Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.77-82-84: Glory of the Gopis by Rukmini Devi
58:49This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.82-84:
- Quick recap of previous day's harikatha
- Rukmini devi's glorification of the gopis- The vrajagopis have served Sri Krsna in a very mysterious way by sacrificing all kinds of worldly and otherworldly means and by sacrificing husband-sons etc. in Sri Vrndavana, by rasa-lila etc.
- The gopis have obtained the Krsna by their special love. That is why the sadhana (devotional practice) of the gopis has become the ultimate goal for us.
- Rukmini Devi continued - That is why it is appropriate for Sri Krsna to show more love to those gopis than to us, because we are the married wives of the Lord and are always busy in the work of religion, work, son-grandson, home etc. and serve the Lord with the pride of being a husband.
- Supremacy of gopis' moods over that of all residents of all of Krsna's abodes
- What happened to the gopis who were stopped by their husbands from going to join rasa-lila & those who had kids?
- Why gopis' prema is the topmost?
- Who feels happiness when Krsna falls at the gopis' feet to break their sulky anger or when He serves them?
- Only hearing will not do, one should also practice
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.82-84: रुक्मिणीदेवी द्वारा गोपियों का महिमा-कीर्तन
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 4 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: देवकी मैया ने पद्मा के प्रश्नों का उत्तर दिया। कल हमने इसकी विशद् व्याख्या की।
[देवकी मैया ने कहा—] “अरे! हम दोनों (देवकी और वसुदेव) ने पृश्नि और सुतपा के रूप में दस हजार वर्ष तक निर्जला [रह करके,] अंगूठे पर हाथ रखकर और पैर ऊपर उठा कर कठोर तपस्या की। तब प्रभुजी से यही वर माँगा कि ‘आप हमारे पुत्र हो करके आयें। आपके जैसा हमको पुत्र हो।’ इसलिये वे स्वयं ही [हमारे पुत्र रूप में] आये किन्तु नन्द-यशोदा ने [पूर्व-जन्म में द्रोण-धरा के रूप में] यह [वर] नहीं माँगा। उन्होंने [ब्रह्माजी से] एक वर से [वास्तव में] दो वर माँग लिये। [उन्होंने ब्रह्माजी से वर माँगा कि हमें भगवान् के प्रति] वात्सल्य-रस का अनुभव हो और परमप्रेम प्राप्त हो।”
परमा-भक्ति माने परमप्रेम। कौनसा प्रेम? एक माता-पिता क्या चाहते हैं? पुत्र चाहते हैं। नन्द-यशोदा ने [भगवान् को] पुत्र [के रूप में] नहीं माँगा, [अपितु] भगवान् के प्रति वात्सल्यभाव माँगा। [और जब] भगवान् के प्रति वात्सल्यभाव माँगा तो वे अपने आप पुत्र हो करके आयेंगे। बड़े चतुर! देवकी और वसुदेव इतने चतुर नहीं थे जितने कि नन्द और यशोदा चतुर थे। [उन्होंने ब्रह्माजी से ऐसा] वर माँगा और ब्रह्माजी ने कहा— “एवमस्तु।”
भगवान् ने अपने भक्त [ब्रह्माजी] के वचन की रक्षा करने के लिए यह वात्सल्यरस का वरदान उनको [नन्द-यशोदा को] दिया। भगवान् को मानना पड़ा। इसलिये भगवद्-कृपा भगवद्भक्त की कृपा के अधीन होती है। भगवद्-कृपा, भागवत-कृपा के बिना नहीं होगी, वह उसके अधीन है। इसलिये भक्तों की आराधना से वह [उत्तम] वस्तु मिल सकती है। श्रीमती राधिका एवं उनके गणों की सेवा करने से वह वस्तु मिल सकती है, पौर्णमासीजी की कृपा से वह वस्तु मिल सकती है, जो [स्वयं] कृष्ण भी नहीं दे सकते। यदि देना भी हो तो कहेंगे— “जाओ, उनसे ले लो।” इसलिये इस सबका हमने वर्णन किया।
[देवकी मैया ने कहा—] “इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। इसलिये ये (नन्द–यशोदा) महिमा में हमसे [बहुत ऊँचे हैं।] इनकी महिमा बहुत ऊपर है। इसलिये इनके प्रति हम कोई भी ईर्ष्या नहीं करेंगे।”
तदनन्तर रुक्मिणीदेवी ने बड़ी प्रसन्न हो करके जो कुछ कहा, उसका श्रवण करने से समस्त जीवमात्र को प्रेममयी भक्ति होगी—सबको प्रेममयी भक्ति होगी। उन्होंने क्या कहा? थोड़ा मन को स्थिर करके, [ध्यानपूर्वक और] समझ-बूझ करके [सुनिये।]
If you want to hear the words of Rukmiṇī-devī, this is the very highest class of topics—a very high class [indeed!] And she [herself] is disclosing all these things.
[यदि आप श्रीरुक्मिणी देवी के वचनों को सुनना चाहते हैं, तो बहुत मन देकर सुने। यह अत्यन्त उच्चकोटि का विषय है—वास्तव में बहुत ही उच्च स्तर का! और वे स्वयं इन सब बातों का उद्घाटन कर रही हैं।]
[रुक्मिणीदेवी] उसको [गोपियों की महिमा को] प्रकट कर रही हैं। यदि प्रश्न हो कि जब ये [रुक्मिणीदेवी गोपियों की महिमा] बतला रही हैं तो वह अवश्य ही उस रस में होंगी? – ऐसा मत समझो। क्यों? [क्योंकि] ज्ञान एक वस्तु है और अनुभूति एक [अलग] वस्तु है। इनको परम्परा से सुन करके [गोपियों की] महिमा का ज्ञान तो हो गया, [किन्तु उस प्रेम की अनुभूति नहीं है। उदाहरणस्वरूप] हिमालय की एवरेस्ट चोटी इतनी बड़ी है [—यह सुनकर ज्ञान तो हो जाता है,] किन्तु [अनुभव] नहीं होगा। कोई M.A., Ph.D. है और एक मनु class (साधारण स्तर की कक्षा) का लड़का सुनता है [और मन में सोचता है] कि ‘हम भी Ph.D. हो जाते हैं। ये तो बड़ा भारी विद्वान है।’ किन्तु हो नहीं पायेगा। साधन के द्वारा ऐसा हो भी सकता है। किन्तु गोपियों की महिमा को छूने के लिए ऐसा होना असम्भव है। इसलिये रुक्मिणीजी ने जो बातें कहीं, वे उन्होंने सुन करके, समझ करके, कुछ थोड़ा-सा अनुभव करके [कहीं] कि गोपियों की कैसी अपार महिमा है, किन्तु [फिर भी वे] ब्रज का एक तृण-गुल्म-लता नहीं हो सकीं।
[6:40- 10:39 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रुक्मिणीदेवी ने क्या कहा? उसीको बतला रहे हैं।
या भर्त्तृपुत्रादि विहाय सर्वं, लोकद्वयार्थाननपेक्ष्यमाणाः।
रासादिभिस्तादृशविभ्रमै, –स्तद्रीत्याऽभजंस्तत्र तमेनमार्त्ताः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.82)
[श्रीरुक्मिणी की उक्ति इस प्रकार है– ब्रजगोपियों ने लौकिक और पारलौकिक समस्त प्रकार के साध्य-साधनों को जलाञ्जलि देकर तथा पति-पुत्र आदि का परित्याग करके श्रीवृन्दावन में रासलीला आदि विलास-श्रेणी द्वारा किसी एक अत्यन्त निगूढ़-रीति से प्रेमातुर होकर श्रीकृष्ण की सेवा की है।] GVP
‘या भर्त्तृपुत्रादि विहाय सर्वं’—गोपियों ने लौकिक और पारलौकिक–समस्त प्रकार के साधन और साध्य को जलाञ्जलि देकर, सम्पूर्ण रूप से परित्यागकर, पति-पुत्र इत्यादि का भी परित्यागकर, वृन्दावन में रासक्रीड़ा इत्यादि विलास-श्रेणी द्वारा किसी एक ‘सुगोप्य-रीति’ से प्रेमातुर हो करके कृष्ण की सेवा की। तात्पर्य यह है कि—गोपियों ने लौकिक-पारलौकिक जितने प्रकार के [साध्य-]साधन हैं, यहाँ तक कि वर्णाश्रमधर्म के जो साधन-साध्य हैं, इसके ऊपर वैधी-भक्ति के जो साध्य-साधन हैं, ऐश्वर्यमयी-भक्ति के जो साध्य-साधन हैं, इसके बाद में द्वारकेश और मथुरेश की सेवा को पाने के लिए जो साध्य-साधन हैं, यहाँ तक कि नन्द और यशोदाजी के वात्सल्य और सखा लोगों के सख्य-रस को पाने के जो साध्य-साधन हैं—इन सबको जलाञ्जलि देकर, [अपने] पति-पुत्र [इत्यादि का त्यागकर कृष्ण की सेवा की।]
यशोदाजी ने अपने पति का त्याग किया? सखाओं ने अपने माता-पिता का त्याग किया? रुक्मिणी [आदि] किसी [महिषी] ने अपने पुत्रों का त्याग किया? नहीं। किन्तु गोपियों ने क्या किया? [उन्होंने] पति-पुत्रादि का परित्याग करके वृन्दावन में रासक्रीड़ा की। इसके अतिरिक्त, श्रील सनातन गोस्वामी आगे वर्णन करेंगे।
[गोपियाँ] कलश लेकर पानी भरने के लिए जा रही हैं, किन्तु पानी भरना ही भूल गयीं और कृष्ण-स्मृति में डूब गयीं और कृष्ण उनके लिए पहले से ही अभिसार करके यमुना के किनारे खड़े हैं। रुक्मिणी, सत्यभामा के लिए यह कभी सम्भव होगा?—नहीं हो सकता। कृष्ण आगे जा करके अभिसार करके कुञ्ज सजा रहे हैं। कभी रुक्मिणी, सत्यभामा के लिए कुञ्ज क्या, अपने घर को भी सजायेंगे? [द्वारका में विपरित होगा—रुक्मिणी, सत्यभामा] घर सजायेंगी और कृष्ण वहाँ जायेंगे।
वृन्दावन में रासक्रीड़ा इत्यादि हैं। [यहाँ] रासक्रीड़ा से समस्त लीलाओं को समझ लो। [गोपियाँ] किसी एक ‘गोपनीय-रीति’ से, ‘रहस्यपूर्ण-रीति’ से [सेवा करती हैं।] रहस्यपूर्ण-रीति क्या है? पारकीयभाव।
जैसे वेश्याएँ हैं, वे किसी के चित्त को मोहित कर देती हैं, [केवल] पैसे के लिए; किन्तु गोपियों का वैसा नहीं है। उनके समान लगता है किन्तु इससे बहुत ऊपर है। वे कृष्ण की सब प्रकार से सेवा करती हैं। ऐसी सेवा करती हैं कि कृष्ण उनकी सेवा में स्वयं ही निमग्न हो जाते हैं।
ये सब गोपियाँ अपने पतियों को परित्यागकर… कौनसे पति को? उनका पति कौन है? उनका स्वकीय जो पति है, वह तो कृष्ण हैं—यह बात तो ठीक है। किन्तु लौकिक-लीला में जिन गोपों के साथ में उनका विवाह हुआ था, [यहाँ पर उन पतियों को त्याग करने की बात कर रहे हैं। वास्तव में लौकिक-लीला में भी] गोपियों की छाया से ही गोपों का विवाह हुआ था। योगमाया ने उन गोपियों से उनके पतियों का विवाह नहीं होने दिया। [गोपों का] किससे विवाह कराया? [गोपियों की छाया से।] अभिमन्यु के साथ में किसका विवाह हुआ? राधाजी की छाया का, काया का नहीं। किन्तु ऐसा प्रतीत हुआ कि राधाजी [से विवाह हुआ।] राधाजी के जैसा ही रूप लगा करके और उनकी [छाया] को बैठा दिया, राधाजी को हटा दिया। ऐसे ही ललिता, विशाखा, चित्रा [आदि सभी गोपियों के विषय में] समझो।
[गोपियों ने कृष्ण की सेवा के लिए] सबको परित्याग कर दिया—पुत्र को भी। जिनको पुत्र है, [उन्होंने पुत्र का भी परित्याग कर दिया।] कृष्ण ने वंशी बजायी और उसका शब्द सुन करके, वेणु की ध्वनि को सुन करके पुत्रवती गोपियाँ भी पागलनी हो करके घर से निकलीं, किन्तु उनके पतियों ने उनको घर में बन्द कर दिया। कैसे जायेंगी? लाठी हाथ में लेकर [उनको निषेध किया।]
उस समय गोपियों को तीव्र विरह हुआ और वे ‘ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गला:’[#1]— ऐसी चिन्ताकर चित्त में एकदम डूब गयीं और [उस तीव्र] विरह से उनके जितने भी दुःख और ये सब [अशुभ] दूर हो गये। तब हुआ क्या? बाहर के लोगों ने समझा कि ये तो मर गयीं। [किन्तु वास्तव में] कोई भी मरी नहीं, [क्योंकि] रासलीला में अमङ्गल नहीं हो सकता है। क्या हुआ? योगमाया ने सारी व्यवस्था कर दी। वे गोपियाँ पहले ही जा करके कृष्ण से मिल गयीं। तो ये सब प्रमाण हैं। गोपियों ने अपने पति [को त्यागकर कृष्ण की सेवा की।]
पुत्रवाली [गोपियों ने] अपने पुत्रों को भी छोड़ दिया। और फिर क्या हुआ? जिनके पुत्र थे, वे तो रासलीला में जाने के लिए अयोग्य थीं। वे कभी भी रासलीला में प्रवेश नहीं कर सकती थीं। वे कृष्ण के लिए कभी भी उपयुक्त नहीं हो सकती थीं। [केवल] बिना पुत्रवाली, बिना पति-सङ्गम करने वाली गोपियाँ ही कृष्ण से मिल सकती थीं, किन्तु ये कैसे मिलीं? ऐसे हुआ—‘अच्युताश्लेष’, [उन्होंने] ध्यान में अत्यन्त विरह में आतुर हो करके, विरह-अग्नि में अपने अशुभों को जला [दिया।] अशुभ माने कृष्ण के विरह को हटाकर और उस समय मन-ही-मन आनन्द से कृष्ण का आलिङ्गन किया। हो सकता है कि कृष्ण वहाँ पर पहुँच गये हों और उन्होंने आलिङ्गन किया और उससे आनन्द उनको प्राप्त हुआ और गोपियों का जितना मङ्गल था, वह सब क्षीण हो गया; अमङ्गल तो था ही नहीं। मङ्गल माने पुण्य इत्यादि सब क्षीण हो गया और क्या हुआ? उनका पुत्रों के प्रति जो पुत्र का भाव था, पति के प्रति जो पति का भाव था, वह सबकुछ समाप्त हो गया। और वे [अन्य] गोपियों जैसी सुकुमार, अभुक्त, एकदम गोपी जैसी [हो गयीं] और फिर कृष्ण ने उनको रास में बुला लिया।
जैसे, जब-जब आम पकता है, तब-तब आदमी उसका आस्वादन करता है। उसी प्रकार, जब पेड़ पर एक आम पक गया, तो समझो ये सभी अब दुग्ध (कोमल) हो गये हैं [अर्थात् बाकी सारे आम भी अब पकने की स्थिति में आ गये हैं।] उन सबको उतार करके घर में रख दिया—धूप में–ताप में रख दिया। एक दिन पाँच पके, दूसरे दिन पाँच पके और तीसरे दिन [कुछ और पके] और ठाकुरजी को भोग लगा करके आस्वादन किया। ऐसे कृष्ण ने उन [पुत्रवती गोपियों] को विरह-ताप से जला करके, पका करके, उपयुक्त करके, फिर उनको [रास में सम्मिलित किया।] तो पति-पुत्र के प्रति उनका स्नेह भी दूर हो गया और उसे दूर करके वृन्दावन में—और कहीं नहीं, वृन्दावन में [रास किया]।
वृन्दावन में कहाँ? यमुना के तटपर, [जहाँ] दोनों ओर वृन्दा, बेली, चमेली, जूही [आदि] के पौधे हैं, भौंरे गुञ्जार कर रहे हैं, और गुञ्जार में ‘राधे-राधे’ बोल रहे हैं। [वहाँ] तरह-तरह के कदम्ब इत्यादि के सुन्दर-सुन्दर वृक्ष हैं, नाना प्रकार के कुञ्ज हैं। कुञ्जों में कोयल मतवाली हो करके ‘कुहू-कुहू’ कर रही, पपीहे ‘पी कहाँ, पी कहाँ’ शोर कर रहे हैं और मयूर क्या कर रहे हैं? ‘केका-केकी।’ उस समय प्रकृति ऐसी सजी हुई है कि रासलीला के सब उद्दीपन करा रही है।
और उस समय वृन्दावन में [गोपियों ने] विलास-श्रेणी [द्वारा किसी एक ‘सुगोप्य-रीति’ से प्रेमातुर होकर कृष्ण की सेवा की।]
कृष्ण गोचारण के लिए जाते हैं, तो गोपियाँ क्या करती हैं? उनका गुण वर्णन करती हैं।
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीञ्च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.5)
[(गोपियाँ अपने भावनेत्रों से देखने लगीं–) श्यामसुन्दर अपने सखा गोपबालकों के साथ वृन्दारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपुच्छ, कानों में कनेर का फूल, सुवर्ण जैसा उज्ज्वल पीताम्बर और गले में पाँच प्रकार के सुगन्धित पुष्पों से ग्रथित घुटनोंतक लम्बी मनोहर वनमाला विराजमान है। रङ्गमञ्चपर सुन्दर अभिनय करनेवाले नटवर का-सा सुन्दर वेश है। वेणु के छिद्रों से अपना अधरामृत प्रवाहित कर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी कीर्ति का गान करते हुए चल रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठ से भी अति-रमणीय यह वृन्दावनधाम उनके शंख, चक्र आदि लक्षणों से युक्त चरणकमलों के चिह्नों से अङ्कित होकर और भी सुशोभित हो गया है।] GVP
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदाम:
सख्य: पशूननुविवेशयतोर्वयस्यै:।
वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनवेणु जुष्टं
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.7)
[गोपियाँ परस्पर बातचीत करने लगीं– अरी सखियो! नेत्रवान व्यक्तियों के लिए ऐसा प्रियदर्शन ही यथार्थ फल है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अपने सखाओं के साथ गोचारण के लिए वन में प्रवेश करनेवाले राम-कृष्ण के वेणुवादरत स्निग्धकटाक्षयुक्त मुखकमल का जिन्होंने दर्शन किया है, निश्चय ही उन्होंने ही इसका अनुभव किया है।] GVP
ये सब लीला-श्रेणी हैं। इसके बाद में लीला-श्रेणी क्या? कृष्ण ने वंशी बजायी, गोपियाँ आयीं। झूले पर झूल रही हैं, झुला रही हैं, बसन्तऋतु में होली खेल रही हैं। वहाँ द्वारका में [कृष्ण] ऐसे होली खेलेंगे? ये सम्भव नहीं है। रास रचायेंगे? वहाँ तो सोलह हज़ार महिषियाँ हैं, तो वे रासलीला करें, नहीं हो सकता। यह [केवल] वृन्दावन में ही सम्भव है। रास की जो वेशभूषा है, कृष्ण उसको वृन्दावन में ही धारण कर सकते हैं और कहीं नहीं। ऐसे अनिर्वचनीय अर्थात् वचनों के द्वारा जिसको व्यक्त नहीं किया जा सकता है, ऐसे विशेष विलास… विलास माने विशेष रूप से उल्लास जो प्रदान करता है, रस का उल्लास—उसके द्वारा किसी एक सुगोप्य-रीति से [प्रेमातुर होकर गोपियों ने कृष्ण की सेवा की। सुगोप्य रीति माने—] जिस प्रकार से स्वर्णी वेश्याएँ लोगों का चित्त आकर्षण कर लेती हैं। कैसे?
एक समय की बात है। एक बहुत ही रूपवती युवती, अच्छे वंश की और अच्छे कुल की, [अपने] माता-पिता के घर से एक युवक से विवाह [कर] दी गयी। [विवाह के बाद] वह अपने [पति के] घर आयी। पति भी बहुत सुन्दर, खूबसूरत और रसिक था। स्त्री अब तो पति के रूप में उसकी सेवा करेगी—दासी के रूप में भी। किन्तु उस [युवक] का मन (चित्त) उससे भी कम सुन्दरी एक वेश्या में लग गया—जो उतनी सुन्दरी नहीं, उतनी रूपवती नहीं, [उतनी] गुणवती नहीं। अब वह अपनी पत्नी को छोड़कर उसके पास जाने लग गया।
पत्नी ने यह देखा और समझ गयी कि कुछ गड़बड़ बात है। [उसने पति का] पीछा किया कि वह कहाँ जाता है, क्या करता है? [उसने] देखा कि वह उस वेश्या के पास में गया। तब उस स्त्री ने क्या किया? पास ही में एक घर किराए पर ले लिया और तरह-तरह से अपना रूप बना करके और वह भी वेश्या के रूप में वहाँ पर बैठ गयी। रूप तो था ही, गुण भी था और जैसे वेश्या का आचरण होता है, [किन्तु] पैसे [के लिए] नहीं, केवल अपने पति के लिए, उसको लुभाने के लिए वह उसे बहुत दूर से देखने लगी, आकर्षित [करने लगी] और वह एकदम आकर्षित हो गया। वह उस वेश्या को छोड़ करके जब आकर्षित हो गया और जब उसके पास आया, [तो उस स्त्री ने कहा–] “जानते हो कि मैं कौन हूँ?”
[पति ने कहा—]“नहीं तो।”
[तब स्त्री ने कहा—]“मैं वही तुम्हारी पत्नी हूँ। मैं उससे [अधिक] गुणी और रूपवती हूँ। तुम्हें लुभाने के लिए [ही मैंने] यह काम किया। इसलिये खबरदार, अब उसके पास मत जाना।”
तो वह रीति ही एक सुगोप्य है—पारकीय भाव। [जिसमें] गुप्त रूप से मिलना, जिसमें बाधाएँ हो, जिसमें दुर्लभता हो, जिसमें निषेध हो—ये पारकीय भाव है। केवल पारकीय भाव से ही नहीं होगा। गोपियाँ पारकीय भाव के लिए ही श्रेष्ठ हैं—ऐसा मत समझो। किसलिये? उनका प्रेम इतना अथाह है कि वे सारी मर्यादाओं को तोड़ देती हैं। [वह प्रेम] पति, पुत्र, परिवार—सबको छुड़वा देता है, सबका विस्मरण करा देता है। वह प्रेम ही कैसा समर्थ है! [गोपियाँ] जानबूझकर पति, पुत्र, परिवार को नहीं छोड़तीं। [तो यह] कैसे होता है? ज्योंहि वह भाव आता है, वह इतना समर्थ हो जाता है कि सबको भुला देता है, विस्मरण करा देता है—यहाँ तक कि अपने प्रियतम को अपने वशीभूत करा देता है।
इसलिये पारकीय भाव से ही नहीं [होगा।] पारकीय भाव तो और भी बहुत जगहों में है। किन्तु वह कृष्ण के प्रति न हो और सर्वत्यागमयी आत्मेन्द्रियवाञ्छा रहित न हो, तो पारकीय होने से भी नहीं होगा। इसलिये कुब्जा का नहीं हुआ। किसका हुआ? गोपियों का हुआ।
अभी इतना ही बोल दो, तब फिर [आगे श्रवण करेंगे।] बहुत दुरूह विषय (subject) है! बहुत दुरूह विषय!
[25:32-43:29 तक विभिन्न भक्तों द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Abhimanyu was a shadow of Kṛṣṇa. All the gopas were shadows, or kāya-vyūhas, of Kṛṣṇa. On the other hand, all the gopīs [who were married to the gopas were] like shadows [of the respective gopīs.] The real gopīs were not married to any other.
[अभिमन्यु कृष्ण की छाया था। सभी गोप कृष्ण की छाया अथवा कृष्ण के कायव्यूह थे। दूसरी ओर, जिन गोपियों का विवाह गोपों से हुआ था, वे अपनी-अपनी वास्तविक गोपियों की छायामात्र थीं। वास्तविक गोपियाँ किसी और से विवाहित नहीं थीं।]
[43:52-45:09 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये सब कौन कह रहा है? रुक्मिणीजी कह रही हैं। वह कह रही हैं, एक विशेष बात गम्भीरता से समझो। सहज रूप में समझ में नहीं आयेगी। पहले गोपियाँ अभिसार करती हैं, वासकसज्जा होती हैं और कृष्ण के लिए प्रतीक्षा करती हैं, उत्कण्ठिता हो जाती हैं। और इसके बाद में फिर खण्डिता और?
श्रीपाद तीर्थ महाराज: प्रोषितभर्तृका, विप्रलब्धा, कलहान्तरिता [#2]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो ये गोपियाँ कृष्ण के लिए [इस प्रकार की अवस्थाओं को प्राप्त] होती हैं। किन्तु कृष्ण भी ऐसा ही करते हैं। कृष्ण भी [गोपियों के लिये] अभिसार करते हैं। वे गोपियों के जैसे अभिसार करते हैं—कुञ्ज की सेवा करते हैं, फूलों की सज्जा बनाते हैं और गोपियों के लिए खण्डित भी होते हैं। किसी कारण से राधिकाजी रह गयीं और [नहीं आयीं तो कृष्ण] रातभर चिन्ता करते हैं। इस तरह से जो-जो ये गोपियों को होता है, कृष्ण को भी होता है।
किसी गोपी ने मान कर लिया, तो कृष्ण उनके चरण दबाते हुए उनको मना रहे हैं। इसमें सुख किसको होता है? गोपियों को होता है, कि कृष्ण को? कृष्ण किसी गोपी को मना रहे हैं—पैरों पर पड़ रहे हैं, वंशी भी उन्हें [समर्पित कर रहे हैं,] आत्मसमर्पण कर रहे हैं और हाथ जोड़ करके कह रहे हैं— “अब मैं ऐसा अपराध नहीं करूँगा।” वे क्षमा भी माँग रहे हैं। तो इससे प्रसन्नता किसको होती है? गोपियों को, [कि कृष्ण को]?
भक्त: कृष्ण को
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कैसे? साधारण रूप में ऐसा प्रतीत होता है कि इससे गोपियों को [प्रसन्नता होती है।] जब कृष्ण मान-भञ्जन करते हैं, तो गोपियों को अभिमान होता है कि देखो तो, हमारे लिए ये हमारा मान [-भञ्जन] कर रहे हैं। किन्तु गोपियाँ ऐसा क्यों कर रही हैं? किसके लिए? कृष्ण के लिए। ये समझना बड़ा भारी कठिन है। बहुत कठिन तत्त्व है। जिसपर भगवान् की, गोपियों की, योगमाया की या किसी रसिकभक्त की कृपा होगी, तो ये समझ में आयेगा; नहीं तो नहीं समझ में आयेगा।
इसलिये रुक्मिणीजी कह रही हैं—“ये सब विशेषताएँ गोपियों में हैं, हम लोगों में सम्भवपर नहीं है। इसलिये उनके प्रति हमारा सापत्न्य-भाव [उचित] नहीं है। क्या भाव है?—गौरवभाव है, आदर का भाव है। [यद्यपि गोपियों के] भाव को हम पाना चाहती हैं, किन्तु हमारे लिए यह सम्भव नहीं है– यह हम जानती हैं। हमने उनकी महिमा को केवलमात्र समझा है। इसलिये यदि कृष्ण उनके प्रति ऐसा व्यवहार करते हैं, तो वह उपयुक्त है, उपयुक्त [ही] है। इसमें हम लोगों को ईर्ष्यालु होने की आवश्यकता नहीं है, जैसा की पद्मा ने लाञ्छना लगायी। इस तरह से उपयुक्त हुआ है। इसलिये गोपियाँ हमसे श्रेष्ठ हैं। उनका माहात्म्य भी [अधिक है।”] कैसे? [गोपियों ने] ऐहिक (लौकिक)-पारलौकिक समस्त प्रकार के साध्य-साधन से अपेक्षारहित हो करके, अनुराग से भरकर कृष्णसेवा की है—वह भी कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए, अपनी प्रसन्नता के लिए नहीं। कृष्ण गोपियों की आँखों में अञ्जन लगा रहे हैं। किसको सुख होता है? किसको? ऐसा प्रतीत होता है, ऐसा लग रहा है कि गोपियों को सुख हो रहा है। [किन्तु गोपियों को जो] सुख हो रहा है, वे बड़ी आनन्दित होती हैं, [वह] कृष्ण को और [अधिक] उल्लसित कराने के लिए। इसलिये गोपियों का जितना भी व्यवहार है—ये सब मान-भञ्जन-लीला इत्यादि [कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही है।] कृष्ण जो उनकी सेवा कर रहे हैं, मना रहे हैं, सब गोपियाँ कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कर रही हैं। हम लोग ऐसा नहीं कर सकते।” [रुक्मिणीजी] रो रही हैं और इस तरह से [गोपियों की महिमा वर्णन कर रही हैं,] और कहती हैं कि “इसलिये हम लोगों [को उनके प्रति] ईर्ष्या नहीं [होनी चाहिये,] वे हमारे आदर की पात्र हैं।”
[49:31-54:31 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: I think that this subject is very deep and very high. Discuss [it with] each other and with your superiors and even if you do not understand it, then tomorrow in class you can ask the question—we will try to solve it. Only hearing will not do. You will have to practice, [beginning] from śraddhā—the first fraction of bhakti is śraddhā.
[मुझे लगता है कि यह विषय बहुत गहरा और बहुत उच्च है। इसे आपस में और अपने से वरिष्ठ-भक्तों के साथ चर्चा करें, और यदि तब भी आप इसे नहीं समझते हैं, तो कल कथा में प्रश्न पूछ सकते हैं—हम उसका समाधान करने का प्रयास करेंगे। केवल सुनना पर्याप्त नहीं है। आपको अभ्यास करना होगा, श्रद्धा से प्रारम्भ करते हुए—भक्ति का प्रारम्भिक स्तर श्रद्धा है।]
I am telling all these things. You should hear and make this thing the goal of your life. The goal of life should be this prema. But how to practice? You should begin with vaidhī-bhakti, [starting] from śraddhā, then bhajana-kriyā, niṣṭhā, ruci, and so on. Do not think that you are galloping—do not gallop. But I am telling that, whether I remain in this world for many years or not, so I want to give this seed of bhakti. You should keep it [carefully] and practice. One day you should be qualified to have all these things.
[मैं यह सारी बातें कह रहा हूँ। आपको इसे सुनना चाहिये और इसे अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिये। जीवन का लक्ष्य यही प्रेम होना चाहिये। किन्तु इसका साधन कैसे करना है? आपको वैधी-भक्ति से प्रारम्भ करना चाहिये, अर्थात् सबसे पहले श्रद्धा से, फिर भजनक्रिया, निष्ठा, रुचि और इसी प्रकार आगे बढ़ना चाहिये। यह मत सोचो कि तुम तेजी से दौड़ रहे हो—तेजी से मत दौड़ो। किन्तु मैं यह कह रहा हूँ कि चाहे मैं इस संसार में कितने ही वर्षों तक रहूँ या न रहूँ, मैं यह भक्ति का बीज देना चाहता हूँ। आपको इसे सम्भालकर रखना चाहिये और अभ्यास करना चाहिये। एक दिन आप योग्य बनेंगे कि इन सभी वस्तुओं को प्राप्त कर सको।]
[55:53-58:49 तक श्रील गुरुदेव भक्तों को उनके सामान को सावधानीपूर्वक रखने के सम्बन्ध में कुछ निर्देश देते हैं…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
दु:सहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभा:।
ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गला: ॥
तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गता:।
जहुर्गुणमयं देहं सद्य: प्रक्षीणबन्धना: ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.29.10-11)
प्रियतम के असहनीय विरह के तीव्र तापरूपी परमदुःख के द्वारा गोपियों का समस्त अशुभ नष्ट हो गया और ध्यानयोग में श्रीअच्युत के आलिङ्गन से प्राप्त परमानन्द के द्वारा उनकी समस्त पुण्यराशि भी क्षय हो गयी। इस प्रकार समस्त शुभ-अशुभरूप बन्धन से रहित होकर गोपियों ने जार (उपपति) बुद्धि के द्वारा ही परमात्मा श्रीकृष्ण को प्राप्तकर उसी क्षण अपनी गुणमय देह का त्याग कर दिया। (GVP)
#2
नायिकाओं की आठ अवस्थाएँ होती हैं-अभिसारिका, वासकसज्जा, उत्कण्ठिता, खण्डिता, विप्रलब्धा, कलहान्तरिता, प्रोषितभर्तृका और स्वाधीनभर्तृका
अभिसारिका– जो नायिकाएँ कान्त को अपने निकट अभिसार कराती हैं या स्वयं अभिसार करती हैं, उनको अभिसारिका कहते हैं।
वासकसज्जा– अपने अवसर के अनुसार प्रियतम अवश्य आएँगे, ऐसा सोचकर जो नायिका अपने अङ्गों को तथा कुञ्ज को सुसज्जित करती हैं, वे वासकसज्जा कहलाती हैं।
उत्कण्ठिता– निरपराध प्रियतम के बहुत देर तक उपस्थित न होनेपर अत्यन्त विरहवशतः जो नायिका अत्यन्त उत्कण्ठित हो जाती है, उसे रसज्ञ पण्डितगण उत्कण्ठिता कहते हैं।
खण्डिता– पूर्व निर्धारित सङ्केत काल के बीत जानेपर भी जिसके प्रियतम अन्य प्रेयसी के साथ निशा यापनकर उसके भोग चिह्नों को स्पष्ट रूपसे धारणपूर्वक यदि निशा के अन्त में उपस्थित होते हैं तो उन्हें देखकर पूर्व नायिका खण्डिता अवस्था को प्राप्त होती है।
विप्रलब्धा– सङ्केत करके भी प्राणनाथके उपस्थित न होनेपर जो नायिका अत्यन्त व्यथित होती है, उसीको रसज्ञ पण्डितलोग विप्रलब्धा कहते हैं।
कलहान्तरिता– जो नायिका सखियों के सामने अपने पदानत वल्लभ को परित्यागकर पीछे अत्यन्त अनुताप अनुभव करती है, उसे कलहान्तरिता कहा जाता है।
प्रोषितभर्तृका– श्रीकृष्ण के दूर देश अर्थात् मथुरा या द्वारका में गमन करनेपर जो विरहिणी कान्ता उनके आगमन पथ को सदा देखती रहती है, उसको प्रोषितभर्तृका नायिका कहते हैं।
स्वाधीनभर्तृका– कान्त सदा-सर्वदा अधीन रहकर जिसके समीप निवास करते हैं, उसे स्वाधीनभर्तृका कहते हैं।
–उज्ज्वलनीलमणि (5.69-91)
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