Importance of Visiting Holy Places & Sri Brhad Bhagavatamrtam 1.7.122-125: Glories of the Mood of Separation
47:13This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Even if someone does not consciously pray, just having darsana or touching the holy dust of these places grants spiritual upliftment due to Krsna's benediction to Narada Muni
- Brief about pastimes as Vamsi-vata pastime: Lord Siva transformed into a gopi.
- Sri Brhad Bhagavatamrtam 1.7.122-125: Narada Muni, feeling guilty for Krsna’s suffering, stands outside the assembly. Krsna lovingly pulls him in, showing deep affection.
- Separation ignites intense spiritual joy through remembrance. In separation, the gopis see Krsna’s form internally, more vividly than when He is in physical sight.
- Narada spreads Radha-Krsna’s divine love, glorifying Srimati Radhika as Krsna’s topmost beloved.
- Avoid offenses, especially to Vaisnavas, to keep bhakti pure and fruitful. Krsna is most pleased when His devotees are honored with love and respect.
Transcript
धाम-दर्शन का महत्व एवं श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.122–125: विरह-भाव की महिमा
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 16 अक्तूबर 2003 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीश्रीहरि, गुरु और वैष्णवों की कृपा से आज हम लोगों [की ब्रजमण्डल-परिक्रमा] का षष्ठ दिवस है। षष्ठ दिवस है या सप्तम?
भक्त: सप्तम
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज [ब्रजमण्डल-परिक्रमा का] सप्तम दिवस चल रहा है। कल या परसों थोड़ा-सा कुछ विघ्न आने पर भी भगवान् की कृपा से सब कुछ ठीक [प्रकार से] निबट गया। आप लोगों ने कल और आज यहाँ से सेवाकुञ्ज, गोपीनाथ गौड़ीय मठ, राधादामोदरजी, शृङ्गारवट, राधाश्यामसुन्दरजी, निधुवन और उधर में गोपीश्वर महादेव, वंशीवट, यमुनापुलिन, धीरसमीर, चीरघाट, कात्यायनी [महामाया] का स्थान इत्यादि दर्शन किये।
आप लोग चाहे कोई इच्छा करें या न करें, उन स्थानों के दर्शन से, उन स्थानों का स्पर्श [करने से] और उन धामों की महिमा के सम्बन्ध में श्रवण करने से—नारदजी की विशेष कृपा से—कृष्ण ने यह वरदान दिया है कि ब्रजप्रेम [अवश्य ही] होगा। [इसमें] कोई संशय मत रखें। जिसको योग्यता नहीं, उसको योग्यता देंगे। जिसकी योग्यता होगी, उसको निष्ठा देंगे। जिसको निष्ठा है, उसको रुचि देंगे। इसी प्रकार जिसको भाव है, उसको प्रेम देंगे। इस प्रकार से क्रमोन्नति अवश्य होगी। और जिन लोगों का ये [मानना] है कि “कुछ नहीं होता", तो वे हम लोगों के साथ आयेंगे ही क्यों? किन्तु [वास्तव में] वे लोग दुर्भागे हैं, जो ऐसे सुन्दर सङ्ग से वञ्चित हो रहे हैं। वे वैष्णवों के प्रति अपराध करते हैं और [यह भी] नहीं सोचते कि अपराध होता है— यही सबसे बड़ी बात है। अपराध करते हैं और समझते हैं कि अपराध नहीं है। इसलिये भगवान् उन सब लोगों को सद्बुद्धि प्रदान करें।
विशेष करके आप लोग आज वंशीवट गये थे। आज ही न? वहाँ की कथा भी आपने सुनी होगी। शंकरजी कैलाश छोड़ करके वृन्दावन में आये, [किन्तु] गोपियों ने उनको वृन्दावन में प्रवेश नहीं करने दिया। उस समय गोपियों ने कहा— “यदि आप योगमाया पौर्णमासीजी की तपस्या करें, तो हो सकता है कि वे कृपा करें।”
[शंकरजी ने] हजारों वर्षों तक तपस्या की। तब योगमाया पौर्णमासीजी आयीं और बोलीं— “[आपकी] क्या इच्छा है?”
[शंकरजी ने कहा—] “मैं ब्रज में, वृन्दावन में, रास करते हुए [श्रीकृष्ण और गोपियों की] रासस्थली का दर्शन करना चाहता हूँ। रास करते हुए जो गोपियाँ और कृष्ण करें, उसका मैं दर्शन कर सकूँ।”
[योगमाया पौर्णमासीजी ने] कहा— “अरे, ऐसे तो दर्शन नहीं कर सकते। कोई भी पुरुष रास का दर्शन नहीं कर सकता। इसलिये आपको गोपी-भाव चाहिये, गोपी-शरीर चाहिये।”
फिर उन्होंने शंकरजी को यहाँ रङ्गनाथ [मन्दिर] के पास [स्थित] ब्रह्मकुण्ड में ले जाकर डुबो दिया। और [जब वे बाहर] निकले, तो वह [किस रूप में] निकले? गोपी के रूप में।
[योगमाया पौर्णमासीजी ने] कहा— “यहीं पास ही में, रासलीला के ईशान कोण में बैठो, और वहीं से रास का दर्शन करना। [यदि] कोई विपत्ति आये तो मुझे बुला लेना।”
वे वहीं पर बैठ करके शाम को रास-दर्शन करने के लिए चले। किन्तु उस दिन [श्रीकृष्ण और गोपियों को] रास में आनन्द नहीं आया। तो उस समय में गोपियों ने कहा— “आज रास में उल्लास क्यों नहीं हो रहा?”
कृष्ण ने कहा— “मुझे भी नहीं हो रहा? [सम्भवतः] कोई विजातीय व्यक्ति घुस आया है।”
कौन विजातीय है? गोपियाँ ढूँढ़ने लग गयीं। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे एक कुञ्ज में [पहुँचीं], जहाँ अभी गोपीश्वरजी का मन्दिर है। [वहाँ] वह [नवेली, अपरिचित] गोपी छिपी हुई थी।
[गोपियों ने] पूछा— “तुम कौन हो? तुम्हारा पति कौन है? तुम्हारे गाँव का नाम क्या है? तुम्हारे ससुर का नाम क्या है?”
[वह नवेली गोपी] कुछ भी नहीं बतला सकी। तब [गोपियों ने] गुल्चे मारकर उसके गाल फुला दिये। तब उन्होंने योगमायाजी को बुलाया।
[योगमायाजी ने] आ करके बतलाया— “यह मेरी कृपापात्री है। आप लोग इसपर कृपा करें।”
तब कृष्ण ने प्रसन्न हो करके योगमाया की [आन्तरिक अभिलाषा] समझते हुए शंकरजी को वरदान दिया— “जो कोई वृन्दावन में प्रवेश करेगा, उसे तुम प्रवेश कराओगे। और तुमको गोपी-प्रेम देने का भी अधिकार रहेगा।”
इसीलिये हमारे विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी ने उनके प्रणाम-मन्त्र में लिखा है—
वृन्दावनावनिपते! जय सोम! सोममौले।
सनक – सनन्दन – सनातन – नारदेड्य।
गोपीश्वर! व्रजविलासि–युगांघ्रि–पद्मे
प्रेम प्रयच्छ निरुपाधि नमो नमस्ते॥
-श्रीसंल्पकल्पद्रुमः (103)
[हे वृन्दावनावनिपते! हे उमापति! हे सोममौले! हे सनक, सनन्दन, सनातन, नारदजीके पूज्य! हे गोपीश्वर! मुझे व्रजविलासी श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंमें निरुपाधिक प्रेम प्रदान कीजिये।] GVP
इसलिये शंकरजी [गोपी-प्रेम] दे सकते हैं। कैलाश के शंकर के रूप में नहीं देंगे, किस रूप में देंगे? गोपीश्वर के रूप में वे दे सकते हैं। इसलिये हम लोग वैष्णव मत से शंकरजी की पूजा करते हैं। कभी-कभी इसी रूप में उनके श्रीविग्रह की भी प्रतिष्ठा करते हैं। तब से अभी तक वे वहाँ स्थापित हैं, और हम लोग [उनकी] पूजा करते हैं। वहीं पास ही में यमुना-पुलिन भी है।
श्रीपाद माधव महाराज: धीर-समीर
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: धीर-समीर और सब [स्थान हैं।] ज्ञान-गुदड़ी भी उसीके पास में है—जिस ज्ञान को उद्धव लेकर गये थे, [उसे गोपियों ने] गुदड़ी करके फेंक दिया। इस प्रकार से सब स्थान हैं। आप लोगों ने उनका दर्शन किया होगा। न चाहें तो भी स्पर्श का गुण कहाँ जायेगा? आग में पैर रखने से जलेगा ही, अवश्य ही [जलेगा—] चाहे इच्छा करो या न करो। उसी प्रकार से इसका फल अवश्य होगा। इसलिये यह मत समझो कि इसका फल नहीं होगा; अवश्य ही होगा।
[9:43-14:51 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
भक्त: ज्ञान-गुदड़ी में उद्धव ने उपदेश तो नहीं दिया था न?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [गोपियों ने] ज्ञान को गुदड़ी बना करके यमुना में फेंक दिया। यमुना से बह करके वह प्रयाग में गया, वहाँ से समुद्र में गया और खारे पानी में गलकर समाप्त हो गया।
[15:06-15:22 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हो गया?
निधुवन का भी आप लोगों ने दर्शन किया। और मैंने बतलाया था कि सेवाकुञ्ज में ललिता सखी का और निधुवन में विशाखा सखी का प्राधान्य है। अब हम थोड़ी-सी बृहद्भागवतामृत की कथा पर आते हैं। अत्यन्त धीर हो करके, शान्तचित्त हो करके, मन लगा करके सुनना; नहीं तो [कथा] समझ में नहीं आयेगी।
उद्धवजी ने कहा— “बाहर के दरवाजे पर देवर्षि नारदजी खड़े हैं। आपके लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
[कृष्ण ने कहा—] “तो वे प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं? उनके लिए तो द्वार बन्द नहीं है। वे तो जब कभी भी आ सकते हैं। तो [वे भीतर] क्यों नहीं आ रहे हैं?
उद्धवजी ने कहा— “वे लज्जा और दुःख से नहीं आ रहे हैं।”
[कृष्ण ने पूछा—] “तो उनको लज्जा और दुःख क्या है?”
[उद्धवजी ने कहा—] “लज्जा तो यह है कि उनके कारण आपको इतना कष्ट सहना पड़ा। और दुःख किसलिये? [उनके कारण आपको] मोह-मूर्च्छा हो गयी।”
दो बार [मोह-मूर्च्छा हुई।] एक तो मोह-मूर्च्छा हुई और उसके [निवारण के] लिए ब्रह्मा, गरुड़जी और कौन-कौन आये! सब लोगों को कितना प्रयास करना पड़ा। तो यह सब नारदजी के कारण ही हुआ। मोह-मूर्च्छा होने से कृष्ण…
[17:23-22:50 तक कीर्तन…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भगवान् कृष्ण ने कहा— “उद्धव! नारदजी दरवाजे पर क्यों खड़े हैं? [भीतर] क्यों नहीं आ जाते?”
तो उद्धवजी भी हँसने लगे, मुस्कुराने लगे और उत्तर दिया— “उनको कुछ भय हो गया है। डर के मारे नहीं आते। भयभीत होने के कारण नहीं आते।”
[कृष्ण ने कहा—] “अरे! भय? उनको भय कहाँ? उनको तो भय नहीं है। उनको तो भय नहीं होना चाहिये, तो भय क्यों?”
[उद्धवजी ने कहा—] “ओह! अपराध के लिए।”
देखो, नारदजी भी भय करते हैं। किस चीज का? अपराध का भय करते हैं। अच्छा, अपराध का भय किसलिये? अपराध क्या किया?
[23:41 पर हरिकथा में अचानक कटौती…]
…[नारदजी] लज्जा के मारे नहीं आये। तो लज्जा किसलिये? इसलिये कि उनके कारण कृष्ण को मोह-मूर्च्छा हुई और कृष्ण को कष्ट भी दिया।
तब स्वयं भगवान् कृष्ण ही उठे और नारदजी का हाथ पकड़ करके सभा में ले करके आये।
देखो भाई, वैष्णवों का अभिनन्दन न करना; जब [वैष्णव] आते हैं, तो उनके लिए उठ करके स्वागत न करना; [जब वैष्णव] जाते हैं, तो उनके पीछे कुछ [दूर तक] चल करके नहीं जाना, उनको देख करके प्रसन्न न होना; उनका अपमान करना; गाली-गलौच करना और मारपीट करना—[ये सब वैष्णव अपराध हैं।]
भक्त: हन्ति निन्दन्ति…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान् नाभिनन्दति।
क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने पतनानि षट् ॥
-स्कन्द-पुराण
[वैष्णवों को मारना, उनकी निन्दा करना, उनसे विद्वेष करना, अभिनन्दन न करना, उनके प्रति क्रोध प्रकाश करना और उन्हें देखकर प्रसन्न न होना—ये छह अधःपतन के कारण हैं।] GVP
[वैष्णवों के प्रति यदि] क्रोध भी हो जाये, [तो वह भी वैष्णव-अपराध है।] वैष्णव कौन है? [जिसने] गुरुजी से दीक्षा ली है और जिसको अभिमान है कि “हाँ, मैं गुरुजी का शिष्य हूँ।” विशेष करके गुरुभाई लोग तो गुरुभाइयों का अपमान न करें। नहीं तो यह जो कह रहे हैं कि भक्ति [होगी, वह] स्पर्श भी नहीं करेगी। इसलिये कुछ तो डरो—डरो इसके लिए। आजकल लोग सदाचार को [बहुत] महत्व देते हैं, किन्तु एकान्तिक वैष्णवता का कोई भी सम्मान नहीं कर रहा। [लोग उसे] समझते ही नहीं हैं।
अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
-श्रीमद्भगवद्गीता (9.30)
यदि सुदुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भजनपरायण होकर मेरा भजन करता है, तो वह भी साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह मेरी भक्ति में निश्चयात्मिका बुद्धिवाला है। (GVP)
‘साधुरेव’— उसको साधु समझना चाहिये। जो वैष्णवों का अपमान करते हैं, [यदि उन्हें] डर नहीं है तो क्या होगा? पारमार्थिक मृत्यु हो जायेगी। तब उनको कोई भी [नहीं बचा सकेंगे]—ब्रह्मा, शंकर भी नहीं बचा सकेंगे; यहाँ तक कि भगवान् भी नहीं बचा सकेंगे। अपराध उनको खा जायेगा। इसलिये फिर उनकी भक्ति में श्रद्धा नहीं रहेगी और अन्त में वे रसातल को जायेंगे। इसलिये भाई, वैष्णव-अपराध से बचो। नारदजी बच रहे हैं, सब लोग बच रहे हैं, शंकरजी भी बचते हैं। इसलिये आप लोग भी वैष्णव-अपराध से सब समय बचेंगे।
[26:20 -30:22 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण ने हँस करके नारदजी से कहा। हँसते हुए उनको पकड़ करके ले आये। वे हँसे क्यों? इसलिये हँसे कि ये नारदजी सब समय हमारी प्रीति चाहते हैं कि भगवान् को कैसे, कृष्ण को मैं कैसे प्रसन्न करूँ?
भगवान् की प्रसन्नता कैसे होगी? कृष्ण की प्रसन्नता कैसे होगी? यदि उनके प्रिय भक्तों का सम्मान हो और उनका सुयश पृथ्वी पर बढ़े, तो वे प्रसन्न हो सकते हैं। और नारदजी यही अभिलाषा लेकर चले हैं—कहाँ से?
भक्त: प्रयाग से
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: प्रयाग से और अभी तक बढ़ते-बढ़ते, बढ़ते-बढ़ते वे गोपियों तक पहुँचे हैं। और गोपियों में भी राधाजी तक पहुँचे हैं। यदि नारदजी नहीं आते, तो ये सब काम नहीं होता। सारी पृथ्वी के लोग यह नहीं जानते कि कृष्ण के [लिए—] विश्वभर में, ब्रह्माण्डभर में, [यहाँ तक कि] गोलोक वृन्दावन तक में भी—राधाजी जैसी उनकी प्रिय हैं, और जैसा उनका कुण्ड प्रिय है, वैसा कोई भी प्रिय नहीं है। तो इससे राधाजी के प्रति श्रद्धा आयेगी और श्रद्धा आने से कृष्ण अपने आप प्रसन्न हो जायेंगे। इसलिये कृष्ण समझ गये कि इसीके लिए नारदजी ने बहाना बना करके ऐसा किया है। वे सबकुछ जानते हैं, किन्तु जगत् के लोग कैसे जानेंगे कि राधाजी कृष्ण की सबसे अधिक प्रियतमा (most beloved) हैं? तो इसलिये नारदजी ने चालाकी-चतुराई से ये किया है। इसलिये भगवान् मुस्कुराने लगे [और कहा—] “वाह! आपने तो हमारा मनोभीष्ट पूर्ण किया है। हे रसिक-उत्तम! आपने हमारा अत्यन्त हित-साधन किया है।”
यद्यपि प्रेमकृत माने प्रेम का जो विकार है.... प्रेम के दो पहलू होते हैं। कौन-कौन से?
भक्त: सम्भोग और विप्रलम्भ
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, विप्रलम्भ और सम्भोग अर्थात् विरह और मिलन। तो पहले अब हम विरह पर विचार करते हैं। तो विरहरूपी दावानल के वेग से अन्तःकरण में तीव्र सन्ताप का जन्म होता है। तो देखो! यह बहुत ही गम्भीर विषय है। यद्यपि प्रेम का जो पहला पहलू है, वह सम्भोग है। और उसके बाद में फिर होता है?
भक्त: विरह
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: विरह। और उसके बाद में होता है—तीव्र-विरह। और यदि उसके बाद में मिलन होता है, तो उसमें महासुख होता है। बिना मिलन के विरह नहीं हो सकता। ठीक है न? पहले अवश्य मिलन होगा और मिलन होने के बाद में तब [विरह होगा।] हाँ, एक स्थिति है, जिसको पूर्वराग कहते हैं। वह भी विरह ही है। तो पूर्वराग मिलन से पहले होता है। किन्तु फिर भी वह उसके गुण सुनने से, उसका रूप दर्शन करने के बाद ही ये होता है।
श्रीपाद तीर्थ महाराज: पहले महाराजजी के पैर दबाते थे तो कभी-कभी रोना आ जाता था। बोले कि महाराजजी बहुत दूर चले गए, अब पैर दबाना है…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [हँसते हुए] अच्छा।
तो प्रेम का पहला जो विकार है, वह विरहरूपी दावानल का वेग है। उससे अन्तःकरण में तीव्र सन्ताप होता है। कितना सन्ताप होता है? चाहे बड़वाग्नि हो, चाहे दावाग्नि हो—उसमें यदि कोई व्यक्ति जल रहा है, तो उससे भी करोड़ों गुणा [अधिक] विरह में सन्ताप होता है। उसमें असीम शोक प्रकट होने पर भी अन्तःकरण में बहुत दुःख होता है, जिसकी कोई उपमा नहीं हो सकती, तथापि… क्या तथापि? इसी दुःख का परिणाम सुख है—देखो!
श्रीपाद तीर्थ महाराज:
बाहिरे विषज्वाला हय, भितरे आनन्दमय,
कृष्णप्रेमेर अद्भुत चरित।
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (2.50)
[बाहर से ऐसा लगता कि महाप्रभु मानो विष की ज्वाला में जल रहे हैं, परन्तु भीतर से वे आनन्द का अनुभव करते हैं। कृष्णप्रेम का ऐसा ही अद्भुत चरित (स्वभाव) है।] GVP
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो यह दुःख तो दिखता है—बहुत, असीम दुःख। किन्तु उसका परिणाम क्या है? आनन्द। भीतर में आनन्द होता है। कैसे? वही विरह में उनके मिलन की सब बातें जो स्मरण होती हैं, उस स्मरण के कारण महासम्भोग से भी प्रशंसनीय, कोई अनिर्वचनीय मनोरम प्रमोद-राशि की स्फूर्ति होती है। राधिकाजी कृष्ण के विरह में सन्तप्त हैं। उनको मोह-मूर्च्छा हो गयी है। वे जीवित हैं या मर गयीं—कोई निश्चित नहीं। गोपियाँ रुई की फाँक देकर देखती हैं कि वे जीवित हैं या मर गयी हैं। हाँ, कुछ-कुछ जीवित हैं। किन्तु भीतर में क्या है? स्मरन्ति—वह क्या है? स्मरन्ति अङ्गसङ्गमम्?
भक्त: ध्यायन्ती कृष्णसङ्गमम् [#1]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ध्यायन्ती कृष्णसङ्गमम्—[अर्थात्] कृष्ण के सङ्गम [का चिन्तन। श्रीमती राधिका चिन्तन कर रही हैं कि] कृष्ण अवश्य ही मधुपुरी में यादवों की पत्नियों का सङ्ग कर रहे होंगे। और इसलिये उनको भीतर ही भीतर तीव्र मान हो गया— “हम गोपनारियों को छोड़ करके वहाँ [उन मथुरा की रमणियों] का सङ्ग करने के लिए चला गया, जो हमसे गुण में, रूप में, लीला में श्रेष्ठ नहीं हैं! अच्छा, तो ठीक है।”
देखो, वह जो [चिन्तन] हुआ, उसमें उन्हें कितना आनन्द हो रहा है! [वह चिन्तन कर रही हैं—] “हम लोगों के मिलने में कितना आनन्द होता है! जब हम दोनों एक साथ होते हैं, तो कितना आनन्द होता है!” तो उस समय में मिलन के आनन्द का जो चिन्तन करती हैं, उससे इतनी प्रमोद-राशि [उत्पन्न] होती है, जिसकी तुलना सम्भोग-रस से भी नहीं हो सकती। क्यों? इसका एक कारण है। साक्षात् मिलने में हम बाहर से मिलते हैं और विरह में कैसे मिलते हैं?
भक्त: अन्दर से।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अन्तर से। तो अन्तर बड़ा है या बाहर बड़ा है? बाहर में [प्रत्यक्ष रूप में] मिलने से भीतर का सबकुछ और उनका जो लगातार (continuous) पूर्व और पश्चात् वाला प्रेम है, वह सब भूल जाता है। किन्तु विरह में एक साथ में कृष्ण को देख सकते हैं।
साक्षात् रूप से कोई गोपी कह रही है। वह कृष्ण को देख रही है और उसने कहा— “आज हमारी सखी ने कृष्ण का सिर से नख तक, और पैर के नख से सिर तक दर्शन किया।” तो राधाजी की कोई सखी—रूपमञ्जरी अथवा ललिताजी—कहती हैं— “हम लोग बड़ी दुर्भागिनी हैं। हमारी सखी का बड़ा भारी दुर्भाग्य है। वह तो एक ही अङ्ग का—केवल आँख तो आँख, भृकुटी तो भृकुटी, मुखकमल तो मुखकमल, पैर तो पैर—बस उसीको देखते-देखते ही मूर्च्छित हो जाती है। और तुम्हारी सखी तो सर्वाङ्ग का दर्शन करती है!” तो ये किसकी प्रतिष्ठा हुई?
भक्त: राधाजी की।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: राधाजी की प्रतिष्ठा हुई। जो सब देख रही है, माने वह कुछ नहीं देख रही—उसका इतना प्रेम नहीं है। किन्तु इनका प्रेम है। इसलिये विरहावस्था में जो कृष्ण का सर्वाङ्गरूप में दर्शन करता है, वह श्रेष्ठ है।
किन्तु याद रखो! — कोई भी नहीं चाहता कि राधिकाजी के साथ कृष्ण का विरह हो। अन्त में बात लटफट करती हुई, जहाँ से तहाँ से आ करके यहीं पर विराम करती हैं। कोई भी नहीं चाहता—कृष्ण नहीं चाहते, राधाजी नहीं चाहतीं, ललिताजी नहीं चाहतीं, विशाखाजी नहीं चाहतीं। यहाँ तक कि हम लोग भी यह नहीं चाहते कि राधा-कृष्ण का परस्पर विरह हो। देखो, कैसा आश्चर्य है! विरह इतना ऊँचा, इतना सुखमय, किन्तु [कोई भी] विरह नहीं चाहता। [सभी] मिलन की [कामना करते हैं।] इसलिये यह (विरह) किसके लिए? मादन की दशावाला—जिसमें मिलन है, [मादन की अवस्था में] मिलन में विरह [की अनुभूति होती है।] इसलिये इसकी (विरह की) प्रतिष्ठा इसी (मिलन) के लिए है।
[39:41-45:41 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज हम यहीं पर कथा को विराम दे रहे हैं। अभी भी इसमें दो-एक दिन और लगेंगे। इसके बाद जैसा होगा, हम किसी दूसरे ग्रन्थ का पाठ करेंगे।
कल हम लोग सवेरे, जैसे हम [प्रायः] सवेरे जाते हैं—भोर में लगभग साढ़े पाँच बजे निकलेंगे। यहाँ से पहले रावल, उसके बाद महावन—कृष्ण की जन्मस्थली, नन्दबाबा का घर, पूतना और शकटासुर [की उद्धार-स्थली], दामबन्धन लीला इत्यादि के स्थानों का दर्शन करेंगे। उसके बाद ब्रह्माण्डघाट जायेंगे और वहाँ से हम दाऊजी जायेंगे। तो ब्रह्माण्डघाट में ही जलपान (बालभोग) की व्यवस्था होगी। दाऊजी में प्रसाद भी होगा, दाऊजी का दर्शन होगा, नगर-संकीर्तन भी होगा। और चार बजे से पहले हम लोग लौट आयेंगे।
भक्त: आते समय भातरोल हो करके।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भातरोल। अच्छा, आते समय भातरोल हो करके आयेंगे तो हमारा वह दर्शन भी हो जायेगा। किन्तु बेलवन अवश्य जाना है—अभी जाओ या बाद में जाओ—क्योंकि द्वादश वनों में से एक है।
श्रीपाद माधव महाराज: यह एक प्रमुख (Prominent ) वन है।
अन्य भक्त: (47:00 अस्पष्ट)
अन्य भक्त: वहाँ नहीं जायेंगे।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, वहाँ पर एक व्यक्ति की मृत्यु (death) हो गयी है। इसलिये वहाँ पर नहीं जायेंगे। बाद में जायेंगे या किसी दूसरी बार जायेंगे।
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसङ्गमम्।
प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.11)
कोई एक गोपाङ्गना (दिव्योन्मादवती, महाभाववती, ह्लादिनी-शक्ति की सारवृत्तिरूपा श्रीवृषभानुनन्दिनी) मथुरा की परमसुन्दरी एक रमणी के साथ श्रीकृष्ण के सङ्गम-विहार का ध्यान कर रही थी, तभी पास ही उसे एक गुनगुनाता हुआ भौंरा दिखायी पड़ा। उसे काला देखकर कल्पना करने लगी कि हो-न-हो यह हमारे काले (साँवले) प्रियतम का ही भेजा गया दूत है। उन्होंने ही मुझे प्रसन्न करने के लिए इसे यहाँ भेजा है। वह गोपी उस भ्रमरको (उद्धव को ही भ्रमर मानकर) सम्बोधन करते हुए इस प्रकार कहने लगी। (GVP)
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