Sri Brhad-bhagavatamrta: Krsna Immersed in the Mood of the Gopis
36:51This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Followers of Sriman Mahaprabhu only desire the mood of the gopis.
- Pastimes of Krsna immersed in the mood of the gopis in Dvarka.
- Baladeva wanted Krsna to come out of that mood and started narrating the pastimes of Mahabharata. He made him realize that He is the supreme personality of Godhead.
- Only Krsna can glorify the gopis properly.
- About the antilogy of different rasas - Madhura-rasa and Vatsalya-rasa cannot stay together.
- Madhura rasa is the original rasa.
- In Vraja, there is opulence but covered by sweetness.
- In the realm of bhajana, intense absoption (avesa) is very important. One must have avesa in hearing harikatha and in serving Sri Guru and the Vaisnavas.
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् : कृष्ण गोपियों के आवेश में निमग्न हो गये
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 29 सितम्बर, 2003 को श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम लोग 15-20 दिन पहले यहाँ से जम्मू-कश्मीर, फिर वहाँ से जयपुर [गये थे।] वहाँ पर स्थित हो करके बहुत अच्छी [प्रकार से] हम लोगों ने महाप्रभुजी की वाणी का प्रचार किया। तत्पश्चात् यहाँ पर लौटे हैं और इतने दिनों के बाद पुनः (फिर से) हम श्रीबृहद्भागवतामृत का पाठ करने जा रहे हैं।
After a long time we went from here to Jammu-Kashmir for preaching and from there we went to Jaipur—Gupta Vṛndāvana and (1:34 inaudible) so beautiful. So it took about more than 16-20 days, a long period! So I have forgotten the subject matter from where I should begin. Now we are discussing the aim and object of our life.
[बहुत समय बाद हम यहाँ से जम्मू-कश्मीर में प्रचार के लिए गये, और वहाँ से जयपुर—गुप्त वृन्दावन गये तथा यह बहुत सुन्दर था। इसमें लगभग 16–20 दिन या उससे भी अधिक समय लग गया। बहुत लम्बा समय! इसलिये मैं विषय भूल गया हूँ कि कहाँ से प्रारम्भ करूँ। हम अब अपने जीवन के लक्ष्य और उद्देश्य पर चर्चा कर रहे हैं।]
I think that Śrīla Rūpa Gosvāmī, Śrīla Jīva Gosvāmī and others have learned so many things from this Bṛhad-Bhāgavatāmṛtam and have written so many books. So Sanātana Gosvāmī is guru—actual guru—in the place of dīkṣā-guru, and Rūpa Gosvāmī is also like this.
[मेरा ऐसा विचार है कि श्रील रूप गोस्वामी, श्रील जीव गोस्वामी और अन्य आचार्यों ने बृहद्भागवतामृतम् से बहुत सी बातें सीखी हैं और अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। इस प्रकार सनातन गोस्वामी गुरु हैं—वास्तविक गुरु— दीक्षा-गुरु के समान ही, और श्रील रूप गोस्वामी भी ऐसे ही हैं।]
So here Kṛṣṇa wanted to glorify the most high-class of love and affection of the gopīs in the whole world. Though the bhaktas of Dvārakā are ātura-bhaktas, parikara of Dvārakā are premātura-bhaktas but the gopīs are not among any of them. Kṛṣṇa himself wanted to glorify them because no one else could glorify them. By his own mouth he wanted to glorify the highest love of the gopīs because Kṛṣṇa had some greed for that to have that position. That is why he had to take the shelter of Viśākhā-devī and Lalitā-devī to know all this and then he would realize something that what is the extreme love of gopīs.
[यहाँ पर श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत् में गोपियों के सर्वोच्च प्रेम और स्नेह की महिमा का गान करना चाहते थे। यद्यपि द्वारका के भक्तगण/परिकर प्रेमातुर-भक्त हैं, किन्तु गोपियाँ उन सभी श्रेणियों से परे हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुखारविन्द से उनकी महिमा प्रकट करने की इच्छा की, क्योंकि कोई अन्य उनकी महिमा का [उनकी भाँति सम्यक् रूप से] गान नहीं कर सकता था। अपने मुख से वे गोपियों के परमप्रेम का वर्णन करना चाहते थे क्योंकि श्रीकृष्ण को उस स्थिति (अद्वितीय प्रेम-भाव) प्राप्ति की कुछ लालसा थी। इसलिये उन्होंने यह सब जानने और अनुभव करने के लिए [महाप्रभु के रूप में] विशाखा देवी तथा ललिता देवी की शरण ली, और तभी वे कुछ अंश में यह अनुभव कर सके कि वास्तव में गोपियों का प्रेम क्या है।]
[abrupt start] love and affection. that is mādanākhya-bhāva should be known in this [break in recording] for the āśrita [?] devotees. Those who are qualified to understand it otherwise this subject will be gone forever. If I am not telling [break in recording] If I am not sending Nārada Gosvāmī to glorify my bhaktas and in the end - gopīs, then this subject will be always kept in the con[?]4:58 file. So he brings and that (5:04 inaudible) he pretended to be unconsciousness with Baladeva and then Baladeva prabhu inspired Brahmā to come. Then Brahmā came, Garuḍa came and all the devatās came there. They wanted to restore the jñāna of Kṛṣṇa that Kṛṣṇa should come to his senses, but it was very hard because he was diving [deeply] in very high gopi prema. So he became faint, Baladeva also became faint and then Baladeva regained his senses and then Garuḍa came and he took Kṛṣṇa on his back and they returned back to their palace with all the queens, Mother Yaśodā, Mother Rohiṇī, Rukmiṇī and other mahīṣīs and there they saw. All are present there. Rukmiṇī and other queens were hiding themselves in the shadow of the pillars, but Satyabhāmā was not there and also Padmā was not there. After that all came [out from] hiding but Satyabhāmā was not there. So Kṛṣṇa became very furious and told “Go and bring Satyabhāmā at once—the daughter of Satrājit, the wicked. She is also wicked. If she is not coming, then get her out from my palace at once without delay.” So at once, quickly she decorated herself and came and he was staying, perhaps that I have told.
[यह जो मादनाख्य भाव है, उसे इन भक्तों को जानना चाहिये — विशेषकर उन भक्तों को जो इसे समझने के अधिकारी हैं। अन्यथा यह विषय सदा के लिए लुप्त हो जाएगा। यदि नारद गोस्वामी न होते, जो अनेक भक्तों तथा अन्त में गोपियों की महिमा का गान करते हैं, तो यह विषय सदा के लिए गोपनीय ही रह जाता।
उस समय कृष्ण ने बलदेव के साथ मिलकर चेतना-शून्य होने का अभिनय किया। तब बलदेव प्रभु ने ब्रह्मा को आने के लिए प्रेरित किया। तब ब्रह्मा, गरुड़ और सभी देवता भी वहाँ उपस्थित हुए। वे सभी श्रीकृष्ण को ज्ञान में लाने का प्रयास करने लगे ताकि कृष्ण पुनः चेतन अवस्था में आ जायें। परन्तु यह अत्यन्त कठिन था, क्योंकि उस समय वे गोपी-प्रेम में बहुत ऊँचाई तक गोते लगा रहे थे। इस कारण वे मूर्च्छित हो गये, बलदेवजी भी मूर्च्छित हो गये थे। फिर बलदेवजी ने पहले चेतना प्राप्त की। उसके बाद गरुड़ आये और श्रीकृष्ण को अपनी पीठ पर बैठाया। उस समय रानियाँ, माता यशोदा, माता रोहिणी, रुक्मिणी तथा अन्य महिषियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं।
कृष्ण ने देखा कि सभी वहाँ उपस्थित हैं। रुक्मिणी और अन्य रानियाँ खम्भों के पीछे छिप रही थीं। सत्यभामा और पद्मा वहाँ नहीं थीं। बाद में पद्मा भी आ गयीं और छिप गयीं, परन्तु सत्यभामा वहाँ नहीं आईं। तब श्रीकृष्ण अत्यन्त क्रोधित होकर बोले, “जाओ! और तुरन्त सत्यभामा को ले आओ, जो दुष्ट सत्राजित की पुत्री है। वह भी अपने पिता की भाँति दुष्टा है। यदि वह नहीं आती, तो तुरन्त उसे मेरे महल से बाहर निकाल दो, एक क्षण की भी देरी न हो!”
तब सत्यभामा ने शीघ्र ही अपने को अलंकृत किया और तुरन्त वहाँ आ गयीं।
सम्भवतः यह मैंने पहले भी बताया है।]
हो गया न? कि नहीं हुआ? कहाँ तक हुआ?
भक्त: (7:43 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो हम वही बतला रहे थे कि कृष्ण ब्रजगोपियों के आवेश में निमग्न हो करके भाव-विभोर हो गये और मूर्च्छित (senseless) पड़े हुए हैं। यहाँ तक तो हो गया।
यही गोपीप्रेम चैतन्य महाप्रभुजी के अनुगतजनों के लिए काम्य है। सभी लोग इसी प्रेम को चाहते हैं।
The followers of Śrī Caitanya Mahāprabhu and Śrī Rūpa Gosvāmī want only this mood of the gopīs—nothing else.
सम्भवतः यहाँ तक कहा था। अध्याय (chapter) तो खत्म हो गया।
भक्त: (8:55 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [तुम लोग] लिख लिया करो कि हमने कहाँ छोड़ा?
बलदेवजी ने कृष्ण को पकड़ करके उठाया और उठाकर बैठाया। [फिर] बलदेवजी ने उनको रसान्तर में लाने की चेष्टा की। वे [चाहते थे कि कृष्ण] यह समझ सके कि– “मैं द्वारकाधीश हूँ, मैं द्वारका में हूँ, मैं वृन्दावन में नहीं हूँ।” बलदेवजी तो ये चाहते थे कि हम [कृष्ण को] इस भाव में लायें कि– “मैं वृन्दावन में नहीं हूँ [अपितु] मैं द्वारका में हूँ, मैं द्वारकाधीश हूँ। ये सब जो मूर्तियाँ हैं, ये योगमाया के द्वारा बनायी हुई हैं या मयदानव के द्वारा या और [किसी प्रकार से।”] इस प्रकार से [कृष्ण] भावान्तर में आ जायें।
बलदेवजी ने कहा– “कृष्ण! आप अपने को स्मरण करें। आप स्वयं भगवान् हैं। देवताओं की रक्षा के लिए उनकी प्रार्थनानुसार दैत्य-दानवों का दमन करने एवं सन्तों की रक्षा के लिए आपका अवतार हुआ है। बहुतों को तो आपने मारा [भी,] किन्तु युधिष्ठिर के ऊपर में बड़ी विपत्ति आ गयी। क्यों आयी? आपके [आश्रित होने के कारण।] वे आपकी भक्ति करते हैं और आपके बिना रह ही नहीं सकते। इसलिये [आपके शत्रु आपके पाण्डवों के प्रति] स्नेह के कारण उन्हें मारना चाहते हैं। इसलिये उनपर आक्रमण कर दिया है और वे तरह-तरह से युधिष्ठिर महाराजजी का उत्पीड़न कर रहे हैं। पौण्ड्रक वासुदेव नामक [असुर] और जरासन्ध इत्यादि दूसरे-दूसरे दानव पाण्डवों पर अत्याचार कर रहे हैं।”
यह सुनते ही कृष्ण का रक्त खौल उठा। वे बड़े क्रोधित हुए– “(11:26 अस्पष्ट) मेरे लिए! मैं अकेले जाता हूँ और इन दुष्टों का संहार करूँगा। युधिष्ठिर और पाण्डवों के ऊपर में इतना अत्याचार मैं नहीं सह सकता।” [यह कहकर] कृष्ण एकदम उठे। [यह सब कुछ] बलदेवजी ने उनमें भावान्तर लाने के लिए कहा था। अब कुछ भावान्तर तो हुआ।
परीक्षित् जी कह रहे हैं कि बलदेवजी ने इस प्रकार से [कृष्ण को] रसान्तर में उपस्थित किया और कृष्ण सोचने लगे।
भगवान् क्रुद्ध हुए [और कहने लगे–] “भाई! शाल्व [के अनुज अर्थात् अनुशाल्व] की तो बात क्या? वह तो वराक है। वराक माने तुच्छ है। मैं एकाकी (अकेले) जा करके उसके प्राण हरण करता हूँ।” [#1]
शाल्व कौन था? You know Salva? Who?
भक्त: पाण्डवों के मामाजी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अभी महाभारत युद्ध से पहले की बात है। [शाल्व पाण्डवों के] मामा थे। वे पाण्डवों की ओर से युद्ध करने के लिए आ रहे थे और बीच में दुर्योधन ने उनकी सेवा करके उनको प्रसन्न करके अपनी तरफ में कर लिया। उस समय के लोग भी बड़े भोले-भाले थे।
भक्त: (13:22 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उसके बाद में फिर वह भगवान् के द्वारा मारे गये।
[श्रील गुरुदेव कुछ भक्तों को अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के लिए कहते हैं। अन्त में श्रीपाद माधव महाराज अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करते हैं। 14:02-16:29 तक]
यहाँ एक बात लक्ष्य करने की है कि मधुररस के लिए रौद्ररस और वीररस दोनों [तटस्थ] हैं। रसों में भी विरोधी, अनुकूल और [तटस्थ] भाव सब होते हैं। जैसे मधुररस और वात्सल्यरस विरोधी हैं, एक जगह नहीं रह सकते। उसी प्रकार से वीररस और मधुररस तटस्थ होने पर भी यहाँ पर जो वीररस का उद्वेग हुआ है, केवल कृष्ण को भावान्तर करने के लिए [हुआ है] और कभी-कभी वात्सल्यरस न रहे तो मधुररस भी नहीं होता। विशेष करके मधुररस में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और इधर (गौण रसों) में हास्य, अद्भुत, [वीर,] करुण, रौद्र, भयानक, वीभत्स इत्यादि बारह रस किसी-न-किसी प्रकार से आवश्यक हैं। यह मधुररस ही सभीका मूल उद्गम स्थान है। दास्य से ये [मधुररस] आया है– ऐसा नहीं। कृष्णचन्द्रजी से सब आये हैं, कृष्ण किसी से नहीं आये। नारायण के बाद में कृष्ण [आये हैं,] नारायण ही कृष्ण के रूप में आये हैं – ऐसा नहीं है। मूल अवतारी कृष्ण हैं। इनमें सारे रस हैं। उसी प्रकार से मधुररस में सारे रस हैं। इसलिये यहाँ पर पीछे बतलायेंगे कि क्यों ये (वीररस) विरोधी नहीं हुआ?
कृष्ण ने कहा– “दाऊ भैया!
भवान् प्रत्येतु सत्यं मे सम्प्रतिज्ञमिदं वचः।
इत्थं प्रसङ्गसङ्गत्या मुग्धभावं जहौ प्रभु:॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.62)
[आप मेरे इन प्रतिज्ञापूर्ण सत्य वचनों पर सम्पूर्णरूप से विश्वास रखिये। इस प्रकार प्रभु श्रीकृष्ण ने प्रसङ्ग-क्रम से अपने प्रेम में निमग्न मुग्धभाव का परित्याग किया।] GVP
[कृष्ण ने कहा–] “आप मेरी बातों पर विश्वास कीजिये। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ। अनुशाल्व और ये सब जितने [दानव] हैं ये कुछ नहीं हैं, वराक (तुच्छ) हैं। मैं अकेले जाकर अनुशाल्व का [वध कर दूँगा।”]
युद्ध में [कृष्ण के हाथों] शाल्व का वध तो हो गया था। उसका छोटा भाई अनुशाल्व था। वह शाल्व का [वध होने के कारण] युधिष्ठिर महाराज को, पाण्डवों को तङ्ग करता था।
“तो मेरे ऊपर विश्वास रखिये। मैं अकेले जा करके इन सबकी हत्या कर दूँगा।” और यह कहते-कहते [कृष्ण] जो गोपियों के– ब्रजभाव में निमग्न थे, उससे कुछ ऊपर आ गये, भावान्तर में आ गये और कृष्ण चारों ओर में देखने लगे–
परितो मुहुरालोक्य श्रीमद्द्वारवतीश्वरम्।
श्रीयादवेन्द्रमात्मानं प्रत्यभिज्ञातवांस्तदा॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.63)
[इसके उपरान्त श्रीकृष्ण बार-बार चारों ओर देखकर अपने को द्वारकाधीश श्रीयादवेन्द्र के रूप में पहचानने लगे।] GVP
अतः कृष्ण इधर-उधर देख रहे हैं और हाथों से आँखों को मल रहे हैं और सोच रहे हैं– “मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ?” कभी-कभी हम लोग भी नींद के वश में... जैसे कि जम्मू-कश्मीर में सो रहे हैं और उस समय सोये हुए में ही नवद्वीप की या वृन्दावन की याद आती है, स्मरण होता है और जब नींद खुलती है तो [सोचते हैं कि] मैं कहाँ हूँ? [वृन्दावन] में हूँ। [किन्तु] जब इधर देखते हैं, खिड़की की तरफ, जाली की तरफ [देखते हैं] तो याद आता है कि मैं जम्मू में हूँ। ऐसे कृष्ण चारों तरफ में देखने लगे।
He began to see in every direction “Where am I? Who am I?”
[कृष्ण] अपने को भी नहीं सम्भाल सके। थोड़ी देर के बाद में [उन्हें स्मरण हुआ–] “ओह! मैं यादवेन्द्र हूँ। मेरी बहुत-सी स्त्रियाँ हैं, बहुत-से लड़के हैं। मैंने महाभारत युद्ध किया। वृन्दावन बहुत पुरानी बात हो गयी। वहाँ पर था, फिर वहाँ से चला आया।” और उन्होंने यह भी स्मरण किया कि मैं राजभवन के भीतर (अन्तःपुर) में, महल के भीतर में सो रहा था और देखा कि “मैं द्वारकाधीश हूँ किन्तु ये वंशी, मोरमुकुट और ब्रज का वेश कैसे आया? क्यों आया?”
और भी देखा कि द्वारकापुरी के बाहर में समुद्र एकदम लहरा रहा है। एक पर एक बड़ी गर्जन करती हुई समुद्र [में लहरें उठ रही हैं।] समुद्र गर्जन कर रहा हैं और उसके किनारे [ग्वाल-बाल] गायों को ले करके खड़े हैं किन्तु गायों को [ध्यान से देखा] तो ये गाय नहीं, ये तो मूर्तियाँ हैं और ये तो गोपबालाएँ नहीं हैं, ये भी मूर्तियाँ हैं। यशोदा मैया भी तो यशोदा मैया नहीं, उनकी मूर्ति है। नन्दबाबा भी मूर्ति हैं, सखालोग भी मूर्ति हैं। अब [कृष्ण] संशयग्रस्त हो करके हँसने लग गये। थोड़ी-सी याद आयी– “ये कैसे हुआ?”
तब तो कृष्ण सर्वज्ञ कैसे हैं? यदि वे नहीं समझ सकते। सर्वज्ञ और मुग्धत्व दोनों एक साथ में रहते हैं। योगमाया कभी-कभी उनका सर्वज्ञत्व छिपा लेती हैं और कभी-कभी मुग्धत्व का भाव अर्थात् बालक जैसे मुग्ध हो जाते हैं। इस प्रकार से कृष्ण में दोनों हैं—कभी-कभी ऐश्वर्य, कभी-कभी माधुर्य। ऐश्वर्य सब समय रहता है किन्तु लीला के लिए योगमाया उसको ढ़क करके रखती हैं। कभी-कभी उसको प्रकाश करती हैं। ब्रज में कृष्ण की ऐसी कोई भी लीला नहीं है [जिसमें ऐश्वर्य न हो।] जैसे गोवर्धनधारण, कालियदमन, केशी को मारना इत्यादि समस्त जितनी भी लीलाएँ हैं, सबमें ऐश्वर्य है किन्तु वे माधुर्य के द्वारा आच्छादित हैं।
अब [कृष्ण] लज्जित हो करके हँस रहे हैं। इस प्रकार से कृष्ण को हँसते देख करके बलदेवजी भी थोड़ा-सा हँसने लग गये। और ब्रह्माजी ने उनको चेतन कराने के लिए जो-जो व्यवस्था की थी, सारी घटनाएँ उनको सुना दीं कि कैसे-कैसे गरुड़ आये? देवता लोग भी आये और क्या-क्या बातें हुईं?
बोलो तो। अब बोल सकता है? बोलो। क्या जाने क्या हिन्दी…
[24:08-31:04 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद–]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भजन-राज्य में आवेश आवश्यक है। जैसे गोपियों की महिमा बोलते-बोलते कृष्ण भावाविष्ट हो गये। ऐसे साधक भी भजन करते-करते भजनीय विषय में आविष्ट हो और यदि आविष्ट नहीं हुए तो अभी भजन आरम्भ नहीं हुआ, [अभी] कुछ-कुछ साधन है। भजन माने क्या? भज धातु सेवायाम् अर्थात् सेवा जहाँ पर आरम्भ हो गयी, [वह भजन है।] इसलिये कृष्ण की सेवा कब आरम्भ हुई? जब साधन करते-करते अनर्थ-निवृत्ति हो जायेगी, निष्ठा, रुचि, आसक्ति होगी, तब कृष्ण में आवेश होगा। यह आवेश जितना ही गाढ़ा होता जायेगा, प्रेम की ऊपरवाली दशा आयेगी। और जिसको तनिक भी आवेश नहीं है, गुरु की सेवा में आवेश नहीं है, वैष्णवों की सेवा में आवेश नहीं है, हरिकथा के श्रवण में आवेश नहीं है तो उसमें बहुत गड़बड़ियाँ हैं। इसीलिये वह बतलाया–
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन- कथासु यः।
नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.2.8)
[मनुष्य द्वारा वर्णाश्रमरूप अपने धर्म का ठीक-ठीक पालन करने पर भी यदि उसकी श्रीभगवान् की लीला-कथाओं में रति अर्थात् आसक्तिरूप रुचि उत्पन्न नहीं होती है, तो उसका स्वधर्म पालन निश्चित रूप से केवलमात्र श्रम ही है। अतः स्वधर्म को छोड़कर श्रवण-कीर्त्तनादि भक्तिरूप परमधर्म का ही पालन करना चाहिये।] GVP
यदि यह हरिकथा सुनने में लोभ, और धीरे-धीरे चित्त आविष्ट नहीं हुआ तो [अभी गड़बड़ी है।] अभी हरिकथा सुनते-सुनते भोजन करने की याद है, अभी [हरिकथा में यह सोचते हैं कि] भोजन करने [का समय हो गया है, हरिकथा में] बहुत देर हो रही है, तब तो अभी आवेश नहीं हुआ। जब व्यक्ति सांसारिक सब क्रियाकलापों को भूल जाता है, और कीर्तन करने में, सेवा करने में, भजन करने में आविष्ट हो जाता है, तब वह भजन आरम्भ हुआ। जब ऐसी दशा आयेगी तो समझो कि वह जीव बहुत सौभाग्यशाली है। बहुत सौभाग्यशाली! यही कह करके आज का वक्तव्य समाप्त करता हूँ। रात हो गयी है। सात बज गये हैं। इसलिये आप लोग 5:30 बजे तक आ जायें।
You should all assemble here at 5:30. So that from 5:30 to 6:30 we can explain otherwise the devotees from Vṛndāvana they suffer a lot.
[33:32-35:30 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद और उसके पश्चात् कोई भक्त परिक्रमा से सम्बन्ध में कुछ घोषणा करते हैं।]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
श्रीमद्भागवतम् के दशम स्कन्ध का 77वाँ अध्याय दृष्टव्य है।
We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
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