PURE BHAKTI ARCHIVE
Subscribe to the Daily Harikatha & Short Videos in Hindi & English @Gaudiya Rasamrita

Sri Brhad-bhagavatamrtam: Baladeva Prabhu Helps Krsna to Return to the Mood of Dvaraka & Uddhava Explains Why Satyabhama is Not Present

53:16
#277
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 65%
Average

This audio is included in the following series of lectures:

Other speakers

  • Other Scholars

Topics

  • The conversation between Baladeva Prabhu and Krsna where Baladeva removed Krsna from the mood of Vraja in Nava-Vrndavana.
  • Baladeva Prabhu removed all the stimulants, like dust and peacock feathers. Both bathed in the sea & returned to Dvaraka.
  • Baladeva Prabhu told Krsna that He was the son of Devaki and Vasudeva.
  • Krsna's eagerness to establish the glories of Srimati Radhika, and the gopis
  • The reaction of different associates of Dvaraka upon witnessing Krsna's Vraja moods.
  • When Mother Rohini was narrating the pastimes of Vraja, then Satyabhama and Mother Devaki were not there. Even Padma (Kamsa's mother) was not allowed to be around when Krsna was experiencing ecstatic moods.
  • When Uddhava saw Satyabhama missing, he asked Krsna the reason, and Krsna himself glorified the gopis.
  • Padma saw all this while she was hidding and she criticized the vrajawasis & chastised Devaki, Rohini Devi & Krsna's queens.
  • At the end, Srila Gurudeva talked about his service to Srila BV Svami Maharaja.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम्: बलदेव प्रभु द्वारा कृष्ण को पुनः द्वारका-भाव में स्थिर करना तथा उद्धवजी द्वारा सत्यभामा की अनुपस्थिति का कारण-वर्णन

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 1 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जब बलदेवजी कृष्ण को ब्रजभाव की निमग्नता से निकालकर द्वारका के भाव में लाये, तब भी अभी कृष्ण को यह बात पूरी तरह से समझ में नहीं आ रही थी। [वे विचार करने लगे—] “मैं द्वारका में हूँ, किन्तु मेरा वेश तो ब्रजवासी जैसा दिख रहा है? मैं समुद्र के किनारे गैया चराने आ गया, यह सब कैसे हुआ?”

तब बलदेवजी ने बतलाया— “आप वसुदेव-देवकी के पुत्र हैं। अभी आप द्वारका के राज्याधीश हैं। आपके [कारण] युधिष्ठिर पर विपत्ति आ पड़ी है। अनुशाल्व इत्यादि उनको बहुत ही तंग कर रहे हैं। उनकी रक्षा करना भी आपका कर्तव्य है।”

[यह सुनकर] कृष्ण बड़े क्रोधित हुए और क्रोधित होकर बोले— “अनुशाल्व की बात क्या! और जितने भी राक्षस जो महाराज युधिष्ठिर और उनके भाइयों को तंग कर रहे हैं, मैं अकेले ही जाकर उन्हें मार दूँगा।” इस प्रकार से…

इतने में बलदेवजी कुछ हँसे और कृष्ण भी मुस्कुराये। [कृष्ण ने] देखा— “पुरी के बाहर समुद्र गर्जन कर रहा है, और वहाँ पर गायें खड़ी हैं।” और संशययुक्त होकर देखा— “ब्रज का भाव मुझमें!” इस प्रकार से कृष्ण को हँसते हुए देखकर बलदेवजी भी मुस्कुराने लगे और उसके बाद में उनको बतलाया—“आप किस प्रकार ब्रज के भाव में मुग्ध हो गये थे, यशोदा मैया और ब्रज के लिए आप किस प्रकार से मूर्च्छित हो गये—मैं भी मूर्च्छित हो गया। तब ब्रह्माजी ने यह सब उपाय किया है कि आपको कैसे स्थिर किया जाये। इसलिये ब्रह्माजी ने उपाय बनाकर गरुड़ को भेजा। गरुड़ आपको यहाँ लाये। विश्वकर्मा ने ये सब मूर्त्तियाँ रचीं और ये गायें भी उन्हीं की बनायी हुई हैं। अब आपका चित्त स्वस्थ हो गया है। अब द्वारकापुरी में चलना है और युधिष्ठिर इत्यादि की रक्षा करनी है।”

यद्यपि यहाँ पर ‘ह्रीण’ शब्द आया—

ततो ह्रीण इव ज्येष्ठमुखं पश्यन् स्मितं श्रितः।
रामेणोद्वर्त्त्य तत्राब्धौ स्नापितो धूलिधूसरः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.67)

[यह सब सुनकर श्रीकृष्ण अपने ज्येष्ठ भ्राता के मुख की ओर देखकर कुछ लज्जित जैसे हुए तथा मन्द-मन्द हँसने लगे। तब श्रीबलदेव ने और कुछ भी नहीं कहा और श्रीकृष्ण के धूलि-धूसरित अंगों का मार्जन करके उनको समुद्र में स्नान कराया।] GVP

यहाँ पर ‘ह्रीण’ शब्द आया है। ‘ह्री’ माने लज्जा होता है, किन्तु ‘ह्री’ माने केवल लज्जा ही नहीं होता—उसको दिखला रहे हैं। यहाँ ‘ह्रीण इव’ कहने का तात्पर्य है—लज्जा के समान। कृष्ण लज्जित हुए—ऐसी बात नहीं है, लज्जा के समान। (बाङ्गला भाषा में…) कृष्ण परमश्लाघ्य (अत्यन्त प्रशंसनीय) सत्कर्म में ही प्रवृत्त हुए थे; इसलिये तत्त्वतः उनका लज्जारहित होना ही सूचित होता है।

यहाँ पर कोई लज्जा की बात नहीं है, क्योंकि कृष्ण एक बड़े भारी गम्भीर कार्य में नियुक्त हुए थे। वह गम्भीर कार्य क्या था?—गोपियों की महिमा का वर्णन करना। संसार के लोग, भक्त लोग—सब लोग यह समझें कि गोपियों की महिमा कैसी है। कृष्ण ने विचार किया—“गोपियों की महिमा बोलने में कोई भी समर्थ नहीं है। कुछ-कुछ मैं हूँ।” इसलिये उसका वर्णन करने के लिए उन्होंने नारदजी के हृदय में प्रेरणा दी। वे वहाँ गङ्गा के किनारे प्रयाग से [आरम्भकर] भक्तों के पास जाते और कहते— “आप ही धन्य हैं।” वे [भक्त] अपने से बड़े को धन्य मानते। इस प्रकार से नारदजी [यात्रा करते-करते] अब द्वारका तक आये हैं। [किन्‍तु] मूल कारण क्या है? जो नारदजी नहीं कर सके, जो उद्धव भी नहीं कर सके और गोपियों की सारी महिमा [गोपनीय ही] रह गयी, उस महिमा को बतलाने के लिए अब कृष्ण स्वयं उन्मुख हो रहे हैं।

विशेषकर गोपियों का कृष्ण के प्रति जो पारकीय भाव था—उस पारकीय भाव का स्वकीय से क्या पार्थक्य है? पारकीय गोपियों का कृष्ण में कैसा प्रेम है—यह [तो स्वयं] कृष्ण भी नहीं समझ सकते। इसलिये [कृष्ण] राधाजी का भाव और द्युति—दोनों लेकर शचीनन्दन गौरहरि के रूप में आये। गोपियों की महिमा केवल [गोपियाँ ही जानती हैं।] विशेषकर राधाजी की महिमा ललिता-विशाखाजी कुछ कह सकती हैं। कृष्ण ने उनसे सीखा और अब फिर उसी ‘विशेष कार्य’ में संलग्न हैं। इसलिये इसमें लज्जा की बात क्या है? इसमें तो लज्जा की बात नहीं है। [कृष्ण] अपने पराक्रम का बखान नहीं कर रहे कि जिससे लज्जा हो। लज्जा किसलिये हो रही है? इसलिये लज्जा की भाँति है, किन्तु लज्जा नहीं है। कृष्ण ‘बहुत विशेष महत्वपूर्ण कार्य’ में संलग्न हैं।

[8:21-12:23 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यहाँ पर और भी बतला रहे हैं। ‘ह्री’ माने जो लज्जा होती है, [उसका व्यापक अर्थ है।] यदि कोई [व्यक्ति] पापकर्म में संलग्न हो, अकर्म-विकर्म में, चोरी-बदमाशी, व्यभिचारी में हो और उसके सामने कहा जाये— “तुमने यह क्या किया?” तो उसे लज्जा आयेगी। अथवा कोई वीर व्यक्ति हो, और वह किसी से हार गया और उसको [कहा जाये—] ‘ओह, तुम हार गये!’ तो उसको लज्जा आती है। किन्तु यहाँ पर ‘ह्री' का तात्पर्य केवल इसीसे नहीं है, इससे बहुत कुछ ऊपर है। इतना ही नहीं है।

कृष्ण का यह काम बहुत ऊँचा है कि उन्होंने गोपियों की प्रशंसा की। किन्तु फिर लोगों [के सामने] मूर्च्छित हो गये और ऐसा काम हुआ कि देवकी मैया, रोहिणी मैया, सत्यभामा, रुक्मिणी और-और सब वहाँ आये हैं, पद्मा आयी है और [उन्‍होंने] कृष्ण के इस ब्रजभाव का जो दर्शन किया, तो अब उनको लज्जा आ रही है। किसलिये? गोपियों के प्रति कृष्ण का जो व्यवहार [है, उसे वह] दूसरों के सामने [प्रकट] नहीं कर सकते। यशोदा मैया के सामने नहीं कहेंगे। [किन्तु उन्होंने ऐसा कर दिया है इसलिये] अब उनको इसके लिए लज्जा हो रही है—यह व्यापक अर्थ में समझो। [कृष्ण विचार कर रहे हैं] कि ये ब्रज के भाव मैंने इनके सामने क्यों प्रकट किये? इसलिये वह सारा विषय ‘ह्री’ के द्वारा बतलाया गया। [कृष्ण यदि] लज्जित होते, तो [श्लोक में] कह देते कि लज्जित हुए, कि‍न्तु लज्जित नहीं हुए। अतः ‘ह्री’ का व्यापक अर्थ है, इसलिये यहाँ पर इसका उपयोग हुआ।

दूसरी बात, ‘रामेणोद्वर्त्त्य तत्राब्धौ स्नापितो धूलिधूसरः— उस समय कृष्ण धूलि-धूसर हैं अर्थात् धूल से भरे हुए हैं क्योंकि वे बाहर आँगन में ही गोपियों की प्रेमदशा का चिन्तन करते-करते मूर्च्छित होकर गिर पड़े थे। वे और बलदेव—दोनों [भूमि पर] लोटने लगे। इसलिये उनके अङ्ग धूलि-धूसरित हो गये। उस समय कृष्ण का जो [ब्रज-भावयुक्त] वेश था, बलदेव प्रभुजी उसको हटा करके [उन्हें द्वारका के वेश में लाये।] ब्रज के भाव को हटाने [हेतु] वंशी को हटाया, मोरमुकुट को हटा दिया और अङ्गों में जो धूलि लगी थी, [उसे भी हटाया।] यह [अङ्गों में धूलि] भी एक क्या है? यह भी ब्रज का कोई एक उद्दीपन भाव है। क्यों हुआ ऐसा? [क्योंकि कृष्ण] ब्रज का भाव चिन्तन कर रहे हैं। इसलिये धूल को हटाने के लिए [बलदेवजी] कृष्ण को समुद्र [तट पर] ले गये और उनको स्नान कराया। स्वयं भी स्नान किया और स्नान कराकर कृष्ण को स्थिर [चित्त] किया। इतने में गरुड़जी आ गये। गरुड़जी आ करके कृष्ण के पास बैठ गये और कृष्ण उस गरुड़ पर बैठ करके अपने अन्तरमहल—राजमहल में पहुँच गये।

[16:20-19:44 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
सर्वज्ञेनोद्धवेनाथ देवकीरुक्मिणीमुखा:।
प्रबोध्यान्तःपुरे देव्यो भगवत्पार्श्वमापिताः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.69)

[तदुपरान्त सर्वज्ञ श्रीउद्धव ने माता श्रीदेवकी और श्रीरुक्मिणी आदि प्रमुख महिषियों को सान्त्वना देकर अन्तःपुर में भगवान् श्रीकृष्ण के पास भेजा।] GVP

उद्धवजी सर्वज्ञ हैं—सब कुछ जाननेवाले। कृष्ण क्या चाहते हैं? नारदजी को किसलिये भेजा? और स्वयं क्या करना चाहते हैं?—यह सब वे जाननेवाले हैं। [इसलिये] उद्धवजी ने देवकी मैया, रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि सबको प्रबोधित किया, उन्‍हें सान्‍त्वना दी और फिर उन्हें कृष्ण जो अन्तःपुर में आये हैं, उनके पास में भेज दिया।

उस समय, समय के भाव और तात्पर्य को [भलीभाँति] समझनेवाली—कि किस समय क्या करना चाहिये—[ऐसी देवकी माता कृष्ण के निकट आयीं। उन्होंने विचार किया कि—] “अभी यदि कृष्ण को वृन्दावन की कोई वस्तु स्मरण करने दिया जाये, तो वे फिर उसी भावना में झट पहुँच जायेंगे। इसलिये उद्दीपन की ऐसी कोई बात न हो जिससे कृष्ण फिर अभी ब्रज के भाव में चले जायें।” इसलिये उन सब विषयों को जाननेवाली देवकी माता निकट में आयीं, आशीर्वाद दिया और कृष्ण को आशीर्वाद देकर अभिनन्‍दित किया, [और फिर] उनके लिए भोजन बनाने के लिए झट वहाँ से चली गयीं। क्यों चली गयीं? [क्योंकि] अभी रुक्मिणी, सत्यभामा के सामने जो बातें होनेवाली हैं, कृष्ण उनकी शिक्षा के लिए ब्रज की जो गाथा कहने जा रहे हैं—वह देवकी मैया के सामने नहीं [कहेंगे।] इसलिये देवकी मैया कृष्ण का भावान्‍तर कुछ और ठीक करके [वहाँ से] चली गयीं।

इधर वहाँ पर सत्यभामा नहीं आयीं। रुक्मिणी आयीं, और कृष्ण की अन्य जो पटरानियाँ थीं—वे सब भी आयीं, किन्तु सत्यभामा नहीं आयीं। क्यों? [क्योंकि] उनको अभिमान—मान हो गया था— “ब्रजवासियों की इतनी महिमा! उनके प्रति इतना स्नेह! हम लोग सब कुछ देकर भी [वह स्नेह] नहीं पातीं।”— इस [भावना से उन्‍हें] कुछ मान हो गया। इसलिये वह रूठ गयीं और [उस समय वहाँ उपस्थित नहीं हुईं।]

दूसरी बात, वृद्धा पद्मा का भी वहाँ पर आगमन नहीं हुआ। उद्धवजी ने उसको आने नहीं दिया, [यह सोचकर] कि वह रङ्ग में भङ्ग करेगी। इसलिये किसी बहाने से उसको दूसरी जगह भेज दिया। वृद्धा का वहाँ पर उपस्थित रहना रस की दृष्टि से ठीक नहीं है।

प्रभुप्रिया रुक्मिणी प्रभृति देवीगण पहले से ही किसी खम्बे की आड़ में छिपी हुई थीं। 16108 [महिषियों में सत्यभामा] को छोड़कर अन्य सभी खम्बे की आड़ में छिपी हुईं थीं। किसलिये? किसलिये छिपी हुई थीं? वे लज्जा के मारे कृष्ण के सामने नहीं जा रही थीं; इसलिये वे छिप रही थीं। केवल सत्यभामा देवी उस स्थान पर नहीं आयीं। इसलिये कृष्ण ने उद्धवजी से पूछा— “सत्राजित की कन्या कहाँ गयी? कहाँ गयी सत्राजित की कन्या?”

यहाँ पर सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि अब कृष्ण अपने मुख से ब्रजवासियों, अपने माता-पिता नन्द-यशोदा और सर्वोपरि गोपियों की विशेष महिमा का वर्णन करेंगे। जो असंकोच और परम-गम्भीर भाव है, जो कि दूसरों के सामने कहने योग्य नहीं है, उस प्रेम को कृष्ण स्वयं अपने [मुख से] कहेंगे। इसलिये यह आख्यान सब लोगों के श्रवण के उपयोगी नहीं है। यह पद्मा के सुनने योग्य नहीं है। माता देवकी तक को भी— वात्सल्य रस [के भक्तों] को भी इसे सुनने का अधिकार नहीं है। इसलिये देवकी मैया को भी उस स्थान से इङ्गित किया गया या वे अपने आप वहाँ से हट गयीं। वे अपने [आप] हट गयीं और रुक्मिणी प्रभृति जो महिषियाँ थीं, वे स्तम्भ के पीछे छिप गयीं। क्यों? क्योंकि वे कृष्ण की प्रियाएँ हैं, [इसलिये] वे सुनने योग्य हैं, किन्तु जिसके लिए ये कह रहे हैं, वह सत्यभामा वहाँ नहीं है। इसलिये सत्यभामा को भी सुनना चाहिये क्योंकि उसको [ब्रजगोपियों] के प्रति मान, ईर्ष्या होती है। भगवान् सत्यभामा को न देख करके बोले— “सत्राजित की कन्या सत्यभामा कहाँ है?” बड़े बिगड़ करके बोले।

हरिदास उद्धवजी बोल रहे हैं—

वृन्दावने यदा जातो विजयो रैवतार्चिते।
प्रभोस्तदातनं भावमबुधभ्रामकं परम्॥
कमप्यालोक्य देवीभिः सह तत्रैव दूरतः।
स्थिता निलीय दुर्बुद्धिरूचे पद्मावती खला॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.72-73)

[श्रीहरिदास उद्धव ने कहा—हे प्रभो! रैवतक पर्वत के बीच में स्थित नव-वृन्दावन में जब आप पधारे थे, उसी समय अबोध व्यक्तियों को भ्रमित करनेवाले आपके विचित्र भाव को देखने के लिए खल-स्वभाववाली कंस-माता पद्मावती भी महिषियों के साथ उस स्थान से कुछ ही दूरी पर अलक्षित भाव से खड़ी थी। वह दुर्बुद्धि पद्मा आपके उस अपूर्व भाव का दर्शनकर महिषियों से कहने लगी—] GVP

उद्धवजी हरिदास हैं। हरिदास कहने का तात्पर्य—जो हरि के दास हैं, हरि के भाव को जाननेवाले हैं। इसलिये उद्धवजी [को हरिदास] कह रहे हैं।

कृष्ण ने पूछा— “सत्यभामा कहाँ गयी? क्यों नहीं आयी?”

उसके [उत्तर में उद्धवजी] कह रहे हैं— “रैवतक पर्वत पर [जब आप पधारे थे…”]

यह समुद्र के बीच में है और जिसके आस-पास में ही द्वारकापुरी है, जहाँ बलदेवजी ने द्विविद बन्दर को मारा था।

[उद्धवजी कह रहे हैं—] “तो जिस समय आप रैवतक पर्वत के बीच में नव-वृन्दावन में [पधारे] थे, [तब आप] ब्रजभाव में सखाओं के साथ गैया चरा रहे थे। नन्द-यशोदा आपको मक्खन खिला रहे थे और पुतली की भाँति खड़े थे। और उस समय आपने राधिकाजी का चुम्बन किया और उनसे प्रेम की ऐसी बातें [कहते हुए बोले]— “प्रिय! तुम मेरे मन की बात कैसे जान गयीं? इसीलिये रूठी हुई हो, बात नहीं कर रही हो। मैंने स्वप्‍न में कुछ देखा है। अभी संक्षेप में बतला रहा हूँ, जब गोचारण [से लौट] करके आऊँगा, तब [विस्तार से] बतलाऊँगा। [स्वप्न में मैंने देखा—] मैं द्वारका में गया, मेरा विवाह हो गया। पहले मथुरा में गया और वहाँ पर कंस को मारा था। [उसके बाद] पिताजी ने मुझे गुरु सान्‍दीपनी के यहाँ भेजा; उपनयन हुआ और उसके बाद में द्वारका में आया। अब यहाँ पर आकर मैंने 16108 महिषियों के साथ में विवाह किया। सबके गर्भ से दस-दस पुत्र और एक-एक कन्या हुईं। और मैं नाती-पोतें सबके साथ में बड़े आराम के साथ में द्वारका में रह रहा हूँ। मैंने [यह] स्वप्‍न देखा। ओह! सम्भवतः तुमको यह स्वप्‍न ज्ञात हो गया क्योंकि तुम तो मेरे मन की सभी बातें [जान लेती हो।] अच्छा, तो इस विषय में तुम रूठो मत! बात तो सत्य नहीं है, मैं केवल स्वप्‍न देख रहा था— [ये सब] स्वप्‍न की बातें हैं। तो तुमने इसलिये मान कर लिया। मैं अभी गोचारण को जा रहा हूँ, वहाँ से लौट करके आकर पूरी बात तुमको आद्योपान्त (आरम्भ से अन्त तक) सुनाऊँगा।” तो जिस समय आप रैवतक पर्वत पर कूदे, उस समय आपके अबुध भ्रामक विचित्र भाव को देखने के लिए कंस-माता पद्मावती [भी उस स्थान पर उपस्थित थी।”]

तात्पर्य क्या है? आपका वह जो चरित्र था, [वह] ‘अबुध’ अर्थात् जो भक्ति-तत्त्व के रस-तत्त्व को नहीं जाननेवाले हैं, उनके लिए अबोध था। वे लाख चेष्टा करने पर भी समझ नहीं सकते। ‘कृष्ण ने क्यों रास किया? क्यों उपपति बने? क्यों नायक बने और गोपियाँ नायिकाएँ बनीं? उनके प्रेमरस का निर्यास कैसा है?’—[यह] बहुत गम्भीर [विषय] है। इसे मूर्ख लोग नहीं समझ सकते। यहाँ तक कि यह वात्सल्य के भी ऊपर है। तो अबुध…

जैसे श्रीदामोदराष्टक के तृतीय श्लोक में लिखा है—

इतीदृक् स्वलीलाभिरानन्द-कुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्।
तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥
-श्रीदामोदराष्टकम् (3)

[जो इस प्रकार दामबन्धनादि–रूप बाल्यलीलाओं के द्वारा गोकुलवासियों को आनन्द–सरोवर में नित्यकाल सराबोर करते रहते हैं, और जो ऐश्वर्यपूर्ण ज्ञानी-भक्तों के निकट “मैं अपने ऐश्वर्यहीन प्रेमी भक्तों के द्वारा जीत लिया गया हूँ”—ऐसा भाव प्रकाश करते हैं, उन दामोदर-श्रीकृष्ण की मैं प्रेमपूर्वक बारम्बार वन्दना करता हूँ।] GVP

क्या तात्पर्य है? ‘तदीयेशितज्ञेषु’ — तुम्हारे समस्त तत्त्वों को जाननेवाले नारद प्रभृति भी इस महिमा को नहीं जानते हैं—राधा और गोपियों के साथ में कृष्ण की लीलाओं को। अतएव जब नारद प्रभृति [तत्त्वज्ञानी भक्त भी] इन तत्त्वों को जाननेवाले नहीं हैं, तो औरों की क्या बात है? इसलिये अबुध भ्रामक विचित्र भावों को देखने के लिए खल स्वभाववाली पद्मावती भी देवकी इत्यादि के साथ में वहाँ पर गयी थी। अर्थात् [यहाँ] उसको मूर्ख बता रहे हैं—किसको? पद्मावती को। तो भी वह गयी और किसलिये [उसको मूर्ख कहा? क्योंकि वह कृष्णलीला का उल्टा अर्थ करती है—] “कृष्ण को ये जूता नहीं देते, छाता नहीं देते, मक्खन भी नहीं देते, उनके हाथ-पैर बाँध देते हैं, मारते हैं, डराते हैं, धमकाते हैं। यदि किसी के घर से थोड़ा-सा मक्खन चोरी किया, तो भी मारते हैं, गोपियाँ उलाहना देती हैं।” [उसने कृष्णलीला का] उल्टा अर्थ लिया; सीधा अर्थ उसके समझ में नहीं [आता।]

तो बड़े-बड़े सिद्धान्‍तविद् लोग भी कृष्ण की इन लीलाओं को नहीं समझ सकते। ब्रह्मा तक उनकी लीलाओं को नहीं समझ पाये, तो और लोगों की तो बात [ही क्या?] इसलिये [ब्रह्माजी] और लीलाएँ देखने के लिए चले, किन्तु भूल कर बैठे—परीक्षा करने [चले] गये। परीक्षा करना ही उनका गड़बड़ हो गया।

पद्मावती भी देवकी इत्यादि के साथ में किसी वृक्ष की आड़ में खड़ी होकर [लीला] देख रही थी। परन्तु दुर्बुद्धि पद्मा उस लीला को देख करके क्या कहने लगी?— “अरे पुण्यहीना देवकी! अरे दुर्भागी रुक्मिणि! अरे नीच सत्यभामे! अरे दीनहीन जाम्‍बवती आदि रमणियों! हाय! हाय! अरे, [क्या तुम लोग] कृष्ण की ऐसी चेष्टाओं को नहीं देख रहीं? अब अपने-अपने महल भी छोड़ो और आभीरियों की दासी बनो।”

[पद्मावती ने] ‘आभीर’ शब्द का प्रयोग किसलिये किया? [उसने] वैश्य नहीं कहा, [क्योंकि] वैश्य भी द्विजाति में आ जाते हैं। आभीर, खश, हूण, अन्‍ध्र—ये सब अस्पृशीय जातियाँ हैं। तो इसलिये उनका ‘आभीर’ नाम लिया। वह कह रही है कि ये भी उसी जाति के हैं। इसलिये [आभीर कहा।]

श्रीपाद तीर्थ महाराज:

किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा
आभीरशुह्मा यवना: खशादय:।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रया:
शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: ॥
-श्रीमद्भागवतम् (2.4.18)

[जातिगत पाप से दुष्ट किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, शुह्म, यवन और खस इत्यादि नीच जातियाँ तथा जो लोग अपने कर्मों से पापी हैं, वे सब भी जिन श्रीभगवान् के आश्रित भागवत-स्वरूप सद्‍गुरु के चरणों में शरणागत होनेमात्र से ही जातिगत और कर्मगत दोषों से शुद्ध हो जाते हैं, उन स्वाभाविक रूप से प्रभुता-सम्पन्र, सर्वशक्तिमान भगवान् को नमस्कार है।] GVP

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसलिये आभीर बतलाया।

“‘आभीरीणां हि दास्याय तपस्यां कुरुतोत्तमाम्’[#1] — ओह! कृष्ण का यह भाव देखा, जो आज तक द्वारका में इतनी रानियों के सामने भी प्रकट नहीं हुआ। [यहाँ द्वारका में कृष्ण किसीको] कभी भी उतना नहीं पूछते और ब्रजवासियों के आगे मक्खन माँग रहे हैं, उनके चरण पकड़ रहे हैं, उनको वंशी से यहाँ पर छू रहे हैं, उनसे हँसते हुए कहते हैं और उनके प्रेम के वशीभूत हो गये हैं। तुम जाओ, आभीरियों की तपस्या करो—उनके भावों को पाने के लिए तपस्या करो।” [इस प्रकार पद्मावती] बहुत कुछ बोल रही है— “इसलिये तुम्हें लज्जा आनी चाहिये।” इतना कहने के बाद…

ये कौन कह रहा है? हरिदास उद्धव कह रहे हैं। वे इन भावों को कृष्ण को सुना रहे हैं कि [सत्यभामा] क्यों नहीं आयीं। उसमें से अभी थोड़ा-सा बतलाया। चलो…

[34:46-46:07 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

[46:08- 50:11 तक श्रील गुरुदेव भक्तों से कथा सम्बन्‍धित कुछ प्रश्न पूछते हैं…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: At the time of my śikṣā-guru, Śrīla Bhaktivedānta Svāmī Mahārāja, he used to have a karatāla of his own, and all the other devotees also [had] their own karatālas. But I never see (50:33 inaudible). I request that you should have your own karatāla, and you should sing with karatāla, and (50:48 inaudible). But I request all of you to have your own karatālas, whether ladies devotee or [gents.] And I want that all [of you should] go for nagara-saṅkīrtana here and there and distribution.

What I am telling you are very great meanings of śāstra and bhakti—vraja-bhakti. You should not try to keep [these] only in your heart. By speaking, you should give [them to] others also, and then you will overcome all lust, anger, and other bad qualities. Otherwise they will not go. So keep karatālas, always engage yourself in better services of Kṛṣṇa—nagara-saṅkīrtana and (51:50 inaudible) and read all my books and distribute my books.

[मेरे शिक्षा-गुरु, श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज के समय की बात है—उनके पास अपनी करताल हुआ करती थी, और अन्य सभी भक्तों के पास भी अपनी-अपनी करतालें होती थीं। किन्‍तु अब मैं ऐसा नहीं देखता। मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि आप सबके पास अपनी-अपनी करताल होनी चाहिये, और आप करताल के साथ कीर्तन करें। फिर से मैं आप सभी से प्रार्थना करता हूँ कि चाहे महिला भक्त हों या पुरुष भक्त—सभी के पास अपनी करताल अवश्य हो। और मैं चाहता हूँ कि आप सब यहाँ-वहाँ नगर-संकीर्तन और ग्रन्‍थ वितरण में जायें।

जो बातें मैं आपसे कह रहा हूँ, वे शास्त्र और भक्ति—विशेषकर ब्रज-भक्ति—के अत्यन्त गूढ़ और महान अर्थ हैं। आप इन्हें केवल अपने हृदय में ही सञ्चित न रखें। इन्हें बोलकर, प्रचार करके, दूसरों तक भी पहुँचाइये। तभी आप काम, क्रोध और अन्य दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर सकेंगे; अन्यथा ये दोष नहीं जाते। इसलिये करताल रखिये, अपने को सदैव कृष्ण की सेवा में नियुक्त कीजिये—नगर-संकीर्तन कीजिये—और मेरी सभी पुस्तकों का अध्ययन कीजिये तथा मेरी पुस्तकों का वितरण कीजिये।]

गौर-प्रेमानन्दे।

Today is what? From 3rd October we will begin our Mathurā-parikramā—where Kṛṣṇa met with Kubjā, where He killed Kaṁsa where Varaha deva was, and where He defeated Cāṇūra and Muṣṭika, and where He took rest after killing Kaṁsa—Viśrāma-ghāṭa and other [places], Dirgha-Vishnu, His birth place, all these (52:50 inaudible). So try to attend that nagara-saṅkīrtana and know all these things. (53:09 inaudible)

[आज कौन-सा दिन है? 3 अक्टूबर से हम मथुरा-परिक्रमा प्रारम्भ करेंगे—वहाँ जहाँ कृष्ण ने कुब्जा से भेंट की, जहाँ कंस का वध किया, जहाँ पर वराह देव थे, जहाँ [कृष्ण ने] चाणूर और मुष्टिक को पराजित किया, और जहाँ कंस-वध के बाद विश्राम किया—विश्राम-घाट तथा अन्य स्थान, दीर्घविष्णु, जन्मभूमि—इन सभी [स्थानों का दर्शन करेंगे।] इसलिये उस नगर-संकीर्तन में सम्मिलित होने का प्रयास कीजिये और इन सभी लीलाओं को भलीभाँति जानिये।]

-------------------------------------------------------------

समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
देवक्यरे पुण्यहीने रे रे रुक्मिणि दुर्भगे।
सत्यभामेऽवरे हन्त जाम्बवत्यादयोऽवरा:॥
पश्यतेदमितोऽर्वाक् स्वमभिमानं विमुञ्‍चत।
आभीरीणां हि दास्याय तपस्यां कुरुतोत्तमाम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.74-75)

अरी पुण्यहीन देवकी! अरी दुर्भागी रुक्मिणि! अरी नीच सत्यभामा! अरी हीन जाम्बवती इत्यादि रमणियों! हाय! क्या तुमलोग श्रीकृष्ण की इन चेष्टाओं को नहीं देख रही हो? अब अपने-अपने अभिमान को त्यागकर गोपियों की दासी बनने के लिए कठोर तपस्या करो। (GVP)

We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.