हूँ। तुम लोग इस ज्ञान-दृष्टि से मेरा दर्शन करो, समाधि लगाओ।’ तो मेरे इस उपदेश को सुनकर गोपियाँ और बिगड़ गयीं।”

और स्वयं कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में भी यही कहा था, तो गोपियों ने उसका उत्तर क्या दिया था? याद है श्लोक?

आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं
गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.82.48)

[गोपियों ने कहा– “प्रिय प्रभो! आपकी नाभि कमल-पुष्प के समान है। संसारकूप में पतित जीवों के लिए आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी और योगी भी आपके चरणकमलों की आराधना करते हैं। वे ध्यान में उनके दर्शनों की अभिलाषा रखते हैं, परन्तु यदा-कदा ही वे उनके दर्शन पाते हैं। यद्यपि हम गृह-शृंखला में आबद्ध साधारण जीव हैं, किन्तु हम आपसे प्रार्थना करती हैं कि आपके ये चरणकमल हमारे हृदय में भी उदित हो।”] IGVP

गोपियों ने खीज करके कहा— “अरे! हमारी तो सब समय सहज समाधि है। बचपन से ही आपके अतरिक्त कुछ भी नहीं जानतीं। आपको भूल जाना चाहती हैं, किन्‍तु भूल नहीं सकतीं। योगी लोग समाधि से आपके दर्शन करने की चेष्टा करते हैं—[फिर भी] नहीं देख पाते; और हम तो आपको भूलने की चेष्टा करने पर भी भूल नहीं पातीं। और आप हमें योग की शिक्षा दे रहे हैं! जो संसार-कूप में पड़े हुए हैं, उनके लिए आपकी भक्ति कैसी है? वह संसार-कूप से निकालने के लिए डोरी के समान है। हमें उसकी आवश्यकता नहीं। ‘गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः’ — आप हमारे मन में उदित हों। मतलब क्या? हमारा मन और वन एक है। इसलिये वृन्दावन में आप पधारिये, तभी हम लोगों को तृप्ति होगी, सन्‍तुष्टि होगी—अन्यथा नहीं।”

भक्त: तारे उपदेश कराह, लोक हसाञा मार [#9]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: “जिस प्रकार से पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पञ्च महाभूत सबमें [अवस्थित] हैं—पार्थिव [जड़] वस्तुओं में सबमें। उसी प्रकार से मन, प्राण, बुद्धि, इन्द्रियाँ और गुण-समूह—इन सबका [आश्रय भी] मैं ही हूँ। तात्पर्य क्या? तुमसे मेरा कभी भी वियोग ही नहीं हैं।”—यह उद्धवजी के मुख से सन्‍देश है—“वियोग कहाँ है? देखो तो वियोग है? विचारपूर्वक ज्ञान की दृष्टि से देखो? [वियोग नहीं है] क्योंकि मैं ही उपादान-कारण हूँ। ‘उपादान’ माने मुझसे ही तुम लोग बनी हो, सब लोग बने हैं। अतएव मन इत्यादि सभी कार्यों में अनुगत रूप से सर्वत्र ही [विद्यमान] हूँ—मैं ही सबमें [अवस्थित] हूँ। जैसे चराचर-विश्व के कारण पञ्चमहाभूत हैं, उसी प्रकार मैं भी [मन आदि] समस्त [कार्यों और कारणों के आश्रय के रूप में ग्रथित हूँ।] गोपियों का शरीर, [मन, प्राण, बुद्धि] जो कुछ भी है, उसका [कारणस्वरूप] मैं ही हूँ।” इसलिये मुझको सन्देश …

इससे क्या हुआ? [यह सन्देश सुनकर] गोपियाँ और भड़क गयीं। उनकी विरह-अग्नि और [बढ़ गयी—] “हमको ज्ञान दे रहे हैं!”

इस प्रकार उद्धवजी कृष्ण से निवेदन कर रहे हैं— “आप विचार करें।”

अभी और कल भी बतलायेंगे। कल मैं कुछ विशेष कार्य से दिल्ली जाने वाला हूँ, और फिर उधर से मथुरा [चला जाऊँगा।] अब यह कथा मथुरा में होगी। अब तक यह [कथा] कहाँ हो रही थी? वृन्दावन में। अब कुछ दिन ये कथाएँ [मथुरा में] होंगी। और उसके बाद मैं फिर वृन्दावन में ही आऊँगा— हमारी परिक्रमा इत्यादि के समय में भी ये [कथाएँ होंगी।] आप लोग बड़े ध्यान से सुनेंगे और इन कथाओं का मर्म अच्छी तरह से समझिए।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You should try to [understand] all these harikathā very deeply and try to realize all of this. This is actually bhajana — nothing else is bhajana. This is bhajana.

[आप इन सभी हरिकथाओं को गहराई से समझने और हृदय से अनुभव करने का प्रयास करें। यही वास्तविक भजन है—इसके अतिरिक्त और कुछ भजन नहीं है। यही भजन है।]

भक्त: (बङ्गाली भाषा में...) राधाष्टमी का निमन्त्रण दे दीजिये।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh! Rādhāṣṭamī is coming very soon — [on the] 4th of September. Now today is the 29th, so only four–five days [are left.] I think [there is] no need of giving an invitation to you, because you want to be in Vṛndāvana. So I think that you will not come. So what should I do?

[ओह! राधाष्टमी बहुत शीघ्र ही आनेवाली है — 4 सितम्बर को। आज 29 तारीख है, तो अब केवल चार–पाँच दिन ही शेष हैं। मुझे लगता है कि आपको निमन्‍त्रण देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप वृन्दावन में ही रहना चाहते हैं। इसलिये मुझे लगता है कि आप नहीं आयेंगे। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिये?]

भक्त: (78:23 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ठीक है। [एक कीर्तन करो।]

[78:38-81:28 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्त्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्तास्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गं गतः साग्रजः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.43.17)

परीक्षित्! उस समय बलदेवजी के साथ रङ्गभूमि में प्रवेश करते हुए शृङ्गारादिसर्वरस-कदम्बमूर्ति श्रीकृष्ण मल्लों को वज्र के समान कठोर, साधारण नरों को नरोत्तम स्वरूप, कामिनियों को मूर्तिमान् कामदेव, गोपों को बान्‍धव, दुष्ट राजाओं को शासनकर्ता, माता-पिता के समान वृद्धजनों को शिशु, कंस को मृत्यु, अज्ञजनों को विराट्-पुरुष, योगियों को परमतत्त्व एवं भक्त-वृष्णियों को परम आराध्य के रूप में प्रतीत हो रहे थे। (GVP)

#2
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.61)

मैं तो ऐसी प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस श्रीवृन्दावन में कोई गुल्म-लता या औषधि-जड़ी-बूटी रूप में जन्म ग्रहण करूँ, जिससे मुझे उन ब्रजाङ्गनाओं की चरणधूलि निरन्तर सेवन करने को मिलती रहे। उन ब्रजगोपियों ने दुस्त्यज (जिसे छोड़ना अत्यन्त कठिन है) स्वजन-सम्बन्धियों तथा वेद की आर्य-मर्यादा को परित्यागकर श्रीगोविन्द के उन चरणकमलों का भजन किया है, जिन्हें श्रुतियाँ अभी तक भी खोज रही हैं। (GVP)

#3
वन्दे नन्दव्रजस्‍त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:
यासां हरिकथोद्गीतं पुनाति भुवनत्रयम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.63)

अतएव मैं श्रीनन्दराज के ब्रज की गोपियों के चरणकमलों की धूलि की बार-बार वन्दना करता हूँ, जिनके द्वारा गान की जानेवाली श्रीकृष्ण कथा त्रिभुवन को पवित्र करती है। (GVP)

#4
या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-
र्योगेश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।
कृष्णस्य तद् भगवत: चरणारविन्दं
न्यस्तं स्तनेषु विजहु: परिरभ्य तापम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.62)

स्वयं लक्ष्मीदेवी जिन श्रीकृष्ण की पदसेवा करती हैं, पूर्णकाम और आत्माराम बड़े-बड़े योगेश्वर तथा ब्रह्मा, शंकर आदि परम समर्थ देवता, जिन श्रीकृष्ण के पादारविन्दों की सेवा करते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों को रासलीला के समय साक्षात् रूप से अपने-अपने स्तनमण्डलोंपर रखकर और उनका आलिङ्गन करते हुए इन गोपियों ने अपने हृदय की विरह-व्यथा को शान्त किया था। (GVP)

#5
अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्‍धु (1.1.11)

श्रीकृष्ण को सुखी करने की स्पृहा के अतिरिक्त, समस्त प्रकार की अभिलाषाओं से रहित, ज्ञानकर्मादि के द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए ही कायिक, मानसिक और वाचिक– समस्त चेष्टाओं और भाव के द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गति से जो कृष्ण का अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्ण की सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओं को) उत्तमा-भक्ति कहते हैं। (GVP)

#6
तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तमः।
सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकैः ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.39.35)

यदुवंश-शिरोमणि श्रीकृष्ण ने देखा कि गोपियाँ उनके मथुरा-प्रस्थान से अतिशय सन्तप्त हो रही हैं। तब प्रेमपूर्ण वचनरूपी दूत के द्वारा “मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा”—इस प्रकार प्रेममय सन्देश देकर उन्हें सान्त्वना देने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण को भी तीव्र विरह-वेदना हो रही थी, परन्तु उन्‍होंने उसे अपने गाम्भीर्यगुण से छिपा लिया। (GVP)

#7
सेइ सती—प्रेमवती, प्रेमवान् सेइ पति,
वियोगे ये वाञ्‍छे प्रिय-हिते।
ना गणे आपन-दुःख, वाञ्छे प्रियजन-सुख,
सेइ दुइ मिले अचिराते॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (13.153)

वही सती ही प्रेमवती है तथा प्रेमवान् वही पति है, जो वियोग में भी प्रिय का हित चाहते हैं। वे अपने दुःख का विचार न करके केवल प्रियजन के सुख की ही कामना करते हैं। ऐसे दोनों प्रेमियों का शीघ्र ही मिलन होता है। (IGVP)

#8
यात यूयं व्रजं तात वयञ्च स्नेहदुःखितान्।
ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.45.23)

(श्रीकृष्ण सान्त्वना प्रदान करते हुए कहने लगे—) हे पिता! अब आप ब्रज में जाइये। हम यहाँ वसुदेव आदि आपके सुहृद्-सम्बन्धियों के द्वारा अभिलषित सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करके उन्हें सन्तुष्ट करेंगे और शीघ्र ही विरह दुःख से कातर आपसे और प्रियजनों से (मधुमङ्गलादि से) मिलने के लिए आयेंगे। (GVP)

#9
चित्त काढ़ि तोमा हैते, विषये चाहि लागाइते,
यत्‍न करि, नारि काढ़िबारे।
तारे ध्यान शिक्षा कराह, लोक हासाञा मार,
स्थानास्थान ना कर विचारे॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (13.140)

मैं तुमसे चित्त हटाकर विषय में लगाने की इच्छा करनेपर भी वैसा नहीं कर पाती। इसलिये तुम्हारे प्रति ऐसी अनुरक्ति ही जब मेरा स्वभाव है, तब मुझे ध्यान की शिक्षा देना—केवल लोकहास्य मात्र है; इसलिये तुमने स्थान-अस्थान का विचार नहीं किया है। (IGVP)

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