Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.89: Understanding Different Types of Mana and Types of Bhakti
49:05This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Note: Abrupt start and end
- Once Narada went to Krsna's palace in Dvarka and offered him a few Parijat flowers. Krsna gave the flowers to Rukmini, his older queen, who was present there, and Satyabhama became angry.
- Why did Krsna endeavor to break Rukmini's sulky anger & not Satyabhama's?
- Srila Gurudeva said ladies have different moods in love. Is Satyabhama's anger breaking the regulations of married life?
- Krsna glorified gopis in the assembly of His queens.
- Krsna cannot repay the debt of the gopis; explained through SB 10.32.22 'na paraye ’ham niravadya-samyujam'.
- Bhakti is of two types: madhurya (in the mood of sweet human-like pastimes), aisvarya (in the mood of reverence).
- In madhurya, aisvarya is there but does not have any importance; it is disguised. Like Mother Yasoda saw the universe in the mouth of Krsna, but she never saw Krsna as Paramatma.
- Why Krsna did not travel to Vraja after he left for Mathura and hthen Dvaraka.
- One should pray like Srila Rupa Gosvami and Srila Narottama Thakura in order to realize the moods of the gopis.
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.89-95 : मान के भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा भक्ति के विविध प्रकार
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 8 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Control your minds and come with me to Dvārakā, into the palace of Rukmiṇī, where all the queens are gathered. But if you will not give your mind [with full] attention, you can not understand. First of all my heart…
[अपने मन को नियन्त्रित करो और मेरे साथ द्वारका में रुक्मिणी के महल में चलो, जहाँ समस्त रानियाँ एकत्रित हैं। किन्तु यदि आप लोग अपना मन पूर्ण ध्यान के साथ अर्पित नहीं करेंगे, तो आप लोग इसे समझ नहीं पायेंगे। सबसे पहले—मेरा हृदय…]
मेरी कोटि-कोटि दण्डवत् प्रणति, गुरुजी ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज के चरणों में, तत्पश्चात् मेरे शिक्षागुरु ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज [के चरणों में], और हमारी सम्पूर्ण गुरु-परम्परा—ब्रह्मा से लेकर गुरुदेव और श्रीभक्तिवेदान्त स्वामी महाराज तक। (and our whole Guru-paramparā, from Brahmā to our Gurudeva and Śrī Bhakti Vedānta Svāmī Mahārāja) सब गुरुओं को प्रणाम करके, फिर मैं [अपना] वक्तव्य यहाँ पर प्रकाशित कर रहा हूँ।
जब (when) कृष्ण ने कहा—“हे सत्राजित की कन्या, तू भी अपने पिता की तरह ही मूर्ख है,” [तब] सत्यभामाजी स्तम्भ के पीछे आड़ में खड़ी हो गयीं। वे मान [को प्रकाशित करके] कृष्ण की सेवा करने लगीं। इसके सम्बन्ध में हमने कल बहुत कुछ बताया था। उन्होंने असमय मान किया, जिससे कृष्ण को क्रोध हो गया।
[जब सत्यभामाजी ने] रुक्मिणीजी [के कारण कृष्ण से] मान किया, तो कृष्ण ने उनका मान भञ्जन किया, [किन्तु] यहाँ पर सत्यभामाजी को ब्रजवासियों से ईर्ष्या है, वे उनकी महिमा को सह नहीं सकीं, इसलिये [कृष्ण ने] पूर्ण क्रोध प्रकाश किया [और कहा—] “गोपियों से तुम लोगों की समता! [कभी सम्भव नहीं।”] किन्तु फिर भी [यहाँ पर सनातन गोस्वामीजी] कह रहे हैं कि सत्यभामाजी मान से सेवा करने लगीं। हमने कल बतलाया था—मान से सेवा करने का क्या अर्थ है? कृष्ण को मान-भञ्जन करना अच्छा लगता है। इसलिये उन्होंने मान किया।
और यहाँ कृष्ण मान-भञ्जन कैसे कर रहे हैं? जब [ब्रज में श्रीमती राधिका का] मान बहुत अधिक, गम्भीर और दुर्जय हो जाता है, तब वे [उनके चरणों में] अपनी वंशी दे देते हैं, उनके चरणों पर सिर रख देते हैं और कहते हैं—“मैं कल से ऐसा अपराध नहीं करूँगा।” अपनी वंशी का सहारा लेकर ऐसे समझाने की चेष्टा करते हैं। किन्तु [यहाँ] इनके मान को भञ्जन करने के लिए थोड़ा-सा क्रोध प्रकाश करना [ही पर्याप्त हो गया।] न मुरली की आवश्यकता हुई, न किसी और वस्तु की आवश्यकता हुई। इसलिये [सत्यभामाजी] खम्भे की आड़ में खड़ी होकर कृष्ण जो कह रहे हैं, उसे सुनने लगीं। कृष्ण ने देखा कि जब ये गोपियों की महिमा सुनेंगी, तो स्वयं समझ जायेंगी कि चींटी और हाथी में क्या अन्तर है? वे अपने आप समझ जायेंगी। इसलिये कृष्ण ने कहना आरम्भ किया।
अरे सात्राजिति क्षीणचित्ते मानो यथा त्वया।
क्रियते रुक्मिणीप्राप्तपारिजातादिहेतुकः॥
तथा व्रजजनेष्वस्मन्निर्भरप्रणयादपि।
अवरे किं न जानासि मां तदिच्छानुसारिणम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.90-91)
[श्रीभगवान् ने कहा—अरी संकीर्णचित्तवाली सात्राजिति (सत्राजितकी कन्या)! तुमने पहले रुक्मिणी के पारिजात प्राप्त करने के समय जिस प्रकार मान किया था, आज भी व्रजवासियों के प्रति मेरे चरम प्रेम को देखकर उसी प्रकार मान किया है? अरी बुद्धिहीने! मैं तो ब्रजवासियों की इच्छा के वशीभूत हूँ, क्या तुम इसको नहीं जानती हो?] GVP
“अरे सत्राजित की कन्या! जैसा सत्राजित है, वैसी ही तुम भी हो—चञ्चल-चित्तवाली हो। जिस प्रकार उसने मेरे ऊपर दोषारोपण किया और बोला— ‘इन्होंने ही वह मणि चुरा ली है,’ किन्तु मैं नहीं जानता था कि मणि किसने चुरायी है। फिर मैं जाम्बवान के पास से मणि और जाम्बवती को लेकर आया, तब पता चला कि मैं [दोषी] नहीं था; तब उनको ज्ञात हुआ।” सत्राजित [के भाई प्रसैन का वध एक सिंह ने किया था और उस सिंह का वध करके] जाम्बवान ने वह मणि ले ली थी। इस प्रकार से [कृष्ण ने कहा—] “अरे सात्राजिति! तुमने पहले भी रुक्मिणी के [पारिजात प्राप्त करने पर] मान किया था।”
जैसे एक समय द्वारका में कृष्ण रुक्मिणीजी और [अन्य] रानियों के बीच में बैठे हुए थे। उसी समय नारद ऋषि आये और स्वर्ग से एक पारिजात पुष्प लाये। पारिजात पुष्प का क्या गुण है? उसकी सङ्गत और सुगन्ध सब समय बढ़ती रहेगी। जिसके घर में रहेगा, जिसके पास रहेगा, वह नवयौवन सम्पन्न रहेगा; उसमें बल का सञ्चार होगा, कभी दुर्बलता नहीं आयेगी—इत्यादि उसके बहुत से गुण हैं।
[नारदजी ने वह] पारिजात पुष्प [कृष्ण को] दे दिया और कहा— “हे महाराज! आप कृपया मेरे सामने ही आपकी जो सबसे प्यारी, प्रियतमा रानी हो, उसे यह दे दीजिये।” कृष्ण ने सोचा— “यह झगड़ा लगायेगा; किसको दूँ?” नारदजी ने कहा— “महाराज, मुझे समय नहीं है, अभी जाना है; मेरे सामने दे दीजिये।” तो कृष्ण ने देखा कि सब रानियाँ [उपस्थित] हैं और सबके सामने ही वह पारिजात का पुष्प रुक्मिणीजी को दे दिया।
रुक्मिणीजी को तो बड़ा आनन्द हुआ, किन्तु वे गम्भीर हैं। [किन्तु] सत्यभामाजी से रहा नहीं गया। [वे मन-ही-मन सोचने लगीं—] “झूठा, चोर, धूर्त, मक्कार! कहता है कि तुम ही मेरी सबसे अधिक प्रिया हो और देने के समय में पारिजात पुष्प रुक्मिणी को दे दिया! तो फिर मैं प्रियतमा रह गयी? इसलिये झूठ बोलता है।” [सत्यभामाजी] मान-घर (कोप-भवन) में चली गयीं और सो गयीं। [नये] कपड़े-लत्ते हटा दिये, केवल पुराने वस्त्र [पहने] और अलंकार कुछ नहीं [पहने।] अलंकार सब छोड़ दिये।
बाद में जब कृष्ण [को पता चला तो] उन्होंने कहा— “यह तो मैं जानता था कि ऐसा ही होगा।” तो वे मान-भञ्जन करने के लिए उनके पास में गये, क्योंकि वे मान-भञ्जन किये बिना रहते नहीं है—क्योंकि वृन्दावन का अभ्यास है। इसलिये वहाँ पहुँच करके [देखा कि] वे कोप-भवन में पड़ी हुई बड़ी सिसक रही थीं और नागिन जैसी फुफकार रही थीं— “धूर्त, चोर, लम्पट” इत्यादि [कह रही थीं।] उसी समय कृष्ण गये और उनके शरीर पर हाथ रखा और सत्यभामाजी ने उसे फेंक (झटक) दिया। [कृष्ण बोले—] “सुनो तो मेरी बात।” [किन्तु वे] सुन नहीं रही थीं? [कृष्ण ने पुनः कहा—] “अरे, थोड़ी-सी मेरी बात तो सुनो! इतना क्रोध करने की क्या आवश्यकता है? अरे, एक पुष्प के लिए इतना [क्रोध!] तुम्हारे घर में पारिजात पुष्प का पेड़ ही लगा देंगे, सब समय पेड़ में नये-नये फूल रहेंगे।”
[सत्यभामाजी बोलीं—] “झूठ!” आप कभी ऐसा नहीं कर सकते।”
[कृष्ण ने कहा—] “अच्छा उठो, खड़ी हो जाओ और शृङ्गार करके आ जाओ।” और फिर उन्होंने स्नान करके शृङ्गार किया और शृङ्गार करके जब आयीं, तो [कृष्ण ने] उनको गरुड़ पर बैठा लिया और देवलोक चले गये। वहाँ देवताओं को परास्त करके बलपूर्वक वह पेड़ ही उखाड़ लाये और उधर में साथ-साथ नरकासुर का वध भी किया—एक ही साथ।
[तो कृष्ण कह रहे हैं—] “तो उस समय भी इसने [मान] किया। और जब मैंने पारिजात वृक्ष सत्यभामा के घर में लगाया, उस समय सत्यभामा ने रुक्मिणी और सब रानियों को भी निमन्त्रित किया। सभी आयीं, रुक्मिणी भी आयी, किन्तु उनको ऐसा मान नहीं हुआ कि इन्हें तो [पूरा पारिजात का] पेड़ दे दिया और मुझे एक ही पुष्प दिया। [उन्हें ऐसा मान] नहीं हुआ। जाम्बवती इत्यादि परम गम्भीर हैं, उनको भी नहीं हुआ। किन्तु ये सदा मानवती रहती है।” [वस्तुतः सत्यभामाजी] राधिकाजी की वैभव-प्रकाश हैं। इसीलिये उनको भी ऐसा [मान होता] है। इसीलिये कृष्ण की बड़ी प्यारी हैं। यह सब बातें [कृष्ण यहाँ] उनको सुनाने के लिए बतला रहे हैं।
[11:53-19:50 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवान् कृष्ण ने कहा— “सत्यभामा, तुम जानती हो या नहीं जानती? व्रजवासी लोगों की इच्छा के अनुसार मैं सब कुछ करता हूँ। यदि व्रजवासी लोग कह दें कि मैं सब कुछ छोड़ करके—पुत्रों को छोड़ करके, स्त्री को छोड़ करके, माता-पिता को छोड़ करके भी—वृन्दावन आकर रहूँ, तो मैं अभी कर दूँ। किन्तु वे लोग नहीं चाहते। जिस दिन चाहेंगे, [उसी दिन] मैं सारी चीज़ें छोड़कर वैसा ही कर दूँगा।”
यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि भारतीय पतिव्रता नारी अपने पतिदेव के [प्रति] प्रेम की गाली का व्यवहार कर सकती हैं या नहीं? यदि करती है, तो मर्यादा कहाँ है? स्त्रियों के भी अलग-अलग स्वभाव होते हैं। रुक्मिणीजी ऐसा नहीं करेंगी। किन्तु प्रेम में सबकुछ होता है—प्रेम में सबकुछ चलता है। इसलिये सत्यभामाजी ने मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। [यहाँ पर] ज्ञात होता है कि यदि वे उनको ‘झूठा’ कहें, ‘लबार’ कहें, तो इसमें क्या हानि है? उनकी दृष्टि से तो सचमुच में वे झूठे हैं, लबार हैं, लम्पट हैं। यह तो कोई गाली नहीं, यह तो सच ही बात है। तो वे सच ही कह रही हैं। इसलिये रुक्मिणीजी के लिए यह सम्भव नहीं है, किन्तु सत्यभामाजी का स्वभाव ही ऐसा है कि वे अपना अनादर नहीं सह सकतीं।
किसी-किसी शिष्य के स्वभाव में गुरु के प्रति भी [मान-]अभिमान होता है। गुरु के प्रति मर्यादा है न, किन्तु कभी-कभी शिष्य के भीतर भी [यह भाव आ जाता है—] “हमारे बिना इनका काम [नहीं] चल सकता।” जो शिष्य अथवा सेवक चौबीसों घण्टे गुरु की सेवा करता है, और [यदि] गुरु किसी प्रकार से [उसकी] उपेक्षा कर दें, तो [वह सेवक] उस उपेक्षा को सह नहीं सकता। कुछ-न-कुछ उसको भी मान-अभिमान हो जायेगा। तो फिर गुरु को उसे सम्भालना पड़ता है। गुरु भी जानते हैं कि यह ठीक बात है, इसलिये वे उसे सम्भालते हैं। वे भी आ करके मनाते हैं—इसमें कोई हानि की बात नहीं है। इसलिये [कृष्ण] सत्यभामाजी को मना रहे हैं, इसमें कोई भी बात नहीं।
भक्त: गालियाँ देंगे ऐसे तो…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गाली क्या कहा? ‘धूर्त’ कह दिया— तो क्या यह गाली है?
भक्त: यह तो केवल गोपियाँ ही बोल सकती हैं।
श्रीपाद श्रीधर महाराज: वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन॥ [#1]
भक्त: किन्तु यह तो गोपियों के लिए, व्रजवासियों के लिए आया है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इनका भी कभी-कभी ऐसा होता है, क्योंकि इन्हें भी कभी-कभी महाभाव का आभास होता है।
भक्त: आभास तो इन लोगों में है, किन्तु भारतीय नारी [के सन्दर्भ में यह कुछ] अजीब-सा लगता है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये ‘धूर्त’ कह देंगी, ‘चोर’ कह देंगी। क्या स्त्री अपने पति को यह नहीं [कह सकती?] यदि पति कहता है कि ‘तुम झूठी हो’, तो क्या [स्त्री] नहीं कह सकती?
भक्त: समाज के बीच में?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, समाज के बीच में।
श्रीपाद श्रीधर महाराज: महाराज कभी शादी नहीं किये, तो इसलिये (23:04 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो कोई बात नहीं।
यह तो बल्कि कृष्ण की मर्यादा होती है। कृष्ण ने कहा— “अरे संकीर्णचित्तवाली, सत्राजित-तनया! जिस प्रकार से सत्राजित संकीर्णचित्त का है, ऐसे तू भी अपने बाप के समान है। जैसा बाप, वैसी बेटी। यदि व्रजवासी लोग चाहें, तो मैं आज ही तुम सबको छोड़कर चला जाऊँगा। मैं तो उनके अधीन हूँ। जैसे ही वे कहेंगे, मैं तुम सब लोगों को परित्याग करके [चला जाऊँगा।] यदि व्रजवासी लोग यह समझें कि कृष्ण के यहाँ (व्रज में) आने से हमारा मङ्गल होगा, और मैं केवल [यह] समझ जाऊँ [कि व्रजवासी ऐसा चाहते हैं], तो मैं तुम सब लोगों को, पुत्र को, परिवार को, माता-पिता सबको छोड़कर चला जाऊँगा—यह बात समझ लो। माता-पिता माने यहाँ देवकी और वसुदेव। मैं शपथपूर्वक कह रहा हूँ, तुम्हारी शपथ लेकर कह रहा हूँ। मैं शपथ करके कह रहा हूँ कि मैं सत्य-सत्य वैसा ही करूँगा, जैसा वे [चाहते हैं।”]
यहाँ पर सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि [कृष्ण] सत्यभामाजी की शपथ ले रहे हैं— “मैं तुम्हारी शपथ ले करके कह रहा हूँ…” जो सबसे प्रिय होता है, [उसी की शपथ ली जाती है—जैसे लोग कहते हैं कि] हम अपने बेटे की शपथ लेते हैं, सौगन्ध खाते हैं। तो इसका मतलब हुआ कि [वहाँ उपस्थित] सब लोगों में सत्यभामाजी श्रेष्ठ हैं। इसीलिये [सत्यभामाजी] श्रेष्ठ हैं।
[कृष्ण ने कहा—] “ब्रह्माजी मेरा स्तव करते हैं। ब्रह्माजी ने स्तव [करते-करते जो कहा था, वह कभी भी झूठ नहीं हो सकता क्योंकि] वे एक प्रामाणिक व्यक्ति हैं।” वे एक प्रामाणिक व्यक्ति हैं।
भक्त: कौन?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ब्रह्माजी।
ब्रह्माजी ने श्रीमद्भागवत में कृष्ण से प्रार्थना की है और उनकी बात प्रामाणिक है।
[कृष्ण कहते हैं—] “मैं व्रजवासियों का प्रत्युपकार नहीं कर सकता। मैं उनका ऋण-शोधन नहीं कर सकता। वे मेरे लिए जो करती हैं, मैं नहीं कर सकता। माता-पिता को छोड़ने से, तुम लोगों को छोड़ने से भी मैं उनका ऋण-शोधन नहीं कर सकता। इसलिये मैं उनके निकट महाऋणी हूँ।”
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.22)
[हे वल्लभाओ! मेरे साथ तुम्हारा जो संयोग है, वह निर्मल, निर्दोष एवं विशुद्ध प्रेममय है। तुमलोगों ने दुर्जय गृह-बन्धनों का छेदनकर मुझसे प्रेम किया है; इसके लिए मैं देवताओं के समान दीर्घायु प्राप्त करके भी उसका प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं हो सकता। तुम्हारे साधु-कृत्य एवं सौम्य स्वभाव मुझे उऋण कर सकते हैं, पर मैं तो तुम्हारे इस प्रेम का सर्वदा ऋणी ही हूँ।] GVP
हे गोपियों! मैं तुम्हारा ऋण नहीं चुका सकता। एक नहीं, दो जन्मों में नहीं, देवताओं जैसी लम्बी आयु प्राप्त करके भी, हज़ारों जन्मो में मैं तुम लोगों का ऋण नहीं चुका सकता। क्यों? इसके लिए वे एक कारण प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रीमद्भागवत में एक श्लोक है—
एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देवरातेति न-
श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति।
सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता
यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनय-प्राणाशयास्त्वत्कृते ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.14.35)
[हे देव! क्रूर हृदयवाली पूतना ने साध्वी वेश धारण के अनुकरणमात्र से ही अघासुर, बकासुर आदि सगे-सम्बन्धियों के साथ आपको प्राप्त किया है। किन्तु जिनके गृह, धन, सुहृद, प्रिय, द्रव्य, देह, प्राण, मन, पुत्र आदि सर्वस्व आपकी प्रीति के लिए ही आपके चरणों में समर्पित हैं, ऐसे इन व्रजवासियों को आप इनकी सेवा के बदले में क्या प्रदान करेंगे, उनसे कैसे उऋण होंगे? आप समस्त फलों के फल हैं, आपसे उत्कृष्ट फल कौनसा है? यह विचार करके मेरा चित्त मोहग्रस्त हो रहा है।] GVP
तात्पर्य क्या है? हे देव! आप व्रजवासियों का ऋण कैसे चुकायेंगे? यह असम्भव है। ‘स्तुवता’ [#2] ब्रह्माजी ने स्तव किया और वह स्तव क्या है? — “हे देव! आप इन व्रजवासियों को सत्-फलात्मक [अर्थात्] अपने से अधिक श्रेष्ठ [कौनसी] वस्तु देंगे?” तात्पर्य क्या है? कृष्ण का दर्शन ही जगत् के लिए सबसे श्रेष्ठ फल है—सब बातों से [बढ़कर।] कृष्ण का दर्शन हो जाये, तो सब कुछ मिल जाये। पूतना भक्तों के जैसा वेश धारण करके कृष्ण को मारने के लिए उनके पास आयी; और कृष्ण भक्तों के अधीन हैं। तो वह साधु-वेश, माता का वेश बनाकर व्रज में गयी और कृष्ण को गोदी में लेकर कालकूट विष पिलाने लगी। [किन्तु] कृष्ण ने उसको माता की गति दे दी; अपना दर्शन भी दिया और माता की गति भी।
तो जिन व्रजवासियों ने कृष्ण के लिए अपना गृह, अर्थ, बन्धु, प्रियजन, पुत्र, प्राण, अपना सारा जीवन ही और सारा सुख कृष्ण के लिए समर्पित कर रखा है, उनके लिए कृष्ण क्या देंगे? अपना वह रूप, जो पूतना को दर्शन दिया—वही समस्त फलों का फल है। इससे बढ़कर आपके पास क्या है? अपने रूप से, अपने दर्शन से, अपनी सेवा से भी अधिक आप उन व्रजवासियों को क्या दे सकते हैं? उन्होंने प्रेमपूर्वक उनकी सेवा की। फिर से समझो। समझ में आ रहा है न? पूतना को क्या दिया? अपनी मैया बना लिया। वह द्वेषपूर्वक, हिंसापूर्वक [कृष्ण को] मारने के लिए गयी थी। और जिनका प्राण, धन, पुत्र, परिवार, सब कुछ कृष्ण के लिए ही है, उनको कृष्ण इससे अधिक क्या देंगे? सब फल तो पूतना जैसी राक्षसी को दे दिया। अब इनके लिए उससे अधिक क्या देंगे? [इसलिये ब्रह्माजी] कहते हैं कि [ब्रजवासियों विशेषकर गोपियों का प्रत्युपकार] कृष्ण के लिए यह असम्भव है। इसीलिये कृष्ण ने कहा— “न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां।” गोपियाँ कृष्ण-सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं माँगेंगी।
कृष्ण [गोपियों जैसा त्याग] नहीं कर सकते। यदि गोपियाँ कहें— “देखो, कृष्ण! हम तुम्हारे लिए अपने पुत्र, परिवार, भाई, बन्धु, पति, सबको त्याग करके, घर छोड़ करके आयी हैं; इसलिये आप सबकुछ छोड़ करके अकेले हमारी शरण में आ जाइये।” गोपियों के लिए यह सम्भव है, किन्तु कृष्ण के लिए यह सम्भव [नहीं है।] सब तब तो फिर एक के [लिए छोड़ने पड़ेगे।] ठीक है [मान लिया कि किसी एक का] ऋण उतार दिया, और बाकी सबके [ऋण कैसे उतारेंगे?] कोटि-कोटि व्रजबालाओं के, नन्द-यशोदा सबके वे सब काल के लिए ऋणी हो जायेंगे। यदि कुछ माँगा भी तो क्या माँगेंगी?— तुम अपनी सेवा दो। [इससे] कृष्ण और भी ऋणी हो जायेंगे। इसलिये [कृष्ण] ऋण नहीं चुका सकते।
[30:29-33:41 तक भक्तों के द्वारा कीर्तन…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: …moods are coming. You should try to hear and make [inaudible 33:48] more properly.
भक्ति दो प्रकार की होती है— माधुर्यमयी और ऐश्वर्यमयी। ऐश्वर्यमयी भक्ति में चाहे ऐश्वर्य हो या न हो, वह परमेश्वरता का ध्यान कराने वाली होती है। वह भगवान् के ऐश्वर्य को प्रकाश करती है। और माधुर्यमयी भक्ति परमेश्वरता के भाव को ढ़क देती है। [यहाँ तक कि] वह ऐश्वर्यमयी भक्ति को भी ढक देती है। माधुर्यमयी भक्ति में ऐसा मत समझो कि ऐश्वर्य नहीं रहता—पूर्ण ऐश्वर्य रहता है। चाहे ऐश्वर्य हो या न हो, किन्तु अपने माधुर्य गुण से ऐश्वर्यमयी [भाव] को भी भुला देती है।
यशोदाजी ने कृष्ण के मुख में सम्पूर्ण विश्वरूप और सारा विश्व देखा, किन्तु [फिर भी उन्होंने] कृष्ण को भगवान् नहीं माना। उन्हें कृष्ण का ऐश्वर्य दिखाई पड़ा, [फिर भी उन्होंने यही माना कि वे एक] छोटे बालक हैं। इसलिये ऐश्वर्यमयी भक्ति प्रेममयी भक्ति अथवा माधुर्यमयी भक्ति को ढक नहीं सकती, बल्कि प्रेममयी भक्ति अथवा माधुर्यमयी भक्ति ही ऐश्वर्यमयी भक्ति को ढक देती है। ऐश्वर्यमयी भक्ति कृष्ण को परमेश्वर [के रूप में] समझा देगी और परमेश्वरत्व [का बोध] भी करा देगी। [किन्तु] माधुर्यमयी भक्ति क्या करती है? वह कृष्ण की परमेश्वरता को ढक करके उनको अपना निजजन [बना देती है—] हमारे प्राणवल्लभ, पुत्र, सखा इत्यादि [के रूप में।] इसलिये जिनकी प्रेममयी भक्ति—माधुर्यमयी भक्ति होती है, वे लौकिक सद्बन्धुवत् भाव से कृष्ण को अपना प्रियतम मानते हैं—प्रियतम बन्धु। यह माधुर्यमयी भक्ति का विशेष भाव है।
यहाँ कहते हैं—देखो, मैं व्रज को छोड़कर मथुरा आया; नन्दबाबा, यशोदा मैया को छोड़कर, व्रजवासियों को छोड़कर [आया,] जिनका जो प्रेम है, वह माधुर्यमय है। तथापि यदि मैं आज वृन्दावन लौट भी जाऊँ, तो क्या गोपियों का विरह दूर हो जायेगा? वे कहते हैं कि मेरे जाने से भी अब विरह दूर नहीं होगा, बल्कि विरह-दुःख और बढ़ जायेगा। यह मेरी धारणा है, मेरी ऐसी अनुभूति है—मैं जानता हूँ। मेरे दर्शनमात्र से ब्रज के लोग विकल हो जाते हैं—विशेष करके गोपियाँ। वे मेरे दर्शनमात्र से प्रगाढ़ प्रेम के उदय से विकल और मुग्ध हो जाती हैं, बड़ी व्याकुल हो जाती हैं और देह-दैहिक समस्त [विषयों को भूल] जाती हैं। अधिक क्या, उस अवस्था में वे जान नहीं पातीं कि मैं कौन हूँ। देह-दैहिक सब कुछ भूल जाती हैं, अन्य की तो बात ही क्या? वे सब कुछ भूल जाती हैं।
Kṛṣṇa is telling that gopī-prema is so high, so high, even mine can not touch them. When they take my darśana, then they become very-very restless. At that time they become faint and they forget all the deha-daihika (body and bodily conceptions)—who am I— all they forget forever. They begin to weep, rolling down on the earth or [they become] totally unconscious.
[कृष्ण कह रहे हैं कि गोपी-प्रेम इतना उच्च, इतना महान है कि मेरा प्रेम भी उसे स्पर्श नहीं कर सकता। जब वे मेरा दर्शन करती हैं, तब वे अत्यन्त ही व्याकुल हो जाती हैं। उस समय वे मूर्च्छित हो जाती हैं और देह-दैहिक—“मैं कौन हूँ”—सब कुछ सदा के लिए भूल जाती हैं। वे रोने लगती हैं, भूमि पर लोटने लगती हैं, या पूर्णतः चेतनाशून्य हो जाती हैं।]
मेरा अनुभव ऐसा है (I have realized this)
कहते हैं—यदि मैं वृन्दावन जाऊँ, मैं जाना चाहता हूँ; किन्तु जा नहीं पाता। कुछ कारण भी थे। मुझे जाना भी चाहिये, किन्तु नहीं गया—किसलिए? मुझे देखने से ही वे मेरे [भावी] विरह [की आशंका] से अशान्त होकर के छटपट करती हैं, मोहदशा को प्राप्त हो जाती हैं। कृष्ण प्रेमवशतः गोप-गोपियों का जो मोह है, वह योगियों की तरह नहीं है। योगी लोगों की निर्विकल्प समाधि होती है। उसमें वे देह-दैहिक को तो भूल ही जाते हैं, अपनी आत्मा को भी विसर्जित कर देते हैं और भगवान् की स्फूर्ति भी नहीं होती। [योगियों को] भगवान् का भी दर्शन नहीं होता। [किन्तु] भक्तों का ऐसा नहीं है। वे कृष्ण के विरह में छटपट करती हुई मुग्ध हो जाती हैं और मूर्च्छित हो जाती हैं।
अन्तःकरण में (internally) उनको क्या होता है? पूरा दिन वे कृष्ण की सेवा में तन्मय [रहती हैं] और उनकी स्मृतियाँ नये-नये रूपों में [प्रकट] होने लगती हैं। इसलिये योगियों [की अपेक्षा यह] दशा सर्वथा अद्भुत है। योगी लोग निर्विकल्प समाधि में शून्य देखते हैं— स्वयं शून्य हो जाते हैं, [किन्तु] गोपियाँ नहीं।
[गोपियाँ विरह में चिन्तन करती हैं—] “अहो! कृष्ण ने कैसी मधुर वंशी बजाई! कैसे हम अपने घर के कामों को छोड़ करके कृष्ण के पास गयीं! कृष्ण ने हम लोगों के साथ कैसी ठिठोली की! — “अपने पतियों के पास लौट जाओ, उनकी सेवा करो, धर्मशास्त्र की बातें कहीं।” और फिर हमने भी उनको तर्क-वितर्क के द्वारा गुरु-पूजा की श्रेष्ठता बताकर, और कृष्ण को कैसे [वास्तविक] पति बतलाया! रास में कैसी-कैसी लीलाएँ की!”— यह सब चिन्तन आने लगता है। उसके कारण उनका प्रेम और भी गद्गद हो जाता है, और भी बहुत कुछ (41:00 अस्पष्ट) ये उनके प्रेम के विकार हैं। योगियों को प्रेम का विकार नहीं होता [किन्तु] उस समय गोपियों को अष्टसात्त्विक भाव उत्पन्न हो जाते हैं— स्तम्भ, वैवर्ण्य, [स्वेद, कम्प,] मूर्च्छा इत्यादि।
‘ते’ [#3] माने यहाँ पर गोपी। यद्यपि गोपी [शब्द] नहीं आया, किन्तु समझेंगे कि ‘ते’ गोपियों के लिए कहा गया है—केवलमात्र गोपियों के लिए। और उनका (राधाजी का) नाम क्यों नहीं लिया? शुकदेव गोस्वामीजी जहाँ राधा नाम इत्यादि करते हैं, तो उनको कितने दिन की [मूर्च्छा हो जाती है?]
भक्त: छह मास की
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: छह महीने की मूर्च्छा हो जाती है, तो फिर हरिकथा सब बन्द हो जायेगी। इसलिये प्रकारान्तर रूप से सब वर्णन कर रहे हैं—‘ते’ इत्यादि के द्वारा, अथवा ‘गोपवधू’, ‘लक्ष्मी’ इत्यादि कह रहे हैं, किन्तु [प्रत्यक्ष] नाम नहीं लेते। और परमाराध्य गुरुजी का नाम भी लो तो प्रणाम करके लो—भीतर ही भीतर रखो। इसलिये अपने परमाराध्य का नाम भी इस रूप में लेने के लिए कहा गया है। तो गोपियाँ सब कुछ भूल जाती हैं। कृष्ण भी आश्चर्य के साथ में कहने लगे— “अहो! उस समय तो उनको अपने का ज्ञान नहीं रहता; किन्तु [यह] ऊपर से और भीतर से कृष्ण की सेवाओं की परिपाटी उनके स्मृति-पथ में आती है। और उस समय जब वह आती है, तो बड़ा सुख होता है।”
जैसे मैं उदाहरण दे करके कहता हूँ न!—सीताजी का। सीताजी अशोक वाटिका में वर्षाकाल में भीग रही हैं और आँखें बन्द करके देख रही हैं— “हमारा कैसे विवाह हुआ। रामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ा। जब मैं उनके गले में हार पहनाने गयी, तो मैं प्रेमवश नहीं डाल सकी। सखियों ने मेरे हाथ को सहारा दे करके उनके गले में डाल दिया। वाह! कितना सुन्दर विवाह हुआ!” कौन आता है, कौन जाता है—[सीताजी] यह सब कुछ भूल जाती हैं। उसी प्रकार गोपियों का प्रेम कृष्ण के प्रति बहुत अधिक है।
इसलिये जब उनको होश ही नहीं है तो किसको सान्त्वना दूँ? यह [कृष्ण के] कहने का तात्पर्य है। जिस समय उनको होश नहीं है, उस समय में कैसे उनको सान्त्वना दे सकता हूँ? इसलिये मैं व्रज में जाकर क्या करूँगा? मुझे देखते ही वे बस मूर्च्छित हो जायेंगी; और जब मूर्च्छित हो जायेंगी, तो मैं किससे क्या कहूँगा?
understand? Gopīs become senseless [upon] seeing me at once—then how can I console them? And they are weeping.
इसलिये मैंने इसका अनुभव किया है और यही मेरी धारणा है।
ये कमलनाभ हैं—उसमें चौदह भुवनों का दर्शन करेंगे। तत्पश्चात् हम लोग आदिवराह जायेंगे। कृष्णवराह और श्वेतवराह [के दर्शन करेंगे,] जो वेदों [का उद्धार कर] इस स्थान पर ले आये और कृष्णवराह ने पृथ्वी का उद्धार किया। उसके बाद में हम लोग विश्रामघाट जायेंगे। वहाँ पास ही में विश्रामघाट है। द्वारकाधीश का दर्शन करके गताश्रम [जायेंगे] और वहीं पर (44:52 अस्पष्ट) का स्थान दर्शन करेंगे। वहाँ पर मत जाना—महाप्रभुजी का जहाँ पर… सतघड़ा, वहाँ पर जगह नहीं है। एक घर में दस व्यक्ति जा नहीं पाते। इसलिये मत जाना। बल्कि वह प्रसङ्ग कह देना कि यह सतघड़ा है और यहीं पर श्रीनाथजी आये थे, महाप्रभु और महाप्रभु के रूप गोस्वामी आदि [परिकर] आये थे—ये बतला देना।
Tomorrow we will go to all these places
[45:37- अन्त तक भक्तों द्वारा कीर्तन...]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
प्रिया यदि मान करि’ करये भर्त्सन।
वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत (4.26)
यदि मेरी प्रियतमा मान करके मेरी भर्त्सना (निन्दा) करती है, तो वह भर्त्सना वेदस्तुतियों से भी अधिक मेरे मन को हरण कर लेती है। (IGVP)
#2
स्तुवता ब्रह्मणोक्तं यद् वृद्धवाक्यं न तन्मृषा।
तेषां प्रत्युपकारेऽहमशक्तोऽतो महाऋणी॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.93)
श्रीब्रह्मा ने स्तव करते-करते जो कुछ कहा है, वह कभी भी असत्य नहीं हो सकता, क्योंकि उनके वचन प्रामाणिक हैं। वस्तुतः मैं व्रजवासियों के उपकार का ऋण चुकाने में असमर्थ हूँ, अतएव मैं उनका अत्यधिक ऋणी हूँ। (GVP)
#3
मदीक्षणादेव विगाढ़भावोदयेन, लब्धा विकला विमोहम्।
न दैहिकं किञ्चन ते न देहं, विदुर्न चात्मानमहो किमन्यत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.95)
वे मेरे दर्शन करनेमात्र से ही प्रगाढ़भाव के उदय होने के कारण व्याकुल और मोहित होकर देह-दैहिक इत्यादि समस्त विषयोंको भूल जाते हैं। अधिक क्या, उस अवस्था में वे अपने को ही नहीं जान पाते, दूसरों के विषय में तो फिर कहना ही क्या! (GVP)
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