Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.28-63: Krsna Realises that Nava-Vrndavana is in Dvaraka
01:12:52This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.28-63
- In Nava-Vrndavana, Krsna meets mother Yasoda, Rohini devi and then the gopis, first Candravali & her group, and then Srimati Radhika & Her group before leaving for cowherding. He tells Srimati Radhika about His dream of going to Dvaraka & marrying 16,108 damsels
- The reaction of Devaki and Krsna's queens and associates upon witnessing His exchanges with the 'vrajavasis'
- Some queens fainted upon experiencing great love like never before
- Krsna sees the ocean and thinks that it is the Yamuna, and calls His cowherd friends to join for water-sports.
- Then He realised that it was the sea, not Yamuna and got bewildered when he saw the palaces of Dvaraka
- Baladeva prabhu reminded Krsna of His identity as the Lord of Vaikuntha and the purpose of His descent. The deep significance on this.
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.28-63 : कृष्ण को यह अनुभव हुआ कि नव-वृन्दावन द्वारका में है
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 7 सितम्बर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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[श्रील गुरुदेव भक्तों से श्रीबृहद्भागवतामृत ग्रन्थ के प्रकाशन के सम्बन्ध में कुछ वार्तालाप करते हुए…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बलदेव भैया ने कृष्ण को पकड़ करके जबरदस्ती बैठा दिया। उस समय कृष्ण पूर्णरूप से गोपकुमार के रूप में सजे हुए थे—मोरमुकुट या पगड़ी, गले में गुञ्जामाला इत्यादि, कानों में कुण्डल और हाथों में वेत्र, सिंगा, मुरली इत्यादि। एकदम जैसे गोप वहाँ पर (ब्रज में) किशोर अवस्था में गोचारण के लिए जाते थे, उसी वेश में बलदेवजी ने उनको सजाया था। जब [बलदेवजी ने] पकड़ करके उठा करके बैठाया, तब कृष्ण ने ‘शिव-शिव’ कह करके अंगड़ाई ली और फिर चारों ओर देखने लगे। उन्होंने देखा—यहाँ तो गैयाएँ खड़ी हैं और साथ-साथ में सखा लोग [भी हैं।]
[किन्तु] ये सभी मूर्तियाँ थीं। इनमें केवल रोहिणी मैया की प्रतिमा नहीं थीं, [क्योंकि वे] वास्तविक रूप में [वहाँ उपस्थित] थीं और बाकी सभी मूर्तियाँ थीं। यहाँ तक कि गायें भी, जो मैदान में चरती हुई प्रतीत हो रही थीं, वे भी वही [मूर्तियाँ] थीं। कृष्ण अभी भावावेश में थे। अभी [उन्हें] पूर्णरूप से यह होश नहीं आया था कि—मैं द्वारका में हूँ और मैं इन लोगों (ब्रजवासियों) के साथ में नहीं हूँ। और मैं एक प्रकार से मूर्च्छित हो गया था—यह सब भूल गये हैं। जब उठे, तो देखा कि—मैं ब्रज में हूँ, गायें खड़ी हैं, मैया पास में खड़ी हैं। इस तरह से सबको देखा, किन्तु किसीको भी प्रतिमा नहीं समझा; सबको असल ही समझा।
उस समय [उन्होंने] देखा कि बाबा पास में खड़े हैं और मैया उनके निकट में खड़ी हैं और उनके हाथों में पहले की भाँति मक्खन रखा है। उनके गोचारण में जाने के समय प्राय: मैया जड़वत हो जाती थीं—अष्ट-सात्विक-विकार [प्रकट हो जाते थे।] उन्होंने सोचा—“मैया सम्भवतः ऐसे ही [हो गयी] हैं। मैं बहुत देर तक सोया, इसलिये मैया की यह दशा [हो गयी है;] जाड़्य-भाव उत्पन्न हो गया है।”
मैया के हाथ में इस तरह से मक्खन रखा था, जैसे ब्रज में रहता था। और कृष्ण ने बड़ी भङ्गिमा (pose) से, बड़े ढङ्ग से, किशोर [होने पर भी] छोटे-से बच्चे [की भाँति] उनके हाथों से मक्खन चोरी कर लिया। उस चोरी करने में भी एक भाव है, कला है। उस कला से उन्होंने [चोरी की] कि सभी देख करके मोहित हो जायें। बच्चों की ऐसी हरकत देख करके लोग बड़े प्रसन्न और आकर्षित होते हैं।
तो कृष्ण ने ठुमककर चलते हुए मक्खन ले लिया, किन्तु खाया नहीं, क्योंकि बलदेव भैयाजी आगे चले गये हैं। वे आगे किसलिये गये? दो कारणों से—एक तो गायें जा रही हैं, उनको सम्भालना है। किन्तु आन्तरिक उद्देश्य यह है कि उनके रहते हुए कृष्ण गोपियों से स्वच्छन्द रूप से नहीं मिल सकते और गोपियाँ भी पास ही में खड़ी हैं, जैसे पहले खड़ी रहती थीं। इस प्रकार से उनसे मिलाने के लिए [बलदेवजी आगे बढ़ गये।] बलदेवजी बड़े रसिक हैं, बड़े बुद्धिमान हैं, इसलिये वे आगे की ओर बढ़ गये। इसलिये कृष्ण उनको मक्खन नहीं [दे पाये]—हाथ में ही मक्खन रख करके चले। अब वहाँ पर जा करके मैया को प्रणाम किया और प्रणाम करके उनसे कुछ बोले। क्या बोले?— “मैया, मैंने स्वप्न देखा। वह मैं पीछे तुम्हें बतलाऊँगा कि क्या देखा। अभी तो गायें आगे जा रही हैं।” और [यह कहकर] वे आगे बढ़ गये। इस प्रकार से विनय के साथ में [कहा।] रोहिणी मैया को देख करके बोले— “मैया, [यशोदा] मैया तो बात नहीं कर रही हैं। हमारे विरह में, शोक में संलग्न हैं। इसलिये जैसे हमारी मैया भेजती थीं, तुम वहाँ पर हमारा छाछ इत्यादि छाक भिजवा देना।”
छाक माने—जो मैया दोपहर में कृष्ण के भोजन के लिए दधि, अन्न, रोटी, पकौड़ी, खीर, लड्डू [आदि] जैसे भिजवती थीं, इसको कहते हैं—छाक।
[कृष्ण ने रोहिणी मैया को] छाक भेजने को कहा। उन्होंने कहा—“अच्छा, ठीक है, मैं भिजवा दूँगी।”
यह कह करके कृष्ण पहले परिहासपूर्वक गोपियों से बोले। कैसे परिहासपूर्वक बोले? जब रोहिणी मैया को छोड़ करके आगे बढ़े, तो देखा कि चन्द्रावली, पद्मा, शैव्या इत्यादि सखियाँ खड़ी हैं। बस बड़े प्रेम से उनसे परिहास किया, जैसे पहले परिहास किया करते थे। निकट में जा करके मानो [उनके] कान में कुछ बोले और इस प्रकार से भङ्गिमा की, मानो पहले जैसे उनका चुम्बन इत्यादि करते थे, इस प्रकार से किया।
बाद में जब थोड़ा-सा और आगे गये तो ललिता, विशाखा इत्यादि अपनी सखियों के साथ में, मञ्जरियों के साथ में राधाजी खड़ी थीं। वहाँ पर जा करके परिहास-वाक्यों से बोले। क्या परिहास वाक्य? — “अरे! मानिनी क्यों हो गयी हो? बिना कारण का ही मान करती हो। तो आज तुमने मान कर लिया—क्यों किया? मेरा क्या अपराध है? मैंने क्या दोष कर दिया जो तुमने [मान कर लिया है?] ओह! मैं जान गया, मुझे याद आ गया। ओह! तुम सर्वज्ञ हो न? सब कुछ जाननेवाली हो। इसलिये ऐसा ज्ञात होता है कि मैंने स्वप्न में जो कुछ देखा, तुमने सर्वज्ञ होने के नाते वह सब कुछ जान लिया; तुम मेरे हृदय की बातचीत [जान गयीं।] इसीलिये तुमने मान किया है।”
“देखो, बात यह है कि आज मैंने एक स्वप्न देखा। [उसी] स्वप्न को देखने से ही मुझे आज उठने में विलम्ब हो गया। स्वप्न में [मैंने] देखा कि मैं तुमको, गोपियों को और ब्रज को छोड़ करके मथुरा [चला] गया और वहाँ से भी आगे बढ़ करके द्वारका चला गया और मथुरापुरी के सब लोगों को वहाँ पर बसा दिया। कुछ दिनों के बाद में मैंने मेरे लिए जो प्राण परित्याग कर रही हैं, उन रुक्मिणी को देखा। रुक्मिणी ने यह प्रतिज्ञा की— ‘मैं किसी से भी विवाह नहीं करूँगी। विवाह करूँगी तो किससे? केवलमात्र कृष्ण से ही और नहीं तो मैं जल मरूँगी। मैं उपवास करके प्राण छोड़ दूँगी, किन्तु किसी दूसरे से—शृगाल या भेड़ से [विवाह] नहीं [करूँगी]—केवल कृष्ण-सिंह से ही मैं विवाह [करूँगी।’] और उसने निर्लज्ज हो करके ऐसा ही पत्र मुझे लिखा और ब्राह्मण को भेजा। [यद्यपि] लड़कियों को लज्जा करनी चाहिये, फिर [भी उसने पत्र लिखा]।”
ओह! विदेश की लड़कियाँ लज्जा नहीं करतीं, वे तो सीधे (direct) कहेंगी— “हम तुमसे विवाह करना चाहती हैं।”
Oh! Western devotees, Western girls—they don't have any shame. They will directly tell— “O Prabhu! I want to marry you.” Directly they will tell, no shame at all. But for Indian ladies, they will [never do like this—] never and never. So…
“रुक्मिणी ने ऐसी प्रतिज्ञा की, तो मैं बाध्य हो करके अकेले ही रथ पर सवार हो करके गया और सब राजाओं को पराजित करके उसको अपने रथ पर बैठा करके ले आया और द्वारकापुरी में मैंने उससे विवाह किया।”
इसी प्रकार से मित्रविन्दा और जितनी सब रानियाँ थीं—आठ पट्ट-महिषियाँ थीं—उनके सम्बन्ध में भी यही समझना। उन सबने भी प्रतिज्ञा की थी कि कृष्ण के अतिरिक्त [किसी अन्य से विवाह नहीं करेंगी। नाग्नजिती ने प्रतिज्ञा कि] “जो सात भयंकर बैलों—साण्डों —को एक साथ में नथ देगा और वशीभूत कर [देगा,] उससे विवाह करूँगी।” कोई भी [ऐसा] नहीं कर सका।
तब उनके पिता ने कहा— “अब क्या किया जाये?
[नाग्नजिती ने कहा—] “मैं मर जाऊँगी, मर जाऊँगी [किन्तु किसी] दूसरे से विवाह नहीं करूँगी। जो [यह प्रतिज्ञा पूरी] करेगा, उसीसे [विवाह करूँगी।”]
वह जानती थीं कि कृष्ण के अतिरिक्त [यह कार्य] कोई [और] नहीं कर सकता। अन्त में कृष्ण आये और एकसाथ में सभी बैलों को एकदम वशीभूत किया। इसी प्रकार अन्य स्त्रियों के सम्बन्ध में भी समझो।
“इस प्रकार मैं वहाँ गया और मैंने पहले आठों पटरानियों से विवाह किया। उसके बाद मैं नरकासुर के राज्य में गया। अपने साथ में गरुड़ की पीठ पर बैठा करके सत्यभामा को भी ले गया। और वहाँ पर नरकासुर को मार करके उसके कारागार में बन्द जितनी कुमारियाँ, युवतियाँ और लड़कियाँ थीं, उन सबको छुड़ाया। [और मैंने उनसे] कहा— “तुम लोग अपने-अपने राज्य में चली जाओ; उसकी सारी व्यवस्था मैं कर देता हूँ।” किन्तु उन लोगों ने क्या किया? [उन्होंने कहा—] “अब हम अपने घरों में नहीं जायेंगी। चाहे हमारा विवाह हो गया हो या नहीं हुआ हो, हम सब आप ही से विवाह करेंगी। और [यदि आप] विवाह नहीं करेंगे, तो आपकी नौकरानी बन करके [आपकी] महिषियों की सेवा करेंगी; किन्तु अब हम किसी भी प्रकार अपने घर नहीं लौटेंगी।”
उनकी प्रतिज्ञा सुन करके [मुझे] दया आ गयी, इसलिये विवाह [किया।] किन्तु तुम मान मत करो क्योंकि वास्तविक बात तो यह है—गम्भीर बात यह है [कि इसमें एक] छिपा हुआ रहस्य है कि मैंने इन स्त्रियों से विवाह इसलिये किया क्योंकि ये देखने में ठीक तुम्हारे जैसी ही लगती हैं—ठीक [तुम्हारे जैसी ही।”]
रुक्मिणीजी चन्द्रावली जैसी लगती हैं। सत्यभामा कैसे लगती हैं? राधिकाजी जैसी। और-और जो [महिषियाँ हैं, वे भी ब्रज की गोपियों जैसी लगती हैं।] वहाँ (द्वारका) की कालिन्दी, यहाँ की यमुना (विशाखा) जैसी।
“इस प्रकार से तुम लोगों की समता के कारण, तुम्हारा स्मरण करने के लिए मैंने ये [विवाह] किये। और इसका यह फल हुआ कि प्रत्येक स्त्री से दस लड़के और एक लड़की [हुए।] और उन लड़कों के भी लड़के—हमारे नाती हजारों [हो गये,] जिनको पढ़ाने के लिए हमने अठासी हजार शिक्षक नियुक्त किये। किन्तु यह सब तो स्वप्न था; मैंने [वास्तव में] तो [कुछ] किया नहीं। तुम मान क्यों कर रही हो? अच्छा देखो, मैं सायंकाल लौटकर आऊँगा। अभी तो समय नहीं, [अभी] जा रहा हूँ। सायंकाल में जब हम गायें चरा करके आयेंगे, तो तुमको विस्तृत रूप में बतलायेंगे कि क्या किया। तो तुम मान क्यों कर रही हो? यह तो स्वप्न की बात है। मैंने तो तुमको छोड़ करके विवाह नहीं किया। मैं मथुरा में भी नहीं गया, द्वारका में भी नहीं गया —यह तो स्वप्न है।”
इस प्रकार कहकर [उन्होंने] क्या किया? बड़ी भङ्गिमा से उनको आलिङ्गन-पाश में बद्ध [किया, पहले] इधर-उधर देखा। देखा कि बलदेव प्रभु भी नहीं है और सखा लोगों में भी केवल मधुमङ्गल और सुबल हैं; और सब लोग इधर-उधर हैं। बड़े भङ्गी से मुस्कुराते हुए, हाथ में वंशी लिये हुए, [उन्होंने] उनका आलिङ्गन और चुम्बन किया। यह देख करके सभी आश्चर्यचकित हो गये।
बहुत लम्बी बात हो गयी…
[17:50-28:10 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इस प्रकार परीक्षित् महाराजजी अपनी मैया से बोले— “मैया! इस प्रकार कृष्ण ने [अपना] स्वप्न-वृतान्त राधाजी को सुनाया। और सुनाने के बाद में वयःसन्धि वाले, धीरललित नायक कृष्ण ने बड़े भङ्गी से कुछ पुष्प उठाकर राधाजी की ओर फेंके—उनके कपोलों के ऊपर में फेंके और बड़े भङ्गी से इधर-उधर देख करके और उनके निकट पहुँचकर, बड़े भङ्गी से उनका आलिङ्गन किया और उनका चुम्बन किया। फिर हँसते-मुस्कुराते हुए, उनकी ओर देखते हुए आगे बढ़ गये, जहाँ पर गौओं के सहित में सखा इत्यादि थे, जिनको पहले अपने वंशी के स्वर से रोक रखा था; अब वहाँ पर पहुँच गये।”
[परीक्षित् महाराजजी] कह रहे हैं— “वहाँ पर देवकी मैया पास में छिपकर [कृष्ण की इन लीलाओं को देख रही थीं।]
देवकी मैया, रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, पद्मा, उद्धव और कलिन्दी इत्यादि जो वहाँ (द्वारका में) दरवाजे पर बैठकर कृष्ण के लिए शोक कर रहे थे—वे सभी लोग वहाँ पर (नव-वृन्दावन में) बैठे हुए हैं और छिप करके कृष्ण की लीलाओं को देख रहे हैं। कृष्ण किसीको नहीं देख रहे हैं किन्तु ये सभी लोग [कृष्ण को] देख रहे हैं। कृष्ण के भाव देख करके उनमें अलग-अलग भाव पैदा हुए। क्या अलग? देवकी मैया ने कृष्ण का ऐसा रूप [पहले] कभी नहीं देखा था—ब्रज का रूप। वे देख करके आनन्द से इतनी मत्त हो गयीं कि [उनके स्तनों से दूध बहने लगा। यद्यपि] अब उनके स्तनों में दूध नहीं रह गया था। उम्र बढ़ गयी न! अब [कुछ समय पहले ही जन्मे] बेटे तो हैं नहीं—नये-नये। इसलिये स्तन का दूध सूख गया था, किन्तु कृष्ण को देख करके ऐसा वात्सल्य उमड़ा, जैसे यशोदाजी को होता है और उनके स्तनों से जोर से दूध चुचुआने लगा। वे बड़ी आह्लादित हुयीं।
और दूसरी-दूसरी रानियों के जैसे-जैसे भाव थे या हैं, वैसे-वैसे उनके अष्टसात्विक भाव इत्यादि प्रकट [हुए।] इन लोगों ने कभी ऐसा ब्रज का भाव, कृष्ण का ऐसा स्वरूप दर्शन नहीं किया था। देवकी मैया ने [कृष्ण को] बचपन में दूध पिलाया था—[मथुरा से गोकुल] जाते समय केवल। बस, और उसके बाद नहीं। जब कृष्ण ने कंस का वध किया, उस समय देवकीजी उनको देख करके बड़ी ह्लादित हुयी थीं, किन्तु भाव में ऐसी हो गयीं कि उनको भगवान् समझा।
उन्होंने कृष्ण से कहा— “तुम तो भगवान् हो, हमारे मरे हुए बेटों को ला दो।” कृष्ण ने क्या किया? उनको लाये।
तो यहाँ पर देवकीजी ने कृष्ण का ऐसा रूप कभी नहीं देखा था। इसलिये मातृवत्सल हो करके उनके स्तनों से दूध चुचुआने (बहने) लग गया—वृद्धा होने पर भी। वृद्धा माने अब [उनकी] उम्र हो गयी है। [किन्तु] ब्रज का या मथुरा का कोई भी [व्यक्ति] वृद्ध जैसा नहीं दिखता है क्योंकि वे नित्यलीला के परिकर हैं। किन्तु उम्र अधिक हो जाने से स्तनों में दूध नहीं होता, किन्तु [यहाँ पर] दूध बहने लग गया।
रुक्मिणी, जाम्बवती और कुछ दूसरी महिषियाँ [श्रीकृष्ण के] इस अभूतपूर्व रूप को देख करके महाप्रेम में मत्त हो गयीं। [उनका] धैर्य च्युत हो गया और वे मूर्च्छित हो करके भूमितल पर गिर गयीं। रुक्मिणी, जाम्बवती और…
भक्त: रुक्मिणी भी?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, रुक्मिणी पतित हो गयीं।
भक्त: सत्यभामा नहीं…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: क्यों पतित हो गयीं? वे गम्भीर हैं, भूमितल पर गिरते हुए भी धैर्य धारण किया क्योंकि ये सब गम्भीर और परम बुद्धिमती हैं, [किन्तु तब भी कृष्ण के अद्भुत गोपवेश का दर्शन करके मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं।] तात्पर्य क्या? रुक्मिणी और जाम्बवती कृष्ण को देख करके कामविशेष से मोहित हो गयीं और उनके हृदय में महाप्रेम की बाढ़-सी आयी। फिर भी ‘आदि’ शब्द से मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा इत्यादि [महिषियों] को भी समझो। उनमें से कुछ महिषियाँ धैर्यच्युत हो गयीं और मोह प्राप्त होकर के भूमितल पर गिर गयीं। किन्तु सत्यभामा और वृद्धा पद्मावती उन्मत्त हो गयीं—एकदम उन्मत्त हो गयीं। और इस प्रकार से कामवेग में [उन्मत्त होकर] पुनः-पुनः अपने हाथों को प्रसारण करके, मानो आलिङ्गन करने के लिए [दौड़ीं।] पद्मा ने बूढ़ी होने पर भी दौड़ने के लिए चेष्टा की। उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि वे दौड़कर कृष्ण को पकड़ ही लेंगी; वे अपने को सम्भाल नहीं सकीं। कोई भी यदि कृष्ण के इस रूप को देखे, तो अपने को सम्भाल नहीं सकता—इतने सुन्दर वे हैं! वे हरि (कृष्ण) को आलिङ्गन करना चाहती थीं, किन्तु हुआ क्या?
इतने में... वहाँ पर कालिन्दी भी थीं। वे भी मोहग्रस्त हुयीं, किन्तु [स्वभाव से] गम्भीर थीं। ये विशाखाजी हैं; उन्होंने कृष्ण के [इस] रूप का अनुभव भी किया है। इसलिये कालिन्दीजी ने बड़े कष्ट से धैर्य का अवलम्बन किया और उद्धव की सहायता से पद्मा और सत्यभामा को पकड़ लिया। स्वयं तो उन्होंने स्त्री होने के नाते सत्यभामा को पकड़ लिया और साथ-साथ में उद्धवजी को संकेत से कहा कि तुम पद्मावती को पकड़ लो, क्योंकि वे उनकी मैया जैसी लगती है—दादी जैसी। इस प्रकार से दोनों को रोक लिया। क्योंकि [यदि वे आगे बढ़ जातीं, तो] कृष्ण के भाव में अन्तर आ जाता— “ये कहाँ से आ गयीं?”
इस प्रकार से इधर क्या हुआ? कृष्ण गोचारण करते-करते कुछ दूर आगे बढ़ गये। जब आगे बढ़े, तो देखा— “अरे! यह क्या?” पहले तो [उन्होंने] सोचा कि “[यह] कालिन्दी नदी है, यमुना नदी है।” किन्तु देखा— “यह तो अथाह पानी है और अनन्त पानी का यहाँ पर, यह समुद्र कहाँ से आया—लवण समुद्र?”
पहले तो थोड़ा दूर से देख करके [यही समझा कि] यह यमुना नदी हैं और बड़े आनन्दित हुए और वहाँ पर सखाओं को बुलाने लगे। पहले देखा यमुनाजी अर्थात् भावावेश में दूर से समुद्र को देख करके पहले समझा कि यह यमुना नदी हैं और वहीं पर सखाओं को— “अरे सुबल! कहाँ हो? सुदाम! कहाँ हो? मधुमङ्गल! जल्दी आओ!”—इस प्रकार से पुकारने लग गये— “हे श्रीदाम! हे सुबल! हे अर्जुन! हे अन्य सखागण! तुम लोग कहाँ चले गये? गायें यहाँ पर अकेली चर रही हैं, तुम लोग हमें छोड़ करके कहाँ चले गये? अरे जल्दी आओ! जल्दी आओ! हम लोग एकसाथ में खेलेंगे। गायों को जलपान करायेंगे और हम लोग मधुर यमुना के निर्मल पानी में स्नान करेंगे और जलपान भी करेंगे। गायों को भी जलपान करायेंगे।” जैसाकि पहले करते थे—गायों को लेकर यमुना नदी के किनारे, पावन-सरोवर, कुसुम-सरोवर में करते थे।
क्या करते थे? धीरी-धीरी—धीरे-धीरे आओ। चूँ-चूँ माने पानी पियो और तीरी-तीरी—पानी पी करके लौट आओ। इस प्रकार से ब्रज की जैसी बोली है, उसी बोली में करने लगे। और वंशी भी बजाते हुए गायों का नाम पुकार करके इस प्रकार से सबका आकर्षण किया।
इस प्रकार से अच्युत [कृष्ण] गायों के निकट अग्रसर हुए। जब और निकट में गये, तो देखा कि अत्यन्त तीव्रता से लहरों की आवाज आ रही है—एक मील दूर से।
हम लोग जब पुरी में रहते थे, तो उस समय बनवारी सिंघानियाजी के आश्रम में रहते थे। समुद्र का कोलाहल इतना तीव्र से होता था कि रात में नींद नहीं आती थी। दरवाजे बन्द करके तब सोते थे। विशेषकर एकादशी से अमावस्या और एकादशी से पूर्णिमा [के समय] समुद्र का गर्जन भयंकर होता था।
कृष्ण ने देखा—ये गर्जन कहाँ से आ रहा है? तो देख करके अब कुछ बोध हुआ [कि वे] समुद्र के निकट पर थे— “अरे! यह तो समुद्र है!” फिर चारों ओर देखने लगे। नखों से, हथेलियों से आँखों को मलते हुए देखने लगे— “अरे! यह समुद्र कहाँ से आया? अरे! समुद्र के किनारे ये सब महल-राजमहल देख रहा हूँ, ये क्या हैं?” [उन्होंने] राजमहलों को देखा। जितनी रानियाँ थीं, उनकी जितनी नौकरानियाँ थीं, सबके लिए राजमहल बने थे—लाखों करोड़ों।
अभी द्वारका के पुराने अवशेष मिले हैं—समुद्र के तीन-चार मील, पाँच मील भीतर तक। और [आज भी] वहाँ पर अवशेष मिल रहे हैं। अभी अमेरिका की कोई बड़ी कम्पनी है, जैसे रामेश्वरम के सेतु [का अनुसन्धान करके] बतलाया है, ऐसे इसका भी अनुसन्धान करके यह बतला रही है। भारत की [प्राचीन] सभ्यता की खोज कर रहे हैं। अभी भी वहाँ पर [अवशेष मिल रहे हैं।] अरे! वहाँ तो दूर रहे, अभी [यहाँ पास में] एक शेरगढ़ स्थान है, जिसको खेलनवन कहते हैं। रामघाट है, उसमें एक गाँव है। गाँव के पास में यमुना के भीतर में बहुत अवशेष सब मिल रहे हैं—बहुत-से अवशेष। जिससे ज्ञात होता है कि आज से पाँच हजार वर्ष पहले यहाँ सचमुच में कोई नगर [रहा] होगा—वह नन्दबाबा का खेलनवन, कृष्ण का।
तो इस प्रकार से समुद्र [और महलों] को देख करके बड़े विस्मित [हो गये—] “अरे! मैं कहाँ आ गया? यह तो कोई पुरी है! अरे! यह द्वारकापुरी लग रही है! मैं जग रहा हूँ या स्वप्न देख रहा हूँ? क्या बात है? ओह! यह क्या हुआ? मैं कहाँ हूँ? मैं कौन हूँ? मैं नन्दनन्दन कृष्ण—मैं यहाँ द्वारकापुरी में कैसे आ गया?” इस प्रकार से बड़े आश्चर्यचकित हो करके मन-ही-मन में सोचने लगे— “यह क्या हुआ?” समुद्र और द्वारकापुरी देख करके कहने लगे और बड़े चकित हो गये। सोच रहे हैं कि यह क्या है? इतने में बलदेव प्रभुजी, जो सब जानते हैं, वे उनसे कहने लगे—
I thought that all had gone to Jammu but I am seeing that all are here, only few [are not here.]
कल मत आना। कल हम यही श्रीबृहद्भागवतामृत वहाँ सुनायेंगे—जम्मू-कश्मीर में और वहाँ पर मत चले आना [क्योंकि] वहाँ पर युद्ध लगा है।
[42:30-52:52 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जिस समय कृष्ण कभी समुद्र की ओर और कभी द्वारकापुरी की ओर देख रहे थे और विचार कर रहे थे— “यह जो मैं देख रहा हूँ, वह सत्य है कि झूठ है या स्वप्न है? मैं यह क्या देख रहा हूँ?” वे बहुत चिन्तित थे।
इतने में बलदेवजी आये और बोले— “भैया! अधिक चिन्ता करने की बात नहीं है। आप वैकुण्ठेश्वर हैं। हे वैकुण्ठेश्वर! अपने को याद करो—स्मरण करो कि आप वैकुण्ठेश्वर हो, गोलोकपति हो और देवताओं की प्रार्थना से भूभार-हरण करने के लिए आप हमारे सहित [यहाँ आये हैं।] मैं शेष हूँ—अनन्त; [आप] भी हमारे साथ वहीं से आये हैं। इसको याद करो। इसलिये अब दुष्टों का विनाश और शिष्टों का पालन करो।” क्या है वह?
भक्त: परित्राणाय साधूनां
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् [#1]—इस [उद्देश्य के] लिए तुम अब प्रतिज्ञा करके आये हो। देवताओं का कार्य [अभी] आधा हुआ है, आधा नहीं हुआ है। [शेष] आधे को पूरा करना है। देखो, और एक बात है—महाराज युधिष्ठिर यज्ञ करा रहे हैं और अनुशाल्व इत्यादि जो बड़े-बड़े दुष्ट हैं—दानव जैसे—उसमें विघ्न कर रहे हैं। महाराज युधिष्ठिर भयभीत हो करके [यह सोच रहे हैं कि] क्या करूँ?, [क्या] न करूँ? और आपका (प्रभु का) स्मरण कर रहे हैं। वहाँ चल करके उनकी भी रक्षा करनी है। और अनुशाल्व इत्यादि दुष्टों का संहार करके भूभार भी हरण करना है।” इस प्रकार से बलदेवजी ने कहा।
उसीको फिर से सनातन गोस्वामी टीका में कहते हैं—बलदेवजी ने उनको ‘वैकुण्ठेश्वर’ कहा। साधारण रूप में वैकुण्ठ और गोलोक में कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही चिन्मय धाम हैं। इसीलिये इस अभेद के कारण [कृष्ण को] यहाँ वैकुण्ठेश्वर ही कहा।
[बलदेवजी ने कहा—] “हे प्रभु! मैं अनन्त हूँ—अनन्तदेव। और आप हमारे प्रभु हैं। आप गोलोकपति हैं।”
तो कृष्ण कहते हैं— “अच्छा, मैं गोलोकपति हूँ, तो फिर यहाँ पर क्यों हूँ?”
[बलदेवजी कहते हैं—] “मैं कह रहा हूँ, सुनो! ब्रह्मा, शंकर इत्यादि देवताओं [के साथ] पृथ्वी को गो-रूप में लेकर क्षीरसमुद्र पर गये। वहाँ पर ध्यान लगाया और आपसे प्रार्थना की। आकाशवाणी हुई— “हमारे प्रभु यह सब जान गये हैं; वे पृथ्वी का भूभार हरण करने के लिए [स्वयं] आ रहे हैं। उनकी शक्तियाँ भी, उनकी गोपियाँ भी आ रही हैं। उनकी सेवा और सहायता के लिए देवताओं की स्त्रियाँ भी वहाँ पर जन्म ग्रहण करें—ब्रजकुल और मथुरा में। और ये जो देवता इत्यादि भी हैं, ये लोग भी वहाँ मथुरा में यादवकुल में और ब्रज में [गोप] के रूप में आयें।’”
ऐसा हुआ था। तो वे (ब्रजवासी) देवता लोग तो नहीं हैं, किन्तु उन [देवताओं] के अंश नन्दबाबा इत्यादि गोपों में [प्रविष्ट हुए] थे। और जो देवियाँ थीं, वे अपने मूल में अर्थात् राधिका इत्यादि गोपियों के रूप में आयीं। तथा दूसरी सखियाँ जो राधाजी की सेवा इत्यादि करती हैं, [उनके रूप में आयीं।]
तो [बलदेवजी] कह रहे हैं— “ब्रह्मा इत्यादि देवताओं की प्रार्थना से आप वैकुण्ठलोक से भूभार-हरण करने के लिए आये हैं। ये याद करो, स्मरण करो कि आप वही जगदीश्वर गोलोकपति हैं।”
यदि कहो— “मैं तो अपने को नन्दनन्दन–यशोदानन्दन ही देखता हूँ। अब मैं [अपने को] ब्रज का ही कृष्ण, एक साधारण गोप का लड़का समझता हूँ; [इसके अतिरिक्त] और [कुछ] तो मैं नहीं [समझता।] मुझे यह याद (स्मरण) नहीं है कि मैं कब गोलोकपति था या और [कुछ] था।”
[बलदेवजी—] “ओह! तथापि मैं तुम्हारे साथ आया न! मैं अनन्त हूँ— [आप मुझे] बलदेव के रूप में देख रहे हैं।”
‘अनन्त’ क्यों कहा? साधारण लोग यही जानते हैं, किन्तु इन अनन्त के भी मूल कौन हैं? बलदेव प्रभु। उन बलदेव प्रभु के ही अंश–प्रकाश हैं—द्वारका का चतुर्व्यूह और उसमें से जो मूलसंकर्षण हैं, उन्हीं के अंश वैकुण्ठ के महासंकर्षण हैं। उनके अंश कारणोदकशायी विष्णु, उनके अंश गर्भोदकशायी [विष्णु], उनके अंश क्षीरोदकशायी [विष्णु] और जो बचा रहता है, उससे भी नीचे ‘शेष’ — वह मैं कह रहा हूँ।
कहने का तात्पर्य क्या है? साधारण लोग इसको इसी रूप में समझेंगे, किन्तु अपने को छिपाया कि मैं मूल [हूँ]—वृन्दावन का बलदेव हूँ। [आप] दुष्टों का संहार और शिष्टों का पालन करने की प्रतिज्ञा करके आये हैं, इसलिये यह याद करो और इस काम को पूरा करना आपका कर्तव्य है।
[यद्यपि आप गोलोक से अवतीर्ण हुए हैं,] फिर भी मैंने आपके अवतीर्ण होने के सम्बन्ध में यह सब बतलाया। अभिप्राय क्या है? ये सबसे पहले बतलाया। यहाँ पर सनातन गोस्वामीजी बतला रहे हैं कि कृष्ण को—नन्दनन्दन स्वरूप को वे (बलदेवजी) ‘वैकुण्ठेश्वर’ बतला रहे हैं। यह कोई विशेष विरुद्ध बात नहीं है। यहाँ पर प्रकरण के अनुसार में यह सामञ्जस्ययुक्त है।
आप नन्दनन्दन हैं—यह बात ठीक है। ब्रज में आपने और सब लीलाएँ कीं, किन्तु उसको बलदेवजी ने नहीं बतलाया। किसलिये? [क्योंकि] फिर वही आवेश हो जायेगा—गोप-गोपियों की लीलाएँ सुनकर, गोपियों की विरह-दशा सुनकर फिर वैसी ही दशा हो जायेगी; फिर रोते-रोते कहीं मूर्च्छित न हो जायें। इसलिये [बलदेवजी ने कृष्ण को नन्दनन्दन] नहीं कहा, ‘वैकुण्ठेश्वर’ और ‘द्वारकाधीश’ की ही बात कर रहे हैं।
[बलदेवजी ने कहा—] “इसलिये आप अपने भक्तों [का पालन कीजिये।] जैसे युधिष्ठिर महाराज यज्ञ करने जा रहे हैं, किन्तु डर के मारे यज्ञ नहीं कर रहे हैं। अनुशाल्व इत्यादि और-और सब दुष्ट लोग अभी [जीवित] हैं। उनका वध करके पृथ्वी का भार हरण करके अपने भक्तों की इच्छा को पूरा करो।” कृष्ण ने यह सब सुना।
[बलदेवजी पुनः] कृष्ण से कह रहे हैं— “और एक बात आपको बतलाऊँ? पाण्डवों को ये लोग अपना शत्रु समझ करके, जो उनके प्रति युद्ध कर रहे हैं, उनको कष्ट दे रहे हैं—इसका कारण जानते हैं कि कौन हैं? आप हो—आपके कारण [यह हो रहा है।” वह कौन था, जिसे] चक्र से मारा…
भक्त: शिशुपाल
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: शिशुपाल, दन्तवक्र, पौण्ड्रक-वासुदेव— ये सब जितने हैं, ये सभी आपसे शत्रुता रखते हैं। और आप पाण्डवों को अधिक स्नेह करते हैं और पाण्डव लोग भी आपसे स्नेह करते हैं, आपके पास आते-जाते हैं। इसलिये पाण्डवों को ये लोग तंग कर रहे हैं। इसलिये फिर आपको अवश्य जाकर उनकी रक्षा करनी चाहिये।
परीक्षित् महाराजजी बोले— इस प्रकार बलदेव प्रभु ने कृष्ण को रसान्तर में प्रवेश कराया। रसान्तर माने नन्दनन्दन का जो भाव था, उसको दूर करने के लिए ऐसी कड़ी बातें कीं जिससे ब्रज का भावावेश नष्ट (दूर) हो जाये और [कृष्ण] अपने को द्वारकाधीश के रूप में समझें और वे दूसरे भाव में आ जायें।
इस प्रकार यह सुन करके भगवान् बड़े क्रुद्ध हो गये— “उन लोगों ने युधिष्ठिर के ऊपर में आक्रमण किया हैं! [उनका] यज्ञ नहीं होने दे रहे! ठीक है—मैं शाल्व के अनुज इत्यादि को अभी देखता हूँ कि वे कैसे हैं? वराक। वराक माने तुच्छ हैं। अभी मैं अकेला ही जा करके उन सबका ध्वंस करके युधिष्ठिर महाराज के यज्ञ की रक्षा [करूँगा।”] इस प्रकार से उनका भावावेश दूर हो गया और वे द्वारकाधीश के रूप में आ गये। बलदेवजी यही चाहते थे—उनकी इच्छा [पूर्ण हुई।]
[62:41-70:42 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसके बाद कृष्ण राजभवन में जायेंगे। सत्यभामा मान करने के [कारण] नहीं आयेंगी और कृष्ण बड़े कठोर स्वर से डाँट लगायेंगे— “सत्राजित की कन्या को बुला लाओ! पकड़ लाओ! और [यदि] नहीं आती है, तो आज ही मैं [उसे] राजमहल से बाहर कर दूँगा।”
[यह] सुन करके सत्यभामा आयीं और फिर कृष्ण ने ब्रजवासियों की—विशेष करके गोपियों की—ऐसी महिमा का वर्णन किया, जो आज तक उन्होंने किसीके लिए नहीं किया था। यही नारदजी का अभीष्ट था कि संसार में—इस सारे गोलोक-वृन्दावन से ले करके विश्वभर में कृष्ण के कृपापात्र कौन हैं?— इसीको उन्होंने विभिन्न चमत्कार[पूर्ण] उदाहरणों [के माध्यम से प्रकट किया] और गोपियों की महिमा का स्वयं वर्णन किया। यह प्रसङ्ग आयेगा; फिर लौट करके कभी होगा तो कार्तिक के महीने में भी इसी प्रसङ्ग को हमलोग आगे बढ़ायेंगे।
गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
[71:58-72:51 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
-श्रीमद्भगवद्गीता (4.8)
मैं अपने एकान्त भक्तों के परित्राण, दुष्टों के विनाश एवं धर्म की संस्थापना के लिए युग-युग में आविर्भूत होता हूँ। (GVP)
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