Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.84: Rukmini Devi Comparing the Love of the Gopis with the Dvaraka Queens
01:13:06This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.84:
- Rukmini devi said ‘It is proper that Sri Krsna’s attitude towards the Gopis should be more excellent than ours.
- Rukmini devi elaborated on the gopis' separation
- Krsna is the prayojana (aim & object) of everyone & gopis are the prayojana of Krsna
- How Krsna meditates on Srimati Radhika?
- Why gopis' prema is the topmost?
- Uddhavaji's glorification of the gopis- 'ya vai sriyarcitam' (S.B.10.47.62)
- Who is superior- Uddhava, Brahma or Kubja?
- Comparison between gopis' prema & the prema of Krsna's queens for Him; different pastimes between gopis & Krsna, especially rasa-lila
- Pastime of Dussehra: Sri Rama left during this time from Kiskindha for subduing Ravana, Ravana was not killed on this day
- Nava-Durga worship is not as per the scriptures
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.84: रुक्मिणी देवी द्वारा गोपियों के प्रेम की द्वारका की महिषियों के प्रेम से तुलना
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 5 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Because we are now starting Bṛhad-Bhāgavatāmṛta again, and without following all of its siddhānta we can’t indulge in the realm of bhakti—pure bhakti, vraja-bhakti. Bṛhad-Bhāgavatāmṛta is a nidhi—treasure of all siddhānta.
[क्योंकि हम अब बृहद्भागवतमृत का पुनः पाठ प्रारम्भ कर रहे हैं, और उसके सम्पूर्ण सिद्धान्त का अनुसरण किये बिना हम भक्तिराज्य में, विशेषतः शुद्ध-भक्ति—व्रज-भक्ति में प्रवेश नहीं कर सकते। बृहद्भागवतामृत समस्त सिद्धान्तों का निधि, अर्थात् खजाना है।]
श्रील सनातन गोस्वामी का यह बृहद्भागवतामृत निधियों का खजाना है। [जैसे] समुद्र के लिए ‘रत्न-निधि’ कहा गया है, [वैसे ही] सनातन गोस्वामी का यह ग्रन्थ भी महानिधि-स्वरूप है।
This grantha is mahānidhi, containing all kinds of bhakti-siddhānta, [especially] vraja-bhakti. Without the help of this book and the explanations of Śrīla Sanātana Gosvāmī, how one can know—what was the mood of Rukmiṇī, what was the mood of Satyabhāmā, what were the moods of Rādhikā, Candrāvalī and others? You heard about the mood of Rukmiṇī—how she explained the glories of gopīs!
[यह ग्रन्थ महानिधि है — समस्त प्रकार के भक्ति-सिद्धान्त, विशेषतः व्रज-भक्ति से परिपूर्ण है। इस ग्रन्थ की सहायता और श्रील सनातन गोस्वामी की व्याख्याओं के बिना कोई कैसे जान सकता है कि रुक्मिणी का भाव क्या था, सत्यभामा का भाव क्या था, राधिका, चन्द्रावली आदि के भाव क्या थे? आपने रुक्मिणी के भाव के विषय में सुना है— उन्होंने गोपियों की महिमा का वर्णन किस प्रकार किया!]
गोपियों की महत्ता को रुक्मिणी देवी ने कैसे प्रकाश किया— कल यह सुन करके आप लोग विचार कर रहे होंगे।
You heard about the mood of Rukmiṇī—how glorious and how deep it was! I think that you cannot repay Sanātana Gosvāmī; what to tell [about] Rūpa Gosvāmī?
[आपने रुक्मिणी के भाव के विषय में सुना है— वह कितना श्रेष्ठ और कितना गहन था! मेरा विचार है कि हम सनातन गोस्वामी का ऋण भी चुका नहीं सकते; फिर रूप गोस्वामी के विषय में क्या कहा जाए?]
अब हम आगे चल रहे हैं। अन्त में [रुक्मिणीजी] उपसंहार (conclusion) कर रही हैं कि वे गोपियाँ उत्तम-से-उत्तम बहु-साधनों द्वारा जो साध्य-प्रेम है, अथवा समाहित चित्त से— समाहित चित्त माने एकाग्रचित्त किया हुआ है— ऐसे चित्त से विचार करनेवाले, चिन्तनीय महान प्रभु श्रीकृष्ण के ऐसे प्रेम-विषय को गोपियों ने लाभ किया है, यह बहुत ही चिन्तनीय बात है। हम लोग इसकी आकांक्षा करती हैं। हम लोग इसको चाहती हैं, किन्तु फिर भी वह हमको मिल नहीं सकता। किसी व्यक्ति के महत्व को देख करके हम यह समझ सकते हैं कि वह कितना महान है, किन्तु हम [स्वयं] वैसे महान नहीं हैं— ऐसी रुक्मिणीजी की [उक्ति है।] इसलिये हम लोगों के लिए भी वह वस्तु— जो गोपियों का प्रेम है— वह चिन्तनीय है, भावनीय है; अर्थात् उत्कृष्ट साधन और ध्यान का विषय है। हम लोग उनका ध्यान करती हैं। ओह! गोपियों का कितना सौभाग्य है कि वे कृष्ण से इतना प्रेम करती हैं! कैसा प्रेम करती हैं? [ऐसा प्रेम करती हैं] कि कृष्ण ही उनका ध्यान करते हैं। जगत् के लिए कृष्ण ध्येय हैं; सारा जगत् कृष्ण का ध्यान करता है, [किन्तु गोपियाँ उन कृष्ण की भी ध्येय हैं।]
The whole world meditates on Kṛṣṇa, but Kṛṣṇa meditates [upon] whom? The gopīs, especially Rādhikā. Here is the glory. Not only that, He is always very eager to meet them and to serve the gopīs.
[सम्पूर्ण जगत् कृष्ण का ध्यान करता है, किन्तु कृष्ण किसका ध्यान करते हैं? गोपियों का, विशेषतः राधिका का। यही उनकी महिमा है। इतना ही नहीं— वे सदैव उनसे मिलने के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित रहते हैं और गोपियों की सेवा करने के लिए उत्सुक रहते हैं।]
और भी गम्भीर विषय आयेगा।
[6:32-6:58 तक अनुवाद सम्बन्धित वार्तालाप…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अतएव गोपियों ने ऐसा भजन किया है—माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः [#1], ‘पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः’ [#2]
[गोपियों ने] कैसा भजन किया? पति, पुत्र, भाई-बन्धु— इन सबको भी छोड़ना सहज है, [किन्तु] लोक-लज्जा को नहीं छोड़ा जा सकता। स्त्रियाँ आग में जल मर सकती हैं, [किन्तु लोक-मर्यादा को नहीं छोड़तीं।] विदेशी भक्तों के लिए हम नहीं कह रहे हैं कि वे करेंगी कि नहीं करेंगी। वे तो बाजार में नाचेंगी, किन्तु हमारे यहाँ की जो मर्यादा-सम्पन्न पतिव्रता नारियाँ हैं, वे भले ही आग में जल मरेंगी किन्तु मर्यादा को नहीं छोड़ सकतीं। किन्तु गोपियों ने मर्यादा का भी उल्लंघन कर दिया। भारत (India) में सास-ससुर और माता-पिता के आदेश का कोई उल्लंघन नहीं करेगा, किन्तु [गोपियों ने] वह भी कर दिया। पाश्चात्य देशों में यह सम्भव है। उनका सब समय काम ही यही है— [उल्लंघन करना।]
Understand? In western countries, they may change their husbands [and wives] thirty times, forty times, and they want to make their name in [the Guinness] Book. But my dear sons and darling daughters, you should try to be like Indians—Indian chastity. Don't be like that.
[समझे? पश्चिमी देशों में लोग तीस–चालीस बार अपने पति या पत्नी बदल लेते हैं और अपना नाम गिनीज़ बुक में दर्ज कराना चाहते हैं। किन्तु, मेरे प्रिय पुत्रों और प्यारी पुत्रियों, आपको भारतीयों की तरह बनने का प्रयास करना चाहिये— भारतीय पातिव्रत्य को अपनाइये। वैसे [उच्छृंखल] मत बनिये।]
तो गोपियों ने लोक-लज्जा, पति, पुत्र सबको छोड़ दिया। कृष्ण ने कहा कि नग्न हो जाओ, तो वे नग्न हो गयीं। [भारतीय नारी के लिए] ये सम्भव नहीं।
Kṛṣṇa told [them] that they should be naked, and they became naked. It is very-very absurd.
भक्त: असम्भव (impossible)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसलिये गोपियों ने कृष्ण के प्रति असाधारण प्रेम को प्राप्त किया अथवा कृष्ण उनके ध्यान के विषय हैं। और क्या? जो कृष्ण जगत् के ध्येय हैं, परम साध्य-तत्त्व हैं, [उन्होंने] आज गोपियों को अपना साध्य-तत्त्व और ध्येय-तत्त्व बना रखा है। कृष्ण ही उनका ध्यान करते हैं। कहाँ? कहाँ पर?
अघरिपुरपि यत्नादत्र देव्याः प्रसाद-
प्रसरकृतकटाक्षप्राप्तिकामः प्रकामम्।
अनुसरति यदुच्चैः स्नानसेवानुबन्धै -
स्तदतिसुरभि राधाकुण्डमेवाश्रयो मे ॥
-श्रीराधाकुण्डाष्टकम् (3)
[श्रीमती राधिका की प्रसन्नतासे विस्तारित उनके कृपाकटाक्ष को पाने की कामनावाले श्रीकृष्ण भी, अतिशय स्नानरूप नित्यसेवाके द्वारा जिस श्रीराधाकुण्ड का प्रयत्नपूर्वक यथेष्ट अनुसरण करते रहते हैं, परम मनोहर वह श्रीराधाकुण्ड ही मेरा आश्रय बन जाये।] GVP
कृष्ण ने [यद्यपि श्याम]कुण्ड को प्रकट किया किन्तु राधाकुण्ड में त्रिसन्ध्या स्नान कर रहे हैं। Taking bath three times without [eating] anything — starving. [बिना कुछ खाए, उपवास रखते हुए, त्रिसन्ध्या स्नान कर रहे हैं] और राधाजी की कृपाकटाक्ष के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, साधन कर रहे हैं कि वे प्रसन्न हो जायें। तो बतलाओ, ये ध्यान भी कर रहे हैं। ये गोपियाँ विशेषकर राधिकाजी कृष्ण के लिए साध्य और ध्येय हैं।
उद्धवजी ने कहा है, क्या कहा है?
वियोगिनीनामपि पद्धतिं वो, न योगिनो गन्तुमपि क्षमन्ते।
यद्ध्येयरूपस्य परस्य पुंसो, यूयं गता ध्येयपदं दुरापम्॥
-पद्यावली (347)
[इन वियोगिनी गोपियों की साधन-पद्धति को योगीगण अपने ध्यान में भी अनुसरण करने में असमर्थ हैं, क्योंकि जो सभी के ध्यान के विषय हैं, वे परमपुरुष भगवान् भी उन गोपियों का ही ध्यान करते हैं।] GVP
जो हमने कहा, वही [यहाँ कहा जा रहा है।] ये वियोगिनी जो गोपियाँ हैं, कृष्ण के वियोग में जो छटपट-छटपट कर रही हैं— कृष्ण मथुरा और द्वारका से उनका ध्यान कर रहे हैं। योगी लोग कृष्ण का ध्यान करते हैं, किन्तु वे उनको प्राप्त नहीं कर पाते। योगी लोग गोपियों का अनुसरण [करने का प्रयास] तो करते हैं कि कैसे हम ध्यान करें, [किन्तु वे] कर नहीं पाते। गोपियाँ ध्येय स्वरूप हैं— अरे, वे कृष्ण की भी ध्येय हैं। उद्धवजी का वह श्लोक है न—
या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-
र्योगेश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।
कृष्णस्य तद् भगवत: चरणारविन्दं
न्यस्तं स्तनेषु विजहु: परिरभ्य तापम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.62)
[स्वयं लक्ष्मीदेवी जिन श्रीकृष्ण की पदसेवा करती हैं, पूर्णकाम और आत्माराम बड़े-बड़े योगेश्वर तथा ब्रह्मा, शंकर आदि परम-समर्थ देवता, जिन श्रीकृष्ण के पादारविन्दों की सेवा करते हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों को रासलीला के समय साक्षात् रूप से अपने-अपने स्तनमण्डलोंपर रखकर और उनका आलिङ्गन करते हुए इन गोपियों ने अपने हृदय की विरह-व्यथा को शान्त किया था।] GVP
ब्रह्मा इत्यादि जिनका ध्यान करते हैं— ‘या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामैः’ — जिस लक्ष्मी की पूजा ब्रह्मा, शंकर आदि देवता लोग करते हैं और वे कृष्ण के चरणों को नहीं पा पाते। और गोपियाँ साक्षात् रूप से, बहुत धीरे-धीरे, डर-डर करके, संकोच के साथ उनके चरणकमलों को अपने स्तनों पर धारण करती हैं। योगी लोगों के लिए [कृष्ण के चरणकमल] ध्यान-गम्य नहीं है और यहाँ पर गोपियाँ [उन्हें साक्षात् अपने स्तनों पर धारण कर रही हैं।] कृष्ण को इसमें आनन्द हो रहा है। गोपियाँ सकुचा करके लज्जित हो रही हैं। क्यों? परमपुरुष जो कृष्ण हैं, वे उनका (गोपियों का) ध्यान करते हैं। किस प्रकार? उद्धवजी कहते हैं कि हम लोग बहुत उत्कृष्ट साधन के द्वारा [भी उन्हें] प्राप्त नहीं कर सकते। [उद्धवजी] कृष्ण [का कुछ] चिन्तन कर सकते हैं— किस कृष्ण का? द्वारकाधीश कृष्ण के चरणों का, ब्रज के कृष्ण का चिन्तन नहीं कर सकते। उसीके लिए वे कहते हैं कि मैं नहीं कर सकता। [इसलिए गोपियों के लिए क्या कहते हैं—] ‘आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने’ [#3]
[उद्धवजी प्रार्थना कर रहे हैं— “क्या] कभी हमको दर्शन करने का सौभाग्य मिल जायेगा—जहाँ पर गोपियाँ कृष्ण से अभिसार कर रही हैं? और उनके चरणों की धूलि बनने के लिए, [उसे] ग्रहण करने के लिए हम लोग गुल्म-लता हो जायें।” किन्तु उनके लिए [वह प्रेम प्राप्त करना] सम्भवपर नहीं। इसलिये तृण-गुल्म का जन्म लिया। अभी सुनते हैं कि उद्धवजी वहाँ पर तृण-गुल्म जन्म ले करके उसके लिए तपस्या कर रहे हैं। अर्थात् गोपियों ने कृष्ण का जो असाधारण प्रेम [प्राप्त किया है— वह] प्रेम दूसरों के लिए [तो] दुर्लभ है ही, उद्धवजी के लिए भी [दुर्लभ है।]
उद्धवजी श्रेष्ठ हैं कि ब्रह्माजी श्रेष्ठ हैं? Who is superior—Brahmā or Uddhava?
भक्त: उद्धव
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Why? Brahmā has four mouths. [क्यों? ब्रह्मा के चार मुख हैं।]
And Uddhava is superior or Kubjā is superior? Who is superior? Who? Uddhava is superior or Kubjā?
[उद्धव श्रेष्ठ हैं या कुब्जा? श्रेष्ठ कौन है—उद्धव या कुब्जा?]
भक्त: उद्धव
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Never. Kubjā gave him (Uddhava) an āsana to sit and he did praṇāma to the āsana and he sat outside the room where Kubjā was with Kṛṣṇa. So how can you tell [that Uddhava is superior to Kubjā.] Because Kubjā has parakīyā-mood.
[कभी नहीं। कुब्जा ने उन्हें (उद्धव को) बैठने के लिए आसन दिया, और उद्धव ने उस आसन को प्रणाम किया तथा उस कक्ष के बाहर बैठ गये, जिसमें कुब्जा कृष्ण के साथ थीं। तो आप कैसे कह सकते हैं कि उद्धव कुब्जा से श्रेष्ठ हैं? क्योंकि कुब्जा में परकीय-भाव है।]
भक्त: महाराजजी, इसकी तो साधारण-रति है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कुब्जा की साधारण-रति] होने से भी इतना है, तो जो असाधारण गोपियों का हो जाये तो फिर…! (कुब्जा की साधारण-रति होने पर भी उद्धव का कुब्जा के ही प्रति इतना भाव है, तो जो असाधारण गोपियों के प्रति कैसा भाव होगा !)
श्रीपाद माधव महाराज: उद्धवजी ब्रज में गये और [उन्होंने] गोपियों का ये सब [माहात्म्य] देखा। [किन्तु] कुब्जा का कभी ऐसा सौभाग्य होगा?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कौन?
श्रीपाद माधव महाराज: उद्धव को। उद्धवजी ब्रज में गये…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धव समझा नहीं कुछ, इन्होंने (कुब्जा ने) समझा। देखो, इस चीज़ को समझो—साधारणी होने पर भी कुब्जा का किसी पर-पुरुष से सङ्ग नहीं हुआ।
भक्त: महाराजजी, वह कुबड़ी थी, इसलिये नहीं हुआ।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और यदि वह ब्रज में रहती, कुबड़ी नहीं होती तो?
श्रीपाद तीर्थ महाराज: और जब सोलह वर्ष के बाद में सारा जीवन षोड़शी बन गयी?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अच्छा, तो ये कुब्जा साधारणी होने पर भी कृष्ण के प्रति समर्पित-चित्त है और किसीके प्रति नहीं है। थोड़ा-सा दोष ये है कि जो वह अपना सुख [चाहती है।]
श्रीपाद माधव महाराज: स्वसुखवासना है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसलिये उसको स्वकीया भी नहीं कहेंगे। स्वकीया नहीं है, परकीया का एक आभास उसमें है। इसलिये उसको साधारण मत समझो। उद्धवजी में पारकीय का आभास भी नहीं है।
अच्छा।
[रुक्मिणीजी] कह रही हैं कि हम लोग कृष्ण की परिचर्या प्राप्त करके भी…
उद्धवजी दिन-रात कृष्ण के यहाँ रहते हैं। उनका पैर पलोटते हैं। यहाँ तक कि [कृष्ण जब] रुक्मिणी प्रभृति [महिषियों] के घरों में भी जाते हैं, तो कभी–कभी उद्धवजी को लेकर जाते हैं।
[रुक्मिणीजी दिन-रात कृष्ण की सेवा करती हैं,] फिर भी वे कहती हैं— “हमारी परिचर्या के द्वारा भी गोपियों का जो अप्राकृत प्रेम है, वह हमें स्वछन्द [रूप से] प्राप्य नहीं है। हम लोग [गोपियों की भाँति कृष्ण को स्वछन्द रूप से] प्राप्त नहीं कर सकीं —[और] प्राप्त करने की आशा भी नहीं है।” क्यों? [क्योंकि उनके प्रेम में] कुछ ऐश्वर्य-भाव मिला हुआ है।
[रुक्मिणी ने स्वयं गोपियों के प्रेम का] इतना वर्णन किया, क्या वह कभी प्राप्त करेंगी? वह भी प्राप्त नहीं [कर सकतीं।] क्यों? [क्योंकि वह] एक रस में [स्थित] हैं; उनके लिए यह सम्भव नहीं।
सनातन गोस्वामीजी इस [विषय को] आगे खोल करके बतलायेंगे।
[18:13-28:15 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रुक्मिणीजी ये सब बातें कह रही हैं। और सनातन गोस्वामीजी उदाहरण के [रूप में] उद्धवजी इत्यादि की बात इसमें दे रहे हैं। रुक्मिणीजी उद्धवजी की बात नहीं कह रही हैं। ये कौन दे रहा है? सनातन गोस्वामी उस वस्तु को परिस्फुट कर रहे हैं।
रुक्मिणीजी और भी कह रही हैं— “इसलिये कृष्ण का गोपियों के प्रति जो भाव है, [गोपियों के प्रति जो] प्रेम-वश्यता है कि कृष्ण हम लोगों के प्रेम से वशीभूत न होकर गोपियों को अधिक प्रेम करते हैं— यह ठीक ही है। [गोपियों के प्रति कृष्ण का भाव हमारी तुलना में] उत्कृष्ट होना ही उचित है। पद्मावती ने कहा— “तुम लोग नीच हो; तुम्हारे प्रति कृष्ण का इतना प्रेम नहीं है।” वह जो कह रही है, ठीक ही कह रही होगी। हम लोग कहाँ गोपियों की तुलना में आयेंगी! हम उनकी बराबरी नहीं कर सकतीं। क्यों? [क्योंकि] हम लोग धर्म और कर्म में व्यग्रचित्त हैं।”
वर्णाश्रम-धर्म में पति के प्रति धर्म, पुत्रों का पालन—[इस प्रकार अनेक धर्मों का निर्वाह करना होता है।] रुक्मिणीजी के दस पुत्र और एक कन्या हैं, और [अन्य] सब [महिषियों] के भी ऐसे ही हैं। [किन्तु कुछ] गोपियों ने कृष्ण के लिए विवाह तक नहीं किया — [और जिनका विवाह हुआ,] न [उनके] पुत्र हैं, [न] पति के प्रति कोई [ममता है।] पति को तो वे छोड़ ही चुकी हैं। घर के प्रति [भी कोई] ममता नहीं है कि [झाड़ू]-बुहारन इत्यादि करें; कुछ भी [ममता] नहीं रखी। देह और दैहिक [सब कुछ भूल गयी हैं।] यहाँ तक कि कृष्ण के लिए कभी शृंगार भी नहीं करती हैं और कभी-कभी करती हैं। कृष्ण के लिए ही उनका जीवन, तन, मन, धन, वर्णाश्रम धर्म—सब कुछ अर्पित है।
और रुक्मिणीजी का जब विवाह हुआ, तब तक तो ठीक थीं। विवाह होने के बाद में उन्होंने कृष्ण को अपना सर्वस्व दिया और कृष्ण ने भी उनको बहुत प्रेम किया। किन्तु कृष्ण का मन सब लोगों में बँटा हुआ है। ऐसे रुक्मिणी का चित्त भी [बहुतों में बँटा हुआ है।] एक पुत्र हुआ तो कृष्ण में जो प्रेम था, वह कम हो गया। किसलिये कम हो गया? [क्योंकि] अब उनका पुत्र के प्रति प्रेम, घर की सफाई और देखभाल में उनका प्रेम और कृष्ण में उनका प्रेम—[ये सब] तरह-तरह से बँट गया। [तब] कृष्ण को कितना मिला? और जब दस पुत्र हुए, तो दस भाग पुत्रों में [चले गया] और वर्णाश्रम-धर्म में एक ग्यारहवाँ [भाग गया] और कृष्ण में एक बारहवाँ भाग—[अर्थात्] कृष्ण को [केवल] बारहवाँ भाग मिला।
Understand? [Rukmiṇī could give] only 12th part [of her mind and heart to Kṛṣṇa.] Whereas gopīs—oh! only one full mind, full heart, full everything—they have given to Kṛṣṇa. Rukmiṇī cannot give [like that.] So she [herself] is telling [this—] “That is why gopīs are more superior than us.”
[समझे? रुक्मिणी कृष्ण को अपने मन और हृदय का केवल बारहवाँ भाग ही दे सकती हैं, जबकि गोपियाँ—अरे!—पूरा मन, पूरा हृदय, पूरा सर्वस्व कृष्ण को अर्पित कर चुकी हैं। रुक्मिणी उस प्रकार से नहीं दे सकतीं। इसलिये वे स्वयं कह रही हैं—“इसी कारण गोपियाँ हमसे भी अधिक श्रेष्ठ हैं।”]
[रुक्मिणीजी ने कहा—] “हम लोग कृष्ण की सेवा करती हैं—यह ठीक है। [किन्तु हम कृष्ण की] पति-भाव से सेवा करती हैं, क्योंकि हम विवाह-विधि से बँधी हुई हैं।”
विवाह क्यों हुआ? विवाह का कारण क्या था? नारदजी का आग्रह। नारदजी क्या करते थे? वे बचपन से ही [रुक्मिणीजी] के पास जाते थे और उन्हें कृष्ण की कथाएँ, कृष्ण के रूप, गुण, उनकी महिमा और उनके सौन्दर्य इत्यादि की बातें सुनाते थे। इसलिये [रुक्मिणीजी का] चित्त आकृष्ट हो गया और इसके बाद [उन्होंने] प्रण कर लिया कि वे कृष्ण से ही विवाह करेंगी और कृष्ण ने [उनसे] विवाह किया भी।
तो उनके प्रेम का कारण नारदजी और कथाओं का सुनना है। [किन्तु] गोपियों का [प्रेम] जन्म से ही है। किसीका ऐसा नहीं सुना जाता कि किसीने उन्हें कृष्ण के सम्बन्ध में बतलाया हो। जन्म हुआ उनका और बस, आँखें चार हुईं और बस प्रेम [हो गया।] इसलिये गोपियों का प्रेम अहैतुक है, इन लोगों का (महिषियों का) सहैतुक है।
इसलिये रुक्मिणीजी कह रही हैं— “हमारे प्रेम में कुछ हेतु है, उनके प्रेम में कोई हेतु नहीं है। हेतु क्या है? विशेष रूप से हम विवाह-बन्धन में बँधी हुई हैं, मर्यादा से बँधी हुई हैं।”
इस प्रकार रुक्मिणी देवी अपने साथ गोपियों की विपर्ययता बतला रही हैं—[अर्थात्] हममें और गोपियों में क्या अन्तर है, इस बात को बतला रही हैं। क्या बतला रही हैं?— “जैसे गोपियाँ ऐहिक और पारत्रिक (पारलौकिक) अशेष साध्य-साधनों की अपेक्षा से रहित हैं अर्थात् लौकिक-पारलौकिक जितने प्रकार के भी साध्य और साधन हैं, उन्हें गोपियों ने हाथ में तिल और गङ्गाजल लेकर जलाञ्जलि दे दी है—उन्हें उनसे कोई मतलब नहीं, कोई भी मतलब नहीं। और हम साध्य और साधन में व्यग्र हैं—हम लोग इसीमें व्यस्त हैं।”
[रुक्मिणी आदि महिषियाँ] सवेरे से शाम तक क्या [करती] हैं? घर के काम में, घर-गृहस्थी के काम में लगी रहती हैं, क्योंकि इसके बिना कृष्ण …
कृष्ण के पुत्र जो हैं—रुक्मिणी के कौन हैं? प्रद्युम्न?
भक्त: हाँ
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: प्रद्युम्न हैं न? प्रद्युम्न हैं, उनके पुत्र अनिरुद्ध भी हैं, और उनके साम्ब इत्यादि बहुत-से भाई भी हैं। यदि रुक्मिणीजी इन पुत्रों की सेवा न करें, उन्हें छोड़ दें और छोड़ करके [केवल] कृष्ण की सेवा करें—[क्या] ये सम्भव है? यह कभी भी सम्भव नहीं है। कृष्ण भी उनको दुत्कारेंगे। यह [हुआ] दूसरा अंक (number)।
पहला अंक यह हुआ—[गोपियों ने] जागतिक (लौकिक)-पारलौकिक समस्त प्रकार के साध्य-साधनों को जलाञ्जलि [दे दी है] और ये (महिषियाँ) उन्हीं में व्यग्र हैं। गोपियों ने विशुद्ध परम-प्रेम के साथ कृष्ण की रासक्रीड़ा आदि अनिर्वचनीय विलास-श्रेणी के द्वारा सेवा की। गोपियाँ क्या करती हैं? नाना प्रकार से जो कथनीय नहीं है, जो वाणी से नहीं कहा जा सकता, [उस विशेष विलास-श्रेणी द्वारा कृष्ण की सेवा की।] उसमें क्या? रासक्रीड़ा। रासक्रीड़ा माने सब क्रीड़ाओं का सार है।
भक्त: कुञ्ज-विलास
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सब, वह आगे बतलायेंगे।
गोपियाँ कृष्ण की सेवा करती हैं। महिषियाँ कुञ्ज-सेवा नहीं कर सकतीं—यह सम्भवपर नहीं है। [महिषियाँ] रास इत्यादि भी नहीं कर सकतीं। वेणुगीत भी वे नहीं कर सकतीं। हाँ, इसका कुछ थोड़ा-सा आभास—प्रेम-वैचित्त्य—वह कुररि पक्षी इत्यादि के [प्रसङ्ग में दिखाई देता] है। [#4]
तो हम लोग पति-भाव से सेवा करके गौरवान्वित होती हैं— “वाह! हमारा सौभाग्य है कि हम कृष्ण की पत्नी हुई हैं, [किन्तु] गोपियाँ उसको एकदम धिक्कृत करती हैं। हम लोगों की जो सेवा है, [वह उतने] बड़े प्रेम से नहीं है जितना प्रेम गोपियों का है। हम मान नहीं कर सकतीं।”
मान भी करेंगी तो कैसा मान? कृष्ण चुटकी बजायेंगे और डराएँगे, धमकाएँगे— “अरे, सत्राजित की कन्या! उसको घर से अभी निकालो, नहीं तो [वह यहाँ] आ जाये।” और दौड़कर [सत्यभामाजी] आ गयीं। रुक्मिणी के लिए तो वह एक तरह की मूर्च्छा-सी अवस्था होगी— वे बस रोयेंगी, कुछ करेंगी [नहीं], कुछ कहेंगी नहीं। जब चन्द्रावली की [ब्रजगोपी होते हुए भी] यह दशा है, तब फिर इनकी (रुक्मिणीजी का चन्द्रावली का प्रकाश होने पर) क्या ही बात कही जाये?
कहते हैं जैसे कौन से रस की विलास श्रेणी है… देखो, सनातन गोस्वामी [रस के गूढ़ विषय] बतला रहे हैं—जो नहीं कहना चाहिये, वह भी कह रहे हैं।
कभी कृष्ण रात में गोपियों के घर में [जाते थे—] कहाँ? जावट में। गोपियों के घर के पास ही एक बदरी (बेर) के पेड़ पर चढ़ गये और वहीं से मधुर-स्वर से कूहु-कूहु करने लगे। गोपियों की नींद खुल गयी। वे कहने [लगीं]— पक्षी की ऐसी मधुर आवाज़ तो हमने सुनी नहीं; ये मधुर आवाज़ किसकी है? तो कृष्ण उसमें भी ऐसे कुछ विचित्र ढङ्ग से कूहु-कूहु करने लगे, जिससे गोपियाँ समझ गयीं कि यह वही (कृष्ण) है। [फिर] कृष्ण ने कुछ ऐसा संकेत किया कि दरवाजा खोलो। धीरे-धीरे बिल्ली की भाँति पैर को दबाती हुईं, [उन्होंने] पैरों से पैजनियाँ निकाल करके रख दीं और घुँघरू निकाल दिये। यदि [निकाला नहीं] भी तो उसको बाँध दिया कि [घुँघरू] बोले नहीं, चुपचाप रहे। [फिर उन्होंने] दरवाजे को खोला और खोल करके कृष्ण से मिलीं। मिलकर गाढ़ आलिङ्गन के द्वारा कृष्ण को सुखी किया।
ये [रुक्मिणीजी] कहती हैं— “देखो तो…”
सनातन गोस्वामी [ने यह उपरोक्त] उपमा दे करके बतलाया है। [क्या] रुक्मिणी इत्यादि के लिए सम्भव है कि वे [इस प्रकार] छिप करके प्रेम करें? जो प्रेम जितना छिप करके होगा, वह [उतना ही] दुर्लभ होगा। जिसमें निषेधात्मक भावना रहेगी, वह प्रेम उन्नत है। कृष्ण तो रुक्मिणी-सत्यभामा के लिए दिन-रात उपलब्ध हैं। उनको रुक्मिणी-सत्यभामा के लिए अभिसार करने की आवश्यकता नहीं। कोई कहनेवाला है [या] वसुदेव-देवकी [कहेंगे] कि उधर मत जाओ, रुक्मिणी के भवन में [मत जाओ।] वे तो दिन-रात वहीं रहते हैं। इसलिये वह कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है।
और देखो, कभी-कभी दिन में भी कृष्ण यमुना पुलिन में गैया चराने के बहाने वहाँ निकुञ्ज में आकर अभिसार करते हैं। कोमल-कोमल आम्र-पत्तों और फूलों से—जिनमें काँटे-फाँटे नहीं होते—ऐसे-ऐसे गुलाब और कमल के फूलों की शैय्या [सजाकर] रखते हैं। उसपर चन्दन बिछाते हैं। यह सब तो गोपियाँ करती हैं, किन्तु कृष्ण भी कभी-कभी [ऐसा करते हैं] और गोपियों की प्रतीक्षा करते हैं।
यदि पेड़ से हवा के झोंके से कोई सूखी पत्ती गिर पड़ती है, या हवा से कोई पत्ती कड़मड़-कड़मड़ कर कोई शब्द करती है, तो कृष्ण कहते हैं— “आ गयी क्या? गोपियाँ आ गयीं?, गोपी आ गयी क्या?” रास्ते [की ओर] मुख करके देखते हैं। कभी आगे जा करके देखते हैं— “क्यों विलम्ब हो रहा है?” सुबल [से कहते हैं—] “जरा जाओ तो! देखो तो!” सह नहीं सकते, जैसे गोपियों को [विरह] होता है, [कृष्ण को भी वैसे ही विरह होता है।] मधुमङ्गल को भेजते हैं। सूखे पत्ते गिरने पर भी सोचते हैं कि प्रियतमा आ गयीं—चकित हो जाते हैं।
और गोपियाँ क्या करती हैं? यमुना-जल लाने के लिए घर से घड़े लेकर जाती हैं और कहाँ पर? गोपीघाट। गोपीघाट कहाँ है? खेलनवन में। वहाँ गोपियाँ घड़े ले करके जाती हैं और कृष्ण किसी न किसी प्रकार वहाँ पहुँच जाते हैं। वह घड़ा पानी से तो भरा नहीं, किन्तु प्रेम से पूरा भर गया। शून्य ही लौट रही हैं, [अर्थात्] वे खाली घड़े को ही लेकर लौट रही हैं। उन्हें कोई सुध-बुध नहीं, किन्तु उनका हृदयरूपी घड़ा प्रेम से भरा हुआ होता है और वे कृष्ण से मिलती हैं।
कभी-कभी प्रदोष में… प्रदोष माने सन्ध्या का समय। जब दिन छिप जाता है और रात होना आरम्भ होती है, उसको प्रदोष कहते हैं। अब इस समय प्रदोष है। This time is Pradoṣa. उस समय कृष्ण वेणुनाद से संकेत करते हैं। जब [कृष्ण] वेणु बजाते हैं और ‘क्लीं’ शब्द के उच्चारण से सब गोपियों को बुलाने लगते हैं, उस समय [गोपियाँ] उन्मादिनी हो उठती हैं—परम उन्मादिनी! कैसे? जो [गोपी] रोटी पका रही होती है, [वेणुनाद को श्रवणकर] रोटी पकाना छोड़ देती है; तवे पर रोटी जल जाती है। कोई दलिया बना रही है, तो वह भी वहीं पर जल गया। कोई अपना अञ्जन कर रही होती है, तो एक ही आँख में अञ्जन किया; वहीं से भागी। कोई सोने का हार कमर में पहन लेती है, कमर का [आभूषण] पैर में पहन लिया। मन ही नहीं है, उन्मादिनी बन गयीं। केशपाश अभी ठीक नहीं किया। जैसे कहते हैं अलुलायित [हवा में हिलते हुए बाल] रूप में ही हैं , विपर्यय-भाव से और उलटे-पुलटे शृंगार इत्यादि करती हैं।
राधाजी अभी एक आँख में अञ्जन लगा रही थीं—थोड़ा-सा लगाया, दूसरी में नहीं—और [उसी समय] कृष्ण ने वंशी बजाकर बुलाया। बस [वे वैसे ही] आँजनौक में पहुँच गयीं।
कृष्ण ने कहा— “देवी! आप पधारीं, किन्तु एक ही आँख में अञ्जन क्यों है?”
तब ललिता सखी और विशाखाजी ने कहा— “हम लोग दे ही रही थीं [किन्तु] करने नहीं दिया, बीच ही में उठ करके चल पड़ीं।” तब कृष्ण ने स्वयं अञ्जन लेकर लगा दिया।
ये [गोपियाँ देखो] कैसी [हैं! क्या] रुक्मिणी का स्वभाव गोपियों के जैसा हो सकता है? नहीं हो सकता। यही प्रेम सौभाग्यवान जीवों के लिए जीवन का उद्देश्य है।
[वेणुनाद श्रवणकर] सब [गोपियाँ] कृष्ण के समीप गयीं। कृष्ण ने कहा— “वाह! वाह! बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर! मैं भगवान हूँ न—मेरा दर्शन तो [आपने] अब कर ही लिया। और यहाँ के यमुना-पुलिन को देखने के लिए [आप सब] आयी थीं, तो ये भी देख लिया—कितना सुन्दर रङ्ग है, मयूर नृत्य कर रहे हैं, कोयलें कुहक रही हैं— ये भी आपने देख लिया। अब आप लोग घर में पधारें। स्त्री का धर्म है— पति की सेवा करना। चाहे [पति] लँगड़ा-लूला, कोढ़ी, जैसा भी हो—उसकी सेवा करना उचित है। घर में जाओ और पतियों की सेवा करो, नहीं तो नरक होगा और इस काल में भी, इस जीवन में भी दुःख होगा। कोई भी उसको अच्छा नहीं कहेगा, सब लोग उसको धिक्कारेंगे और परजन्म में भी ऐसी दुर्दशा होगी।”
पहले गोपियाँ बड़ी दुःखी हुईं, किन्तु जब समझीं कि ये ठिठोली कर रहे हैं—ठिठोली माने क्या?
भक्त: परिहास
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परिहास कर रहे हैं, तो उन्होंने भी परिहास आरम्भ कर दिया।
[गोपियाँ कहने लगीं—] “भला आपके जैसे गुरु को छोड़कर हम कहाँ जायें? आपके जैसे चमत्कार [अद्भुत] गुरु मिले हैं, जो इतने सुन्दर उपदेश दे रहे हैं—पतियों की सेवा के लिए। यह तो बहुत सुन्दर उपदेश है। तो पहले हम ऐसे गुरु की पूजा कर लें, तब अपने पतियों की सेवा कर लेंगे। और पति कौन है? जो पालन-पोषण करता है। वह [हमारे] पति तो करते नहीं, आप ही करते हैं। इसलिये आप हमारे पति भी हैं, गुरु भी हैं—दोनों रूपों में हैं।”
इस [प्रकार गोपियाँ] कृष्ण का मुख बन्द कर देती हैं। अन्त में उनके पास…
[45:22- 59:19 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Tomorrow also we will continue the same thing what Rukmiṇī has told and then Satyabhāmā will tell something. This is most important—[even] more than [what] Rukmiṇī [has said.] So you should be prepared for that.
[कल भी हम रुक्मिणी द्वारा कही गयी उसी बात को आगे बढ़ायेंगे, और फिर सत्यभामा कुछ कहेंगी। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है, रुक्मिणी के वचनों से भी अधिक। इसलिये आपको उसके लिए प्रस्तुत रहना चाहिये।]
Tomorrow is also Daśaharā, [the appearance day of] Madhvācārya, and Rāma-vijaya [Mahotsava.]
[कल दशहरा भी है—मध्वाचार्य का आविर्भाव-दिवस, तथा राम-विजय महोत्सव (विजय-दशमी)।]
भक्त: (बङ्गाली भाषा में...) आज ही था।
अन्य भक्त: Today is Daśaharā [दशहरा आज है।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ओह! आज [विजयदशमी है।] हनुमानजी ने लंका को जलाया और सीताजी से अंगूठी लेकर आये और उसे रामचन्द्रजी को दिया। कहाँ पर दिया? किष्किन्धा में, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वर्षा ऋतु समाप्त हो गयी थी। जब हनुमानजी आये, [रामचन्द्रजी को सीताजी की अंगूठी] दी और यह पता लग गया कि रावण समुद्र पार करके लंका में है, तो रामचन्द्रजी ने सुग्रीवजी, अङ्गद, नल, नील और-और सबसे विचार करके आज के ही दिन किष्किन्धा से रावण को पराजित करने के लिए—लंका-विजय के लिए—यात्रा [प्रारम्भ] की। इसलिये हमारे यहाँ क्षत्रिय लोग अपने-अपने अस्त्रों को धार देते थे। अभी भी कहीं-कहीं पर यह प्रचलन है—अपने हथियारों को सब…
श्रीपाद माधव महाराज: गाँवों में अभी भी करते हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अभी भी करते हैं, और हमारे यहाँ राम की लीला होती है। यद्यपि [सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोग] आज के दिन रावण का दहन करते हैं—[रावण-वध] की स्मृति में यह होता है, किन्तु रामचन्द्रजी ने आज के दिन रावण को नहीं मारा था। आज के दिन तो उन्होंने [लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए] कूच किया था।
राम और रावण का युद्ध सत्ताईस दिन या कितने दिन चला था। वह जाकर पूरा हुआ कब? चैत्र मास में नवमी से एक दिन या दो दिन पहले। इसलिये बिना एक दिन की भी देरी (late) किये रामचन्द्रजी पुष्पक-विमान से मन की गति से भी अधिक [वेग से] अयोध्या पहुँचे, और [रावण-वध के] दूसरे-तीसरे दिन [बाद अर्थात् रामनवमी के दिन ही] उनका राज्याभिषेक हुआ। इसलिये यह राम का विजयोत्सव है—राम ने [आज] विजय के लिए यात्रा की थी। साधारण लोग इसमें राम का कुछ नहीं करते। वे देवी की—नौ दुर्गा की नौ दिवस की पूजा करते हैं। बङ्गाली जाति बहुत चालाक और चतुर है। यदि [उनकी] कृष्ण-भक्ति हुई, तब तो वे एकदम चरम सीमा तक उन्नत रहेंगे; और [यदि] नहीं, तो वे लोगों को ऐसे फँसा करके देवी की पूजा कराने में लगा देंगे जैसाकि किसने किया?
श्रीपाद तीर्थ महाराज: कृत्तिवास ने।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृत्तिवास ने। आज से लगभग ढाई सौ वर्ष पहले तक बङ्गाल में यह नौ-दुर्गा की पूजा नहीं थी, न भारतवर्ष में। इन लोगों ने ही इसका प्रचलन किया, [जिससे] मथुरा जैसी पुरी में, ब्रज में, वृन्दावन में और पंजाब में—सर्वत्र उसकी पूजा हो सके। किन्तु यह राम की पूजा का दिन है, उनकी यात्रा का दिन है, राम की लीलाओं को स्मरण करने का दिन है। रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण लोग पढ़ें और सुनें किन्तु उल्टा हो गया। इसलिये मध्वाचार्यजी हमारे ऊपर में कृपा करें। [आज] उनका आविर्भाव है। वे हमारे सम्प्रदाय के गुरु हैं, ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय सम्प्रदाय के आचार्य हैं। उनके सम्बन्ध में कहना तो बहुत था, किन्तु अब समय नहीं है। अब कल जैसा होगा। कल भी तो [कोई तिथि है—] कल क्या है?
भक्त: एकादशी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एकादशी है, कोई बात नहीं। रुक्मिणीजी ने जो कहा है, वह सब तो हम वर्णन कर चुके हैं। [कल हम लोग] रुक्मिणीजी की शेष बात को समाप्त करेंगे तथा सत्यभामाजी बिगड़ करके चली गयी हैं—उसके सम्बन्ध में हम लोग कहेंगे।
मैं समझता हूँ कि कार्तिक के महीने में सवेरे के समय, पहले ही दिन से दामोदराष्टक [का पाठ करेंगे] और एक-दो दिन में ही [उसे] समाप्त कर देंगे—अधिक दिन नहीं लेंगे, [क्योंकि यह] प्रतिवर्ष तो होता ही है। और उसके बाद में श्रीमन:शिक्षा है, या शिक्षाष्टक है, उपदेशामृत है, या सबसे अधिक अच्छा है कि भजनरहस्य [का पाठ करेंगे।] उसका कुछ भाग हमने किया है, [कुछ भाग] बाकी रह गया है। ‘मधुरेण समापयेत्’ मधुर [भाग] बाकी रह गया है, तो उसके सम्बन्ध में हम लोग वर्णन करेंगे। साधन-भजन कैसे होता है और कैसे कृष्ण का प्रेम मिल सकता है—इस प्रकार से हम लोग उसका वर्णन करेंगे।
I have spoken about Madhvācārya. He is our guru. Rāmānuja, Madhvācārya, Viṣṇusvāmī and Nimbāditya [are the four ācāryas of the four sampradāyas.] So Madhvācārya [is the ācārya] of our Brahma–Madhva–Gauḍīya Vaiṣṇava sampradāya. Today is his auspicious birthday.
[मैंने मध्वाचार्यजी के विषय में कहा है। वे हमारे गुरु हैं। रामानुज, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी और निम्बादित्य—ये चारों चार सम्प्रदायों के आचार्य हैं। अतः मध्वाचार्य हमारे ब्रह्म–माध्व–गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य हैं। आज उनका शुभ आविर्भाव-दिवस है।]
We have done prasādam and everything here. Today this is the day when Śrī Rāma [came to] know from Hanumān that Sītā was in Laṅkā, and he saw the ring of Sītā-devī, which was given by Rāma Himself. And then Rāma told all the monkeys under the guidance of Sugrīva and others— “Today we will have to go to invade Laṅkā.”
[हमने यहाँ प्रसाद आदि सब कुछ किया है। आज ही के दिन श्रीराम को हनुमान से यह ज्ञात हुआ कि सीताजी लंका में हैं, और उन्होंने सीता-देवी की अंगूठी देखी, जो स्वयं राम ने दी थी। तब राम ने सुग्रीव आदि के मार्गदर्शन में सभी वानरों से कहा—“आज हमें लंका पर विजय प्राप्त करने जाना होगा।”]
So with millions and millions of monkeys and bears, He started [his journey to invade Laṅkā.] So this day is Vijaya-daśamī. It is not that Rāvaṇa was killed on this day—never. He was killed in Caitra-māsa, two or three days before Rāma-navami. Because on the first day Sītā was brought [back. On the] Second day Vibhīṣaṇa became king. Then they started and came to Nandīgrāma and from Nandīgrāma they came to Ayodhyā. On the second day rājya-tilaka was given to Rāma on the day of Rāma-navamī. So this is not the day [on which] Rāma killed Rāvaṇa. This is the day [on which] Śrī Rāmacandra started the journey to kill and conquer Rāvaṇa.
[इस प्रकार लाखों-करोड़ों वानरों और भालुओं के साथ उन्होंने लंका-विजय के लिए प्रस्थान किया। इसलिये यह दिन विजय-दशमी कहलाता है। यह ऐसा नहीं है कि रावण का वध इसी दिन हुआ—कदापि नहीं। रावण का वध चैत्र-मास में, राम-नवमी से दो-तीन दिन पहले हुआ था। क्योंकि पहले दिन सीता को वापस लाया गया। दूसरे दिन विभीषण का राज्याभिषेक हुआ। फिर वे नन्दीग्राम आये और नन्दीग्राम से अयोध्या पहुँचे। उसके दूसरे दिन अर्थात् रामनवमी के दिन राम का राज्याभिषेक (राजतिलक) हुआ। अतः यह वह दिन नहीं है जिस दिन राम ने रावण का वध किया, बल्कि यह वह दिन है जिस दिन श्रीरामचन्द्र ने रावण के वध और विजय प्राप्त करने के लिए अपनी यात्रा आरम्भ की।]
गौर प्रेमानन्दे!
[एक इटेलियन भक्त का वीज़ा खो जाने पर श्रील गुरुदेव द्वारा उसकी सहायता करना…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: One thing more, my dear sons…
भक्त: Daughters...
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: My dear sons and darling daughters, though I am Guru and I should not request, but I am requesting: please register your names. If you have no money, come to me; I will help you.
[मेरे प्रिय पुत्रों और प्यारी पुत्रियों, यद्यपि मैं गुरु हूँ और मुझे निवेदन नहीं करना चाहिये, फिर भी मैं निवेदन कर रहा हूँ— कृपया अपने नाम पञ्जीकृत कराइये। यदि आपके पास पैसे नहीं हैं, तो मेरे पास आ जाइये; मैं आपकी सहायता करूँगा।]
श्रीपाद माधव महाराज: They are objecting—no, you do not have to pay; they will pay by themselves.
[वे आपत्ति कर रहे हैं—नहीं, आपको भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है; वे स्वयं भुगतान करेंगे।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Understand? If you have no money, no harm—I will pay. So you should come to me, but surely you should register your name. And if you have some money to go to Jaipur, to come from Jaipur, to bring so many laddus, foodstuffs, water and all this for you, but you cannot give? This is serving of Kṛṣṇa and my guru service. But I want to tell you that if you have nothing, I must pay for it because when I go to your countries and to your houses, you give up everything for me. Why should I not? And that is why you are my darling daughters and dear sons. Thank you.
[समझे? यदि आपके पास पैसे नहीं हैं, तो कोई बात नहीं, मैं भुगतान कर दूँगा। इसलिये आप मेरे पास आ जाइये, परन्तु निश्चय ही अपना नाम पञ्जीकृत कराइये। और यदि आपके पास जयपुर जाने, जयपुर से आने और इतने सारे लड्डू, खाद्य-सामग्री, पानी आदि लाने के लिए पैसे हैं, तो क्या आप दे नहीं सकते? यह कृष्ण-सेवा है और मेरे गुरु की सेवा है। किन्तु मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूँ कि यदि आपके पास कुछ भी नहीं है, तो मुझे ही उसके लिए भुगतान करना होगा, क्योंकि जब मैं आपके देशों में और आपके घरों में जाता हूँ, तो आप मेरे लिए सब कुछ त्याग देते हैं। फिर मैं ऐसा क्यों न करूँ? इसी कारण आप मेरे प्रिय पुत्र और प्यारी पुत्रियाँ हैं। धन्यवाद।]
Tomorrow morning’s programme. From here we will go [to the place] where Kṛṣṇa used to (70:09 inaudible) for cows grazing. You should see that place. Now there are some rooms and everything has been made but in that place Kṛṣṇa used to graze cows also. Now there are so many devotees—oh, very pure devotees, very marvelous devotees—and they are all Brajavāsīs. They know how to receive and how to welcome Vaiṣṇavas. Some are from Khadiravana, some are from Gopī-ghāṭa, Khelanavana, some are from here and there—pure Brajavāsīs. I think anyone is here (71:02 inaudible.) So we will go there and you will see the etiquette of Vaiṣṇavas—how they receive and how they welcome.
[कल प्रातःकाल का कार्यक्रम: यहाँ से हम उस स्थान पर जायेंगे जहाँ कृष्ण गायें चराने जाया करते थे। आपको वह स्थान देखना चाहिये। अब वहाँ कुछ कमरे आदि बना दिए गये हैं, किन्तु उसी स्थान पर कृष्ण गायें चराते थे। अब वहाँ बहुत से भक्त हैं—अत्यन्त शुद्ध भक्त, अत्यन्त अद्भुत भक्त और वे सभी ब्रजवासी हैं। वे जानते हैं कि वैष्णवों का स्वागत कैसे करना है और कैसे आदर-सत्कार करना है। कुछ खदिरवन से हैं, कुछ गोपीघाट, खेलनवन से हैं, कुछ इधर-उधर से—सभी शुद्ध ब्रजवासी। तो हम वहाँ जायेंगे और आप वैष्णवों का सदाचार देखेंगे कि वे कैसे स्वागत करते हैं और कैसे आदर करते हैं।]
So I think you will go. Tomorrow there is not so much [distance] to go—only some houses—but all are purified by the lotus dust of Kṛṣṇa. When Kṛṣṇa was coming, He was in tour in all the states everywhere and what the Yādavīs were telling—glorifying gopis. So you should go also.
[मुझे लगता है कि आप अवश्य जायेंगे। कल बहुत दूर नहीं जाना है, केवल कुछ घरों तक किन्तु वे सभी स्थान कृष्ण के चरणकमलों की धूलि से पवित्र हैं। जब कृष्ण आते-जाते थे तो वे सर्वत्र विभिन्न प्रदेशों में विचरण करते थे, और यादव स्त्रियाँ क्या कहती थीं—गोपियों की महिमा का गान करती थीं। इसलिये आपको भी जाना चाहिये।]
I want to say that from tomorrow you will register all those—also the brahmacārīs and sannyāsīs. Whether those brahmacārīs who has given up whole life in this service of maṭha, they don’t have a single paisā—they must be given chance to do parikramā and those who have not done so and if they have money for them, for their own recreation, why they should not [pay?] So ask from your pure mind or heart that what should I do? And then do.
[मैं यह कहना चाहता हूँ कि कल से आप सभी के नाम पञ्जीकृत करेंगे—ब्रह्मचारी और संन्यासियों के भी। वे ब्रह्मचारी जिन्होंने अपना पूरा जीवन मठ की सेवा में अर्पित कर दिया है, जिनके पास एक पैसा भी नहीं है—उन्हें तो परिक्रमा करने का सुयोग अवश्य दिया जाना चाहिये। और जिन्होंने ऐसा नहीं किया है, तथा जिनके पास अपने मनोरञ्जन आदि के लिए पैसे हैं, वे भुगतान क्यों न करें?) अपने शुद्ध मन और हृदय से पूछिए कि मुझे क्या करना चाहिये। और तब उसके अनुसार कीजिये।]
भक्त: This is for their own benefit. [यह तो उनके अपने हित के लिए है।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: But I will have to manage so many buses, so many dharmaśālās, and [marketing.] So [please] try to understand our feelings also. I understand your feelings that you have no money, but when you came from there for a greed to do parikramā. So I will surely help, but you should also [try to understand.] Those who have something—they should [pay.]
[किन्तु मुझे इतनी सारी बसों, इतनी सारी धर्मशालाओं और अन्य व्यवस्थाओं का प्रबन्ध भी करना पड़ता है। इसलिये कृपया हमारी भावनाओं को भी समझने का प्रयास करें। मैं आपकी भावना समझता हूँ कि आपके पास पैसे नहीं हैं, फिर भी आप परिक्रमा करने के लोभ से वहाँ से आये हैं। इसलिये मैं निश्चय ही सहायता करूँगा, परन्तु आपको भी समझने का प्रयास करना चाहिये। जिनके पास कुछ है, उन्हें देना चाहिये।]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.22)
हे वल्लभाओ! मेरे साथ तुम्हारा जो संयोग है, वह निर्मल, निर्दोष एवं विशुद्ध प्रेममय है। तुमलोगों ने दुर्जय गृह-बन्धनों का छेदनकर मुझसे प्रेम किया है; इसके लिए मैं देवताओं के समान दीर्घायु प्राप्त करके भी उसका प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं हो सकता। तुम्हारे साधु-कृत्य एवं सौम्य स्वभाव मुझे उऋण कर सकते हैं, पर मैं तो तुम्हारे इस प्रेम का सर्वदा ऋणी ही हूँ। (GVP)
#2
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.16)
हे अच्युत! हम अपने पति, पुत्र, आत्मीय, स्वजन, भाई-बन्धुओं की आज्ञाओं एवं इच्छाओं का अतिक्रमण करके आपके पास आयी हैं। हे कितव (कपटी!) आप अच्छी तरह से जानते हैं कि हम आपकी वंशी के उच्च-गीत से मोहित-सी तथा विवेकशून्य-सी होकर यहाँ आयी हैं। हे अच्युत! यह सब जानकर भी आपके अतिरिक्त कौन ऐसा निष्ठुर एवं कपटी होगा, जो अर्धरात्रि में आयी नवयौवनाओं का इस प्रकार से परित्याग करेगा? (GVP)
#3
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.61)
मैं तो ऐसी प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस श्रीवृन्दावन में कोई गुल्म-लता या औषधि-जड़ी-बूटी रूप में जन्म ग्रहण करूँ, जिससे मुझे उन ब्रजाङ्गनाओं की चरणधूलि निरन्तर सेवन करने को मिलती रहे। उन ब्रजगोपियों ने दुस्त्यज (जिसे छोड़ना अत्यन्त कठिन है) स्वजन-सम्बन्धियों तथा वेद की आर्य-मर्यादा को परित्यागकर श्रीगोविन्द के उन चरणकमलों का भजन किया है, जिन्हें श्रुतियाँ अभी तक भी खोज रही हैं। (GVP)
#4
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोध:।
वयमिव सखी कच्चिद् गाढनिर्विद्धचेता
नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.90.15)
महिषियों ने कहा— “हे कुररी! अज्ञात-तत्त्व ईश्वर श्रीकृष्ण इस जगत् में अखण्ड-बोध छिपाकर रात्रिकाल में सोये हुए हैं। (पता नहीं, कहाँ सोये हैं) तुम्हें नींद नहीं आ रही क्या, जो तुम उनकी निद्रा भङ्ग करने के लिए विलाप कर रही हो, परन्तु वे शयन कर रहे हैं, अतः ऐसा करना उचित नहीं है। अथवा हे सखि! नलिन-नयन श्रीकृष्ण के मधुर हास्य एवं उदार तथा कौतुकमय लीला-चिन्तन से हमारे समान तुम्हारा चित्त भी अतिशयरूप से विद्ध हो गया है क्या?” (GVP)
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