Sri Brhad-bhagavatamrtam: Why Krsna Didn't Return Vrndavana, About Suddha-sattva, Sattvika-bhava etc.
01:17:40This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Audio begins with a devotee singing "sri rupa manjari pada"
- The significance of the kirtana - sri rupa manjari pada. One should pray Rupa Gosvami as mentioned in this kirtana by Srila Narottama Thakura, then one will realize the mood of the gopis
- Krsna explains to Satyabhama the reason for His stay in Dvaraka and why He avoided returning to Vraja
- Real sraddha & its types
- Meaning of suddha-sattva, satva-abhasa & ni-satva; types of sattvika-bhavas.
- One can never repay sri guru
- Significance of siksa-guru
- The difference between all the moods of a jiva and those of Mahaprabhu and Srimati Radhika
- Harikatha about Prema-sarovara - Why did Krsna not return to Vraja?
- Difference between samadhi of the gopis & that of impersonalists
- Comparison between the vision of the gopis & that of Dhruva Maharaja; why do gopis faint on beholding Krsna instead of feeling rejoice?
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् : कृष्ण वृन्दावन क्यों नहीं लौटे एवं शुद्धसत्त्व, सात्त्विक-भाव आदि के सम्बन्ध में
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 9 अक्तूबर 2003 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्जीकरण करें।]
[0.00 से 8:40 तक भक्तों के द्वारा ‘श्रीरूपमञ्जरी पद’ कीर्तन…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रील नरोत्तम ठाकुरजी ने श्रील रूप गोस्वामी के विरह में यह एक अनुपम कीर्तन किया है।
(बाङ्गला भाषा में…) उनके कीर्तन में स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, अद्वैताचार्य, गदाधर पण्डित, श्रीवासादि सभी आकर नृत्य करते। वे इतना सुन्दर [कीर्तन करते थे।] यह कीर्तन श्रील प्रभुपाद का प्राण था। मैंने भी श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज के तिरोभाव के समय उन्हें यह कीर्तन सुनाया था।
I also sang this song in front of Śrīla Bhaktivedānta Svāmī Mahārāja when he was passing from this world, and he began to weep. This [song] is of a very high class — this is our aim and the object of our life. If anyone has attraction and attachment to Śrīla Rūpa Gosvāmī, then he may bless us and by his mercy to us, we can enter into Vraja-bhakti. All right.
[जब श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी महाराज इस संसार से प्रस्थान कर रहे थे, तब मैंने भी उनके समक्ष यह कीर्तन किया था, और वे भावविभोर होकर रोने लगे। यह कीर्तन अत्यन्त उच्च कोटि का है — यही हमारे जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य है। यदि किसी को श्रील रूप गोस्वामी के प्रति आकर्षण और अनुराग हो जाये, तब वे हमें आशीर्वाद दे सकते हैं और उनकी कृपा से हम व्रज-भक्ति में प्रवेश कर सकते हैं। ठीक है।]
[10:25- 25:48 तक कीर्तन, कुछ बातचीत और मङ्गलाचरण…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: (बाङ्गला भाषा में...) कृष्ण अब बोल रहे हैं। किसको बोल रहे हैं? सत्यभामा को। “तुम संकीर्णचित्त हो…”
[कृष्ण] कुछ धर्म सम्बन्ध में बोल रहे हैं, और भी कुछ बोल रहे हैं। कृष्ण ने कहा— “यदि व्रजवासी लोग चाहें, तो मैं सबको छोड़ दूँगा। पुत्र, स्त्री और तुम सब लोगों को छोड़कर वृन्दावन में जाकर वास करूँगा। किन्तु हाँ, एक बात है — मैं शपथपूर्वक कह रहा हूँ…”
इससे यह ज्ञात होता है कि जो प्रिय होता है, उसीके नाम की ही शपथ ली जाती है। जब उन्होंने सत्यभामा के नाम की शपथ ली, तो इसका तात्पर्य यह है कि उन्हें सत्यभामा, रुक्मिणी आदि से भी अधिक प्रिय हैं। कृष्ण ने कहा कि “मैं व्रजवासियों के निकट में महाऋणी हूँ, महाऋणी!” और उस सम्बन्ध में मैंने [पहले] कहा था।
“यदि मैं व्रजवासियों को प्रसन्न करने के लिए व्रज में रहूँ, वहाँ चला जाऊँ और मथुरा नहीं आऊँ या द्वारका नहीं जाऊँ, तो भी यह निश्चित नहीं है कि उन लोगों का स्वास्थ्य ठीक हो जायेगा [अर्थात् वे सन्तुष्ट हो जायेंगे—] यह सम्भव नहीं है; यही मेरी धारणा है।” क्यों? इसके सम्बन्ध में आगे बतलाया जायेगा।
कृष्ण यदि व्रज में जायें, गोपियों के पास में, व्रजवासियों के पास में रहें — तो क्या उनको स्वास्थ्य लाभ हो जायेगा? क्या उनका विरह-दुःख दूर हो जायेगा? नहीं! क्यों नहीं? इसके सम्बन्ध में भी [वे स्वयं] बतला रहे हैं। क्यों? मेरे दर्शनमात्र से ही उनमें जो प्रगाढ़रूप में प्रेम उदित होता है, उससे वे विकल और मोहित हो जाते हैं। वे देह-दैहिक सब कुछ भूल जाते हैं। अधिक क्या, वे अपने को भी नहीं जानते—“मैं कौन हूँ? कहाँ हूँ? क्या कर रहा हूँ, क्या कर रही हूँ?”
तो [फिर मैं] किसको समझाऊँ? जब वे विरह में, प्रेम में मूर्च्छित हो जाती हैं और उन सबको अपने देह-दैहिक कुछ याद नहीं रहता— यहाँ तक कि वे शृंगार, भोजन तक करना भी भूल जाती हैं और मूर्च्छित हो जाती हैं— तो फिर किसको समझाऊँ? उनको तो सुधबुध ही नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सुधि में रहे, तब उसको समझा सकते हैं, किन्तु इनको तो सुधबुध ही नहीं है।
[29:25 से 32:40 तक श्रील गुरुदेव भक्तों से अनुवाद के सम्बन्ध में कुछ पूछते हैं तथा उसके पश्चात् श्रीपाद माधव महाराज के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एक बात समझो—हरि-गुरु-वैष्णव से सम्बन्धित जो भी क्रिया-कलाप किये जाते हैं, उनसे सुकृति होती है। उस सुकृति से पहले जो श्रद्धा देखी जाती है, वह लौकिकी-श्रद्धा होती है। उससे भक्ति का कुछ लेना-देना नहीं है। (बाङ्गला भाषा में...) उससे भक्ति नहीं होती। [किन्तु] यदि लौकिकी-श्रद्धा के कारण किसी को साधुसङ्ग [प्राप्त हो जाये], भगवान् के प्रति, धाम के प्रति कोई शुभ क्रिया हो जाये, तब उस सुकृति से दृढ़ श्रद्धा होती है। तब प्राण चले जाने पर भी वह कृष्णनाम नहीं छोड़ेगा, कृष्ण-भक्ति नहीं छोड़ेगा। यह श्रद्धा का लक्षण है।
यह श्रद्धा दो प्रकार की होती है— एक लोभ द्वारा उत्पन्न माधुर्यमयी और एक वैधीभक्ति द्वारा जो श्रद्धा होती है। [एक] शास्त्र-अवधारणामयी और दूसरी भागवतकथा-लोभमयी। यदि शास्त्र-अवधारणामयी श्रद्धा होती है, तो वह वैधी-भक्ति द्वारा उसकी शेष गति वैकुण्ठ तक ले जाती है और यदि लोभमयी-श्रद्धा है तो वह क्रमशः गुरुपदाश्रय, शुद्ध-हरिकथा श्रवण, अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, उसके बाद भाव (रति), रति के पश्चात् प्रेम होने पर वैकुण्ठ को पारकर व्रज में उसकी गति होती है। जब आसक्ति होती है तब उनमें शुद्धसत्त्व प्रकाशित होता है। रति माने क्या? शुद्धसत्त्व। जिसे भाव कहते हैं, उसे ही रति कहते हैं। यह रति यदि होती है, तब शुद्धसत्त्व आता है।
शुद्धसत्त्व माने क्या? मुक्त महापुरुषों अर्थात् कृष्ण के नित्य-परिकरों [जैसे] नन्दबाबा, यशोदा मैया, गोप-गोपियों [के हृदय में जो दिव्य भाव विद्यमान है,] वह उन परिकरों के हृदय से संक्रमित होता है। यदि गुरुदेव के आनुगत्य में उस भाव के अनुगामी होकर भजन करें, तब क्या होगा? वही शुद्धसत्त्व उनके हृदय में आता है। तब वह जो भाव प्रकट होता है उसे कहते हैं— सात्त्विक। और यहाँ पर लौकिक आचार-विचार देखकर लौकिक की भाँति जो भाव उदित होता है, वह शुद्ध-सात्त्विक नहीं, यहाँ तक कि सत्त्वाभास भी नहीं होता है। उदाहरण के द्वारा समझो।
एक स्थान पर हरिकथा हो रही थी। पण्डित महाशय की बहुत लम्बी दाढ़ी थी— पकी हुयी अर्थात् सफेद दाढ़ी। सब लोगों ने सुना, भारी आनन्द और वहाँ पर एक स्त्री थी। उसका लम्बी दाढ़ीवाला एक बड़ा बकरा था। वह कहीं भाग गया था या किसीने चोरी कर लिया था। अब वह पण्डित के पास आकर कथा सुन रही थी, तब मन-ही-मन उस बकरे का स्मरण करने लगी कि मेरे बकरे की भी ऐसी ही दाढ़ी थी। तब वह क्रन्दन करने लगी। पण्डित महाशय ने पूछा— “तुम क्यों क्रन्दन कर रही हो? इतना प्रेम तो मुझमें भी नहीं। तुम प्रेम में इतना क्रन्दन कर रही हो!” तो वह बोली— “ठीक आपकी भाँति मेरा एक लम्बी दाढ़ीवाला बकरा था। रात्रि में किसीने चोरी कर लिया। इसलिये मैं [उसे स्मरणकर क्रन्दन कर रही हूँ।]
अच्छा, यह जो क्रन्दन कर रही है, वह किस वस्तु के लिए? उसका भक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं। उसी प्रकार वर्तमान में हमारी श्रद्धा, निष्ठा, रुचि, आसक्ति पर्यन्त पार नहीं करने से जो सात्त्विक भाव देखा जाता है जैसे आँखों से अश्रु प्रवाहित होना इत्यादि, वह शुद्धसत्त्व नहीं। शुद्धसत्त्व बहुत उन्नत अवस्था है! तब शुद्धसत्त्व से सत्त्विक-विकार प्रकट होते हैं। जब बाहर प्रकाशित होते हैं, तब वह शुद्धसत्त्व और भीतर-ही-भीतर यदि होते हैं तो उसको व्यभिचारी-भाव कहते हैं।
भक्त: सञ्चारी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सञ्चारी-भाव। सञ्चारी-भाव होने पर बाहर में देखा जाता है— चक्षु से जल, जड़-अवस्था, कम्प-अवस्था — ये सब देखा जाता है।
हमारी प्राणवायु होती है। कथा श्रवण करते-करते अथवा भगवद्-लीला चिन्तन करते-करते भावाविष्ट हुए जब वैष्णवों के आनुगत्य में, कृष्ण के परिकरों के आनुगत्य में भजन करते हैं, तब शुद्धसत्त्व क्या होता है? विकारग्रस्त हो जाता है। हमारी प्राणवायु पाँच प्रकार की। तब वही प्राण शुद्धसत्त्व से स्थित, शरणागत होकर, आश्रय ग्रहण करके, तब यदि पृथ्वी का आश्रय ग्रहण करे, तब क्या होता है? शरीर स्तम्भ हो जाता है। और यदि अग्नि के तो… [#1]
You are not doing?
भक्त: No translation.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You cannot do I know. He is not able to do. I will speak about it. Very high class of subject!
आकाश का होने से क्या होगा?
भक्त: मूर्च्छा
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वायु के होने से क्या होगा? कम्प। और अश्रु कब होंगे?
भक्त: जल में स्थित
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसी प्रकार का विधान है। ये अष्टसात्त्विक-विकार हैं। किन्तु शुद्धसत्त्व से सम्बन्धित होना चाहिये। शुद्धसत्त्व नहीं होने से आँखों से अश्रु निकलना उसी प्रकार होगा।
[किसीने] राधिकाजी का चित्र देखा [और कहता है कि] मेरी स्त्री भी इसी प्रकार सुन्दरी थी। हाय! हाय! मैं उसको छोड़ करके आ गया। कृष्ण को छोड़ दिया। तब क्या होगा? उसके नेत्रों से अश्रु आयेंगे। पुत्र के मरने पर सहज रूप में आँसू आयेंगे, किन्तु यह सात्त्विक नहीं, यह शारीरिक (शरीर से सम्बन्धित) होता है।
First I am telling that the first (stage) is śraddhā. Śraddhā are two kinds – mundane and transcendental. Laukika śraddhā (mundane śraddhā) will not help you, but if your śraddhā is of high-class transcendental, anyhow related to Hari, guru, Vaiṣṇava, Kṛṣṇa, Rādhikā, dhāma, nāma, then it may be śraddhā. Also this śraddhā is of two kinds: śāstra-avadhāraṇamayī and mādhuryamayī.
If you will not do bhajana, then you have to go to hell, so anyone who is chanting nāma and taking shelter of gurudeva, [so this śraddhā is śāstra-avadhāraṇamayī], and one hearing very sweet pastimes of Kṛṣṇa, Mahāprabhu, Nityānanda Prabhu, Gadādhara Paṇḍita, Gaura-Gadādhara, Rādhā-Kṛṣṇa, then, oh! high-class of transcendental love and affection may come at that time.
After that [I was telling about] śuddha-sattva. What is śuddha-sattva? Śuddha-sattva is the mood of Rādhikā towards Kṛṣṇa, how she is serving, (42:57 inaudible) how she wants to serve. This is sattva, and if you will follow gopī, Vrajavāsī, and Rādhikā, then it will come down into our heart. This is called śuddha-sattva, and then if we will realise this, tears may come. You will be senseless. Oh! sweating and so many symptoms will come.
If we divide our prāṇa-vāyu (life air)… You can tell. Stand up and tell.
[सबसे पहले मैं श्रद्धा के विषय में बता रहा हूँ। श्रद्धा दो प्रकार की होती है—लौकिक और पारमार्थिक। लौकिक श्रद्धा आपको वास्तविक लाभ नहीं दे सकती, लेकिन यदि आपकी श्रद्धा उच्च कोटि की, पारमार्थिक हो—जो किसी भी प्रकार से हरि, गुरु, वैष्णव, कृष्ण, राधिका, धाम या नाम से सम्बन्धित हो—तभी उसे वास्तविक श्रद्धा कहा जा सकता है।
यह श्रद्धा भी दो प्रकार की होती है—शास्त्र-अवधारणामयी और माधुर्यमयी। यदि कोई यह सोचकर भजन करता है कि “यदि मैं भजन नहीं करूँगा तो नरक में जाना पड़ेगा,” और इस कारण से वह नाम जपता है तथा गुरुदेव का आश्रय लेता है, तो यह शास्त्र-अवधारणामयी श्रद्धा है।
दूसरी ओर, जब कोई कृष्ण, महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, गदाधर पण्डित, गौर-गदाधर और राधा-कृष्ण की मधुर लीलाओं को सुनता है, तब उसके हृदय में उच्च कोटि का अप्राकृत प्रेम और स्नेह उत्पन्न होने लगता है—यह माधुर्यमयी श्रद्धा है।
अब शुद्ध-सत्त्व के विषय में [सुनो]। शुद्ध-सत्त्व क्या है? शुद्ध-सत्त्व वह भाव है, जो राधिका के हृदय में कृष्ण की सेवा के लिए विद्यमान है—वे किस प्रकार सेवा करना चाहती हैं, वही उनका सत्त्व है। यदि हम गोपियों, व्रजवासियों और राधिका का अनुसरण करें, तो वह भाव हमारे हृदय में प्रकट हो सकता है—इसी को शुद्ध-सत्त्व कहते हैं।
जब यह भाव प्रकट होने लगता है, तब अश्रु (आँसू), चेतना का अभाव, शरीर में कम्प, पसीना आदि अनेक लक्षण प्रकट होते हैं।]
[44:01-50:37 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: For a long time — so many years — I wanted to understand this fact: how sāttvika-vikāra comes. Why kampa, why aśru, why all others come? I read so many times, but I could not understand. Then I prayed to Rūpa Gosvāmī: “Oh! Be merciful to me.” And after a long time — I think more than thirty years — then I realised. Especially, I am realising this time more; before [it was not like] that.
[बहुत लम्बे समय तक—कई वर्षों तक—मैं यह समझना चाहता था कि सात्त्विक-विकार कैसे प्रकट होते हैं। कम्प क्यों होता है? अश्रु क्यों आते हैं? और अन्य सात्त्विक-भाव क्यों प्रकट होते हैं? मैंने इसे अनेक बार पढ़ा, किन्तु मैं समझ नहीं सका। तब मैंने श्रील रूप गोस्वामी से प्रार्थना की—“ओह! मुझ पर कृपा कीजिये।” और बहुत समय के बाद—मेरा विचार है, तीस वर्षों से भी अधिक समय के बाद—मुझे इसका अनुभव हुआ। विशेषकर अब मैं इसे अधिक समझ रहा हूँ; पहले ऐसा नहीं था।]
श्रीपाद माधव महाराज: (बाङ्गला भाषा में…) 8-10 वर्ष पूर्व तमालकृष्ण महाराज ने इस विषय में आपसे जिज्ञासा की थी।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh! Tamāla Kṛṣṇa, when hearing Vilāpa-kusumāñjali…
श्रीपाद माधव महाराज: (बाङ्गला भाषा में…) जब जैव धर्म की कथा चल रही थी, उस समय…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Oh! He asked, I answered, but I was not satisfied. He became satisfied, but I never did. But now I am fully satisfied. And this knowledge I am giving to you without any price, any sādhana-bhajana or anything. How fortunate you are! So, so much fortunate. All my knowledge I am giving, and you are thinking, “Oh! I have paid a hundred and ten dollars,” some [are thinking,] “I have paid not less than one thousand rupees.” [and some are thinking,] “I am a brahmacārī — whole life I am serving.”
[ओह! उन्होंने प्रश्न किया, मैंने उत्तर दिया, किन्तु मैं सन्तुष्ट नहीं हुआ। वे तो सन्तुष्ट हो गये, परन्तु मैं कभी सन्तुष्ट नहीं हुआ। लेकिन अब मैं पूर्णरूप से सन्तुष्ट हूँ। और यह ज्ञान मैं तुम्हें बिना किसी मूल्य, साधन-भजन या अन्य कुछ किये बिना दे रहा हूँ। तुम लोग कितने भाग्यशाली हो! अत्यन्त भाग्यशाली। जो भी ज्ञान मेरे पास है, वह सब मैं तुम्हें दे रहा हूँ। और तुम सोचते हो— “ओह! मैंने एक सौ दस डॉलर दे दिये।” कुछ लोग सोचते हैं— “मैंने एक हजार रुपये से कम नहीं दिये।” और कुछ लोग सोचते हैं— “मैं तो एक ब्रह्मचारी हूँ—सारा जीवन सेवा ही करता आया हूँ।”]
(बाङ्गला भाषा में...)[कोई सोचता है—] “सारा जीवन मैंने सेवा की और मुझे [परिक्रमा आदि में] इस प्रकार से ले करके जा रहे हैं। मैंने कितनी सेवा की!” [यह विचार ठीक नहीं है] किन्तु यदि यह विचार किया जाये कि यह ज्ञान और तत्त्व जो गुरु प्रदान करते हैं… ऋणी क्यों हैं? यह विचार करना पड़ेगा। गुरु का ऋण कोई चुका नहीं सकता। किन्तु दुर्भागे लोग ये सब विचार नहीं कर पाते। वे मन में सोचते हैं कि दीक्षागुरु सब कुछ है, किन्तु शिक्षागुरु कुछ नहीं। (53:00 अस्पष्ट)[ऐसे विचार से] कुछ हाथ में नहीं आता। इसलिये तुम बहुत सावधानीपूर्वक मनोनिवेशपूर्वक हरिकथा को सुनो। इस एक महीने और कुछ मत करो, विशेष-विशेष यदि कोई कार्य हो, तो करो। किन्तु हरिकथा के समय चित्त निविष्ट करके यह सब सुनो। तब हमारा भाव होगा और सारा जीवन हम ऋणी रहेंगे। किसी-किसी में 8 सात्त्विक भाव, 33 व्यभिचारीभाव, अनुभाव—इनमें से कोई-कोई एक-एक आता है। किन्तु गोपियों और चैतन्य महाप्रभु को क्या होता था? एक साथ सब भाव प्रकट हो जाते। महाप्रभु का मन एक है, किन्तु मन को इन्द्रियाँ कौन-कौन-सी दिशा में खींच रही हैं, एक साथ अष्टसात्त्विक-विकार प्रकट हो जाते। साथ-साथ अनुभाव, व्यभिचारी भाव प्रकट हो जाते। विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी चारों परिपूर्ण मात्रा में [प्रकट हो जाते।] इसलिये महाप्रभु कभी कूर्म की भाँति हो जाते, कभी समद्र में कूद जाते, कभी कुछ। श्रीमती राधिका के भाव भी उसी प्रकार के होते हैं, किन्तु उससे भी अधिक...
भक्त: आपने एक बार कहा था महाप्रभु मूल रूप से तो राधिका हैं…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: महाप्रभु कौन हैं? राधारानी ही तो। इसी कारण उनमें ये सभी भाव दिखाई देते हैं। अतएव श्रीमती राधिका इन भावों की मूल [आश्रय] हैं; महाप्रभु में जो भाव प्रकट हुए, वे भी मूलतः श्रीमती राधिका के ही भाव हैं। महाप्रभु ने तो दो-चार दिन या दस दिन ये भाव दिखाये थे, किन्तु श्रीमती राधिका में सम्पूर्ण जीवन प्रेम-वैचित्त्य के सभी महाउन्नत भाव देखे जाते हैं। जब गोपियों और व्रजवासियों में इस प्रकार के भाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी-भाव प्रकट होते हैं, तब वे मूर्च्छित हो जाते हैं। जब उन्हें शरीर की सुधबुध नहीं रहती, जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ अथवा देह-दैहिक सब कुछ नहीं रहता; जब कृष्ण को देखनेमात्र से ही भावी विरह की आंशका से मूर्च्छित पड़े रहते हैं, तब कृष्ण किसको समझायेंगे? किसको सान्त्वना देंगे? इस कारण कृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं…
इस प्रसङ्ग में मैंने थोड़ी-सी भूमिका बाँध दी है, ताकि समझ में आये।
अतएव मुझे देखने से ही मेरे विरह के कारण शान्ति नहीं होगी। हाय! हाय! कृष्ण आये हैं और अभी ही चले जायेंगे। ये प्रेम सरोवर में…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You remember Prema-sarovara hari-kathā. Śrīmatī Rādhikā is in the arms of Kṛṣṇa, and Kṛṣṇa is there, and she is in…
श्रीपाद माधव महाराज: Left side of Kṛṣṇa’s lap.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और वह होश में हैं।
श्रीपाद माधव महाराज: She was in sense.
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: At first she knew that she was in the lap of Kṛṣṇa, but later what happened? When Madhumaṅgala said, “I have driven out this Madhusūdana,” at once aṣṭa-sāttvika-bhāva, vibhāva, anubhāva, sāttvika, [and vyabhicārī-bhāvas manifested,] and she became senseless. Kṛṣṇa began thinking, “How can I console her?”
[प्रारम्भ में वह जानती थीं कि वे कृष्ण की गोद में हैं; किन्तु बाद में क्या हुआ? जब मधुमङ्गल ने कहा—“मैंने इस मधुसूदन को भगा दिया है,”—तो उसी क्षण अष्ट-सात्त्विक-भाव, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव प्रकट हो गये और वह मूर्च्छित हो गयीं। तब कृष्ण विचार करने लगे—“मैं इन्हें किस प्रकार सान्त्वना दूँ?”]
मैं इनको कैसे समझाऊँ? कैसे सान्त्वना दूँ? यह मेरे बस की बात नहीं। इसलिये यदि मुझे देखने से उनको शान्ति मिलती, तो मैं व्रज चला जाता, किन्तु इसलिये व्रज में नहीं जाता। यदि मैं वहाँ पर कुछ दिन रहूँ और व्रज से लौटूँ ही नहीं, व्रज में ही रह जाऊँ, जिससे उनको सान्त्वना होगी और मधुर विहार कर उनके साथ रास इत्यादि करूँ, तो भी नहीं होगा। किन्तु मेरे विच्छेद की चिन्ता से आकुल होकर या विरहादि दुःख उनको हर तरह से विदीर्ण कर देते हैं। उस समय वह विरह क्या करता है, (57:50 अस्पष्ट)
[58:00-61:19 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि कहो कि प्रेम मोह अर्थात् मूर्च्छा हो जाये, तो उसमें ज्ञान नहीं रहता—यह बात तो ठीक है; किन्तु अन्तर (भीतर) में वह योगियों की निर्विकल्प समाधि जैसी नहीं होती। कृष्ण की सेवा जिन्होंने की है, उन्हें उनके सौन्दर्य और माधुर्य का आस्वादन होने लगता है। मैंने कल भी बतलाया था। भगवद्-स्फूर्ति होने के कारण बाहर और भीतर, सब समय उनका दर्शन होता है। जैसे महाप्रभुजी को [होता था।]
भाव में डूब जाने पर वे भीतर क्या देख रहे होते हैं? जब उनकी मूर्च्छा टूटी तो कहते हैं— “अरे! मैं तो यमुना में कृष्ण के साथ में विहार कर रहा था। मुझे क्यों उठा दिया? मुझे वहाँ से क्यों खींच लाये?” और रोने लगे। इसका अर्थ यह है कि भीतर और बाहर दोनों में वे देखते हैं। क्यों? इसका कारण यह है कि ऐसे प्रगाढ़ भाव के उदय होने पर स्वाभाविक रूप से ही भगवान् का दर्शन होता है। एकदम ऐसा प्रतीत होता है कि कृष्ण खड़े हैं, राधाजी खड़ी हैं—दर्शन हो रहा है।
उदाहरणस्वरूप देखो—ध्रुव थे। वे भगवान् के ध्यान में निविष्ट हो गये और भीतर उन्हें भगवान् की स्फूर्ति हुई, किन्तु इन आँखों से भगवद्-दर्शन नहीं हुआ। भगवान् ने देखा कि इन्होंने अभी तक हमारे रूप को इन इन्द्रियों से नहीं देखा है। इसलिये भीतर जो स्फूर्ति थी, उसे समाप्त कर दिया और अन्तर्धान हो गये। तब जब ध्रुवजी ने आँखें खोलीं, तो सामने वही [रूप प्रत्यक्ष] दिखाई दिया। गोपियों और व्रजवासियों की समाधि ऐसी नहीं होती। इसीको बतला रहे हैं। भगवान् ने ही कृपा करके ध्रुव को साक्षात् दर्शन दिया था। चतुर्थ अध्याय में ध्रुवजी का चरित्र वर्णन किया गया है। छः महीने क्रमशः प्रगाढ़ ध्यानयोग करते-करते अन्तिम महीने ध्रुवजी का चित्त एकदम निश्चल हो गया।
हम लोगों का चित्त तो अभी तक भी निविष्ट नहीं हुआ—इतने वर्ष हो गये; किन्तु ध्रुवजी ने क्या किया? उन्होंने तो अपना चित्त एकदम निश्चल कर लिया। क्यों? भैया, उनके गुरुजी नारद हैं। गुरु नारदजी की कृपा से हुआ। चित्त निश्चल हो गया और उन्होंने हृदय के पद्मकोष में भगवान् की मूर्ति को देखा। स्फूर्ति हुई और स्फूर्ति में ही भगवान् आ गये। जैसे शची मैया [का हुआ।]
[शची मैया ने] किसी उत्सव के दिन विभिन्न प्रकार की रसोई बनायी और जब ठाकुर को भोग लगाया— हाय! हाय! निमाइ मेरा (65:02 अस्पष्ट), तब महाप्रभुजी साथ-साथ आये और सारा प्रसाद पा लिया। तब उन्होंने बोला कि ये किसने खा लिया? मैंने भोग बनाया—कौन खा गया? बिल्ली, कुत्ता, अथवा मैंने भोग बनाया ही नहीं? यह होती है स्फूर्ति। स्फूर्ति में दर्शन दिया और वह समझती हैं कि हमारा बेटा तो वहाँ (पुरी में) है।
वैसे ही ध्रुवजी को स्फूर्ति हुई और उन्होंने भगवान् का दर्शन किया। जब भगवान् ने हृदय से अपनी मूर्ति को निकाल लिया, तो सहसा उनका ध्यान भङ्ग हो गया और ऐसे देखा। क्या मैं देखा रहा हूँ? उन्होंने देखा कि वही नारायण शंख, चक्र, गदा, पद्म ले करके सामने खड़े हैं। अतएव इस प्रकार साक्षात् दर्शन ही सब प्रकार के साध्यफलों की अपेक्षा भी अधिक श्रेष्ठतर फल है। इसीलिये आपका साक्षात् दर्शन होने पर ही… यह पूर्वपक्ष कर रहे हैं।
पूर्वपक्ष यह है कि ध्रुव का तो ऐसा हुआ—[पहले] भीतर [स्फूर्ति] हुई और फिर बाहर में भी दर्शन दिया। उन्हें ज्ञान तो था; जब बाहर में देखा तो उनको ज्ञान हुआ। तो फिर गोपियों और व्रजवासियों को भी ऐसा ही क्यों नहीं होता? उनको मोह-मूर्च्छा क्यों होती है? ध्रुव को तो मोह-मूर्च्छा नहीं हुई, क्योंकि उन्होंने दोनों जगह अर्थात् [भीतर और बाहर] देखा।
तो इसीके लिए कहते हैं—यह कथा सत्य है। यह बात तो ठीक है। किन्तु जो व्यक्ति विरह के कारण विशेष दु:खित होता है, उसे केवल दर्शन द्वारा स्वस्थ करना असम्भव है। ध्रुवजी को तो भगवान् का विरह नहीं था; उन्हें तो केवल दर्शन करने की लालसा थी। किन्तु गोपियों का क्या है? वे कृष्ण का विरह अनुभव करती हैं, और वह भी कैसा? सप्तम सर्ग में अर्थात् अन्तिम स्थिति में। तो विरह प्राप्त व्यक्ति का केवल दर्शन से नहीं होगा।
एक व्यक्ति को बहुत भूख लगी हो और उसके सामने मालपुआ, कचौड़ी, लड्डू आदि सब रख दिया। वह बहुत दिन का भूखा है—दस-पन्द्रह दिन का और उसके सामने ये सब रख दिया, तो जब तक वह खायेगा नहीं, तब तक कुछ होगा? खाने से भी क्या होगा? दस-बारह दिन का भूखा है। भूख तो मिट गयी है। भूख तो अब नहीं है। पेट सूख गया है। वह लेने से भी एक दिन में स्वस्थ हो जायेगा? जैसा पहले मोटा-सोटा (हृष्ट-पुष्ट) था, [वैसा हो जायेगा?] बीस-पच्चीस दिन नियमित रूप से आहार करेगा, तब कहीं जाकर [वह पूर्ववत्] होगा।
तो इसी प्रकार मेरे दर्शन [मात्र] से व्रजवासियों को वैसा आनन्द नहीं होगा और उनकी विरह-अग्नि शान्त नहीं होगी। और भी क्या होता है? मैं जाऊँ, उन्हें दर्शन दूँ, तो भावी विरह [की आशंका] से उनका विरह और भी दुगना हो जाता है। यह उनका स्वभाव है। इसलिये यदि मैं व्रज में जाऊँ, और बहुत दिनों तक उनके साथ लीला करूँ, तो भी नहीं होगा। हाँ, [यदि मैं] कुछ अधिक दिन तक रहूँ, सब समय के लिए और नित्य उनके साथ में विहार करूँ, तो हो सकता है कि [उनकी विरह-वेदना शान्त] हो सके। कृष्ण कहते हैं यह भी नहीं हो सकता। इसलिये वे व्रज में नहीं जाते। ये सब व्रज में नहीं जाने का [गूढ़] कारण है—इसको समझो।
गौर प्रेमानन्द हरि हरि बोल!
अब इसके आगे की कथा कल कहेंगे। अच्छा, तुम शीघ्रता से बोलो।
[69:10-75:00 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Tomorrow is the Viraha Mahotsava of our Gurudeva, and from tomorrow our Niyama-sevā, Kārtika-vrata, and Ūrjā-vrata will also begin. Therefore, in the early morning, the ārati will be at 4:30, and it should be completed by then.
[कल हमारे गुरुदेव का विरह महोत्सव है, और कल से ही हमारा नियम-सेवा, कार्तिक-व्रत तथा ऊर्जा-व्रत भी प्रारम्भ होगा। इसलिये प्रातःकाल आरती 4:30 बजे होगी, और तब तक उसे सम्पन्न कर लेना चाहिये।]
चार बजकर तीस मिनट तक, या अधिक से अधिक पाँच बजे तक, आरती और कीर्तन पूर्ण हो जायें। आरती के बाद कीर्तन आरम्भ हो। जो आह्निक करना चाहें, वे आह्निक कर लें।
Those who want to do āhnika after the ārati, they should complete all these things before 5:30. Then kīrtana should begin. I will come just at 5:45 and then the following kīrtanas should be sung: Rādhā-kṛpā-kaṭākṣa, Nandanandanāṣṭakam, Dāmodarāṣṭakam, Kṛṣṇa-deva-bhavantaṁ vande, and Rādhe jaya jaya Mādhava-dayite. Some kīrtanas we will select for the morning and some for the evening. “Jaya Rādhe, Jaya Kṛṣṇa” will be for the evening, and it can be sung at the time of parikramā.
So I want that all should be regulated in this way. Tomorrow in the morning, I will give some glorification of my Gurudeva; and after that kīrtana you can go.
[जो लोग आरती के बाद आह्निक करना चाहते हैं, वे इन सब कार्यों को 5:30 बजे तक पूर्ण कर लें। इसके बाद कीर्तन प्रारम्भ होना चाहिये। मैं ठीक 5:45 पर आऊँगा, और तब निम्नलिखित कीर्तन गाये जायेंगे—राधाकृपाकटाक्ष, नन्दनन्दनाष्टकम्, दामोदराष्टकम्, कृष्णदेव भवन्तं वन्दे, तथा राधे जय जय माधवदयिते। कुछ कीर्तन हम प्रातःकाल के लिए चयन करेंगे और कुछ सायंकाल के लिए। “जय राधे, जय कृष्ण” सायंकाल के लिए रहेगा, और उसे परिक्रमा के समय गाया जा सकता है।
अतः मैं चाहता हूँ कि सब कुछ इसी प्रकार व्यवस्थित रहे। कल प्रातः मैं अपने गुरुदेव का कुछ गुणगान करूँगा; और उसके बाद कीर्तन करके आप जा सकते हैं।]
भक्त: विश्राम घाट
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: I will also go. I think that it would be better to keep your daṇḍa with you.
[मैं भी जाऊँगा। मेरा विचार है कि आपके लिए अपना दण्ड अपने पास रखना अधिक उचित होगा।]
-------------------------------------------------------------
समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
ब्रजनाथ–सात्त्विकभाव कैसे उदित होते हैं?
गोस्वामी-जब साधकका चित्त सत्त्व भावके साथ एक होकर अपनेको प्राणके निकट समर्पण करता है, तब प्राण विकारयुक्त होकर शरीरमें प्रचुर क्षोभ पैदा करता है, उसी समय स्तम्भ आदि विकार उदित होते
ब्रजनाथ–सात्त्विक विकार कितने प्रकारके हाते हैं?
गोस्वामी-स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु (कम्प), वैवर्ण (विषाद), (भय और क्रोध आदि द्वारा शरीरके ऊपर जो वर्ण विकार होता है जैसे–मलिनता, कृशता आदि) अश्रु और प्रलय-ये आठ सात्त्विक विकार हैं। प्राण किसी अवस्थामें दूसरे चार भूतों (भूमि, जल, तेज और आकाश) के साथ पञ्चम भूतके रूपमें अवस्थित रहता है और कभी-कभी स्वप्रधान होकर अर्थात् वायु प्रधान होकर जीवके शरीरमें विचरण करता है। जिस समय वह भूमिस्थ होता है, तब स्तम्भ (जड़ता) लक्षित होता है, जलाश्रित होनेपर अश्रु, तेजस्थ होनेपर वैवर्ण एवं स्वेद या पसीना लक्षित होता है। जब वह आकाशाश्रित होता है, तब प्रलय या मूर्छा होती है तथा जब वह स्वप्रधान (वायुके आश्रित) होता है, तब मन्द, मध्य, तीव्र भेदसे रोमाञ्च, कम्प और स्वरभेद विकारससूह प्रकाशित होते हैं।
-जैवधर्म (सत्ताइसवाँ अध्याय, रस-विचार)
We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.