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Sri Brhad-bhagavatamrtam: Benediction to Narada Muni

52:42
#313
Govardhana
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 65%
Average

This audio is included in the following series of lectures:

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Topics

  • Note: Audio starts abruptly with a kirtana and ends abruptly as well.
  • Krsna appreciates Narada's efforts to establish Srimati Radhika's topmost glories and tells him to ask for a boon.
  • Pastime of benediction to Narada Muni.
  • How Narada Muni was cursed by Prajapati Daksa.
  • Glorification of Narada Muni.
  • Srila Gurudeva explained the glories of Krsna's names and sweetness and recited 2 verses from Sri Damodarashtakam.
  • Srila Gurudeva quoted 'sri visnoh sravane pariksid' from Padyavali: 'Maharaja Pariksit attained the highest perfection, shelter at Lord Krsna's lotus feet, simply by hearing about Lord Visnu. Sukadeva Gosvami attained perfection simply by reciting Srimad-Bhagavatam. Prahlada Maharaja attained perfection by remembering the Lord. The goddess of fortune attained perfection by massaging the transcendental legs of Maha-Visnu. Maharaja Prthu attained perfection by worshiping the Deity, and Akrura attained perfection by offering prayers unto the Lord. Vajrangaji [Hanuman] attained perfection by rendering service to Lord Ramacandra, and Arjuna attained perfection simply by being Krsna's friend. Bali Maharaja attained perfection by dedicating everything to the lotus feet of Krsna.'
  • Srila Gurudeva explained the second boon to Narada Muni and the importance of the boon.
  • If one touches the dust of Vraja, one will attain Krsna prema.

Transcript

श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.143-144: नारदजी को प्राप्त दुर्लभ वर

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 19 अक्तूबर 2003 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

[0.00 से 8:39 तक कीर्तन एवं मङ्गलाचरण…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हमने कल बृहद्भागवतामृत से बतलाया था कि नारदजी को लज्जित देखकर श्रीकृष्णजी [स्वयं उठकर उनको घर में ले] आये और अपने निकट बैठाया और कहा—“मैं बहुत प्रसन्न हुआ। आपका यह प्रयास अत्यन्त स्तुत्य है। आपने अपने हृदय में हमारे कृपापात्रों में से सबसे श्रेष्ठ को स्थापित करने के लिए यह प्रयास किया। और आप कह रहे हैं कि— ‘आज मैं समझ गया हूँ कि गोपियाँ ही कृष्ण की सर्वश्रेष्ठ कृपापात्र हैं; और उन गोपियों में भी चन्द्रावली और राधिका [प्रधान हैं।] उन दोनों में भी श्रीमती राधिका ही कृष्ण की परम कृपापात्र हैं। [केवल] कृपापात्र ही नहीं, वे कृष्ण की परम आराध्या हैं।’”

[कृष्ण] कह रहे हैं—[“श्रीमती राधिका] मेरी आराध्या देवी हैं। मैं इनसे प्रेम की शिक्षा [ग्रहण] करता हूँ। इसलिये आप कुछ वर माँगो। [आपने] गोपियों की ऐसी विरहावस्था को मेरी स्मृति में ला दिया है, [उसके कारण] आप भय मत करें। बतलाइये, आप क्या वर चाहते हैं?—‘वरं ब्रूहि, वरं ब्रूहि’।”

नारदजी बोले—“हे वरदाताओं में सर्वश्रेष्ठ! यहाँ तक कि अपने को भी दान देने में आप हिचकते नहीं है। आप सर्वस्व दे करके, अपने को भी दान दे देते हैं। हे गोपियों के कुचमण्डल के कुंकुम को अपने श्रीचरणकमलों में धारण करनेवाले! मेरी बहुत लालसा थी कि कुछ वर माँगू। तो मैं पहला वर यह माँगता हूँ कि मैं गोकुलरूपी क्षीरसमुद्र से [उत्पन्न परम अनिर्वचनीय गोपवेश और लीला आदि द्वारा प्रकाशित आपके मधुर से भी सुमधुर नाम-अमृत का निरन्‍तर पान करते-करते उन्मत्त होकर सम्पूर्ण जगत् को आनन्‍दित करते हुए सर्वत्र विचरण करूँ।”] #1

गोकुल क्या है? क्षीरसमुद्र है। उससे उत्थित (उठा हुआ) परम अनिर्वचनीय—जिसको वचनों (शब्दों) के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता—वह ‘गोपवेश वेणुकर नवकिशोर नटवर’ [कृष्ण का रूप है।] नवकिशोर नटवर कैसा रूप है? रास से अन्तर्धान होने के बाद में जब कृष्ण गोपियों के मण्डल (समूह) में बैठे हैं। कहाँ बैठे हैं? गोपियों के मध्य में। और कैसे? कुछ लज्जित होते हुए बैठे हैं।

तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्‍मन्‍मथ मन्‍मथः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.2)

[उसी समय उन रोदनकारी ब्रजदेवियों के बीच में शूरवंश के शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कान से खिला हुआ था, वे गले में वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मन को मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेव के मन को भी मथनेवाला था।] GVP

[कृष्ण ने साक्षात्] मन्‍मथ-मन्‍मथ का रूप धारण किया। कौन मन्‍मथ? मन्‍मथ कौन हैं? मन्‍मथ अर्थात् मन को मथनेवाले ‘कामदेव’ हैं। उन [प्राकृत कामदेव के] मन को मथनेवाले कामदेव—प्रद्युम्नजी हैं और उनके भी मन को मथनेवाले स्वयं कृष्ण हैं। कृष्ण स्वयं कामदेव के भी कामदेव हैं। वे मन्‍मथ के भी मन्‍मथ हैं किन्तु उनके भी मन का मथन कौन करता है? राधिकाजी उनके मन को मथन करके एकदम छोड़ देती हैं [और तब] वे तड़पने लगते हैं।

ऐसा जो आपका गोपवेश और मधुर लीलाएँ हैं… गोकुल की दामबन्धन-लीला, [जिसमें] यशोदा मैया ने प्रेम के द्वारा रज्जु से उनको बाँध दिया। उस बन्धन को उनका कोई सखा नहीं खोल सका। कोई बन्धन नहीं [खोल सका। कृष्ण] रो रहे हैं, मैया लठिया ले करके उनको डरा रही हैं– फिर, फिर [करेगा?] कैसी मधुर लीला! केवल यही नहीं, उनसे भी श्रेष्ठ वृन्दावन की लीलाएँ हैं—[जैसे] रासलीला इत्यादि लीलाएँ हैं, जिसमें [कृष्ण] राधिकाजी के चरणों में पड़ रहे हैं। और राधिकाजी क्या कर रही हैं? ललिता इत्यादि [सखियों] के साक्षी में अपने चरणों की महावर—जो कृष्ण ने अभी तुरन्त लगायी थी—[उसीसे] उनके सिर पर छाप दे रही हैं, stamp (मोहर) दे रही हैं कि “तुम मेरे हो।” ऐसी-ऐसी मधुर लीलाएँ! ऐसी मधुर से सुमधुर लीलाओं से उत्थित जो नाम हैं अर्थात् उनसे सम्बन्धित [जो नाम] हैं, जैसे दामोदर।

श्रीकृष्ण गोपाल हरे मुकुन्‍द,
गोविन्‍द हे नन्‍दकिशोर कृष्ण।
हा श्रीयशोदातनय प्रसीद,
श्रीबल्लवीजीवन राधिकेश॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (2.4.7)

[श्रीकृष्ण! गोपाल! हरे! मुकुन्‍द! गोविन्‍द! हे नन्‍दकिशोर कृष्ण! हा श्रीयशोदा के प्रिय पुत्र, मुझपर प्रसन्न होओ! हा श्रीबल्लवी-जीवन! राधिकेश!] GVP

एक-एक से सुन्दर ये नाम हैं—

हे कृष्ण! करुणासिन्धो! दीनबन्‍धो! जगत्पते!
गोपेश! गोपिकाकान्त! राधाकान्त! नमोऽस्तु ते॥

[हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! हे जगत्पते! हे गोपेश! हे गोपीकान्त! हे राधावल्लभ! श्रीकृष्ण! प्रभो! आपके लिए मेरा कोटिशः प्रणाम है।] GVP

हे कृष्ण! सब जगत् को आकर्षण करनेवाले कृष्ण। करुणासिन्धो! —आप करुणा के सिन्धु हैं। You are causeless merciful— [बिना किसी कारण ही दया करते हैं।] करुणा के [सिन्‍धु हैं।] दीनबन्धो! आप दीनों के बन्धु हैं। [किन्‍तु] कौनसे दीन? साधारण [अर्थ में] दीन नहीं, [बल्कि] जो प्रेम के विरह में तड़पते हैं, ऐसे जो दीन हैं। नहीं तो हम लोगों का रोना उनके कानों में प्रवेश नहीं करता है। बस वहीं तक जाता है, जहाँ तक परमात्मा हैं। वे भी बेचारे कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनका कर्म (कार्य) ऐसा नहीं है— वे [केवल] फलदाता हैं। इसलिये—

षड़ङ्ग शरणागति हइबे जाँहार।
ताँहार प्रार्थना सुने श्रीनन्‍दकुमार॥

[जिसकी छः प्रकार की शरणागति होगी, श्रीनन्‍दनन्‍दन श्रीकृष्ण एकमात्र उसीकी प्रार्थना सुनते हैं।] GVP

जिनकी सम्पूर्ण रूप से—[पहले] गुरु के चरणों में और उसके बाद में श्रीकृष्ण के चरणों में— षडङ्ग-शरणागति है, उन्हींकी प्रार्थना [श्रीकृष्ण सुनते] हैं। और दूसरे लोगों की [प्रार्थना वे] नहीं [सुनते।]

ऐसे जो [आपके] नाम हैं—कृष्ण! करुणासिन्धो! दीनबन्‍धो! जगत्पते! गोपेश–गोपों के ईश! गोपीश–गोपियों के भी जो ईश हैं [अथवा] गोपियाँ भी जिनकी ईश हैं! गोपिकाकान्त–गोपियों के कान्त! तो भी कुछ रह गया। वह क्या रह गया? राधाकान्त! राधाकान्त!

इस [गोपिकाकान्‍त] नाम से भी सुन्दर नाम है—‘राधाकान्त’, ये बतलाया।

सनातन गोस्वामीजी कह रहे हैं—“जो व्यक्ति…

तो ये उनका पहला वर है, क्या? ऐसा जो नामामृत है, उसका अविरत, निरन्‍तर, तैलधारावत्, अविछिन्न गति से मैं सब जगत् में गान करता हुआ विचरण करूँ। और [स्वयं] उन्मत्त होता हुआ, सब लोगों को भी उन्मत्त कर डालूँ। सर्वत्र जगत् में [उन नामों का कीर्तन करता हुआ] विचरण करूँ।

ये नारदजी कौन हैं? वही नारदजी—याद रखिये, जिन्हें दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था। [दक्ष ने कहा था—] “तुमने मेरे लड़कों का जीवन नष्ट कर दिया! मेरे लड़के कहाँ हैं? [उन्हें लेकर] आओ। मैंने उन्हें साम, दाम, दण्ड, भेद, जागतिक रीति और [एक योग्य] प्रजापति कैसे होते हैं—इन सब शिक्षाओं के लिए तुम्हें दिया, किन्‍तु तुमने उनको बहका करके वन (जंगल) में भेज दिया और भगवान् नारायण के भजन में लगा दिया। यह मैं सह नहीं सकता। [इसलिये मैं तुम्हें श्राप देता हूँ—] जाओ, [अब तुम] एक जगह कहीं भी गोदोहन के काल से अधिक [देर तक] नहीं रह सकोगे।”

नारदजी ने कहा— “आपका यह अभिसम्पात मेरे लिए वर हो गया।”

और फिर वही [नारदजी] और भी मधुर रूप से कृष्ण से यह वर माँग रहे हैं— “गोकुल से उत्थित आपकी जो लीलाएँ हैं—रास इत्यादि मधुर लीलाएँ हैं, राधिकाजी के साथ में व्यवहार इत्यादि हैं—जिनका हमारे षड्‍गोस्वामियों में से श्रील रूप गोस्वामी, श्रील सनातन गोस्वामी, विशेष करके श्रील रघुनाथदास गोस्वामी, श्रील कविराज गोस्वामी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, श्रील नरोत्तम ठाकुर आदि ने गान किया है—[उन लीलाओं से प्रकाशित आपके मधुर से भी सुमधुर] नामों का मैं स्मरण करता हुआ, गान करता हुआ पृथ्वी में सर्वत्र विचरण करूँ और मैं उन्मत्त हो जाऊँ।”

नारदवीणोज्जीवन! सुधोर्मि-निर्यास-माधुरीपूर!
त्वं कृष्णनाम! कामं स्फुर मे रसने रसेन सदा ॥
-श्रीकृष्णनामाष्टकम् (8)

[हे नारद की वीणा को सचेत करनेवाले! हे अमृतमय तरङ्गों के सार के समान मधुरता के समूह! हे कृष्णनाम! आप मेरी जिह्वापर स्वेच्छापूर्वक रसयुक्त होकर, सदैव स्फूर्ति पाते रहें।] GVP

‘नारदवीणोज्जीवन! सुधोर्मि-निर्यास-माधुरीपूर’– ‘निर्यास’ किसको कहते हैं? निर्यास कहते हैं—[सार को।] जैसे गोदुग्ध है, उससे दधि बनती है। दधि का निर्यास क्या है?

भक्त: मक्खन

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मक्खन का निर्यास क्या है?

भक्त: घी

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मक्खन को आग पर रख दो, तो गल करके उससे घी निकल आयेगा। ये घी [मक्‍खन का] निर्यास है।

उसी प्रकार से गन्‍ने का रस है। उसका निर्यास क्या है? गुड़। गुड़ का निर्यास क्या है? सितोपल (मिश्री)। उसका भी ऐसे ही रस बढ़ता जाता है [अर्थात् रस क्रमशः और भी गाढ़ा, मधुर और सारवान होता जाता है।] मैं तो समझता हूँ कि उससे कोटि-गुणा [अधिक] कृष्ण की प्रेमाभक्ति का रस है—उससे करोड़ों गुणा। जो व्यक्ति [इस प्रेमाभक्ति-रस को] अनुभव करनेवाला है, ये सब छोड़ करके दूसरे रस में उसकी रुचि जायेगी ही नहीं। इसलिये [नारदजी] कहते हैं—“नामामृत का पान करके, मैं उन्मत्त हो करके इन नामों का सर्वत्र गान करूँ।

और क्या? कह रहे हैं कि आपकी वह जो नामावली है—नाम की अवली माने समूह—मधुर से सुमधुर है। जैसे–विष्णु, नारायण, रामचन्द्र, मथुरानाथ, यादवेन्द्र इत्यादि मधुर नाम हैं। किन्‍तु मधुर से सुमधुर [नाम] कौनसे हुए? तो गोकुलरूपी क्षीरसमुद्र से समुत्थित नामावली का सुमधुर गान कैसे हुआ? इन नामों से भी श्रेष्ठ गोकुल में परम अनिर्वचनीय [नाम]…

कौन से हैं?

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यं ततोद्रुत्य गोप्या॥
-श्रीदामोदराष्टकम् (1)

[जिनके कपोलोंपर दोदुल्यमान मकराकृत–कुण्डल क्रीड़ा कर रहे हैं, जो गोकुल नामक अप्राकृत चिन्मय धाम में परम शोभायमान हैं, जो दधिभाण्ड फोड़ने के कारण माँ यशोदा के भय से ओखल के ऊपरसे कूदकर अत्यन्त वेग से दौड़ रहे हैं और जिनको माँ यशोदा ने उनसे भी अधिक वेग से दौड़कर पकड़ लिया है; ऐसे उन सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की मैं वन्दना करता हूँ।] GVP

रुदन्तं मुहुर्नेत्र-युग्मं मृजन्तं
कराम्भोज–युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्।
मुहुःश्वास-कम्पत्रिरेखाङ्क-कण्ठ–
स्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्तिबद्धम्॥
-श्रीदामोदराष्टकम् (2)

[मैया के हाथ में छड़ी को देखकर मार खाने के भय से डरकर, जो रोते–रोते बारम्बार अपनी दोनों आँखों को अपने हस्तकमल से मल रहे हैं, जिनके नेत्रयुगल भय से अत्यन्त विह्वल हैं, रोदन के आवेग से बारम्बार श्वास लेने के कारण जिनके त्रिरेखायुक्त कण्ठ में धारण की हुई मोतियों की माला आदि कण्ठभूषण कम्पित हो रहे हैं और जिनका उदर रस्सी से (माँ यशोदा की वात्सल्य–भक्ति के द्वारा) बँधा हुआ है, उन सच्चिदानन्दस्वरूप दामोदर की मैं वन्दना करता हूँ।] GVP

[नारदजी कह रहे हैं]—“ये सब नामावली सुन्दर से [भी अति] सुन्दर हैं [अर्थात् मधुर से सुमधुर हैं। मैं] उन्मत्त हो करके [इन नामों का] गान करता रहूँ।”]

ये नाम [जो गोकुलरूपी क्षीरसागर से उत्पन्न हुए हैं] नारायण, विष्णु, परमात्मा, मथुरानाथ, यादवेन्द्र, द्वारकाधीश [आदि नामों की तुलना में] कितने करोड़ गुणा मधुर नाम हैं, ये नारदजी जानते हैं या उनकी परम्परा में यदि कोई आनेवाला है, वही इसे समझ सकेगा। नहीं तो, [लोग] सब [नामों] को खिचड़ी बना देते हैं—परमात्मा, जगन्नाथ, मदनमोहन, श्यामसुन्दर, रासरसिक, राधारमण—[सबको एक समान मान लेते हैं।]

ये सब गोकुल के नाम हैं—लीलाओं को प्रकाश करनेवाले हैं। जैसे, ‘कृष्ण’ नाम मधुर है या ‘रासरासेश्वर’ [नाम]? कौनसा नाम [मधुर है?] ‘कृष्ण’ आकर्षक हैं, किन्तु रास में जब प्रकटित होते हैं, तो कैसे और [अधिक] आकर्षक हो जाते हैं—अद्भुत! [कृष्ण] मन्‍मथ-मन्‍मथ बन जाते हैं। कुछ लज्जित हुए, संकोचित हुए, कुछ मुस्कुराते हुए—एक साथ में न जाने कितने भाव उनमें आते हैं। ऐसे [मधुर लीलाओं से सम्बन्धित] जो नाम हैं, वे मधुर श्रेष्ठ अर्थात् [मधुर से भी सुमधुर हैं।]

उनमें [कुछ] वेश-विजृम्भित (सम्बन्‍धित) [नाम हैं।] जैसे नटवर वेश—नंगे, केवल पैरों में नुपुर हैं, यहाँ पर शिखिपुच्छ है, हाथ में वेणु है और यशोदा मैया के डर के मारे भाग रहे हैं और ये पीछा कर रही हैं। वह रूप कैसा है? अद्भुत, निराला रूप!

[और उनमें कुछ] ऐसी [लीलाओं] को स्मरण करानेवाले, उनकी लीलाओं से सम्बन्धित नाम हैं। उस समय नारदजी वीणा में [नाम कीर्तन करने लगे—]

नारद मुनि, बाजाय वीणा, राधिकारमण-नामे।
नारद मुनि, बाजाय वीणा, राधिकारमण-नामे।

[परम रसिक श्रीनारद मुनि अपनी वीणा की मधुर झंकारपर श्रीराधिकारमण का नाम गान करते हैं।] GVP

भक्त: श्यामबिहारी बहुत अच्छा गाते हैं।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्यामबिहारी, अच्छा तो ठीक है।

तो दशम स्कन्ध में ये सब लीलाएँ हैं। शकटभञ्‍जन, पूतनाघातन…

अघदमनयशोदानन्दनौ!  नन्दसूनो!
कमलनयन – गोपीचन्द्र – वृन्दावनेन्द्राः!
प्रणतकरुण – कृष्णावित्यनेकस्वरूपे
त्वयि  मम  रतिरुच्चैर्वर्धतां  नामधेय॥
-श्रीकृष्णनामाष्टकम् (5)

[हे नामप्रभु! आपके अनेक स्वरूप इस प्रकार हैं—“हे अघदमन! हे यशोदानन्दन! हे नन्दसूनो! हे कमलनयन! हे गोपीचन्द्र! हे वृन्दावनेन्द्र! हे प्रणतकरुण! हे कृष्ण! इत्यादि”। आपमें मेरी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे।] GVP

गोपियाँ उनको ‘कमलनयन’ कहती हैं—कभी ‘कृष्ण’ नहीं पुकारतीं। पत्नियाँ अपने पति का नाम नहीं लेतीं। इसलिये इन सब नामों को नहीं [कहतीं]। हाँ, यदि कुछ बिगड़ जायेंगी, तो बिगड़ करके न जाने [क्या-क्या कहेंगी;] उनको ‘काला’, ‘चोर’, ‘लम्पट’, ‘धूर्त’—सब कुछ [कहेंगी,] कुछ भी बाकी नहीं रखेंगी। और ये नाम उन नामों से भी परम मधुर हैं।

तो पहला वर क्या हुआ? आपके इन नामों को वीणा यन्त्र से गान करते हुए उन्मत्त हो करके जगत् में विचरण करूँ। ये तो पहला [वर हुआ। और दूसरा वर क्या है?] जो कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक, परम विश्वास के साथ…

श्रद्धा माने क्या? विश्वास समझो, विश्वास किसको कहते हैं?

‘श्रद्धा’–शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय।
कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (22.62)

[‘श्रीकृष्ण भक्ति करने से सब कार्य करना हो जाता है’—ऐसे सुदृढ़ निश्‍चयात्मक विश्वास को भक्ति का अधिकार प्रदान करनेवाली ‘श्रद्धा’ कहते हैं।] IGVP

‘प्राण जाय, वरु भक्ति न जाइ’—प्राण निकल जायें तो निकल जायें [किन्‍तु भक्ति छूटनी नहीं चाहिये।] हरिदास ठाकुर की भाँति, प्रह्लाद महाराज की भाँति प्राण चले जायें; कोई बात नहीं।

हरिदास ठाकुर को 22 बाजार में मारा गया। [क्या उन्होंने] भगवान् का नाम छोड़ा? हरे कृष्ण [कहना छोड़ा?] नहीं।

[मलेच्छों ने श्रीहरिदास ठाकुर से] कहा—“तुम अल्लाह, खुदा कहो तो कोई बात नहीं। [सभी नाम] एक ही तो बात है।”

[श्रीहरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया]— “यदि एक ही बात है, तो आप मुझे [कृष्णनाम छोड़कर अल्लाह, खुदा कहने के लिए] क्यों जोर दे रहे हैं? अल्लाह, खुदा [कहने] के बदले मैं तो ‘कृष्ण कृष्ण’, ‘राम राम’ कह रहा हूँ।”

ऐसी श्रद्धा के साथ, विश्वास के साथ जो ब्रज की लीलाओं का, जो कृष्ण की लीलाएँ हैं, उनका मधुर रूप में गायन करते हैं… गायन माने? ये मत सोचो [कि जो] हारमोनियम, बेहला (वायोलिन) [या अन्य वाद्य बजाकर सुमधुर] स्वर से गाते हैं। शुकदेवजी गानविद्या में सबसे निपुण हैं। वे संकीर्तन [भक्ति अङ्ग के उदाहरण] में आते हैं। उन्‍होंने भगवान् की इन मधुर लीला कथाओं का गायन किया। इसलिये ‘कीर्त्तने वैयासकिः’ [#2] अर्थात् शुकदेव गोस्वामी, और प्रह्लाद महाराज का क्या है?

भक्त: स्मरणे

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: स्मरणे। परीक्षित महाराजजी?

भक्त: श्रवणे

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रवणे। इस तरह से।

[जो कोई व्यक्ति विश्वास के साथ आपकी] ऐसी लीला-कथाओं और ऐसे नामों का कानों के द्वारा श्रवण करते हैं, अङ्ग-प्रत्यङ्ग के द्वारा एकबार भी आपकी ऐसी मधुर से सुमधुर लीलाओं (क्रीड़ाओं) को हृदय में धारण करते हैं अथवा आपकी क्रीड़ाभूमि का स्पर्श करते हैं—[जैसे] रासस्थली, वंशीवट, भाण्डीरवट, श्रीगिरिराज गोवर्धन, सर्वोपरि श्यामकुण्ड तथा उससे भी श्रेष्ठ राधाकुण्ड—इन लीलाओं [और लीला-स्थलियों] को [हृदय में] धारण करते हैं, या हाथों से स्पर्श कर दें, आँखों से स्पर्श कर दें, मन के द्वारा भी स्पर्श कर दें– इतनी छूट दी है– वे गोपियों के कुच-कलशों के कुंकुम के द्वारा शोभायमान आपके श्रीचरणयुगल में नित्य-प्रेमभक्ति को लाभ करें।

गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल! श्रीश्रीनारद गोस्वामी की जय! [उन्होंने दूसरा वर यह] माँगा।

[कुछ भक्त श्रील गुरुदेव को अंग्रेज़ी अनुवाद का स्मरण कराते हुए…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You want to know? But you will take my so much time. Go on. You can stand up anywhere, where you want.

कुछ कथाएँ जच रही हैं? जच रही हैं?

भक्त: जी।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अच्छी लग रही हैं? मैं यही चाहता था कि रामचन्द्र आपके साथी, रोहिणीनन्दन, रोहिणीसुता इत्यादि आप भी थोड़ा-सा रमिये। काम जो कर रहे हैं बहुत अच्छा कर रहे हैं। वह भी लीला-सम्‍पर्क ही है, किन्तु इसमें भी डूबिये।

[27:26 से 37:38 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो नारदजी का जो दूसरा वर है, उसको थोड़ा-सा और स्पष्ट (clear) कर दूँ। नारदजी कह रहे हैं—आपकी ब्रजभूमि से सम्बन्धित मधुर क्रीड़ाएँ, अथवा वृन्दावनादि ब्रजभूमि को स्पर्श करने से, स्मरण करने से क्या होता है? वहाँ की क्रीड़ाएँ और कीर्तन इत्यादि हृदय में स्फुरित होता है। वंशीवट में जाने से क्या होगा? कृष्ण ने गोपियों के साथ में रास-विलास किया और वे मन्मथमन्‍मथ रूप में [प्रकट हुए।] शृङ्गार-वट में [कृष्ण ने] राधारानी का शृङ्गार किया। सेवाकुञ्‍ज में [स्वयं कृष्ण ने] श्रीमती राधिका की सेवा की। अद्भुत-अद्भुत विपरीत लीलाएँ वहाँ घटित हुईं—[जहाँ स्वयं सर्वेश्वर श्रीकृष्ण सेवक बन गये।] तो वहाँ पर जाने से इन सब लीलाओं की स्मृति जाग्रत होती है। इन सब लीलाओं का स्मरण होता है। क्यों?—ओह! ब्रजभूमि कृष्ण की लीलाओं का स्मारक है। उन स्थानों में जाने से कृष्ण की लीलाओं की स्फूर्ति होती है। श्रीमद्भागवत में कहते हैं–

सरिच्छैलवनोद्देशा गावो वेणुरवा इमे।
सङ्कर्षणसहायेन कृष्णेनाचरिता: प्रभो॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.49)

[हे प्रभो उद्धव! यह वही नदी है, वही पर्वत है, वही वन है, जहाँ श्यामसुन्दर बलदेवजी के साथ गायों को लेकर वंशी बजाते हुए विचरण किया करते थे। बतालाओ! इन सब उद्दीपनों को देखकर हम उन्हें भूल सकती हैं क्या?] GVP

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—“उधो! तुम कहते हो कि कृष्ण का ध्यान करो, किन्‍तु हम तो उनको भूल जाना चाहती हैं। इसीलिये हम अपने घरों से निकलकर, नन्दगाँव से निकलकर या जावट से निकलकर अथवा बरसाने से निकलकर, हम लोग ‘सरित्’ — यमुना के किनारे, पावन सरोवर, मानसीगङ्गा–ये भी एक नदी है, कृष्णगङ्गा—इन सब नदियों के किनारे जाती हैं, किन्तु वहाँ कृष्ण की इतनी मधुर से मधुर लीलाओं की हृदय में स्फूर्ति हो जाती है। फिर विरह [और तीव्र] हो जाता है। फिर हम वहाँ से ‘शैल’—गिरिराज गोवर्धन, काम्यवन, चरणपहाड़ी [आदि स्थानों] में जाती हैं। वहाँ देखती हैं कि चरणपहाड़ी पर कृष्ण के चरणचिह्न उभरे हुए हैं। [वहाँ पर] हिरणों, गायों के [खुरों के चिह्न हैं,] सखाओं के सब चरणचिह्न हैं। बस विरह हमें आकुल-व्याकुल कर देता है। फिर हम वहाँ से वनप्रदेश में—वृन्दावन, काम्यवन, खदिरवन, कोकिलवन और भाण्डीरवन इत्यादि वनों में जाती हैं, किन्तु वहाँ पर प्रत्येक पेड़ (वृक्ष), लता, गुल्म उन कथाओं को स्मृति में ला देते हैं।” यह श्रीमद्भागवत की बात है।

[यदि] कोई व्यक्ति कृतनिश्चय [होकर यह भाव करे कि]—मुझे कृष्णलीला का स्मरण [अवश्य] करना चाहिये, [और मैं] करूँगा; तथा कृष्ण का वह ब्रजप्रेम मुझको निश्चित [रूप से प्राप्त करना] है—[तो इस प्रकार] कृतनिश्चय हो करके वह [व्यक्ति उन] लीलाओं और लीला-स्थलियों के माहात्म्‍य में विश्वास के साथ में अपने वचनों के माध्यम से… वचन माने? [वह कहे—] “वाह! यह वंशीवट है, यहाँ पर ये लीलाएँ हुई थीं। यह राधाकुण्ड है, यह श्यामकुण्ड है—यहाँ पर ये लीलाएँ हुईं। [यहाँ स्वयं] कृष्ण ने गोपियों के चरण स्पर्श किये थे। उनके चरणों में [अपना] शीश नवाया था, और यहीं पर राधाजी से प्रेम की शिक्षा ली थी।” – इत्यादि का अपने वचनों के द्वारा [कथन करे।] नेत्रों के द्वारा दर्शन करे, उन लीला-[स्थलियों] को स्पर्श करे, कानों के द्वारा उनकी कथाओं का श्रवण करे अथवा अन्य किसी प्रकार से किसी भी अङ्ग-प्रत्यङ्ग के द्वारा एक बार भी यदि उन-उन क्रीड़ाओं और क्रीड़ाभूमि का स्पर्श करे, अपने मन से, वचन से, तन से, आँखों से, नाक से सूँघना – इत्यादि किसी प्रकार से हो गया, तो मूल श्लोक में कहते हैं “कश्‍चिदपि”— [अर्थात्] कोई भी व्यक्ति, किसी भी जाति का हो, किसी भी समाज का हो, किसी भी आश्रम (गृहस्थ आश्रम या त्यागी आश्रम) का हो, चाहे वह स्त्री हो, चाहे पुरुष हो, कोई भी हो—यदि आत्मविश्वास के साथ में, निश्चय के साथ में अङ्ग-प्रत्यङ्ग के द्वारा क्रीड़ा (लीला) को स्पर्श करते हैं तो…

और वाक्य के द्वारा स्पर्श करने से क्या [तात्पर्य है?] ब्रजभूमि सम्बन्धी महिमा का कीर्तन करते हैं या कानों के द्वारा श्रवण करते हैं। अङ्ग के द्वारा [लीलास्थलियों को स्पर्श करने का तात्पर्य है कि] अपने हाथों से [स्पर्श द्वारा,] आँखों से [दर्शन द्वारा,] सिर से [प्रणाम द्वारा,] चरण से [चलते हुए] वहाँ पर परिक्रमा करते हैं– ये सब। अर्थात् [‘स्पर्श’ शब्द से] – ब्रज की रज में जहाँ पर कृष्ण, राधिका और गोपियों की चरणरज पड़ी हुई हैं, [अपने समस्त अङ्गों से] स्पर्श [करने का तात्पर्य] भी समझ में आता है।

इस प्रकार से जो कोई व्यक्ति अपने किसी भी अङ्ग-प्रत्यङ्ग के द्वारा ब्रजलीला और ब्रजलीला भूमि का स्पर्श करते हैं, वे राधिका—वहाँ पर [मूल श्लोक में] कहा गोपी और यहाँ [टीका में कहा कि] राधिका रूपी जो गोपी हैं, उनके कुचकमल-कलशरूप मङ्गलघट के कुंकुम द्वारा विलसित (शोभायमान) आपके युगल पादपद्मों में नित्य प्रेमभक्ति प्राप्त हो—यही मेरा द्वितीय वर है। [#3]

गौर प्रेमानन्दे।

वर को सुन करके कृष्ण ने दाहिना हाथ ऐसे करके [आशीर्वाद मुद्रा में उठाया और] कहा— “एवमस्तु, एवमस्तु, एवमस्तु।” यह [मुद्रा] मङ्गल की सूचक है और वर देने का यह स्वरूप है। बहुत-से लोग इस चीज को नहीं समझते हैं, किन्तु ये वरदाता [रूप] है। भगवान् या अन्य कोई भी वर देते हैं या गुरु आशीर्वाद करते हैं, माता-पिता आशीर्वाद करते हैं, तो वे इसी [प्रकार करते हैं—] “मङ्गलंभवतु, कल्याणंभवतु, सुखी-समृद्धिर्भवतु, कृष्णभक्तिर्भवतु।” यह [मुद्रा और वाक्य] मङ्गलसूचक हैं। इस प्रकार से उन्होंने वर समाप्त किया। आज हम अपनी कथा को यहीं पर विराम देते हैं।

अब इसके बाद नारदजी क्या करेंगे? आनन्द से नृत्य करते हुए, इन्‍हीं सबका नामकीर्तन करते-करते वे कैसे जायेंगे और कैसे विश्व में प्रचार करेंगे—यह थोड़ा-सा रह गया है। आज [की कथा] यहीं तक [रहे।]

कल हम लोग सवेरे, जैसे भोर में निकल जाते थे, [वैसे ही निकलेंगे।] थोड़ा-सा कीर्तन इत्यादि हो जायेगा। इसके बाद रास्ते में जहाँ जायेंगे या यहीं पर ही ‘राधाकृपाकटाक्ष’, ‘नन्दनन्दनाष्टकम्’ और ‘नमामीश्‍वरं’—ये [सब कीर्तन] करके हम लोग चलेंगे। रास्ते में ही हम लोग हरिकथा सुनते चलेंगे। यहाँ से हम लोग दानघाटी जायेंगे। दानघाटी में मधुर से मधुर लीलाएँ [हुई] हैं। दानघाटी के बाद में दाननिवर्तनकुण्ड, उसके बाद में आन्यौर, आन्यौर के बाद में संकर्षणकुण्ड, गौरीकुण्ड और गोविन्दकुण्ड [जायेंगे।] गोविन्दकुण्ड [के तट] पर जहाँ माधवेन्द्रपुरीजी ने गोपाल को प्रकट किया और जहाँ पर भजन किया और इन्द्र ने [कृष्ण का] ‘गोविन्द’ नाम से अभिषेक किया। और उसके बाद में पूँछरी चलेंगे। पूँछरी का लौठा और उसके बाद नवलकुण्ड, अप्सराकुण्ड, रासस्थली, राघव पण्डित की गुफा और आगे चलिये…

भक्त: सुरभिकुण्ड

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, तब तक आप लोग बहुत थक जायेंगे। थकने पर थोड़ा-सा वहीं पर [प्रसाद की व्यवस्था होगी।] सुरभि मैया हैं न? दूध और दूध का खीर और सब चीज़ें बना करके भेजेंगी और आप लोग प्रसन्नचित्त से अपना श्रम दूर करेंगे और साथ-साथ में प्रसाद पा करके फिर आगे के लिए तैयार होंगे। तो फिर हम लोग जतिपुरा—माधवेन्द्रपुरी का स्थान और वहीं पर अन्नकूट का स्थान, बिलछूकुण्ड, फिर लौट करके…

भक्त: सनातन गोस्वामी भजनकुटीर

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: किसका? नहीं, अब उधर नहीं जायेंगे। उधर से लौट जायेंगे। फिर परसों और बाकि सब [दर्शन] करेंगे। हम लोग वही दानघाटी से ही जायेंगे और दानघाटी से लौट करके इधर आ जायेंगे।

गौर प्रेमानन्दे हरि हरि बोल!

Tomorrow we will…

[46:39-51:20 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: One thing — I am now very worried, very, very worried. Why did I tell all these things to you? I am very very sad. Now I am dragging you all from your houses and [from your] householder [lives] to Girirāja Govardhana, Rādhā-kuṇḍa, Śyāma-kuṇḍa, Dāna-ghāṭī, Dāna-nivartana-kuṇḍa, Govinda-kuṇḍa, and also to Rāsalīlā-[sthalī,] Vaṁśī-vaṭa, Bhāṇḍīr-vaṭa, and so many [other] places. Why I am worried that if this really happens that Kṛṣṇa-prema [will come in your hearts] then you will be in maṭha. I think you cannot return back to your homes.

[एक बात — मैं अब बहुत चिन्तित हूँ, अत्यन्त चिन्तित। मैंने आपको ये सब बातें क्यों बता दीं? मैं बहुत उदास हूँ। अब मैं आपको आपके घरों और गृहस्थ जीवन से खींचकर गिरिराज गोवर्धन, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, दानघाटी, दान-निवर्तनकुण्ड, गोविन्दकुण्ड, तथा रासलीला-स्थली, वंशीवट, भाण्डीरवट और अनेक अन्य पवित्र स्थलों की ओर ले जा रहा हूँ। मुझे चिन्ता इस बात की है कि यदि वास्तव में ऐसा हुआ कि आपके हृदयों में कृष्ण-प्रेम उदित हो गया, तो फिर आप मठ में ही रह जायेंगे। मुझे लगता है कि आप अपने घर वापस नहीं जा पायेंगे।]

भक्त: गौर प्रेमानन्दे

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [52:13-52:17–Inaudible] Like Sanatana Gosvami… So I am very very very worried that what will be of your daughters, sons and husbands and wives, whom you will give up and come here! So what to do! I cannot tell. I will ask Kṛṣṇa to make any [arrangement so that you can return back[?]].

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
पायं पायं व्रजजनगणप्रेमवापीमराल
श्रीमन्नामामृतमविरतं गोकुलाब्ध्युत्थितं ते।
तत्तद्वेशाचरितनिकरोज्जृम्भितं मिष्टमिष्टं,
सर्वाल्लोंकान् जगति रमयन् मत्तचेष्टो भ्रमाणि ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.143)

हे व्रजवासियोंके प्रेमरूप सरोवरमें विचरण करनेवाले राजहंस! मैं गोकुलरूपी क्षीरसागरसे उत्पन्न परम अनिर्वचनीय गोपवेश और लीला आदि द्वारा प्रकाशित आपके मधुरसे भी सुमधुर नाम-अमृतका निरन्तर पान करते-करते उन्मत्त होकर सम्पूर्ण जगत् को आनन्दित करते हुए सर्वत्र विचरण करूँ। (यही मेरा प्रथम वर है।) GVP

#2
श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्त्तने
प्रह्लादः स्मरणे तदङ्‍घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने।
अक्रूरस्त्वभिवन्‍दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः
सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम्॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (22.132)

राजा परीक्षित् ने श्रीविष्णुकी कथा-श्रवण से, शुकदेव ने उनके कीर्तन से, प्रह्लाद ने उनके स्मरण से, लक्ष्मी ने उनके चरणकमलों की सेवासे, पृथु राजा ने उनके पूजन से, अक्रूर ने उनकी वन्दना से, कपिपति हनुमान ने उनके दास्य से, अर्जुन ने उनके सख्य से और बलि ने उन्हें सर्वस्व और आत्मनिवेदन से श्रेष्ठरूप में श्रीकृष्ण को प्राप्त किया था। (IGVP)

#3
त्वदीयास्ताः क्रीड़ाः सकृदपि भुवो वापि वचसा,
हृदा श्रुत्याङ्गैर्वा स्पृशति कृतधीः कश्चिदपि यः।
स नित्यं श्रीगोपीकुचकलसकाश्मीरविलस
त्वदीयाङ्घिद्वन्द्वे कलयतुतरां प्रेमभजनम् ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.143)

जो कोई व्यक्ति विश्वास के साथ आपकी व्रजलीला का अपने मुख द्वारा वर्णन करे, कान द्वारा श्रवण करे, हृदयमें धारण करे अथवा अन्य किसी भी अङ्ग-प्रत्यङ्ग द्वारा एकबार भी आपकी उन लीलाओं को तथा आपकी लीला-स्थलियोंका स्पर्श करे, वह गोपियों के कुचकुंकुम द्वारा सुशोभित आपके श्रीचरणकमलों में नित्य-प्रेमभक्तिको प्राप्त करे। (इस दूसरे वरके लिए मेरी प्रार्थना है।) GVP

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