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Sri Brhad-bhagavatamrta 1.7.137: Two Benedictions of Narada

41:40
#329
Govardhana
Lecture
Hindi
English
Srila Gurudeva 70%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Note: Audio starts abruptly
  • Srila Gurudeva shares his earlier experiences including how parikrama was performed with so many difficulties and how Sri Giridhari Gaudiya Matha was built in Govardhana.
  • Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.137 'atra gatya ca ye drista': Sri Narada asked the benediction, that no one be satisfied by Krsna's devotional service.
  • Gradations of devotees
  • Pastime of Satyabhama wanting to donate gold worth Krsna's weight
  • Who is eligible for mercy?
  • Explanation of two benedictions Narada asked of Krsna.
  • Krsnadasa Prabhu sings kirtana 'harinama tuwa aneka svarupa' and Srila Gurudeva explained it's meaning

Transcript

श्रीबृहद्‍भागवतामृत 1.7.137: नारदजी को प्राप्त दो वर

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 18 अक्तूबर, 2003 को श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ, गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हम लोगों ने] पैदल ब्रजमण्‍डल की परिक्रमा की। उसमें 700-800 पैदलयात्री थे। प्रपूज्यपाद त्रिविक्रम महाराजजी बाजार-हाट इत्यादि करना– ये सब व्यवस्था [करते थे] और तम्‍बू लगाने की व्यवस्था हमारे ऊपर में थी। ‘Advanced’ और ‘Real’ पार्टी भी हम ही थे। हमारे साथ में बहुत से ब्रह्मचारी थे। कोई बाहर का तम्‍बू लगानेवाला नहीं था, आगरा से तम्‍बू आये थे, जो बाद में हम लोगों के पास नवद्वीप में थे। अब तो वे सड़-गल गये हैं। 1950 में गुरुजी ने परिक्रमा की। त्रिगुणातीत बाबाजी महाराज के अन्‍दर (उत्तरदायित्व) में भण्डार था। और उसके थोड़े-से आगे हमारे शिवानन्‍द ब्रह्मचारीजी परमपूज्यपाद नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद्भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराजजी के शिष्य [रहते थे।] उस समय मठ [इत्यादि] कुछ नहीं था। उसके पीछे एक टीला था। तुम लोगों ने देखा या नहीं देखा। उस टीले पर ही हमारी परिक्रमा ठहरी। चारों तरफ से गाइड लाइट (पारदर्शी उपकरण–एक प्रकार का प्रकाश स्रोत) वामन महाराजजी वे गाइड लाइट जलाते थे। और ऐसा जलाते थे कि रातभर जलती रहती थी। गाइड लाइट माने वह…

भक्त: (बङ्गला भाषा में) उसको डे लाइट कहते है।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: डे लाइट। आजकल वह सब नहीं है, कहीं नहीं देखा। एक बार जला दिया बस, कभी-कभी तीन दिन [तक] जलने लगता। श्रील वामन महाराज रातभर जगते और हमारे स्वयंसेवक-दल के लोग लाठियाँ ले करके चारों ओर से पहरा देते थे और ‘हरिबोल’, ‘राधे-राधे-राधे’, ‘गिरिराजधरण की जय’– ये कहते थे।

यहीं पर अन्नकूट-उत्सव हुआ। यहाँ के ब्राह्मणों को और सब लोगों को भी निमन्‍त्रण किया गया। कम-से-कम तो 5000 लोगों ने यहाँ पर प्रसाद पाया। अभी जो गिरिधारी [पण्डा] हैं, उसके पिताजी उस समय हमारे पण्डाजी थे। वे प्रभुपादजी के अत्यन्‍त-अत्यन्‍त प्रिय थे। वे पहलवान व्यक्ति थे। सारी व्यवस्था उन लोगों ने करायी और हम लोग पैदल ही सब स्थानों में [जाते थे]—काँटे-कण्टकों [वाले मार्गों] में [अथवा] जहाँ भी जाते थे।

तो परिक्रमा के बाद में, लगभग 1955-56 में संन्यास लेने के बाद में मैं यहाँ गोवर्धन में आया। मैंने कहा कि– “गिरिराज गोवर्धनजी आप हमारे प्रति कृपालु हों। हमने आजतक कभी भिक्षा तो माँगी नहीं। यदि हमारे रहने की और भोजन की व्यवस्था कर देंगे तो हम समझेंगे कि आप हमको स्थान दे रहे हैं।”

हमारा यही गिरिधारी [पण्डा] वहीं पर पहुँच गया और बोला– “महाराजजी! हमारे यहाँ सब व्यवस्था है।”

इतने में वहाँ पर हमारे पुराने परीचित शास्त्रीजी [पहुँच गये।] उनका नाम मुझे याद नहीं। तो शास्त्रीजी थे, उनके दोनों लड़के बड़े चिकित्सक (Doctor) और प्रधानाचार्य (Principal) थे। उन लोगों ने कहा– “नहीं, हमारे लड़के वहाँ आपके यहाँ पढ़े हैं और पढ़ करके विद्वान हुए हैं। इसलिये जब तक आप यहाँ रहेंगे, हमारे घर में थोड़ी-सी माधुकरी करेंगे। तो प्रतिदिन वही माधुकरी देते थे और हम जाते थे। यहाँ पर बाढ़ आयी, हम लोग बाढ़ में भी... मैं और भक्तिप्रसाद पुरी महाराज (उस समय नारायण प्रभु) दोनों व्यक्ति बड़े मित्र थे, पानी में तैर करके पहुँच जाते थे।

यहाँ पर एक महीना हम रहे। तब तक गुरुजी आ गये और हमको ले करके चले गये। पहले पूज्यपाद वामन महाराजजी आये—मान भङ्ग करने के लिये। जब [मैं नहीं माना तो,] हार करके गुरु महाराज [आये।] गुरु महाराजजी की हमारे प्रति देखो कितनी प्रीति थी! मैं नहीं जानता कि किसी के लिए आते कि नहीं आते? वामन महाराज के लिए तो अवश्य ही आ जाते। वामन महाराजजी और हमारे लिए। मैं यह देख रहा था कि उनका कैसा व्यवहार है? मैं बड़ा स्वाभिमानी था, तनिक भी अपनी उपेक्षा नहीं देख [पाता था।] गुरुजी भी हमारी उपेक्षा कर दें, तो मैं नहीं सह सकता था। इसलिये त्रिविक्रम महाराजजी से हमारी लड़ाई होती, तो त्रिविक्रम महाराजजी कहते– “चाटुखोर, चाना-तानी मत सीखो।” और गुरु महाराजजी हमारे कहते– “ठीक कह रहा है।” वे जानते थे कि यदि कुछ गड़बड़ होती है तो… [बीच-बीच में] हमारा पक्ष ले करके त्रिविक्रम महाराजजी को down (चुप) करा देते।

यहाँ पर एक महीना रहा और भगवान् की कृपा से हम लोग राधाकुण्‍ड में मन्‍दिर बनाना चाहते थे। [किन्तु] उसके बाद में फिर सोचा कि यदि यहाँ गिरिराज गोवर्धन में [बीच में मन्‍दिर] हो, तो हम यहाँ से उधर की बड़ी परिक्रमा कर सकते हैं, और यहाँ से इधर की [छोटी परिक्रमा कर सकते हैं।] तो हम लोगों ने बहुत चेष्टा की किन्‍तु भगवान् की कृपा से कहीं नहीं हुआ। दूसरी तरफ में दूसरी जगह में गिरिराजजी के ऊपर में हमको एक लाख में एक बीघा जमीन [के भाव से] हमको ऐसे पाँच-छह लाख में छह बीघा जमीन मिल रही थी। नहीं हो सका। हमने कहा कि इतना रुपया कहाँ से लायेंगे? और यहाँ पर फिर लाखों रुपए हुए और यह जमीन ली। यह सब पाश्चात्य भक्तों (western devotees) के सौजन्य से हुआ। यह कैसे हुआ? कहाँ से पैसा आया? सब प्रणामी में हमको जो दिया और दिल्ली के भक्तों ने दिया और पाश्चात्य देशों के लोगों ने दिया। एक-एक बूँद से तालाब भरा और आज ये ऐसा सुन्‍दर [मन्‍दिर] बना। इसका नाम हम लोगों ने रखा है—गिरिधारी गौड़ीय मठ।

गौर प्रेमानन्‍दे!

भक्त: गिरिधारी गौड़ीय मठ की जय! गौर प्रेमानन्‍दे!

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसको इस तरह से बनाया है कि पाँच हजार व्यक्ति यहाँ पर रह सकें। पहले से कुछ बयाना दे दिया था कि कुछ दिन दूसरी जगह रहें। मैं सोचता था कि हमारा और शिवानन्‍दजी का ये आश्रम पूरा हो जायेगा और हो भी जाता, किन्‍तु अभी समय (time) तो लग जाता। इसलिये हम लोगों ने जहाँ-जहाँ हमारे पाश्चात्य देश वाले लोग ठहरे हैं, उनको ठहरने दिया। अगले वर्ष से यदि चार-पाँच हजार व्यक्ति भी आयें, तो सारी व्यवस्था हो जायेगी। ये इतना ही देख रहे हैं, उसके बाद में 10 फुट और है। 10 फुट इधर 10 फुट उधर, चारों तरफ से लोग बैठेंगे और नीचे खाने के लिए एक साथ में भोजन करने के लिए कम-से-कम 5000 लोग बैठ जायेंगे। इसके ऊपर में रहने की व्यवस्था की जायेगी। एक ही उधर में बना है। उसमें बाथरूम कम-से-कम तो 60-70 उधर बन जायेंगे, इधर में बन गया है। इसलिये हमने रखा कि भविष्य में चार-पाँच हजार भी आयेंगे तो सारी व्यवस्था यहाँ पर, और हमारे शिवानन्‍द सेन की हैं। उनके यहाँ सारी व्यवस्था परिपूर्ण रूप से होगी। इन लोगों को यदि कोई आवश्यकता होगी, हम लोग दोनों मिल करके रहेंगे। इन्होंने हमारी बहुत सहायता की है। इसलिए भगवान् के निकट प्रार्थना करते हैं कि इनको ब्रज की भक्ति प्रदान करें। इससे बढ़कर के और कुछ नहीं है।

[After clapping Srila Gurudeva starts again by saying] You have to help me.

श्रीपाद माधव महाराज: How much money they have brought with them, now no need to return back to their country. They can spend it here.

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: If what you have brought, if you will give all, then both my projects will be done. I know, with us there are so many wealthy persons—I know. Alone they can complete my wish, I know also. But I don’t want that. I want drop-drop-drop, like that. Now come to our Bṛhad-bhāgavatāmṛtam.

[श्रील गुरुदेव विदेशी-भक्तों को सम्बोधित करते हुए कह रहे हैं– जो धन आप लोग अपने साथ लाये हो, यदि वह सब दे दोगे, तो मेरे दोनों प्रोजेक्ट पूरे हो जायेंगे। मुझे पता है, हमारे साथ बहुत से धनी लोग हैं—मुझे पता है। अकेले भी वे मेरी इच्छा पूरी कर सकते हैं, यह भी मुझे पता है। किन्‍तु मैं ऐसा नहीं चाहता। मैं तो बूँद-बूँद-बूँद चाहता हूँ। अब आइये, हम अपने बृहद्‍भागवतामृत पर आते हैं।]

Krsna is speaking…

कृष्ण कह रहे हैं—

प्रयागतीर्थमारभ्य भ्रामं भ्राममितस्ततः।
अत्रागत्य च ये दृष्टाः श्रुताश्च भवता मुने॥
सर्वे समस्तसर्वार्था जगन्निस्तारकाश्च ते।
मत्कृपाविषया: किञ्चित् तारतम्यं श्रिता: परम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.137)

[हे मुनिवर! आपने प्रयागतीर्थ से लेकर यहाँ तक भ्रमण करते-करते जिन-जिन भक्तों के विषय में श्रवण किया और जिनका दर्शन किया, वे सभी मेरे कृपापात्र होने के कारण कृतकृतार्थ हैं तथा वे जगत् का निस्तार करनेवाले बन गये हैं। फिर भी उन सबमें कुछ तारतम्य है।] GVP

हे देवर्षि मुनि! आपको कहा कि आप वर माँगिये, तो आपने यही वर माँगा कि मेरी प्रेमाभक्ति से किसी को भी तृप्ति ना हो, किसी भी व्यक्ति की तृप्ति न हो। चाहे वह साधक हो अथवा सिद्ध हो, चाहे श्रीमती राधिका तक हों– मादनाख्याभाव तक। कभी किसी को तृप्ति न हो और [कोई यह न अनुभव करे कि बस] हो गया, [और नहीं चाहिये।]

सनातन गोस्वामी कह रहे हैं कि कृष्ण नारदजी से कह रहे हैं — “देखो, साधक [से लेकर सिद्ध तक सभी अपने-अपने में पूर्ण हैं।] हमारे प्रयागतीर्थ में जो ब्राह्मण था, जो जमींदार राजा– वहाँ से लेकर और चलते-चलते द्वारकापुरी में उद्धवजी, सत्यभामा, रुक्मिणी प्रभृति और ब्रज में यशोदा मैया, सखा लोग और उससे भी चन्‍द्रावली और राधिका, उसमें भी राधिका सभी अपने-अपने में पूर्ण हैं किन्‍तु उनके पूर्ण होने में कुछ तारतम्य है।”

हमने कल इसको समझाया। जैसे द्वारका में रुक्मिणी, सत्यभामा हैं, वे अपनी प्रेमाभक्ति में परिपूर्ण हैं। किन्‍तु जब तुलनात्मक दृष्टि से देखेंगे तो ब्रज की गोपियाँ हैं और सत्यभामा, रुक्मिणी प्रभृति हैं। [इनमें] तारतम्य देखेंगे तो ब्रजदेवियाँ कृष्ण की पूर्णतर प्रियाएँ हैं। उनमें ललिता और विशाखा इत्यादि पूर्णतम, चन्‍द्रावली और उसके गण भी पूर्णतर और राधाजी क्या हैं? परिपूर्णतम, किन्‍तु किसी को भी अपनी भक्ति से तृप्ति नहीं है।

राधिकाजी कह रही हैं—

न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ
क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम्।
वंशीविलास्याननलोकनं बिना
विभर्मि यत् प्राणपतङ्गकान् वृथा॥
-श्रीचैतन्यचरितामृतम् मध्यलीला (2.45)

[हे सखि! कृष्ण के लिये मेरे हृदय में प्रेम की लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। तब मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने परम-सौभाग्य का प्रकाश करने के लिये ही करती हूँ। वंशीवदन कृष्ण के दर्शन के बिना मैं जो प्राणपतङ्ग धारण करती हूँ, वह व्यर्थ ही है।] IGVP

मेरे प्राण-पतङ्ग को धिक्कार है! धिक्कार है, भई! कृष्ण में मेरा प्रेम नहीं है। यदि थोड़ा-सा भी प्रेम होता—एक साधारण मछली की भाँति भी होता—[तो जैसे] मछली पानी से निकलते ही छटपट-छटपट करते हुए प्राण त्याग देती है, [वैसे ही मैं भी प्राण त्याग देती।] वंशी पर विलास करनेवाले अत्यन्‍त सुन्‍दर जो कृष्ण हैं, उनका मुख मैंने अवलोकन नहीं किया और [फिर भी] मैं अभी तक जीवित हूँ! मेरे प्रेम को धिक्‍कार है। इसलिये उनको भी...

चैतन्य महाप्रभु दिन-रात विरह में तड़प रहे हैं। ये कौन हैं? हैं तो कृष्ण, किन्‍तु राधाजी का भाव और कान्‍ति लेने के कारण ये शचीनन्‍दन के रूप में [प्रकट हुए] हैं। किन्‍तु स्वरूप से ये कृष्ण ही हैं—कृष्ण स्वरूप हैं। ‘राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम्’—ये कृष्ण स्वरूप हैं, राधाजी नहीं। राधाजी का भाव लेकर वे माधुर्यों का आस्वादन करने के लिए आये।

महाप्रभुजी का विरह देखो तो, वह राधिकाजी के ही जैसा अष्टसात्विक-भावमय विरह था। भाव, विभाव, अनुभाव, सात्विक, व्यभिचारी इत्यादि परिपूर्ण रूप से एक ही समय में, राधिका में जैसे प्रकट होते थे, [वैसे ही महाप्रभु में भी प्रकट होते थे।] इसलिए [महाप्रभुजी] कभी समुद्र में कूद जाते, कभी कूर्माकृति हो जाते, कभी उनकी ग्रन्‍थियाँ लम्‍बी हो जातीं। ये सब राधिकाजी में भी कहीं नहीं सुना गया, किन्‍तु [उनमें भी] अवश्य ही होता होगा। [इसका] वर्णन श्रीमद्भागवतकार नहीं कर सकते, जिनको हमारे गोस्वामियों ने वर्णन किया। स्वरूप दामोदर की कृपा से रघुनाथदास गोस्वामी, रूप गोस्वामी और इन लोगों के बाद में कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उन भावों का वर्णन किया।

इसलिये कहते हैं कि सभी लोग अपने-अपने [अधिकार अनुसार] कृष्ण के परिपूर्ण कृपापात्र हैं, किन्‍तु उन सबमें तारतम्य है। जब विचार देखते हैं तो उनमें तारतम्य है। सभी एक बराबर नहीं है। उनमें ऐसा कोई भी भक्त नहीं है—साधक अथवा सिद्ध, जिसको भक्ति से तृप्ति हो गयी हो।

[कृष्ण ने कहा—] “नारद! तुमने क्या माँगा? और दूसरा कोई वर माँगो। यह तो भक्ति का ऐसा सिद्धस्वरूप है कि तुम माँगो अथवा न माँगो, ऐसा तो होगा ही।”

नारदजी भगवान् की जय-जयकार बोले— “जय हो! जय हो! आपकी जय हो!” और फिर कुछ बोलना चाहा।

You can repeat.

[14:25-17:54 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हो गया।

नारदजी बोले— “आप अपने को भी अपने [भक्तों] को दान कर सकते हैं। अपना विग्रह भी आप दूसरों को दान कर सकते हैं।”

कभी दान किया है? द्वारकावासी जब कुरुक्षेत्र में आये, तो सत्यभामाजी ने कृष्ण को दान करना चाहा। [सत्यभामाजी कृष्ण को] तोलने लगीं, तो कृष्ण को [तुला के] एक पलड़े पर रखा और जितना सोना था, वह [दूसरे पलड़े पर] रखा। 16108 रानियों का स्वर्ण और वहाँ (द्वारका) से जो [स्वर्ण] लायी थीं, वह भी एक तरफ रख दिया, किन्‍तु [फिर भी] कृष्ण का विग्रह [वाला पलड़ा] नीचे ही रहा और [सोनेवाला पलड़ा] ऊपर उठ गया।

अन्‍त में [सत्यभामाजी] राधाजी के पास में आयीं और रोने लगीं। तो राधाजी ने कहा— “ठीक है, इस सबको हटा दो। जितना सोना और हीरे-जवाहरात हैं, सब हटा दो।”

[राधाजी ने] एक तुलसी का पत्र लिया और रोते हुए कहा कि हमारी लज्जा रखना और आँखों के आँसुओं से तुलसीपत्र को धो दिया और उस पलड़े पर रख दिया। [तत्क्षणात्] कृष्ण का पलड़ा ऊपर उठ गया और राधाजी के आँसुओं से धुला हुआ तुलसीपत्र का जो [पलड़ा] था, वह क्या हो गया? [नीचे हो गया।] देहकुण्‍ड में कृष्ण ने अपने को दान कर दिया था। ऐसे बहुत से उदाहरण स्थल हैं जहाँ पर कृष्ण अपने विग्रह को भी दान कर देते हैं।

[नारदजी ने कहा—] “हे प्रभु! आज मेरा परिश्रम सफल हो गया। आप तो इतने करुणा के सागर हैं कि अपने को देकर भी मानों कुछ नहीं दिया। मेरा परिश्रम इसलिये सफल हुआ क्योंकि अब मैं जान गया हूँ कि जगत् में आपके कौनसे करुणापात्र हैं।”

कौन हैं कृपापात्र? सबसे [अधिक] करुणा की पात्र गोपियाँ हैं। उन गोपियों में भी चन्‍द्रावली और श्रीमती [राधिका]जी [प्रमुख हैं] और उन दोनों में भी श्रीमती राधिका से [बढ़कर] और कोई कृपापात्र नहीं है।

[नारदजी ने कहा—] “अतएव मेरा यह उत्तम वर मुझको मिल गया और मैं समझता हूँ कि इससे बढ़कर मुझे और क्या वर मिलेगा, तथापि हे उदारश्रेष्ठ! बहुत दिनों से मेरी एक लालसा है।”

वह लालसा क्या है?

[नारदजी ने कहा—] “आज उसीको आपके चरणों में माँग रहा हूँ।”

नारदजी ने वर माँगा। दो वर माँगने की बात थी न? तो पहलेवाला तो कृष्ण ने रद्द (cancel) कर दिया कि वह वर नहीं है, वह तो भक्ति का स्वभाव है किन्‍तु पहला वर उन्होंने क्या माँगा? [नारदजी ने कहा—] “हे ब्रजवासियों के प्रेमरूपी सरोवर में सञ्‍चरण करनेवाले राजहंस!” मतलब क्या है? कृष्ण ब्रजवासियों के प्रेमरूप सरोवर में सञ्चरण करनेवाले राजहंस हैं। कृष्ण ही राजहंस हैं। वे तरह-तरह से आनन्‍द प्राप्त करते हैं और गोपियाँ उनकी सेवा करती हैं।

“आप यही वर दीजिये कि गोकुलरूप क्षीरसमुद्र से जो उठा हुआ (उत्थित) आपका जो अनिर्वचनीय गोपवेश है—नवकिशोर नटवर गोपवेश वेणुकर—आपका यह जो रूप है, कहाँ से आया? गोकुलरूप समुद्र से उत्थित हो करके और लीला के द्वारा... मधुर लीलाएँ की आपने— दामबन्‍धन से आरम्‍भ, और फल-विक्रणी के सम्‍बन्‍ध में बतलाया और उसके बाद में वृन्‍दावन में छटीकरा में आये और वहाँ से गोचारण इत्यादि लीलाएँ और गोपियों के साथ में उनका मधुर मिलन—ये सब जो लीलाएँ आपने की हैं, वे नामामृत हैं। क्या नामामृत?

अघदमनयशोदानन्दनौ! नन्दसूनो!
कमलनयन – गोपीचन्द्र – वृन्दावनेन्द्राः!
प्रणतकरुण – कृष्णावित्यनेकस्वरूपे
त्वयि  मम  रतिरुच्चैर्वर्धतां  नामधेय॥
-श्रीकृष्णनामाष्टकम् (5)

[हे नामप्रभु! आपके अनेक स्वरूप इस प्रकार हैं—“हे अघदमन! हे यशोदानन्दन! हे नन्दसूनो! हे कमलनयन! हे गोपीचन्द्र! हे वृन्दावनेन्द्र! हे प्रणतकरुण! हे कृष्ण! इत्यादि।” आपमें मेरी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे।] GVP

नारदवीणोज्जीवन! सुधोर्मि–निर्यास–माधुरीपूर!
त्वं कृष्णनाम! कामं स्फुर मे रसने रसेन सदा॥
-श्रीकृष्णनामाष्टकम् (8)

[हे नारद की वीणा को सचेत करनेवाले! हे अमृतमय तरङ्गों के सार के समान मधुरता के समूह! हे कृष्णनाम! आप मेरी जिह्वापर स्वेच्छापूर्वक रसयुक्त होकर, सदैव स्फूर्ति पाते रहें।] GVP

नाम चिन्‍तामणिः कृष्णश्चैतन्य-रसविग्रहः।
पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वान्नामनामिनोः॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्‍धु (1.2.233)

[‘कृष्णनाम’ चिन्तामणि स्वरूप तथा स्वयं कृष्ण चैतन्य-रसविग्रह, पूर्ण, मायातीत एवं नित्यमुक्त है, क्योंकि नाम और नामी में भेद नहीं हैं।] GVP

कृष्णनाम तुया अनेक स्वरूप- [अर्थात् कृष्णनाम, आपके अनेक स्वरूप हैं।]

(बङ्गला भाषा में) यह कीर्तन करो।

[23:40-26:29 तक श्रीपाद कृष्णदास प्रभु के द्वारा कीर्तन...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यह हरिनाम [हरि से अभिन्न है।] कृष्ण स्वयं भगवान् हैं—He is Lord of Lords. (वह ईश्वरों के भी ईश्वर हैं।) वही कृष्ण लकुटी लेकर वनों-वनों में गैयाएँ चराते हैं। [उनके] सिर पर मयूरपंख, हाथों में वंशी, और क्या? वे गोपियों के घरों से मक्खन चुराते हैं, [और] मक्खन के बहाने हृदय चुराते हैं, लोगों का हृदय चुराते हैं। वे चाहें तो एक ही पलक में करोड़ों-करोड़ों विश्व-ब्रह्माण्‍डों को [ध्वंस कर सकते हैं और उतनी ही शीघ्रता से पुनः उनका सृजन भी कर सकते हैं।]

Billions of universes he can demolish and in a second he can again create.

वे उनको फिर से बना सकते हैं किन्‍तु देखने में वही छोटा-सा बच्चा! और क्या? वे अहैतुकी करुणाशील हैं। इतने उदार हैं कि अपने को भी दे देते हैं और [फिर भी] मानते हैं कि मैंने कुछ नहीं दिया। वे अहैतुकी दयालु हैं। [उन्‍होंने] अपने इन सारे गुणों को, सारी शक्तियों को उस नाम में भर दिया है—‘नन्‍दतनय रसकूप।’ यह जो नाम है, [इसे साधारण] नाम मत समझो। राधाकृष्ण जो नहीं कर सकते हैं, यह नाम कर सकता है—इस विश्वास के साथ में नाम करो। इसमें सम्पूर्ण रस [भरा हुआ है।] सारी लीलाएँ इसके भीतर में है।

अतः हे प्रभु! यदि वर देना चाहते हैं तो यही वर दीजिये कि आपका ऐसा जो रसकूप नन्‍दनन्‍दन नाम और-और जो अघदमनयशोदानन्दनौ…

[श्रील गुरुदेव आनन्‍द से भावपूर्वक कीर्तन करते हुए–]

गोविन्‍द दामोदर माधवेति।
गोविन्‍द दामोदर माधवेति॥

राधे-राधे-राधे जय-जय श्रीराधे।
राधे-राधे-राधे जय-जय श्रीराधे।

राधारमण हरि गोविन्‍द जय जय!
गोविन्‍द जय जय गोपाल जय जय!
राधारमण हरि गोविन्‍द जय जय!

ये जो आपके नाम हैं, वे रस के कूप हैं। मैं उन [नामों] का गान करते हुए पृथ्वी में सर्वत्र विचरण करूँ—यही मेरा पहला वर है। आया [समझ में?] पहले वाला वर तो [कृष्ण ने] रद्द (cancel) कर दिया क्योंकि वह वर नहीं, [बल्कि] वह तो नाम का स्वभाव है—कीर्तन का स्वभाव है, भक्ति का [स्वभाव है।]

[नारदजी ने कहा—] “किन्‍तु यह मेरा पहला वर है कि विश्व-ब्रह्माण्‍ड में आपके ऐसे मधुर से मधुर, सुमधुर, रसपूर्ण और सर्वशक्तिमत्ता जो नाम हैं, मैं विश्व में विचरण करूँ और आपके उन नामों का कीर्तन करूँ। यही पहला वर [आप] मुझे दीजिये।”

कृष्ण ने कहा— “धन्य हो! धन्य हो!”

[पहले कृष्ण ने कहा—] “वरं ब्रूहि।” जब नारदजी ने वर माँगा, तब कृष्ण ने कहा— “एवमस्तु! एवमस्तु! [अर्थात् ऐसा ही हो।] मैं बहुत आनन्दित हुआ।” – यह तो पहला वर हुआ।

तो आज यहीं पर कथा विराम करेंगे। आज 8:00 बज गये!

भक्त: दूसरा वर, दूसरे दिन।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: दूसरे दिन कृष्णदास और हमारे जितने भी [कीर्तनीया हैं—] हरे कृष्ण, तमाल और सबके सेनापति कन्हैयालालजी—ये समय पर बैठेंगे। मैं ठीक दिन में 4:45 बजे और सवेरे 4:45 बजे यहाँ पर आऊँगा। उसके पहले तक सारे कीर्तन हो जाने चाहिये। नहीं तो हरिकथा आधा घण्‍टा भी नहीं हो पाती, और फिर इसका रस नहीं मिलता है। तो इस प्रकार से करेंगे।

[31:10-35:54 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जैसे हम लोगों का सवेरे यहाँ पर पाठ होता है, कल वैसे ही होगा।

From tomorrow, our classes will be as usual, from 5:00 to 7:30 in the morning. I will try to finish the Dāmodarāṣṭakam, and after that, taking some breakfast, we will do parikramā of Mānasī Gaṅgā, Harideva-jī, Cakleśvara Mahādeva, Sanātana Gosvāmī’s bhajana-kuṭīra, Pārāṅga-ghāṭa—Nauka-vilāsa-līlā-sthalī—and then Mukhāravinda nearby, and then we will return back.

[कल से हमारी कथा प्रातः 5:00 बजे से 7:30 बजे तक पूर्ववत् होंगी। मैं ‘दामोदराष्टकम्’ समाप्त करने का प्रयास करूँगा। उसके बाद थोड़ा नाश्ता करके हम मानसी-गङ्गा, हरिदेवजी, चकलेश्वर महादेव, सनातन गोस्वामी की भजनकुटी, पारंग घाट—नौकाविलास-लीलास्थली और फिर पास ही मुखारविन्द की परिक्रमा करेंगे, और उसके बाद वापस लौट आयेंगे।]

कल प्रपूज्यचरण श्रीश्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधर गोस्वामी महाराजजी की आविर्भाव-तिथि भी है। कल हम लोग उसको भी मनायेंगे।

Tomorrow is the very auspicious appearance day of Parama-pūjyapāda Prapūjyacaraṇa Śrī Śrīmad Bhakti Rakṣaka Śrīdhara Gosvāmī Mahārāja, so we will observe it and then in the evening more harikathā. Nothing here and there and after that…

[कल परमपूज्यपाद प्रपूज्यचरण श्रीश्रीमद्भक्ति रक्षक श्रीधर गोस्वामी महाराज की परम पावन आविर्भाव-तिथि है। हम सब उसका पालन करेंगे और फिर सन्‍ध्या के समय भी कार्यक्रम रहेगा।]

One thing I want to tell you. I am very worried, very sad to tell you this thing—that a devotee from Houston, oh! a very high-class of devotee! Originally from Patnā but residing in Houston, she had cancer and asthma both, but she decided “I must go [to parikramā.”] I said “Do or die. So she came. Her one brother is an advocate in Delhi and his wife also came and they are initiated in Mathurā. At that time I was in Mathurā, about 10 days before and then she came with us to Gokula-Mahāvana, Rāvala, Bhāṇḍīravana, Bhāṇḍīra-vata, and also Mānasarovara and other places. But on that day she told that something is [not well].

We called the doctor in the night. She said she had very much breathing problem, but some medicine and injection were given and she slept. Our Tirtha Mahārāja said that he went to check up on her. She was breathing heavily. At that time she was alive, but after that they thought that she slept and then at about 7:30 someone went there and was trying to wake her up, [and said]—“Oh! Time is over. You should come to hear classes.” And then they saw that there was no life. The doctor was called and he certified that she is dead now.

I think this devotee was a very high-class devotee. About 5 years before, I initiated her in Kṛṣṇa [mantra]. Though she was sick—so much sick, cancer and suffocation—yet she came. She even took risk. And in the month of Kārtika, in Vṛndāvana, in Sevā-kuñja, on the bank of Yamunā, hearing kathā, remembering hari-kathā, also in the midst of many Vaiṣṇava–Vaiṣṇavīs, [she left her body.] How wonderful and how fortunate—that in Vṛndāvana she left [her body!]

So I pray and you all should pray to Kṛṣṇa that He should be merciful to give what we are discussing—Nāradajī taking boon from Kṛṣṇa. You should all pray that same boon she must be given by Kṛṣṇa. Kṛṣṇa should be very merciful to give this donation to her. Her name was Nīlam Sahī.

[एक बात मैं आपको बताना चाहता हूँ। यह कहते हुए मुझे बहुत चिन्ता हो रही है और गहरा दुःख भी अनुभव हो रहा है। ह्यूस्टन की एक भक्त—ओह! अत्यन्त उच्च कोटि की भक्त! मूलतः पटना की रहनेवाली, पर अब ह्यूस्टन में निवास करती थीं—उन्हें कैंसर और दमा, दोनों रोग थे। फिर भी उन्होंने निश्चय किया कि मुझे परिक्रमा अवश्य करनी है। मैंने कहा—“करो या मरो।” और सचमुच वे आ गयीं। उनका एक भाई दिल्ली में वकील है और उसकी पत्नी भी, दोनों ने मथुरा में मुझसे दीक्षा ग्रहण की। लगभग दस दिन पहले की बात है। फिर वह हमारे साथ गोकुल, महावन, रावल, भाण्‍डीरवन, भाण्‍डीरवट, मानसरोवर तथा अन्य स्थानों पर भी गईं। किन्तु एक दिन उन्होंने कहा कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है।

रात में हमने चिकित्सक को बुलाया। उन्होंने कहा कि उन्हें साँस लेने में बहुत कष्ट है, लेकिन कुछ दवा और इंजेक्शन दिया गया और वह सो गईं। हमारे तीर्थ महाराज ने कहा कि वे उन्हें देखने गए थे। वह बहुत तेज़ साँस ले रही थीं। उस समय वह जीवित थीं, लेकिन बाद में सबने सोचा कि वह सो रही हैं। फिर लगभग 7:30 बजे कोई वहाँ गया और उन्हें जगाने की कोशिश की—“अरे! समय हो गया है, आपको कथा सुनने आना चाहिए।” और तब देखा गया कि अब प्राण नहीं रहे। चिकित्सक को बुलाया गया और उन्होंने प्रमाणित किया कि अब उनकी मृत्यु हो चुकी है।

मेरा मानना है कि यह भक्त बहुत उच्च कोटि की भक्त थीं। लगभग पाँच वर्ष पूर्व मैंने उन्हें कृष्ण-मन्‍त्र में दीक्षित किया था। यद्यपि वे अत्यन्त अस्वस्थ थीं—गम्‍भीर रूप से बीमार, कैंसर और श्वास-कष्ट से पीड़ित—फिर भी वे आईं। उन्होंने जोखिम तक उठाया। और कार्तिक मास में, वृन्दावन में, सेवा-कुञ्ज में, यमुना के तट पर, कथा सुनते हुए, हरिकथा का स्मरण करते हुए, तथा अनेकों वैष्णव–वैष्णवियों के मध्य ही उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। कितना अद्भुत और कितना सौभाग्यशाली अवसर था कि उन्होंने वृन्दावन में ही अपना प्राण त्यागा!

इसलिए मैं प्रार्थना करता हूँ और आप सबको भी प्रार्थना करनी चाहिए कि श्रीकृष्ण उन पर विशेष कृपा करें और वही वरदान दें जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं—जैसा नारदजी ने कृष्ण से प्राप्त किया था। आप सब मिलकर प्रार्थना करें कि वही वरदान उन्हें भी श्रीकृष्ण प्रदान करें। श्रीकृष्ण अत्यन्त कृपालु होकर यह दान उन्हें अवश्य दें। उन भक्त का नाम नीलम साही था।]

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