Speciality of Sriman Mahaprabhu & Why We Suffer
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- There is an increase in material prosperity due to scientific advancement but a decline in prema (love).
- All the avatars of God came to kill the asuras but Sriman Mahaprabhu came to give the love of God and to taste Radha Pranaya Mahima.
- Why Sriman Mahaprabhu is special.
- Importance of Prema and Sriman Mahaprabhu.
- Krsna gives devotees some sorrow just to increase their desire for bhakti.
- Krsna gives lessons to the general people through his devotees.
- Sometimes a lot of suffering comes so that we can quickly bear the fruits of our Karmas in our lifetime and go back to Godhead.
Transcript
श्रीमन्महाप्रभु का वैशिष्ट्य एवं हम दुःख क्यों भोगते हैं?
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने वृन्दावन [अज्ञात-तिथि] में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिये वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: समय संक्षेप है। चैतन्य महाप्रभु का अवदान बुलन्द सागर के समान है। ‘जे डुबिवे, से बुझिबे’ [अर्थात्] जो इसका अनुभव करनेवाले रसिकजन हैं, वही लोग उनका वर्णन कर सकते हैं। मैं वैष्णवों के चर्वित किये हुए, चबाये हुए, दो-एक हरिकथा का वर्णन करके चैतन्य महाप्रभु के अवतरण का वर्णन करके, [अपने वक्तव्य को विराम दूँगा, क्योंकि] समय भी संक्षेप है। आरती का समय हो गया है।
मैं ये देख रहा हूँ कि आज युग की समस्या क्या है? आजकल जगत् में तरह-तरह के चमत्कारपूर्ण वैज्ञानिक अनुसन्धान हो रहे हैं। उनको देख करके अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है। आप लोग दूरदर्शन इत्यादि देखते हैं। आज वायु से भी तीव्रगामी ऐसे विमान निकल गये हैं, जो हवा से भी तेज गति से एक स्थान से, पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर में पहुँच सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति अमेरिका में कोई भाषण दे रहे हो, तो हम लोग उनका स्वर, उनकी शब्दावली, उनके रूप के समेत यहीं पर घर में बैठे हुए आँखों के सामने देख सकते हैं। किस प्रकार से रसोईघर से लेकर बहुत दूर तक जितनी भी सुख-सुविधाओं की बातें हैं, उनको पूर्ण करने के लिए सब बड़े-बड़े वैज्ञानिक चमत्कारपूर्ण अनुसन्धान हुए हैं।
इस विज्ञान ने जगत् को इतना उन्नत किया, ऐसे-ऐसे चमत्कारपूर्ण ये सब दान दिये। किन्तु इसका एक विपरीत फल भी है। वह फल यह है कि इस विज्ञान ने प्रेम को सदा के लिए इस जगत् से बहुत दूर दूर कर दिया। इस विज्ञान ने आज ऐसा कर दिया है कि कलकत्ते में, इंग्लैण्ड में, लन्दन में, शिकागो में और बड़े-बड़े शहरों में जहाँ पर करोंड़ों, अरबों-खरबों लोग रहते हैं, [देखने में हर व्यक्ति] जहाँ करीब से करीब दिखता है, किन्तु कहीं मन में मेल नहीं है। कहीं भी प्रेम की छाया तक नहीं है। एक इमारत में हजारों व्यक्ति रहते हैं, किन्तु कोई मर जाता है, तो कोई पूछनेवाला नहीं है। भाई-भाई का प्रेम दूर हो गया। पति और पत्नी का प्रेम भी दूर हो गया। पिता और पुत्र का सम्बन्ध भी दूर हो गया। शिक्षकों और छात्रों का प्रेम भी दूर हो गया। इसलिये आज जगत् में इतना उत्पात, अन्धाधुन्ध (घोर अन्धकार) सा मचा हुआ है। इसलिये इस विश्व की प्रधान समस्या प्रेम का [अभाव] है।
यदि जगत् में प्रेम हो जाये, तो सभी लोग सुखी [हो जायेंगे।] इस प्रेम को श्रीचैतन्य महाप्रभु के अतिरिक्त और कोई भी देने में समर्थ नहीं है। यदि आज के इस युग में चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं का अवलम्बन करके हम अपने चरित्र को सुधार सकें, तो यह आश्वासन (guarantee) के साथ में कहा जा सकता है कि जगत् के सभी जीव सुखी हो सकते हैं। यही चैतन्य महाप्रभु की प्रधान शिक्षा है–
आराध्यो भगवान् ब्रजेशतनयस्तद्धाम वृन्दावनं
रम्या काचिदुपासना ब्रजवधूवर्गेण या कल्पिता।
श्रीमद्भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुमर्थो महान्
श्रीचैतन्यमहाप्रभोर्मतमिदं तत्रादरो नः परः॥
-(श्रील चक्रवर्ती ठाकुर)
[भगवान् ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण एवं वैसा ही वैभवयुक्त श्रीधाम वृन्दावन भी आराध्य वस्तु है। ब्रजवधुओं ने जिस भावसे कृष्ण की उपासना की थी, वह उपासना ही सर्वोत्कृष्ट है। श्रीमद्भागवत ग्रन्थ ही निर्मल शब्द प्रमाण एवं प्रेम ही परम-पुरुषार्थ है—यही श्रीचैतन्य महाप्रभु का मत है। यह सिद्धान्त ही हम लोगों के लिए परम आदरणीय है, अन्य मत आदर योग्य नहीं हैं।] GVP
‘प्रेमा पुमर्थो महान्’– इसी को देने के लिए चैतन्य महाप्रभु आये। हम विचार करके देखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव से लेकर उनकी जितनी भी लीलाएँ हैं, [उनका अन्य भगवद्-अवतारों की लीलाओं से वैशिष्ट्य है।] उनके सम्बन्ध का अवदान, उनके अभिधेय का अवदान, उनके प्रयोजन का अवदान, [और उनके] समस्त अवदानों का, [अन्य] सब अवतारों की शिक्षाओं से बहुत वैशिष्ट्य है।
जब हम चैतन्य महाप्रभु के अवतार के प्रधान कारण को देखते हैं, तो हम विचार करते हैं कि [इनके अवतरण का अन्य अवतारों के अवतरण से वैशिष्ट्य है।] रामचन्द्रजी के आविर्भाव के लिए देवताओं ने आराधना की, ब्रह्माजी ने आराधना की। किसलिए? ‘धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे’– धर्म की संस्थापना करने के लिए, असुरों को ध्वंस करने के लिए।
[श्रील गुरुदेव कुछ भक्तों को कथा में बैठने के लिए कहते हैं]
जितने भी अवतार हैं उनके अवतरण का कारण यही है–
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
-श्रीमद्भगवद्गीता (4.7-8)
[हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने नित्यसिद्ध देह को प्रकट करता हूँ। मैं अपने एकान्त भक्तों के परित्राण, दुष्टों के विनाश एवं धर्म की संस्थापना के लिए युग-युग में आविर्भूत होता हूँ।] GVP
कृष्ण के अवतार के सम्बन्ध में भी यही देखा जाता है। पृथ्वी गाय का रूप धारण करके [ब्रह्माजी के शरणागत हुई और] ब्रह्माजी देवताओं को साथ में ले करके क्षीरसमुद्र के तट पर जाते हैं और भगवान् से यही निवेदन करते हैं। [ब्रह्माजी भगवान् से] कंस इत्यादि [असुरों] के अत्याचारों की बात करते हैं। भगवान् ने कहा– “अच्छी बात है। ठीक है।” तो उनके अवतार का भी यही सब कारण था— धर्म की रक्षा करना और असुरों का दमन करना। रामचन्द्रजी के अवतार में भी यही देखा जाता है और जितने भी भगवद्-अवतार हैं, उनके [अवतरण का] यही कारण देखा जाता है। किन्तु चैतन्य महाप्रभु के अवतार का क्या कारण है?
श्रीराधायाः प्रणय-महिमा कीदृशो वानयैवा-
स्वाद्यो येनाद्भुत-मधुरिमा कीदृशो वा मदीयः।
सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभात्-
तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (1.6)
[श्रीमती राधिका के अलौकिक प्रेम की महिमा कैसी है? वह मेरी अद्भुत मधुरिमा कैसी है, जिसका श्रीमती राधिका आस्वादन करती हैं? मेरी मधुरिमा की अनुभूति से श्रीमती राधिका को कौन सा अनिर्वचनीय सुख मिलता है? इन तीन विषयों के प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्ण रूप चन्द्र ने शचीगर्भ रूप समुद्र से जन्म ग्रहण किया।] IGVP
श्रीचैतन्य महाप्रभुजी इसी के लिए आये। कृष्णचन्द्रजी ने जब युगधर्म [की स्थापना कर] अपने अवतार को, अपनी [भौम ब्रज की] लीला को अप्रकट कर दिया, तो कृष्णचन्द्रजी विचार कर रहे हैं– “मैंने प्रेम का आस्वादन किया, किन्तु एक वस्तु का आस्वादन नहीं हुआ कि ‘मुझे देख करके राधाजी को कैसा आनन्द होता है? राधाजी की प्रणय महिमा कैसी है? राधाजी मेरी मधुरिमा को, मेरे रूप, गुण, लीला, वेणु माधुरी इत्यादि का आस्वादन किस प्रकार से करती हैं और आस्वादन करके [उन्हें] कैसा सुख होता है?’ —ये राधाजी के अतिरिक्त मुझे कोई भी नहीं दे सकता।” कृष्णचन्द्रजी रसिकशेखर हैं।
प्रेमरस-निर्यास करिते आस्वादन।
रागमार्ग-भक्ति लोके करिते प्रचारण॥
रसिक-शेखर कृष्ण परमकरुण।
एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (4.15-16)
[श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, इसलिये अपने ही प्रेमरस के सार का आस्वादन करने के लिये, और वे परम करुण हैं, इसलिये जगत् में बद्धजीवों के उद्धार के लिये रागमार्ग-भक्ति का प्रचार– इन दो कारणों से श्रीकृष्ण की अवतीर्ण होने की इच्छा उत्पन्न हुई।] IGVP
कृष्णचन्द्रजी बड़े रसिक हैं, बड़े करुण हैं। उन्होंने रसिकशेखर होने के कारण विचार किया– “मेरे जीवन में कुछ अधूरी बात है। राधाजी के प्रति मेरी तीन वाञ्छाएँ हैं, इसको मैं कैसे आस्वादन करूँगा?” उन्होंने विचार करके देखा कि जब तक राधाजी के भावों को ग्रहण नहीं किया जायेगा, तब तक इसका आस्वादन नहीं हो सकता।
चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव के बहुत से कारण हो सकते हैं, किन्तु उसमें चार प्रधान [कारण] हैं। चार प्रधान [कारणों] में भी दो प्रधान हैं। [चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव के चार कारणों में से] एक [कारण] युगधर्म की स्थापना, हरिनाम संकीर्तन की स्थापना करना भी है। उसका प्रचार करने के लिए [चैतन्य महाप्रभुजी अवतरित होते हैं।] किन्तु और-और अवतारों ने भी नाम का प्रेम दिया है। नारदजी भी सर्वत्र नाम का प्रचार करते हैं, किन्तु उन [लोगों के द्वारा प्रचारित] नामों में और चैतन्य महाप्रभु के [द्वारा प्रचारित] नाम में कुछ पार्थक्य है, वैशिष्ट्य है।
सेइ द्वारे आचण्डाले कीर्त्तन सञ्चारे।
नाम-प्रेममाला गाँथि पराइल संसारे॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (4.40)
[इसके द्वारा उन्होंने कीर्तन का प्रचार कर चण्डाल जैसे नीच लोगों को भी प्रेमदान किया। उन्होंने नाम-प्रेमरूपी माला गूँथकर सम्पूर्ण संसार को पहनायी।] IGVP
श्रीचैतन्य महाप्रभुजी ने उस नाम में प्रेम की डोरी दे करके सबके गले में पहना दी। पहले जो नाम था, उस नाम से मुक्ति होती थी और-और सब वस्तुएँ, वैभव इत्यादि की प्राप्ति होती थी या साधारण रूप में नारायण की प्राप्ति होती थी, किन्तु कृष्णप्रेम की प्राप्ति नहीं होती थी। चैतन्य महाप्रभु ने विशेष करके नाम में प्रेम की डोरी दे करके इसको गूँथ करके जीव को, सबको पहना दिया।
दूसरी बात, अद्वैताचार्यजी ने चैतन्य महाप्रभुजी को पुकारा। किसलिये? जगत् भक्ति से विहीन हो रहा है, कोई भगवान् को नहीं मानता। इसलिये तुलसी और गङ्गाजल [से भगवान् की आराधना की।] तुलसी के द्वारा भगवान् विक्रीत हो जाते हैं —ऐसा सोच करके, समस्त शास्त्रों का तात्पर्य ले करके भगवान् की आराधना की, [जिससे] भगवान् अवतीर्ण हो। किसलिये?
[अद्वैताचार्यजी ने विचार किया–] “यदि चैतन्य महाप्रभु नहीं आये और धर्म की हानि होती गयी और प्रेम का प्रचार नहीं हुआ, तो मैं चक्र से समस्त जगत् को काट दूँगा। यह काम (प्रेम का प्रचार) मेरे द्वारा, विष्णु के द्वारा भी नहीं हो सकता है।” इसलिये चैतन्य महाप्रभु की आराधना की। यह भी एक कारण है।
चैतन्य महाप्रभु कब आते? यह कोई निश्चित नहीं था। [वे राधाजी के भावों का] आस्वादन करने के लिए तो अवश्य ही आते, किन्तु चैतन्य महाप्रभु अद्वैताचार्यजी की आराधना से तत्क्षणात् उपस्थित हो गये।
तीसरा कारण [के रूप में] ‘अनर्पितचरीं चिरात्…’ [#1] का विचार सब वैष्णवों ने दिया।
और चतुर्थ [कारण] है– राधाभाव आस्वादन करने के लिए ये जगत् में आये। ‘रसिकशेखर कृष्ण परमकरुण’ कृष्णचन्द्रजी रसिकशेखर तो हैं, किन्तु ‘राधिकाजी कैसे रसास्वादन करती हैं? मुझे देख करके उन्हें कैसा सुख होता है? मेरा माधुर्य कैसा है? उनका प्रणय कैसा है?’ – यह नहीं समझ सकते। इसलिये [कृष्णचन्द्रजी ने विचार किया कि] आश्रयजातीय राधाजी का भाव लेना अवश्यम्भावी है। किन्तु ये कैसे होगा? बिना गुरु के तो होगा नहीं।
बिन गुरु भव निधि तरइ न कोई।
जों बिरंचि संकर सम होई॥
-(रामचरितमानस)
[गुरु के बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शङ्करजी के समान ही क्यों न हो।]
मैं समझता हूँ कि [कृष्णचन्द्रजी] ने चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित होने के बाद में संन्यास लेने के पहले या संन्यास लेने पर भी जब तक कि पुरी में पहुँचे, [उन्होंने] नाम इत्यादि का प्रचार तो किया, किन्तु वे प्रेम दान नहीं कर सके या राधाभाव का आस्वादन नहीं कर सके। इसलिये चैतन्य महाप्रभु गोदावरी के तट पर रायरामानन्दजी (विशाखाजी) के यहाँ [पहुँचे।] विशाखाजी के यहाँ पर उन्होंने प्रेम की दीक्षा ग्रहण की क्योंकि [विशाखाजी] राधाजी की परमसखी हैं, वह अनुराधाजी हैं। इसलिये जब तक कि सखियों की कृपा नहीं होगी, राधाभाव कैसे आयेगा? इसलिये और स्थानों पर चैतन्य महाप्रभुजी ने [अन्य भक्तों को] उत्तर दिये हैं, [जैसे] सनातन गोस्वामीजी ने प्रश्न किये हैं, किन्तु यहाँ [गोदावरी के तट] पर चैतन्य महाप्रभु ने [रायरामानन्दजी से] स्वयं प्रश्न करके राधाजी के भावों को ग्रहण किया। और इसमें रसराज-महाभाव इत्यादि का वर्णन किया। पूज्यपाद महाराज इसी का वर्णन कर रहे थे। बीच में (12:02 अस्पष्ट) उन्होंने छोड़ दी।
इस तरह से जब तक कि [श्रीचैतन्य महाप्रभु] विशाखाजी के पास में नहीं पहुँचे, और जब तक कि उन्होंने दीक्षा नहीं ली, तब तक ये प्रेम उनके हृदय में नहीं आया। इसके बाद में उन्होंने चैतन्यचरितामृत से वर्णन किया कि किस प्रकार सागर में सभी रत्न (अस्पष्ट 12:22) पानी रहता है। उसी पानी को [सूर्य की किरणें सोख लेती है और वह पानी] वाष्प रूप में बदलकर बादल [बन] जाता है। वहाँ से फिर पानी बरसता है। स्वाति-नक्षत्र में जब वही पानी बरसता है, तो समुद्र के सीप में [गिरकर] रत्न हो जाता है। तो समुद्र को रत्नालय कहते हैं।
इसी प्रकार से चैतन्य महाप्रभु रसिकशेखर तो हैं और उनमें सब कुछ है, किन्तु फिर भी उस प्रेमरस का निर्यास उनमें भक्त के द्वारा– राय रामानन्द के रूप में जाता है और उधर से फिर चैतन्य महाप्रभु उसे ग्रहण करके राधाभाव इत्यादि को आस्वादन करते हैं। इसलिये चैतन्य महाप्रभु की ये विशेषता है। चैतन्य महाप्रभुजी की और भी विशेषताएँ हैं। मैं संक्षेप में ही दो-एक का वर्णन कर रहा हूँ।
अन्य सब अवतारों में भगवान् ने, कृष्ण ने भी चक्र से सब असुरों का संहार किया और उन्हें मुक्ति दी। किन्तु विशेषता यह है कि कृष्ण ने या राम ने जिन असुरों को चक्र से मारा और उनको मुक्ति [प्रदान] कर दी, जिसको अद्वैतवादी लोग बड़े-बड़े कष्ट से उस परब्रह्म को पाते हैं, उसमें उनका सायुज्य होता है। भगवान् ने तो उन्हें मार करके वह गति दे दी, उनको अनायास ही मुक्ति दे दी, किन्तु चैतन्य महाप्रभुजी ने ऐसी कृपा [की जो पहले नहीं देखी गयी।]
उन लोगों (भगवान् के द्वारा मारे गये असुरों) ने भगवान् की कृपा का अनुभव उस जीवन में नहीं किया। जैसे कंस को मारा, उसकी मुक्ति हुई, किन्तु उस जन्म में रहते हुए ही उनकी कृपा की उपलब्धि उसने नहीं की। और-और अघासुर, बकासुर, जरासन्ध इत्यादि सब दैत्य, दानवों और असुरों का उन्होंने संहार किया, किन्तु उनकी कृपा की उपलब्धि उन लोगों ने [उस जन्म में] नहीं की। किन्तु चैतन्य महाप्रभु की यह विशेषता है कि जिन-जिन पर उन्होंने कृपा की, [उन लोगों ने] उसी जीवन में उनकी कृपा की उपलब्धि की। जैसे जगाइ-माधाइ, कुष्ठ-विप्र, और देवानन्द पण्डित और गोपाल चापाल इत्यादि जितने भी लोग हैं, [उन्होंने] उसी जीवन में ही महाप्रभुजी की कृपा की उपलब्धि की। ये चैतन्य महाप्रभुजी की विशेष [बात है।]
और क्या बात है? श्रीमद्भागवत में बतलाया गया, हमारे गोस्वामीजी ने पहले (14:43 अस्पष्ट) में बतलाया कि कृष्ण के अतिरिक्त लताओं-पताओं को भी कौन प्रेम दे सकता था? [#2] यह बात ठीक है। किसी ने नहीं दिया, किन्तु कृष्णचन्द्रजी ने वजन करके प्रेम दिया। जिसका जैसा अधिकार है, जैसी आराधना है उस आराधना के अनुरूप में कांटे पर तोल करके, धर्मकांटे पर तोल करके– ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ [#3] इत्यादि के रूप में [तोल करके प्रेम दिया।] जिसका यदि दो पैसे का प्रेम है, तो दो पैसे का ही फल दे दिया। यदि मुक्ति चाहता है, तो मुक्ति दे दिया। भुक्ति चाहता है, तो भुक्ति दे दिया। किसी [के पास] पात्र नहीं है, तो कुछ नहीं देंगे। किन्तु चैतन्य महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु [इन सबका विचार नहीं करते।]
चैतन्य-नित्यानन्दे नाहि एसब विचार।
नाम लैते प्रेम देन, बहे अश्रुधार ॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (8.31)
[श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु के नामों में अपराध का विचार नहीं है, इसलिये नाम लेने मात्र से उस व्यक्ति को वे प्रेम प्रदान कर देते हैं और उसके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है।] IGVP
[श्रीचैतन्य महाप्रभु] उनको पात्र भी दे देते हैं– “अब ले जाओ, पात्र ले जाओ।” और पात्र में उस प्रेम को भी दान कर देते हैं। ये पात्रता और प्रेम दान दोनों एक साथ में करते हैं, जो आज तक किसी भी [अवतार ने नहीं किया।] औरों की तो बात क्या? स्वयं कृष्ण [ने भी ऐसा नहीं किया।]
[चैतन्य महाप्रभु जी के द्वारा] प्रेम इत्यादि देने [के बारे में] का आप लोगों ने सुना। महाराजजी ने भी बतलाया, हमारे इन्होंने भी बतलाया। झारिखण्ड के पथ में चैतन्य महाप्रभुजी ने सिंह, भालू, साँप इत्यादि सबको प्रेम दे करके कृतार्थ कर दिया [और वे] सभी एक साथ में चैतन्य महाप्रभुजी के पीछे-पीछे चल रहे थे। किसी अवतार में ऐसा देखा? किसी अवतार में ऐसा हुआ कि ब्राह्मण और चाण्डाल दोनों मिल करके और पाश्चात्य देश के गौ-मांस खानेवाले, शराब पीनेवाले, लौकिक भोगों में प्रमत्त होनेवाले लोग आज चोटी रख करके, तिलक-माला ग्रहण करके, संन्यास इत्यादि ग्रहण करके कृष्णप्रेम में मत्त हो रहे हैं? आज तक यह चैतन्य महाप्रभु के अतिरिक्त किसने किया? यह चैतन्य महाप्रभु की ही कृपा है।
पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥
[पृथ्वी पर जितने भी देश और गाँव हैं, सर्वत्र मेरे नाम का प्रचार होगा।]
आज चैतन्य महाप्रभु की कृपा से सर्वत्र ये कृष्णनाम और कृष्णभक्ति का प्रचार हुआ। इसी प्रकार से चैतन्य महाप्रभु की कितनी विशेषताओं की बात करें! रात बहुत अधिक हो गयी है, इसलिये मैं चैतन्य महाप्रभु के चरणों में और उनके अनुरागी भक्तों के चरणों में एकान्तिक रूप से प्रार्थना करता हूँ कि चैतन्य महाप्रभु के प्रेम का मैं कुछ कण भी उपलब्धि कर सकूँ– यही प्रार्थना करके मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ।
हमारे मध्य में बैठे हुए सभा का सञ्चालन करनेवाले विद्वतवरेण्यं, रसिकशेखर, गागर में सागर भरनेवाले, ऐसे (17:20 अस्पष्ट) के वक्ता हमारे श्रीमान् डा॰ केशवाचार्यजी विद्यमान हैं। उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ में कल भी और आज भी हमारी सभा का सञ्चालन किया। हम उनसे निवेदन करते हैं कि श्रीचैतन्य महाप्रभु के अवदान के सम्बन्ध में अपने विचारों को [रखें।]
[डा॰ केशवाचार्यजी की कथा (17:47 - 27:25) के उपरान्त...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज जैसे सभा हुई थी, वैसे ही कीर्तन के बाद कल सवेरे सभा होगी एवं [बङ्गली भाषा में]... हमारे जितने भी वैष्णवगण हैं– संन्यासीवृन्द अथवा भक्त, वे सवेरे के समय श्रीचैतन्यमहाप्रभु के अवदान के सम्बन्ध में अपनी-अपनी पुष्पाञ्जलि अर्पण करेंगे।
तत्पश्चात् हमारे विग्रह-प्रतिष्ठा अधिवास के सम्बन्ध में हम लोग यहाँ पर कुछ कार्य करेंगे। आप लोग कल कहीं नहीं जायेंगे। विशेष करके जितने संन्यासी और ब्रह्मचारी हैं, वे आठ बजे तक तैयार होकर यहाँ पर मण्डप में पधारेंगे और विग्रह-प्रतिष्ठा का संकल्प करेंगे और वस्तु, वास्तु, यज्ञ और-और जो चीजें है जो अधिवास में की जाती हैं, ये सब चीजे होंगी। इसलिये संन्यासी, ब्रह्मचारी लोग, भक्त लोग और यात्री जितने भी आये हैं, ये सभी लोग कहीं नहीं जायेंगे, यहीं पर उपस्थित रहेंगे।
शाम को लगभग साढ़े तीन बजे से, अधिक से अधिक चार बजे तक नगर-सङ्कीर्तन होगा। [बङ्गली भाषा में]...उसमें चार-पाँच मण्डली कीर्तन करेंगी। उस नगर-सङ्कीर्तन के समय कोई यहाँ पर नहीं ठहरेगा। जो अत्यन्त वृद्ध अथवा बीमार हो, वे यहाँ पर ठहरे, बाकी सब लोग नगर-सङ्कीर्तन में जायेंगे। हमलोग यहाँ सेवाकुञ्ज से प्रारम्भ करके इमलीतला होकर सप्त-देवालयों के सामने से जाते हुए बाजार से होकर बांकेबिहारी इत्यादि मन्दिर होकर गोपीकुञ्ज में हम लोग समाप्त करेंगे। यहाँ पर राजमार्ग नहीं है, बहुत संकीर्ण पथ है, इसलिये यहाँ से प्रारम्भ न करके, जहाँ पर रास्ता है सेवाकुञ्ज से नगर-सङ्कीर्तन प्रारभ करेंगे। इसलिये सबके निकट मेरी प्रार्थना है, यहाँ के स्थानीय लोगों के निकट मेरी प्रार्थना है, यात्रियों के निकट मेरी प्रार्थना है कि आप सभी नगर-सङ्कीर्तन में योगदान करें और यहाँ पर जो विग्रह-प्रतिष्ठा का आयोजन हो रहा है, उसमें सभी सम्मिलित हों– यह कहकर मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ।
वाञ्छा-कल्पतरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः॥
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतोज्जवल-रसां स्वभक्तिश्रियम्।
हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः
सदा हृदय-कन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥
-(विदग्धमाधव 1.2)
सुवर्ण कान्तिसमूह द्वारा दैदीप्यमान श्रीशचीनन्दन गौरहरि तुम्हारे हृदय में स्फूर्ति लाभ करें। जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरस का दान जगत् को चिरकाल तक नहीं दिया, उसी स्वभक्ति-सम्पत्ति का दान करने के लिए वे कलियुग में अवतीर्ण हुए हैं। (GVP)
#2
श्रीलघुभागवतामृतमें श्रील रूपगोस्वामी ने लिखा है –
सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः।
कृष्णादन्यः को वा लताष्वपि प्रेमदो भवति॥
कमलनाभ श्रीहरि के अनन्त अवतार हैं, सभी सब प्रकार से मङ्गलकारी हैं, किन्तु श्रीकृष्ण के अतिरिक्त, चैतन्य जीवों की तो बात ही क्या है, जड़, लता, गुल्मादि को भी प्रेमदान श्रीकृष्ण के बिना और कौन कर सकता है? (GVP)
#3
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्तमानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
-श्रीमद्भागवद्गीता (4.11)
हे पार्थ! जो मनुष्य जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही पथका अनुसरण करते हैं। (GVP)
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