Glories of Vamsivata, Matvana, Vrndavana, Gokula and Glories of Krsna-lila in Vraja
01:08:48This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Glories of Vamsivata, where Sridhama waited for Krsna after He left for Mathura.
- Glories of Matvana, Raya, Vrndavana, Gokula, etc.
- Hathrasa is named so because Putna's hand fell here.
- Srila Gurudeva quoted SB 10.35.14-15 'vividha-gopa-caranesu vidagdho' about the impact of hearing Krsna's flute song.
- Why Krsna cannot enjoy the same pastimes as He does in Vraja with His wives in Dvaraka.
- Meaning of 'kirtana'.
Transcript
वंशीवट, माटवन, वृन्दावन, गोकुल की महिमा तथा व्रज में श्रीकृष्ण-लीला की महिमा
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 14 अक्तूबर 2003 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवद्-कृपा तथा गुरु-वैष्णवों की कृपा से हम लोगों [की परिक्रमा] का आज चतुर्थ दिवस है। तीन दिन तो बड़ी अच्छी तरह से बीते, किन्तु आज थोड़ी-सी कुछ गड़बड़ी हो गयी।
Three days we have passed very okay — no problem, nothing [at all.] But today some problem came. I was very worried and thinking [about] all these things. Then I slept, and in a dream I saw that somehow that driver had come. I asked him, “Oh, how have you come?” [He replied,] “Oh, it is by your mercy and Kṛṣṇa’s mercy that they have left me on Jamānat (bail).”
[तीन दिन तो बहुत अच्छे से बीत गये—कोई समस्या नहीं, बिल्कुल भी कुछ नहीं। परन्तु आज कुछ समस्या आ गई। मैं इन सब बातों को लेकर बहुत चिन्तित था और सोच रहा था। फिर मैं सो गया, और स्वप्न में देखा कि किसी प्रकार वह ड्राइवर आ गया है। मैंने उससे पूछा, “अरे, तुम कैसे आ गये?” उसने उत्तर दिया, “आपकी कृपा और कृष्ण की कृपा से मुझे ज़मानत पर छोड़ दिया गया है।”]
Now I think that our motor-wālā mālik is a very wealthy and reputed man, and the chairman of Rāyā. The police and all the officers are favorable. That is why they have given bail. And I think that everything should be decided in our favor. Then I became somewhat [relieved.] I want that we should pray for one second or one minute for that girl who is dead. What prayer that us kī sad-gati ho…
[अब मैं सोचता हूँ कि हमारे मोटरवाले मालिक बहुत धनी और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, और राया के चेयरमैन भी हैं। पुलिस और सभी अधिकारी अनुकूल हैं, इसलिये उन्होंने ज़मानत दे दी है। मेरा विचार है कि सब कुछ हमारे पक्ष में ही निर्णय होगा। तब मुझे कुछ शान्ति मिली। मैं चाहता हूँ कि हम सब उस मृत लड़की के लिए एक सेकण्ड या एक मिनट प्रार्थना करें। कैसी प्रार्थना? कि उसकी सद्गति हो…]
भक्त: good destination for her
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Yes, she should take birth anywhere in Vraja-bhūmi, and Kṛṣṇa-bhakti should come in her. So please, for one minute, all of you should pray.
[हाँ, वह व्रजभूमि में कहीं भी जन्म ले, और उसके हृदय में कृष्ण-भक्ति प्रकट हो। अतः आप सब एक मिनट के लिए उसके लिए प्रार्थना करें।]
आप सब लोग उसके लिए प्रार्थना करें कि उसकी सद्गति हो और उसे कृष्ण-भक्ति मिले।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
यदि आप लोग प्रार्थना करेंगे, तो निश्चय ही उसकी सद्गति होगी।
If you are praying then I think that Kṛṣṇa must be merciful. And he will anyhow give her birth in Vraja-bhūmi again, and she will have Kṛṣṇa-bhakti.
[यदि आप सब प्रार्थना करेंगे, तो मेरा विश्वास है कि श्रीकृष्ण अवश्य ही कृपा करेंगे। वे किसी न किसी प्रकार उसे पुनः व्रजभूमि में जन्म देंगे और उसके हृदय में कृष्ण-भक्ति प्रदान करेंगे।]
I think that now our parikramā will again go on very nicely. Tomorrow you will have to go in Vraja-Vṛndāvana to Gopīnātha, Vaṁśīvaṭa, Rāsa-sthalī, Gopīśvara Mahādeva, and other places. Perhaps you have not yet gone to Śṛṅgāra-vaṭa and some other places. And the day after tomorrow, perhaps to Belavana. And then after that, we will go to Dauji, Brahmāṇḍa-ghāṭa, and other places.
[अब मुझे प्रतीत होता है कि हमारी परिक्रमा पुनः बहुत सुचारु रूप से चलेगी। कल आपको व्रज-वृन्दावन में गोपीनाथ, वंशीवट, रासस्थली, गोपीश्वर महादेव तथा अन्य स्थानों पर जाना होगा। सम्भव है कि आप अभी तक शृंगार-वट और कुछ अन्य स्थलों पर नहीं गये हो। परसों सम्भवतः बेलवन जायेंगे। और उसके बाद हम दाऊजी, ब्रह्माण्डघाट तथा अन्य स्थानों के दर्शन करेंगे।]
And then we will go to Govardhana after four more days.
भक्त: On 18th, we will go to Govardhana.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: What is the date today?
भक्त: 14th
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: 14, 15, 16, 17 and 18. On the 18th in morning.
भक्त: In the afternoon.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: In the afternoon, just after 2 or 3 p.m.
भक्त: Just at one o’clock
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Yes. We will serve prasādam at about 10 a.m. They should take some rest, and then we will go.
आज हम लोग भाण्डीरवन गये, भाण्डीरवट गये। फिर उसके पश्चात् हम लोग रासस्थली, वंशीवट, श्रीदाम भैया का स्थान, छाहेरी ग्राम और आगियारा ग्राम गये और उनके सम्बन्ध में हमने बतलाया।
Today we went to so many places. First we went to Bhāṇḍīra-vana, Bhāṇḍīra-vaṭa, and Bhadra-vana. We did praṇāma. First Bhadravana, and then we went to Mānasarovara, [the place that belongs to] Śrīmatī Rādhikā. There I spoke some [hari-kathā.] After that, we went to Bhāṇḍīra-vana, Bhāṇḍīra-vaṭa, Rāsa-sthalī, and also to the place of the Gandharva-vivāha — the Gandharva marriage of Śrī Rādhā and Kṛṣṇa. [There] Śrīmatī Rādhikā defeated Kṛṣṇa in mala-yuddha (wrestling). Only by Her eyes — by Her crooked glance — She defeated Kṛṣṇa, and Kṛṣṇa accepted that defeat. [There the pastime of] Pralambāsura-vadha and other līlās [took place.]
[आज हम अनेक स्थलों पर गये। पहले हम भाण्डीरवन, भाण्डीरवट और भद्रवन गये। हमने वहाँ प्रणाम किया। पहले भद्रवन, और फिर हम मानसरोवर गये, जो श्रीमती राधिका का स्थान है। वहाँ मैंने कुछ हरिकथा कही। इसके पश्चात् हम भाण्डीरवन, भाण्डीरवट, रासस्थली तथा उस स्थान पर गये जहाँ श्रीराधा-कृष्ण का गान्धर्व-विवाह हुआ था। वहीं श्रीमती राधिका ने मलयुद्ध में श्रीकृष्ण को पराजित किया। केवल अपनी आँखों से—अपनी कुटिल चितवन से—उन्होंने श्रीकृष्ण को जीत लिया, और श्रीकृष्ण ने भी उस पराजय को स्वीकार किया। वहीं प्रलम्बासुर-वध तथा अन्य अनेक लीलाएँ भी सम्पन्न हुईं।]
Then we went to Vaṁśī-vaṭa. There Śrīdāma, the brother of Rādhikā, never returned back to Vṛndāvana, and he was always weeping and weeping. So in the Kaliyuga, Kṛṣṇa came in the form of Gaura-candra. He went there, and at once [Śrīdāma exclaimed,] “Oh! My bhāī, my brother has come!” He embraced Him, and Caitanya Mahāprabhu embraced him. Nityānanda Prabhu also went there.
[इसके बाद हम वंशीवट गये। वहाँ से श्रीमती राधिका के भ्राता श्रीदामा कभी पुनः वृन्दावन नहीं लौटे; वे निरन्तर रोते ही रहते थे। कलियुग में श्रीकृष्ण गौरचन्द्र के रूप में प्रकट हुए। वे वहाँ गये, और श्रीदामा ने उन्हें देखते ही पुकारा—“अरे! मेरा भाई आ गया!” उन्होंने उन्हें आलिङ्गन किया, और महाप्रभु ने भी उन्हें आलिङ्गन किया। नित्यानन्द प्रभु भी वहाँ गये थे।]
After that, you came to Rāyā through Māṭavana. Māṭavana is the place where they used to make all kinds of earthen clay pots — maṭkī and many other things. Then we came to Rāyā.
[इसके पश्चात् आप लोग माटवन होते हुए राया आये। माटवन वह स्थान है जहाँ पहले लोग मिट्टी के घड़े, मटकी और अन्य प्रकार के पात्र बनाया करते थे। फिर हम राया पहुँचे।]
भक्त: माटवन बलदेव प्रभु का स्थान है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Māṭavana is the place of cowherding and also the place of Baladeva Prabhu. Black Baladeva Prabhu is there. And then we came to Rāyā. What is the meaning of “Rāyā”? I asked so many paṇḍitas there. One gentleman was 97 years old — he was Paṇḍita, Śarmā, and he was a warrior of Congress Gandhi Movement.
[माटवन गोचारण-लीला का स्थान है और यह बलदेव प्रभु का भी स्थल है। वहाँ श्यामवर्ण बलदेव प्रभु विराजमान हैं। उसके पश्चात् हम राया आये। ‘राया’ का क्या अर्थ है? वहाँ मैंने अनेक पण्डितों से यह प्रश्न किया। एक सज्जन 97 वर्ष के थे—वे पण्डित, शर्मा थे, और गाँधी-आन्दोलन के सेनानी (योद्धा) भी रह चुके थे।]
भक्त: Freedom fighter.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Freedom fighter, 97 years old and very smart. I asked him, and also other priests and purohitas, but they could not tell [the meaning.] Then I told them: Nanda-rāya and Yaśodā-rāṇī, from ‘Rāya’ [the word] ‘Rāyā’ [has come.] He used to be there sometimes on the way to Gokula Mahāvana. He used to stay there.
[स्वतन्त्रता-सेनानी। वे 97 वर्ष के थे—अत्यन्त बुद्धिमान। मैंने उनसे, तथा वहाँ के अन्य पुजारियों और पुरोहितों से भी पूछा, किन्तु वे ‘राया’ का अर्थ स्पष्ट नहीं बता सके। तब मैंने ही कहा—‘नन्दराय’ और ‘यशोदा रानी’ के ‘राय’ शब्द से ही ‘राया’ नाम की उत्पत्ति हुई है। नन्दराय जी कभी-कभी गोकुल महावन जाते समय मार्ग में वहीं निवास करते थे और कुछ समय वहाँ ठहरते थे।]
And you know that all the names of the villages…
[और आप जानते ही हैं कि व्रज के सभी ग्रामों के नाम…]
वृन्दावन-व्रजमण्डल के जितने भी गाँव हैं—सेई, परसों, राया, गोकुल, वृन्दावन, बरसाना, कोऽसि (कोसी)—ये सभी नाम व्रजगोपियों और श्रीकृष्ण की लीलाओं [के आधार] पर रखे गये हैं।
तो ‘राया’ का अर्थ है [वह स्थान] जहाँ पर नन्दबाबा रहते थे—नन्दराय और नन्दरानी यशोमती मैया। वहाँ से वे अपनी गायों और सबके साथ में फिर दूसरी जगह जाते थे। उनके दो मुख्य (प्रधान) [निवास]-स्थान थे—नन्दगाँव और महावन। अन्य स्थानों पर वे कुछ-कुछ दिन रहकर चले जाते थे। जब गायों के लिए चारे की कमी हो जाती, अथवा वहाँ पर दैत्यों का उत्पात होने लगता, तो वे वहाँ से दूसरी जगह चले जाते। हाथरस माने क्या? हाँ, क्या कह रहा था?
भक्त: हाथरस
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [जब कृष्ण] पूतना के स्तन को चूसने लगे, तो वह आकाश में उड़ गयी। आकाश में होने पर कृष्ण ने उसे ऐसे चूसा कि वह गिर पड़ी। 6 क्रोस माने 12 मील में उसका लम्बा शरीर था; उसकी आँखे [अग्नि के समान] जलती हुई और पेट कैसा? कुण्ड जैसा, सरोवर जैसा। और उसके स्तन कैसे? पर्वत जैसे। तो जहाँ वह गिरी, तो छटपट जब करने लगी, तो जहाँ पर उसका हाथ गिरा, वह ‘हाथरस’ [कहलाया।] जहाँ उसका सिर (मुण्ड) गिरा, वह ‘मुरसान' [कहलाया।] इस प्रकार व्रज के समस्त [स्थानों के] नाम [कृष्णलीला से ही जुड़े] हैं।
तो हम लोग उन सब स्थानों में भी जायेंगे। तो आज हम इन-इन स्थानों में गये और वहाँ जो-जो लीलाएँ हुईं, उनके [विषय] में तीर्थ महाराज और [अन्य भक्तों] ने भी कुछ कहा होगा। अब हम थोड़ा-सा…
I think that all of you are tired.
आप सभी लोग क्लान्त हैं। अभी आप अपने घर या वासस्थान पर नहीं गये हैं। ठीक है न?
भक्त: सीधा यहीं आये।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अभी सीधा यहीं आये। I think that you are all tired. So if you want, you can go and take rest.
भक्त: This is the best.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Śyāmarāṇī, you are too tired? And my sister, Vṛndāvana-vilāsinī? If you want to take rest then prasādam is ready. Oh, you should take prasādam and then go and take rest.
श्रीपाद माधव महाराज: (बाङ्गला भाषा में…) लोहवन के सम्बन्ध में कुछ नहीं बोला…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: लोहवन, वहाँ पर महाराज ने कुछ कहा नहीं? मैंने तो नहीं कहा किन्तु उन्होंने कुछ कहा?
लोहवन यमुना के किनारे स्थित था और वहाँ पर नौकालीला हुई थी। गोपियों को पार कराने के लिए कृष्ण ने एक जीर्ण नौका ली, जैसा हम वहाँ पर भी कहते हैं…
रामचन्द्र दास: मानसीगङ्गा में पारङ्गघाट
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मानसीगङ्गा में। तो वहाँ पर भी वैसी लीला हुई थी।
वहाँ पर [लोहजंघासुर नामक] एक दैत्य रहता था। उसने तपस्या करके शंकरजी से वर माँगा था। उसकी जंघा लोहे की थी, क्योंकि उसका ऐसा था की जंघा में [आघात] लगने से ही वह मरेगा। तो उसने तपस्या करके शंकरजी से वर माँग लिया कि उसकी जंघा लोहे की हो जाये। तो कृष्ण ने उस लोहजंघासुर को वहाँ पर मारा था। तो वह स्थान है। वहाँ पर और भी [अनेक लीलाएँ हुईं,] गोचारण वहाँ पर हुआ। वहीं पर कृष्णकुण्ड है। उस कृष्णकुण्ड में भी [कृष्ण ने] गोपियों के साथ तरह-तरह की लीलाएँ कीं। इस प्रकार वह स्थान भी बहुत पवित्र है। लोहवन [बारह वनों में से] एक प्रमुख वन है।
मैं आज [केवल] दो-एक श्लोक की व्याख्या करूँगा क्योंकि सभी लोग क्लान्त हैं। इसलिये आज प्रसाद पा करके विश्राम करें।
कृष्ण गोपियों की महिमा का वर्णन कर रहे थे। उन्होंने कहा था— “मेरा व्रज में जाना और निवास करना भी व्यर्थ है। मैं गोपियों को इससे अधिक क्या सुख दूँगा?”
[15:20-18:07 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो कृष्ण सत्यभामा, रुक्मिणी इत्यादि से कह रहे हैं— मैं उस व्रज में जाकर क्या करूँगा? मैं उन्हें कोई सान्त्वना नहीं दे सकूँगा। क्यों नहीं दे सकूँगा? क्योंकि मेरे वहाँ जाने से वे सन्तुष्ट नहीं होंगी। यदि मैं वहाँ रहकर बहुत दिनों तक उनके साथ रास-विलास लीलाएँ भी करूँ, तो भी उनका यह विरह और दुगुना बढ़ जायेगा।
दूसरी बात—केवल मेरा दर्शन करते ही वे महामोहित हो जाती हैं, मूर्च्छित अवस्था में पहुँच जाती हैं। उस समय मैं उन्हें सान्त्वना नहीं दे सकता। और विरह की दशा में तो कभी-कभी दिव्योन्माद आदि अवस्थाओं में वे अन्धकार को भी मुझे समझकर आलिङ्गन करती हैं, उसका चुम्बन करती हैं, और इस प्रकार विरह में ही एक प्रकार का आनन्द अनुभव करती हैं। इसलिये क्यों न उनका विरह रहे। यदि मैं [व्रज में] जाऊँगा, तो फिर वे दर्शन करेंगी और इस प्रकार उनका विरह बहुत बढ़ जायेगा। इसलिये मैं किसी प्रकार से उनको सन्तुष्ट नहीं कर सकूँगा, उनको धैर्य धारण नहीं करा सकूँगा। इसलिये मैं जा करके क्या करूँगा? इसलिये नहीं जाता। यही मूल कारण है।
जरासन्ध को मारने के लिए, शत्रुओं की सेना इत्यादि [का विनाश] करने के लिए, अन्य असुरों को मारने के लिए, कौरव-पाण्डवों [के प्रसंग] में पाण्डवों की रक्षा और सहायता करने के लिए— ये सब गौण कारण हैं। मुख्य कारण यह था, कि वे इसलिये नहीं जा रहे हैं कि [उनके वहाँ] जाने से उन्हें और कष्ट ही होगा और मेरे नहीं जाने पर वे विरह-अवस्था में भी मेरा दर्शन करती ही रहती हैं। इसलिये मैं यही [उचित] समझता हूँ।
भक्त: इस सिद्धान्त (theory) के अनुसार तो उन्हें कभी [व्रज में] जाने की आवश्यकता ही नहीं है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यही तो कह रहे हैं।
[20:31-21:47 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और भी कह रहे हैं— “देखो, मैं व्रज में आनन्द-समुद्र में निमग्न था। ब्रह्मा इत्यादि देवतागण भी मेरी स्तव-स्तुति और वन्दना करते थे; [किन्तु] उनका दर्शन करके और उनके सम्भाषण को सुन करके मुझे दुःख होता था। उधर भी मेरी रुचि [नहीं थी। ब्रह्मा इत्यादि देवतागण मेरी] वन्दना, स्तव-स्तुति कर रहे होते और मैं अपने सखाओं के कन्धे पर हाथ दे करके, सखाओं से बातचीत करता था। मैं उस समय देवताओं के भूभार-हरण इत्यादि कार्यों को भूल चुका था।” व्रज में कैसा सुख था, उसके लिए यह बात बोल रहे हैं।
जिस प्रकार से मैं सखाओं के साथ क्रीड़ा में निमग्न रहता—सूर्यकुण्ड, राधाकुण्ड, भाण्डीरवन इत्यादि में जैसी लीलाएँ करता था, व्रज के सभी लोग आनन्द से भरपूर थे और मैं भी आनन्दरूपी समुन्द्र में डूबा रहता था। ब्रह्मा, इन्द्र, नारद इत्यादि मेरी स्तव-स्तुति करते, तो वह भी मुझे बुरा लगता, अच्छा नहीं लगता था। इसलिये कंस-वध इत्यादि जो कार्य थे, उन्हें भी मैं भूल गया था। वह तो नारद ने स्मरण कराया और अक्रूर आये। अक्रूर के कहने से और नारदजी की प्रार्थना से मैं फिर मथुरा गया, कंस का वध किया और सब [कार्य किये] और फिर द्वारका आया। किन्तु जब भी मैं व्रज के उस सुख का स्मरण करता हूँ, तो अत्यन्त भाव-विह्वल हो जाता हूँ।
मेरी ऐसी मधुर लीलाओं से ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, चन्द्र [आदि समस्त] देवतालोग, सिद्धलोग, (24:02 अस्पष्ट), गोगण, वत्सगण, मृग, वृक्ष, लता, पक्षी, तृण, गुल्म, नदियाँ, मेघसमूह, स्थावर-जङ्गम, चेतन-अचेतन [समस्त विश्व ही] प्रेम के समुद्र में डूब जाता और उनमें सात्विक और व्यभिचारी भाव उदित हो जाते। इसका हमने कल वेणुगीत के द्वारा वर्णन किया था कि किस प्रकार के [भाव प्रकट होते हैं?] ‘बर्हापीडं नटवरवपुः’ [#1] और इसके बाद में ‘धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता’ [#2], ‘नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीतम्’ [#3]इत्यादि [श्लोकों द्वारा] हमने बतलाया था।
भक्त: अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः [#4]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उनका स्वभाव बदल जाता था। चर अचर [बन जाते थे] और अचर चर बन जाते थे; चलने वाले स्तब्ध हो जाते थे। जड़ जङ्गम [बन जाते] और जङ्गम जड़ हो जाते। ये सब बातें जो मैं कह रहा हूँ, यह सत्य है या असत्य — यह कालिन्दी यहाँ बैठी हुई है, उससे पूछ लो। यह कालिन्दी हमारे साथ व्रज में भी रहती थी; यह हमारी अत्यन्त प्रिया है, इसलिये उसी से पूछो। कालिन्दी व्रजवासियों सहित हमारे स्वच्छन्द विहार की साक्षिणी है — किस प्रकार मैं यमुना में विहार करता था, और किस प्रकार यमुना के उपवनों में भी विहार करता था — इन सबकी साक्षी कालिन्दी है। इन सबका वर्णन श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के पैंतीसवें अध्याय में किया गया है। क्या?
विविधगोपचरणेषु विदग्धो वेणुवाद्य उरुधा निजशिक्षा:।
तव सुत: सति यदाधरबिम्बे, दत्तवेणुरनयत् स्वरजाती: ॥
सवनशस्तदुपधार्य सुरेशा: शक्रशर्वपरमेष्ठिपुरोगा:।
कवय आनतकन्धरचित्ता: कश्मलं ययुरनिश्चिततत्त्वा: ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.35.14-15)
[अनन्तर अपराह्न में कुछ गोपियाँ किसी बहाने से श्रीव्रजेश्वरी के घर में उपस्थित हुईं और कहने लगीं— हे यशोदे! गोपगणोचित गोचारण आदि नानाविध कलाओं में निपुण तुम्हारा लाड़ला जब बिम्बफल के समान अपने लाल-लाल अधरोंपर वंशी धारणकर बिना किसीसे शिक्षण प्राप्त किये ही, स्वयं ही उच्च-मध्यम-निम्न आरोह-अवरोह आदि आलापों से सङ्गीत की ऋषभ, निषाद आदि स्वरों की विविध राग-रागिनियाँ बजाते हुए, कई शैलियों का आविष्कार कर लेता है, तब इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, चतु:सन, रुद्र सहित कात्यायनी, नारद आदि मन्द-मध्यम-तार भेद से अपूर्व निपुणता के साथ बजाये गये इसके स्वरालापों को सुनते तो हैं, परन्तु पण्डित होनेपर भी उनका सार नहीं निकाल पाते अर्थात् वंशी के राग, ताल और स्वरूप आदिका निश्चय करने में असमर्थ हो जाते हैं। वे मुग्ध-से होकर अपनी ग्रीवा एवं चित्त को झुकाकर श्रवण में ही तन्मय हो जाते हैं।] GVP
क्या तात्पर्य है? हे यशोदे! कौन कह रही हैं? गोपियाँ।
[वे कहती हैं—] तुम्हारा यह लाड़ला बेटा गोप-क्रीड़ा में, सखाओं के साथ क्रीड़ा में अत्यन्त निपुण है। वह वेणुवाद्य के विषय में स्वरजाति, चढ़ाव-उतराव, दीर्घ, प्लुत और मध्य— इन तीनों स्वरों की मूर्च्छना इत्यादि में परम पारङ्गत है। ब्रह्मा, शंकर, नारद इत्यादि स्वर को समझनेवाले हैं, किन्तु इनकी भी समझ में नहीं आता कि कौनसा ताल, कौनसी रागिनी है, कौनसा क्या है? उस समय जब वह दीर्घ, प्लुत, ह्रस्व और मध्यम स्वर से वेणु बजाता है, तो हिरण, गाय इत्यादि सभी प्राणी खिंच करके आ जाते हैं। बछड़े दूध पीना बन्द कर देते और कान लगा करके कृष्ण की वंशी को सुनते हैं और उनका रूप देखते हैं। यहाँ तक कि ‘प्रायो वताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन् [#5]’ ओह माँ यशोदे! मैं क्या कहूँ? यहाँ की चिड़ियाँ और पशु-पक्षी जो हैं, वे भी कृष्ण की मधुर मुरली की तान सुन करके मुग्ध हो जाते हैं।
और तब वे क्या करते हैं? वेद की उस शाखा को ले करके जाते हैं, जो उनको व्रज में पहुँचा दे। समझ में नहीं आया? वेद की तो बहुत शाखाएँ हैं। वहाँ के शुक-सारि इत्यादि पशु-पक्षी जो हैं, वे मुनि लोग हैं। क्यों? जिस समय कृष्ण मधुर वंशी बजाते हैं, वे ध्यानस्थ हो करके चुपचाप बैठ जाते हैं। उस समय वे कलरव इत्यादि कुछ नहीं करते। किसलिये नहीं करते? वे भूल जाते हैं। वे कान को दोना बना करके, इससे सुन करके तन्मय हो जाते हैं। तो वे लोग योगी हैं। कैसे योगी हैं? योगी भी बहुत प्रकार के होते हैं—कोई निर्विशेषवादी, कोई परमात्मावादी, कोई कृष्ण में भी लीन हो जाने वाले, और कुछ भक्तियोग की शाखावाले। तो वेद की ये सब शाखाएँ हैं। वे लोग वेद की इस भक्तिरूपी शाखा पर बैठ करके कृष्णलीला का चिन्तन करने लगते हैं और उसमें डूब जाते हैं। ये मुनि लोग भी कृष्ण की लीलाओं का थाह नहीं पाते हैं। ‘तदुदितं कलवेणुगीतम्…’
श्रीपाद तीर्थ महाराज: सम्मोहितार्यऽऽचरितान्न [#6]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ‘चलेत् त्रिलोक्याम् त्रैलोक्यसौभगमिदं’ इत्यादि सब।
तो तुम्हारा बेटा ऐसा आलाप करता है—स्वरजाति का, ह्रस्व-दीर्घ मूर्च्छनायुक्त। मूर्च्छना किसे कहते हैं? जिसके स्वर में कम्पन हो। और तब पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग सभी आ जाते हैं। यहाँ तक कि गोपियाँ अपने घरों को छोड़ करके, नोकझोंक करके वहाँ पर चली आयीं।
कृष्ण कहते हैं कि मैं ऐसी लीलाएँ करता था। आज वे लीलाएँ कहाँ? आज वे सब लीला नहीं रहीं। इन्द्र, महादेव, ब्रह्मा इत्यादि सुरेश्वर भी ह्रस्व, मध्य और दीर्घ क्रमभेद से हमारे गीतों को सुन करके, आलाप को सुन करके [मोहित हो जाते थे।] आलाप माने क्या?
भक्त: अलग-अलग राग हो गये।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, आलाप माने बहुत जोर से…
(गाते हुए…) जय राधे..... जय राधे…. जय राधे…. जय राधे…. उतार-चढ़ाव, ये राग-रागनियाँ हैं।
भक्त: उतार-चढ़ाव
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये आलाप सङ्गीत के सौन्दर्य और माधुर्य को बढ़ा देता है। उस समय गीतध्वनि के राग से ‘आनतकन्धर’ अर्थात् देवताओं का भी चित्त मुग्ध हो जाता था। उनके कन्धे नीचे हो जाते थे। कन्धे [नीचे] होना माने मूर्च्छित भाव।
भक्त: सौन्दर्य (31:23 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वे लोग क्यों [मोहित हो जाते?] क्योंकि वे स्वर-आलाप का भेद ही नहीं कर पाते कि यह क्या है? कौनसा राग-रागिनी है?
भक्त: गोपियाँ?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, गोपियाँ नहीं। यह इन लोगों (ब्रह्मा, शंकर इत्यादि देवताओं) के लिए। कृष्ण यदि पञ्चम-स्वर में आलाप करते, तो गोपियाँ सप्तम में कर देतीं। और उस समय में सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, सा… ये हुआ पञ्चम।
और गोपियों का सा…., रे…., गा…. एकदम ऊपर में ले जातीं। और कृष्ण कहते— “साधु! साधु! साधु! साधु! साधु!”
कृष्ण आज यह स्मरण कर रहे हैं— “हाय! हाय! अब वह आनन्द कहाँ गया? कहाँ वह? मैं गोपियों को साधुवाद देता था, क्योंकि जितने स्वर से मैं आलाप नहीं कर पाता था, [वे कर लेती थीं।”] इसके विषय में सनातन गोस्वामी ने कहा है—“इसकी आलोचना हम बाद में करेंगे। क्यों? क्योंकि अभी स्थान और पात्र [उपयुक्त] नहीं हैं। अभी तो द्वारकाधीश के सामने हैं। जब व्रजवासी रहेंगे, तब करूँगा।”
अधुना तु स एवाहं स्वज्ञातीन् यादवानपि।
नेतुं नार्हामि तं भावं नर्मक्रीड़ाकुतूहलैः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.114)
किन्तु इस समय वही मैं, अपने आत्मीय-स्वजन यादवों को नर्मक्रीड़ा-कौतूहल द्वारा भी उस भाव की प्राप्ति कराने में असमर्थ हूँ। (GVP)
अब इस समय मैं अपने स्वज्ञाती, इन यादवगणों को वह भाव प्राप्त नहीं करा सकता, जो हिरणों, मयूरों, पशु-पक्षियों और गोपियों को प्राप्त होता था। क्यों? इनमें वह सामर्थ्य और योग्यता नहीं है। और दूसरी बात क्या? व्रज के अतिरिक्त हमारी वे सब लीलाएँ नहीं हो सकतीं। गोकुल होना चाहिये, व्रज होना चाहिये, वृन्दावन होना चाहिये, तब [वे लीलाएँ] होंगी; अन्यथा उन लीलाओं को मैं [नहीं कर सकता।] क्यों? इसके लिए बतला रहे हैं? यदि कहो— “तुम तो भगवान् हो, सर्वशक्तिमान हो। तो अपनी उन क्रीड़ाओं को यहाँ द्वारका में भी करो। रास भी करो। सखाओं के साथ में उन लीलाओं को करो और स्वरजाति इत्यादि [से युक्त] वंशीवादन करो और सबको मुग्ध कर दो।”
[इसके उत्तर में कहते हैं—] “ओह! ये सब विहार इत्यादि यहाँ सम्भव नहीं है।”
[यदि कोई कहे—] “हाँ, तो इसलिये कह रहे हैं कि आप तो सर्वशक्तिमान हैं। तो लीलाओं को प्रकट क्यों नहीं करते? वैसी वंशी क्यों नहीं बजाते? रास क्यों नहीं करते?”
[इसके उत्तर में कहते हैं—] “ओह! अब मैं नहीं कर सकता क्योंकि मैं अशक्त हूँ। व्रज के अतिरिक्त हमारी वे क्रीड़ाएँ और लीलाएँ सम्भव नहीं हैं। वैसा राग-रागिनी और वंशी बजाना सम्भव नहीं है। क्यों? क्योंकि ये यादव लोग वैसे विदग्ध और रसिक नहीं हैं। इनमें ऐश्वर्य-भाव प्रधान है, माधुर्य-भाव नहीं। अर्थात् देह-सम्बन्धीय आत्मीय होने पर भी मैं इन्हें व्रजभाव नहीं दे सकता। मैं [स्वयं यहाँ वैसा] नहीं हो सकता और इनको [वह व्रजभाव] नहीं दे सकता। इनके सामने मैं वह वंशी नहीं बजाता।”
[कोई पूछे—] “वंशी क्यों नहीं रखते? यहाँ भी वंशी बजाइये।”
[कृष्ण कहते हैं—] “किसलिये बजाऊँ? कैसे बजाऊँ? यहाँ पर बजाने में समर्थ नहीं हूँ।”
“क्यों समर्थ नहीं हैं?”
[कृष्ण कहते हैं—] “मैं इसलिये समर्थ नहीं हूँ। पहले तो मैं गोपियों का मान-भङ्ग करने के लिए वंशी बजाता था। यहाँ पर मैं इनका मान-भङ्ग ही नहीं कर पाता। [अर्थात् उस मान-भङ्ग लीला की यहाँ आवश्यकता ही नहीं होती] इसलिये वंशी बजाना छोड़ दिया। जैसे सत्यभामा को मान हुआ है, इनका मान-भङ्ग [करने जैसी लीला] नहीं कर पाता हूँ। इसलिये मैं वंशी नहीं बजाता।”
तात्पर्य क्या है? इसका भीतर का रहस्य यह है कि यहाँ इन लोगों का जो मान है, वह इतना कच्चा है कि थोड़ा-सा क्रोध करने में ही इनका मान उतर जाता है। वंशी क्या बजाऊँ?
रामचन्द्र दास: किन्तु [कृष्ण] ये शब्द तो नहीं कहेंगे कि मान-भङ्ग नहीं कर सकता।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वही उसका गम्भीर रहस्य है। उस [कथन] का आन्तरिक, गम्य अर्थ यह है— “मैं यहाँ पर वंशी किसलिये बजाऊँ? वंशी की क्या [आवश्यकता है? यहाँ] गैयाओं को चराने तो नहीं आया हूँ कि उन्हें घेर करके लाना है। इसलिये मैं यहाँ पर वंशी नहीं बजाता। यहाँ रास-विलास भी नहीं करता कि सप्तम-स्वर में वंशी को बजाऊँ और सभी आकर्षित हों। यहाँ पर किसे आकर्षित करना है? यह मर्यादा-सम्पन्न देश है, और वह व्रज माधुर्य प्रदेश है। इसलिये मैं [यहाँ वंशी] नहीं बजाता।
दूसरी बात, यहाँ इन शब्दों का गम्भीर तात्पर्य यह है— “मैं यहाँ वंशी किसलिये बजाऊँ? [व्रज में तो] गोपियों का मान-भञ्जन करने के लिए और उनको आकर्षित करने के लिए बजाता था। किन्तु यहाँ इनका मान इतना कच्चा और थोड़ा-सा है कि मैं थोड़ा-सा क्रोधित हो गया, तो बस [इनका मान] उतर गया। विशेष करके रुक्मिणी इत्यादि का तो मान है ही नहीं; तो उनका मान-भञ्जन क्या करना? और सत्यभामा का थोड़ा-सा है, किन्तु थोड़ा-सा क्रोध प्रकाश करने से ही बस उनका मान उतर जाता है। इसलिये मैं किसलिये वंशी बजाऊँ? अब वही लीलाएँ मुझको स्मरण होती हैं और हृदय द्रवित हो जाता है। मैं अपने को सम्भाल नहीं पाता।”
जब [कृष्ण] इस प्रकार से कहने लगे, तो वहाँ बैठे उद्धवजी ने सोचा— “यदि इसी प्रकार आगे भी व्रज की कथाएँ कहेंगे, तो क्या होगा? वे फिर मूर्च्छित हो जायेंगे और फिर ये सब उपद्रव हो जायेगा।” इसलिये उन्होंने झट संकेत से रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि सभी 16,108 रानियों को वहाँ पर बुला लिया। वे सब आ गयीं और उद्धव के संकेत के अनुसार कृष्ण के चरण पकड़कर क्षमा माँगने लगीं—“हम लोगों से भूल हो गयी। आगे से हम स्वप्न में भी गोपियों की बराबरी करने का विचार नहीं करेंगी। इसलिये आप [कृपा करके हमें] क्षमा कर दीजिये।”
यदि ऐसा नहीं होता, तो कृष्ण भावाविष्ट होकर पुनः मूर्च्छित हो जाते; और फिर न जाने ब्रह्मा आते या कौन आते, तब उनकी मूर्च्छा छूटती। इसलिये उद्धवजी ने उन लोगों को [संकेत के माध्यम से कहा—] “आप लोग शीघ्र पधारें और उनसे क्षमा माँगें कि हम गोपियों के साथ स्पर्धा या समता नहीं करेंगी।” और साथ-ही-साथ [उद्धवजी ने] संकेत से देवकी मैया और रोहिणी मैया को भी बुला लिया और उनसे कहा— “शीघ्र पकवान और खाने की सब सामग्री ले करके आइये, नहीं तो वे फिर उसी भाव में [आविष्ट हो] जायेंगे।”
तब रोहिणी मैया और देवकी मैया तरह-तरह के पकवान और मिठाइयाँ ले करके आयीं। वे [वहाँ से] चली गयीं, ताकि रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि [रानियाँ] उनको खिलायेंगी, चामर डुलायेंगी—जैसा [वे प्रायः] खिलाती हैं। और [इस प्रकार] उनका और भावान्तर हो जाये। इस प्रकार से कृष्ण को [पुनः व्रजभाव में आविष्ट] नहीं होने दिया।
इतने में उद्धवजी ने कहा— “प्रभु, बाहर में नारदजी बैठे हैं।”
[कृष्ण ने कहा—] “किसलिये [बाहर] बैठे हैं?
[उद्धवजी ने कहा—] “क्योंकि बड़े लज्जित हैं।”
[कृष्ण ने कहा—] क्यों?
[उद्धवजी ने कहा— “नारदजी ऐसा सोच रहे हैं कि] आज मेरे कारण कृष्ण ने ऐसा किया। वे विरह में मत्त होकर मूर्च्छित हो गये और सब लोगों को इतना कष्ट सहना पड़ा। ये सब कुछ मेरे कारण ही हुआ है क्योंकि मेरी भक्तों का तारतम्य दर्शन करने की [इच्छा थी।”]
कृष्ण ने कहा— “अच्छा!” तब वे भक्तवत्सल दीनानाथ अपने आप उठे, नारदजी [की ओर अग्रसर हुए,] उनका हाथ पकड़ करके [राजभवन में] ले आये और बोले— “आपने जो किया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तो यही चाहता था कि संसारभर में व्रजगोपियों और व्रजवासियों, विशेष करके गोपियों की प्रतिष्ठा जगत् में हो। लोग समझें कि गोपियों का प्रेम और विरह कैसा था। यह लोग समझें। और विशेष करके हमारा परमप्रिय शुक है। जब मैं पृथ्वी को छोड़ दूँगा, तब उसको यहीं रख जाऊँगा। और रखने पर क्या होगा? हमने ये सब जो कहा है, उसका वह भागवत में [वर्णन करेंगे।]
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (1.1.3)
हे भगवत्-प्रीतिरस-रसिकजनो! हे अप्राकृत रसविशेष की भावना में चतुर भक्तो! श्रीमद्भागवत वेदरूपी कल्पतरु का परमानन्दरसमय परिपक्व फल है। यह छिलका, गुठली आदि कठिन हेय-अंश से रहित, तरल होने के कारण पान करने योग्य है। श्रीशुकदेव गोस्वामी के मुख से निकलकर शिष्य-प्रशिष्यादि की परम्पराक्रम से स्वेच्छा से पृथ्वीपर अखण्ड रूपमें अवतीर्ण इस फल को आपलोग मुक्त अवस्था में भी पुनः-पुनः पान करते रहें। स्वर्ग के सुखों की उपेक्षा करनेवाले परम मुक्तपुरुष भी इस रसमय फल (श्रीमद्भागवत) की उपेक्षा न करके नित्यकाल ही इसका सेवन किया करते हैं। (GVP)
श्रीमद्भागवत के अन्त में भी यह कहा गया है कि कृष्ण की लीलाएँ, जिनमें मधुर भाव भरे पड़े हैं, उनका श्रवण करने से जगत् का कल्याण होगा। शुकदेव गोस्वामीजी कलियुग के जीवों के लिए इसीका वर्णन करेंगे और उनका इसी प्रकार से कृष्णलीला श्रवण करके [कल्याण होगा।] और गोलोक वृन्दावन की व्रजगोपियों की स्थिति को प्राप्त [करेगा। इस प्रकार यह प्रसङ्ग] इत्यादि सब हुआ।
अब कल इसके सम्बन्ध में अन्तिम स्पर्श (finishing touch) करूँगा। उसके बाद में दूसरा [ग्रन्थ आरम्भ करेंगे—] श्रीमद्भागवत, मनः शिक्षा अथवा भजनरहस्य। एक बार सवेरे और एक बार शाम को, जब समय मिलेगा, [तब पाठ करेंगे।] विशेष करके बाहर जाने के समय में तो सवेरे वाला समय नहीं मिलता है। तो जैसा होगा, देख करके हम लोग करेंगे। एक महीने तक बहुत-सी वस्तुएँ देने का प्रयास करूँगा। आप लोगों का सौभाग्य हो, तो उसे ग्रहण करें।
रामचन्द्र दास: नारदजी वाली ये जो लीला है, ये यहीं की है? इसे नित्य मानेंगे या नैमित्तिक मानेंगे?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अब समझो।
भक्त: सभी लीलाएँ नित्य हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये प्रश्न आने का तात्पर्य क्या?
[42:20-52:29 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल सवेरे जैसे हम लोग कीर्तन करते हैं, वैसे ही होगा— श्रीराधाकृपाकटाक्ष, श्रीनन्दनन्दनाष्टकम्, श्रीदामोदराष्टकम् और अन्य कीर्तन, ठीक सवेरे वे सब होंगे। उसके बाद ‘दामोदराष्टकम्’ का जो कुछ बाकी है, उसे जहाँ तक [सम्भव] होगा, मैं पाठ करूँगा।
उसके बाद यहाँ जलपान करके, आठ बजे से पहले या [अधिकतम] आठ बजे तक यहाँ से निकल करके निधुवन, राधारमण, गोकुलानन्द, गोपीनाथ आदि जहाँ तक सम्भव होगा, वहाँ तक दर्शन करेंगे। साढ़े दस बजे से पहले ही सब लोग [दर्शन करके] आ जायेंगे, [अधिकतम] साढ़े दस बजे तक। अधिक परिश्रम न किया जाये, यही अभिप्राय है। [वहाँ दर्शनों में] घण्टा पर, घण्टा पर, घण्टा पर, घण्टा बस हरिकथा ही न चले; संक्षेप में कभी ये बोलें, कभी वे बोलें, कभी ये बोलें और सब यात्रियों को लेकर यहाँ पर आ जायें कि उचित व्यवस्था हो जाये। कल का यही कार्यक्रम (program) है। और शाम को जैसा कार्यक्रम होता है, वैसा ही होगा।
एक कीर्तन कर दो।
Oh, tomorrow very [early] morning at 5:00, after Maṅgala-ārati there at Rūpa-Sanātana Gauḍīya Maṭha, you should all come and begin kīrtana as we usually do. And at about 5:55 I will come here—or [perhaps] earlier, around 5:30, I may come. Then we will do all kīrtanas: Rādhā-kṛpā-kaṭākṣa, Nanda-nandanāṣṭakam, Dāmodarāṣṭakam—all kīrtanas. After that, I will explain Dāmodarāṣṭakam.
[कल प्रातः बहुत शीघ्र पाँच बजे, रूप-सनातन गौड़ीय मठ में मङ्गल-आरती के बाद आप सब आकर, जैसे हम प्रतिदिन करते हैं, कीर्तन आरम्भ करें। लगभग 5:55 पर मैं यहाँ आ जाऊँगा—या सम्भव है उससे भी पहले, लगभग 5:30 पर आ जाऊँ। तब हम सब कीर्तन करेंगे—श्रीराधाकृपाकटाक्ष, श्रीनन्दनन्दनाष्टकम्, श्रीदामोदराष्टकम् आदि। उसके पश्चात् मैं श्रीदामोदराष्टकम् की व्याख्या करूँगा।]
After kīrtana, you should take some prasādam—balabhoga, breakfast—and then you should go to take darśana of Nidhu-vana. Nidhu-vana is like Seva-kuñja. The prominence of Lalitā is in Seva-kuñja, and the prominence of Viśākhā is there in Nidhu-vana. You should go and hear. From there, you may visit Gokulānanda, Rādhāramaṇa, Gopīnātha, and others—as much as you can visit. And in the evening, our program will be as usual.
[कीर्तन के बाद आप लोग कुछ प्रसाद—बाल-भोग, प्रातःकालीन नाश्ता—ग्रहण करें, और फिर निधिवन के दर्शन के लिए जायें। निधिवन, सेवाकुञ्ज के समान है। सेवाकुञ्ज में ललिता सखी की विशेष प्रमुखता है, और निधिवन में विशाखा सखी की। वहाँ जाकर श्रवण करें। वहाँ से आप गोकुलानन्द मन्दिर, राधारमण मन्दिर, गोपीनाथ मन्दिर आदि जितने स्थानों के दर्शन कर सकें, करें। सायंकाल हमारा कार्यक्रम पूर्ववत् रहेगा।]
गौर-प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
[56:06-65:11 तक कीर्तन…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण क्या कह रहे हैं? हे मेरी प्राणवल्लभे! ये जो मान है, महादुर्जय मान है— ‘मानमनिदानम्’
[हरिकथा में अचानक कटौती…]
[You are my] Ornament. Oh! You are my life and soul. Oh! You are my bhava-jaladhi-ratnam.
भव-जलधि-रत्नम् माने भव-[सागर] में डूबने पर जो उसको बचा ले; अथवा उस समुद्र में जो सीप मूँगे इत्यादि [रत्न] होते हैं।
त्वमसि मम भूषणं त्वमसि मम जीवनं,
त्वमसि मम भव-जलधि-रत्नम्।
भवतु भवतीह मयि सततमनुरोधिनी,
तत्र मम हृदयमतियत्नम्॥
-श्रीगीतगोविन्दम् (10.3)
[तुम ही मेरी भूषण स्वरूप हो, तुम ही मेरा जीवन हो, तुम ही मेरे संसार-समुद्र के रत्नस्वरूप हो, अब तुम ही सतत मेरे प्रति अनुरोधिनी बनी रहो—यही मेरा एकान्तिक प्रयास है।] GVP
आप कृपा करके अपने चरणकमलों को मेरे सिर पर रख करके [अपने] मान का [परिहार करो।]
‘नीलनलिनाभमपि तन्वि’ — ‘तन्वि’ अर्थात् कमर पतली और ‘नीलनलिनाभ’ नीलकमल के समान
नीलनलिनाभमपि तन्वि तव लोचनं धारयति कोकनदरूपम्।
कुसुमशरबाणभावेन यदि रञ्जयसि कृष्णमिदमेतदनुरूपम्॥
-श्रीगीतगोविन्दम् (10.4)
[हे कृशाङ्गि! तुम्हारे इन्दीवर के समान नेत्रों ने इस समय रक्तोपल का रूप धारण किया है। मदन-भाव से परिपूर्ण कटाक्ष बाण से कृष्णवर्ण इस शरीर को यदि रञ्जित कर दोगी—तो अनुरूप होगा।] GVP
स्फुरतु कुचकुम्भयोरुपरि मणिमञ्जरी रञ्जयतु तव-हृदयदेशम्।
रसतु रसनापि तव घनजघनमण्डले घोषयतु मन्मथनिदेशम् ॥
-श्रीगीतगोविन्दम् (10.5)
[तुम्हारे कुच-कुम्भ के ऊपर मणिमय मञ्जरी देदीप्यमान होकर तुम्हारे हृदय देश को सुशोभित करें, तुम्हारे परस्पर अविरल जघन युगल के ऊपर विराजमान काञ्चि कन्दर्प के आदेशका उद्घोष करे।] GVP
इति चटुल-चाटु-पटु-चारु मुरवैरिणो राधिकामधि वचन-जातम्।
जयति पद्मावती रमण जयदेवकवि भारती भणितमितिशातम्॥
-श्रीगीतगोविन्दम् (10.8)
[पद्मावती के प्रिय श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित राधिका को सम्बोधित करके श्रीकृष्ण द्वारा उक्त चाटुयुक्त सुकुमार, मान हरण में कुशल, मोहन माधुरीपूर्ण वचन समुदायकी जय हो।] GVP
‘इति चटुल चाटु’ — इस प्रकार से चटुल चाटु… चाटु माने flattering. इस प्रकार राधिका को कृष्ण (66:57 अस्पष्ट) करने लगे। और जयदेव [गोस्वामी] कहते हैं ‘कवि भारती (67:01 अस्पष्ट) और इसका ये वर्णन कर रहे हैं। संक्षेप में गोपी के भाव से प्रार्थना [कर रहे हैं।]
उन्होंने बहुत सुन्दर कीर्तन किया। उन्होंने आलाप भी लिया। तो कल का कार्यक्रम (67:19 अस्पष्ट) जाये। [अभी] आरती होगी। महामन्त्र [कीजिये।]
[67:26-68:48 तक कीर्तन…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
विभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीञ्च मालाम्।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-
र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.5)
(गोपियाँ अपने भावनेत्रों से देखने लगीं) श्यामसुन्दर अपने सखा गोपबालकों के साथ वृन्दारण्य में प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपुच्छ, कानों में कनेर का फूल, सुवर्ण जैसा चमकता पीताम्बर और गले में पाँच प्रकार के सुगन्धित पुष्पों से ग्रथित घुटनोंतक लम्बी मनोहर वनमाला विराजमान है। रङ्गमञ्चपर सुन्दर अभिनय करनेवाले नटवर का-सा सुन्दर वेश है। वेणु के छिद्रों से अपना अधरामृत प्रवाहित कर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी कीर्ति का गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठ से भी अति-रमणीय यह वृन्दावनधाम उनके शंख, चक्र आदि लक्षणों से युक्त चरणकमलों के चिह्नों से अङ्कित होकर और भी सुशोभित हो गया है। (GVP)
#2
धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता
या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम्।
आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः
पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10:21:11)
दूसरी व्रजनारियों ने कहा—अहो! ये वन में विचरनेवाली मूढ़ बुद्धिवाली हिरणियाँ निम्न योनि की होनेपर भी धन्य हैं। जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेश धारणकर बाँसुरी बजाते हैं, तब ये उस वंशी की तान सुनकर अपने पतियों कृष्णसार मृगों के साथ मनोहर-वेशधारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की ओर दौड़ी चली आती हैं और प्रणयभरी दृष्टि से उन्हें निहारा करती हैं। अपनी कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखों के द्वारा वे श्रीकृष्ण के चरणकमलों में पूजा अर्पित करती हैं और श्रीकृष्ण की प्रेममयी चितवन को अपने अभिनन्दन के रूप में स्वीकार करती हैं। (GVP)
#3
नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीत-
मावर्तलक्षितमनोभवभग्नवेगाः।
आलिङ्गनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारे-
र्गृह्णन्तिपादयुगलं कमलोपहाराः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10:21:15)
यमुना, मानसी गङ्गा प्रभृति नदियाँ श्रीकृष्ण का वेणुगीत सुनकर मदन (काम) से मोहित हो जाती हैं। उनके अन्दर प्रणय की इच्छा से अनन्त आवर्तसमूह उठते हैं। वे गतिविहीन होकर तरङ्गरूपी बाहुओं के द्वारा कमल-उपहार लेकर मदनमोहन का आलिङ्गन करती हुई उनके चरणयुगल को अपने वक्षःस्थलपर धारण करती हैं। (GVP)
#4
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः
सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः।
वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.7)
गोपियाँ आपस में बातचीत करने लगीं—अरी सखियों! नेत्रवान व्यक्तियों के लिए ऐसा प्रिय दर्शन ही यथार्थ फल है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अपने सखाओं के साथ गोचारण के लिए वन में प्रवेश करनेवाले राम-कृष्ण के वेणुवादरत स्निग्धकटाक्षयुक्त मुखकमल का जिन्होंने दर्शन किया है, निश्चय ही उन्होंने ही इसका अनुभव किया है। (GVP)
#5
प्रायो वताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन्
कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्।
आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान्
शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.14)
दूसरी गोपियों ने कहा—ओ माँ! हे अम्ब! इस वन में ये जो पक्षी वास कर रहे हैं, वे सम्भवतः ऋषि-मुनि ही हैं। मुनि जैसे ही श्रीकृष्ण का दर्शन करते हैं, वैसे ही वेदोक्त कर्मफलों का त्याग कर देते हैं और वेद-तरु की शाखाओंपर आरूढ़ होकर सुरम्य एवं रुचिर प्रवालरूप-कोंपलरूप समस्त स्थानीय कर्मों को ग्रहण करके सुखपूर्वक मात्र श्रीकृष्ण-गीत का श्रवण करते हैं। इसी प्रकार ये सारे पक्षी भी कृष्ण का दर्शन करने हेतु वृक्षों की शाखाओंपर आरूढ़ हो गये हैं। अन्य ध्वनियों से विमुख होकर इन्होंने अपने नेत्र मूँद लिए हैं और मात्र कृष्ण-कृत वेणु-सङ्गीत हो सुन रहे हैं और उन्हें ही अपलक दृष्टिसे देख रहे हैं। इस समय वेणुनादकी तरङ्गों से वृक्षों की टहनियाँ भी भाव-विभोर हो रही हैं। (GVP)
#6
का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतवेणुगीत-
सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्।
त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं
यद् गोद्विजद्रुममृगा: पुलकान्यविभ्रन्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.29.40)
हे कृष्ण! आपके सुमधुर पद एवं आरोह-अवरोह क्रम से विविध एवं दीर्घ मूर्च्छनाओं से युक्त वेणु के अमृतमय सङ्गीत को सुनकर तीनों लोकों में ऐसी कौन-सी कामिनी है, जो मोहित होकर अपने आर्य-धर्म से, नारी-धर्म से तथा लोक-लज्जा से विचलित न हो जाय। तीनों लोकों के मनों को मोहित करनेवाले और उन्हें मङ्गलमय बनानेवाले आपके रूप का दर्शन करके गाय, पशु, पक्षी एवं वृक्ष भी पुलकित एवं रोमाञ्चित हो जाते हैं। (GVP)
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