Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.126-139: Bliss in Transcendental Separation
52:34This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- When Narada Muni visited Krsna in Dvaraka, Krsna was very happy to see him because he had highlighted the topmost glories of the gopis.
- Although separation (viraha) initially feels like unbearable sorrow, it is born of pure prema and ultimately reveals deep bliss
- During separation, the gopis become fully absorbed in remembering Krsna’s pastimes
- Only one who has deeply felt this divine love can understand the bliss hidden in transcendental separation. No logic or explanation can reveal it to others.
- Without remembrance of Krsna’s pastimes, a devotee is spiritually lifeless. True bhajana means to always remember His pastimes.
- Benediction to Narada Muni
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम् 1.7.126–139 : विरह में आनन्द
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 17 अक्तूबर 2003 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्जीकरण करें।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण नारदजी को द्वारदेश से पकड़कर अन्दर ले गये और बोले—“आप मेरे प्रियतम सेवक हो और आप मुझे सर्वदा सुख देने की चेष्टा करते हो। इसलिये आपका कोई अपराध नहीं है। और यदि कहो कि भय तो है, तो आपको अपराध का कोई भय नहीं [होना चाहिये क्योंकि] आपका कोई अपराध था ही नहीं—हो ही नहीं सकता। [आपने मेरा अत्यन्त हित ही किया है।]”
[यदि नारदजी कहें कि] “मैंने कैसे आपका हित किया है?” तो वही [यहाँ पर कृष्ण] कह रहे हैं। जैसे मैंने कल बतलाया था।
कृष्ण गोपियों की महिमा जगत् में प्रचारित कराना चाहते थे और नारदजी उसी उद्देश्य से गोपियों की महिमा प्रचार करने के लिए प्रयाग से चले और कहाँ हनुमानजी के पास! और उसके बाद में [पाण्डवों के पास!] और उसके बाद में यहाँ द्वारका में पहुँचे।
[कृष्ण कह रहे हैं]— “आपने मेरा बहुत उपकार किया, जो मेरे स्मरण में ये सब बातें आईं। गोपियाँ, जो सर्वश्रेष्ठ हैं, उन्हें ही [सबसे अधिक] मेरा विरह-दुःख होता है, और [उसी प्रकार] मिलन में भी उन्हें ही [सबसे अधिक] सुख होता है। विशेषकर गोपियों का जो विरह है, वह प्रेम का [ही एक] विकार है और प्रेम तो सच्चिदानन्द वस्तु है। फिर उस प्रेम में दुःख कैसे सम्भव [हो सकता] है? जो प्रेम का विकार है, वह दुःख के समान दिखने पर भी उसमें दुःख नहीं हो सकता। जो प्रेम से बना है, उसमें दुःख कहाँ? इसलिये दुःख जैसा दिखने पर भी [उसमें दुःख] नहीं है।
[कृष्ण] नारदजी के लिए कहते हैं यदि कहो कि यह जो ब्रज का प्रेम है– ब्रज में कृष्ण का विरह- दुःख है, उस दुःख के गाढ़ होने पर अथवा अत्यन्त परिपक्व होने पर, उस दुःख विशेष से मोह और मृत्यु भी सम्भव हो सकती है। विरह का दुःख होने पर मोह माने मूर्च्छा भी हो सकती है और मृत्यु भी सम्भव हो सकती है—जैसे श्रीमती राधिकाजी [या अन्य] गोपियों [के साथ] होता है।
विशेषतः कहते हैं कि देखो, जगत् में एक बात [सर्वसाधारण रूप से] प्रचलित है। वह क्या है? सुख के बाद में दुःख और दुःख के बाद में सुख आता ही है। विशेषकर ब्रज का [यह विरह] तो प्रेम का ही विकार है; इसलिये उसमें दुःख की छाया भी नहीं है। तब भी, मान लो कि जगत् में जितने दुःख हैं, उनसे करोड़ों गुना, दावानल और बड़वानल के दुःख से भी अधिक दुःख उस समय में [अर्थात् विरह की अवस्था में] होता है। तो दुःख के बाद में, फिर तो सुख आयेगा। किन्तु दुःख के परिणाम में अथवा [उसकी] परिपक्व [अवस्था में] प्रमोद-राशि की स्फूर्ति क्या विश्वास योग्य है? यह प्रश्न [कृष्ण] नारद से करते हैं।
यदि कहो कि दुःख का परिमाण, या दुःख की परिपक्व [अवस्था में अर्थात् वह] अधिक से अधिक होते-होते मोह, मूर्च्छा, मृत्यु तक हो रहा है, तो उसमें प्रमोद कहाँ से आयेगा? आनन्द कहाँ से आयेगा? क्या ये सम्भव है? गोपियाँ विरह में डूबती, डूबती, डूबती, और डूबती चली गयीं। तो उनको सुख कब [प्राप्त] हुआ? अन्त तक तो वे विरह में तड़पती रहीं; कृष्ण नहीं आये। [वे सोचती रहीं—] आज आयेंगे, कल आयेंगे, परसों आयेंगे, तरसों आयेंगे, बरसों आयेंगे— पर वे आये ही नहीं। तो फिर प्रमोद कैसे होगा? आनन्द कैसे होगा?
[कृष्ण कहते हैं—] “बात तो ठीक ही कहते हो, किन्तु इस विषय में मेरा अनुभव ही प्रमाण है।” कौन कह रहा है?
भक्त: कृष्ण स्वयं कह रहे हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कृष्ण कह रहे हैं— ] “मैंने देखा न! ब्रज में प्रेम-सरोवर में देखा और अन्य सभी स्थानों में देखा। [गोपियाँ] उस महाविरह-अग्नि में तड़पते हुए जल रही हैं, किन्तु उसमें भी उनको आनन्द की अनुभूति होती है।” सब समय यह एक बात याद रखना कि वह (दुःख) प्रेम का ही विकार है। इसलिये उसमें दुःख अथवा महाशोक और ऐसा विरहताप [दिखायी देने] पर भी, उसमें अवश्य ही प्रेम अथवा सुख होगा। [वह वस्तुतः] प्रमोदराशि है—यह समझना।
कृष्ण कहते हैं— “मैंने इसका अनुभव किया है; यह मेरे अनुभव की बात है। [मेरा] अनुभव ही प्रमाण है। अर्थात् प्रियजन के विरह में भी चित्त में सुख की स्फूर्ति होती है।”
[यहाँ प्रियजन के विरह का तात्पर्य है—] कृष्ण के विरह में गोपियाँ, या गोपियों के विरह में कृष्ण। [किन्तु] विशेषरूप से यहाँ पर कृष्ण के विरह में गोपियों [की अवस्था] दिखला रहे हैं। मैं दस बार इस विषय को बतला चुका हूँ। गोपियाँ विरह-अवस्था में कृष्ण की लीलाओं का स्मरण करती हैं, और उसमें डूब जाती हैं। उस सुख-स्फूर्ति का दूसरा कोई कारण [ज्ञात] न होने पर भी अनुभूति ही इस विषय में [प्रमाण है।] उसको वचनों के द्वारा समझाया नहीं जा सकता।
[कृष्ण कह रहे हैं कि] जो मेरी स्थिति में आयेगा, या गोपियों की स्थिति में आयेगा, केवल वही इसे समझ सकेगा; दूसरा [कोई] नहीं समझेगा। इसलिये ‘स्वानुभव’— [स्वयं का अनुभव अर्थात्] मैं ही इसका प्रमाण हूँ। यहाँ ‘स्वानुभवगम्य प्रमाण’ को दिखलाने के लिए इस श्लोक को कह रहे हैं—
तच्छोकदुःखोपरमस्य पश्चाच्–, चित्तं यतः पूर्णतया प्रसन्नम्।
सम्प्राप्तसम्भोगमहासुखेन, सम्पन्नवत्तिष्ठति सर्वदैव॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.127)
[इसका कारण है कि विरह से उत्पन्न शोक-दुःख के शान्त होने पर चित्त सदैव सम्पूर्णरूप से प्रसन्न होकर सम्भोग-सुख प्राप्त होने की भाँति महासुखी हो जाता है।] GVP
उसीके लिए कह रहे हैं कि विरहजनित शोक और दुःख की निवृत्ति के बाद में [अर्थात्] जब वह शोक और दुःख मिट जाता है, [तब ऐसा सुख प्राप्त होता है] जैसे कृष्ण से [साक्षात् रूप से] मिलते हैं। इस विरह-अग्नि के बाद में…
कृष्ण किसके वध के बाद में [ब्रज में आये]?
भक्त: दन्तवक्र
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [कृष्ण दन्तवक्र के वध] के बाद [ब्रज में] आये और [सबसे] मिले और मिल करके ब्रजलीला के जितने परिकर हैं, उन सबको अपने साथ में ले करके [अप्रकट ब्रज में] चले गये अर्थात् अप्रकट-लीला में चले गये। तो उस समय क्या हुआ? सुख हुआ कि नहीं? अन्त में जब [वे सबको] ले करके गोलोक वृन्दावन के अप्रकट प्रकाश में प्रवेश कर गये, तो उस समय जो विरह का दुःख था, वह रहा कि नहीं? — नहीं रहा। अथवा [विरह से उत्पन्न] शोक के द्वारा जो दुःख होता है, उसके उपशम (निवृत्ति) के बाद में विरही का मन प्रसन्न हो करके सम्पूर्ण रूप से [न्यूनता के] विपरीतभाव [से युक्त अर्थात्] अत्यन्त आनन्दमय हो उठता है।
जिस समय कृष्ण दन्तवक्र का वध करके अन्त में ब्रज में आये और गोपियों से मिले, और मिल करके फिर उनको ले करके अप्रकट लीला में चले गये। अब अप्रकट लीला में विरह ही नहीं है। वहाँ गोचारण का अत्यन्त संक्षिप्त विरह है, ‘माथुर-विरह’ नहीं है। कहते हैं कि [वह विरह भी] तीन महीने का है और वह भी न के बराबर है।
विरह [से उत्पन्न दुःख के] शान्त होने के बाद [जो सुख प्राप्त होता है,] वह सुख कैसा होता है? सम्भोग-सुख-सम्पन्न की भाँति महासुख होता है। अर्थात् मिलन के अभाव में चित्त में जो एक न्यूनता, अभाव अथवा अपूर्णता थी, वह अब नहीं रहती। जैसे कृष्ण के विरह में गोपियाँ डूब रही हैं, डूबते-डूबते उनको ये स्फूर्ति हुई कि कृष्ण अभी हमसे मिले हैं। जब वे मिले, तो देखा क्या?
राधाजी सखियों से कह रही हैं— “किसने हमारी आँखे बन्द कीं?”
राधाजी पहले ललिता [का नाम लेती हैं], फिर विशाखा का, फिर चित्रा का; अन्त में [जब उनके] हाथ [का स्पर्श] और उनकी सुगन्ध नाक में आयी, [तब बोलीं—] “ओह! ये कृष्ण हैं! अब बतलाओ, देखें!”
[यह सब राधाजी] स्फूर्ति में [अनुभव कर रही हैं।] इसमें सुख है कि नहीं? इस विरह में भी जो मिलन का सुख है, वह भी [परम] सुख है। कौन समझेगा? वही जो अनुभवगम्य है; अर्थात् ऐसा कोई भक्त हो, जिसका गोपियों के जैसा भाव हो या अन्ततः कृष्ण के भी जैसा भाव हो। कृष्ण का सुख विषय-[जातीय] है और गोपियों का [सुख] आश्रय-[जातीय] है। इसलिये इस आश्रय-[जातीय भाव] में ही वह अधिक समझेगा।
भक्त: समस्त गीत-गोविन्द भी इसीके आधार पर है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गीत-गोविन्द, हाँ वह तो सब ऐसा ही विरहमय है।
भक्त: विरह में ही है, मिलन के नहीं है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और अन्त में क्या है?
भक्त: अन्त में मिलन दिखलाया।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अन्त में मिलन दिखलाया।
भक्त: स्वाधीनभर्तृका
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मिलन हुआ और वह भी [राधिकाजी को] स्वाधीनभर्तृका [नायिका के रूप में] दिखलाया। उसमें उत्कण्ठिता से लेकर और सब [नायिका के रूप में] दिखलाया और उसीमें वे सब सखियाँ आकर उनको [कृष्ण के निकट] ले जाने के लिए समझाती हैं। राधिकाजी कृष्ण को बुरा-भला भी कहती हैं, किन्तु अन्त में स्वाधीनभर्तृका के रूप में बदलकर [सबकुछ] पूर्ण सुखमय हो जाता है।
अन्त में ये प्रश्न करेंगे कि कौन चाहता है कि विरह हो? इसमें प्रश्न किया। कोई चाहता है, विश्व में कोई भी? [—नहीं]
कहते हैं इसलिये उस समय में जब स्फूर्ति होती है, स्फूर्ति में मिलन होता है, तो उस समय चित्त प्रसन्न हो जाता है। उस समय राधिकाजी का कृष्ण से [प्रत्यक्ष] मिलन नहीं होता, [किन्तु] स्फूर्ति हो रही है। वे तमालवृक्ष को ही कृष्ण समझकर आलिङ्गन करती हैं, उस समय उनका कैसा आनन्द है? [उसे केवल] वह ही समझेगा, जो समझनेवाला है, ‘अनुभवगम्य’ है। वस्तुत: [वह] पूर्णता विरहरूपी दुःख से उत्पन्न होती है। विरह-दुःख के बाद में जो मिलन होगा, उसमें पूर्णता होती है किन्तु ‘सम्भोगजत्व’ नहीं [अर्थात् सम्भोग-सुख से वह पूर्णता नहीं होती।] यहाँ पर ‘सम्पन्नवत्तिष्ठति’ पद में ‘वत्’ का प्रयोग हुआ है और इसीलिये उसी अवस्था में प्रमोदराशि स्फूर्ति होती है। उस समय विरह के बाद में जो स्फूर्ति में मिलन होता है या वैसे मिलन होता है, उसमे महाप्रचुर आनन्द होता है।
(बाङ्गला भाषा में…) भावार्थ यह है कि प्रियतम व्यक्ति के साथ मिलन आदि होने पर मन जिस प्रकार महाप्रसन्न होता है, उसी प्रकार विरह से उत्पन्न शोक आदि के शान्त होने पर ऐसा ही हुआ करता है। उस समय (विरह की अवस्था में) उनको जो सुख की स्फूर्ति होती है, उस समय में उसका दूसरा कोई कारण नहीं है। क्या कारण है? वह विरह भी आनन्दजनक है, इसलिये ऐसा होता है। अतएव उस सुख की स्फूर्ति विरह-दुःख से हुई है, इसको अवश्य ही स्वीकार करना होगा। इसलिये विरह-दुःख में भी उनको सुख की अनुभूति होती है—ऐसा समझो।
[17:58-25:07 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण कह रहे हैं— “यदि प्राणाधिक प्रिय वस्तु या व्यक्ति का विस्मरण हो जाये, तो वह उनके लिए मरण की अपेक्षा [अधिक] निन्दनीय है।”
गोपियाँ क्या कभी चाहेंगी कि कृष्ण को हम भूल जायें? [यद्यपि] गोपियाँ कहती हैं कि हम काले को सदा के लिए भूल जाना चाहती हैं—
मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा
स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।
बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद्ध्वाङ्क्षवद्य-
स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.17)
[हे मधुप! नृशंस स्वभाव श्रीकृष्ण ने रामावतार में वानरराज बालि का वृक्ष की ओट में छिपकर व्याध के समान वध कर दिया था तथा एक स्त्री के वशीभूत होकर उन्होंने काम-पीड़ावश आयी दूसरी स्त्री शूर्पणखा के नाक-कान काटकर कुरूप कर दिया था। ऐसे ही एक और काले थे– वामन देव। राजा बलि ने उन्हें विविध पूजोपहार प्रदानकर उन्हें उनकी इच्छित वस्तु भी प्रदान की। उन्होंने उसे ग्रहण कर लिया और बाद में राजा बलि को वरुणपाश में उसी प्रकार बाँधकर पाताल में डाल दिया, जिस प्रकार कौआ बलि देनेवाले को ही अपने साथियों के साथ घेर लेता है। ऐसे धूर्त काले के साथ सख्यता से भला हमारा क्या प्रयोजन है? जो बाहर से काला है, क्या वह अन्दर से शुभ्र हो सकता है? जो त्रिभङ्ग है, क्या उसका अन्तःकरण कभी सरल हो सकता है? कृष्ण ही क्यों, किसी भी काली वस्तु से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। सभी काले ऐसे ही निष्ठुर, निर्मोही, निर्दयी, छली, कपटी, धूर्त एवं कामुक होते हैं, परन्तु सुन! कृष्ण-चर्चा का त्याग करना हमारे लिए अति दुष्कर है।] GVP
[किन्तु कहती हैं कि] “उनका स्मरण, उनकी लीलाएँ-कथाएँ हम भूल नहीं सकतीं। वह हम लोगों के लिए मरने के समान है।” यही प्रियजन का लक्षण है।
तो कह रहे हैं कि यदि कभी कोई साधक—साधक क्या, गोपियाँ भी नहीं चाहतीं कि कृष्ण को हम भूल जायें। उनके लिए तो यह महानिन्दनीय और मृत्यु के समान है। (26:35 अस्पष्ट) कोई भी प्रियजन के स्मरणकार्य को जीवनदान समझे। जिस समय उनकी कथा स्मरण नहीं होगी, वे मर ही जायेंगी। यद्यपि अपने जीवन के समान, प्राणप्रिय प्रियजनों का कदापि विस्मरण नहीं होता—[कभी] सम्भव नहीं है, मरने के बाद ही हो सकता है, [किन्तु] गोपियाँ तो मरेंगी भी नहीं—तथापि किसी प्रकार उनकी विशेष स्फूर्ति होने से ऐसा प्रतीत होता है, [कि वह जीवनदान के समान अत्यधिक आनन्दप्रद है। अपने प्राणों के समान प्रिय व्यक्ति का] कभी विस्मरण नहीं होता, सब समय उनका स्मरण होता है, किन्तु कभी-कभी किसी विशेष स्थिति में उनका विशेष स्मरण हो जाता है।
ललिताजी हंस (दूत) के माध्यम से कृष्ण को [सन्देश] भेज रही हैं। वह कह रही हैं— “देखो, नन्दगाँव से निकलकर तुम कैसे-कैसे मथुरा जाओगे, उसका रास्ता मैं बताती हूँ।” तो वह मथुरा जाने के लिए रास्ता बतला रही हैं।
[ललिताजी हंस को] रास्ता बतलाते हुए कहती हैं— “भाण्डीर[वट] को बाईं ओर रखकर जाना या दाहिनी ओर रखकर जाना। आज वह भाण्डीर[वट] सूख रहा है, मृतप्राय हो गया है। कृष्ण अब वहाँ नहीं जाते, जहाँ पर वे रास करते थे, और-और [लीलाएँ] करते थे। भाण्डीरवन को प्रणाम करना। छटीकरा में तुम प्रणाम करना, वहाँ पर गोप लोग रहते थे। वहाँ पर कृष्ण की कैसी-कैसी दामबन्धन इत्यादि लीलाएँ हुई हैं।” तो [इस प्रकार] उनको बतला रही हैं। कौन बतला रहा है?
भक्त: ललिताजी बतला रही हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ललिताजी हंस को [बतला रही हैं।] उन्हींका प्रसङ्ग आ जाता है कि कृष्ण ही भेज रहे हैं, किन्तु ललिताजी भेज रही हैं। अच्छा, उस समय जो उनका स्मरण कर रही हैं, तो कैसा लग रहा होगा?
भक्त: पहले की लीलाएँ सब याद आ रही हैं, अन्दर आनन्द हो रहा है।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सब लीलाएँ याद [कर रही हैं।] ये है उनका विरह। विशेष…
भक्त: [विरह=वि+रह अर्थात्] विशेष रह— विशेष रूप में मिलन
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जब उन्होंने हंस को देखा कि वह उड़कर उधर (मथुरा) की ओर जा रहा है, तो उनको कृष्ण की स्फूर्ति हुई और बस सब लीलाओं का स्मरण [होने लगा। यदि] यह लीला-स्मरण न रहे, तो वे मर जायेंगी। हम लोग भी भजन-मार्ग में क्या करना चाहते हैं? लीलाओं का ही स्मरण।
अष्टकालीय-लीलाओं का स्मरण क्या है?—उन्हीं लीलाओं का स्मरण है। यदि स्वाभाविक गति से कृष्ण की लीलाओं का स्मरण नहीं आता, तो साधक के लिए वह [अवस्था] मरणप्राय है; ऐसा साधक [वास्तव में] साधक ही नहीं है। इसलिये जब भी होता है, हम ‘बृहद्भागवतामृत’ का या [अन्य ग्रन्थों का पाठ करते हैं।] और भी सब जैसे ये हैं…
भक्त: भजनरहस्य
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ‘भजनरहस्य’ इत्यादि। हम ‘भजनरहस्य’ आरम्भ करेंगे।
या कोई भी लीला हो, दशमस्कन्ध की लीलाएँ हों, या ‘दामोदराष्टकम्’ इत्यादि का पाठ करते हैं—सब किसलिये करते है? इसीलिये करते हैं [कि इन लीलाओं का स्मरण हो।] ये सब स्मृतियाँ हैं। तो जब यह स्मृति आती है, तो और भी [अधिक] आनन्दप्रद [होता है।] इसमें साधारण रूप में तो सब समय [उनका स्मरण होता] है, किन्तु [कभी-कभी किसी विशेष स्थिति में उनका] विशेष [स्मरण हो जाता है।]
जैसे यहाँ पर चावल-दाल और सब्जी तो प्रतिदिन ही बनती है और उसमें परमान्न बन जाये और उसमें रसमलाई बन जाये और दही का सुन्दर, अच्छा-सा क्या कहते हैं… फल?
भक्त: फ्रूट सलाद
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वह यदि बन जाये बहुत अच्छा-सा, तो कैसा रहे?
भक्त: छैने का हलवा बन जाये तो बात ही क्या?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मन के द्वारा खाइये।
तो उसी प्रकार से कहते हैं कि [गोपियों को] कृष्ण का स्मरण प्रतिदिन हो रहा है, किन्तु स्मरण के साथ में कोई उसका वैसा मसाला मिल जाये, [तो विशेष स्मरण होता है। जैसे] उद्धव मिल गये, फिर क्या हुआ? गोपियाँ उद्धव से कृष्णलीला-चरित्र का सम्पूर्ण विवरण कह रही हैं। बीच में जब उद्धव कुछ कहते हैं तो उनकी बात को काट करके और उनको बतला रही हैं। कितना आनन्द उस विरह में भी हो रहा है!
इसीको कृष्ण कहते हैं कि यह ‘अनुभवगम्य’ है। यदि कोई साधक भजन करते-करते इन लीलाओं का स्मरण नहीं कर पाता, तो उसने अभी भजन में प्रवेश नहीं किया; तब तक उसका साधन केवल साधनमात्र है। और भजन क्या है?—सेवा। अष्टकालीय-लीला में डूबकर उनकी सेवा करता है।
भक्त: बीच में कुरुक्षेत्र में मिलने आ गये।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये सब उससे भी अधिक है। जैसे रथयात्रा का प्रसङ्ग है, वह आ जाये तो गोपियाँ उनको ले आ रही हैं।
[कृष्ण ने कहा—] “हे देवर्षि! आपने मेरी मनोकामना पूर्ण की और मेरा महान उपकार किया है। आपने इन सब तत्त्वों को मेरे मुख से कहलवाकर [गोपियों का विशेष स्मरण कराकर मेरा परम उपकार किया है।] मुझको स्फूर्ति हुई और मैंने इन सब तत्त्वों को बतलाया। इसलिये मैं बहुत प्रसन्न हुआ। इसलिये आप अपना अभीष्ट वर माँगिये। क्या चाहते हैं, वह माँगिये?”
हम लोग किसीसे कोई वर माँगेंगे, तो क्या माँगेंगे? एक व्यक्ति अन्धा था— न उसका विवाह हुआ था, न पुत्र था और वह दरिद्र भी था। [एक दिन] शंकरजी आये और बोले— “वर माँगो, [किन्तु केवल] एक ही वर माँगना।”
तो उसने कहा— “मैं अपने पुत्र को सोने के थाल और सोने की कटोरी में दूध और भात खाते हुए दर्शन करूँ।”
अब बाकी क्या रह गया? कुछ रहा बाकी? वह अन्धा कैसे देखेगा? जब आँखें आयेंगी, तब [देखेगा;] और सोने की कटोरी में दूध और भात [खाते हुए] अपने बेटे को [देखेगा, तो] बेटा भी हो गया और [धन-सम्पत्ति भी आ गयी।]
शंकरजी ने कहा— “बहुत चतुर! बहुत चतुर!”
भक्त लोग इससे भी [अधिक] चतुर होते हैं। भक्त लोग किसके लिए माँगते हैं? वे स्वयं कृतार्थ हैं, इसलिये जो कुछ भी वर माँगते हैं, वह जगत् के [मङ्गल के] लिए [होता है। जैसे] यदि कोई पिता सचमुच में पिता है, और कोई महात्मा या ऋषि [उसके घर] आयें, तो वह कहेगा— “प्रभो! मेरा लड़का सुखी रहे।” [पिता] अपने लिए वर नहीं माँगता, यह [उसका] स्वभाव है। यही महतजनों और भक्तों का स्वभाव है, [वे अपने लिए कुछ नहीं माँगते।]
परीक्षित् महाराजजी ने कहा— “[ऐसा सुनकर श्रीनारदजी] ‘जय हो, जय हो, जय हो। आपकी जय हो।’ [कहने लगे और] वीणा को धारण करके और भगवान् का सब नामकीर्तन करने लगे—
राधारमण हरि गोविन्द जय जय!
राधारमण हरि गोविन्द जय जय!
गोविन्द जय जय! गोपाल जय जय!
राधारमण हरि गोविन्द जय जय!
उनका कीर्तन सुन करके भगवान् प्रसन्न हुए और [नारदजी नामों का कीर्तन करते हुए उनकी] स्तव-स्तुति करने लगे—
हे कृष्ण! करुणासिन्धो! दीनबन्धो! जगत्पते!
गोपेश! गोपिकाकान्त! राधाकान्त! नमोऽस्तु ते॥
[हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! हे जगत्पते! हे गोपेश! हे गोपीकान्त! हे राधावल्लभ! श्रीकृष्ण! प्रभो! आपके लिए मेरा कोटिशः प्रणाम है।] GVP
तप्तकाञ्चनगौराङ्गि! राधे! वृन्दावनेश्वरि!
वृषभानुसुते! देवि! प्रणमामि हरिप्रिये!॥
[हे तपे हुए कञ्चन के वर्ण के समान गौराङ्गि! हे वृन्दावनेश्वरि! हे वृषभानुनन्दिनी! हे हरिप्रिये! हे देवि! श्रीमती राधिके! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ।] GVP
[नारदजी] स्तव-स्तुति करने लगे— “वाह! आप औघड़दानी हैं। आप भक्तों की मनोवाञ्छा परिपूर्ण करनेवाले हैं।”
परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं— “हे माताजी! मुनिवर नारदजी स्वयं प्रयाग के दशाश्वमेध तीर्थघाट से चलकर इस द्वारावती (द्वारकापुरी) तक पहुँचे हैं। उन्होंने विप्र से ले करके जिन-जिन भक्तों से सम्भाषण किया—हनुमान से किया, उसके बाद में उद्धव इत्यादि से किया, और अब यहाँ पर स्वयं कृष्ण से वार्तालाप कर रहे हैं—इन सबको सुनकर भी क्या नारदजी को पूर्णार्थ प्राप्त नहीं हुआ? उनका कुछ बाकी रहा? सब कुछ हो चुका। अत: वे [जिस उद्देश्य] के लिए निकले थे, वे जो जानना चाहते थे कि विश्व-ब्रह्माण्ड में श्रीकृष्ण का सबसे प्रियपात्र कौन है—उनको मालूम हुआ कि नहीं अभी तक, कि कौन सबसे प्रियपात्र है? कौन है?—राधिकाजी।
[ऐसा] जानते हुए भी नारद ऋषि अत्यन्त हर्ष के साथ में, बड़े सुख से कृष्ण के मुख से सुनने के लिए उदार श्रेष्ठ भगवान् के निकट ‘प्रथमतः वक्ष्यमाणं प्रियवरं’— अपना पहला वर माँगा। पहला वर क्या माँगा?
श्रीकृष्णचन्द्र कस्यापि तृप्तिरस्तु कदापि न।
भवतोऽनुग्रहे भक्तौ प्रेम्णि चानन्दभाजने ॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.135)
[हे श्रीकृष्णचन्द्र! मैं यह वर माँगता हूँ कि आनन्दस्वरूप आपके अनुग्रह (कृपा), भक्ति और प्रेम से कभी भी किसी की तृप्ति न हो।] GVP
“हे कृष्णचन्द्र! आपके अनुग्रह से, आपकी कृपा से भक्ति में कभी भी किसीको पूर्ण रूप से तृप्ति न हो। कोई भी भक्त—[चाहे] साधक [हो या श्रद्धा] से लेकर निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव, प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग [आदि किसी भी स्तर का हो—उसके हृदय में यह भावना बनी रहे कि] ‘और अधिकतर क्या हो? और अधिक [चाहिये,] और अधिक! हम एकदम कुछ भी नहीं हैं।’”
राधाजी कहती हैं— “न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ[#1]” अनुभव के साथ में कह रही हैं। यही भक्ति का लक्षण है, यही कृष्ण की कृपा है। यदि किसी को मिल जाये, उसकी सर्वार्थ सिद्धि हो जायेगी।
[नारदजी ने कहा—] “भक्ति में कभी भी किसी को पूर्ण तृप्ति न हो—यही मेरा प्रार्थित वर है।” [उन्होंने] अपने लिए क्या माँगा? अपने लिए कुछ नहीं माँगा, [किन्तु] उसमें उनका अपना भी हो गया, “हमको भी भक्ति में तृप्ति न हो।”
अरे! भक्ति में तृप्ति नहीं हो। [उन्होंने न] बेटा (पुत्र) चाहा, न धन-सम्पत्ति, न गोलोक-वृन्दावन, न मुक्ति। क्या चाहा? कुछ भी नहीं। [केवल यही चाहा कि] भक्ति में, कृष्णप्रेम में कभी भी किसीको तृप्ति न हो।
भगवान् बोले— “हे विदग्धचूड़ामणि नारद! परमरसिक नारद! चतुरों में चतुरशिरोमणि नारद! आपने यह क्या वर प्रार्थना किया? ये तो ऐसा है ही है।”
[कोई कहे कि] “हमारे कुएँ में पानी आ जाये” और कुएँ में तो पहले से ही पानी है। तो फिर क्या [माँगना हुआ?] हाँ, ये कह सकते हैं कि “हमारे पानी पीने का जो कुआँ है, उसमें सुगन्ध आ जाये, गङ्गा नदी का पानी आ जाये।” है न? तब तो कुछ अर्थ है।
नारदजी ऐसे विदग्धों में चूड़ामणि हैं। तो कृष्ण कह रहे हैं— “ये कोई वर है? यह तो भक्ति का स्वभाव है, किसीको तृप्ति नहीं होती। ओह! मेरी कृपा का, मेरी भक्ति का, मेरे प्रेम का ऐसा ही स्वभाव है, ये तो सभी लोग जानते हैं। ये क्या वर माँगा? दूसरा कोई वर तो माँगो!”
कृष्ण की जितनी कृपा हो न, [क्या] कहीं थमनेवाली है? कृष्ण ने कृपा की— “जाओ, तुम गोपियों के सेवक हो जाओ।” [भक्त ने] कहा कि अभी कृपा रह गयी।
यदि वे कहे कि “राधाजी की कृपा हो जाये,” तब भी कुछ कृपा रह गयी।
तो वे कहेंगे “रूप [गोस्वामी]जी के आनुगत्य में श्रीश्रीराधाकृष्ण की सेवा करो।” तब भी रह गया। यदि वह माँगेगा क्या—
हा देवि! काकुभर–गद्गदयाद्य वाचा
याचे निपत्य भुवि दण्डवदुद्भटार्तिः।
अस्य प्रसादमबुधस्य जनस्य कृत्वा
गान्धर्विके! निजगणे गणनां विधेहि ॥
-श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम् (2)
[हे देवि गान्धर्विके! मैं विशिष्ट पीड़ा से युक्त हूँ, अतः आज भूमिपर दण्ड के समान गिरकर अत्यन्त कातरता भरी, गद्गद वाणी से आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझ अज्ञानी जनपर कृपा करके निजजनों में मेरी भी गिनती कर लीजिये।] GVP
तवगणे गणनां विधेहि नहीं, निजगणे गणनां विधेहि।
[कृष्ण ने कहा—] “इसलिये अब दूसरा वर माँगो। हे मुनिवर! आप प्रयागतीर्थ से आरम्भ करके [विभिन्न स्थानों का] भ्रमण करते-करते हमारे यहाँ जो पधारे हैं और आपने जिन विभिन्न भक्तों को देखा और जिनके सम्बन्ध में [श्रवण किया,] वे सभी मेरे कृपापात्र हैं। कहाँ से? प्रयागतीर्थ के ब्राह्मण से ले करके राधाजी तक [सभी मेरे कृपापात्र हैं।] और सभी अपने-अपने अर्थ में परिपूर्ण हैं, किन्तु किसीको [भक्ति में] तृप्ति नहीं है और [वे सभी] जगत् को निस्तार करनेवाले [हैं—] ‘ब्रह्माण्ड तारिते शक्ति धरे जने-जने’। सभी पूर्ण आप्त हैं, किन्तु उनमें किञ्चित् तारतम्य है। किन्तु उनमें कोई भी परितृप्त नहीं है। पूर्ण तो सभी हैं, किन्तु कोई भी परिपूर्ण रूप से [तृप्त नहीं है। कोई भी ऐसा नहीं कहता—] ‘मुझे और नहीं चाहिये, भक्ति नहीं चाहिये, भगवान् की कृपा नहीं चाहिये।’ [कोई भी भक्त] ये नहीं [चाहता।] अतएव [हे नारद!] मेरे निकट आप कोई दूसरा वर [माँग लीजिये।]
बोलो।
[43:40-50:38 तक किसी भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद …]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल सवेरे आरती के बाद में यहाँ पर दामोदर-लीला [के सम्बन्ध] में कथा होगी। और कीर्तन-कथा इत्यादि के बाद में नाश्ता (breakfast) नहीं होगा। No breakfast tomorrow.
भक्त: Brunch
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: At once, at 10 a.m., mahāprasāda will come, and you can serve. Don’t take, don’t eat [mahāprasāda.] You should serve mahāprasādam, and after that, be ready for Govardhana. Our bus must start at 1 p.m. in any case. So, after taking prasāda at 12, by 1 PM, you should be ready with your luggage and come here. After that, we will go to Govardhana, and on the way [we will] go to Paiṭhā and Candra-sarovara. I want to reach our destination, Giridhārī Gauḍīya Maṭha, before 4 p.m., because we have to adjust everyone’s hosting and all other things. Be ready like that.
[कल ठीक 10 बजे महाप्रसाद आयेगा, और आप सभी उसका सेवन कर सकते हैं। वास्तव में महाप्रसाद को हम खाते नहीं है, बल्कि उसकी सेवा करते हैं। उसके बाद सभी को गोवर्धन जाने की तैयारी करनी है। किसी भी स्थिति में हमारी बस दोपहर 1 बजे निकलनी ही चाहिये। इसलिये, 12 बजे प्रसाद लेने के बाद, आप अपना सामान तैयार रखिये और यहीं पर आ जाइये। उसके बाद हम गोवर्धन के लिए प्रस्थान करेंगे, और रास्ते में पैठा तथा चन्द्रसरोवर भी जायेंगे। मैं चाहता हूँ कि हम अपने गन्तव्यस्थान श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ शाम 4 बजे से पहले पहुँच जायें, क्योंकि वहाँ सबकी ठहरने आदि की व्यवस्था करनी होगी। इस प्रकार से तैयार रहिये।]
-------------------------------------------------------------
समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि मे हरौ
क्रन्दामि सौभाग्यभरं प्रकाशितुम्।
वंशीविलास्याननलोकनं बिना
विभर्मि यत् प्राणपतङ्गकान् वृथा॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (2.45)
हे सखि! कृष्ण के लिये मेरे हृदय में प्रेम की लेशमात्र गन्ध भी नहीं है। तब मैं जो क्रन्दन करती हूँ, वह केवल अपने परम-सौभाग्य का प्रकाश करने के लिए ही करती हूँ। वंशीवदन कृष्ण के दर्शन के बिना मैं जो प्राणपतङ्ग धारण करती हूँ, वह व्यर्थ ही है। (IGVP)
We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.