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Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.84-89: Rukmini Glorifies the Gopis & Satyabhama's Sulky Anger Compared to Srimati Radhika's

54:08
#290
Mathura
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 75%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Sri Brhad-bhagavatamrtam Part 1, chapter 7, verses 84-89.
  • Rukmini acknowledges the superiority of the gopis' love for Krsna.
  • Who holds a higher position—Draupadi or Rukmini?
  • While Rukmini glorifies the gopis, Satyabhama finds it difficult to accept. She feels disheartened and sulks. Seeing this Krsna becomes visibly angry and demands that Satyabhama be brought before Him immediately.
  • Although Satyabhama is the most beloved (parama-priyata) of Krsna among the queens, she felt ashamed for sulking at an inappropriate moment. Fearful of Krsna's anger, she hid behind a pillar.
  • Srimati Radha’s mana is of the highest class, incomparable to any other. When Krsna attempted to break her sulky mood, she only became more indignant, intensifying her mana. Eventually, feeling remorseful for her stubbornness, Radha sent Visakha to pacify Krsna, continuing the sweet flow of transcendental pastimes.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.84-89: रुक्मिणी द्वारा गोपियों की स्तुति एवं श्रीमती राधिकाजी के उच्चतम मान की तुलना में सत्यभामा का मान

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 6 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रुक्मिणीजी कह रही हैं— “गोपियाँ हम लोगों से सब प्रकार से श्रेष्ठ हैं। उनके प्रति हमें मात्सर्य, ईर्ष्या, द्वेष नहीं होना चाहिये। जैसे [किसी] परम-उत्कृष्ट व्यक्ति के साथ में, उत्तम व्यक्ति के साथ में निकृष्ट व्यक्तियों का सापत्‍न्‍य [सौतपन] भाव अयोग्य है, [वैसे ही हमारे लिए भी गोपियों के प्रति ऐसा भाव रखना अनुचित है।]

Rukmiṇī is glorifying the gopīs, that in all respects the gopīs are superior most to us, in all ways, and we should not have any īrṣyā or dveṣa, any envy. I am very happy to hear all these things—that Kṛṣṇa loves the gopīs so much. So, I have no envy. Like, she is giving an example…

परम-उत्कृष्ट व्यक्तियों के साथ में निकृष्टजन का सापत्‍न्‍य-भाव अयोग्य है। [जैसे]—कोई एक राजरानी है और उसकी कोई दासी है। यदि स्वामी ने– पति ने, उस दासी को थोड़ा-सा प्रेम किया, तो यह [बहुत ही] अनुचित है, एक [दृष्टि] से। क्यों? एक दासी अपनी स्वामिनी की बराबरी कर सकती है? यह तो सम्भव नहीं। [दासी अपनी स्वामिनी की बराबरी] नहीं कर सकती। किन्तु एक बात है, यदि स्वामिनीजी का हृदय बहुत विशाल हो और उसका पति उस दासी की सेवा से प्रसन्न हो गया हो, तो उस [स्वामिनी को] बड़ी प्रसन्नता होगी कि ‘हमारी दासी ने हमारे प्रभु का चित्त प्रसन्न कर दिया।’ क्योंकि उसमें सापत्‍न्‍य-भाव नहीं है। बल्कि राजरानी उस [दासी के] भाव को देख करके बड़ी प्रसन्न होगी—किन्तु [इसके लिए] उसमें थोड़ी उदारता होनी चाहिए। उदारता नहीं होने से नहीं होगा।

[रुक्मिणीदेवी कह रही हैं—] “इसी प्रकार से हम दासियाँ हैं, और गोपियाँ क्या हैं? राजरानियाँ हैं। इसलिये [जब] हम दासियाँ देखती हैं कि हमारी स्वामिनी गोपियों और राधाजी को कृष्ण बहुत चाहते हैं, बहुत प्रेम करते हैं, तो हमको तो आनन्दित होना चाहिए। [वस्तुतः] यह श्रेष्ठ भाव [हमारे] प्रभु की प्रियजनों के प्रति अधीनता [स्वीकाररूप] माहात्म्य [को प्रकाश कर रहा है।] इसके द्वारा यह प्रसिद्ध होता है, यह सुसिद्ध होता है कि कृष्ण, जो हमारे प्रभु हैं और गोपियों के भी प्रभु हैं, वे प्रेम के अधीन हो जाते हैं। यही कृष्ण की विशेषता है कि छोटी-सी सेवा से भी वे अपने भक्तों के पराधीन बन जाते हैं। अथवा वे (गोपियाँ) हमारे स्वामी कृष्ण की अत्यन्त प्रियजन हैं और कृष्ण उनके अधीन हैं, उनके प्रेम के वशीभूत हैं—यह तो हमारे ही गौरव की बात है। यह मेरे [भी] गौरव की बात है। [इस प्रकार] स्वछन्द रूप में यह भाव प्रकाश करने के [कारण] हम लोग भी उसीको पाने की लालसा रखते हैं कि वैसा ही– गोपियों जैसा प्रेम हमको [भी प्राप्त] हो जाये।”

रुक्मिणीदेवी के बोलने का यही अभिप्राय है कि ‘गोपियाँ हमसे श्रेष्ठ (superior) हैं, हमसे उन्नत हैं। कृष्ण यदि उनके प्रेम से वशीभूत हो जाते हैं, तो यह परम गौरव की बात है। इसलिये गोपियाँ हमारी गौरव की पात्र हैं।’

यद्यपि रुक्मिणी, सत्यभामा [तथा अन्य महिषियों] की धर्म-कर्म [आदि विषयों में] कुछ भी आसक्ति नहीं है, किन्तु [फिर भी वे] कह रही हैं कि हम पुत्र-परिवार, धन में आसक्त हैं। [उन्होंने] पहले कहा, किन्तु वे कभी किसी भी धर्म-कर्म, किसी भी वस्तु, [यहाँ तक कि] पुत्र में भी आसक्त नहीं हैं। उन्‍होंने अपनी दीनता दिखलाने के लिए वैसा कहा। और यदि उनमें आसक्ति हो भी, तो [वह केवल] कृष्ण के लिए ही है। एक तो किसी में आसक्ति नहीं है, और यदि आसक्ति है तो कृष्ण [की सेवा] के लिए ही है, तो ऐसी भावना भगवद्‍-सेवा में सहायक होती है।

यदि कृष्ण के लिए किसीसे प्रेम किया जाये—जैसे द्रौपदी अपने पतियों को प्रेम करती हैं, किसलिए? कृष्ण के लिए, क्योंकि [उनके पतियों का] कृष्ण के लिए प्रेम हैं। ललिताजी, राधिकाजी को प्यारी हैं, किसलिए? [क्योंकि ललिताजी] कृष्ण की वैसी सेवा करती हैं। वे राधिकाजी को भी डाँट-डपटकर कृष्ण की सेवा में लगाती हैं। ऐसे ही सब। विशेषतः यह भजन का वैचित्र्य है तथापि रुक्मिणीदेवी गोपियों के समान सौभाग्य पाने के लिए ललकती हैं और अपने को अत्यन्त दीन-हीन मानती हैं—‘हाय! हाय! हमारा गोपियों जैसा कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं हुआ। हम उनके जैसी कृष्ण की सेवा नहीं कर सकतीं कि कृष्ण हमारे वशीभूत हो जायें।’

[9:14-13:08 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अब थोड़ा-सा विचार करके देखें—एक ओर द्रौपदी, जो पाण्डवों की पत्नी हैं और दूसरी ओर रुक्मिणी तथा सत्यभामा। भक्ति के तारतम्य के विचार से [देखें, तो] इन दोनों में कौन श्रेष्ठ है?

भक्त: रुक्मिणी, सत्यभामा

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh! You can think—Draupadī is very near and dear to Kṛṣṇa, and also Satyabhāmā and Rukmiṇī are very near and dear to Kṛṣṇa. Draupadī also, and [Satyabhāmā and Rukmiṇī also]. Can you think, who is superior among them? Who is superior?

भक्त: द्रौपदी

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Draupadī is superior?

श्रीपाद माधव महाराज: Rukmiṇī and Satyabhāmā are superior to Draupadī.

भक्त: द्रौपदी

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बाङ्गला भाषा में (तुमने द्रौपदी का पक्ष लिया है?)

भक्त: (14:12 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ब्रज-अरण्य! अरण्य-रोदनं! You should do rodana in araṇya.

श्रीपाद अरण्य महाराज: Krsna calls Draupadī sakhi, she has some mood inside right!

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: So, Draupadī is more superior.

Also, there are some reasons. When Draupadī went to Kurukṣetra, all the queens were there, and they were discussing this subject—“Oh! We are sixteen thousand one hundred and eight queens, but so many of us cannot control [even] one husband. Whereas Draupadī alone is controlling five husbands.” Not only five, but the sixth also! Who is the sixth?

[कुछ कारण और भी हैं। जब द्रौपदी कुरुक्षेत्र गयीं, उस समय सब रानियाँ वहाँ उपस्थित थीं, और वे सब इस विषय पर चर्चा कर रही थीं— “अरे! हम तो सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियाँ हैं, फिर भी हम इतनी रानियाँ मिलकर एक पति को भी वश में नहीं कर पातीं। किन्तु द्रौपदी अकेली ही पाँच पतियों को वश में कर रही है।” केवल पाँच ही नहीं, बल्कि छठे को भी! और वह छठा कौन है?]

श्रीपाद माधव महाराज: Kṛṣṇa himself. (स्वयं कृष्ण।)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Kṛṣṇa. She is controlling Kṛṣṇa also. So the queens asked this question—“Oh! How [do] you do [this]? Very wonderful you are! How you [do]?” And then Draupadī told so many things. It is written in Bhāgavatam—that the first thing is, to whom our husband likes [we should also like]

[कृष्ण। द्रौपदी कृष्ण को भी वश में करती हैं। तब रानियों ने यह प्रश्न किया—‘अरे! आप यह कैसे करती हैं? यह तो बड़ा अद्भुत है! तब द्रौपदीजी ने बहुत-सी बातें बतायीं। भागवत में सब लिखा है, सबसे पहली बात यह है कि हमारे पति जिनसे प्रीति करते हैं, हमें भी उनसे प्रीति करनी चाहिए।]

जिसको हमारे पति प्रेम करते हैं या चाहते हैं, उसीको हम भी प्रेम करते हैं। जिसको हमारे गुरु प्रेम करते हैं, उसीको [हम भी] प्रेम करेंगे, किन्तु यदि कोई गुरुजी का विरोधी है और [कोई शिष्य उस गुरु-विरोधी से] प्रेम करता है, तो वह गुरु का विरोधी है। यदि विरोधी नहीं है, तो अन्तत: वह मूर्ख अवश्य ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

Understanding you Araṇya? understanding?

श्रीपाद माधव महाराज: द्रौपदी (16:48 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: No, no… हमें विषय (subject) पर बोलने दो, नहीं तो फिर गड़बड़ हो जायेगा, भूल जायेंगे।

तो द्रौपदी कह रही हैं कि— “हम पति का मुख [का भाव] देख करके किसीसे प्रेम करती हैं, स्नेह करती हैं या आदर करती हैं। [यदि] पति का भाव उनके प्रति ठीक है, तो [हमारा भी] ठीक है। [यदि] पति उनको चाहते हैं, तो हम लोग [भी] उनको आदर करेंगे। और [यदि] पति के साथ में उसका कोई विरोध है, तो [चाहे वह] हमारा कोई भी प्रिय से प्रिय हो, ऐसे व्यक्ति के साथ [हमारा] कोई सम्बन्ध नहीं।” किन्तु यदि ऐसा होगा [कि गुरु-विरोधी के साथ प्रीति है] तो गुरु या कृष्ण समझेंगे कि हमारे विरोधी के साथ में इसकी प्रीति है—तो [फिर वे] क्या करेंगे?

भक्त: कृपादृष्टि बहुत दूर रहेगी।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तब भगवान् की कृपा-दृष्टि नहीं रहेगी, और न गुरु की कृपा रहेगी—वह छोड़ देंगे। मन-ही-मन छोड़ देंगे। ऊपर से चाहे जो भी [व्यवहार] करें, भीतर से छोड़ देंगे कि यह मूर्ख है, या यह भी वैसा ही है।

[द्रौपदी कह रही हैं]— “इसलिये मैं उसीको प्रिय मानती हूँ, जो कृष्ण का प्रिय है; और जो कृष्ण का प्रिय नहीं, उसको [मैं प्रिय] नहीं मानती। दूसरी बात, मैं पाँचों पतियों के उठने से पहले ही उठ जाती हूँ और उनकी सेवा की सब सामग्री ठीक कर रहती हूँ। एक सूची (list) बना लेती हूँ कि किसको क्या-क्या दान देना है। सारी वस्तुएँ ले करके मैं पाँचों पाण्‍डवों को देती हूँ कि ‘इस समय अब दान करने का समय है। स्नान का समय हो गया, स्नान कर लीजिये।’ उनके कपड़े मैं अपने हाथ से तैयार [करती हूँ] और उनका भोजन भी मैं अपने हाथों से बनाती हूँ, नौकरानी से नहीं।”

द्रौपदीजी सब समय भोजन अपने हाथ [से बनाती हैं।] तो इसी तरह से सेवक भी हो। गुरु के प्रति भी ऐसा [ही भाव] हो, और भगवान् के प्रति तो होना ही चाहिए। तब वह शिष्य जीवन में एक दिन वैसा उन्नत हो सकता है और भगवान् की अनुभूति कर सकता है।

[द्रौपदी कह रही हैं]— “और उनके सो जाने के बाद मैं सब घर-गृहस्थी संभाल करके फिर सोती हूँ और उनसे पहले‌ ही फिर उठ [जाती हूँ।] मैं वही करती हूँ, जो वे लोग चाहते हैं। जो नहीं चाहते, मैं नहीं करती।”

Draupadī is saying— “What they want, I do only that. I follow the mood of Kṛṣṇa. Whatever Kṛṣṇa wants, I do. I never do anything which is opposite to Kṛṣṇa, and what they (five ) like, [that only] I do.”

Then the queens began to appreciate [her.] But one thing—Kṛṣṇa has told [Draupadī as] His sakhī, and she is controlling [Him.] But still, Rukmiṇī and Satyabhāmā are more-more superior. Why? [Because] Satyabhāmā has māna. I have never seen that Draupadī [ever expressed] any māna. All these things [are there.]

[फिर रानियाँ उनकी सराहना करने लगीं। पर एक बात है—कृष्ण ने द्रौपदी को अपनी सखी कहा है और वह उन्हें वशीभूत भी करती है। किन्तु फिर भी रुक्मिणी और सत्यभामा उनसे कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। क्यों? क्योंकि सत्यभामा में ‘मान’ है। मैंने कभी नहीं देखा कि द्रौपदी ने कभी कोई मान किया हो। ऐसी अनेक बातें हैं।]

श्रीपाद माधव महाराज: भक्ति का स्वभाव है– दीनभाव। जैसे [राधिकाजी कह रही हैं–] ‘न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ’[#1] तो रुक्मिणी, सत्यभामा दीनतावश द्रौपदी से ऐसा कह रही हैं। किन्‍तु [वास्तव में] रुक्मिणी, सत्यभामा का कृष्ण से कितना गहरा सम्बन्‍ध है!

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज : न, रुक्मिणी सत्यभामा ने जो कहा, वह बात भी ठीक थी। वह बात भी दीनता से ही नहीं [कही,] वह बात ठीक है, और इन लोगों का भी जो विचार है, वह भी ठीक है। द्रौपदी को मान नहीं होगा। यदि कृष्ण का कोई लड़का मर जाता, तो रुक्मिणी और सत्यभामा क्या करतीं?

भक्त: रोतीं

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रोतीं और कुछ करतीं? कृष्ण को धिक्कार देतीं। द्रौपदी [ऐसा] नहीं कर सकतीं।

श्रीपाद माधव महाराज: जब प्रद्युम्न को शंबरासुर हर के ले गया, तब तो इन लोगों ने कृष्ण को धिक्कार दिया नहीं? आपने कहा कि रुक्मिणी, सत्यभामा का बच्चा मर जाये, तो कृष्ण को धिक्कार देंगी, द्रौपदी का यह अधिकार नहीं, द्रौपदी [ने ऐसा] कभी किया नहीं।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अधिकार के कारण नहीं कह रहे हैं।

श्रीपाद माधव महाराज: वे तो कहेंगे नहीं ऐसा।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: जब प्रद्युम्न का जन्म हुआ, तो शंबरासुर ने उनका हरण कर लिया था, किन्‍तु उस समय रुक्मिणी ने कुछ नहीं कहा?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज : [हरण के समय प्रद्युम्न] तो रुक्मिणी के पास में थे, तब शंबरासुर ले करके चला गया। इसलिये यह कृष्ण का दोष नहीं हुआ। कृष्ण के पास रहता या वे लड़ने के लिए भेजते, तब तो होता, वे तो रुक्मिणी के घर में सोये हुए थे। किसके? अभी [प्रद्युम्न का] जन्म हुआ और साथ-ही-साथ में [शंबरासुर ले] गया। इसलिये तो वह अपने आप पर लज्जित हुयीं कि हमारे रहते हुए हमारा बेटा चला गया।

श्रीपाद माधव महाराज: ये सब रानियाँ को तो मिलकर कृष्ण को धिक्कार देना चाहिये था?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (हँसते हुए…) तुम युक्ति दो।

[22:25-26:09 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]

श्रीपाद माधव महाराज: यहाँ प्रश्न उठ सकता है—कौन श्रेष्ठ हैं, द्रौपदी या द्वारका की महिषियाँ?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Both are superior, both are superior. He (Mādhava Mahārāja) can not decide! (laughter in crowd) Even Kṛṣṇa cannot decide who is superior!

[दोनों ही श्रेष्ठ हैं, दोनों ही श्रेष्ठ हैं। वे (माधव महाराजजी) निर्णय नहीं कर सकते हैं, (भक्तलोग यह सुनकर हँसते हैं…) स्वयं कृष्ण भी यह निर्णय नहीं कर सकते कि कौन श्रेष्ठ है।

श्रीपाद माधव महाराज: स्वयं कृष्ण भी यह निर्णय नहीं कर पाते कि कौन श्रेष्ठ है। किन्‍तु हमें किसी को हीन या श्रेष्ठ न देखकर निष्पक्ष भाव से उचित विचार करना चाहिए। कृष्ण द्रौपदी को ‘सखी’ कहकर सम्बोधित करते हैं, जैसे वे ब्रज में गोपियों को ‘सखी’ कहा करते थे। किन्‍तु कृष्ण ने रुक्मिणी, सत्यभामा या अन्य महिषियों को कभी भी ‘सखी’ कहकर सम्बोधित नहीं किया। इसलिये द्रौपदी के सम्बन्‍ध में ऐसा प्रतीत होता है कि वहाँ पर थोड़ा परकीयभाव है। रुक्मिणी और सत्यभामा कृष्ण की प्रिय महिषियाँ हैं, और उनमें स्नेह, मान तथा प्रणय आदि प्रेम की उच्च स्थिति दिखायी देती है। हमने कभी नहीं देखा कि द्रौपदी को मान हुआ हो। जब दुःशासन उनके वस्त्रहरण कर रहा था और कृष्ण थोड़ी देर से प्रकट हुए, तब भी द्रौपदी ने मान नहीं किया। किन्‍तु सत्यभामा तो कई बार मानिनी हो जाती थीं।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: But one thing is to be considered—what [is that?] We should see whether the gradation of prema is higher in Draupadī or in Satyabhāmā. We see that sometimes Rukmiṇī, Satyabhāmā, and all these mahiṣīs enter into prema-vaicittya[#2]. They become like mad. They are thinking, “The kurarī pakṣī (bird) and others are feeling so much separation just like us.”

[The Mahiṣīs saying,] “O kurarī, why are you weeping? Oh! [It must be] because we are weeping for Kṛṣṇa.” But [actually,] they are sleeping side by side with Kṛṣṇa, and even they are thinking [in this way.] But Draupadī has no prema-vaicittya. This is [the difference.]

[परन्तु एक बात विचारणीय है—वह क्या? हमें देखना चाहिए कि प्रेम की उच्चतर अवस्था द्रौपदी में है या सत्यभामा में। हम देखते हैं कि कभी-कभी रुक्मिणी, सत्यभामा और ये सब महिषियाँ प्रेम-वैचित्त्य में प्रवेश करती हैं। वे पागल-सी हो जाती हैं। वे सोचती हैं—“कुररी पक्षी और अन्य भी हमारे समान ही विरह का अनुभव कर रहे हैं।”

महीषियाँ कहती हैं—“हे कुररी! तू क्यों रो रही है? ओह! अवश्य ही तू इसलिये रो रही है क्योंकि हम भी श्रीकृष्ण के लिए रो रहे हैं।” किन्तु वास्तविकता यह है कि वे तो श्रीकृष्ण के समीप, उनके साथ ही शय्या पर सो रही होती हैं, और फिर भी इस प्रकार सोचती रहती हैं। परन्तु द्रौपदी को कभी भी प्रेम-वैचित्त्य का अनुभव नहीं हुआ। यही [अन्तर] है।]

वहाँ पर जितनी भी महिषियाँ थीं, एक सत्यभामा को छोड़कर बाकी सबने रुक्मिणी की बात सुनकर [कहा]—“धन्य! धन्य! साधु! साधु! तुम ठीक कह रही हो।” [इस प्रकार] सभी लोगों ने अनुमोदन किया। केवल एक– सत्राजित की कन्या सत्यभामा, रुक्मिणी की बात को सह न सकीं कि गोपियाँ हम लोगों से भी अधिक कृष्ण की प्यारी हैं। वे यह नहीं सह सकीं। यह मान है। ये सत्यभामा का और लोगों से श्रेष्ठ होने का एक कारण है। रुक्मिणी इत्यादि से भी इनका वैशिष्ट्य है। श्रेष्ठ नहीं कहेंगे, वैशिष्ट्य कुछ है कि वे यह सह न सकीं।

और [उन्होंने] क्या किया?—“ओह! यदि सचमुच कृष्ण हम लोगों से अधिक गोपियों को ही प्रेम करते हैं, तो…” [सोचकर] वे मानभवन– कोपभवन में चली गयीं। वहाँ जाकर [उन्होंने] अपने अच्छे कपड़ों को, राजकीय वस्त्रों को और स्वर्ण-अलंकार [इत्यादि] सबको रख करके, गन्दे मलिन वसन पहन लिए और रोने लगीं। यह कौन कह रहा है?—उद्धव कृष्ण से कह रहे हैं कि “ऐसी घटना हुई और इसीलिए वे यहाँ नहीं हैं, क्योंकि अभी वे कोपभवन‌ में पड़ी हैं।” – ये उद्धवजी कह रहे हैं।

यहाँ [सत्यभामाजी] कोपभवन में चली गयीं। अब कृष्ण क्या करते हैं? ये ब्रज नहीं है। यहाँ (द्वारका में) पति-पत्नी की मर्यादा है। इसलिये गोपियाँ यदि होतीं, तो कृष्ण क्या करते? [उन्हें मनाने के लिए] चले जाते। अथवा दूसरा कोई अवसर (occasion) होता—जैसे पारिजात पुष्प के समय में, तो उनको मनाने के लिए प्रयत्न करते। क्यों? वह तो परस्पर रानियों में अपना ईर्ष्या-द्वेष था। किन्तु गोपियों के सम्बन्ध [में ईर्ष्या-द्वेष की बात] कृष्ण सह नहीं सकते। वे सुनते ही बस क्रोध में आतुर हो गये। बड़े क्रोधित हो गये और बोले।

परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं— “उद्धव की बातों को सुन करके कि क्यों सत्यभामा [वहाँ पर उपस्थित] नहीं हैं और अलंकारों को छोड़ करके कोपभवन में पड़ी हुयी हैं, [कृष्ण ने क्रोधपूर्वक आदेश दिया–]

She is now in, Where?

भक्त: Dark-room

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Dark-room? What is the meaning of kopa-bhavana?

भक्त: Anger-room

अन्य भक्त: Sulky-room

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Sulky-room. Because she cannot bear the glorification of the gopīs—that Kṛṣṇa will love them much more than His queens. That she could not tolerate, and [therefore] she went to the kopabhavana and began to weep there.

[क्योंकि वे गोपियों की महिमा सहन नहीं कर सकीं कि श्रीकृष्ण हम रानियों की अपेक्षा गोपियों को कहीं अधिक प्रेम करते हैं। इसे वे सह न सकीं और इसी कारण वे कोपभवन में चली गयीं और वहाँ जाकर रोने लगीं।]

महाराज परीक्षित् कह रहे हैं — ‘श्रीमद्‍गोपीजन-प्राणनाथः’

यहाँ पर एक बात [ध्यान] देने की है कि [महाराज परीक्षित्] कृष्ण को किस प्रकार सम्बोधित करते हैं? कृष्ण के लिए [उन्‍होंने]कहा— ‘गोपीजन-प्राणनाथः’। [इसका अर्थ हुआ—वे जो] गोपियों के प्राणनाथ हैं अथवा गोपियाँ ही जिनकी प्राण हैं, ऐसे जो गोपियों के नाथ हैं। दोनों [प्रकार] से अर्थ हो गया। गोपियों के प्राणधन अथवा गोपियाँ ही जिनका प्राणधन हैं— वे श्रीकृष्ण।

[श्रीमद्‍गोपीजन-प्राणनाथ कृष्ण ने] क्रोध से कहा— “महामूढ़ सत्राजित की कन्या सत्यभामा को शीघ्र पकड़ लाओ। ‘महामूढ़ सत्राजित की कन्या’—[सत्राजित महामूढ़ है,] तो उसकी बेटी भी महामूढ़ है। जैसा बाप वैसी बेटी। यह भी मूर्ख है, इसको भी विचार नहीं। और सत्राजित मूर्ख किसलिए? मैंने चोरी नहीं की, और [फिर भी उसने] मुझपर चोरी का आरोप लगाया। ऐसे ही ये [भी मूर्ख] है।”

बोलो तो, बोलो तो।

[34:03-37:25 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सत्यभामा कौन हैं? इसके लिए बतला रहे हैं– (बाङ्गला भाषा में) विदग्धा-रमणियों में श्रेष्ठ थीं।

विदग्ध माने क्या?— एक तो होता है चतुर और, एक [होता है] रसिक चतुर। [रसिक चतुर अर्थात्] प्रेम की परिपाटी के साथ में उल्टा-सीधा बोलना। ऐसी वे [सत्यभामा] अन्य रानियों से श्रेष्ठ थीं। [जब] उन्होंने सुना कि कृष्ण बहुत क्रोधित हो गये हैं और दासियों से कहा है —“जाओ, उसे पकड़ लाओ”—तो वे, जो रो रही थीं, सुनते ही उठ करके बैठ गईं और भूमि-शय्या छोड़ करके स्नान किया, अङ्ग-मार्जन किया, अलङ्कारों को पहन लिया और बड़ी शीघ्रता से एक खम्बे के पीछे– आड़ में खड़ी हो गयीं, जहाँ कृष्ण थे।

और ‘गोपीरति-लम्पट विदग्ध-शिरोमणि… सत्यभामा तो विदग्धा-रमणी हैं और कृष्ण कैसे हैं? विशेष रूप से (specially) गोपीरति-लम्पट विदग्ध-शिरोमणि धीरललित नायक कृष्ण। वे अपने पति को मान-सेवा-चातुर्य के द्वारा सन्तुष्ट करने की [चेष्टा करने लगीं।] मान-सेवा माने क्या? ये जो मान किया था, किसके लिए? कृष्ण की सेवा के लिए। किन्तु यह समझ में नहीं आयेगा– साधारण व्यक्ति को कि उनका मान भी कृष्ण की सेवा के लिए ही था।

भक्त: सत्यभामा का?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, कैसे? यदि वे मान नहीं करतीं, तो प्रेम के इतने-इतने जो गम्भीर विषय हैं, गोपियों का प्रेम कैसा अगाध है? — यह संसार में कोई नहीं जानता।

भक्त: सत्यभामा का मान क्या मदीयतामय है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ।

भक्त: गुरुजी! [उन्‍होंने] सेवा कैसे की?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [सत्यभामाजी ने] मान के द्वारा सेवा की। क्यों? कि कृष्ण को कुछ वक्रता ला करके, क्रोधित करा करके उनके मुख से गोपियों की प्रशंसा करवायी। अभी जो [कृष्ण] आगे [वर्णन] करेंगे।

[सत्यभामा] मान की सेवा [द्वारा कृष्ण को] सन्तुष्ट करने में प्रवृत्त हुयीं।

Understand what I told?

[40:20-43:40 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि [कोई] पूर्वपक्ष में यह कहे कि—“सत्यभामादेवी तो कृष्ण की परम प्रियतमा हैं, तो [फिर] उन्होंने कृष्ण के मन के विपरीत मान क्यों किया? यह तो उचित नहीं है”— [तो उसके उत्तर में] कहते हैं कि नहीं, सत्यभामादेवी कृष्ण की अत्यन्त परम प्रियतमा हैं, यह बात सत्य है, यह झूठ नहीं है, यह ठीक है। वे उनकी प्रियतमा ही हैं और उन्होंने जो किया, वह कृष्ण के विरोध में नहीं किया। उसका कारण बतला रहे हैं कि नागरशेखर कृष्ण ने प्रियजनों के प्रेमोत्कर्ष का वर्णन करके ही मानिनी का मान-भञ्‍जन किया। कृष्ण नागरशेखर हैं—मानिनी का मान-भञ्‍जन करने में उन्हें सुख होता है। जितना ही मानिनी मान करती है, उसका मान जितना ही दुर्जय होगा, कृष्ण को उतना ही आनन्द होता है। बार-बार वह चिढ़ती है, बार-बार [मान] करती है, तो भी उसको मनाने जाते हैं और [यदि] नहीं मानती है, तो भी [मनाते हैं।] यह रसिक का स्वभाव है।

‘संरम्भ’ माने?—बहाने। मान-भञ्‍जन के बहाने प्रियजन का उत्कर्ष वर्णन होगा। किसका [उत्कर्ष?—] गोपियों का। [श्रीकृष्ण] गोपियों का उत्कर्ष वर्णन कर रहे हैं, किसलिए? सत्यभामा के सामने गोपियों का हम जो [उत्कर्ष] वर्णन कर रहे हैं, उससे सत्यभामा ये सोचे, “हम कितनी तुच्छ हैं!” और इसीके द्वारा उसका मान-भञ्‍जन हो जाये।

आया समझ में? कृष्ण बड़े चतुर हैं, रसिक हैं, और सत्यभामा भी बड़ी रसिक हैं—इसीलिए उन्होंने मान किया। और कृष्ण को मान-भञ्‍जन करने में बड़ा आनन्द होता है। जितना मान दुरूह रहेगा, उतना ही उनको मनाने में आनन्द होता है। और ब्रज की गोपियों को मनाते-मनाते वे मान-[भञ्‍जन करने के] अभ्यस्त हो गये हैं, निपुण (Expert) [हो गये हैं।] इसलिये कृष्ण गोपियों की महत्ता वर्णन करने लगे, किसलिये? कि इसीसे इनका मान-भञ्‍जन होगा—“कहाँ‌ तुम और कहाँ गोपियाँ! उनसे तुम तुलना करने जा रही हो?” तो इसलिये उनका मान-भञ्‍जन हो जायेगा।

तो यह भी एक तरीका है। कृष्ण को क्रोध नहीं है किन्तु मान-भञ्‍जन करने का यह तरीका है कि थोड़ा-सा क्रोधित हो जाओ, जिससे इनके मान का पारा नीचे उतर जाये। इसलिये सत्यभामा को विदग्धा-रमणियों में श्रेष्ठ कहा गया है और कृष्ण को विदग्ध-चूड़ामणि कहा गया है। इसलिये जब सत्यभामा ने सुना कि कृष्ण [उनपर] बिगड़ गये हैं, झट अपने कपड़े बदल करके, शृङ्गार करके और वहाँ पर उपस्थित हो करके, खम्बे की आड़ में बैठ गयीं और तब फिर कृष्ण उनसे क्रोधित हो करके कहने लगे। वे खम्बे की आड़ में है, और उसीको सम्बोधन करते हुए, दूसरी रानियों को भी समझा रहे हैं। ‘झिके मेरे बौके शेखानो’ [#3] – ऐसे सत्यभामा के माध्यम से सबको [समझा रहे हैं।]

[47:45-51:15 तक श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: One day, at some time, Śrīmatī Rādhā has a very high class of māna—very high class! Kṛṣṇa again and again tried to break her sulky mood (māna) but [instead,] Rādhā’s māna was going up and up. In the last, Kṛṣṇa made his face like weeping and then He returned back.

When He returned back, then what happened?—Śrī Rādhikā began to lament– “Why did I do so? Why did I do so?”

Then she sent Viśākhā or any other one—[saying,] “Oh! Anyhow, by trick you should not tell that I am weeping or lamenting. Oh! But you should tell Him of my situation and anyhow by trick you should tell but Kṛṣṇa should not know that I have sent you.”

So that sakhī went. Kṛṣṇa told her, “I will not go. Tell her! Tell her!” And then, Kṛṣṇa came in disguise of that sakhī [to Rādhikā.] Rādhikā asked, “What Kṛṣṇa told?”

[The disguised Kṛṣṇa replied,] “He will not come. He will never come to you”

Then she became very puzzled and began to weep more and then Kṛṣṇa [revealed Himself and] showed that Oh! I am the same.

[एक दिन, किसी समय, श्रीमती राधा को बहुत उच्चकोटि का मान हुआ—बहुत ही उच्चकोटि का! कृष्ण बार-बार उनका मान-भञ्‍जन का प्रयास करते रहे, किन्तु राधाजी का मान तो और बढ़ता ही गया। अन्त में, कृष्ण ने अपना मुख रोने जैसा बना लिया और फिर लौट गये।

जब वे लौट गये, तब क्या हुआ?—श्रीराधिकाजी विलाप करने लगीं—“मैंने ऐसा क्यों किया? मैंने ऐसा क्यों किया?”

तब उन्होंने विशाखा या किसी अन्य सखी को यह कहते हुए भेजा– “अरे! तुम किसी उपाय से जाकर मेरी स्थिति कृष्ण को बताना किन्तु यह नहीं बताना कि मैं रो रही हूँ या विलाप कर रही हूँ। और ऐसा भी न हो कि कृष्ण को पता चल जाये कि मैंने तुम्हें भेजा है।”

तो वह सखी गयी। कृष्ण ने उससे कहा—“मैं नहीं जाऊँगा। उससे कह दो! कह दो!” और फिर कृष्ण उसी सखी के वेश में राधिका के पास आये।

राधिका ने पूछा—“कृष्ण ने क्या कहा?”

[वेश बदलकर आये कृष्ण ने उत्तर दिया–] “वह नहीं आयेंगे। वह कभी तुम्हारे पास नहीं आयेंगे।”

तब राधिका बहुत व्याकुल हो गयीं और और भी रोने लगीं। तभी कृष्ण ने अपने स्वरूप को प्रकट कर दिखा दिया—“अरे! मैं ही वही हूँ।”]

गौर प्रेमानन्‍दे हरि हरि बोल!

Tomorrow you should follow in the morning. I have told you in English. So in the morning you should follow Tīrtha Mahārāja. Tomorrow…

कल कहाँ जा रहे हैं?

भक्त: (53:21 अस्पष्ट)

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (बंगाली भाषा में) अच्छा, परसों जन्मभूमि, दीर्घ-विष्णु, [मथुरादेवी] ये सब दर्शन के लिए जायेंगे और उसके अगले दिन वराह, श्वेत-वराह, [द्वारकाधीश] इत्यादि दर्शनों के लिए जायेंगे।

So, you should all follow Tīrtha Mahārāja, and tomorrow morning I will go to Delhi to have my teeth checked. It is very essential for me. I will return the next morning, on the eighth, and then I can begin my kathā again

[तो आप सबको तीर्थ महाराज का अनुसरण करना चाहिए। कल प्रातः मैं अपने दाँत की जाँच कराने के लिए दिल्ली जाऊँगा। यह मेरे लिए बहुत आवश्यक है। मैं अगले दिन प्रातः, आठ तारीख़ को लौट आऊँगा और फिर पुनः अपनी कथा आरम्भ कर सकूँगा।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ
क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम्।
वंशीविलास्याननलोकनं बिना
विभर्मि यत् प्राणपतङ्गकान् वृथा॥
-श्रीचैतन्यचरितामृतम् मध्यलीला (2.45)

हे सखि! कृष्ण के लिये मेरे हृदय में प्रेम की लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। तब मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने परम-सौभाग्य का प्रकाश करने के लिए ही करती हूँ। वंशीवदन कृष्ण के दर्शन के बिना मैं जो प्राणपतङ्ग धारण करती हूँ, वह व्यर्थ ही है। (IGVP)

#2
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोध:।
वयमिव सखी कच्चिद् गाढनिर्विद्धचेता
नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.90.15)

रानियों ने कहा– हे कुररी पक्षी! तुम विलाप कर रही हो। अब रात हो चुकी है, और इस संसार में कहीं गुप्त स्थान पर परमेश्वर सो रहे हैं। लेकिन हे सखा! तुम पूरी तरह जाग रहे हो, सो नहीं पा रहे हो। क्या ऐसा है कि हमारी तरह तुम्हारा हृदय भी कमलनयन भगवान् की उदार, चञ्‍चल मुस्कानभरी दृष्टि से छिन्न-भिन्न हो गया है? (BBT)

#3
‘झिके मेरे बौके शेखानो’ (jhike mere bouke shekhāno) — यह एक बंगाली कहावत है। इसका शाब्दिक अर्थ है– बेटी को मारकर बहू को सिखाना। और इसका भावार्थ है– किसी और को दिखावटी तौर पर डाँटना या दण्ड देना, पर वास्तविक सन्‍देश किसी और को देना।

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