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Sri Brhad-bhagavatamrtam: Supremacy of the Vrajavasis and Vrndavana

52:06
#262
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 80%
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This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Note: Abrupt start and end
  • When Mother Rohini, overwhelmed with emotion, referred to Sri Krsna as cold-hearted, Rukmini and Satyabhama immediately objected.
  • To console the pain of separation felt by the vrajavasis, Krsna Himself wrote letters assuring them: "I will return to Vraja very soon."
  • Upon understanding the depth of the vrajavasis’ love, Uddhava was moved to tears. Though a great devotee, he found himself humbled and transformed by their pure devotion, becoming a servant to their love.
  • Kamsa’s mother accused the vrajavasis that they didn’t take care of Krsna. Mother Rohini’s firm response to this accusation.
  • Without true affection (mamata) for the Guru and Krsna, one cannot truly experience the pangs of separation (viraha). Separation arises only from deep love.
  • The unparalleled love of the vrajavasis for Krsna reveals their selfless, spontaneous, and natural devotion (prema).
  • Why Krsna tends cows daily - this activity is an intimate aspect of His divine lila with His devotees.
  • The beauty of Vrndavana-dhama
  • An insightful conversation between a suka and sari, how it is filled with symbolic meaning and Krsna’s glories and the mood of Vraja.
  • Meaning of "Kosi" - ko + asi.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् : ब्रजवासियों और वृन्दावन की सर्वोच्चता

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 5 सितम्बर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

[0:00-1:06 तक श्रील गुरुदेव भक्तों से प्रश्न करते हुए कि कौनसा ग्रन्‍थ पाठ हो रहा था और वह कहाँ तक सम्पन्न हो चुका था…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जब रोहिणी मैया ने कृष्ण को निष्ठुर बतलाया तो रुक्मिणी और सत्यभामा ने उनका खण्डन किया। और उसके बाद में फिर क्या हुआ?

भक्त: कृष्ण जब पूछ रहे थे कि क्या करना चाहिये, तो उद्धव ने …

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, कृष्ण ने उद्धव से कहा— “अब बतलाओ हमको क्या करना चाहिये?

भक्त: (1:48 अस्पष्ट) अब उद्धव कृष्ण से कह रहे हैं…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उस समय में कृष्ण ने अपने हाथों से पत्र लिखा। ये तो बतलाया था न?

[कृष्ण अपने] हाथों से पत्र लिखते हैं— “हे ब्रजवासियों! मैंने जो [कार्य] आरम्भ किया था— शत्रुओं का विनाश करना और यादवों को सन्‍तुष्ट करना— उसे [पूर्ण करके] मैं बहुत शीघ्रता से [लौट आऊँगा।] मैं अभी शीघ्र ही ब्रज में आ ही गया, ऐसा ही समझो।” इस प्रकार से उन्‍होंने प्रेमपत्र लिखा। फिर जब उद्धवजी ने देखा कि कृष्ण का अभिप्राय तो केवल वह चिट्ठी उनके द्वारा [ब्रज में] भेज देना है, तो वे बड़े दुःख के साथ में रोदन करने लगे। क्योंकि उद्धवजी ब्रजवासियों के मन के भावों को [भलीभाँति] जानते थे।

उद्धवजी ने कहा— “प्रभु! हमने निश्चय किया है कि आपके ब्रज में गये बिना ब्रजवासियों के जीवन की रक्षा नहीं हो सकती। वे [आपके अतिरिक्त] कुछ भी नहीं चाहते।”

परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं— “इसको सुनकर उसी समय कंस की माता पद्मावती हँसती हुई और सिर कम्पन करती हुई कहने लगी।”

ये [भी पहले पाठ] हो गया था।

भक्त: [हाँ जी,] ये भी हो गया था।

श्रीपाद माधव महाराज: उद्धव उत्तर दे रहे हैं…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: “अरे देवकी! मैं बहुत अच्छी तरह से समझ रही हूँ।” इसीके बाद से आरम्भ होगा।

[पद्मावती कहने लगी—] “उद्धव ने बहुत दिनों तक ब्रज में वास किया और ब्रजवासियों का गोरस-मक्खन इत्यादि खाया। ब्रजवासियों ने उद्धव को [गोरस] खिलाकर वशीभूत कर रखा है। इसलिये वे उद्धव की सहायता से तुम्हारे पुत्र को पुनः ब्रज में ले जायेंगे और [फिर] वहाँ के दुर्गम वनों—जंगलों से भरे, हिंसक प्राणियों से भरे हुए, कण्‍टक वन—में तुम्हारे पुत्र को गोचारण के लिए भेजे देंगे।”

ये भी हो गया था।

परिक्षित् महाराजजी ने कहा— “कंस की मैया की यह बात सुनकर कृष्ण सहन नहीं कर सके। साथ-साथ यशोदा की प्रियसखी तथा रामजननी—बलराम की माता [रोहिणी देवी] क्रोधित होकर कहने लगीं।”

ये भी हो गया था? नहीं?

भक्त: (4:53 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वहीं तक हुआ था।

भक्त: वहीं तक हुआ था, उससे आगे नहीं हुआ।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ठीक है। तुम लोग ठीक से बतलाइये तो, कोई कुछ शब्द ही नहीं कर रहे।

रोहिणीजी ने कहा— “अरे, कंस की मैया! क्या ब्रजवासी लोग कृष्ण को गो-रक्षा के लिए, दुर्गम वनों में गैया चराने के लिए ही लगाते हैं? वे तो कृष्ण को एक क्षण नहीं देखने से जीवन धारण भी नहीं कर सकते।”

और भी बोलीं— “एक क्षण [कृष्ण को] नहीं देखने से सखा लोग क्या करते हैं? यदि एक क्षण के लिए भी कृष्ण पेड़ों की आड़ (ओट) में हो जाते हैं, तो वे ढूँढ़ने लगते हैं—‘कृष्ण कहाँ गये? कृष्ण कहाँ हो? अरे भैया! कृष्ण कहाँ हो? कहाँ हो?’ एक क्षण भी वे [कृष्ण के बिना] जीवित नहीं रह सकते।”

जब कृष्ण ब्रज से मथुरा आये, तो नन्दबाबा सब सखाओं को भी [साथ] ले आये थे—सुबल, श्रीदाम, मधुमङ्गल इत्यादि सखा लोग आये थे। वे भी यहाँ पर आये थे। वे कृष्ण को छोड़कर रह ही नहीं सकते। गोपियाँ तो किसी प्रकार से वृन्दावन में रह गयीं, किन्‍तु ये लोग नहीं रह सके।

“अरे, हे सति!...”— [पद्मावती को ‘सती’ कहकर रोहिणी मैया] उसको ताना मार (taunting) रही है, ‘हे सति!’, अर्थात् तुम असती हो।

यदि कुछ वृक्ष का व्यवधान हो जाता या कृष्ण एक पेड़ के नीचे छिप जाते, तो [सखा लोग पुकार उठते—] ‘हे कृष्ण! हे कृष्ण! तुम कहाँ हो? शीघ्र आओ!’ [इस प्रकार] जोर से उच्चारणपूर्वक वे रोने लगते थे। जब तक कृष्ण नहीं मिल जाते, तब तक वे उनको ढूँढ़ते रहते। कृष्ण के दर्शन न मिलने पर एक दिन भी उन्हें प्रलय के समान प्रतीत होता और एक लवमात्र का समय भी उनके लिए चतुर्युग के समान लम्‍बा [प्रतीत होता।] ‘युगायितं निमेषेण’[#1] अथवा

अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटि युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.15)

[हे प्रिय! दिन के समय जब आप ब्रज से वन में विहार करने के लिए चले जाते हैं, तब आपको न देखकर एक क्षण का समय भी हमारे लिए एक युग के समान प्रतीत होता है और जब दिन के अन्तमें (सन्ध्याकालमें) आप गोष्ठ की ओर लौटते हैं, तब हम घुँघराली अलकावलियों से युक्त आपके श्रीमुखमण्डल को देखती हैं, तो पलक गिरनेमात्र का व्यवधान भी हम सहन नहीं कर पातीं। हमें तो वह विधाता विवेकहीन (मूर्ख) ही प्रतीत होता है, जिसने इन पलकों को बनाया है।] GVP

‘त्रुटि युगायते’ — कृष्ण के विरह में एक ‘त्रुटि’ माने पलक गिरने का समय ही [उन्‍हें] ‘युगायते’ माने [ऐसा प्रतीत होता कि] करोड़ो युग बीत रहे हैं। ऐसा क्यों होता है? विरह की अनुभूति किसे होती है? जिसकी जिसके प्रति जितनी ममता है, उसके लिए उसको उतना ही विरह होता है। और जिसको ममता नहीं है, उसे उसके लिए विरह नहीं है।

कृष्ण के प्रति इन लोगों (ब्रजवासियों) की ममता बहुत अधिक है, इसलिये वे उनके विरह में रह नहीं सकते। कृष्ण के विरह में सखा लोग दुःखी तो हैं, किन्तु यशोदा मैया जैसे रोते-रोते अन्‍धी-[सी] हो गयीं, ऐसा [विरह सखाओं को] नहीं होता— उनमें यह सम्‍भव नहीं। और गोपियाँ जैसे [विरह में] पागल हो गयीं, उन्हें दिव्योन्माद इत्यादि हो गया, [वैसा विरह] यशोदा मैया और नन्दबाबा में [सम्भव] नहीं। यहाँ तक कि ललिता और विशाखा को भी इतना विरह नहीं होता, जितना राधिकाजी को है। यह सब ममता [की पराकाष्ठा पर निर्भर है। इसी प्रकार] जिसको गुरु के प्रति ममता नहीं है, उसको गुरु के लिए भी विरह नहीं होगा—[विरह सदैव ममता के अनुपात में ही होता है।]

Those who have no mineness (mamatā) to guru [experience] no viraha for Gurudeva. Similarly, if [one has] no mamatā for Kṛṣṇa, [there can be] no viraha at all.

तो पहले यह [होना चाहिये कि] गुरु के प्रति कैसे ममता हो? वैष्णवों के प्रति ममता हो, शिक्षागुरु के प्रति ममता हो—तब [जाकर] कृष्ण के प्रति [ममता उत्पन्न] हो सकती है। ममता में कुछ…

और भी, [संसार में] यदि किसी से हमको अधिक लाभ [मिलता] है, [किसी से कुछ] प्राप्ति योग है, तो उसके लिए भी कुछ ममता होती है; किन्तु वह स्वार्थ है, स्वार्थयुक्त [ममता] है। जिस ममता में कोई स्वार्थ नहीं है, केवल आन्तरिक प्रीति है, उसमें विरह अधिक होगा। गोप-गोपियों, ब्रजवासियों की कृष्ण के प्रति निःस्वार्थ ममता है, इसलिये उनको विरह का दुःख भी [अधिक] होता है।

जब कृष्ण गोचारण से लौट करके आते हैं, तो वे लोग दोपहर से ही उनकी प्रतीक्षा में लग जाते हैं कि, ‘कृष्ण कब आयेंगे?’ और वे उसको कैसे निश्चित करते हैं कि कृष्ण आ रहे हैं? गायों के खुरों से धूलि आकाश में उड़ती है, या सिंगा और वंशी जब बजने लगती हैं, या मुरली की ध्वनि (sound) सुनकर वे समझ जाते हैं कि अब कृष्ण आ रहे हैं—और उस समय घर में कोई भी नहीं रहता; सभी लोग घर से बाहर आ जाते हैं। कहते हैं कि वे उन्मत्त दशा को प्राप्त हो जाते हैं। यह ब्रजवासियों का [प्रेम] है—स्वाभाविक! हृदय से पूर्ण।

इस जगत् में प्रेम नहीं है। [यहाँ] काल के प्रभाव से [लोग] वह प्रेम-ट्रेम सब कुछ भूल जाते हैं। यहाँ तक कि इस जगत् में [शिष्य] गुरु के विरोधी भी बन सकते हैं। जिसने जितना भी उपकार किया हो, उसके उपकारों को भी वे भूल सकते हैं। [किन्‍तु] अप्राकृत जगत् में ऐसा नहीं है। वे दूर हो जायेंगे, किन्तु भूल नहीं सकते।

Who will speak? Can you?

[12:32-17:39 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ब्रजवासी लोगों का और [उनमें भी] गोपियों का कृष्ण के प्रति इतना निःस्वार्थ प्रेम है कि वे क्षणभर भी उनको देखे बिना जीवन धारण नहीं कर सकतीं। भला वे गोपियाँ कृष्ण को दुर्गम वनों में भेजेंगी, जहाँ हिंसक पशु, [भयंकर जीव-]ज‍न्तु [रहते] हैं? यह कभी सम्भव नहीं है। यदि कोई कहे—[जब ऐसा है,] तो कृष्ण गायों के साथ में वन में क्यों जाते हैं? इसलिये [उसके लिए] कह रहे हैं कि कृष्ण गैयाओं को चराने के लिए नहीं जाते। किसलिये जाते हैं? कृष्ण बड़े कौतूहली हैं। कौतूहली माने क्या? बड़े रस के समुद्र हैं।

वृ‍न्दावन [अत्यन्‍त] रमणीय स्थान है। उसमें भ्रमण या विहार करने के लिए [कृष्ण] गोचारण का छल करते हैं। [कृष्ण गोचारण का] एक बहाना बनाते हैं और सखाओं के साथ में, बलदेवजी के सङ्ग में नित्य वन-भ्रमण करते हैं।

वृन्दावन कैसा रमणीय [स्थल] है?

जयति जयति वृन्दारण्‍यमेतन्मुरारे:
प्रियतममतिसाधुस्वान्‍तवैकुण्‍ठवासात्।
रमयति स सदा गाः पालयन् यत्र गोपीः
स्वरितमधुरवेणुर्वर्द्धयन् प्रेम रासे॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.1.5)

[जो साधुओं के हृदयकमल तथा श्रीवैकुण्ठ से भी श्रीमुरारी का अत्यधिक प्रियतम वासस्थान है, जिस स्थान पर वे स्वयं प्रत्येक गाय का पालन करते हैं, मधुर-मधुर वेणुवादन करते हुए सर्वदा रासविलास द्वारा सभी गोपियों का प्रेमवर्धन करते हैं, वे वृन्दावन सर्वोत्कर्ष से विराजमान हैं —सर्वोत्कर्ष से विराजमान हैं।] GVP

आनन्द-वृन्द-परितुन्दिलम् इन्दिराया
आनन्द-वृन्द-परिनिन्दित-नन्द-पुत्रम्।
गोविन्द-सुन्दर-वधू-परिनन्दितं
तद् वृन्दावनं मधुर-मूर्तम् अहं नमामि॥
-श्रीसाधनामृतचन्द्रिका (1.32)

[जो श्रीलक्ष्मी के आनन्दसमूह को परिपुष्ट करता है, जहाँ श्रीनन्दनन्दन आनन्दवृन्द द्वारा प्रशंसित (पूजित) हैं एवं जिसके दर्शन से श्रीगोविन्द की सुन्दर वधुगण (गोपियाँ) भी परानन्द को प्राप्त करती हैं, उसी मधुरमूर्ति वृन्दावन को प्रणाम करता हूँ।]

‘जयति जयति वृन्दारण्यमेतन्मुरारे:’— मुरारी के इस वृन्दावन की जय हो! कैसे? वैकुण्ठ की अपेक्षा भी वृन्दावन में रहना ‘साधु’ अर्थात् सौभाग्य की बात है। जहाँ पर कृष्ण गायों को चराते हैं, सुन्‍दर वेणु बजाते हैं और उससे गोपियों के हृदय में प्रेम उत्पन्न कर देते हैं, जहाँ पर गोप-गोपियाँ इत्यादि हैं जो प्रेमरस के अधार हैं, ऐसे कृष्ण-मुरारी का जो वृन्दावन है, उसकी जय-जय हो।

वहाँ ‘रमणीय’ कहने का तात्पर्य क्या है? रमण करने योग्य। परब्रह्म कृष्ण, रसिकवर कृष्ण के लिए [वृन्‍दावन ही] रमणीय स्थान है; द्वारका या मथुरा नहीं। वृन्‍दावन में सु‍न्दर-सु‍न्दर बेली, चमेली, जूही—सब प्रकार के फूल हैं। ऐसा कोई पुष्प नहीं जो [वहाँ] न हो। षड्‍ऋतुओं के सारे जो फूल हैं, वे सब एकसाथ [वहाँ खिलते हैं।] वहाँ पर सदैव वसन्‍त ऋतु है।

वहाँ पर भ्रमर [निरन्तर] गुँजार करते हैं। कोयल सब समय ‘कुहू- कुहू’ [का मधुर स्वर] करती है। मयूर आकाश में मेघों को देख करके मानो नृत्य करने लगते हैं और ‘के–का’ शब्द करने लगते हैं। यमुनाजी बड़े सु‍न्दर, निर्मल पानी के साथ चारों ओर बहती हैं—मानो चारो ओर से वह [वृन्‍दावन को] घेर करके रखती हैं। वहाँ पर यमुना की बालू कैसी है? स्वच्छ। वहाँ पर यमुना का तटप्रदेश कर्पूर के समान स्वच्छ और सुशीतल है। [वहाँ की तटभूमि] गायों के खाने [योग्य] घासों से भरी है। गायें एक ही स्थान पर चर-चर करके अघाह जाती हैं। वहाँ पर कोई हिंसक ज‍न्तु नहीं है। वहाँ पर भालू, [बाघ] इत्यादि नहीं हैं। [वहाँ] गायें हैं, मृग हैं—ऐसे सब [जीव-जन्‍तु हैं।]

भक्त: खरगोश, हिरण…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ऐसे सब [पशु-पक्षी] हैं, जो वृन्दावन की सु‍न्दरता को बढ़ाते हैं। ऐसे-ऐसे पशु-पक्षी जिनका कृष्ण से अत्य‍न्त प्रेम है और कृष्ण भी उनको प्रेम करते हैं। ज्योंहि कृष्ण वृन्दावन में पधारते हैं, तो सब पशु-पक्षी उनको चारों ओर से घेर लेते हैं—मयूर आ जाते हैं, कोयलें आ जाती हैं, कितने मृग इत्यादि आ जाते हैं और कृष्ण उस समय उन्‍हें बुलाने के लिए अपनी वंशी बजाने लगते हैं। इस प्रकार से [कृष्ण] वृन्दावन में भ्रमण करने के लिए [जाते हैं,] गोचारण के लिए नहीं जाते। वहाँ पर कोई हिंसक जानवर नहीं है, तो गायों को डर नहीं है। वे तो [वन में] जाकर अपने आप चर करके आ सकती थीं, कि‍न्तु नहीं। कृष्ण उसी गोचारण करने का बहाना [बनाकर] वृन्दावन में जाते हैं। किसलिये? [कृष्ण] सखाओं को भी साथ लेते हैं, बलदेवजी को भी—किसलिये? बहाने के लिए। वास्तव में उनका उद्देश्य क्या है, तात्पर्य क्या है? प्रेममयी जो गोपियाँ हैं, उनके हृदय में रमण करनेवाली जो गोपियाँ हैं, उनसे मिलने के लिए जाते हैं; उनके साथ विहार करने के लिए जाते हैं—राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड भाण्‍डीरवन [इत्यादि स्थानों] पर जाते हैं, जहाँपर गोपियाँ हैं। इसलिये वे केवल बहाना बनाते हैं।

तथा महाश्चर्यविचित्रतामयी कलिन्दजा सा व्रजभूमिसङ्गिनी।
तथाविधा विन्ध्यनगादिसम्भवाः पराश्च नद्यो विलसन्ति यत्र च॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.108)

[उन श्रीवृन्दावन की सखी श्रीयमुना भी चित्त को चमत्कृत कर देनेवाली अद्भुत शोभा से युक्त हैं। यही नहीं बल्कि विन्‍ध्याचल आदि पर्वतों से निकलनेवाली छोटी-छोटी नदियाँ भी इस वृन्दावन की शोभा को और भी अधिक वर्धित करती हैं।] GVP

जहाँपर कुसुमसरोवर, मानसीगङ्गा, पावनसरोवर [इत्यादि] न जाने कितने सरोवर हैं, और हवा बहने से उनमें तरङ्गे आती हैं। उनमें काले-काले भ्रमर सब [पुष्पों पर मँडराते रहते] हैं और हंस, सारंग इत्यादि उसमें विचरण करते रहते हैं। [उन सरोवरों का] पानी अत्यन्‍त स्वच्छ और निर्मल है—जिसको गायें भी पीती हैं, कृष्ण भी पीते हैं, सखा लोग भी स्नान करते हैं, उसमें विहार करते हैं। उसमें जब कृष्ण सखाओं [अथवा] सखियों के साथ विहार करते हैं, तैरते हैं, तो उसमें जो कमल (उत्पल) हैं, वे भी हिलोरे लेने लगते हैं। वह है न?

भक्त: कुसुमित सरोवरे कमल–हिल्लोल।
मङ्गल सौरभ बहे पवन कल्लोल॥
-मङ्गलारति (7)

[नाना प्रकार के फूलोंवाले सरोवर के बीच खिले हुए कमल के फूल हिल रहे हैं। मन्द गति से प्रवाहित होनेवाली पवन उन खिले हुए कमलपुष्पों की मङ्गलमय सुगन्ध को धारणकर सर्वत्र वितरण कर रही है तथा सभी को आनन्दित एवं प्रफुल्लित कर रही है।] GVP

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वहाँपर सु‍न्दर भीनी-भीनी सुग‍न्ध बहती है। मानो वहाँ की हवा फूलों का सौरभ ग्रहण करके भार से चल नहीं पाती है, लड़खड़ा करके चलने लगती है। ऐसा रमणीय [है यह] वृन्दावन! और वृन्दावन में फूल-पुष्प तो हैं ही, पेड़ भी हैं कि‍न्तु वृन्दावन में [विशेष रूप से] वृन्दाजी की प्रधानता है। वृन्दाजी की मञ्‍जरियों में इतना मधु है, जैसा और कहीं नहीं है। उनकी मञ्‍जरियों पर मधुमक्खियाँ बैठती हैं, भ्रमर बैठते हैं। और कि तो बात क्या कहूँ ‘तथाविधा’ यमुनाजी के साथ में और भी [विन्‍ध्याचल आदि पर्वतों से निकलनेवाली छोटी-छोटी नदियाँ भी इस वृन्दावन की शोभा को और भी अधिक वर्धित करती हैं।] वृन्दावन की सङ्गिनी यमुना है। बड़ी कठिनाई से यमुनोत्री से [यहाँ तक आती हैं।] किसलिये आती हैं वृन्दावन में? और वह टेढ़ी-मेढ़ी बहती हुई [यहाँ से] जाना नहीं चाहती और जब जाती हैं तो मूर्च्छित हो करके जाती हैं—कैसे? इसके बाद उसमें फिर धारा प्रवाह नहीं रहता और जब [समुद्र से] मिलती हैं न, तो एकदम जैसे थका हुआ कोई व्यक्ति है, ऐसी हो जाती हैं। कृष्ण-विरह और वृन्दावन-विरह से [मानो क्लान्त हो गयी हों।]

यहाँ पर फिर… और पर्वत कौन? विन्‍ध्याचल पर्वत। ‘विन्‍ध्यनगादिसम्भवाः’ विन्‍ध्यपर्वत आदि पर्वतों से निकली हुई क्षुद्र-क्षुद्र नदियाँ हैं। सरस्वती की एक धारा थी, जो मथुरा में मिलती है, वह वृन्दावन हो करके, नानाप्रकार के वनों से हो करके [बहती हुई] आती है। यमुनावती में यमुनाजी बहती हैं। इस प्रकार से वृन्दावन की शोभा अद्भुत, निराली और [अनुपम] है। कृष्ण उसमें विचरण करने के लिए, विहार करने के लिए और विशेष करके गोपियों से मिलने के लिए जाते हैं।

[27:21-32:26 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:

तत्तत्तटं कोमलबालुकाचितं रम्यं सदा नूतनशाद्वलावृतम्।
स्वाभाविकद्वेषविसर्जनोल्लसन्मनोज्ञनानामृगपक्षिसंकुलम् ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.109)

[उन नदियों के दोनों तट स्वच्छ कोमल बालू द्वारा परिपूर्ण हैं तथा नित्यनवीन घासों से मण्डित हैं। स्वाभाविक द्वेषसे रहित होने के कारण सदैव उल्लसित तथा परम मनोहर नाना-प्रकार के मृग तथा पक्षी उन तटों पर विहार करते हैं।] GVP

नदियों के तट— [जैसे] यमुना नदी का तट, मानसीगङ्गा का तट, सरस्वती इत्यादि के तट—विशेष करके यमुना [का तट] चारों ओर से अत्यन्‍त स्वच्छ, निर्मल बालुका [से युक्त है।] समुद्र के तट पर जायेंगे, तो कड़े (खुरदुरे) और बड़े-बड़े बालू मिलेंगे और इधर-उधर की [अन्य] पहाड़ी नदियों [के तटों पर] भी [बालू] मिलेंगे [किन्‍तु] कंकड़ इत्यादि [से युक्त] मिलेंगे; कि‍न्तु यमुना तट की बालुका एकदम [कोमल,] सुशीतल और स्वच्छ है, उसमें सुग‍न्ध है। और उसके दोनों तट नवीन तृणों से भरे हुए हैं—बड़े सु‍न्दर! [वहाँ] तरह-तरह के फूल, फल और कदम्ब, तमाल इत्यादि के वृक्ष हैं। स्वाभाविक रूप में उनकी निर्मल सुग‍न्ध चारों तरफ में फैलती रहती है। और वहाँ के पशु-पक्षी द्वेष-विवर्जित हैं—साँप और नेवला, बाघ और हिरण—सब एक साथ में विचरण करते हैं; उनमें कोई द्वेष नहीं है।

भक्त: वहाँ तो कोई हिंसक प्राणी नहीं है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: है तो नहीं, कि‍न्तु [सनातन गोस्वामीजी] कह रहे हैं कि यदि कोई हिंसक प्राणी भी हो, तो भी उनमें हिंसावृति नहीं है। कृष्ण की वंशी सुन करके सभी प्रेम के साथ में एक ही साथ वहाँ पर उपस्थित होते हैं। अधिक क्या कहूँ? [उनके तट] नाना-प्रकार के मृगों और पक्षी समूहों से परिपूर्ण हैं। वहाँ के पक्षी भी कैसे होते हैं?—एक कृष्ण-पक्षीय और एक राधा-पक्षीय। हरावाला तोता कृष्ण-पक्षीय है; कृष्ण श्याम-हरे [वर्ण के] हैं न? इसलिये वह तोता [कृष्ण-पक्षीय होता है] और उसकी चोंच लाल होती है। वह मनुष्य की बोली बोल सकता है। और मैना क्या करती है? वह भी मनुष्य की बोली [बोल सकती है।] उसकी बोली तोते से भी अधिक मधुर होती है। जो कुछ मनुष्य बोले, वे ठीक वैसा अनुकरण करते हैं।

तोता कह रहा है कि— ‘कृष्ण बड़े सु‍न्दर हैं।’ और मैना कहती है कि— ‘यदि राधाजी के साथ में हैं तो सु‍न्दर हैं, नहीं तो सु‍‍न्दर नही हैं।’

फिर, और क्या?

भक्त: शुक बले आमार कृष्ण मदनमोहन। शारी बले आमार राधा वामे जतक्षण, नइले शुधुइ मदन॥

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तोता कहता है कि— ‘हमारे कृष्ण मदन को भी मोहित करनेवाले हैं।’ तो सारि कहती है कि— ‘यदि राधा न रहे तो केवल मदन ही हैं। इसलिये कृष्ण राधाजी के साथ में ही ‘सब कुछ’ हैं।’ और?

भक्त: शुक बले आमार कृष्ण गिरि धरेछिल। शारी बले आमार राधा शक्ति सञ्‍चरिल, नइले पारबे केन॥

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तोता कहता है कि— ‘कृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन को धारण किया।’ और सारि (मैना) कहती है— ‘यदि राधाजी अपनी शक्ति सञ्‍चारित नहीं करतीं, तो कृष्ण कैसे उठा सकते थे? यदि राधाजी की शक्ति नहीं होती, तो [कृष्ण गिरिराज गोवर्धन को] उठा नहीं सकते थे।’ और?

भक्त: शुक बले आमार कृष्णेर माथाय मयूर-पाखा। शारी बोले आमार राधार नामटि ताते लेखा, एइ जे जाय गो देखा॥

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तोता कहता है कि— ‘हमारे कृष्ण के सिर के ऊपर में मयूरपंख है। [सारि कहती है—] ‘जानते हो ये किसलिये है? उसमें राधाजी का नाम लिखा है इसलिये। नहीं तो कौन उसको [धारण करता।]

भक्त: शुक बले आमार कृष्णेर चूड़ा वामे हेले। शारी बले आमार राधार चरण पाबे बले, चूड़ा ताइत हेले॥

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तोता कहता है— ‘कृष्ण का मयूर-मुकुट बायें तरफ में ऐसे झुका है। तो मैना कहती है कि— ‘वह इसलिये झुका है कि राधाजी के चरणों पर वह गिरे।’ इसीप्रकार से जो तोता कहता है, उसे मैना काट देती है, जैसे कृष्ण जो कुछ भी कहते हैं उसे राधाजी काट देती हैं। कैसे काटती हैं?

कृष्ण कहते हैं— “किवाड़ खोलो।”

[राधाजी पूछती हैं—] “कौन है?”

[कृष्ण उत्तर देते हैं—] “कृष्ण हूँ।”

[राधाजी कहती हैं—] “अरे! कृष्ण तो सर्प [को कहते] हैं। तो यहाँ पर आने की आवश्यकता नहीं है। [क्या मुझे] डँसने [आये हो? जाओ,] वन-जंगल में जाओ।”

[कृष्ण कहते हैं—] “अरे! कृष्ण (सर्प) नहीं, मैं हरि हूँ।”

[राधाजी कहती हैं—] “अरे हरि! हरि तो सिंह को कहते हैं। तो सिंह है, तो यहाँ पर क्या हम लोगों को काटने के लिए, खाने के लिए आये हो?”

[कृष्ण कहते हैं—] “अरे! मैं वह सिंह नही हूँ, मैं चक्री हूँ।”

[राधाजी कहती हैं— “अरे यहाँ चक्री (कुम्हार) की आवश्यकता नहीं है। मेरे घर में कोई विवाह-उत्सव नहीं है। जहाँ विवाह-उत्सव इत्यादि हों वहाँ तुम अपने मिट्टी के बर्तनों को लेकर जाओ।”]

भक्त: कौन हरि? हरि माने बन्‍दर

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, [कृष्ण कहते हैं—] “मैं हरि हूँ।”

[राधाजी कहती हैं—] “ओह श्रीहरि! अरे बन्‍दर की यहाँ क्या आवश्यकता है? [यहाँ आकर] मुख नोचेगा, जाओ जंगल [में जाओ।”]

[इस प्रकार] जो-जो कृष्ण कहते हैं, राधाजी [हर बात को] काट देती हैं। ऐसे ही राधाजी की जो पालित-पोषित मैना है, वह भी कृष्ण के द्वारा पालित शुक की [कही हुई] समस्त [बातों का] खण्‍डन करती रहती है। ऐसे-ऐसे शब्द सुनने के लिए कृष्ण [वन में] जाते हैं। विहार करना माने यही सब सुनते हैं और बड़े प्रसन्न होते हैं। यह है—वृन्दावन में रमण। [कृष्ण] गैया चराने के लिए नहीं जाते, वह तो बहानामात्र है।

दिव्यपुष्प-फल-पल्लवावलीभारनम्रितलता-तरु-गुल्मैः।
भूषितं मदकलापि-कोकिल-श्रेणिनादितमजस्तुतिपात्रम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.110)

[उन तटों पर गुल्म, लताएँ तथा वृक्ष दिव्य पुष्पों, फलों तथा पल्लवों के भार से झुके होने के कारण तटों की शोभा वर्द्धित कर रहे हैं। मदमत्त मयूरों तथा कोकिल आदि पक्षियों के मधुर कलरव से वृन्दावन मुखरित हो रहा है। इस प्रकार परम रमणीय होने के कारण श्रीब्रह्मा आदि देवताओं ने भी वृन्दावन की स्तुति की है।] GVP

दिव्य-दिव्य फल, पुष्पों और नये-नये पल्लवों से वृक्ष और लताएँ मानो नीचे की ओर झुक गयी हैं। लताएँ तो झुक ही जाती हैं, और पेड़ भी [फलों के भार से झुक जाते हैं।] जब आम के फलों से पेड़ लद जाता है, तो उसकी डालियाँ ऊपर से नीचे झुक जाती हैं। लताएँ जो ऊपर चढ़ रही होती हैं, जब वे पुष्पों से एकदम लद जाती हैं, तो वे भी नीचे आ जाती हैं। इस प्रकार लताओं और वृक्षों से विभूषित वृन्दावन है। वहाँ पर मदमत्त मयूर और कोकिल अपने कलरवों से, [अपनी] मीठी-मीठी बोली से वृन्दावन को सब समय मुखरित करते हैं। यह वृन्दावन परम रमणीय होने से ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी स्तुति का विषय हो जाता है। ब्रह्माजी कहते हैं— “जहाँ भी मेरा जन्म हो, ब्रज में हो।

तद्भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां
यद्‌गोकुलेऽपि कतमा‌ङ्‍‍घ्रिरजोऽभिषेकम्।
यज्जीवितन्तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-
स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.14.34)

[हे देवताओं के भी उपास्यदेव प्रभो! अनादिकाल से आज तक श्रुतियाँ जिनकी पदरज का अन्वेषण कर रही हैं, वे ही भगवान् मुकुन्द जिनके जीवनप्राण एवं सर्वस्व हैं, उन गोकुलवासियों में से किसी एक की भी पदधूलि द्वारा मैं अभिषेक के योग्य बन सकूँ (किसी एक की भी पदरज से मेरा मस्तक अभिषिक्त हो जाये) अथवा इस भौमव्रज के वन में अथवा विशेषरूप से गोकुल में किसी भी योनि में मेरा जन्म हो जाये, तो यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात होगी।] GVP

वृन्दावन में हमारा जन्म हो—कीट, पशु, पक्षी किसी भी रूप में हो। और यदि किसी कारण से वहाँ पर [जन्म] न हो, तो हमारा जन्म कहाँ हो? गोकुल में भी हो जाये, जहाँ पर मैला उठानेवाली— जमादारनियाँ हैं; उनके चरणों के रगड़ने के लिए मैं पत्थर बन करके इस वृन्‍दावन में आऊँ।”

इतना दुर्लभ यह वृन्दावन वास है! तो इस तरह से—

वृन्दारण्ये व्रजभुवि गवां तत्र गोवर्द्धने
वा नास्ते हिंसाहरणरहिते रक्षकस्याप्यपेक्षा।
गावो गत्वोषसि विपिनतस्‍ता महिष्यादियुक्ताः
स्वैरं भुक्त्वा सजलयवसं सायमायान्ति वासम् ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.111)

[श्रीब्रजमण्डल के वृन्दावन और गोवर्द्धन में हिंसा तथा पशुओं के चोरी होने की कोई आशंका नहीं है, अतएव उन स्थानों में गौओं की रक्षा करने के लिए रक्षकों की कोई आवश्यकता ही नहीं है। गाय, भैंस आदि पशु अपने आप ही प्रातःकाल वन में चले जाते हैं तथा स्वछन्दरूप से तृण और जल आदि भक्षणकर सायंकाल को अपने-अपने स्थानों पर लौट आते हैं।] GVP

अरे! जब वहाँ पर हिंसक ज‍न्तु नहीं हैं, तो रक्षक की क्या आवश्यकता है? इसलिये कृष्ण को गोचारण की आवश्यकता नहीं है। उनका ये तो बहानामात्र है। गायें अपने आप [वन में] जाती हैं, चर करके लौट आती हैं। यह केवल कृष्ण का बहानामात्र है।

[41:18- 46:50 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रोहिणीजी की यह बात सुनकर कंस की माता कहने लगी— “अरे अतिवाचाले! ‘अतिवाचाले’ माने लम्बी-लम्बी बातें करनेवाली। वाचाले! अधिक बोलनेवाली! तुम एक अज्ञानी बालिका की भाँति ऐसे ही यह सब क्यों कह रही हो? अरे! यदि ऐसी ही बात है कि वृन्दावन इतना मधुर है, वहाँ कोई हिंसक प्राणी नहीं है, कोई चोर-चोटे नहीं हैं जो गायों को चुरा ले—तो फिर जब कृष्ण वहाँ ब्रज से चले आये, तो गायें मर क्यों रही हैं? बछड़े क्यों मर रहे हैं? क्यों? हमने तो सुना है कि वे मर रहे हैं—क्यों?”

और इतना सुनते ही कृष्ण एकदम विचलित हो गये। उनका मुख सूख गया। [वे चिन्तित होकर सोचने लगे—] “ओह! सचमुच में ऐसा हो रहा है क्या? बलदेवजी भी ऐसा कह रहे थे, उद्धव भी ऐसा कह रहा था, [और अब] ये भी ऐसा कह रही है” — यह सब चि‍न्ता करने लगे। तब कृष्ण सब चीजों को जाननेवाले, वृन्दावन के समस्त संवादो को जाननेवाले बलरामजी के मुख की ओर देखने लगे। अच्छा, तो माने क्या? [उनका आशय था]— “बलदेवजी! आप सच-सच बतलाइये कि यह कहाँ तक सत्य है?” इसलिये बलदेवजी की ओर देखने लगे— “आप तो हमारे साथ ब्रज में थे और फिर बाद में भी ब्रज में गये। आपको सब पता है। अभी हाल ही में वहाँ जा करके देख आये हैं।” इसलिये [कृष्ण] संशयित हो करके बलदेवजी से वह पूछने लगे।

बलदेवजी ने कहा— “हे कृष्ण! गायों की तो बात ही क्या! वहाँ के मृग-समूह, मोर-पपीहे आदि जितने भी पशु-पक्षी हैं, भाण्‍डीरवट, कदम्ब आदि के वृक्ष, वंशीवट, लताएँ, कु‍ञ्‍ज, और तृण-मण्डित जितने भी मैदान हैं, सभी ने आपको ही अपना जीवन समर्पण कर रखा है। वहाँ के सब सरोवर सूख रहे हैं। वे पशु-पक्षी, हिरण–मृग इत्यादि सब सचमुच में आपके विरह में मर रहे हैं। पर्वत भी दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रहे हैं। यमुना नदी भी आपके विरह में क्रमश: सूखती जा रही हैं। यह बड़े ही परिताप और दुःख की बात है।”

[बलदेवजी] और भी [बहुत कुछ] कहने लगे। किन्‍तु अभी रात हो गयी है। आज यहीं तक रहे। कल बतलायेंगे।

गौर प्रेमान‍न्दे हरि हरि बोल!

[50:17- 52:05 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्दविरहेण मे ॥
-श्रीशिक्षाष्टकम् (7)

हे सखि! गोविन्द के विरह में मुझे एक निमेष-काल भी एक युग के समान प्रतीत होता है; नेत्रों से वर्षा की भाँति अश्रु-धाराएँ प्रवाहित होती हैं और सम्पूर्ण जगत् शून्यवत् प्रतीत होता है। (GVP)

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