Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.77-81: Devaki's Reply to Padma & Supremacy of Nanda-Yasoda
43:32This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Brief explanation of glories of Krsna's names in the kirtana - 'hari nama tuva aneka svarupa'
- The mood to chant and do kirtana
- Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.77-81: Devaki devi's reply to Padma for her chastisement- “I had done penance in my previous birth with Sri Vasudevji to get Krsna as my son and as a result of that penance, the best of boons, Krsna has accepted to be our son. But Sri Nanda-Yasoda prayed to Sri Brahma only to get the supreme devotion of Sri Krsna.
- ‘Parama-bhakti’ means (vatsalya-mayi) bhakti in which by hearing and chanting, other living beings too can easily cross the worldly ocean in the future.
- Comparing Devaki & Vasudeva's austerity & the boon they asked from Krsna with that of Nanda & Yasoda's & the boon that they asked for
- The supremacy of service of Nanda & Yasoda over theirs
- After that Rukmini devi Spoke - The love of all the devotees towards the Lord will increase by listening to the words uttered by Sri Rukmini Devi.
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.77-81: देवकी का पद्मा को उत्तर-प्रदान एवं नन्द-यशोदा की सर्वश्रेष्ठता
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 3 अक्तूबर, 2003 को श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ‘नन्दतनय रसकूप’ – He is well of… an ocean of rasa. ‘Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa’—all these Vraja-names are full of the ocean of rasa. All the sweet pastimes of Kṛṣṇa are in these names—all! But we don’t realize. We should try to realize. When you are chanting ‘Kṛṣṇa’, ‘Hare’, and ‘Rāma’—oh! So many pastimes are coming from Śrīmad-Bhāgavatam. So you should not think that these are only words. These names will fulfill all desires.
[वह रस का कूप, समुद्र है। ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण’—ये सब व्रज-नाम रस-समुद्र से परिपूर्ण हैं। कृष्ण की समस्त मधुर लीलाएँ इन नामों में हैं—सब कुछ! किन्तु हम अनुभव नहीं कर पाते। हमें अनुभव करने का प्रयास करना चाहिये। जब आप ‘कृष्ण’, ‘हरे’ और ‘राम’ नाम का जप करते हैं—ओह! तो कितनी सारी लीलाएँ श्रीमद्भागवतम् से प्रकट होती हैं। इसलिए आपको ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि ये केवल शब्द हैं। ये नाम आपकी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कर देंगे।]
[भगवान् का नाम] सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर देगा। यह भगवान् का नाम ऐसा है कि ये यह रस का कूप है—‘रसेर कूप’। अनन्त सागर इस नाम के भीतर में है। और यह जो दूसरा कीर्तन किया–
श्रित-कमलाकुचमण्डल! धृतकुण्डल! ए!
कलितललितवनमाल! जय जय देव! हरे॥
-श्रीमङ्गलगीतम् (1)
[हे कमलाके अर्थात् सर्वलक्ष्मीमयी श्रीराधिकाके पयोधर-मण्डल का आश्रय लेनेवाले! हे मकराकृति कुण्डल धारण करनेवाले! एवं मनोहर वनमाला धारण करनेवाले! हे देव! हे हरे! तुम्हारी बारम्बार जय हो।] GVP
Very beautiful song! [Even] Jagannātha Deva [became] attracted [upon hearing this kīrtana].
जगन्नाथ भी [इस कीर्तन को सुनकर] उससे आकर्षित हो गये। जगन्नाथजी विचलित हो गये। घर में रह नहीं पाये। दौड़कर जंगल में गये। हमने कहा है ये सब, किन्तु देखो, यह बङ्गाली या उड़िया लड़की नहीं है। कहाँ ये अमेरिकन लड़की है और जो मृदङ्ग बजा रहा है, वह भी अमेरिका का है। और जो हारमोनियम (1:49 अस्पष्ट) [बजा रहा है,] वह भी अमेरिका का है किन्तु इतना सुन्दर बङ्गाली कर सकते हैं और उड़िया की नहीं, हमको (1:59 अस्पष्ट) इतना सुन्दर ये कीर्तन करते हैं! तो इस प्रकार से भावमय हो करके कीर्तन करो। तुम लोग सोच रहे हो...
You are thinking that we are giving $110 for this parikramā, but you should know—in one song, what you are hearing, the price of that kīrtana and my harikathā—you cannot pay [for it even] in your long, long (2:31 inaudible) life. So you should not think, “Oh! We are giving so much!” Nothing. It is not even like a [penny.] You should hear our harikathā and (2:56 inaudible) I have brought you all to give something, not to take. We will give a lot of things, [and] if you will keep them in this pocket—[meaning in your heart]—then your life will be successful.
[आप सोच रहे हैं– “हम इस परिक्रमा के लिए 110 डॉलर दे रहे हैं।” किन्तु आपको जानना चाहिए– एक ही गीत में, जो कीर्तन आप सुन रहे हैं, उस कीर्तन और मेरी हरिकथा का मूल्य आप अपने बहुत-बहुत लम्बे जीवन में भी नहीं चुका सकते। इसलिए ऐसा न सोचें – “अरे! हम तो बहुत कुछ दे रहे हैं!” यह कुछ भी नहीं – एक पैसे के बराबर भी नहीं। इसलिए हमारी हरिकथा को सुनें और लाभ उठायें। मैं आप सबको कुछ देने के लिए लाया हूँ, आपसे कुछ लेने के लिए नहीं। यदि आप इसे अपनी जेब में अर्थात् हृदय में सम्भालकर रख लेंगे, तो आपका जीवन सफल हो जायेगा।]
हमने कुछ लेने के लिए नहीं बुलाया, देने के लिए बुलाया है। (बङ्गाली भाषा में) जिन वस्तुओं को मैं हरिकथा में दे रहा हूँ, यदि कोई इनको हृदय में धारण करेगा, तो उसका जीवन, उसके कोटि-कोटि जन्म सफल हो जायेंगे। ऐसा सब है।
[3:29-11:05 तक कीर्तन एवं श्रील गुरुदेव के द्वारा मङ्गलाचरण...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (बङ्गाली भाषा में) जो बङ्गाल से आये हैं वे पाठ के पश्चात् तीर्थ महाराज के निकट कथा सुन लेंगे।
तीर्थ महाराज! कुछ संक्षेप में सुना देना। और अल्प-अल्प हिन्दी तो आप लोग समझते ही हैं, बाकी जो रह जायेगा, उसे तीर्थ महाराज बता देंगे, मन में ऐसा मत सोचना की आप लोगों की उपेक्षा हो रही है।
जब पद्मावती ने देवकी, रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि को धिक्कार दिया, [तो बोलीं–] “अरी नीच सत्यभामे! दुर्बुद्धि देवकी! बुद्धिहीन रुक्मिणि! तुमको कोई ज्ञान और कोई भी अक्ल नहीं है! देखो तो, तुम्हारे सामने ही कृष्ण ने मैया यशोदा, नन्दबाबा और गोपियों के साथ में जो इतना सुन्दर उत्तम व्यवहार किया, तुम्हारे जीवन में कभी भी ऐसा नहीं किया। [कृष्ण] उनके चरणों में पड़ते हैं, मक्खन और रोटी के लिए रोते हैं, [गोपियाँ] इतने से मठ्ठे पर उनको नचा देती हैं और गोपियों के तो वे चरणों में पड़ते हैं, पैरों में गिरते हैं। देखो तो, तुम लोगों पर तनिक भी ऐसी कृपा नहीं है।”
यह सुन करके... देवकी माता बड़ी अभिज्ञ हैं, बुद्धिमान हैं, बड़ी गम्भीर हैं। क्यों? विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करनेवाले जो कृष्ण हैं, उनको अपने उदर में धारण करनेवाली वे देवकी हैं। ऐसे साधारण नहीं है। इसलिये परम-गम्भीर हैं। किसी के कहने से जल्दी बिगड़ नहीं जायेंगी। हम लोगों जैसे नहीं हैं कि क्रोधित हो जायेंगी। उन्होंने क्रोध नहीं किया। क्यों? अनन्त समुद्र के समान गम्भीर हैं।
देवकी माता ने [पद्मावती से] कहा– “अरी बुद्धिहीने!”
[पद्मावती] उनकी कौन लगती है? [पद्मावती कंस की माता होने के कारण उनकी भी माता] लगती है।
तो माता को कहती है– “अरी डोकरिया!” डोकरिया न क्या? और क्या?
भक्त: बुढ़िया
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बुढ़िया? बुढ़िया नहीं, डोकरिया ही ठीक है।
[देवकीजी ने पद्मावती से कहा–] “अरी डोकरिया! अरी बुढ़िया! तुम जो कह रही हो, इसमें आश्चर्य की बात क्या हुई? देखो! मैंने पूर्वजन्म में मेरे जो पति वसुदेवजी हैं, उनके सहित कृष्ण को पुत्ररूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। मैं और मेरे पति वसुदेवजी, हम दोनों ने [मिलकर तपस्या की।] उस समय मेरा नाम पृश्नि था और वसुदेवजी का नाम सुतपा था। हमने बहुत कठोर परिश्रम किया!”
कैसे? दस हजार वर्ष खाना-पीना छोड़ दिया। अंगूठे पर ऐसे भार रख करके पैर को ऊपर कर दिया। खाना-पीना सब [छोड़ दिया।] अरे! ध्रुवजी ने तो छह महीने [खाना-पीना] छोड़ा था और इन्होंने दस हजार वर्ष तक छोड़ दिया। इसलिये ये ध्रुव से कितने उन्नत है!
[देवकीजी ने कहा–] “तो जब प्रभु हमारी तपस्या से बड़े प्रसन्न हो करके प्रकट हुए और बोले– “वरं ब्रूहि! वरं ब्रूहि! वरं ब्रूहि!” तीन बार बोला– “वर माँगो, वर माँगो, वर माँगो। क्या चाहते हो?” तो मेरे पति ने मेरी ओर देखा अर्थात् उस समय सुतपा ने अपनी पत्नी की ओर देखा। तो मैंने कहा– “आप ही के समान कोई मुझे पुत्र उत्पन्न हो।” तो भगवान् ने कहा– “मेरे समान तो दूसरा कोई पृथ्वी में है नहीं। न कोई मेरे समान है, न मुझसे बढ़कर है। (15:35 अस्पष्ट) इसलिये मैं ही तुम्हारे पुत्र के रूप में [आऊँगा।] तुम्हारे वचन को [पूर्ण करूँगा।] तुमने बहुत कठोर तपस्या की है। किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की है।” तो इस प्रकार से प्रभु ने तीन बार जो कहा था कि “वर माँगो, वर माँगो, वर माँगो।” इसलिये प्रभु ने क्या किया? अपने वचन को सत्य करने के लिए वे तीन जन्म में हमारे पुत्र हो करके आये। पहले जन्म में पृश्निसुत या पृश्निगर्भ और दूसरे जन्म में [जब हम] कश्यप और अदिति हुए, तो वामन के रूप में आये और इस जन्म में [हम] वसुदेव और देवकी हैं और हमारे उदर से ये आये हैं।”
“तो हम लोगों ने जो तपस्या की थी, उसकी तुलना में नन्द और यशोदा की तपस्या और भी कठोर थी। उन्होंने भगवान् की तपस्या नहीं की। हम लोगों ने तो भगवान् की तपस्या की और उन दोनों ने भगवान् के भक्त ब्रह्माजी की आराधना की।”
कितने? साठ हजार वर्ष या कितने वर्ष तपस्या की । और उस समय उनका नाम क्या था?
भक्त: द्रोण...
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: द्रोण और धरा। [द्रोण] एक वसु का नाम है। कितने वसु हैं? द्वादश वसु?
भक्त: अष्टवसु
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आठ वसु। आठ वसुओं में प्रधान ये [द्रोण] वसु थे। किन्तु यह मत समझना कि [ये नन्दबाबा के मूल हैं।] द्रोण नन्दबाबा के एक अंश हैं। [द्रोण ने] नन्दबाबा के आनुगत्य में कृष्ण को पुत्र मानने के लिए चेष्टा की। इसलिये उनको अष्टवसु कहा जाता है और उन अष्टवसुओं में प्रधान उनका नाम द्रोण और उनकी पत्नी का नाम [धरा था।] वही द्रोण और धरा इस जन्म में नन्द और यशोदा हुए। उन्होंने क्या माँगा? पुत्र वर नहीं माँगा कि [भगवान् उनके] पुत्र हो। उन्होंने माँगा कि भगवान् के प्रति उनकी ऐसी परमाभक्ति हो जिसको सुन करके विश्व-ब्रह्माण्ड के लोग जन्म-जन्मान्तर तक कल्प-कल्पान्तर तक इस भवसिन्धु से पार करके भगवान् की परमाभक्ति को पायें।
अच्छा परमाभक्ति किसको कहते हैं? प्रेम-भक्ति को। अच्छा! इन दोनों ने जो परमाभक्ति माँगी, यह कौनसी भक्ति माँगी? क्या चाहते हैं? प्रेम माँगा न? तो कौनसा प्रेम? वात्सल्यप्रेम। [द्रोण-धरा ने ब्रह्माजी से माँगा कि] भगवान् के प्रति हमारा परम-उन्नत वात्सल्य प्रेम हो। पृश्नि-सुतपा ने भगवान् को पुत्र [रूप में] माँगा, वात्सल्य नहीं माँगा और इन लोगों ने क्या माँगा? वात्सल्यभाव और वह भी कैसा? परम-उन्नत!
[कृष्ण के माता-पिता] होने के नाते देवकी और वसुदेव का उनके प्रति कुछ वात्सल्य तो है, [किन्तु वह] ऐश्वर्यमय है, उनका [वात्सल्यभाव] कभी शिथिल हो जाता है, किन्तु यशोदा और नन्दबाबा का [वात्सल्यभाव कभी भी शिथिल नहीं होता, भले ही कृष्ण] हजार ऐश्वर्य प्रकट करें– मुख में विश्व-ब्रह्माण्ड दिखायें, गोवर्धन को धारण कर लें, कालिय के फन पर नृत्य करें, जो कुछ भी, जो इच्छा [करें। जब कृष्ण ने अपने मुख में] विश्व-ब्रह्माण्ड को दिखलाया, विश्वरूप भी दिखलाया, [तो मैया यशोदा ने] कहा– “ये लाला को का हो गयो? [क्या हो गया?] का भयो? [क्या हो गया?] लाला को का भयो? [लाला को क्या हो गया?]” बस इतना ही कह रही हैं– “भूत-पिशाच इत्यादि लग गयो कि क्या हो गयो?” इस प्रकार से [कहती हैं–] “भूत लग गयो? अथवा डायनी ने टोना कर दियो? डायनी ने टोना कर दियो?” इस प्रकार से कहेंगी। गोमूत्र और गोबर मिला करके [ब्राह्मणों से पूजा करवाती हैं]– “मङ्गलम् भवतु! कल्याणम् भवतु! आरोग्यम् भवतु! भवतु! भवतु!” और ब्राह्मण लोग कहेंगे– “मैया! अब दक्षिणा लाओ।” तो एक-एक ब्राह्मण को दस हजार गायें देंगी। सोने, हीरे, जेवरात– जो कुछ अपने घर से दे सकती हैं, [वह सब ब्राह्मणों को देंगी।]
[देवकीजी ने पद्मावती से कहा–] “इस प्रकार से नन्दबाबा और यशोदा हमसे लाखों गुना श्रेष्ठ हैं। तो ये क्या आश्चर्य की बात है? तुमने कहा कि कृष्ण ने उनके प्रति तुम लोगों से अधिक उन्नत भावना दिखलायी, तो ये तो बहुत ही अच्छा हुआ।”
[देवकीजी पद्मावती की बातों को सुन करके] बिगड़ी नहीं। देखो! ये गम्भीर हैं। ऐसे ही [तुम लोग भी] बिगड़ो मत। किसी ने अपमान कर दिया तो क्रोधित मत होओ। [इस प्रकार से] सामञ्जस्य कर दो– “आज हमारा सौभाग्य है कि आपने हमारा जो पाप था, उसमें से आधा बाँट दिया।” आया समझ में? क्या कहो? कोई अपमान करता है तो सोचो कि आज हमारा आधा पाप [ले लिया।] (20:37 अस्पष्ट) किन्तु उसके लिए (अपमान करनेवाले व्यक्ति के प्रति) दुःख हो। किसी के प्रति कभी ईर्ष्या ना हो। सबका जीवन सफल हो।
[श्रील गुरुदेव कुछ शिष्यों के कथा में न होने पर शासन करते हुए...]
बहुत ही लच्छेदार ये कथाएँ हैं! बड़ी मनोहर कथाएँ हैं! इनको सुनो। जीवन में कभी नहीं सुना होगा। [इनको सुनने से] जीवन सफल हो जायेगा।
[21:36-27:09 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कोई सन्देह कर सकता है कि भगवान् ने पृश्नि-सुतपा को वर दिया और ब्रह्माजी ने द्रोण-धरा को वरदान दिया, तो भगवान् के वर से अधिक भक्त का वर हो जायेगा? हाँ, हो जायेगा। यही कारण था कि कृष्ण ने पुत्रत्व तो दिया किन्तु उससे भी अधिक [श्रेष्ठ वर ब्रह्माजी ने दिया।] ब्रह्माजी भक्त हैं। इसलिये उन्होंने जो वर दिया, भगवान् उसकी रक्षा करने के लिए बाध्य हैं, मानने के लिए बाध्य हैं। इसलिये ब्रह्माजी ने उनसे भी अधिक श्रेष्ठ –वात्सल्यभाव की प्राप्ति के लिए वर [दिया।] यह युक्तियुक्त है।
[28:03-32:08 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: विशेष करके ब्रह्माजी कृष्ण के भक्त हैं और आदिगुरु हैं। आदिगुरु को उन्होंने [32:22 बताया?] और हमारे सम्प्रदाय के भी गुरु हैं। और सब सम्प्रदायों के ज्येष्ठ-गुरु होने से वे कृष्ण के परम-भक्त हैं। इसलिये ब्रह्माजी ने जो वर दिया, कृष्ण ने उसको पालन किया। उसको महत्व दे करके उसको पूर्ण किया। वर तो ब्रह्माजी देनेवाले हैं, किन्तु वर का जो फल है, वह कौन देगा? कृष्ण स्वयं देते हैं।
[देवकीजी कहती हैं–] “इसलिये भक्ति के साथ में उन लोगों ने कृष्ण की जो सेवा की है, वह हमसे बहुत अधिक है। बहुत-बहुत अधिक है! वे स्नेह से परिपूर्ण हो करके [कृष्ण का लालन-पालन करते हैं।] जिस प्रकार से [कोई व्यक्ति अपनी] आँखों की ताराओं (पुतलियों) का पालन करते हैं, रक्षा करते हैं, उससे भी अधिक वे कृष्ण का बड़े स्नेह से लालन-पालन करते हैं। यही नहीं, वे उस परब्रह्म का ताड़न और भर्त्सन अर्थात् धमकाना और शासन भी कर देते हैं। हमने [कृष्ण को] एक दिन भी डाँटा नहीं है।”
भक्त: देवकी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: देवकी या वसुदेव भी।
“हम लोग उनके चरणों में लिपटे हैं, प्रणाम भी [करते हैं।] किन्तु इन्होंने क्या किया? कृष्ण को धमकाया– “बिगड़ जायेगा, चोर बन जायेगा, ढीठ बन जायेगा।” [इस प्रकार] शासन भी किया, लालन-पालन भी किया। [कृष्ण को] एक मिनट नहीं देखने से ही बस, इनके प्राण-पखेरू उड़ जाते हैं। दामबन्धन-लीला में ये विशेष करके दिखलाया। इसलिये बतलाया गया–
नन्दः किमकरोद् ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम्।
यशोदा च महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.8.46)
[नन्दबाबा ने ऐसा कौन-सा सुकृतिमय मङ्गलपुण्य किया था, जिससे श्रीकृष्ण ने उनका पुत्र बनना स्वीकार कर लिया और यशोदा ने भी ऐसी कौन-सी पुण्यमयी सुकृति की, जिसके कारण साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण ने उस महाभागा का स्तनपान किया।] GVP
देवकी ने पुत्र तो उत्पन्न किया, किन्तु स्तन नहीं पिलाया और यशोदा मैया ने स्तन पिलाया और कहा– “और नहीं पिलायेंगे। जाओ, भागो यहाँ से।” और नन्दबाबा ने कहा– “हमारी खड़ाऊँ वहाँ हैं, ले आओ।” वसुदेवजी हाथ जोड़ करके उनको प्रणाम कर रहे हैं– “हे प्रभु! रक्षा करें। आप वही भगवान् हैं।” और नन्दबाबा कहते हैं– “[कृष्ण!] खड़ाऊँ ले आ। अरे यशोदा! इसको मारना मत। कोमल बच्चा है, कहीं ब्रह्माण्ड-घाट में डुबकी ना लगा ले। वन (जंगल) में ना चला जाये। ये क्रोधी है।” इस प्रकार स्नेह से उनका लालन-पालन करते हैं।
[देवकीजी कहती हैं–] “इसलिये यशोदा-नन्द का हमसे बहुत अधिक करोड़ों गुना माहात्म्य है। एक-दो गुना नहीं, करोड़ों गुना! तुम सत्य कह रही हो। इसलिये यदि ऐसी बात है तो मैं बहुत प्रसन्न हूँ।” ठीक है।
तीर्थ महाराज! बोलो।
भक्त: देवकीजी ऐसे वर्णन [कर रही हैं। उन्हें] कैसे पता चला?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अरी बेटी! ...
भक्त: वे तो ऐश्वर्य (35:14 अस्पष्ट) है ना?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो बोलना तो ऐश्वर्य नहीं है। अनुभव करना – ये ऐश्वर्य है।
भक्त: कैसे बोल सकती हैं? (35:21 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (35:24 अस्पष्ट) सुना है ब्रजवासियों से। ब्रज से सब समय वे तुरहिन आती थीं, कुँजड़िन आती थीं । (35:29 अस्पष्ट)
भक्त: (35:33 अस्पष्ट)
[यहाँ भक्त श्रील गुरुदेव से प्रश्न करते हैं कि देवकीजी तो ऐश्वर्य‑भाव में स्थित हैं, फिर वे ब्रज की लीलाओं का इतना मधुर वर्णन कैसे कर रही हैं? इस पर श्रील गुरुदेव उत्तर देते हैं कि केवल बोल देने से किसी का भाव ऐश्वर्य या मधुर नहीं हो जाता; भाव का स्वरूप इस बात से प्रकट होता है कि वह किस भाव को किस प्रकार से अनुभव कर रहा है। देवकीजी ने स्वयं ब्रज की लीलाएँ प्रत्यक्ष अनुभव नहीं की थीं, बल्कि वे समय‑समय पर मथुरा आनेवाले ब्रजवासियों से इन कथाओं को सुनती थीं। ब्रज के गोप‑गोपियाँ, तुरही बजानेवाले, कुँजड़िनें और अन्य ग्रामवासी नन्द‑यशोदा तथा श्रीकृष्ण की बाल‑लीलाओं के प्रसङ्ग सुनाते थे। इन लीलाओं के सतत् श्रवण से ये लीलाएँ देवकीजी के हृदय में अंकित हो गईं और उनके वर्णन में कुछ माधुर्य प्रकट हो गया।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बेटी! ऐसी ही... इससे भी कुछ और बात है। मेरी आँखों से तो आँसू नहीं [निकलते,] हृदय पिघलता नहीं है, क्योंकि बहुत पाप हैं न? अनर्थ हैं इसलिए [हृदय नहीं पिघलता।] नहीं तो, यदि ये देवकी कह रही होंगी, तो कैसे कह रही होंगी? प्राण को निकाल करके कह रही होंगी।
कथावाचक वह है जो तदात्म्यभाव से उस कथा को कहे। शुकदेव गोस्वामी को [कथा करते समय] कभी क्रोध होता था, कभी क्षोभ होता था।
भक्त: (36:06 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये सब क्षोभ आता था और परीक्षित् महाराजजी को क्या हो रहा है? [वे सम्पूर्ण रूप से कथा में] डूब जाते हैं [और उत्तरा देवी से कहते हैं–] “मैया! कृष्ण को अपना प्राणवल्लभ समझना।” कोई मैया को [ऐसा] कहेगा? (36:20 अस्पष्ट) ठीक है।
[36:24 कुछ बातचीत …]
[37:14-41:30 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यह सुन करके कृष्ण की पटरानियों में सबसे श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ रुक्मिणी देवी ने महाआनन्द के साथ में जो कुछ कहा, यदि कोई उसका श्रवण करे तो उसे प्रेमभक्ति होगी और वह बढ़ती जायेगी। जो कुछ उन्होंने कहा, भक्ति राज्य में अनूठी उनकी बातें हैं।
After that hearing this, Rukmiṇī-devī – the queen, most prominent among all and [also the] elder – she became very happy on hearing [those words] (42:25 inaudible). And then she told something. If anyone hears her words, then they will feel prema-bhakti [awaken] in their heart. And if some prema-bhakti is [already] there, it [will go on] increasing, increasing, and increasing. What she told – [that we will hear] tomorrow, not today. Very soon time is passing. Better you should come before 5. At 5, just you should be here, then I can explain something.
[यह सुनने के पश्चात् – रुक्मिणी देवी, जो महारानी हैं, सबमें सबसे प्रमुख हैं और ज्येष्ठ भी – वे यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं। फिर उन्होंने कुछ कहा। यदि कोई उनके वचन सुनेगा तो उसके हृदय में प्रेम-भक्ति जाग उठेगी। और यदि थोड़ी-सी भी प्रेम-भक्ति पहले से है, तो वह बढ़ती ही जायेगी, बढ़ती ही जायेगी, और बढ़ती ही जायेगी। उन्होंने क्या कहा – यह हम कल सुनेंगे, आज नहीं। समय बहुत शीघ्र बीत रहा है। अच्छा होगा कि आप पाँच बजे से पहले आ जायें। पाँच बजे, आप लोगों को यहाँ पर होना चाहिये, तब मैं कुछ वर्णन कर पाऊँगा।]
भक्त: (43:08 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Otherwise 10 minutes to 20 minutes and it goes (43:16 अस्पष्ट)
भक्त: (43:19 अस्पष्ट)
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