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Sri Brhad-bhagavatamrtam: Separation of the Gopis is Higher than that of the Dvaraka Queens

01:07:54
#293
Vrndavana
Lecture
Hindi
English
Bengali
Srila Gurudeva 50%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • In Dvaraka, Krsna himself told the glories of the gopis after the queens heard from Mother Rohini. He was angry with Satyabhama because she thought she was equal to the gopis.
  • The gopis have a very strong separation mood; even Uddhava couldn't understand this.
  • Why Krsna did not return to Vrndavana.
  • Gopis' state of deep meditation is natural, unlike that of Dhruva Maharaj.
  • Difference in the love of the gopis compared with that of the queens of Dvaraka.
  • Gopis go to Govardhana to forget Krsna, but they remember Him always and their separation increases.
  • If Krsna would go to Vrndavana to perform lila, His separation would also increase. The gopis couldn't tolerate this. Krsna can't pacify their separation. In Kurukshetra, separation of the gopis increased 100 times more, when Krsna instructed them.
  • If a sadhaka gets a sphurti of Krsna, like Narada Muni, he must experience separation when He disappears.
  • If you can't experience happiness, then you can't experience separation.
  • First, you have to feel separation from Gurudeva.
  • Perform bhajana under the guidance of an exalted devotee, who experience this separation, then you will get this realization. The more service you perform, the more separation you feel.
  • Srila Gurudev expressed his gratitude to Gopinatha Prabhu and Tungavidya Didi for their services.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् : गोपियों का विरह द्वारका की महिषियों से अधिक है

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 11 अक्तूबर 2003 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम लोगों ने पहले सुना — पद्मा की बात सुनकर देवकी मैया ने जो कहा, उसको सुनकर रुक्मिणीजी भी कुछ कहने लगीं। और [उन सब बातों को उद्धव के मुख से] सुनकर कृष्ण से रहा नहीं गया। उन्होंने सत्यभामा को बुलाया। [वे आकर] खम्‍भे की आड़ में खड़ी हो गयीं। और फिर सबको लक्ष्य करके स्वयं कृष्ण गोपियों की महिमा कहने लगे। इस जगत् में कोई दूसरा नहीं है, जो गोपियों की महिमा का वर्णन कर सके।

After hearing the words of Rukmiṇī and, in anger, calling Satyabhāmā, Kṛṣṇa began to glorify the gopīs. I think there is none in this whole universe — [not] even in Goloka Vṛndāvana — who can glorify the gopīs. None of them can. Only Kṛṣṇa can glorify them to some extent, [but] not fully. Only Viśākhā, Lalitā, Citrā, Campakalatā, Tuṅgavidyā, and Indulekhā can [describe] some of their glories. [In fact,] Kṛṣṇa Himself has to learn from Lalitā and Viśākhā the glories of Rādhikā — otherwise, He cannot.

[रुक्मिणी के वचनों को सुनकर और क्रोध में सत्यभामा को बुलाकर, श्रीकृष्ण गोपियों की महिमा कहने लगे। मेरा विचार है कि इस समस्त ब्रह्माण्ड में — यहाँ तक कि गोलोक वृन्दावन में भी — कोई ऐसा नहीं है, जो गोपियों की महिमा का पूर्णरूप से वर्णन कर सके। कोई नहीं कर सकता। केवल श्रीकृष्ण ही किसी अंश तक उनकी महिमा कह सकते हैं, पूर्णरूप से नहीं। केवल विशाखा, ललिता, चित्रा, चम्पकलता, तुङ्गविद्या और इन्दुलेखा [आदि सखियाँ]— ये ही कुछ अंश तक गोपियों की महिमा का वर्णन कर सकती हैं। वास्तव में श्रीकृष्ण को भी राधिकाजी की महिमा ललिता और विशाखा से ही सीखनी पड़ती है — अन्यथा वे भी नहीं कह सकते।]

इसलिये आज कृष्ण स्वयं गोपियों की महिमा का वर्णन करने के लिए प्रस्तुत हुए।

कृष्ण कह रहे हैं— “यदि मैं ब्रज में जाऊँ और मेरे जाने से वे लोग प्रसन्न हो जायें, उन्हें सा‍न्‍त्‍वना मिल जाये, उन्‍हें सुख और शा‍न्ति हो जाये, तो मैं अभी ब्रज में चला जाऊँ। कि‍न्तु मेरा अनुभव ऐसा है [कि मेरे जाने से भी उन्‍हें शान्‍ति और सान्‍त्‍वना नहीं मिल सकती।]

(बाङ्गला भाषा में…) मेरा अनुभव इस प्रकार का है कि मेरे जाने से गोपियों को शान्‍ति और सान्‍त्वना नहीं मिलेगी— यह कभी भी सम्भवपर नहीं है। क्यों? [क्योंकि] मुझे देखते ही वे भाव-विभोर होकर मूर्च्छित हो जाती हैं। मैं उन्‍हें धैर्य कैसे दूँ? वे अपने देह-दैहिक और सब कुछ भूल जाती हैं।

विशेषकर यदि यह कहा जाये कि देह-दैहिक समस्त विषयों को भूल जाने में क्या क्षति है? जिस प्रकार ध्रुव के अन्‍तर हृदय में कृष्ण ने स्फूर्ति करायी और बाद में उसे अन्‍तर्हित कर दिया, तब उन्‍होंने [बाहर] साक्षात् नारायण के दर्शन किये— उसी प्रकार गोपियों को भी किया जाये। गोपियों के अन्‍तर में स्फूर्ति करके और बाद में जब स्फूर्ति ज्ञान होगा तब [बाहर में भी] यह रूप दिखा देना। उससे उनको शान्‍ति मिल जायेगी।

ओह! यह कह नहीं सकता, यह कभी भी सम्भवपर नहीं है। क्योंकि जब गोपियाँ भीतर दर्शन करती हैं, तो बाहर में भी दर्शन करती हैं। गोपियों की समाधि निर्विकल्प नहीं है, उनकी समाधि जाग्रत अवस्था में होती है। वे चलती-फिरती हैं, खाती-पीती हैं, फिर भी उनकी सहज समाधि बनी रहती है। ऐसा उदाहरण किसी अन्य का नहीं है — यहाँ तक कि महायोगेश्वर शंकर आदि का भी नहीं। उनकी तुलना तो केवल उन्हीं से की जा सकती है।

इस कारण कह रहे हैं कि यह सम्भवपर नहीं है। अतएव वे बाहर और अन्‍तर दोनों से मोहित हो जाती हैं। और जब वे मोहित होती हैं, तब क्या करती हैं? मेरी लीलाओं की स्फूर्ति उनके हृदय में सदा रहती है। उस समय भीतर से वे परम-सुखी होती हैं, किन्तु बाहर से विरह-ज्वाला [में दग्ध होती हैं।]

‘तप्त इक्षु चर्वण न जाए त्यजन’ जिस प्रकार ‘तप्त इक्षु चर्वण’ को कोई छोड़ नहीं सकता — क्योंकि वह अत्यन्त मधुर होता है, किन्तु गर्म होने के कारण [खाया भी नहीं जा सकता।]

मेरा स्वयं का अनुभव है — कभी-कभी कोई अत्यन्त स्वादिष्ट परन्तु गरम वस्तु मुँह में रखी जाती है, तो मुँह में रखने से क्या होता है? रखते ही जिह्वा जलने लगती है। भीतर भी ले नहीं सकते, बाहर भी कर नहीं पाते। भीतर ले जायें तो जल जायेगा, और बाहर करें तो बड़ा मुश्किल [क्योंकि अत्यन्‍त स्वादिष्ट भी है।]
श्रीकृष्ण कह रहे हैं — यही गोपियों की अवस्था है।

अतएव उनको भगवद्‍ स्फूर्ति होने पर भी बाहर साक्षात् इस समय भगवद्-दर्शन नहीं हो रहा—वे कृष्ण का दर्शन नहीं कर पा रही हैं।

मान लिया कि उन्‍होंने कृष्ण का दर्शन किया, तो क्या [केवल] देखने का ज्ञान होने से ही [उन्‍हें] सुख होगा? [जैसे] एक व्यक्ति ने कम-से-कम एक महीने तक कुछ नहीं खाया—[अत्यन्‍त] दुर्बल हो गया, [उसका शरीर] प्रायः सूख गया—और उसी समय यदि उसे प्रचुर परिमाण में भोजन, रसमलाई, पान्‍तुआ, खीर आदि दे दिये जायें [तो क्या केवल] देखने से ही उसका पेट भर जायेगा? देखने से होगा कि नहीं होगा? ये सब उसके सामने एक बड़े थाल में रखा गया हो — बत्तीस अँगूठिया [बड़ा] केले का पत्ता। केले का पत्ता बहुत लम्बा-चौड़ा, [तो देखने से ही] हो जायेगा? [उस पर] तरह-तरह के मिष्ठान और पकवान सब कुछ हो, तो केवल देखने से [उसका] पेट भर जायेगा? [उसे] शा‍न्ति हो जायेगी? नहीं।

फिर कैसे होगा? [जब वह] उसका सेवन करेगा। पेट [भर] खा-पी लेगा, तो होगा? [पर क्या एक बार] खा-पी लेने से एक-दो महीने से [भूखे व्यक्ति का] शरीर एक दिन में ही स्वस्थ हो जायेगा? क्या होगा? [वह यदि] एक-दो महीने तक प्रतिदिन [ठीक से] खाये-पीये, स्नान करे, तेल लगाये और सब कुछ ठीक करे, तो एक-दो महीने के बाद में स्वस्थता आयेगी।

कृष्ण कह रहे हैं — “देखो, अब तुलना करो।”

कैसी तुलना? गोपियाँ कितने दिनों से विरह में तड़प रही हैं, जब से [कृष्ण] मथुरा गये। [वे सोचती रहीं कि कृष्ण] आज आयेंगे, कल आयेंगे, परसों आयेंगे, [किन्‍तु] बरसों बीत गये, तरसों बीत गये, नहीं आये। गोपियों का विरह [अत्यन्त] तीव्र है। इतना तीव्र है कि उसका वर्णन कोई [नहीं कर सकता।] उद्धवजी [ब्रज में] जाकर, देखकर भी [उस विरह का] वर्णन नहीं कर सके। वे [स्वयं] भी [उस ताप से] तप्त हो गये। [इतने दीर्घकाल का यह विरह है, कि केवल] एक महीने [जाने से भी शान्‍त] नहीं होगा, [जिस प्रकार एक-दो महीने से भूखा व्यक्ति] एक दिन खाने से [स्वस्थ] नहीं होगा। अर्थात्‌ गोपियों का विरह नहीं छूटेगा।

[कृष्ण कह रहे हैं—] “अच्छा, मान लिया कि मैं वहीं पर रहूँ और उनके साथ में क्रीड़ा करूँ, रास-विलास करूँ, तब [क्या उनका विरह शान्‍त] हो जायेगा? बहुत दिनों तक रहकर [साथ में लीलाएँ] करने से गोपियों को कुछ तृप्ति तो होगी, कि‍न्तु तो भी [पूर्ण तृप्ति] नहीं होगी। क्यों नहीं होगी? [क्योंकि] मिलन के साथ में भावी विरह [भी रहता है—] ‘अभी कल चले जायेंगे, गोचारण के लिए चले जायेंगे।’ [गोपियाँ] एक मिनट का भी विरह [सह नहीं सकतीं।]”

अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.15)

[हे प्रिय! दिन के समय जब आप ब्रज से वन में विहार करने के लिए चले जाते हैं, तब आपको न देखकर एक क्षण का समय भी हमारे लिए एक युग के समान प्रतीत होता है और जब दिन के अन्त (सन्ध्याकाल) में आप गोष्ठ की ओर लौटते हैं, तब हम घुँघराली अलकावलियों से युक्त आपके श्रीमुखमण्डल को देखती हैं, तो पलक गिरनेमात्र का व्यवधान भी हम सहन नहीं कर पातीं। हमें तो वह विधाता विवेकहीन (मूर्ख) ही प्रतीत होता है, जिसने इन पलकों को बनाया है।] GVP

‘अटति यद्भवानह्नि’ — जब कृष्ण गोचारण के लिए वन में जाते हैं और सांयकाल में लौटते हैं, तब यह विरह गोपियों से सहा नहीं जाता। सबसे [अधिक] विरह की [पराकाष्ठा की] बात क्या है? जब कृष्ण लौटकर आते हैं और सामने खड़े हैं, गोपियाँ [उन्‍हें] देखती हैं, किन्‍तु बार-बार पलकें झपक जाती हैं, आँखों में आँसू आ जाते हैं; इस [क्षणिक बाधा को भी] वे सह नहीं सकतीं। एक मुहूर्त के लिए भी [उनका विरह] सह नहीं सकतीं। [जब कृष्ण] वन में हैं, तो वे [किसी प्रकार विरह] सह रही हैं, पर जब [कृष्ण] सामने [उपस्थित होते हैं] और वे यह सोचती हैं कि “कल चले जायेंगे, मथुरा चले जायेंगे,” तो फिर? इसलिये विरह में एकदम व्याकुल हो जाती हैं।

कृष्ण सोच नहीं पाते कि मैं इनको क्या सा‍न्‍त्‍वना दूँ? [दूँ या] नहीं दूँ। तो बतलाओ?

कृष्ण कह रहे हैं— “यह गोपियों की स्थिति है। सत्यभामे! तू उन गोपियों की बराबरी करेगी? [गोपियाँ यदि] आज कहें, तो मैं पुत्र, कलत्र (पत्नी) तुम सबको छोड़कर अभी [इसी] समय वृन्दावन में पहुँच जाऊँ।”

[14:35 से 19: 56 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (बाङ्गला भाषा में…) कृष्ण कहते हैं — “मैं बहुत दीर्घकाल से मथुरा और द्वारका में हूँ, और वे गोपियाँ मेरी विरह-अग्नि में छटपट कर रही हैं।”

[“गोपियाँ मेरे] विरह में छटपट कर रही हैं। [इसलिये] मेरे लिए उचित है कि मैं ब्रज में जाऊँ और वहाँ रहकर उनके साथ रास करूँ। उनके साथ में जैसे पहले रहता था, [वैसे रहूँ।] उनके घरों में दही-मक्खन इत्यादि खाऊँ। मैं चाहता हूँ, [किन्‍तु] सम्भव है कि नहीं? मैं चाहता तो हूँ, कि‍न्तु [क्या यह] सम्भव है? अभी जितने असुर लोग हैं उन्‍हें मारना है। पृथ्वी का भार हरण करने के लिए हम ऊपर से आये हैं। इसलिये मेरे लिए अभी [ब्रज में जाना सम्भव नहीं है। अभी] जरासन्‍ध का वध करना है, दुर्योधन इत्यादि दुष्टों को, असुरों को हरा करके पाण्डवों को शा‍न्ति प्रदान करनी है और यदुकुल में भी बहुत से असुर हैं, उन असुरों का भी विनाश करना है। ये सब काम कैसे होंगे? यदि मैं इन [सब कार्यों] को अभी छोड़ भी दूँ और वहाँ जाऊँ, [तो भी] उनका स्वभाव तो विरह का ही बना हुआ है।”

एक व्यक्ति कहता है कि ‘मिट्टी का घड़ा है, पर इसमें मिट्टी नहीं है।’ मतलब क्या है? एक घड़े में मिट्टी के अस्तित्व के बिना घड़े का कोई अस्तित्व है? आ रहा है समझ में?

(बाङ्गला भाषा में…) एक मिट्टी का बना हुआ घड़ा है। यदि कोई कहे कि घड़े में मिट्टी नहीं है तो इसका क्या मतलब होगा? [तो इसका तात्पर्य है कि वह] मूर्ख जानता नहीं है, वह अज्ञानी है।

गोपियों का स्वभाव ही विरह द्वारा निर्मित है। अतएव गोपियाँ स्वभाव से ही ऐसी हैं। एक-दो मिनट के लिए जो परस्पर मिलन इत्यादि होता है, फिर विरह-अग्नि उनको इस प्रकार से जलाती है कि कृष्ण किसी भी प्रकार उनको शा‍न्त नहीं कर पाते।

“देखो सत्यभामा! रुक्मिणी! कालि‍न्दी! अ‍न्य सब [महिषियों!] मैं तुम्हारे ‘अनुभवगम्य’ — अनुभव की कथा कहता हूँ। तुम्हें अनुभव है।”

कैसा अनुभव? कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे [#1]

“देखो, एक समय इसी द्वारका में मैं तुम्हारे साथ जलक्रीड़ा कर रहा था और जलक्रीड़ा करते समय तुम लोग वहीं पर विलाप करने लगीं— ‘हाय! हाय! कृष्ण कहाँ गये?’”

इसीको प्रेमवैचित्त्य कहते हैं, जो महिषियों में भी [होता है, और यह] महाभाव को स्पर्श करनेवाला है। कि‍न्तु गोपियों का जो प्रेमवैचित्त्य होता है—दिव्यो‍न्माद, चित्रजल्प इत्यादि और उससे भी ऊपरवाला (मोहन, मोदन, मादन)— ये सब तो [महिषियों में प्रकाशित] नहीं होते, कि‍न्तु इस महाभाव का ही कुछ भाव [प्रकट होता] है।

“तो तुम लोग मेरे साथ में स्नान कर रही हो, विहार कर रही हो, मेरे पास में बैठी हुई हो, और कह रही हो — ‘हे कुररि! हे सखि, कुररि!”

कुररी मतलब एक पक्षी को सखी बनाया। यह पक्षी रात में बहुत रोती है, रात में! पति के लिए रोती है। उसका पति सरोवर के इधर में रहता है और ये दूसरी ओर [रहती है] और रोती है। तो जब [कुररी] विलाप करने लगती है, तो महिषियाँ कहती हैं— “हे सखि! अब तो रात्रिकाल है।”

है दिन, कि‍न्तु उनको ऐसा भ्रम हो गया कि [रात्रिकाल है।]

तो वे कह रही हैं— “ये तो रात्रिकाल है। कृष्ण गाढ़ निद्रा में सो रहे हैं।” कृष्ण उनकी गोदी में [सो रहे] हैं।)

“[कृष्ण] गाढ़ निद्रा में सो रहे हैं और हम लोगों की निद्रा… हम उनकी नींद को भङ्ग कर रही हैं। (बाङ्गला भाषा में…) मन में यह आ रहा है कि तुम जो यह विलाप कर रही हो, कृष्ण के लिए विलाप कर रही हो? पति के लिए विलाप नहीं, किसलिये विलाप कर रही है? हमारी भाँति क्या तुम भी कृष्ण विरह में विलाप कर रही हो?”

[महिषियाँ] दिन के समय कृष्ण के साथ जल-विहार कर रही हैं और उनकी यह अवस्था? तब गोपियों की कैसी अवस्था होगी?

यह उदाहरण देकर कृष्ण कह रहे हैं “तुम्हें कुछ-कुछ अनुभव है।”

अथवा हमारी भाँति तुम भी दीन-हीन होकर सोने की इच्छा नहीं कर रही हो। जिस प्रकार हम लोग कृष्ण विरह में रातभर सो नहीं पाती हैं, लगता है तुम भी कृष्ण विरह में, अथवा अपने पति के विरह में सो नहीं पा रही हो। जिसके लिए विलास विलाप! तुम भूरि-भूरि विलाप कर रही हो, क्रन्‍दन कर रही हो।

“तुम लोग बहुत रो रही हो, छटपट कर रही हो। हे सखि! नलिनलोचन, नीलकमल [के समान नेत्रों] वाले जो उदार कृष्ण हैं, उनकी लीलाओं को देखकर, उनके मधुर स्वरूप को देखकर, उनके मधुर हास्ययुक्त [मुखकमल] को देखकर और म‍न्द मुस्कान को देखकर क्या [तुमने भी] अपने हृदय को उनको दे दिया है? या उन्होंने तुम्हारे हृदय को चोरी कर लिया है? या तुम्हारे हृदय में वे विद्ध हो गये हैं, इसलिये तुम इतना रो रही हो? हा सखि! सम्भवतः तुम रात में अपने का‍न्त का दर्शन न [कर] पाने के कारण ही ऐसे रो रही हो और अपनी आँखो को बन्‍द नहीं कर रही हो। नींद न आये नहीं जा रही। तुम करुण स्वर से रो रही हो।”

कितने? दस श्लोकों में [शुकदेव गोस्वामी ने महिषियों के प्रेमवैचित्त्य का वर्णन किया है।] जैसे कि दस श्लोकों में भ्रमरगीत है। उसी प्रकार ये दस [श्लोक] महिषियों के लिए हैं। [इसमें उनके] प्रेमवैचित्त्य का वर्णन है।

[महिषियाँ कहती हैं —] “अहो! क्या तुम [भी हमारे ही समान] कृष्ण का दासीभाव प्राप्त करने के लिए इस प्रकार विलाप कर रही हो अथवा कृष्ण की चरणसेवित-माला को कवरी पर धारण करने के लिए तुम हमारी भाँति क्रन्‍दन कर रही हो।” इस प्रकार दस श्लोकों में शुकदेव गोस्वामी ने उनकी प्रेम-चेष्टा का वर्णन किया है।

गोपियाँ कृष्ण के विरह में कह रही हैं— “मन नहीं लगता। सखी मनरो लागे न…”

[28.38-34.16 तक भक्तों के द्वारा कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh, gopīs are feeling so much viraha–agni, the fire of separation. They are saying, “If we go to Yamunā to forget Kṛṣṇa, we [remember how] Kṛṣṇa used to do so many sweet pastimes here—so much nauka-jhonk…” नोक-झोंक जानते हो? (do you know nok-jhonk?) Gopīs are telling one thing and Kṛṣṇa is [telling another thing;] Kṛṣṇa is telling something and they are cutting His arguments (34:58 inaudible) So this [is called nauka-jhonk.]

“To forget Kṛṣṇa, we go to Govardhana but we see everywhere on the shade of every tree Kṛṣṇa has done sweet pastimes. Oh, [Then] our viraha (separation) increases double. When we go to Vaṁśīvaṭa, [there we] remember that sweet rāsa-līlā and then we cannot have any patience. धैर्य धारण नहीं कर पातीं।”

So the gopīs are telling each other and weeping bitterly for Kṛṣṇa. This was the kirtan.

[ओह! गोपियाँ बहुत अधिक विरह-अग्नि का अनुभव कर रही हैं। वे कहती हैं— “हम यदि यमुना में जाती हैं, यह सोचकर कि कृष्ण को भूल जायेंगे, पर वहाँ पहुँचते ही याद आता है कि यहाँ तो कृष्ण ने कितनी मधुर लीलाएँ की थीं—कितनी नोक-झोंक की थी…” नोक-झोंक जानते हो? गोपियाँ एक बात कहतीं और कृष्ण दूसरी बात कहते; कृष्ण कुछ कहते और गोपियाँ उनके तर्कों को काट देतीं — यही नोक-झोंक कहलाती है।

“कृष्ण को भूलने के लिए हम गोवर्धन जाती हैं, पर वहाँ देखती हैं कि प्रत्येक वृक्ष की छाया में, प्रत्येक स्थान पर कृष्ण ने कितनी मधुर लीलाएँ की थीं। तब हमारा विरह दुगुना हो जाता है। जब हम वंशीवट जाती हैं, तो वहाँ उस मधुर रासलीला की स्मृति हो आती है, और फिर हम तनिक भी धैर्य धारण नहीं कर पातीं।”

इस प्रकार गोपियाँ आपस में कहती हैं और कृष्ण के लिए करुण स्वर में विलाप करती हैं।

यह कीर्तन था।]

[35.47-39.10 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि सत्यभामा, रुक्मिणी इत्यादि कहती हैं— “आप तो सर्वशक्तिमान हैं। जो नहीं होगा [अर्थात् असम्भव है], उसको भी आप अघटनघटनपटीयसी शक्ति के द्वारा [सम्भव] कर सकते हैं। तो आप इतने शक्तिमान होकर भी गोपियों का विरह दूर नहीं कर सकते? आपको तो [अवश्य] करना चाहिये।”

उसीके लिए कृष्ण कह रहे हैं— “बात तो ठीक है। यद्यपि मैं सर्वशक्तिमानों में अघटनघटनपटीयसी-शक्तिवाला हूँ, मैं जो इच्छा, वह कर सकता हूँ। कि‍न्तु गोपियों के विषय में मैं हार जाता हूँ। उनके विषय में मेरी शक्ति और सब कुछ धरा रह जाता है। क्यों? अभी जो बतलाया था कि वे मेरे विरह से ही बनी हुई हैं। अतः उनका स्वभाव ही तो ऐसा [विरहमय] है।”

यहाँ पर ‘हर्षाय’[#2] इत्यादि श्लोक बोल रहे हैं। ब्रजवासियों के सुख के लिए मैं जो कुछ भी [करूँ,] उनको सुख देने के लिए अभी वहाँ जाकर विहार करूँ; पहले के समान जैसे ब्रज में गोचारण करने जाता, कुसुमसरोवर में मधुमङ्गल इत्यादि को [साथ] लेकर जाता, वहाँ से राधाकुण्ड में गोपियों से मिलता–विहार करता, सूर्यकुण्ड में उनके साथ तरह-तरह से विहार करता या और-और जो हमारी मधुर लीलाएँ हैं, जैसे निशा‍न्त-लीला, मध्याह्निक-लीला इत्यादि, सब समय उनके साथ लीलाएँ करता था— [यदि अभी मैं] वैसी ही लीलाएँ करूँ तो, [वह] तो अनुभूति के साथ देख करके ही मैं आया हूँ कि अब वे [सुखी] नहीं हो सकते, अब उनका विरह कम नहीं हो सकता है।”

“अरे, पहले की बात तो छोड़ो, जो मैं ये सब लीलाएँ करता हूँ, या करूँगा तो उनका विरह दुगुना हो जाता हैं। कैसे विरह हो जाता हैं? तवे को रोटी बनाने के लिए गर्म करते हैं और उसको लाल कर दो, इतनी आग उसमें प्रवेश करा दें कि एकदम लाल टेसू बन जाये और अब उसपर एक बूँद पानी छिड़को, क्या होगा? छन्न करके [एकदम वाष्प बन जाता है।] यदि वह छन्न तुम्हारे मुख पर लग गया, तो फफोला बन जायेगा। इसी तरह से मैं यदि वृन्दावन में जाकर लीलाएँ करूँ, तो [वह] उनको क्षणभर के लिए प्रतीत होती हैं, उससे उनका विरह दसगुना, बीसगुना, पचासगुना बढ़ जाता है। वह कैसे? एक बूँद उस तवे के ऊपर में पड़ जाये—गोपियों के विरह से भरे हुए हृदय में। गोपियों का हृदय जो है वह तवा है, उसपर [मेरी लीलाएँ उनके लिए एक बूँद के समान है,] और छन्न से गोपियों का विरह उष्मा से भर जाता है। [उनके विरह को दूर करना मेरे लिए] सम्भव नहीं हैं। मैं हार करके यहाँ पर बैठा हूँ। बल्कि विरह में मेरी चिन्‍ता करते-करते त‍न्मय होकर वे हमारे मिलनरूपी सुख की चि‍न्ता तो कर सकती हैं, कि‍‍न्तु साक्षात् रूप में [मिलन से] उनका विरह और बढ़ जाता है। [अतः मेरे लिए वहाँ जाकर उनके विरहताप को दूर करना] सम्भव नहीं है।

तात्पर्य यह है कि गोपियाँ ऐसा सोचती हैं— “कृष्ण का ऐसा जो विरह है, हम कैसे सह सकेंगी?” सारे ब्रजवासी लोग भी ऐसा सोचते हैं। विशेष करके गोपियाँ [सोचती हैं—] “कृष्ण अभी छोड़ करके चले जायेंगे, गोचारण के लिए जायेंगे, रात में सोने के लिए मैया के घर में जायेंगे—वह विरह हम कैसे सह सकेंगी? यह [हमारे लिए] सम्भव नहीं है।”

इसलिये हम जो कुछ विहार इत्यादि करते हैं, वह [तो केवल] एक बूँद के समान होता है। गोपियों के तवेरूपी हृदय के ऊपर में पड़ते ही वह छन्न करके उड़ जाती है, और गोपियों का विरह और भी दसगुना, पचासगुना अधिक बढ़ जाता है। इस प्रकार से हम विचार करके देखते हैं कि मधुर-मधुर लीलाओं से भी उनको सा‍न्‍त्‍वना नहीं होती है। उद्धवजी ने [यह ब्रज में] जा करके अनुभव किया।

साथ-ही-साथ में, जब कृष्ण सूर्यग्रहण के समय मथुरा-द्वारका के अपने परिवारवर्ग तथा अन्य सब [यदुवंशियों] के साथ कुरुक्षेत्र गये, तब गोपियाँ भी न‍न्दबाबा और यशोदाजी के साथ वहाँ पर पहुँचीं। वहाँ पर उनकी कैसी दशा थी! वे विरह से तड़प रही थीं। बहुत दिनों के बाद में [कृष्ण से मिलने पर गोपियों की कैसी दशा हुई] जिसका वर्णन किया, वह सब उसमें वर्णन किया है। उसका वर्णन करना असम्भव है।

कृष्ण कुछ अभास दे रहे हैं। तो उस समय कृष्ण ने [उन्हें] सा‍न्‍त्‍वना दी— “अरे! तुमसे हमारा वियोग कहाँ है? तुम लोग तो हमसे ही बनी हो, हमारे भावों से बनी हो। [वास्तव में] वियोग तो है ही नहीं। तुम लोग सोचो कि अब हमसे तुम्हारा वियोग नहीं है। ध्यान लगाओ—ध्यान में तुम हमें सर्वत्र पाओगी। हम कहाँ नहीं हैं? आग कहाँ नहीं है? घिसने से यहाँ पर भी प्रकट हो [जाती है।] अपने हाथों को ऐसे-ऐसे करो [अर्थात् घिसो], तो कुछ देर के बाद में देखोगे कि हाथ जल जायेगा, आग निकल आयेगी। लकड़ी को घिसो, एक पत्थर को पत्थर पर मारो, तो उसमें से आ‌‌‌ग की चिंगारी [निकलती है।] साधन से मिलता है। ऐसे ही तुम साधन करो, ध्यान लगाओ।”

कि‍न्तु कृष्ण का यह जो सा‍न्‍त्‍वना देना था, [गोपियों को] वह कैसा मालूम हुआ? उनकी विरह-अग्नि लाखों-करोड़ों गुना (time) बढ़ गयी। कृष्ण स्वयं यह देखकर अधैर्य हो गये। उद्धवजी सा‍न्‍त्‍वना देने [ब्रज] आये थे। उन्होंने बहुत सान्त्वना दी, कृष्ण का सन्देश भी दिया, उन लोगों ने सुना भी, कि‍न्तु [परिणाम] क्या हुआ? आगे कुरुक्षेत्र [प्रसङ्ग में] बतलायेंगे कि ‘जीवकोश ध्वस्त’ [#3] हो गया। ‘जीवकोश ध्वस्त’ माने क्या? गोपियों की जीने की जो लालसा थी, वह भी समाप्त हो गयी। [वे सोचने लगीं,] “अब हम लोग जीवित नहीं रह सकतीं।”

कुछ-कुछ कहते हैं कि ‘जीवकोश ध्वस्त’ हो गया– अर्थात् वे ब्रह्मलीन हो गयीं। [किन्‍तु] मूर्ख लोग ही ऐसी व्याख्या करते हैं। हमारे जीव गोस्वामी, सनातन गोस्वामी और विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी ने ऐसी सु‍न्दर व्याख्या की है, जैसा मैं कह रहा हूँ। जगत् में कोई ऐसा नहीं जन्मा, जो ऐसी [गूढ़] व्याख्या कर सके। केवल हमारे गोस्वामी लोग—रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, कृष्णदास कविराज गोस्वामी—ये लोग ही कर सकते हैं।

मैं तो समझता हूँ कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, श्रील रूप गोस्वामीजी के कृपापात्र और उनके ही द्वितीय अवतार हैं; नहीं तो ऐसा कैसे लिख सकते हैं? यहाँ तक कि जीव गोस्वामी ने जो स्वकीयावाद के लिए लिखा था, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने उन्‍हें प्रणाम करते हुए, उनकी चरणधूलि लेते हुए उनका भी ऐसा खण्डन किया है, जिसे दूसरे लोगों के लिए समझना कठिन है। भक्तिविनोद ठाकुरजी ने उसका [सुन्‍दर] सामञ्जस्य (reconciliation) किया, अन्यथा [उसे समझना सम्भव] नहीं था।

तो वही कृष्ण कह रहे हैं— [“अग्नि का उष्ण स्वभाव जैसे किसी भी प्रकार से दूर नहीं होता, उसी प्रकार उनको मेरे द्वारा असाधारण महाप्रसाद (विशेष कृपा) प्रदान किये जाने पर भी उनके स्वभाव के कारण मैं किसी भी प्रकार से उनके उस विरहदुःख को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाऊँगा।”]

जिस प्रकार से अग्नि गर्म है न? उसको ठण्डा कैसे करना है? आग ठ‍ण्डी कैसे होगी? यदि पानी डाल दो, अरे! तो आग रहेगी? आग के रहते हुए ही, उसको जरा सुशीतल बनाओ। आग जल रही है, उसको सुशीतल बना दो तो, यह सम्भव नहीं है। ऐसे गोपियों का जो विरहमय हृदय है, वह आग के समान है। यदि उस पर पानी [डाल] दो, तो वह बुझ जायेगी, [अर्थात्] वह समाप्त हो जायेगी। [इसलिये] या तो गोपियाँ मर जायेंगी; या [यदि वे] जीवित रहेंगी, तो ऐसा ही होगा [अर्थात् उनका हृदय विरहमय ही रहेगा।] बड़ा कठिन है।

और पानी देने से और…

भक्त: गर्मी बढ़ जायेगी।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [उदाहरण के लिए] दावानल है। वन में आग लग गयी और वहाँ पर दमकलवाले जाते हैं और पानी देते हैं, तो आग और बढ़ जाती है, जैसे [उसमें] घी दे दिया हो। थोड़ी-सी आग रहे, तो बुझ जायेगी, किन्‍तु यदि अग्नि का विराट स्तूप हो, तो उसपर जितना भी पानी दो, [आग और भड़क उठती है।] कोई उदाहरण है? हाँ, उदाहरण तो बहुत हैं। कहाँ? कृष्ण और अर्जुन के खाण्डववन [के प्रसङ्ग में।] अग्निदेव ने वरदान माँगा था। अर्जुन ने ऐसा किया कि बाणों से अग्नि लगा दी, और [उस वन को] चारों ओर से बाणों से घेर लिया, जिससे कोई पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग [बाहर] नहीं निकलने पाये और वहाँ पर बहुत जोर से पानी भी दे रहे हैं, तो आग एकदम से धग-धग-धग करके बढ़ गयी।

अभी हमने देखा कि अमेरिका में वन में आग लग गयी थी और पानी देने से [आग और अधिक भड़क उठी।] फिर जब बहुत तेज मूसलाधार वर्षा हुई, [तब वह आग बुझ सकी।]

भक्त: वह आस्ट्रेलिया में हुआ था।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, आस्ट्रेलिया में भी [हुआ था, और] वहाँ पर अमेरिका में भी। अभी तक पचासों-सैकड़ों कोस वह वन-जंगल जला हुआ है—यह हमने [स्वयं] देखा।

ऐसी ही गोपियों की विरह-अग्नि है। अभी जो [हम इसका] वर्णन कर रहे हैं, वह सम्पूर्ण नहीं—अभी हमलोग [केवल उसका] अभासमात्र वर्णन कर रहे हैं। इसी प्रकार से कृष्ण यदि उनपर जितनी भी कृपा करें, तो वह विराट अग्नि में एक बूँद पानी के समान प्रतीत होती है। उनका विरह और भभक उठता है।

कृष्ण कहते हैं— “मैं किसी भी प्रकार से उनके विरह का दुःख दूर करने में समर्थ नहीं हूँ। इसलिये इससे बढ़ करके गोपियों का क्या माहात्म्‍य होगा? तुम लोग तुलनामूलक दृष्टि से इसका विचार करो”

[49.46-55.25 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आप लोग भी समझो — कृष्ण कह रहे हैं, “देखो, जितने भी भक्त हैं, जो हमारा साधन-भजन करते हैं, उनमें किसको हमारा विरह-दुःख नहीं है? [कौन भक्त नहीं चाहता] कि कृष्ण मिलें?”

यदि किसीको समाधि में या किसी प्रकार से स्फूर्ति में एक बार भी कृष्ण का दर्शन हो जाये, तो वह नारदजी की तरह बावरा हो जायेगा। नारदजी ने [भी केवल] एक बार मन ही में दर्शन किया था। तब कृष्ण ने कहा— “अब [इस शरीर में फिर] दर्शन नहीं होगा। अब तुम हमारे गुणगान करते हुए पृथ्वी में घूमो; जब यह शरीर समाप्त हो जायेगा और चिन्मय शरीर मिलेगा, तब [तुम्हें पुनः मेरा दर्शन] होगा।”

इसलिये इस जगत् में [जो भी साधक हैं, सब कृष्ण-दर्शन ही चाहते हैं।] बहुत से लोग यहाँ आये हैं, हम ही लोगों में कौन कृष्ण का दर्शन नही चाहता? इसलिये तो [हम] साधन-भजन [कर रहे हैं।] सब कोई चाहते हैं। तो हम लोगों में विरह दुःख है कि नहीं? कुछ को तो है। अब इसको ले करके देखो, कहाँ? अनुभव करो कि गुरुजी के प्रति तुम्हारा कितना विरह है? यदि गुरुजी के प्रति विरह है तो समझो कि कृष्ण के प्रति भी विरह होगा। [यदि] कृष्ण के प्रति विरह है कि‍न्तु राधिकाजी के प्रति विरह नहीं है, तो क्या होगा? राधाजी तो गुरु हैं न? यदि राधाजी के प्रति विरह है, तो समझो कृष्ण के प्रति एकदम बहुत सीमा तक [विरह है।]

तो हममें भी विरह का कुछ अंश या आभास तो है, कि‍न्तु इसको जो [वास्तव में] अनुभव करनेवाले हैं—शुकदेव गोस्वामी, शंकरजी, ब्रह्माजी, जि‍न्होंने उनका [साक्षात्] दर्शन किया है—उनमें यह विरह है कि नहीं? [उनमें भी विरह है, किन्‍तु] क्या [उनका] विरह गोपियों जैसा है? अरे, उनको छोड़ दो— रुक्मिणी और सत्यभामा को भी कृष्ण का विरह [होता] है। जब कृष्ण इधर-उधर या इ‍न्द्रप्रस्थ इत्यादि [स्थानों पर] जाते हैं, तो उनको भी [साथ] ले जाना पड़ता है। किन्‍तु जहाँ [कृष्ण] युद्ध में जाते हैं, वहाँ [साथ] नहीं जा पातीं, तो उनको विरह का बड़ा दुःख होता है। [किन्‍तु क्या] उनका विरह भी गोपियों जैसा है?

यहाँ तक कि ललिता और विशाखा को भी कृष्ण का विरह है, कि‍न्तु राधिका जैसा है क्या? क्यों? इसका प्रमाण क्या? वे तो राधाजी को सान्‍त्‍वना दे रही हैं। इसका मतलब है कि उनको अभी कुछ होश-हवाश है। तो विरह सबसे [अधिक] चरमावस्था तक कहाँ है? गोपियों में। और गोपियों से भी अधिक राधिका में।

जहाँ पर यह विरह का दुःख अनुभव होता है, वहीं पर कृष्ण का दर्शन करने से सुख होता है। अथवा इसको इस रूप में कहो कि जि‍न्होंने साक्षात्‌ रूप में कृष्ण की सेवा की या राधाजी की सेवा की और सुख अनुभव हुआ, जितना सुख अनुभव हुआ, उसके विरह में उसको उतना ही दुःख होगा; नहीं तो [विरह-दुःख] नहीं होगा। आ रहा है समझ में? जिसको मिलन में सुख नहीं है, जिसने सेवा दे करके कृष्ण को, राधाजी को सुख नहीं दिया और उस सुख की अपने अन्दर अनुभूति है, [उसे ही विरह-दुःख होगा। वह] सुख नहीं चाहता कि‍न्तु करोड़ों गुणा सुख होता है। तो जिसको सुख की अनुभूति नहीं है, उसे क्या दुःख की अनुभूति होगी? उनको उतना विरह नहीं होता है।

इसलिये कृष्ण कह रहे हैं— “ये बात तो ठीक है कि सब भक्तों में विरह है, कि‍न्तु [उसमें भी] तारतम्य है। उस तारतम्य में ब्रजवासियों का विरह सबसे अधिक है और उन लोगों में भी माता-पिता का [उससे भी बढ़कर है] और उनसे भी करोड़ों गुणा [अधिक] गोपियों का और [गोपियों में भी सबसे अधिक] च‍न्द्रावली और राधिकाजी का विरह और च‍न्द्रावली से भी अधिक राधिकाजी का विरह।”

श्रील सनातन गोस्वामी कह रहे हैं— “इस विरह का मैं कैसे वर्णन करूँ? मेरे लिए सम्भव नहीं है। जो मैंने यह विचार दिखलाया है, [वह केवल] मैंने दिग्दर्शन से दिखलाया है।”

दिग्दर्शन माने क्या? दिक्-दर्शन। जैसे [कोई कहे,] “ये चन्‍द्रमा कहाँ पर हैं? उस पेड़ की डाल पर है।” [किन्‍तु वास्तव में] चन्‍द्रमा कितना दूर है? करोड़ो-करोड़ो-करोड़ो मील!

भक्त: शाखाचन्‍द्रन्याय

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, शाखाचन्‍द्रन्याय [अप्रत्यक्ष या कठिन वस्तु को प्रत्यक्ष और सरल वस्तु के माध्यम से दिखाना या समझाना। जैसे जब कोई व्यक्ति पेड़ों की शाखाओं के बीच दिखाई दे रहे चन्द्रमा को सीधे नहीं पहचान पाता, तो शिक्षक पहले उसे शाखा दिखाता है और कहता है— “पहले इस शाखा को देखो। उसी के ठीक ऊपर चन्द्रमा दिख रहा है।]

[श्रील सनातन गोस्वामी कह रहे हैं—] “इसका मैं वर्णन नहीं कर सकता—कृष्ण के जो भाव हैं। [मैं कृष्ण के] भावों का वर्णन करने चला था, कि‍न्तु मैं कर नहीं सकता, पंगु हूँ, मेरे लिए सम्भव नहीं।”

जब ये [ऐसा] कह रहे हैं, तो हम लोगों की दशा क्या [होगी?] कहाँ है [हमारा] साधन-भजन? सब कहाँ है? [हम तो] गुरु-वैष्णवों की नि‍न्दा करते हैं और समझते हैं कि हम सबसे बड़े हो गये। और जो लोग ऐसे वैष्णव-अपराधियों का सङ्ग करते हैं, वे तो और भी गये-बीते हैं।

इसलिये इस जन्‍म में भगवद्‌-भजन हो जाये, ये सब भाव आयें। कि‍न्तु आयेंगे कैसे? सोचो-विचारो—यदि ऐसे महान् पुरुष हों, जिनको कुछ अनुभूति है, उनके आनुगत्य में भजन करो, तो आयेगा।

[60:50-64:51 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: My so much heartly blessings to Gopīnātha Prabhu and Tuṅgavidyā. I cannot repay their [debt,] I cannot repay them. Because in Mathura Maṭha there was no space for so many devotees. Even in Rūpa–Sanātana Gauḍīya Maṭha we have some place, but not like this. [Here,] at one time we can take prasādam. At one time thousands — two, three, even four thousand — [can take prasādam together.]

[गोपीनाथ प्रभु और तुङ्गविद्या के लिए मेरी अत्यन्त हार्दिक आशीर्वाद-शुभकामनाएँ। मैं उनका ऋण नहीं चुका सकता — बिल्कुल नहीं चुका सकता। मथुरा मठ में इतने भक्तों के लिए स्थान नहीं था। रूप–सनातन गौड़ीय मठ में कुछ स्थान है, किन्तु यहाँ जैसी व्यवस्था नहीं। यहाँ तो एक ही समय में प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है — एक समय में हज़ारों, दो हज़ार, तीन हज़ार, बल्कि चार हज़ार लोग भी साथ में प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।]

भक्त: (बाङ्गला भाषा में…) प्रसाद दोबारा हुआ, एक बार में नहीं हुआ।

अन्य भक्त: (बाङ्गला भाषा में…) यहाँ पर हॉल बनाने से नहीं होगा।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: We will request them not to make any hall or anything, [keep it] an open place. But I think one thing we can do: [make it] double-storeyed, so that from this and from that storey they can hear.

[हम उनसे अनुरोध करेंगे कि वे कोई हॉल इत्यादि न बनायें— उसे खुला स्थान ही रहने दें। पर मुझे लगता है, एक बात हम कर सकते हैं: इसे दो-मञ्‍जिला बना दें, ताकि ऊपरवाली और नीचेवाली दोनों मञ्‍जिलों से वे सुन सकें।]

भक्त: Like a cinema hall. [सिनेमा हॉल जैसा।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Anyhow, so my heartly blessings to them that they are giving all kinds of facilities here, all kinds of.

One thing more, anyhow try to follow my this Bṛhad–Bhāgavatāmṛtam. Sanātana Gosvāmī has said, “I cannot fully explain the mood of Kṛṣṇa. What I have shown [is only] like śākhā–candra–nyāya So something…” Then what about us? How can we [even] touch that? But we can touch it through the service of guru and Vaiṣṇavas. If we [truly] touch them, then greed for this bhakti will come.

My whole pariśrama — my endeavour — is only to make a greed, even slight, no harm, for Vraja-prema. You should try to understand this. If you can take it in your pocket, in your heart a good thing — I think that our parikramā is successful. So you should try to understand.

[किसी भी प्रकार से, मैं उन्हें अपना हार्दिक आशीर्वाद देता हूँ क्योंकि वे यहाँ हर प्रकार की सुविधा दे रहे हैं — हर प्रकार की।

एक बात और — किसी भी प्रकार से इस बृहद्भागवतामृत ग्रन्थ का अनुसरण करने का प्रयास करें। सनातन गोस्वामी ने कहा है— “मैं कृष्ण के भाव को पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं कर सकता। जो मैंने बताया है, वह शाखाचन्द्र-न्याय के समान मात्र एक संकेत है… कुछ थोड़ा-बहुत।” तो फिर हम लोगों की क्या स्थिति? हम उसे कैसे स्पर्श कर सकते हैं? लेकिन हम गुरु और वैष्णवों की सेवा के माध्यम से उसे स्पर्श कर सकते हैं। यदि हम वास्तव में उनके भाव तक पहुँच सकें, तो इस भक्ति के लिए लोभ अवश्य उत्पन्न होगा।

मेरा समस्त परिश्रम — मेरा पूरा प्रयास — केवल इतना है कि ब्रज-प्रेम के लिए थोड़ा-सा भी लोभ उत्पन्न हो जाये। थोड़ा भी हो, कोई हानि नहीं। आपको इसे समझने का प्रयास करना चाहिये। यदि आप इसे अपनी जेब में, अपने हृदय में रख सकें — तो मैं समझता हूँ कि हमारी परिक्रमा सफल है। अतः आप इसे समझने का प्रयास करें।]

(बाङ्गला भाषा में…) तुम महामन्‍त्र कीर्तन करो तो।

कल हम वृन्दावन में पहले सेवाकुञ्ज जायेंगे, फिर इमलीतला, शृङ्गारवट, फिर राधादामोदर [जायेंगे।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे
स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोध:।
वयमिव सखी कच्चिद् गाढनिर्विद्धचेता
नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.90.15)

रानियों ने कहा– हे कुररी पक्षी! तुम विलाप कर रहे हो। अब रात हो चुकी है, और इस संसार में कहीं गुप्त स्थान पर परमेश्वर सो रहे हैं। लेकिन हे सखा! तुम पूरी तरह जाग रहे हो, सो नहीं पा रहे हो। क्या ऐसा है कि हमारी तरह तुम्हारा हृदय भी कमलनयन भगवान् की उदार, चञ्‍चल मुस्कानभरी दृष्टि से छिन्न-भिन्न हो गया है? (BBT)

#2
दृष्टेऽपि शाम्येन्मयि तन्न दुःखं, विच्छेदचिन्ताकुलितात्मनां वै।
हर्षाय तेषां क्रियते विधिर्यो, दुःखं स सद्यो द्विगुणीकरोति॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.96)

अतएव मुझे देखने पर भी मेरे विरह से उत्पन्न उनका दुःख कदापि दूर नहीं होगा और यदि उनकी प्रसन्नता के लिए मैं उनके साथ मधुर विहार आदि भी करूँ, तो भी मेरे भावी विच्छेद की चिन्ता से आकुल होकर वैसा विहार आदि भी उनके दुःख को दो गुणा अधिक बढ़ा देगा। (GVP)

#3
अध्यात्मशिक्षया गोप्य एवं कृष्णेन शिक्षिताः।
तदनुस्मरणध्वस्तजीवकोशास्तमध्यगन्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.82.47)

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—परीक्षित्! श्रीकृष्ण से इस प्रकार अध्यात्म-शिक्षा के द्वारा स्वस्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके गोपियाँ प्रतिक्षण उनका ही ध्यान करने लगीं, जिससे उनके जीवन-कुमुद का अन्तर्भाग-आत्मा का सूक्ष्म आवरण-मिथ्या अहंकार ध्वस्त हो गया। श्रीकृष्ण को प्राप्त करने की आशा से (क्योंकि श्रीकृष्ण ने मथुरा आते समय यह प्रतिज्ञा की थी कि वे अवश्य-अवश्य ही आवेंगे) वे अपने जीवन की रक्षा के लिए किञ्‍चित् मात्र ही प्रयास करती थीं अर्थात् किसी प्रकारसे जीवन धारण करती थीं। जीवन की समाप्तिपर वे उन्हें ही प्राप्त हो गयीं [कृष्ण द्वारा प्रदत्त ज्ञान-प्राप्त गोपियों ने कहा कि हमारी जिज्ञासा न रहनेपर भी ये कृष्ण प्रथम तो रासलीला में धर्म के उपदेष्टा बने, बाद में उद्धव द्वारा ज्ञान के उपदेष्टा बने और अब पुन: ज्ञान का ही उपदेश कर रहे हैं—यह ज्ञान देने का स्वभाव इनके लिए दुस्त्यज्य ही है (अर्थात् ज्ञान देना छोड़ ही नहीं सकते)। नित्य सिद्ध साधुओं का लिङ्ग-देह नहीं होता, तब प्रेमधन-सम्पन्न हमारा (हम गोपियों का) जीवकोश (मिथ्या अहंकार द्वारा प्राकृत बन्धन) सम्भव ही नहीं है। (GVP)

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