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Glories of Kumuda-vana, Chatikara, Bahula-vana and Sri Brhad-Bhagavatamrtam: Conversation Between Krsna and Satyabhama

01:24:43
#307
Vrndavana
Parikrama
Hindi
English
Srila Gurudeva 50%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Glories of Kumuda-vana, Chatikara, Bahula-vana
  • Conversation between Suka and Sari: Who lifted Govardhana?
  • Sri Brhad-bhagavatamrtam: Conversation of Krsna with Satyabhama.
  • How Krsna married Rukmini and the other queens.
  • Deliverance of the demons and Akrura.
  • Pastimes of stealing Krsna's flute.
  • State of the vrajavasis upon hearing Krsna's flute.
  • Explanation of the kirtana 'dhira samire yamuna tire'.

Transcript

कुमुदवन, छटीकरा, बहुलावन की महिमा तथा श्रीबृहद्भागवतामृतम् : कृष्ण और सत्यभामा के मध्य संवाद

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 13 अक्तूबर 2003 को वृन्‍दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

[श्रील गुरुदेव भक्तों से परिक्रमा और प्रसाद के सम्बन्‍ध में पूछते हैं…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज हम लोग श्रीश्रीगुरु-गौराङ्ग की कृपा से चौरासी कोस ब्रजमण्डल के मधुवन, तालवन और कुमुदवन में गये।

Today our Parikramā traveled to Madhuvana. I told the history of Madhuvana and then we went to Tālavana. I think that the history of that place has been told by so many [devotees—] Tīrtha Mahārāja and others. English translation has also been done, Bengali also. So no need [to repeat the kathā] of Tālavana and then [we went to] Kumudavana. Kumudavana is only [about] two miles from Tālavana. We used to do praṇāma from Tālavana to Kumudavana. Still the name of that vana is Kudaravana. First it was called Kumudavana and then Kudaravana. Then [there is] a kuṇḍa that is called Kumudinī-kuṇḍa or Vihāra-kuṇḍa. Kṛṣṇa and Baladeva [along] with their dear colleagues—gopa-sakhās cowherd—used to graze cows there.

[आज हमारी परिक्रमा मधुवन गई। वहाँ मैंने मधुवन की महिमा बतायी। उसके बाद हम तालवन गये। मुझे लगता है कि उस स्थान की महिमा तीर्थ महाराज आदि अनेक भक्तों द्वारा कई बार बतायी जा चुकी है। उसका अंग्रेज़ी और बाङ्गला में भी अनुवाद हो चुका है। इसलिये तालवन की कथा को पुनः कहने की आवश्यकता नहीं है। फिर हम कुमुदवन गये। कुमुदवन तालवन से लगभग दो मील की दूरी पर है। पहले हम तालवन से ही कुमुदवन को प्रणाम करते थे। पहले उसका नाम कुमुदवन था और बाद में कुदरवन हो गया। वहाँ एक कुण्ड है जिसे कुमुदिनी-कुण्ड या विहार-कुण्ड कहा जाता है। उस स्थान पर श्रीकृष्ण और बलदेव अपने प्रिय सखा, गोप बालकों के साथ गायों को चराया करते थे।]

गैयाएँ जब चर लेतीं… after grazing the cows, all cows Kṛṣṇa used to bring them. चूँ-चूँ [कहकर] जल पिलाते। तीरी-तीरी [कहकर] वहाँ से फिर निकट ले जाते।

Cu-cu means all cows should take water. At a time, lakhs and lakhs—millions of cows—used to come. And tīrī-tīrī [means—] “Oh! now you have taken water, now come down.” And then… [उसके पश्चात् वे] कुमुदिनि के फूलों का हार बना करके एक-दूसरे को देते।

They used to make garlands of that kumuda-puṣpa and [offer to each other.] Sometimes Kṛṣṇa used to call all the gopīs there, and they used to do vihāra in that kuṇḍa. And then…

(उसके पश्चात्) ब्रजयात्रा शान्तनु-कुण्ड से बहुलावन प्रस्थान करती है। उसमें मानको नगर, उसपार, लगायो, गणेशरा, दतिहा, आयोरे, गौराई, छटीकरा, गरुड़-गोविन्द, ऊँचागाँव [आदि दर्शनीय लीला-स्थलियाँ हैं। यहाँ यह ललिताजी वाला] ऊँचागाँव नहीं, दूसरा ऊँचागाँव है। ये दर्शनीय हैं। दतिहा में कृष्ण ने दन्तवक्र को मारा था, इसलिये [इसका] नाम दतिहा [पड़ा।] शान्तनु-कुण्ड जिसको सतोहा भी कहते हैं, वहाँ पर शान्तनु ऋषि ने यज्ञ किया [और] तपस्या की।

श्रीपाद माधव महाराज: राजा या ऋषि?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कौन?

श्रीपाद माधव महाराज: शान्तनु?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: शान्तनु राजा, किन्तु कृष्ण का भजन करने के लिए यहाँ आये थे।

आयोरे— [कृष्ण को देखते ही ब्रजवासियों ने प्रसन्‍नता से—] “कृष्ण आयो! आयो रे! ये ही आ गया! आयो रे! आयो रे!” [कहा था।]

“Oh! Kṛṣṇa has come. Oh! Let's go and see.” Thousands and millions of gopas and gopīs used to meet Kṛṣṇa.

छट्टीकरा (शकटीकरा)— वहीं पर गोप-गोपियों ने गोकुल महावन से आ करके गाड़ियों से शकटीकरा [बनाया था।] ‘शकट’ माने होता है—[बैलगाड़ी।] शकटीकरा माने गाड़ियों से घेरा बना करके नगर बसा दिया और वहीं से कृष्ण गोचारण करने के लिए और रासलीला के लिए वंशीवट इत्यादि में जाया करते थे।

गरुड़गोविन्द— हम जायेंगे, [तब] बतलायेंगे—हम लोग वहाँ जायेंगे।

बहुलावन— बहुत ही रमणीय स्थान है। [यह स्थान] ‘बहुला’ नामक हरि की एक सखी का निवासस्थल है—‘बहुला श्रीहरेः पत्नी तत्र तिष्ठति सर्वदा’। [इसका] वर्तमान नाम बाटी है। इसका वहाँ पर कुछ बतलाया था, तो [अभी] थोड़ा संक्षेप में [ही कहेंगे।] यहीं पर चैतन्य महाप्रभु जब आये थे, तो उन्होंने शुक और सारि को वाद-विवाद करते हुए देखा।

शुक कह रहा है— “मेरे कृष्ण मदनमोहन हैं, मदन को भी मोहन करनेवाले।”

सारि कहती है— “जब तक मेरी राधा उनके वाम भाग में है, तब तक मदनमोहन हैं, [अन्यथा] केवल मदन ही हैं।”

शुक कहता है— “कृष्ण ने गिरिराज को धारण किया। हमारे कृष्ण इतने बलवान हैं कि गिरिराज को धारण किया।”

सारि कहती है— “क्योंकि मेरी राधा ने शक्ति का सञ्‍चार किया था, अन्यथा धारण कैसे कर सकते? [राधाजी ने] शक्ति का सञ्‍चार किया।”

शुक— “मेरे कृष्ण जगत् के जीवन हैं।”

सारि— “मेरी राधा उनके जीवन की जीवन हैं। वे तो जगत् के जीवन हैं, और [मेरी राधा] उन जगत् के जीवन की भी जीवनी हैं।”

शुक— “मेरे कृष्ण के सिर पर मयूरपंख है।”

[सारि—] “क्योंकि [मेरी] राधा का नाम उसमें अंकित है, इसलिये।”

[शुक—] “मेरे कृष्ण के सिर पर बाईं और झुका हुआ मोरपंख है।”

[सारि—] “क्योंकि [वह मेरी] राधाजी के चरणों में झुकना चाहता है।”

[शुक—] “मेरे कृष्ण चाँद हैं”

सारि— “ओह! मेरी राधा चाँद पकड़नेवाली फाँद हैं।”

शुक ने कहा— “वृथा कलह करने की आवश्यकता नहीं; दोनों मिलकर किशोर-किशोरी का गान करेंगे।”

[सारि ने कहा—] “मुझे सहर्ष स्वीकार है।”

गोविन्दलीलामृत में ये सब कहा गया है। संक्षेप में वहाँ पर बतलाया भी होगा। इस तरह से तोषगाँव, जखिनगाँव, विहारगाँव, अडींग, माधुरी-कुण्ड, मयूरग्राम, छकनाग्राम इत्यादि हैं। वहाँ पर भीतर होने के कारण हम लोग नहीं जा सके।

[11:12-14:03 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अब हम लोग बृहद्भागवतामृत की कथा पर आ रहे हैं। We are coming to Bṛhad-bhāgavatāmṛtam.

कृष्ण ने कहा— “देखो, मुझे विवाह करने की कोई इच्छा नहीं थी। किन्तु किसलिये विवाह किया? रुक्मिणी मेरे विरह में प्राण छोड़ रही थी और दैत्यों का दलन करके मुझे उसे लाना [आवश्यक] था। इसलिये मैं दैत्यों का दलनकर उनके बीच से रुक्मिणी को उठा लाया; अन्यथा वह अपने प्राण परित्याग कर देती। सत्यभामा की भी उसी प्रकार [की स्थिति थी।”]

हमने [इस सम्बन्‍ध में] कल बतलाया था। कृष्ण काले हैं और रात भी काली (अँधेरी) होती है, इसलिये ब्रजवासी लोग [विशेष करके] गोपियाँ उसीका चुम्बन, आलिङ्गन करती हैं। इसका भी कल हमने वर्णन किया था।

[कृष्ण ने कहा—] “अब मेरे लिए ब्रज में वास करना और न करना दोनों ही एक समान है, क्योंकि मैं किसी प्रकार से उनको सान्‍त्वना नहीं दे सकता। बल्कि [मेरे रहने से] उनकी विरहाग्नि दुगुना, चार गुना, दस गुना और अधिक वर्धित हो जाती है।” — यह भी हमने कल बतलाया था।

“हे मानिनि! मान करनेवाली!” — [कृष्ण] यह किसको कह रहे हैं? सत्यभामा को।

“जब मैं पहले मथुरा में रहता था, तब गोप-गोपियों से विरह होने पर भी मेरी विवाह करने की इच्छा नहीं थी—एकदम नहीं थी। किन्तु रुक्मिणी इत्यादि के लिए मैंने विवाह किया।” यह प्रसङ्ग भी हमने बतलाया था।

“एक बात और समझो—रुक्मिणी को देख करके मेरे हृदय में गोपियों की स्मृति आती है; इसलिये मैंने विवाह किया कि उनकी स्मृति आयेगी। किन्तु वह स्मृति कैसी हो गयी? महाशोकपूर्ण और आर्त्तिजनक हो गयी, जिससे मैं अत्यन्‍त व्याकुल हो गया। क्यों? जब रुक्मिणी और सत्यभामा को देखता हूँ, तो राधिका और चन्द्रावली इत्यादि [गोपियों] का स्मरण हो आता है; ललिता, विशाखा का स्मरण आता है। मैं धैर्य नहीं बाँध पाता—महाशोक और आर्त्तता से पूर्ण हो जाता हूँ।”

और भी सुनो। कात्यायनी की पूजा किसने की थी? जिन्‍होंने कृष्ण को पति के रूप में, स्वामी के रूप में [पाने की कामना की थी।] वे कितनी थीं? षोड़श सहस्त्र एक शत अर्थात् सोलह हज़ार एक सौ।

षोड़शानां सहस्राणां सशतानां मदाप्तये।
कृतकात्यायनीपूजाव्रतानां गोपयोषिताम् ॥
निदर्शनादिव स्वीयं किञ्‍चित् स्वस्थयितुं मनः।
तावत्य एव यूयं वै मयात्रैता विवाहिता: ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.104-105)

[मेरी प्राप्ति की कामना से कात्यायनी-व्रत करनेवाली सोलह हजार एक सौ गोपकुमारियों के साथ तुम्हारी संख्या के सादृश्य को देखकर और उस दर्शन द्वारा अपने मन को कुछ स्वस्थ करने के लिए मैंने यहाँ पर तुमलोगों से विवाह किया है।] GVP

तो एक साथ [उन सोलह हजार एक सौ] गोपियों ने मुझमें चित्त निबद्धकर कात्यायनी की पूजा की और उसमें मन्त्र क्या था?

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतम् देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
श्रीमद्भागवतम् (10.22.4)

[वे कुमारियाँ कात्यायनी देवी को सम्बोधित करते हुए कहतीं— “हे महामाये! हे महायोगिनी! हे अधीश्वरी! हे कात्यायनी देवी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्ण को हमारा पति बना दीजिये। आपके चरणों में हमारा नमस्कार है।] GVP

इस मन्त्र का उच्चारण करके [वे कात्यायनी देवी की उपासना करने लगीं।] भक्त लोग जो कृष्ण के लिए कात्यायनी-व्रत करते हैं या जैसा चाहते हैं, तो वे [मन्‍त्र में] थोड़ा-सा परिवर्तन कर देते हैं—

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतम् देवि उपपतिं मे कुरु ते नमः॥

ऐसा करके वे लोग भजन करते हैं।

मैंने यह संख्या देखी—सोलह हज़ार एक सौ। और उसमें ‘च’ भी है; ‘च’ के द्वारा समझ लो कि आठ भी उसमें आ गयीं—आठ प्रधान महिषियाँ और सोलह हज़ार एक सौ, जिन्हें नरकासुर के कारागार से निकाला था। इन सबसे कृष्ण ने विवाह किया। तो कात्यायनी-व्रत करनेवाली भी सोलह हज़ार एक सौ थीं। जिसमें कहते हैं कि वे रामलीला से सम्बन्धित, [यज्ञ-]सीता से सम्बन्धित और जनकपुर की राजकन्याएँ थीं, जो राम को पति रूप में चाहती थीं। उन सबकी इच्छा को पूर्ति करने के लिए वे यहाँ पर आयीं। उसमें श्रुतिचरी, ऋषिचरी (मुनिचरी), यौथिकी, अयौथिकी इत्यादि [सम्मिलित थीं।]

तो मैंने विवाह किसलिये किया? [कात्यायनी-व्रत करनेवाली सोलह हजार एक सौ] गोपियों की संख्या [के साथ इनका सादृश्य] देखकर कि उनकी भी संख्या इतनी थी और इनकी भी संख्या उतनी ही है। संख्या [देखकर] मैंने सोचा कि मेरा दुःख दूर हो जायेगा, मुझे कुछ शान्ति मिलेगी और उन गोपियों की स्मृति हरी-भरी रहेगी।

किन्तु, हे भामिनी! ‘भामिनी’ माने क्या? प्रिये। ‘भा’ माने प्रकाशमान। तुम लोग निश्चय जान लो, याद रखो—मेरा वह सुख, वह शान्ति और वह महिमा मुझे परित्याग करके चली गयी है। मतलब क्या? मैं भी महाशोक में, विरहाग्नि में तड़प रहा हूँ। इनकी संख्या का गोपियों से सादृश्य अब मेरे हृदय को शूल की भाँति छेदन कर रहा है, मुझे दुःखी कर रहा है। क्यों? जब भी मैं यह सब देखता हूँ, तो मुझे ब्रज की याद आती है। मैं धैर्य धारण नहीं कर पाता; हृदय से विलाप करता हूँ। और उस दुःख को किसी से बाँट भी नहीं पाता, इसीलिये वह शूल की तरह मेरे हृदय में [निरन्तर] चुभता रहता है।

Can you [translate?]

कभी-कभी रामचन्द्रजी भी [अनुवाद]करें—इसके बाद वाला।

[21:31-25:42 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (बाङ्गला भाषा में…) हे भामिनी! जब मैं व्रज में था, तब वहाँ मैंने अत्यन्त चित्र-विचित्र और मनोहर विहार-रूप लीलाएँ कीं। उन लीलाओं में आनन्द-सागर में ऐसा निमग्न रहता था कि मुझे रात और दिन का भी भान नहीं होता था।

[यदि प्रश्न हो] कि यह कैसे सम्भव हुआ? अरे, आप लीला तो करते थे, [किन्‍तु दैत्यों के वध आदि में हुए परिश्रम में दुःख तो हुआ होगा?] आपको मारने के लिए पूतना आयी—छह क्रोस माने बारह मील लम्बी और कितनी ऊँची! उसके स्तन पर्वताकार, पेट कुण्डाकार अर्थात् सरोवर जैसा, इतनी विशाल! तो उसको मारने में आपको सुख कैसे हुआ? [इसके उत्तर में कह रहे हैं—] मुझे तो तनिक भी प्रयास नहीं करना पड़ा। मैं तो बालक रूप में ही उसके गले में खेल रहा था। थोड़ा-सा हाथ लगाने से या स्तन को चूसने से [ही उसके प्राण निकल गये। इसमें मुझे] थोड़ा-सा भी परिश्रम नहीं करना पड़ा और वह दैत्याकार छह मील में [धराशायी हो गयी।] ब्रज के लोग उथल-पुथल हो गये और [जब उन्होंने देखा कि] मेरे प्राण [सुरक्षित हैं,] तो उनके भी प्राण आ गये।

यद्यपि यह काम महादुर्दर्श और ऐश्वर्यपूर्ण था, किन्तु उसमें भी मुझे सुख हुआ। क्यों सुख हुआ? क्योंकि अनायास ही पूतना मर गयी। मैं क्या करूँ? मैं तो खेल ही रहा था, स्तनपान कर रहा था। और पूतना कैसी थी? जितने भी दुर्दान्‍त दैत्य थे, उनमें वह महादैत्य थी।

श्रीपाद माधव महाराज: बालघ्नी राक्षसी रुधिराशना [#1]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इतना भयंकर दूसरा कोई नहीं था—सबसे महाभयंकर वही थी। उसी प्रकार अघासुर [भी आया।] सखा और गोवत्स सब उसके पेट में चले गये। कृष्ण ने [बार-बार] कहा— “मत जाओ, मत जाओ, मत जाओ।” किन्‍तु उन्‍होंने सुना नहीं। [उन्‍होंने सोचा—] कृष्ण तो है, कोई चिन्ता की बात नहीं। चलो, देख आयें कि यह क्या है—पहाड़ है, कोई कन्दरा है, या खेलने का स्थान है या नहीं है?” सब उसके [भीतर] चले गये। तो भी उसने मुख बन्द नहीं किया। आकाश-पाताल के समान मुख ऐसे फैला कर रखा और अन्त में जब कृष्ण [भीतर] आये तो उसने उन्‍हें भी निगल लिया और मुख बन्द कर दिया। तब कृष्ण ने आग के गोले के जैसा रूप धारण किया और उसके कण्ठ में ऐसे अटक गये कि उसका श्वास-प्रश्वास सब बन्द हो गया। ब्रह्मरन्‍ध्र को फोड़ करके उसकी आत्मा निकल गयी और तब तक घूमता रहा जब तक कि कृष्ण के चरणकमलों में प्रवेश नहीं कर गया अर्थात् [जब तक] उसकी मुक्ति नहीं हो गयी। प्रतीत तो होता है कि उसे सायुज्य-मुक्ति मिली, किन्तु सायुज्य-मुक्ति नहीं हुई। क्या हुई? सारूप्य जैसी—सालोक्य में थोड़ा-सा गया। इसी प्रकार से ब्रजवासियों के भी पुनः प्राण लौट आये।

“ये सब लीलाएँ बड़ी मनोहर थीं। इन सब लीलाओं में मुझे तनिक भी कष्ट नहीं हुआ यह। दिन-रात को भी नहीं जान पाता था कि कहाँ गया दिन और कहाँ गयी रात। इस प्रकार मैं आनन्द सागर में निमग्न रहता था।”

यदि कोई कहे— “दैत्य-वध में दुःख तो होगा ही? — तो नहीं, तनिक भी दुःख नहीं; मुझे उसमें सुख ही प्रतीत होता था, क्योंकि वह सब बाल्यलीला का कौतुक था। और उधर बड़े-बड़े असुर लोग समाप्त [होते जाते थे—जैसे] बकासुर।

[कृष्ण] गोचारण कर रहे थे और वहीं पास ही में बकथरा नामक गाँव में [बकासुर] कृष्ण को मारने आया। उसने कृष्ण को पकड़कर अपनी चोंच से भीतर ले जाना चाहा। तब कृष्ण ने एक पैर से [उसकी निचली चोंच को] और एक हाथ से [ऊपरी चोंच को पकड़कर उसे] ऐसे चीर दिया—दो फाड़ [कर दिये। यह सब] अनायास ही, खेल-खेल में करते थे।

कुछ दैत्य थे और शाल्व मनुष्य का रूप धारण किये हुए था। शाल्व मनुष्य था, किन्तु उसका काम दैत्य-दानव का था। परम भयानक दुष्ट कालिय [का भी मैंने खेल-खेल में दमन किया।] मैं जब वहाँ गया, तब कालियह्रद को उसने विष बना रखा था, जिससे आग की लपटे उठती थीं। और मैं अनायास ही, बाल्यलीला में उसमें कूद गया और [खेल-खेल में] उसका दमन करके उसको बाहर भेज दिया।

[ये सब] मेरे लिए सुखकर लीलाएँ थीं, मुझे उनमें बड़ा‌ आनन्द आता था। इस प्रकार औरों की तो बात ही क्या, मुझे तनिक भी दुःख नहीं हुआ; बल्कि महासुख ही हुआ। मैं ब्रज में इस प्रकार आनन्द-समुद्र में निमग्न था कि ब्रह्मा और देवतागण स्तव-स्तुति कर रहे थे, [किन्‍तु] मैंने सुना तक नहीं। ब्रजलीलाओं में सखाओं के हाथों पर हाथ रख करके और लीला-कमल घुमा रहा था। किस तरह से? किसलिये? जो दूर में गोपियाँ खड़ी थीं, उनका हृदय वैसे डोल रहा था और उनके हृदय डोलने से मेरा भी [हृदय] डोल रहा था। कितने सुख और आनन्द की अनुभूति थी! दूसरों के लिए वे [कार्य] दुःखदायक [प्रतीत हो सकते थे,] किन्तु मेरे लिए परम सुखदायक थे। असुरों का संहार इत्यादि [कार्य] मेरे लिए क्या है? इसलिये बाल्यलीला में ही सबकुछ अपने-आप हो गया।

व्रजवासियों की बात तो दूर रहे, उस समय मेरा अपूर्व रूप [विशेष करके] कैशोर रूप , वेश और वंशी का मधुर स्वर समस्त चराचर विश्व को प्रेम में डुबो रहा था। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, शशि (चन्द्र) आदि देवतागण, सिद्धगण, गोपगण, वृषगण, वत्सगण, मृगगण, समस्त वृक्ष, पक्षी, तृण-लता-गुल्म, नदियाँ और मेघ समूह— जिनका वर्णन वेणुगीत में हुआ है—उन सबको मैं महाप्रेमरूपी समुद्र में निमज्जित कर रहा था। अब हाय! हाय! जब उसकी स्मृति आती है, तो मैं महादुःखी और शोकार्त हो करके विरहाग्नि में [स्‍वयं] भी जलने लगता हूँ।

[33:42-39:54 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण कहते हैं— “मुझे ब्रज की बातें याद आती हैं। कभी गोपियाँ मेरी वंशी चुरा लेती थीं—[विशेष करके] राधाजी। तब मैं विकल होकर उसे खोजता। ऊपर से विकल दिखायी देता था, किन्तु [भीतर ही भीतर] उसमें मुझे बहुत ही आनन्द प्राप्त होता था। कैसे? उसको ढूँढ़ने में जो आनन्द मिलता था, वैसा आनन्द मुझे और कहीं नहीं मिलता। चारों ओर खोजता था— ‘चोरी कर तुमने यहाँ छिपा दी? वहाँ छिपा दी? कहाँ छिपा दी?’ इस प्रकार से [वंशी ढूँढ़ता रहता।”]

[कृष्णदास एक कीर्तन करो—] राधे! दे दो ना वंशी मेरी।

[40:35- 46:18 तक कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Krsna is telling, “I remember the past days of Vraja. How happy I was! Sometimes gopīs used to take away, stole my flute (vaṁśī) to sell away. Then I used to pray to them, keeping my head at their feet, “sakhī! O Rādhe! Rādhe! Rādhe Rāṇī! Please return back my flute, otherwise I cannot live, cannot survive myself.

ओह! मेरे प्राण उसमें बस रहे हैं। मेरे प्राण ही वह वंशी है, उसीमें बस रहे हैं।

My life and soul is that vaṁśī, and you have taken it away from here. How can I survive? O Rādhike! You should see how I will call all the cows and collect them. O! They are grazing miles and miles away. How will I [gather them?] And how can I sing [without my flute]?

“मैं कैसे बजाऊँ? मैं तो उसीको बजाता था और उसीमें गान करता था। उसीसे गइयों को घेर करके लाता था। तुम मेरी वंशी दे दो।”

तो राधिकाजी उत्तर दे रही हैं— “अरे कान्हा! तू हमको ऐसा क्यों कह रहा है? कन्हैया काले! अरे, मुख से गाओ और हाथ से बजाओ—कोई बात नहीं। और अपनी लकुटी से गइयों को घेरकर ले आओ।”

“You should sing by your mouth and clap by your hands and by your stick you should collect your cows. Nothing is there.” Then Kṛṣṇa is telling, “No, no! Please return back my vaṁśī.”

अन्त में क्या [कहा?]

भक्त: हा हा करत तेरे पैयाँ परत हूँ…

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ओह! मैं तुम्हारे पैयाँ पड़ रहा हूँ। ‘पैयाँ पड़ने’ माने क्या? मैं अपना सिर तुम्हारे चरणों में झुका रहा हूँ और तुम हमारा दुःख समझो। मैं तुम्हारी शरण लेता हूँ। कृपा करके हमारी वंशी लौटा दो।

कृष्ण कहते हैं— “यह सब स्मरण करके मैं भाव-विभोर हो जाता हूँ। वे सब महिमाएँ कहाँ चली गयीं? सब छोड़ करके चली [गयीं।] उस समय मैं कितना सुन्दर लगता था! ब्रह्मा, शंकर, गन्धर्व और अप्सराएँ आकाश से पुष्प-वृष्टि करती थीं। वे विमानों पर चलती हुई मेरे रूप का दर्शन करके विमान में ही अपने पतियों की गोद में मूर्च्छित हो जाती थीं। उस समय गोपियों की मण्डली में मेरा वह कैसा अद्भुत कैशोर रूप था! मिनट-मिनट में वह बदलता था, बढ़ता रहता था। और गोपियाँ भी उसे प्रेम से कैसे देखती थीं? नित्य-नवीन रूप में देखती थीं। आज वह मेरा रूप कहाँ है? मेरा वह वंशीवादन कहाँ है? आज मेरा वह आनन्द कहाँ है? मेरा सब कुछ लुट गया। तुम लोग मेरे हृदय को नहीं समझ रहीं कि आज मैं किस प्रकार व्यथित और दुःखी हूँ। मैं किसको सुनाऊँ? मेरी विरह-व्यथा को सुनने के लिए मथुरापुरी या द्वारका में कोई नहीं है, जिसे [मैं यह सब बताऊँ। अधिकांश] अयोग्य हैं अथवा यदि कोई योग्य है, तो उसका हृदय भी फट जायेगा। इसलिये मैं इसे [किसीको] नहीं बतलाता।”

[50:55-52:27 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण कह रहे हैं— “देखो, उस समय मेरा कैशोर रूप कैसा सुन्दर था!” शुकदेव गोस्वामी उस रूप का वर्णन कर रहे हैं—

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीञ्‍च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्‍गीतकीर्तिः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.5)

[(गोपियाँ अपने भावनेत्रों से देखने लगीं) श्यामसुन्‍दर अपने सखा गोपबालकों के साथ वृन्दारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपुच्छ, कानों में कनेर का फूल, सुवर्ण जैसा चमकता पीताम्‍बर और गले में पाँच प्रकार के सुगन्धित पुष्पों से ग्रथित घुटनोंतक लम्‍बी मनोहर वनमाला विराजमान है। रङ्गमञ्‍चपर सुन्‍दर अभिनय करनेवाले नटवर का-सा सुन्‍दर वेश है। वेणु के छिद्रों से अपना अधरामृत प्रवाहित कर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी कीर्ति का गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठ से भी अति-रमणीय यह वृन्दावनधाम उनके शंख, चक्र आदि लक्षणों से युक्त चरणकमलों के चिह्नों से अंकित होकर और भी सुशोभित हो गया है।] GVP

कैसा सुन्दर रूप!

‘बर्हापीडं’— सिर पर मयूर का पुच्छ, उसीका मुकुट धारण किये हुए।

‘नटवरवपु:’— जब किसी अभिनय मञ्‍च पर कोई नट आता है, तो वह सबका चित्त मुग्ध कर लेता है। तो कृष्ण नटों में भी श्रेष्ठ हैं अथवा जो कृष्ण नृत्य-परायण हैं।

‘कर्णयोः कर्णिकारं’— मदमस्त होकर कनेर का फूल एक कान में धारण किये हुए हैं। कभी इधर रखते हैं, कभी उधर रखते हैं।

‘विभ्रद्वासः कनककपिशं’— बिजली के समान [दैदीप्यमान] सुन्दर पीताम्बर धारण करते हैं।

‘वैजयन्तीञ्‍च मालाम्’— सतरङ्गी फूलों की माला आपादमस्तक [पैर से लेकर सिर तक–नख-शिख] उसको धारण कर रहे हैं।

‘वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्‍गीतकीर्तिः’— उनके सखा लोग श्रीदाम, सुबल, मधुमङ्गल इत्यादि— “जय हो! कृष्ण की जय हो! कृष्ण की जय हो!” ऐसा कह रहे हैं।

“ऐसा सुन्दर मेरा रूप था कि त्रिजगत् उस पर मुग्ध हो जाता था।”

और कैसा [दृश्य था!] जब कृष्ण हजारों-लाखों गायों के साथ में वन में विचरते थे। उनके भैया बलदाऊजी आगे और कृष्ण पीछे [चलते थे।] उस समय गोपियों की ओर दृष्टि करते थे। मानो गोपियाँ आँखों के द्वारा अर्चन कर रही हैं और कृष्ण उसको अङ्गीकार कर रहे हैं।

तो ‘व्रजेशसुतयो [#2]’ [शब्द का सामान्य अर्थ] दोनों नन्‍दनन्‍दन अर्थात् कृष्ण और बलदेव हैं। [किन्‍तु] नहीं, यहाँ पर ऐसा अर्थ न करके ‘व्रजेशसुतयो’ [का विशेष अर्थ किया है। दो व्रजेश हैं—एक] नन्द व्रजेश और दूसरे वृषभानु महाराज। [तो ‘व्रजेशसुतयो’ अर्थात् नन्‍द महाराज का पुत्र कृष्ण और] वृषभानु महाराज की सुता (पुत्री) [श्रीमती राधिका।]

श्रीपाद माधव महाराज: सुताश्‍च सुतश्‍च सुतयोः।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इस प्रकार से वे उनकी ओर देखते हैं और आनन्द से भर जाते हैं। अरे! औरों की तो बात ही क्या! वृन्दावन के पशु, मृग, गाय और बछड़े तक समाधिग्रस्त हो जाते हैं। बहती हुई यमुना भी स्थिर हो जाती हैं। आकाश के बादल कृष्ण को मानो छाया दे रहे हैं और वे वर्षा की बूँदें बरसाते हैं—सुशीतल होने के लिए।

पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग-
श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन।
तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन
लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.17)

[हे सखि! यह वनचारी पुलिन्दीगण पूर्ण हैं, क्योंकि इनके हृदय में भी श्रीश्यामसुन्‍दर के प्रति अत्यधिक प्रेम है। सखि! जब ये उनको देखती हैं, तब उनमें भी कामपीड़ा जाग्रत होती है। किसी प्रेयसी के वक्षःस्थल पर धारण किया हुआ कुंकुम श्रीकृष्ण के चरणों से संलग्न होकर तृणराजि में संलग्न हुआ था, उसी कुंकुम को देखकर स्मरपीड़ा से उद्दीप्त पुलिन्द-कन्याओं ने उसे अपने मुखमण्डल एवं कुचमण्डल पर लेपन करके अपनी उस कामपीड़ा को शान्त किया।] GVP

वे भीलनियाँ पूर्ण हैं। यह कौन कह रहा है? गोपियाँ कह रही हैं कि [ये भीलनियाँ] कृष्ण के चरणकमलों की महावर, जो घासों पर लगी रह जाती है, उसे पोंछकर अपने अङ्गों में लगा करके अपने काम-ताप को दूर करती हैं। हा! हा! हमारा ऐसा सौभाग्य नहीं है। हिरणियाँ अपने पतियों के साथ कृष्ण के पास पहुँच जाती हैं और [उन्‍हें ऐसे निहारती हैं,] मानो प्रणय की भिक्षा माँग रही हैं। विमानचारी देवताओं की पत्नियाँ अर्थात् देवियाँ [कृष्ण का रूप दर्शन करके] अपने पतियों की गोद में ही गिर जाती हैं और मूर्च्छित हो जाती हैं। कैसा सुन्दर रूप! यमुनाजी, जो गतिशील हैं, वे भी मानो स्थावर की भाँति एकदम स्थिर हो जाती हैं और उसमें भँवर उठने लगते हैं।

इस प्रकार कृष्ण कह रहे हैं— मेरा वह इतना सुन्दर रूप था! अब वह रूप कहाँ गया? वह रूप गया कहाँ? मैं चाहता हूँ कि इन लोगों को भी उस प्रेमरस में डुबाऊँ। किनको? अपने यदुवंशियों को। उसीके लिए कह रहे हैं— “अधुना [#3]” आज मैं यहाँ पर स्वज्ञाति… अब यहाँ पर स्वज्ञाति बदल दिया, [यहाँ पर स्वज्ञाति शब्द] नन्दबाबा [इत्यादि ब्रजवासियों के लिए नहीं अपितु यादवों के लिए प्रयुक्त हुआ है।] अपने स्वज्ञाति यादवों को भी मैं वह भाव प्राप्त नहीं करा सकता। विमान की देवियों, नदियों, मृग इत्यादि को जो भाव मैं अपने रूप से देता था, वह मेरा महा-सुन्दर रूप आज कहाँ चला गया?

सचमुच यह बात ठीक है, या नहीं है? कृष्ण का तो रूप वही था। और अन्तर भी कितने दिनों का था? थोड़े दिनों का अन्तर। कृष्ण तो अन्तिम समय तक, एक सौ पच्चीस वर्ष की आयु में भी किशोर रूप में [ही विराजमान] रहे। [तो क्या उनके] रूप में कोई अन्तर आया होगा? नहीं, [किन्‍तु] भाव में [अन्‍तर] आ गया, इसलिये रूप में भी वैसा आ गया। अब वहाँ पर उन भावों को सुनने योग्य कोई नहीं। और यह सत्यभामा, रुक्मिणी आदि सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियाँ क्या रास कर सकती हैं? रास भी सम्भव नहीं। इनको भी मैं [वह विशिष्ट] भाव प्राप्त नहीं करा सकता। इसीलिये आज मैं उन नर्म-क्रीड़ाओं, बड़ी प्रिय लीलाओं को करने में समर्थ नहीं हूँ।

[59:19-63:31 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: धीर समीरे यमुना तीरे।

[63:42-77:11 तक कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर।

कृष्ण कहते हैं— “हाय! हाय! [जब मैं] व्रज की लीलाओं का स्मरण करता हूँ, तो मेरा हृदय अधीर हो जाता है; मैं व्याकुल हो जाता हूँ। विशेष करके गोपियों का मेरे प्रति जो प्रणय है, उसे मेरा ही हृदय अनुभव करता है, दूसरा [कोई उसे] नहीं [जान सकता।”]

एक समय कृष्ण राधाजी के लिए बड़े विकल हो रहे हैं और वे स्वयं अभिसार करने के लिए निकल गये और वहाँ पर सुन्दर-सुन्दर, कोमल-कोमल पल्लवों और पुष्पों—बेली, चमेली आदि जिसमें कोई कठिन चीज़ नहीं है, तथा पाटल के पुष्पों या कमल की पंखुड़ियों को बिछा करके एक [सुकोमल] सेज तैयार कर रहे हैं। [फिर] उत्कण्ठित हो करके [बार-बार] देखते हैं कि कब आयेंगी। यदि [कोई] पत्ता गिर पड़ता है और खड़-खड़ की आवाज़ होने से [चौंककर सोचते] हैं— “अरे! अब राधाजी आ गयीं, मेरी प्रिया आ रही हैं‍!” इस प्रकार उनकी दशा है।

[कृष्ण कह रहे हैं— “मैं यह] किससे कहूँ?”

“रति-सुख-सारे गतमभिसारे”— ‘गतमभिसारे’ माने कृष्ण अभिसार पर गये हैं। अभिसारे…?

भक्त: रति-सुख-सारे गतमभिसारे मदन-मनोहरवेशम्।
न कुरु नितम्बिनि! गमन-विलम्बनमनुसर तं हृदयेशम्॥
-श्रीगीतगोविन्‍दम् (5.11.1)

[प्रशस्त नितम्बोंवाली श्रीराधे! रतिसुख के सारभूत संकेतस्थान में मदन के समान मनोहरवेश को धारण किये हुए हृदयवल्लभ श्रीकृष्ण के पास अभिसरण करो, अब विलम्ब मत करो।] GVP

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तात्पर्य क्या है?

कृष्ण ने एक सखी को सिखलाया— “मैं अधीर हो रहा हूँ। जाओ, हमारी प्राणप्रिया को किसी प्रकार समझा-बुझा करके [ले आओ।] वे मान कर रही हैं, आ नहीं रही हैं। हठ कर रही हैं कि हम नहीं जायेंगी।” और इधर कृष्ण की [यह] दशा है।

साधारण रूप में यही बतलाया जाता है कि कृष्ण के विरह में राधाजी अभिसारिणी हैं, किन्तु जयदेव गोस्वामी कहते हैं कि इसका एक और पहलू भी है। [कभी-कभी स्वयं] कृष्ण अभिसार करते हैं। उन्‍होंने सखी को भेजा— “मैं जीवन धारण नहीं [कर सकता। जाओ, वहाँ] जाकर मानिनी का मान भङ्ग करके किसी प्रकार से ले आओ।”

तो वह सखी श्रीमती राधिकाजी को समझा-बुझा रही हैं— “न कुरु नितम्बिनि! गमन-विलम्बनम्—अब गमन में अधिक देर मत करो। अनुसर तं हृदयेशम्—तुम हृदयेश जो कृष्ण हैं, शीघ्र उनके पास जाओ।”

और कान में कहती हैं— “देर करने से क्या हो सकता है, [जानती हो?] कोई [अन्य] प्रिया आयेगी और उनको [अपने साथ] ले करके चली जायेगी, और तुम देखती रह जाओगी। इसलिये शीघ्र [चलो।”]

हे नितम्बिनि! यदि कहो कि मैं नितम्बिनि हूँ, चल नहीं पाती हूँ —तो अब यह मत करो। अब गमन में विलम्ब मत करो। अभी निकल जाओ। यदि धीरे-धीरे भी चलोगी, तो भी तब तक [अर्थात्] समय पर पहुँच जाओगी; [अन्यथा देर करोगी] तो समय पर पहुँच नहीं सकोगी। इसलिये शीघ्र चलो, विलम्ब मत करो।

इसके बाद क्या-क्या है?

देखो, जब तुम चलती हो, तो पैरों की पाजेब ‘रुन-झुन, रुन-झुन’ करती हैं। इसलिये उनका मुख बन्द कर दो। कपड़े से अच्छी तरह बाँध दो, ताकि कोई शब्द न हो। [ये पाजेब] कैसी हैं? — रिपु, वह शत्रु [के समान] हैं। [ज़रा-सी ध्वनि करके सब] इधर-उधर कर देंगे। इसलिये ‘चल सखि! कुञ्‍जं सतिमिर-पुञ्‍जं शीलय नीलनिचोलम् [#4]”— इसलिये जल्दी से चलो। इस तरह से देरी मत करो।

विगलित-वसनं परिहृत-रसनं घटय जघनमपिधानम्।
किसलय-शयने पंकज-नयने निधिमिव हर्ष-निधानम् ॥
-श्रीगीतगोविन्‍दम् (5.11.6)

[हे इन्दीवरनयन राधे! नवीन किसलय की शय्या पर तुम आवरणरहित होकर, करधनी रहित होकर प्रियतम के प्रीतिविधान स्वरूप अपने निधि-रत्‍न जंघाओं को स्थापित कर दो।] GVP

इस प्रकार से [वह सखी] उनको कह रही हैं, समझा रही हैं— “अब अधिक विलम्ब मत करो। समय हो गया है। तुम [शीघ्र] चल नहीं सकती, इसलिये धीरे-धीरे चलना। तुम अपने पाजेब के नूपुरों को बन्द करके रखना; वे रिपु के समान हैं। [यह] समझो, वे शब्द करेंगे।”

इस प्रकार जयदेव गोस्वामी [इस सब का वर्णन] कर रहे हैं— “शीघ्र [चलो,] अब देरी मत करो।” [कृष्ण] कहाँ पर हैं? वसति वने वनमाली… कहाँ?

भक्त: धीर समीरे यमुना तीरे [#5]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: धीर समीरे—ओह! यहीं पास ही में धीर-समीर है, अधिक दूर नहीं है। तुम लोगों का सौभाग्य है कि आज धीर-समीर में ही बैठे हो, पास ही में है। रासस्थली भी यहीं है। हम जहाँ बैठे हैं, वह किसका मोहल्ला है?

भक्त: सेवाकुञ्‍ज

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हाँ, सेवाकुञ्‍ज] और उसमें भी राधारानी के इस [विशेष] कुञ्‍ज में बैठे हो। यह साधारण नहीं है। शृंगार वट, इमलीतला और-और सब स्थान [यहीं निकट में हैं।]

श्रीपाद तीर्थ महाराज: वास्तव में रासस्थली यही है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रासस्थली यही है—यमुना के किनारे। अब यमुना थोड़ी-सी दूर चली गयी है, पर अभी भी निकट ही हैं। अभी घाट बने हुए हैं, [कि‍न्‍तु] उस समय यहाँ सुन्दर, स्वच्छ बालू ऐसे बिछी रहती थी, मानो कर्पूर के समान कोमल हो। इस प्रकार से रास[स्थली] भी यही है।

‘धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली’— वे वहीं पर हैं, तुम्हारे लिए अभिसार कर रहे हैं। शीघ्र चलो। हे नितम्बिनि! देरी [मत करो।]

कितने सुन्दर भाव हैं! आप लोगों का भी सौभाग्य है कि जयदेव गोस्वामी कवि का इतना सुन्दर कीर्तन सुन रहे हैं। मैं समझता हूँ कि वृन्दावन में इन भावों को लेकर ऐसे कीर्तन करनेवाले हैं कि नहीं हैं। यद्यपि इसकी रचना बङ्गाल में हुई, किन्तु बङ्गाल के लोगों ने इसका अध्ययन-अध्यापन नहीं किया। किसने किया? उड़ीसा देश के भक्तों ने। वे बड़े सौभाग्यवान हैं। यहाँ तक कि जगन्नाथ देव भी इस कीर्तन को सुन करके अधीर हो जाते हैं और अधीर हो करके उधर की ओर भागते हैं, जहाँ कीर्तन [हो रहा हो।]

अब रात अधिक [हो गयी है,] आज यहीं तक रखेंगे। कल हम लोग यहाँ से मथुरा हो करके, माँट, भाण्डीरवन, भद्रवन, मान सरोवर, लोहवन इत्यादि [स्थानों पर] जायेंगे। पहले हम यहाँ से मथुरा हो करके पुल से जायेंगे क्योंकि यहाँ का रास्ता अभी बना नहीं है। इसमें दुर्घटना (accident) हो सकती है। बड़े-बड़े ट्रक भी नहीं जाते हैं, इसलिये हम इधर से जोखिम नहीं लेंगे। हम आधा घण्टा विलम्ब से पहुँचेंगे, तो कोई हानि नहीं। तो यहाँ से मथुरा हो करके नये पुल से जायेंगे और वहाँ पर हम [दर्शन करेंगे।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.6.35)

पूतना अपनी जाति में प्रसिद्ध राक्षसी थी। बालकों की हत्या करना और उनका खून पी जाना उसका स्वभाव था। उसने श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से उन्हें विषलिप्त स्तनपान कराया, फिर भी उसे सत्पुरुषों को प्राप्त होनेवाली परम गति प्राप्त हुई। (GVP)

#2
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः
सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः।
वक्‍‍त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.7)

गोपियाँ आपस में बातचीत करने लगीं—अरी सखियों! नेत्रवान व्यक्तियों के लिए ऐसा प्रिय दर्शन ही यथार्थ फल है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अपने सखाओं के साथ गोचारण के लिए वन में प्रवेश करनेवाले राम-कृष्ण के वेणुवादरत स्निग्धकटाक्षयुक्त मुखकमल का जिन्होंने दर्शन किया है, निश्चय ही उन्होंने ही इसका अनुभव किया है। (GVP)

#3
अधुना तु स एवाहं स्वज्ञातीन् यादवानपि।
नेतुं नार्हामि तं भावं नर्मक्रीड़ाकुतूहलैः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.114)

किन्तु इस समय वही मैं, अपने आत्मीय-स्वजन यादवों को नर्मक्रीड़ा-कौतूहल द्वारा भी उस भाव की प्राप्ति कराने में असमर्थ हूँ। (GVP)

#4
मुखरमधीरं त्यज मञ्‍जीरं रिपुमिव केलिषु लोलम्।
चल सखि! कुञ्‍जं सतिमिर-पुञ्‍जं शीलय नील-निचोलम्॥
-श्रीगीतगोविन्‍दम् (5.11.4)

सखि! चलो, कुञ्‍ज की ओर चलें। चलने में मुखरित होने वाले, विलास केलि में अति चञ्‍चल होनेवाले इन नूपुरों को तुम शत्रु के समान त्याग दो, तिमिरयुक्त नीलवसन को धारण कर लो। (GVP)

#5
धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली।
गोपीपीनपयोधरमर्दनचञ्‍चलकरयुगशाली॥
-श्रीगीतगोविन्‍दम् (5.11.1)

सुमन्द मलय मारुत सेवित यमुना तीरवर्ती निकुञ्‍जवनमें बैठकर वनमालाधारी (श्रीकृष्ण) गोपियों के पयोधरमण्डल को निपीड़ित करनेमें चञ्‍चलशाली कर-युगल से सुशोभित हो प्रतीक्षा कर रहे हैं। (GVP)

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