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Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.74-75: Svakiya, Parakiya Mood & Three Types of Rati

01:03:03
#278
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.74-75: Padma said- O Devaki! O unfortunate Rukmini! O mean Satyabhama! O inferior Jambavati etc. lovely ladies! Are you not seeing these efforts of Sri Krsna? Now leave your pride and do hard penance to become the maidservant of the Gopis.
  • Significance of doing Vraja-mandala parikrama
  • Why could Padma witness Krsna's exchanges with residents of Vraja, especially with the Gopis?
  • Does the pastime of marriage between Krsna & His queens occur in unmanifest Dvaraka? No marriage ceremony takes place there but there is abhimana from anadi-kala that Krsna is my husband
  • Difference between svakiya & parakiya
  • Gopis have 'upa-pati' mood from eternity. They are in love with Krsna eternally
  • Krsna is Visaya & Gopis are Asraya
  • The gradation of prema differs according to the type of rati
  • There are 360 types of gopis and they different types of rati
  • Srimati Radhika has topmost rati among all
  • Detailed explanation of different types of rati- sadharani, samanjasa & samartha
  • Sadharani rati – Attraction towards Krsna for His external form & qualities. There is desire for self-pleasure along with Krsna’s pleasure. It arises after meeting beloved Krsna. Kubja is an example of this. This is not dense and does not reach the higher stages of prema
  • Samanjasa rati - Superior to Sadharani but still not able to bind Krsna completely. The desire for sambhoga (self pleasure/union) is seen sometimes, it’s not ‘tadatmaya’ every time. There is desire for marriage
  • Samartha rati - Able to control Krsna, this love is causeless (ahaituki) that is why it never breaks & thus able to bind Krsna. There is ‘tadatmaya’ between their desire to satisfy Krsna & self pleasure. This is undivided & very dense
  • Glories of mamata (my-ness)
  • Gopis never married Krsna. Srimad Bhagavatam says ‘pati sutanvaya…’
  • According to the proportion of mamata, level of rati increases
  • Why did the damsels of Mathura call gopis as 'urukrama citta yanah' (S.B.10.44.15)?

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.74-75 : स्वकीया-भाव, परकीया-भाव तथा तीन प्रकार की रतियाँ

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 2 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: I think you have fulfilled my desire that every devotee should have their own karatāla with them. Have you? Any karatāla with you?

[मुझे लगता है कि आप लोगों ने मेरी यह इच्छा पूरी कर दी है कि प्रत्येक भक्त के पास अपनी करताल होनी चाहिये। क्या आपके पास है? क्या आपके पास करताल है?]

भक्त: No, I left it in Vṛndāvana.

[नहीं, मैं उसे वृन्दावन में ही छोड़ आया हूँ।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh! But in parikramā you will have to take it every day. From tomorrow our parikramā will start, and each devotee should have their own karatāla. And I will suddenly [check] that who has not brought it. I will tell [them] that you should go and bring it and then join the parikramā.

[ओह! किन्‍तु परिक्रमा में तो आपको उसे प्रतिदिन साथ रखना होगा। कल से हमारी परिक्रमा प्रारम्भ हो रही है, और प्रत्येक भक्त के पास अपनी करताल होनी चाहिये। मैं अचानक जाँच भी करूँगा कि कौन करताल नहीं लाया है। और जो नहीं लायेगा, उससे मैं कहूँगा—पहले जाकर करताल ले आओ, फिर परिक्रमा में सम्मिलित होना।]

So tomorrow morning, after class, our nagara-saṅkīrtana will be done, and each day [we will go for darśana]—like Raṅgeśvara Mahādeva tomorrow. After that Kubjā-kūpa—the well of Kubjā, and Akrūra-bhavana, Dhruva-ghāṭa, Nārada-ṭīlā, Dhruva-ṭīlā, Saptarṣi-ṭīlā—Marīci, Pulaha, Pr̥thu, Vaśiṣṭha, Aṅgirā—these are the Saptarṣis; and Bali Mahārāja-ṭīlā, Ambarīṣa-ṭīlā, Janmabhūmi, Śveta-Varāha, Kṛṣṇa-Varāha, Dīrgha-Viṣṇu, Gataśrama-ṭīlā. Oh! Padmanābha—where Brahmā came from the nābhi of Viṣṇu and created the whole world.

[तो कल सुबह, कथा के पश्चात् हम नगर-संकीर्तन के लिए जायेंगे और प्रतिदिन हम दर्शन के लिए जायेंगे—जैसे कल रङ्गेश्वर-महादेव। उसके बाद कुब्जा-कूप (कुब्जा का कुआँ), अक्रूर-भवन, ध्रुव-घाट, नारद-टीला, ध्रुव-टीला, सप्तर्षि-टीला—मारीचि, पुलह, पृथु, वशिष्ठ, अङ्गिरा—ये सप्तर्षि हैं; फिर बलि महाराज-टीला, अम्बरीष-टीला, जन्मभूमि, श्वेत-वराह, कृष्ण-वराह, दीर्घ-विष्णु, गताश्रम-टीला। ओह! पद्मनाभ—जहाँ विष्णु की नाभि से ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की।]

So all these very important places we will try to finish within five–six days. Those who are young, they must come and try to take darśana—take darśana of [all these places.] This is bhakti. And after that we will go to Vṛndāvana after Pūrṇimā, on Pratipadā-day, and [stay] there for about seven–eight days. Again [we will go] to Govardhana; from Govardhana to Barsānā—all the places—and then again [return] to Vṛndāvana for the last 7–8 days. So you should make a diary of all the places of darśana, and you should try to note down our harikathā. Try to take it into your heart also.

[तो इन सभी अत्यन्‍त महत्वपूर्ण स्थानों के दर्शन हम पाँच–छह दिनों के भीतर पूरे करने का प्रयास करेंगे। जो लोग युवा हैं, उन्हें अवश्य आना चाहिये और इन सभी स्थानों के दर्शन करने का प्रयास करना चाहिये। यही भक्ति है। इसके बाद पूर्णिमा के बाद, प्रतिपदा के दिन हम वृन्दावन जायेंगे और वहाँ लगभग सात–आठ दिन ठहरेंगे। फिर पुनः गोवर्धन जायेंगे; गोवर्धन से बरसाना—इन सभी स्थानों के दर्शन करेंगे—और अन्‍त में फिर से अन्‍तिम सात–आठ दिनों के लिए वृन्दावन लौट आयेंगे। इसलिये आपको सभी दर्शनीय-स्थलों की एक डायरी बनानी चाहिये और हमारी हरिकथा को भी लिखने का प्रयास करना चाहिये। उसे अपने हृदय में भी धारण करने का प्रयास कीजिये।]

Don’t think that it will be sukṛti. For sukṛti I am not doing [parikramā.] Perhaps you have done sukṛti in so many past years. I want that you should begin bhakti. Parikramā is a part of bhakti—not for sukṛti. It may be sukṛti for some, but not for all.

[यह मत सोचो कि यह सुकृति होगी। सुकृति के लिए मैं परिक्रमा नहीं करवा रहा हूँ। सम्भव है कि आप लोगों ने पिछले अनेक वर्षों में बहुत-सी सुकृति एकत्रित कर ली है। मैं चाहता हूँ कि अब आप भक्ति प्रारम्भ करो। परिक्रमा भक्ति का एक अङ्ग है—सुकृति के लिए नहीं। किसी-किसी के लिए यह सुकृति हो सकती है, पर सबके लिए नहीं।]

सब लोगों के लिए यह सुकृति नहीं है; यह भक्ति का अनुशीलन है। ‘पादसेवनम्’ नवधा-भक्ति में से एक [अङ्ग] है। इसलिये इसको सुकृति मत समझना। इसको भक्ति का अङ्ग समझ करके, जब तक [सम्भव] हो सके, इसका पालन करना चाहिये। मथुरा के भक्त लोग—स्थानीय (local) भक्त—भी यदि इसमें आना चाहते हैं, तो वे लोग आ सकते हैं; उनका भी सत्कार है (welcome to them) पहले वे अपना नाम लिखवा देंगे और माधव महाराजजी उन सब लोगों से बातचीत कर लेंगे और [फिर वे] जायें। जितनी अधिक से अधिक संख्या में लोग जा सकें, उतना अच्छा है।

कल बतलाया कि कृष्ण ने पूछा— “सत्राजित की बेटी (कन्या) सत्यभामा कहाँ है? यहाँ नहीं है? और सबको तो [यहाँ] देख रहे हैं।

[उद्धवजी ने] कहा— “ओह! वह नहीं है।”

[कृष्ण ने पूछा—] “क्यों नहीं है?”

[उद्धवजी ने कहा—] “इसलिये कि जब आप रैवतक पर्वत पर नव-वृन्दावन में लीला कर रहे थे, ब्रज के भाव में [पूर्णतः] आविष्ट थे और गोपियों का आलिङ्गन और चुम्बन जिस ब्रजभाव से कर रहे थे—बाँसुरी और मोर-मुकुट धारण करके नन्दनन्दन की भावना से—उस समय देवकी मैया तथा सत्यभामा और रुक्मिणी आदि दूसरी-दूसरी [महिषियों] के सहित [कंस की माता] पद्मावती भी वहीं पर [उपस्थित]थी। वह बोल उठी। उसने कृष्ण का वह भाव देखा, जो आज तक उसने न देखा था और न ही सुना था। उसने [वहाँ पर यह] देखा कि— ‘कहाँ वसुदेव-देवकी का वात्सल्य और कहाँ नन्द-यशोदा का वात्सल्य! एक है पर्वत—प्रान्‍तदेश का नीचा भाग और एक है प्रान्‍त का अत्यन्त उन्नत भाग! दोनों में बहुत अन्तर है।’ और क्या देखा? [उसने यह भी देखा कि] कृष्ण जिस प्रकार से गोपियों को प्रेम कर रहे हैं—उनके चरण स्पर्श करते हैं, चुम्बन-आलिङ्गन करते हैं—यह सत्यभामा और रुक्मिणी के साथ सम्भव नहीं है।’ इसलिये [पद्मावती] देवकी [तथा महिषियों] से कहने लगी— ‘अरे पुण्यहीन देवकी! अरी दुर्भागी रुक्मिणी! ओ नीच सत्यभामे! ओ हीन जाम्‍बवती और दूसरी रमणियों! अरे, [क्या तुम] कृष्ण की भावनाओं को नहीं देख रही हो? किस प्रकार वे गोपियों को, ब्रजवासियों को, नन्द-यशोदा को बड़ा प्रेम [कर रहे हैं!] उनके साथ प्रेमपूर्वक ब्रज के भाव [से व्यवहार] कर रहे हैं! तुम्हारे साथ तो जीवन में ऐसा हमने कभी नहीं देखा।’”

इसमें एक और बात [समझने की] है— ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी’ — जिसकी भावना जैसी होती है, वह वस्तु को उसी रूप में देखता है। पद्मावती ने देखा, रुक्मिणी ने देखा और [यदि] यशोदा मैया और ब्रज की रमणियाँ देखतीं, तो उनका सब भाव निराला है; [सबका दर्शन] एक समान नहीं होगा। जिसकी भक्ति जितने उन्नत स्तर पर है, कृष्ण को देखकर वैसा ही उन्नत स्तर का भाव उसमें आयेगा। पद्मावती में ये सबकुछ भाव नहीं थे, वह तटस्थ रूप में देख रही थी, अनुकूल रूप में नहीं देख रही थी। उसने देखा— ‘अरे! यशोदा और नन्दबाबा के प्रति कृष्ण जितने समर्पित आत्मा हैं, [जितने] उनके प्रेम के वशीभूत हैं, [उतने] देवकी और वसुदेव के वशीभूत नहीं हैं। और जैसे गोपियों के वशीभूत हैं, वैसे इन पटरानियों के वशीभूत नहीं हैं।’ [पद्मावती ने] बस तटस्थ भाव से उनका यह ऐश्वर्य-अंश देखा; उसमें रमकर नहीं देखा। रुक्मिणी ने कुछ जम करके देखा, सत्यभामा ने भी कुछ जम करके देखा; किन्तु यदि [वहाँ] ब्रज की गोपियाँ होतीं, तो क्या होता? न जाने कैसा निराला भाव [प्रकट] होता! कृष्ण ऐसी लीला (play) कर सकते थे कि नहीं? ये भी सम्भव है।

तो इस प्रकार से [पद्मावती कहने लगी—] “अब अपने-अपने इस अभिमान का पारित्याग करो कि कृष्ण हमको अधिक आदर करते हैं, [अधिक] स्नेह करते हैं, [अधिक] प्रेम करते हैं—इन सबको छोड़ दो।”

यहाँ पर एक विशेष बात है। कान्ताएँ दो प्रकार की होती हैं—स्वकीया और परकीया। रुक्मिणी, सत्यभामा [आदि] 16,108 महिषियाँ कृष्ण की स्वकीया-कान्ताएँ हैं। वे वैवाहिक हैं, विवाह की मर्यादा को रखनेवालीं, पतिव्रता धर्म-परायणा और कृष्ण के प्रत्येक आदेश का पालन करनेवाली हैं। इसलिये उनको स्वकीया कहा [जाता है। वे] वैदिक विवाह की रीति से कृष्ण से बँधी हुई हैं; इसलिये उन्‍हें स्वकीया-कान्‍ताएँ कहा गया है। और ब्रज की राधा, ललिता, विशाखा,चन्‍द्रा, पद्मावती इत्यादि—ये ब्रज की देवियाँ परकीया-कान्‍ताएँ कहलाती हैं। ये विवाह-बन्धन से बँधी हुई नहीं हैं, विवाहित नहीं हैं। जो पति के आदेश में तत्पर रहती हैं, जिनका पतिव्रता-धर्म अविचल होता है, वे स्वकीया [कहलाती] हैं।

रुक्मिणी प्रभृति महिषियों का प्रकटलीला में विवाह हुआ, यह तो ठीक है—अब इसको ध्यान से सुन लो। प्रकटलीला में उनका विवाह हुआ और वे अपने को [कृष्ण की] पत्नी समझती हैं कि— “मैं इनकी पत्नी हूँ।” कुण्डिन नगर से कृष्ण रुक्मिणी का हरण करके ले आये और द्वारका में उनके साथ विवाह किया। इसलिये [उन्‍होंने] सम्पूर्ण जीवन अपने को पत्नी और कृष्ण को पति माना। किन्तु अप्रकट लीला में, जहाँ द्वारका है, वहाँ की क्या स्थिति है? वहाँ पर कोई विवाह है कि नहीं है—यह देखना है। वहाँ पर विवाह नहीं है; वहाँ [विवाह का] अभिमानमात्र है। इसे बहुत सावधानी से समझना। वहाँ विवाह नहीं है, क्योंकि वह नित्यलीला है, तो विवाह कब हुआ?

इसलिये “हम उनकी नित्य पत्नियाँ हैं, उनके साथ हमारा विवाह हुआ है। उसी सम्बन्ध से हम पत्नियाँ हैं और वे पति हैं।” — [वहाँ] नित्यकाल उनका यह अभिमान रहता है। इसलिये विवाह कब हुआ— ये नहीं है। विवाह नहीं [हुआ, विवाह का] भाव होता है। तथापि अनादिकाल से उनका ऐसा भाव आ रहा है कि कृष्ण हमारे विवाहित पति हैं और हम उनकी विवाहित पत्नियाँ हैं। केवल भू-लीला में भू-धाम में [अर्थात्] पृथ्वी-धाम में जो लीला होती है, उसमें उनका विवाह होता है—वह भी तब, जब रुक्मिणी की उम्र 18-19-20 वर्ष की हो गयी और कृष्ण की [उम्र लगभग] 24-25 वर्ष की हो गयी।

भक्त: [रुक्मिणी] जब ब्राह्मण [के माध्यम से] पत्र भेजती हैं, [और वे कृष्ण] को पढ़कर [सुनाते] हैं, ऐसी कोई लीला नहीं है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कहाँ?

भक्त: अप्रकट लीला में…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वहाँ अप्राकृत द्वारका में नहीं है।

भक्त: वहाँ ब्राह्मण को नहीं भेजते हैं।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, वहाँ पर विवाह नहीं हुआ न। कब हुआ? वे अनादिकाल से वहाँ पर है न? वहाँ पर काल का कोई प्रभाव नहीं है। इसलिये वहाँ [विवाह] नहीं है। और इस प्रकट द्वारका में है।

भक्त: प्रकट द्वारका में जैसे भागवत में विचार दिया है, जैसा लिखा हुआ है…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वह वैसा ही होता है।

भक्त: वैसा वहाँ पर अप्रकट में नहीं है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अप्रकट में वहाँ कब हुआ? अनादिकाल से वह [लीला] है और [द्वारका की महिषियों में] पति का अभिमान है। ब्रजगोपियों का भी विवाह नहीं है, वहाँ पर भी नहीं है।

भक्त: अनादिकाल की वह भी तो लीला होगी—विवाहवाली?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [वहाँ पर] वैसे ही वैसे ही है। पति हमारे हैं— यह अभिमान चल रहा है। हमारा विवाह हुआ ऐसा [उनका अभिमान रहता है]। हमारा विवाह अभी-अभी पाँच वर्ष पहले हुआ, बस ये अभिमान रहता है।

श्रीपाद माधव महाराज: आपने बताया जैसे मैया यशोदा का अभिमान रहता है कि अभी (अस्पष्ट 14:47) बच्चा हुआ है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, वहाँ पर जन्म नहीं है। केवल यह [अभिमान] है कि हमारा बेटा हुआ था बस। तो कृष्ण भी उनके लिए ऐसा ही समझते हैं कि हमारी विवाहित पत्नियाँ हैं और इनके साथ में हमने विवाह किया था, किन्‍तु विवाह नहीं। अब चलो।

जो अनुराग से विवाह की प्रतीक्षा नहीं करतीं—विवाह हो या न हो, इससे [उन्‍हें] कोई मतलब नहीं—वे अनुराग के वशीभूत [होकर] इस लोक और परलोक की अपेक्षा न रखकर, मर्यादा, कुल की रीति, आर्यधर्म—सबको जलाञ्‍जलि देकर—कृष्ण के चरणों में प्रेमपूर्वक आत्मसमर्पण कर देती हैं, [वे परकीया-कान्‍ताएँ कहलाती हैं।] और कृष्ण भी कोई विवाह की विधि की अपेक्षा न करके अनुराग से ही उनको कान्‍ता रूप में ग्रहण करते हैं— “ये मेरी कान्‍ताएँ हैं, मेरी प्रियाएँ हैं।” कब से हैं? विवाह की अपेक्षा नहीं है, बचपन से ही—अनुराग लग गया, अनुराग लग गया।

तो बचपन से ही जिनका [कृष्ण में] अनुराग है और वे उसके लिए धर्म का उल्लंघन कर रही हैं; पिता-माता और गुरुजनों की बातों पर भी ध्यान नहीं देतीं, उस कुल [की मर्यादा] को तोड़ करके पार कर देती हैं, ऐसी जो किशोरियाँ होती हैं, वे कृष्ण की परकीया-कान्‍ताएँ हैं—परकीया। [किन्‍तु] याद रखो [वास्तव में] परकीया नहीं हैं। हैं क्या? शुद्ध स्वकीया हैं। [गोपियाँ] रुक्मिणी-सत्यभामा से करोड़ों गुणा [अधिक] स्वकीया हैं, क्योंकि वे कृष्ण जैसी ही हैं। वे कृष्ण की क्या हैं? कला हैं।

श्रीपाद माधव महाराज: आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि [#1]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रुक्मिणी और सत्यभामा के लिए [कृष्ण की] कला नहीं कहा गया; बल्कि उनके लिए कहा गया है कि वे राधाजी का वैभव-प्रकाश-विग्रह हैं। इसलिये श्रीमती राधिका प्रभृति ब्रजसुन्दरीगण कृष्ण की परकीया-कान्‍ताएँ हैं। अतएव कृष्ण के साथ ब्रजदेवियों का जो सम्बन्ध है, वह किसी वैध-अवैध सम्बन्ध के अधीन नहीं है। [वह] वैध है कि अवैध है—यह नहीं; अनुराग ही उसका कारण है। “पहलेहि राग नयनभङ्गे भेल” पहले [से ही प्रेम है।] जब से हुआ, तभी से प्रेम है। कबसे प्रेम हुआ? जब-जब दोनों की नज़रें चार हुईं, तभी से। इसमें कोई दूती नहीं रही। कौन दूती रही? बस वही दूती रही। इसलिये इनका भाव कृष्ण के साथ में क्या है? ओह! [वह पूर्णतः] अनुरागमय है।

लो इतना थोड़ा-सा कह लो। बोलो, आप कर सकेंगे? Have you noted? अच्छा, ठीक है बोलो! बहुत गम्भीर भाव है।

भक्त: महाराजजी ये लिखा है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कौन?

भक्त: मोहन

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मोहन का बाप नहीं बोल सकेगा। मोहन का दस जन्म का बाप भी नहीं बोलेगा। मैं जानता हूँ,नहीं कर सकता।

[18:28-26:57 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मधुर-रस में कृष्ण कान्तरूप में स्फूर्ति प्राप्त होते हैं—“ये हमारे कान्त हैं, प्रिय हैं।” वे प्रेम के विषय-आलम्बन हैं। कृष्ण गोपियों की रति के विषय हैं, [इसलिये वे] विषय आलम्बन हैं और श्रीमती राधिका, चन्‍द्रावली, ललिता, विशाखा, पद्मा इत्यादि गोपियाँ आश्रय-आलम्‍बन हैं। गोपियों में कुछ रति के तारतम्‍य से प्रीति का तारतम्‍य होता है। क्या चीज?

What do you mean by [this—] According to the gradation of rati, the gradation of the love and affection of the gopis increases.

[भक्त के द्वारा न बता पाने पर श्रील गुरुदेव कहते हैं…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You cannot tell, I know. You should first hear and then practice and then…

रति के तारतम्‍य से, जैसे [शान्‍त,] दास्य, सख्य, वात्सल्‍य और मधुर—ये पाँच प्रकार की रतियाँ हैं। पहला क्या?

भक्त: शान्त

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्‍य और मधुर—ये [पाँच प्रकार की रतियाँ] हैं। इस रति के अनुसार में गोपियों की रति का तारतम्‍य है। यशोदाजी से भी, नन्दबाबा से भी गोपियों का तारतम्‍य अधिक है। गोपियाँ कितने प्रकार की हैं? 360 प्रकार की गोपियाँ हैं—एक-दो नहीं। इसलिये कनिष्ठा, मध्यमा और उत्तमा—ये सब ले करके मधुर-रति का 360 प्रकार का तारतम्‍य दिखलाया गया है और उसमें श्रीमती राधिकाजी का तारतम्‍य सर्वाधिक दिखलाया है।

इसके अतिरिक्त साधारणी, समञ्‍जसा और समर्था— ये तीन प्रकार की रतियाँ होती हैं और इन-इन रतियों में रहनेवाली [नायिकाओं को क्रमशः] साधारणी-नायिका, समञ्‍जसा-नायिका और समर्था-नायिका कहते हैं। साधारणी [नायिका] किसको कहते हैं? वेश्या का जो प्रेम किसी पर-पुरुष पर अर्थ के लिए होता है—उसके गुणों से, सौन्दर्य से आकृष्ट हो करके नहीं—उसको साधारणी कहते हैं, किन्तु [वास्तव में] साधारणी नहीं है। साधारणी कब होगी? जब उनकी निष्ठा [केवल] कृष्ण में ही हो और कृष्ण के अतिरिक्त किसी भी पर-पुरुष में निष्ठा न हो—तब वह साधारणी में आयेगी। इसलिये वेश्याओं का प्रेम ही साधारणी नहीं है। कब होगा? जब कोई स्त्री [ऐसी] हो कि उसका पति इत्यादि हुआ ही नहीं और उसका किसी पर-पुरुष में प्रेम भी नहीं, किन्तु [साधारणी-नायिका के] उस प्रेम में कुछ गड़बड़ी यह है कि उस प्रेम के विषय, रति के विषय [अर्थात् कृष्ण] के सुख के साथ-साथ में अपना भी सुख [सम्मिलित] होता है। और वह [रति] कब उत्पन्न होती है? जब उद्दीपन [होता है, जब] अपने उस कान्त (कृष्ण) को देखती है, तो उसके अन्दर में वह रति आती है कि—उनका सुख भी हो और हमारा सुख भी हो। और जब उनकी भूख मिट जाती है, तो बस शान्‍त [हो जाती है।] इसलिये इसको साधारणी कहा।

साधारणी कहने का वही तात्पर्य है कि एक पुरुष में ही—[और] वह भी [केवल] कृष्ण में [निष्ठा हो,] तब तो वह साधारणी में आयेगी। [यदि] कृष्ण के अतिरिक्त कोई [और] पर-पुरुष हो गया, तो वह वेश्या हो गयी। और कृष्ण में [निष्ठा है,] कृष्ण का भी सुख चाहना और अपना भी सुख चाहना। कृष्ण दर्शन के द्वारा यह उत्पन्न होती है और फिर कृष्ण को नहीं देखेगी तो [उनकी] याद ही नहीं। और सम्भोग में ही, इच्छा [पूर्ण होने पर] ही बस समाप्त हो जाती है। यही रति कुब्जा में देखी जाती है। यह रति गाढ़ नहीं होती।

समञ्जसावाली [रति] गाढ़ होती है, किन्तु एक सीमा तक। और समर्था-रति [वह है जो] कृष्ण को भी वशीभूत कर देने में समर्थ है, इसलिये उसको समर्था-रति कहते हैं।

इसलिये [साधारणी-रति में नायिका] की सम्भोग की इच्छा कम होने पर यह रति भी अपने आप कम हो जायेगी। विशेषकर इस रति के मूल में कृष्णसङ्गम सुख के द्वारा अपनी प्रीति, इन्‍द्रियों की प्रीति है, जो भक्ति के विपरीत है। किन्तु [केवल] कृष्ण में निष्ठा होने से और किसी परपुरुष के न होने के कारण ही उसको साधारणी में रखा गया है।

चैतन्य महाप्रभुजी ने भी इसको दिखलाया है। कहाँ दिखलाया? वह है न, जिसका अनुवाद रूप गोस्वामी ने किया था?

भक्त: यः कौमारहरः [#2]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ‘यः कौमारहरः’ यह उसीका है, एक ही जैसा भाव। जो कौमार-हर थे, अब वही पति भी हुए हैं किन्तु वह आनन्द नहीं रहा। तो यह समान (similar) [भाव का] है किन्तु यह बढ़ करके कहाँ महाभाव और रूढ़ तक पहुँच जाता है। साधारणी कुब्जा का कहाँ तक आयेगा? वह केवल ‘प्रेम’ तक हो सकता है—बस ‘प्रेम’। स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग—[क्या कुब्जा का] कभी सुना जायेगा? नहीं सुना जाता। कुब्जा ने मान किया? इसलिये उसमें [अर्थात् साधारणी-रति में मान] नहीं होगा। [यदि] कुब्जा मान करेगी, तो कृष्ण क्या कहेंगे— “जा, भाग जा!”

पहले कहा गया है—देखो भाई! प्रीति के लिए ममता आवश्यक है। और ममता कैसे होगी? कोई सम्बन्ध से यह ममता होगी। सम्बन्ध जितना गाढ़ा होगा, ममत्व भी उतना अधिक गाढ़ा होगा। यह या तो विवाह से, पुत्र के नाते, सखा के नाते—ये सब सम्बन्ध से ममता [होगी।] इसलिये कहीं-कहीं पर यशोदा मैया से भी अधिक सखाओं की ममता है, किन्तु ममता होने पर भी ‘कृष्ण को भूख लगी होगी’ यह पालन-भाव नहीं है। कृष्ण का भर्त्सन, ताड़न—‘देखो! तुमको पीट देंगे’—यह नहीं कर सकते। जितना भी प्रेम हो, कन्धे पर चढ़ जायेंगे, खिलायेंगे-पिलायेंगे ये सब [करेंगे,] किन्तु ‘कृष्ण भूखे हैं’—ये सब भाव [नहीं होगा।] इसलिये भक्ति में पहले गुरु के प्रति ममता होनी चाहिये। ममता कैसे होगी? सम्बन्ध से। “इनके (गुरु के) अतिरिक्त जगत् में हमारा पालन-पोषण करनेवाला कोई नहीं है। ये हमारे अपने हैं” — और यह [भाव] नहीं होने से भक्ति नहीं होगी। जिनको [गुरु के प्रति] यह ममता नहीं आयी, वे लाख जन्मों में इसके लिए जो भी चेष्टा करें, [उन्हें भक्ति की प्राप्ति नहीं होगी।] जिसकी ममता जितनी प्रगाढ़ है, [उसकी] भक्ति [उतनी] प्रगाढ़ है। जिसकी ममता तरल है, [उसकी भक्ति भी अल्प ही होगी।] तरल है, माने क्या? बहुत अल्प है।

समञ्‍जसा-रति में पत्नीत्व का अभिमान पूर्णरूप से होता है। समञ्‍जसा-रति में पत्नी का भाव तो परिपूर्ण रूप से होता है—“मैं उनकी पत्नी हूँ।” इसमें सम्बन्ध है। इसलिये पत्नी-भाव में पत्नी का अभिमान प्रगाढ़ रूप से है। इसलिये ममता भी प्रगाढ़ है, किन्तु वह उतनी [प्रगाढ़] नहीं है जैसे ब्रज की गोपियों में होती है। क्यों? [क्योंकि] इनका सम्बन्ध विवाह से है। [यदि] विवाह नहीं होता, तो [क्या] रुक्मिणी इनकी सेवा करतीं या सत्यभामा और [अन्य महिषियाँ करतीं?] नहीं कर सकतीं। इसलिये इनका सम्बन्ध विवाह के ऊपर में है। विवाह 16-17-18 वर्ष के बाद [हुआ।] उसके पहले बचपन से कोई प्रेम है? नहीं। ये क्या लोक-मर्यादा का उल्लंघन कर सकती हैं? नहीं कर सकतीं। इसलिये यह बात ठीक है कि महिषियाँ नित्य-प्रेयसी हैं, प्रगाढ़ ममता भी है, किन्तु प्रगाढ़ माने अधिक से अधिक यह नहीं है। इसलिये रति…

रति कैसे उत्पन्न होती है? समर्था-रति में प्रेम उत्पन्न होने का कोई कारण नहीं होता—इस वस्तु को समझो। जिस प्रेम के उदय होने का, उत्पन्न होने का कोई कारण होगा, तो वह कारण दूर होनेपर रति भी दूर हो जायेगी। [किन्‍तु] जिसका कोई कारण ही नहीं है—अहेतुकी है—जिसकी भक्ति अहेतुकी है, उसके लिए सम्बन्ध हो या न हो, अनुराग ही एकमात्र कारण है। वह [रति] समर्थ है। ऐसा करने में वह समर्थ है। कृष्ण ऐसे प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं।

रुक्मिणी और सत्यभामा ने कृष्ण के गुण और लीलाएँ सुनीं, तब विवाह हुआ। किन्तु गोपियों के अनुराग का कोई हेतु नहीं है, परस्पर देख रही हैं। जो समञ्‍जसा-रतिवाली पटरानियाँ (महिषियाँ) हैं, उनमें कभी-कभी अलग से सम्भोग की इच्छा भी होती है, इसलिये [उनके] पुत्र इत्यादि भी हैं। ब्रजगोपियों को पृथक् रूप में [सम्भोग की इच्छा] नहीं है। उनकी भक्ति कृष्णप्रेम के लिए तदात्म्य होती है। क्या समझा? आया समझ में? तदात्म्य होती है—क्या? उनकी सम्भोग-इच्छा [और] कृष्ण को सुख देने की इच्छा—दोनों में तदात्म्य होता है। उनकी कोई भी इच्छा ऐसी नहीं होती, जो कृष्ण-सेवा के लिए न हो। सभी [इच्छाएँ कृष्ण-सेवा के लिए ही होती हैं।]

किन्तु रुक्मिणी और सत्यभामा की [कृष्ण-सेवा] कभी-कभी आत्मप्रीति, आत्मेन्‍द्रियप्रीतिवाञ्‍छा के लिए भी होती है। और उस समय वे लाख चेष्टाएँ करती हैं, किन्‍तु कृष्ण को वशीभूत नहीं कर पातीं। [उन्‍होंने] बहुत बार चेष्टा की—कब? जब ‘कुररि के विलाप [#3]’ [प्रसङ्ग] में वह दिखलाया। हजार चेष्टा करती हैं, तो भी कृष्ण वशीभूत नहीं होते। वशीभूत कब होंगे? जब गोपियों जैसा उनका भाव हो। उनका प्रेम और सम्भोग-इच्छा—दोनों कृष्ण के लिए ही हों—कृष्ण के लिए, अपने लिए नहीं। तब तो वे समर्था होंगी।

इधर [महिषियों] की अलग से कभी-कभी सम्भोग की इच्छा होती है। इनका अभी सब समय तदात्म्य-भाव नहीं हुआ। इसलिये [इनकी रति] समञ्‍जसा [कहलाती है।] समञ्‍जसा माने क्या? हो भी सकता है [और नहीं भी]—इसलिये। और [गोपियों का] समर्थ [अर्थात्] पक्का है। [इसके विपरीत] गोपियों की अलग रूप से कभी भी [अपने] सुख की कोई वाञ्‍छा नहीं होती। महिषियों को कृष्णसङ्ग के लिए विवाह-विधि की अपेक्षा होती है। ब्रजगोपियों को कोई भी अपेक्षा नहीं है—[उनके प्रेम का] कोई कारण ही नहीं है। गोपियों की समर्था-रति, साधारणी और समञ्‍जसा से कुछ अनिर्वचनीय उन्नत होती है, जिसको वचन के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।

भक्त: गोपियाँ विवाहित तो हैं?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जो [लोग] ऐसा कहते हैं, वे प्रीति नहीं जानते कि [प्रीति] किसको कहते हैं। वे प्रीति जानते ही नहीं हैं। [वे यह भी नहीं जानते] कि ब्रजप्रेम किसको कहते हैं। वे लोग ही ऐसा कह सकते हैं।

किसी भी गोपी का विवाह नहीं हुआ—किसी भी ब्रजगोपी का। [यदि] कोई उदाहरण है तो बतलाओ? [अपने] मन का सन्देह दूर कर लो। “कृष्ण हमारे पति हों”—यह तो भावना थी कि कृष्ण ही हमारे पति हों; किन्तु [क्या] उनके साथ में विवाह हुआ? यह विचारणीय है। और पति हों तो, कैसे? वहाँ पर पति का अर्थ— ‘प्रियकान्‍त-वल्लभ’ हों—ऐसी भावना है।

भक्त: सामाजिक दृष्टि से उनका विवाह हुआ था।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं हुआ था। कोई भी ऐसी गोपी नहीं है, जिसका सामाजिक दृष्टि से कृष्ण के साथ में विवाह हुआ।

भक्त: घर के कामकाज को छोड़कर जाती थीं, जब उनसे मिलने के लिए?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सब समय याद रखना। श्रीमद्भागवत में क्या कहते हैं? ‘पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलंघ्य तेऽन्त्यच्युतागताः’ [#4]— [गोपियों ने] पति, भाई, बन्धु पुत्र—सबको छोड़ दिया। उनका (कृष्ण का) गोपियों के साथ कोई विवाह ही नहीं हुआ—कभी भी [नहीं। गोपियों का] विवाह और दूसरों से हुआ—उनका विवाह दूसरों से था। राधिका का विवाह किससे [हुआ?] अभिमन्यु से। ललिता का [विवाह भी] किसी दूसरे [गोप] से हुआ। चन्द्रावली का विवाह भी दूसरे से [हुआ।] कौन गोप था? — गोवर्धनमल्ल गोप।

भक्त: तो [विवाह] तो हुआ है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: विवाह हुआ माने कृष्ण के साथ नहीं [हुआ।]

भक्त: कृष्ण से नहीं हुआ…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उनके साथ में।

भक्त: वहीं हम समझा रहे थे

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अच्छा, यह भी इसमें बारीकी से समझो। जो विवाह हुआ, वह किसके साथ में हुआ। योगमाया ने गोपियों की छाया के साथ में उनका [दूसरे गोपों से] विवाह कराया—असल गोपियों के साथ में विवाह [नहीं हुआ।]

‘अनिर्वचनीय वैशिष्ट्य’ माने क्या? वह वैशिष्ट्य जो मुख से नहीं कहा जा सकता। यह रति उस प्रेम से तदात्म्य लाभ करती है। कृष्ण के सुख में अपने सुख को मिला लेना—‘तोमार इच्छाय मोर इच्छाय मिशाइनु।’ [अर्थात् कृष्ण की इच्छा में ही अपनी इच्छा को मिला देना।] समञ्‍जसा के लिए यह सब सम्भव नहीं है। इसलिये इसको समर्था कहते हैं—ये समर्थ है। यह ऐसी रति होती है, जो बचपन से ही स्वाभाविक रूप से अपने विक्रम तथा प्रभाव से कुल, धर्म, धैर्य, लज्जा, सम्‍पद—सबको भुला देती है, विस्मरण करा देती है। पति के प्रति कोई धर्म है— यह सब भूल जाती हैं। और यह रति स्वभावत: अत्यन्त गाढ़ होने के कारण किसी भी दूसरे भाव से भेदित नहीं होती। माने क्या? कृष्ण के प्रति गोपियों का वात्सल्य हो जायेगा—ये नहीं। सखत्व भाव आयेगा—ये नहीं। दूसरा कुछ जैसे—साधारणी कुब्जा का जैसा भाव है, समञ्‍जसा का जैसा भाव है—ये नहीं आयेगा। इसलिये निरपेक्ष भाव से केवल ब्रजसुन्दरियों में ही यह परकीय-भाव देखा जाता है और दूसरे में नहीं।

जैसे (44:41 ओला??) गन्ने का रस, उससे गुड़, गुड़ से मिश्री, मिश्री से ताल-मिश्री, (44:53 ओला??) इत्यादि हुआ करते हैं, ठीक उसी प्रकार से गोपियों का रुक्मिणी प्रभृति के अनुराग से बहुत घनीभूत अनुराग है, जो वचनों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।

देखो! श्रीमद्भागवत में क्या कहते हैं? मथुरा की नागरियाँ कृष्ण को देखकर भाव से विमोहित हो गयीं और कंस को गाली-गलौच करती हुई, अभिसम्पात देती हुई कह रही हैं— “व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:।” [#5] माने क्या? ‘व्रजस्त्रिय उरुक्रम चित्तयाना:’ — सब समय कृष्ण की भावना उनके मन में चढ़ी हुई हैं—किसके? गोपियों के। किसके लिए? सब समय दिन-रात कृष्ण का चिन्तन करती हैं। और केवल यही नहीं कि गोपियों का मन ही [उरुक्रम के लिए यान है]— ‘उरुक्रम चित्त यान’ — ये उरुक्रम का चित्त जो है, वह गोपियों के लिए यानमार्ग है—उसपर चलती हैं। माने कृष्ण उनकी चिन्ता करते हैं। जगत् [में कृष्ण का] चिन्तन करते हैं, भक्त कृष्ण [का चिन्‍तन] करते हैं, किन्तु कृष्ण भी किसीकी चिन्ता करते हैं। वे गोपियों की चिन्ता करते हैं। कृष्ण आज द्वारका में भी गोपियों की बात भूले नहीं हैं और जहाँ अधिक प्रेम में विवश हो गये, इन गोपियों की चिन्ता करते हुए विवश हो गये।

[46:33-60:07 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: From tomorrow, our Mathurā Parikramā will be started. I request that you should not take bath in ponds and rivers. Otherwise, quickly you will be overpowered by cold and cough. And also you should not be tired. Only [those] who are very young [and who] have never gone, they can do [Mathurā] Parikramā. In Mathurā special-special places they may go. Otherwise those who are old, [have] no energy and have two kinds of looking glass they should not be. Otherwise they may be sick and they can spread all over whole Parikramā, [and] all the devotees will be infected.

[कल से हमारी मथुरा परिक्रमा आरम्भ होगी। मैं आप सभी से निवेदन करता हूँ कि आप कुण्डों और नदियों में स्नान न करें। अन्यथा आपको शीघ्र ही सर्दी-खाँसी हो सकती है। साथ हीआप अधिक थकें भी नहीं। केवल वे ही लोग, जो बहुत युवा हैं और जिन्होंने पहले कभी मथुरा-परिक्रमा नहीं की है, वे मथुरा-परिक्रमा कर सकते हैं। वे मथुरा के विशेष-विशेष स्थानों में जा सकते हैं। किन्तु जो लोग वृद्ध हैं, जिनमें शक्ति नहीं है और जिन्हें दो-दो प्रकार के चश्मे लगाने पड़ते हैं, वे मथुरा-परिक्रमा न करें। अन्यथा वे स्वयं बीमार पड़ सकते हैं और पूरी परिक्रमा में रोग फैला सकते हैं, जिससे सभी भक्त संक्रमित हो सकते हैं।]

One more thing—you should be careful. It may be that [some] Indian devotee, whether [they are] devotees or not, but in the disguise of devotee, they may come and they can ask— “Oh, I want this, I want this, I want that. [I want] one hundred [dollars]—only one hundred dollars, nothing or two hundred dollars. I want to buy this and that.”

You should tell, “I will ask my Gurudeva and if he allows then [I will do it.]

[एक बात और—आप लोगों को बहुत सावधान रहना चाहिये। हो सकता है कि कुछ भारतीय भक्त, चाहे वे वास्तव में भक्त हों या न हों, भक्त के वेश में आकर आपसे कहें— “ओह, मुझे यह चाहिये, मुझे वह चाहिये। बस सौ डॉलर—केवल सौ डॉलर, या दो सौ डॉलर। मुझे यह-वह खरीदना है।”

आपको उनसे कह देना चाहिये— “मैं अपने गुरुदेव से पूछूँगा, और यदि वे अनुमति देंगे, तभी मैं कुछ करूँगा।”]

श्रीपाद माधव महाराज: Foreign ingredients, any money, anything. [विदेशी वस्तुएँ, कोई भी पैसा, कोई भी वस्तु।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: So any ingredient or anything or so you should be careful. You should at once reply, “Please ask Gurudeva and if he allows, I will.”

[इसलिये किसी भी सामग्री के विषय में, या किसी भी वस्तु के बारे में, आपको सावधान रहना चाहिये। आपको तुरन्‍त यह उत्तर देना चाहिये— “कृपया गुरुदेव से पूछ लीजिये; यदि वे अनुमति देंगे, तो मैं करूँगा।”]

श्रीपाद माधव महाराज: If Gurudeva gives permission then, otherwise not. [यदि गुरुदेव अनुमति दें, तभी; अन्यथा नहीं।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: And try not to be sick. This is the first thing—Do not be sick. Don’t [get] cough and cold. Don't jump [into] Pāvana-Sarovara, Vimala-Sarovar and don't drink [the water.]

[और बीमार न पड़ने का प्रयास करो—यह सबसे पहली बात है: बीमार मत पड़ो। सर्दी-खाँसी न होने दो। पावन-सरोवर और विमल-सरोवर में कूदकर स्नान मत करो और [कुण्डों का] जल मत पियो।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि–
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।
गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥
-श्रीब्रह्मसंहिता (5.37)

आनन्द-चिन्मयरस के द्वारा प्रतिभाविता, अपने चिद्‍रूप के अनुरूपा, चिन्मयरस-स्वरूपा, चौंसठ कलाओं से युक्ता, ह्लादिनी-शक्ति-स्वरूपा श्रीमती राधिका और उनकी कायव्यूह-स्वरूपा सखियों के साथ, जो अखिलात्मभूत अपने गोलोक-धाम में निवास करते हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्द का मैं भजन करता हूँ। (GVP)

#2
यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा-
स्‍ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः।
सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ
रेवा-रोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (13.121)

एक नायिका अपनी एक सखी से कहती है— “जिसने कौमारावस्था में मेरे चित्त का हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्था में प्रथम मिलन के समय जो चैत्रमाह की ज्योत्सनामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाह का ज्योत्सनामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलन के समय की भाँति खिली हुई मालती पुष्पों की भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वन की ओर से प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ, फिर भी उसी रेवा नदी के किनारे निर्जन सुशीतल प्रदेश में बैंत के वृक्ष के नीचे प्रथम मिलन के समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहार के लिए मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है। (IGVP)

#3
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोध:।
वयमिव सखी कच्चिद् गाढनिर्विद्धचेता
नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.90.15)

महिषियों ने कहा—हे कुररी! अज्ञात-तत्त्व ईश्वर श्रीकृष्ण इस जगत् में अखण्ड-बोध छिपाकर रात्रिकाल में सोये हुए हैं। (पता नहीं, कहाँ सोये हैं) तुम्हें नींद नहीं आ रही क्या, जो तुम उनकी निद्रा भङ्ग करने के लिए विलाप कर रही हो, परन्तु वे शयन कर रहे हैं, अतः ऐसा करना उचित नहीं है। अथवा हे सखि! नलिन-नयन श्रीकृष्ण के मधुर हास्य एवं उदार तथा कौतुकमय लीला-चिन्तन से हमारे समान तुम्हारा चित्त भी अतिशयरूप से विद्ध हो गया है क्या? (GVP)

#4
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.16)

हे अच्युत! हम अपने पति, पुत्र, आत्मीय, स्वजन, भाई-बन्धुओं की आज्ञाओं एवं इच्छाओं का अतिक्रमण करके आपके पास आयी हैं। हे कितव (कपटी!) आप अच्छी तरह से जानते हैं कि हम आपकी वंशी के उच्च-गीत से मोहित-सी तथा विवेकशून्य-सी होकर यहा आयी हैं। हे अच्युत! यह सब जानकर भी आपके अतिरिक्त कौन ऐसा निष्ठुर एवं कपटी होगा, जो अर्धरात्रि में आयी नवयौवनाओं का इस प्रकार से परित्याग करेगा? (GVP)

#5
या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप
प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो
धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.44.15)

व्रजगोपियाँ गो-दोहन करते समय, मूसल से धान आदि कूटते समय, दधि-मन्थन और घर लीपते समय, दोलन (बालकों को झूला झुलाते समय), ओक्षण (उन्हें नहलाते-धुलाते समय), रोते हुए बालकों को चुप कराने तथा गृह-मार्जनादि के समय अनुरक्त चित्त होकर गद्गद कण्ठ से सर्वदा अपने चित्तरूपी सिंहासन पर श्रीकृष्ण को बिठलाकर श्रीकृष्णविषयक गीत गाया करती थीं। उस समय उनके नेत्रों से अश्रुओं की धारा प्रवाहित होती रहती थी। (GVP)

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