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Sri Brhad-bhagavatamrtam: Separation of Gopis Higher than that of the Queens of Dvaraka and Laksmi

56:49
#300
Vrndavana
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 50%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • If our devotional practice grants us the qualification, we can have a sphurti of Krsna, like Bilvamangala Thakura and Narada had.
  • Without the mercy of Yogamaya, one can't see Krsna.
  • Serve with all your senses.
  • Srimati Radhika is the personification of hladini sakti and the gopis are Her kaya-vyuha and the Dvaraka queens are vaibhava-prakasa. These queens can attain prema till the stage of anuraga, that's why they can also experience prema-vaicittya.
  • There are 3 categories of prema: Prema of Laksmi, the queens, and the gopis.
  • (1) Laksmi serves the feet of Narayana. She doesn't have viraha or mana. Her prema is in opulence.
  • (2) The queens are married, but are not so enthusiastic to meet Krsna, because they don't experience obstacles.
  • (3) The gopis have divya-unmaddha. They experience intense separation, sometimes even while meeting.
  • We don't want Radha and Krsna to be separated. Separation only nourishes meetings.
  • In separation, Srimati Radhika continues to think about Krsna and experiences internal bliss because She believes She is meeting Him.
  • Krsna never returned to Vrndavana because He knew He couldn't ease the gopis' separation from Him just by visiting, and that they experienced bliss in separation.
  • Why Krsna married His queens of Dvaraka
  • Krsna visits the gopis but they think it is a sphurti.
  • Mathura is glorious, because Krsna took birth there, and Vrndavana is glorious because of the gopis. And because Krsna performed many pastimes with them there.
  • Note: Audio ends abruptly

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् : गोपियों का विरह द्वारका की महिषियों और लक्ष्मी से भी अधिक है

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 12 अक्तूबर 2003 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इस प्रकार से श्रीकृष्ण सत्यभामा को लक्ष्यकर गोपियों की महिमा का वर्णन करने लगे—“यदि मैं ब्रज में लौट भी जाऊँ, तो गोपियों से मिलन होने पर भी मैं उनको सान्त्वना नहीं दे सकता। [यदि] मैं नित्य उनके साथ वहाँ पर विहार करूँ, तब ये सम्भव है। किन्तु यह जरासन्ध, [शिशुपाल, दन्तवक्र] इत्यादि [बहुत से असुरों] को मारने के [बाद, धर्म संस्थापन के बाद ही] सम्‍भव है। यदि ये भी बात छोड़ दें, तो भी गोपियाँ जो चिरकाल से मेरे विरह में तड़प रही हैं, मेरे दर्शन से उनकी उत्कण्ठा और बढ़ जायेगी—विरह-उत्कण्ठा बढ़ जायेगी। [कुछ समय के लिए मेरा वहाँ जाना–] वह एक [तपते] तवे पर एक बूँद जल छिड़कने के समान है। [ऐसा करने से] उनको शान्ति [प्राप्त] नहीं होगी। कल मैंने इसको विस्तृत रूप से बतलाया था।

इसीके लिए सनातन गोस्वामी विचार करके बतला रहे हैं—भजन करते-करते जब व्यक्ति भगवत् साक्षात्कार के स्‍तर (stage) पर पहुँच जाता है, भगवान् का दर्शन करने के लिए योग्य बन जाता है... जैसे बिल्वमङ्गल, भजन करते-करते वृन्दावन में आये और कृष्णकर्णामृत की रचना हुई। और तब भजन करते-करते उनके समस्त अनर्थ दूर हो गये। वैश्या के प्रति आसक्ति भी दूर हो गई। तब वे भगवद्‍-साक्षात्कार के योग्य हुए।

नारदजी स्फूर्ति में कृष्ण के दर्शन करने के बाद, समय आने पर, जब वे चारों ओर विश्व में भगवान् की कथाओं का कीर्तन करते-करते [भगवद्‍-]साक्षात्कार के योग्य हुए, तब योगमाया ने क्या किया?—भगवान् के साथ में उनका मिलन कराया। और तब वे समझते हैं कि “मैंने अपनी आँखों से ही देखा।”

[इसी प्रकार] बिल्वमङ्गल भी सोचते हैं—“कृष्ण ने मुझे आँखें दे दीं और फिर मैंने दर्शन किया।” किन्तु [वास्तविक] बात यह है कि हम भक्त अचेतन आँखों से, मायिक आँखों से चिन्मय, सच्चिदानन्दघनविग्रह श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं कर सकते। [जड़-नेत्रों से चिन्मय दर्शन] असम्भव है।

तब योगमाया एक ऐसी शक्ति है… यहाँ पर योगमाया से समझो– ह्लादिनी-शक्ति का सार, स्वयं श्रीमती राधिकाजी। वे यदि किसी प्रकार से कृपा कर दें और हमारी चिन्मय सत्ता के साथ में कृष्ण की चिन्मय सत्ता को ‘समधि’ बना दें– एक बराबर बना दें, तो उस समय में आत्मा के द्वारा कृष्ण का दर्शन होगा और [तब ऐसा] समझेंगे कि आँखों से भगवान् का दर्शन कर रहे है। जड़ आँखों से भगवान् का दर्शन नहीं हो सकता। आत्मा तो है ही, आँख भी है ही, [फिर] क्यों दर्शन नहीं हो सकता? [क्योंकि] योगमाया के बिना, ह्लादिनी शक्ति के द्वारा सम्‍पर्क कराये बिना जीवात्मा कभी भी भगवान् का दर्शन नहीं कर सकती। [वास्तव में] आत्मा से ही दर्शन होता है, किन्तु तादात्म्य के कारण प्रतीति होती है कि [हमने] इन आँखों से भगवान् का दर्शन किया।

किन्तु भगवान् बड़े भक्तवत्सल हैं। कभी-कभी वे इस गुण के कारण ध्रुव इत्यादि किसी-किसी भक्त को आँखों से भी दर्शन करा देते हैं। किन्तु वह आँख का दर्शन भी क्या है? योगमाया [का कार्य है।] वही ऐसा कराती हैं। योगमाया ही उनके आत्मचक्षुओं से भगवद्‍-दर्शन कराती हैं। वे कौन है? ह्लादिनी-शक्ति। जब ह्लादिनी-शक्ति की कृपा भक्तों के हृदय में भक्ति के रूप में सञ्चरित होती है—अर्थात् प्रेमाभक्ति के रूप में—[तब ही वह भगवद्‍-साक्षात्कार के योग्य बनता है।]

‘भजधातु सेवायाम्’—सेवा माने क्या? तन, मन, वचन, आत्मा इत्यादि सब प्रकार से वैष्णव आनुगत्य में कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए ही जब निरन्तरमयी सेवा होती है, तब ये भक्ति वृद्धि होती है। यही बढ़ करके प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, भाव, महाभाव इत्यादि में जब जाती है, तो वह भक्त कृष्ण के दर्शन करने के योग्य होता है। और नहीं, यदि ऐसा न हो और [मान लो कि किसी प्रकार] भगवान् का दर्शन भी मिल गया, तो भगवान् ने कहा—“वर माँगो।” [तो भक्त ने] कहा—“प्रभु! मुझको बहुत नींद आ रही है, मैं आराम से सो जाऊँ।” [इस प्रकार] कोई जड़ीय पदार्थ माँग लोगे। इसलिये सब [जड़ीय] इच्छाएँ समाप्त होने के बाद में तब ह्लादिनी-शक्ति ऐसा योग कराती हैं।

राधिकाजी स्वयं ह्लादिनी-शक्ति हैं। और अन्य-अन्य गोपियाँ उनकी कायव्यूह हैं। और महिषीवर्ग उनका वैभव-प्रकाश हैं। ‘कृष्णके अह्लादे ताते नाम—ह्लादिनी।’— राधिकाजी स्वयं ह्लादिनीस्वरूपा हैं। और गोपियाँ उनकी कायव्यूह हैं, उनकी कलाएँ हैं। और महिषीवर्ग क्या हैं? उनका वैभव-प्रकाश हैं। लक्ष्मीगण भी उनका वैभव-प्रकाश हैं। इस प्रकार से लक्ष्मी का जो प्रेम है, वह ऐश्वर्यपूर्ण है। रुक्मिणी इत्यादि महिषियों [का जो प्रेम है,] वह महाभाव के प्रारम्भक अनुराग-पर्यन्त रहता है। [अर्थात् महिषियों का प्रेम यद्यपि अत्यन्त उच्च है, तथापि वह महाभाव की पूर्ण सीमा तक नहीं पहुँचता है। वह केवल महाभाव की प्रारम्भिक सीमा तक ही सीमित है]—जिसमें कि प्रेमवैचित्त्य होता है, [जैसे] कुररीवाला [प्रसङ्ग] जो कल सुनाया था। लक्ष्मी ऐश्वर्यपूर्ण हैं, और उनका प्रेम भी ऐश्वर्यपूर्ण ही है। और रुक्मिणी प्रभृति महिषियाँ महाभाव के प्रारम्भक...

भक्त: आभास

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आभास भी कह सकते हैं। [रुक्मिणी-प्रभृति महिषियों का प्रेम महाभाव के] प्रारम्‍भक अर्थात् अनुराग-पर्यन्त [तक स्थित है—अर्थात्] स्नेह, मान, [प्रणय,] राग, अनुराग और अनुराग में जब प्रेम अत्यन्त प्रौढ़ हो जाता है और वह महाभाव में रूपान्तरित होने लगता है, उस समय [वाले प्रेम के स्तरपर] ये रुक्मिणी, सत्यभामा हैं [अर्थात् उस स्तर तक ही इनका प्रेम पहुँचता है।] इसलिये उनमें प्रेमवैचित्त्य और मान दोनों होता है। लक्ष्मी में कभी मान हुआ? नहीं। और इन दोनों (रुक्मिणी और सत्यभामा) में प्रेमवैचित्त्य हुआ और मान भी हुआ, किन्तु थोड़ा-सा कृष्ण ने क्रोध प्रकाश किया, तो [मान] दूर हो गया। गोपियों के मान करने पर कृष्ण क्रोध प्रकाश करेंगे?

भक्त: उल्टा गोपियाँ ही क्रोध प्रकाश करेंगी।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गोपियाँ बल्कि क्रोध करेंगी? महिषियाँ मान में [कभी] क्रोध नहीं करेंगी—हजार [बार] कहने पर भी। इसलिये महिषियों के प्रेमवैचित्त्य का वर्णन किया गया है। किन्‍तु, यह जो प्रेमवैचित्त्य है, उसकी अपेक्षा—ओह!—कहीं भी कृष्ण-प्रीति [उतनी] नहीं देखी जाती, वह केवल ब्रजदेवियों में ही देखी जाती है—चरमसीमा तक। अतः ब्रजवासियों के अतिरिक्त अन्यत्र महाभाव की बात नहीं सुनी जाती है। महाभाव किसमें होगा? रुक्मिणी, सत्यभामा में नहीं, बल्कि ब्रजवासियों का सुना जाता है—[विशेषकर] गोपियों का। अब फिर से समझिये।

भगवान् की प्रेयसियाँ तीन प्रकार की हैं—लक्ष्मी, महिषी और गोपी।

इनमें लक्ष्मी अनादिकाल से बिना विवाह किये हुए नारायण के साथ में निरन्तर मिलन में रहती हैं। वे उनके चरणों को पलोटती हैं, चरणों की सेवा करती हैं। [नारायण के] वक्ष:स्थल में विलास करने पर भी [लक्ष्मी की] सेवा क्या है? उनके चरणकमलों का सन्तर्पण। लक्ष्मी नारायण की वक्ष:विलासिनी होने पर भी उनकी चरण की सेवा करनेवाली हैं। नारायण को इनके साथ मिलने में कोई उत्कण्ठा या प्रेम की सेवा में उत्कण्ठा नहीं होने से इनमें कभी भी विरह-वेदना नहीं होगी। लक्ष्मी को कभी विरह-वेदना होगी? [नहीं।] मिलने की उत्कण्ठा कभी होगी? ये भी नहीं होगा। अतः नारायण के साथ में इनका चिरमिलन विवाह के पहले से ही है। विवाह है ही नहीं। वैकुण्ठ में विवाह कब होगा? वे नित्यकाल से उनकी प्रेयसी हैं। इसलिये उनमें विरह भी नहीं है, मान भी नहीं है। उनमें उत्कण्ठा भरी हुई मिलन की तीव्र लालसा भी नहीं है। वे चिरदिन सेवा की अनुभूति में रहती हैं। [अतएव] उनका प्रेम उत्कण्ठा-शून्य, ऐश्वर्यमय है।

किन्तु महिषीगण विवाह-विधि के अनुसार [कृष्ण से] विवाहित हैं। उनका भगवान् (कृष्ण) के साथ मिलन भी होता है। वे आजीवन पति-बुद्धि से उनकी सेवा करती हैं। प्रथम मिलन में उत्कण्ठा रहने पर भी पत्नीरूप में स्वीकृत किये जाने के बाद [वह] उत्कण्ठा उतनी नहीं रहती, क्योंकि वे निरन्तर उनकी सेवा में रहती हैं और कोई [विशेष] बाधा तो है नहीं।

लक्ष्मीजी को तो एकदम [कोई] बाधा ही नहीं है—दिन-रात मिलन है। महिषियों को कभी-कभी बाधा होने पर भी कोई [विशेष] बाधा नहीं है। माता-पिता सामने नहीं आयेंगे और कोई भी बाधा नहीं। इसलिये उनमें मान और प्रेमवैचित्त्य उदय होने पर भी विरह के समय की उत्कण्ठा [वहाँ] नहीं है। वे निरुद्वेग (बिना किसी उद्वेग के), निश्चिन्त रूप में पति-बुद्धि से कृष्ण से मिलती हैं। इसलिये उनके मिलन में उत्कण्ठा नहीं है। [परिणामस्वरूप] उनके अनुराग का चरम-विकास नहीं होता। [वह] महाभाव [के उच्च स्तर]—मादन, मोदन, और मोहन तक नहीं जाता।

‘न विना विप्रलम्भेन सम्भोगः पुष्टिमश्नुते’—बिना विप्रलम्भ (विरह) के [सम्भोग की पुष्टि नहीं होती। बिना विरह के] प्रेम की पुष्टि नहीं होगी, उत्कण्ठा नहीं होगी, मान नहीं होगा, प्रेमवैचित्त्य चरमसीमा तक नहीं होगा, [वह] मादन, मोदन, मोहन तक नहीं जायेगा।

महिषियों में कुछ-कुछ महाभाव को छूने योग्य प्रेमवैचित्त्य देखा जाता है, किन्तु गोपियों के प्रेम में जो ‘दिव्योन्माद’ है, जो ‘मधुप कितवबन्धो’[#1] [आदि में व्यक्त हुआ है] —वह सब उनमें नहीं है। इसलिये वहाँ निरन्तर मिलन की सुखानुभूति है, तो उनको विरह-वेदना कहाँ से अनुभव होगी? [महिषियों में गोपियों की भाँति] विरह-वेदना भी नहीं है। वास्तिक पक्ष में, विरह के बाद मिलन [होने पर] जिस प्रकार से माधुर्य का उद्घाटन होता है, [वैसा सब समय मिलन होने पर नहीं होता।] जैसे, भूख लगने पर जैसा भी अन्न-साग मिल जाये, उसमें उत्कण्ठा, बड़ा स्वाद होता है, उसी प्रकार से गोपियों को विरह के बाद में मिलन होने पर प्रेम का आस्वादन होता है। यह महिषियों में नहीं है—यह केवलमात्र ब्रजगोपियों में है। इसलिये लक्ष्मियों के चिर-मिलन में जो आनन्द है और महिषियों के अबाध-मिलन में जो आनन्द है—[उन दोनों की] गोपियों की उत्कण्ठामयी, प्रेममयी, मानमयी जो भक्ति (सेवा) है, उससे तुलना नहीं की जा सकती। इस प्रकार से इस मिलन की अपेक्षा विरह का [अधिक] महत्व है। विरह का महत्व है। एक बार हम लोग अमेरिका या कहाँ गये थे, तो उसमें किसी व्यक्ति ने कहा कि नवद्वीप से कोई गौड़ीय-सारस्वत महात्माजी आये हैं...

भक्त: हवाई

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [तो हम लोग] हवाई में थे।

[He said—] “Viraha is more important than milana. So, we want viraha.”

I said— “Rādhikā wants separation or not? Any gopī of Vraja want separation or not? Even Rukmiṇī and Satyabhāmā want viraha or not? Lakṣmī wants viraha or not? Do you want that Rādhā and Kṛṣṇa should always remain separated? Do you want this? Is this service? But [real] service is what Rūpa-mañjarī is doing. Kṛṣṇa for a moment has gone to Candrāvalī at Gaurī-kuṇḍa and by trick, she brought Kṛṣṇa [back] to Rādhā-kuṇḍa—that is [true seva.]

[उन्होंने कहा— “विरह मिलन से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसलिये हम विरह चाहते हैं।”

मैंने कहा— “राधिकाजी विरह चाहती हैं या नहीं? ब्रज की कोई गोपी विरह चाहती हैं या नहीं? यहाँ तक कि रुक्मिणी और सत्यभामा विरह चाहती हैं या नहीं? लक्ष्मीजी विरह चाहती हैं या नहीं? क्या आप चाहते हैं कि राधा और कृष्ण सदा ही अलग रहें? क्या आप ऐसा चाहते हैं? क्या यही सेवा है? किन्‍तु वास्तविक सेवा तो वही है, जो रूपमञ्‍जरी करती हैं। कृष्ण क्षणभर के लिए गौरीकुण्ड पर चन्द्रावली के पास चले गये, तो उन्होंने उपाय करके कृष्ण को पुनः राधाकुण्ड पर पहुँचा दिया—यही वास्तविक सेवा है।”]

‘श्रीकृष्ण-विरहे राधिकार दशा, आमि त’ सहिते नारि’—तब तो यह बात गलत हो जायेगी। मैं कृष्ण के विरह में राधिका का दुःख—विरह नहीं सह सकती। मैं तत्क्षणात् उनसे मिलन कराने की चेष्टा करुँगी।

भक्त: राधिकार तरे, शतवार मरि, जीवन छाड़िते पारि।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [‘युगल मिलन, सुखेर कारण,] जीवन छाड़िते पारि’[#2]—इसलिये ऐसी भावना होनी चाहिए।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: महाराजजी! एक बात है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कहिये।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: जिन्होंने बताया, उन्होंने कुछ दृष्टिकोण से बताया।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: दृष्टिकोण से बताया तो, [किन्‍तु] हम ये कहते हैं कि हमारा...

श्रीपाद तीर्थ महाराज: सब दृष्टिकोण एक तो नहीं है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: दृष्टिकोण देखेंगे हम...

श्रीपाद तीर्थ महाराज: आपने जो बोला है, वह सिद्ध-स्थिति की बात है। और एक साधक-स्थिति की बात है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ठीक है। तो एक भक्त कहता है कि राधाकृष्ण में कभी मिलन न हो, तो ये हम मान लेंगे?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: नहीं, ऐसा नहीं है। ‘समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे’[#3]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: क्योंकि विरह सबसे अच्छा है, इसलिये [राधाकृष्ण में] नित्यकाल विरह बना रहे?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: नहीं, ऐसा नहीं है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कैसा नहीं है?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: ‘समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्‌क्षे’—वृत्रासुर ने प्रार्थना की, “प्रभु आपका विरह हमें अनुभूति हो।” और उसके बाद में ‘प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा’[#4] ये प्रिया-प्रियतम के विरह की भाँति...

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तुम जैसा भी बतलाओ। तुम चाहते हो कि राधाकृष्ण अलग-अलग रहें कि क्या चाहते हो?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: नहीं, वह वाली बात नहीं।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो फिर यह तो थोड़ी-सी, छोटी-सी बात है, तर्क-वितर्क की बात नहीं है।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: नहीं, वह सिद्ध की स्थिति...

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सभी व्यक्ति मिलन चाहते हैं। हाँ, विप्रलम्भ की हम नहीं कहते हैं।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: एक साधक है…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सुनो, [अच्छे से] सुनलो और विचार करके देखो। आप लोग विचार करो कि हम राधाकृष्ण का विरह चाहते हैं कि नहीं? हम जानते हैं कि विरह में कुछ आनन्द है। तो [क्या] इसलिये हम यह चाहेंगे कि राधा और कृष्ण में विरह हो जाये और वे छटपट करें? ऐसा कौन मूर्ख होगा जो ऐसा कहेगा? चाहे किसीका भी दृष्टिकोण हो—हम मान लेते हैं कि किसी का एक दृष्टिकोण है—किन्तु [क्या] फिर भी वह चाहेगा कि राधाकृष्ण अलग-अलग रहें? और हम [उनके विरह में] आनन्द देखेंगे—राधिकाजी उनकी चिन्ता में, विरह में बड़ा आनन्द का अनुभव कर रही हैं। वाह! वाह! वाह!

श्रीपाद तीर्थ महाराज: राधाकृष्ण आराध्य वस्तु हैं और साधक एक साधक है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कौनसा साधक?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: कोई भी साधक

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कोई भी साधक कैसा?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: जो कोई साधक रहा...

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जो निम्न-स्तर (third class) का, अभी भजन में प्रवेश ही नहीं किया है और जो अभी प्रथम अधिकारी है—उसको, या द्वितीय मध्यम को, या [फिर] उत्तम को?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: एक साधक क्या चाहेगा? और एक सिद्ध जो आराध्य...

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तुम जितना भी तर्क करो। तुम चाहते हो कि राधाकृष्ण अलग-अलग रहें? अभी तो तुम ऊँचे साधक भी नहीं हो। तुम बतलाओ?

श्रीपाद तीर्थ महाराज: नहीं, राधाकृष्ण अलग रहें—ये कोई बात नहीं है। हमारे वैष्णव-साहित्य में सभी कुछ लिखा गया है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तुम जितना भी कहो।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: विरह को लिखा। मिलन को भी लिखा।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हम यह] सब मान लेते हैं कि विरह बहुत उच्चतम कोटि की वस्तु है; किन्तु फिर भी वह विरह किसलिये है? सम्भोग की सन्‍तुष्टि के लिए—इसको मान लो।

श्रीपाद तीर्थ महाराज: वह तो सिद्ध...

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जहाँ पर वह विरह सम्भोग की सन्‍तुष्टि नहीं करता है, वह विरह त्यज्य है।

(बाङ्गला भाषा में) इस कारण मिलन की अपेक्षा विरह का माहात्म्य है, किन्तु स्थायीभाव में स्वतः ऊष्णता की भाँति… [कृष्ण कह रहे हैं—“मेरे द्वारा अनुष्ठित लीला भी उनके लिए अग्नि के उष्ण स्वभाव के समान होती हैं। अर्थात् अग्नि का उष्ण स्वभाव जैसे किसी भी प्रकार से दूर नहीं होता, उसी प्रकार उनको मेरे द्वारा असाधारण महाप्रसाद (विशेष कृपा) प्रदान किये जाने पर भी उनके स्वभाव के कारण मैं किसी भी प्रकार से उनके उस विरह दुःख को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाऊँगा। अतएव इसी प्रकार से ही उनका माहात्म्य स्थापित होता है।”]

अदृश्यमाने च मयि प्रदीप्त, वियोगवह्नेर्विकलाः कदाचित्।
मृता इवोन्मादहताः कदाचिद्, –विचित्रभावं मधुरं भजन्ते ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.97)

[मेरे दर्शन न प्राप्त करने पर कभी वे प्रदीप्त विरहानल से व्याकुल हो जाते हैं, कभी मृतप्राय हो जाते हैं और कभी-कभी उन्मादग्रस्त होकर अनेक मधुर भावों का आश्रय ग्रहण करते हैं।] GVP

कभी-कभी मैं गोपियों से मिलता हूँ और [मेरे] अदृश्य होने पर कभी वे प्रदीप्त विरह से विकल हो जाती हैं, मेरे विरह में मोहग्रस्त हो जाती हैं, मृतवत् हो जाती हैं [और कभी-कभी] उन्मादग्रस्त हो करके विविध प्रलाप इत्यादि करने लगती हैं।

कोई भी सखी [ऐसा विरह] चाहेगी? ...

ओह! बहुत बोलना है न? हम तो धड़-धड़ बोलते जा रहे हैं। You should explain something.

[22:38-31:45 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण कह रहे हैं—“अरी महिषियों! अरे! देखो तो, गोपियों का प्रेम कैसा है! कभी-कभी [जब] मैं अदृश्य हो जाता हूँ, तो विरह में वे अन्धकार को मेरा स्वरूप समझ करके उसका ही चुम्बन करने लगती हैं, आलिङ्गन करने लगती हैं। एक तमालवृक्ष को ही मेरा स्वरूप समझ करके उसका आलिङ्गन करती हैं। [जहाँ] कहीं भी कोई श्यामल [वस्तु] देखती हैं, एकदम मेरी स्मृति उनको आ जाती है। अहो! परम आश्चर्य का विषय यह है कि उन लोगों की यह जो विरहाग्नि है, उसे मैं किसे बतलाऊँ? कोई भी योग्य [व्यक्ति] नहीं मिलता, जिसे बतलाऊँ। और मैं वर्णन भी नहीं कर सकता। और यदि [मैं इसका] वर्णन कर भी दूँ, तो उस व्यक्ति का हृदय भी वैसा ही बन जायेगा—[वह भी] दिन-रात विरह में तड़पेगा। इसलिये मैं इसका वर्णन नहीं कर सकता। मैं ब्रज में अवस्थान करनेपर, रहनेपर भी उन लोगों को अधिकतर सुख दानकर विरह-चिन्ता के दुःख को दूर नहीं कर पाता। उनका दुःख और द्विगुणित होता चला जाता है। बल्कि विरह में मैं देखता हूँ, मेरे अदृश्य हो जाने पर [देखता हूँ] कि [गोपियाँ] विरह में ऐसे तन्मय हो जाती हैं कि उस अवस्था में समझती हैं कि मुझसे मिल रही हैं, मुझसे बातें करने लगती हैं और बड़ी प्रसन्न हो जाती हैं। बल्कि यह तो अपेक्षाकृत अच्छा है। विरह में तीव्र चिन्तन करते-करते-करते कुछ समय तो उनका आनन्द से बीत जाता है कि ‘वाह! हम कृष्ण से मिल रही हैं, कृष्ण हमारी आँखें बन्द कर रहे हैं, कृष्ण हमसे ठिठोली कर रहे हैं।’ अन्‍ततः यह तो थोड़ा-सा हो जाता है। किन्तु मिलन में तीव्र उत्कण्ठा, तीव्र दुःख होता है। इसलिये तो मैं [ब्रज में] नहीं जाता।”

कृष्ण ब्रज में नहीं जाते, इसका प्रधान कारण यही है, और कोई [या यह] कारण नहीं है कि उनको विरह का दुःख हो।

[कृष्ण कह रहे हैं—] “इसलिये हमारे मिलन से, उनके साथ में विलास करने से, उनको आनन्द [मिलने] के बदले में उनकी विरह-अग्नि द्विगुणित होकर भड़क उठती है। इसलिये मैं [ब्रज में] जा करके क्या करूँ? किसको समझाऊँ? उनको तो सुधबुध है नहीं, मूर्छित पड़ी हुई हैं। और यदि मैं उनको चेतन करके फिर [उन्‍हें आनन्‍द प्रदान करने का प्रयास] करूँ, तो भी मैं नहीं कर सकता। इसलिये मैं इच्छा करके भी, अपनी सारी अघटनघटन-पटयसी शक्ति लगा करके भी उनका सन्‍तोष विधान नहीं कर सकता। अतएव मेरा ब्रज में वास करना, और न वास करना—दोनों एक ही समान है। [मेरा वहाँ जाना] उनकी विरह-अग्नि को भड़काना है। बल्कि हाँ, मेरा यहाँ मथुरा में रहना, उनको किसी कारण से थोड़ा-सा सुख प्रदान करता है।

वे विरह में तन्मय हो करके हमारी चिन्ता करते-करते भौंरे से बातचीत तो करती हैं—“तू उस काले का दूत है? यहाँ पर क्यों आया? अपनी मूँछों से हमको मत छुओ। तू अपवित्र है। [बुद्धिमान पुरुष दो पद के होते हैं।] पशुमात्र ही चार पैरवाले होते हैं, किन्‍तु तुम तो षट्‍पद हो। तुम मूर्ख से भी मूर्ख से भी अज्ञानी (जाहिल) हो। तुम्हें ज्ञान नहीं है। यदि तुम कहो कि—‘अरे! लक्ष्मीजी तो सब समय हमारे [प्रभु के] पास में रहती हैं, वे तो पतिव्रता हैं।’ तो [इसपर] हम लोग [कहती] हैं कि वे भोली-भाली हैं, उनकी समझ में नहीं आता। [किन्‍तु] हम तो कृष्ण को बचपन से जानती हैं। देखो, उसके लिए हमने घरबार छोड़ा और वह इतना निष्ठुर, बेदर्दी कि हमें ही छोड़ करके चला गया। तुम उससे सन्धि करने के लिए कहते हो? यह कदापि सम्भव नहीं। वह काला... जितने भी काले रङ्गवाले हैं, सभी एक समान हैं।”—इत्यादि सब वर्णन करती हैं।

और उस समय में कभी [कहती हैं—] “तुम आ गये? क्या प्रियतम ब्रज में आ गये हैं? क्या गुरु सान्दीपनि के घर से आ गये? बहुत अच्छी बात! वे कैसे हैं? सखा लोग कैसे हैं? – [इस प्रकार] सखाओं का कभी चिन्तन करते हैं? पिता-माता का कभी चिन्तन करते हैं?” —ये बड़े प्रेम से बोल रही हैं, किन्तु [गोपियों की स्थिति] कैसी है? वे महाविरह की अवस्था में हैं। विरह की अग्नि में बैठी हुई ये बातें कर रही हैं—आह! उनको विरह सुशीतल लग रहा है। यह एक ऐसी [अद्भुत] स्थिति है। जैसे बर्फ है न? बर्फ जला रहा है कि शीतल कर रहा है? शीतल तो कर रहा है, किन्तु शीतल में वह ताप का [अनुभव] दे रहा है। ऐसे गोपियों का [विरह] है। इसलिये मेरा ब्रज में वास करना और न वास करना एक समान है। बल्कि विरह में कुछ सान्‍त्वना उनको मिल जाती है कि मैं कृष्ण से मिल गयी।”

[कृष्ण आगे कह रहे हैं—] “इसलिये देखो, और भी सुनो। मैंने तुमसे विवाह किसलिये किया? विवाह करने का कारण जानती हो? ये मत समझ लेना कि मैं काम में मत्त हो करके और बिना स्त्री के रह नहीं सकता—इसलिये विवाह किया—यह एकदम गलत बात है।

एक लड़की थी—रुक्मिणी। नारदजी ने जैसे-तैसे उसे मेरी कथाओं को सुनाया और [उन्हें सुनकर] वह बचपन से ही मेरे प्रति अनुरक्त हो गयी। [किन्‍तु] उसका विवाह एक शृगाल—शिशुपाल के साथ में होना था। वह कभी उससे [विवाह] नहीं करना चाहती थी। शिशुपाल उससे बलपूर्वक विवाह करने के लिए जरासन्ध इत्यादि की अक्षौहिणी सेनाओं को ले करके वहाँ पहुँच गया। उसका भाई रुक्मी भी शिशुपाल से मिल गया। [किन्‍तु] बाकी सब लोग चाहते थे कि उसका विवाह मेरे साथ हो। [तब उस] लड़की ने बेहया होकर, निर्लज्ज होकर क्या किया? एक ब्राह्मण को अपने हाथ से पत्र लिखवाया। स्त्रियाँ लज्जा नहीं छोड़तीं। किन्तु उसने निर्लज्ज हो करके लिखा—‘मैंने अपना हृदय आपको सौंप दिया है। अब यह आपपर है कि आपका जो भोग है, वह शृगाल खाये या कौन खाये। मैं आपको सम्पूर्ण रूप से समर्पित हूँ। यदि आप नहीं आयेंगे, तो मैं विष खा करके मर जाऊँगी या किसी प्रकार से प्राण परित्याग [कर दूँगी।’] इसलिये मैं यदुवंशियों का मान रखने के लिए गया और भरी हुई राजसभाओं तथा सेनाओं के बीच से उसको हरण करके, उन [राजाओं] को हरा करके उसे यहाँ ले आया।

और भी एक कारण है—ये आठ जो महिषियाँ हैं, कुछ-कुछ रूप में, गुण में वे गोपियों के रूप और गुण के आभास जैसी हैं। इसलिये मैंने इनसे विवाह किया। सत्राजित ने मुझपर दोष लगाया। और जाम्बवान् ने यौतुक के साथ में, उपहार के साथ में जोर दे करके [जाम्बवती] के साथ मेरा विवाह करा दिया—इसलिये [मैंने उसे] ग्रहण किया। और यदि आवश्यकता होगी, तो मैं एक मिनट में तुम्हें छोड़ करके तीव्र गति से [गोपियों के निकट] चला जाऊँगा—यह समझ रखो। मैंने कामना-वासना के लिए, पुत्र के लिए विवाह-कार्य नहीं किया।”

[40:35-47:15 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण कह रहे हैं—“मेरी महिषियों! तुम जानती हो कि नहीं जानती हो, मैं नहीं जानता। मैं तो एक कणमात्र [रूप में ही] मथुरा या द्वारका में हूँ। मैं सम्पूर्ण रूप से वृन्दावन में, ब्रज में ही [रहता] हूँ। मेरे वहाँ होने पर भी मैं उनको सब समय प्रसन्न करने की चेष्टा करता हूँ, किन्तु उनका विरह बढ़ता जाता है। मैं जो कुछ करता हूँ, गोपियों को सन्‍तुष्ट करने के लिए [करता हूँ।] किन्तु मैं उनका महाऋणी हूँ। ‘न पारयेऽहं निर्वद्यसंयुजां’[#5]—मैं उनका चिरऋणी हूँ। मैं कभी उनके ऋण से उऋण नहीं हो सकता। मैं तो सम्पूर्ण रूप से (totally) ब्रज में [विद्यमान] हूँ। उद्धवजी को यह एक आंशिक भाव से दिखलाया था। मैं वहीं तो पड़ा हुआ हूँ। यहाँ पर तो एक अंशमात्र हूँ। गोपियाँ क्या मानती हैं? गोपियाँ समझती हैं कि [उन्‍हें] मेरी स्फूर्ति हो रही है—विरह की दशा में स्फूर्ति [हो रही] है।”

जैसे शची मैया [के साथ] होता था—महाप्रभु आ करके शचीजी द्वारा बनाया गया सब भोग लेते थे। और [शची मैया] सोचती थीं कि ‘ओह! मैं तो रसोई बनाना भूल गयी। मेरा बेटा निमाई नहीं आया।’ किन्‍तु महाप्रभुजी [स्वयं] आ करके, खा करके और उन्‍हें प्रणाम करके चले जाते। उसी प्रकार से जब गोपियाँ विरह में [अत्यन्‍त] अनुतप्त हो जाती हैं, तो कृष्ण सचमुच वहाँ पर पहुँच जाते हैं। वे उनकी सेवाएँ ग्रहण करते हैं, किन्तु वे समझ नहीं पातीं। [कृष्ण] यशोदा मैया की सेवा ग्रहण करते हैं, गोपियों से भी मिलते हैं। किन्तु फिर भी उनकी तृप्ति नहीं होती।

[कृष्ण कह रहे हैं—] “इसलिये तुम जानो या मत जानो। मैं सब समय सम्पूर्ण रूप से वहीं पर पड़ा हूँ।”

[कौरव-स्त्रियों ने ब्रज में श्रीकृष्ण के नित्य अवस्थान के विषय में वर्तमान काल का प्रयोग करते हुए कहा है—] ‘अहो अलं श्लाघ्यतमं यदो: कुलं, अहो अलं श्लाघ्यतमं मधोर्वनम्।’[#6]

जब कृष्ण हस्तिनापुर से अपनी रानियों के साथ में आ रहे हैं, उस समय कौरव की स्त्रियाँ कह रही हैं—“अहो! मधुकुल, यदुकुल संसार में सबसे श्लाघ्यतम है, सौभाग्यवान् हैं। यहाँ पर पुरुषश्रेष्ठ श्रीमधुपति, श्रीपति कृष्ण अवतीर्ण हुए हैं। वही कुल धन्य है और वृन्दावन का भी क्या सौभाग्य कहूँ? वृन्दावन का ऐसा कोई स्थान नहीं है, जो कृष्ण की पवित्र चरणरेणु से अभिषिक्त न हो, जहाँ पर उन्होंने क्रीड़ाएँ न की हों।” – [यह] सनातन गोस्वामी कह रहे हैं, किन्तु मैं समझता हूँ कि वृन्दावन का सौभाग्य इससे भी अधिक यह है कि [वहाँ] सर्वत्र राधारानी की पदरेणु है। उसको लेने के लिए ही कृष्ण घूम रहे हैं—उस चरणधूलि के लिए। इसलिये वृन्दावन की शोभा है।

और किसलिये वृन्दावन की शोभा है? —कृष्ण के विरह में गोपियों की उस महाविरह [दशा के कारण। कृष्ण से] मिलने पर उनको किस प्रकार का सुख होता है और विरह में उनकी क्या दशा होती है, इसके लिए [वृन्दावन की शोभा है।] इसलिये पृथ्वी ने मधुपुरी को धारण किया है। मधुपुरी धन्य है—कृष्ण का जन्म [होने के कारण] और साथ ही साथ ब्रज को धारण किये हुए है। और ब्रज पवित्र है, किसलिये? गोपियों के लिए।

इस प्रकार से [कृष्ण ब्रज में] मनुष्योचित [लीलाएँ कर रहे हैं।] दशम स्कन्ध में भी बतलाया गया है—

माथुरपुरस्त्रीणामुक्तौ—[मथुरा की स्त्रियों द्वारा कहा गया है—]

पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिङ्ग-
गूढ: पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्य:।
गा: पालयन् सहबल: क्‍वणयंश्च वेणुं
विक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्‍‍‍‍‍घ्रि:॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.44.13)

[अन्य नारियाँ कहने लगीं– सखी! सच पूछो तो ब्रजभूमि ही परम पवित्र और धन्य है, क्योंकि वहाँ ये सनातन पुरुष श्रीकृष्ण मनुष्य-वेश में छिपकर रहते हैं। देवदेव महादेव शङ्कर और लक्ष्मीजी जिनके श्रीचरणकमलों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु ब्रज में रङ्ग-बिरङ्गे विचित्र वन्य पुष्पों की माला धारणकर बलदेवजी और ग्वालबालों के साथ बाँसुरी बजाते हुए, गौएँ चराते हुए और विभिन्न प्रकारके खेल खेलते हुए आनन्द से विचरण करते हैं।] GVP

यहाँ पर ‘रमार्चिताङ्‍‍‍‍‍घ्रि’ अर्थात् ‘रमा के द्वारा अर्चित पद’ हो करके भी वे वृन्दावन में पधार करके तरह-तरह की लीलाएँ करते हैं। वह वृन्दावन धन्य है। किसलिये? वेणु बजाते हुए स्वयं श्रीहरि वहाँ पर विराजमान होते हैं। इसी प्रकार से वे वृन्दावन की महिमा का वर्णन करने लगे।

[51:55-54:47 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल हम लोग मधुवन, तालवन, कुमुदवन और बहुलावन—इन चार वनों में जायेंगे। सवेरे पाँच बजे गाड़ी आ जायेगी। आप सब लोग बसों में बैठ जायेंगे। कुछ ब्रह्मचारी लोग, कनाई प्रभु और सब लोग यहाँ का जो कीर्तन है, संक्षेप में करेंगे। जब सब लोग गाड़ी में बैठ जायेंगे, तो यहाँ से हम लोग यात्रा [प्रारम्भ] करेंगे। मैं भी [साथ] चलूँगा।

[सबसे] पहले मधुवन में जायेंगे। वहाँ कृष्ण की गोचारण इत्यादि लीलाएँ, और किस प्रकार से शत्रुघ्नजी ने लवणासुर का वध किया—ये बतलायेंगे। और उसके बाद में हम लोग बलदेवजी के [प्रिय] वन– तालवन में जायेंगे, जहाँ पर बलदेवजी ने गुरु का कार्य किया था—[अविद्यारूप] धेनुकासुर को मारा था। और वहीं पास ही में, वहाँ से [लगभग] एक मील की दूरी पर कुमुदवन है—[जहाँ] कुमुद का सरोवर है और वहाँ उस कुण्ड में कृष्ण की [विविध] विहार-लीलाएँ हुई थीं। और उसके बाद में हम बहुलावन में पहुँचेंगे। वह बहुत ही गुप्त स्थान है, जहाँ कृष्ण की [गूढ़] लीलाएँ हुई थीं। चैतन्य महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु भी वहाँ पर गये थे। [वहाँ पर] शुक-सारी की भी बातें हुईं।

हम लोग तालवन में ही कुछ जलपान, बालभोग करेंगे। और उसके बाद में फिर हम लोग दर्शन करके 12 बजे तक, [लगभग] 1 बजे के पहले ही यहाँ पर उपस्थित हो जायेंगे। अधिक चलना नहीं है। चलना थोड़ा है। किन्तु बस में चढ़ करके वहाँ उतर करके दर्शन करके फिर बस में जायेंगे। इसलिये कष्ट तो नहीं होगा। फिर भी आप लोग देख लें। अभी प्रवचन के बाद में सब लोग बैठ जायेंगे और यहाँ पर [यात्रा के लिए] कार्ड (card) बाँटे जायेंगे।
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
मधुप कितवबन्धो मा स्पृशाङ्‍घ्रि सपत्न्याः
कुचविलुलितमालाकुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः।
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं
यदुसदसि विडम्ब्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.12)

हे मधुकर! हे धूर्तबन्धो! मुझे प्रसन्न करने के लिए तू मेरे पैरों का स्पर्श मत कर! मेरी सपत्‍नियों के कुचों से श्रीकृष्ण की जो वनमाला विमर्दित हुई है, तेरी मूँछोंपर उसीके चिह्न दिखायी दे रहे हैं। जैसे तेरे स्वामी मधुपति, वैसा ही तू उनका दूत मधुप। अतः हे मद्यप! सुन! मधुपति मथुरा की उन मानिनियों को सन्तुष्ट किया करें, परन्तु तुमने जिनका दूत बनकर ये जो रति-चिह्न धारण किये हैं—उन कृष्ण का यह आचरण यदुसभा में निश्चय ही उपहासास्पद होगा। (GVP)

#2
श्रीकृष्ण-विरहे राधिकार दशा, आमि त’ सहिते नारि।
युगल मिलन, सुखेर कारण, जीवन छाड़िते पारि॥
-गीतमाला

श्रीकृष्ण-विरह में श्रीमती राधारानी की दशा मैं सहन नहीं कर सकता। युगल-मिलन ही उनके सुख का एकमात्र कारण है; उसके बिना मैं प्राण भी त्याग सकता हूँ।

#3
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठयं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.11.25)

हे सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपकी सेवा त्यागकर ध्रुवलोक, ब्रह्मलोक, पृथ्वी का एकछत्र साम्राज्य एवं अणिमादि अष्टयोग-सिद्धियाँ, यहाँ तक कि मोक्ष भी प्राप्त नहीं करना चाहता। आपके विरह में मेरे प्राण रह भी जायें, तो ये सब मुझे क्या सुख प्रदान करेंगे। (GVP)

#4
अजातपक्षा इव मातरं खगाः
स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।
प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा
मनोऽरविन्‍दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (6.11.26)

हे कमललोचन! जिनके अभी पंख भी उत्पन्न नहीं हुए हैं, ऐसे पक्षी-शावक जिस प्रकार अपनी माता के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं; जैसे रस्सियों से बँधे छोटे-छोटे बछड़े भूख से पीड़ित होनेपर गाय के दुहे जाने की प्रतीक्षा करते हैं और जैसे वियोगिनी पत्‍नी अपने प्रवासी पति के दर्शन के लिए उत्कण्ठित रहती है, उसी प्रकार मेरा मन भी आपके दर्शन के लिए व्यग्र हो रहा है। (GVP)

#5
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः
संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.22)

हे वल्लभाओ! मेरे साथ तुम्हारा जो संयोग है, वह निर्मल, निर्दोष एवं विशुद्ध प्रेममय है। तुमलोगों ने दुर्जय गृह-बन्धनों का छेदनकर मुझसे प्रेम किया है; इसके लिए मैं देवताओं के समान दीर्घायु प्राप्त करके भी उसका प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं हो सकता। तुम्हारे साधु-कृत्य एवं सौम्य स्वभाव मुझे उऋण कर सकते हैं, पर मैं तो तुम्हारे इस प्रेम का सर्वदा ऋणी ही हूँ। (GVP)

#6
अहो अलं श्लाघ्यतमं यदो: कुलं
अहो अलं श्लाघ्यतमं मधोर्वनम्।
यदेष पुंसामृषभ: श्रिय: पति:
स्वजन्मना चंक्रमणेन चाञ्‍चति ॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.10.26)

अहो! पुरुषश्रेष्ठ श्रीपति जिस यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं, वह यदुकुल धन्य है और श्रीवृन्दावन का भी कैसा महान सौभाग्य है! श्रीकृष्ण की परम पवित्र पदरेणु के स्पर्श से वह स्थान परम गौरवयुक्त हो गया है। द्वारका के भी माहात्म्य की सीमा नहीं हैं—पृथ्वी उसको अपने वक्षःस्थल पर धारण करके धन्य हो गयी हैं। (GVP)

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