Sri Bhajana Rahasya (1): Nisanta lila and Sraddha
33:08This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- All should observe Ekadasi as per regulation.
- Explanation of Sri Siksastakam 'asta kaliya-lila'.
- If one studies asta kalyan-lila without being in the state of bhava then he will certainly fall down.
- Explaining nisanta-lila and nisanta-bhajana.
- Explaining sraddha and its types.
Transcript
श्रीभजनरहस्य (1) : निशान्त-लीला एवं श्रद्धा
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 8 नवम्बर 2004 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज एकादशी तिथि है। सबको विधिवत् एकादशी का पालन करना चाहिये।
Today is Ekādaśī. You should try to follow Ekādaśī in a proper process [and engage in] service. Śrīla Bhaktivinoda Ṭhākura is very merciful.
[श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी] बड़े दयालु हैं। उन्होंने हम लोगों के भजन-साधन के लिए निम्न स्तर से आरम्भकर अत्यन्त उच्च स्थिति तक के सब [विषयों] को एकत्रित करके बतलाया है। जैसे श्रील रूप गोस्वामी ने अष्टकालीय-लीला का सूत्रपात किया और श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने उसीका विस्तार के साथ वर्णन किया। फिर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने ‘कृष्णभावनामृत’ में उन्हीं लीलाओं का [और भी] विस्तार [से वर्णन] किया।
दिन-रात के काल को आठ भागों में विभक्त करने पर [इनमें से] एक खण्डकाल को ‘याम’ कहते हैं। जैसे चौबीस घण्टे को आठ भागों में विभक्त करो, तो एक-एक भाग एक-एक याम कहलाता है। रात के समय तीन [याम,] दिन में तीन [याम] तथा उनमें ऊषा और सन्ध्या [का योग करने पर] ये आठ [याम होते] हैं।
जो वैष्णव लोग व्रज में विशेष करके राधाकुण्ड इत्यादि में वास करते हैं, यदि वे वहाँ इन [अष्टकालीय]-लीलाओं के साथ रहते हैं, तब तो [वास्तविक] राधाकुण्ड-वास है और यदि इनके बिना रहते हैं, तो वह राधाकुण्ड-वास अथवा वृन्दावन-वास नहीं है।
अभी [हम लोगों में] बहुत कमी है। नवीन और प्राचीन सभी लोग एक ही समय में एक साथ ऊपर उठ जायेंगे [अर्थात् इतनी उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेंगे]—ऐसी सम्भावना नहीं है। बहुत दिनों तक साधन-भजन करने के बाद, [यहाँ तक कि] हज़ारों जन्मों के बाद, तब ऐसी स्थिति आती है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी ने उस स्थल पर, उस स्थिति तक पहुँचने के लिए अष्टकालीय-लीलाओं का स्मरण करने के लिए भजन के भी आठ स्तर बतलाये हैं।
आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया
ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठारुचिस्ततः।
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति
साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत क्रमः॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (1.4.15-16)
[सर्वप्रथम श्रद्धा, तदनन्तर साधुसङ्ग, उसके पश्चात् भजनक्रिया, तदनन्तर अनर्थ-निवृत्ति, उसके पश्चात् निष्ठा, तदनन्तर रुचि और उसके बाद आसक्ति, तत्पश्चात् भाव और भाव के बाद में प्रेम का उदय होता है। साधकों के हृदय में प्रेम उत्पन्न होने का यह क्रम निरूपित हुआ है।] GVP
ये [भजन के आठ] स्तर हैं। इसलिये हमें भजन के इन स्तरों में [आगे बढ़ना] पड़ेगा, तभी हम लोग अष्टकालीय-लीला-चिन्तन का स्पर्श कर सकते हैं। जो लोग इन [श्रद्धा, साधुसङ्ग इत्यादि स्तरों] का स्पर्श नहीं करते अर्थात् [शास्त्रीय विधि का उल्लंघन करके काल्पनिक रूप से] अष्टकालीय लीलाओं का स्मरण करने लगते हैं, अथवा अपरिपक्व अवस्था में एकादश-भाव और पञ्चदशा का [चिन्तन] करने लगते हैं, वे कुछ दिनों के बाद गिर पड़ते हैं। [इसलिये यह सब] काल्पनिक रूप से नहीं होना चाहिये। यह [अवस्था] भजन करते-करते [स्वाभाविक रूप से] आयेगी, किन्तु इसी पद्धति के अनुसार।
इस [ग्रन्थ] की एक और विशेषता भी है। महाप्रभुजी ने अष्टयाम के लिए शिक्षाष्टक में आठ श्लोकों को कहा है। इनका भी इस [भजनरहस्य ग्रन्थ] में समन्वय किया गया है।
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्द्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम् ॥
-श्रीशिक्षाष्टक (1)
चित्तरूपी दर्पण को शोधित करनेवाले, संसाररूप महादावानल को सम्पूर्णरूप से बुझा देनेवाले, जीवों की कल्याणरूपिणी कुमुदिनी को विकसित करने के लिए भावरूपी चन्द्रिका का वितरण करनेवाले, विद्यारूपी वधू के जीवनस्वरूप, आनन्दरूपी समुद्र को निरन्तर वर्द्धित करनेवाले, पग-पगपर पूर्ण अमृत का रसास्वादन करानेवाले, बाहर-भीतर से देह, धृति, आत्मा और स्वभाव— सबको सर्वतोभावेन निर्मल और सुशोभित करनेवाले केवल श्रीकृष्णसंकीर्तन ही विशेषरूप से सर्वोपरि जययुक्त हों। (GVP)
तो यह भी साथ-साथ चलेगा। पहले चित्तरूपी दर्पण का मार्जन तो हो; अन्यथा क्या एकदम अष्टकालीय-लीला में ‘सर्वात्मस्नपनम्’ हो जायेगा? तो यह कैसे [सम्भव] होगा? इसलिये श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी बड़े दयालु हैं।
सबसे पहले लीला-स्मरण में निशान्त-लीला आती है। निशान्त-लीला बहुत ही रोचक और मनोरञ्जक है। वृन्दादेवी वन के पक्षियों को—विशेषकर भ्रमरों, कोकिल, मयूरों और “पी-कहाँ” बोलनेवाले पक्षी को...
भक्त: पपीहा
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: पपीहा।
भक्त: कोयल
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: नहीं, कोयल तो पहले ही कह दिया। तो [वृन्दादेवी] इन [पक्षियों] को श्रीराधाकृष्ण के जागरण के लिए सिखाती हैं। [वे उन्हें] बड़े मधुर स्वर में कलरव करने के लिए कहती हैं। फिर शुक और सारि मनुष्योचित भाषा में बहुत सुन्दर और मधुररूप से श्रीराधाकृष्ण को जगाते हैं।
और फिर भी जब वे नहीं जागते—या जागकर भी सोये रहते हैं, आँखें नहीं खोलते—तब कक्खटी [नामक] बूढ़ी बन्दरी को भेजा जाता है। इस प्रकार उन्हें निद्रा से उठाते हैं। उस समय ललिता, विशाखा तथा अन्य सभी सखियाँ...
भक्त: पहले मुर्गे को भेजते हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ, वह तो पक्षियों में आ गया। पहले [उसीको उन्हें जगाने के लिए भेजते हैं।] उसे मुर्गा नहीं [कहते], ताम्रपिच्छ [कहते हैं।] ‘मुर्गा’ तो मुसलमान बोलते हैं। ताम्रपिच्छ—क्योंकि उसके यहाँ पर कुछ लाल रहता है।
[जागरण के बाद] ललिता इत्यादि सखियाँ [श्रीयुगल की] आरती उतारती हैं। वे आरती कैसे उतारती हैं? समयोचित विविध प्रकार की सेवाओं के द्वारा। सबसे पहले रूपमञ्जरी, रतिमञ्जरी इत्यादि का [कुञ्ज में] प्रवेश होता है। जब वे शृङ्गार कर देती हैं, तब अष्टसखियाँ आती हैं। इस प्रकार से विराट निशान्त-लीला का वर्णन है।
अधिकारी लोग ही इसको पढ़ेंगे। अनाधिकारी लोग इसको स्पर्श नहीं करेंगे; अन्यथा [उनके भीतर] सांसारिक भावनाएँ आयेंगी और वे डूब मरेंगे। इसलिये पहले निशान्त-भजन में आओ। निशान्त-भजन क्या है? श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी कहते हैं—श्रद्धा।
श्रद्धा कैसे आयेगी? पहले साधुसङ्ग होगा। साधुसङ्ग में श्रद्धा आयेगी। वे घर-घर जाकर, द्वार-द्वार जाकर बतलायेंगे। जिनको इसकी आवश्यकता नहीं है, ऐसे विषयी लोगों के भी घर-घर में जाकर बतलायेंगे कि कृष्ण-भजन के बिना जीवन विफल है। कृष्ण का भजन करना चाहिये। इस जगत् में कोई सुखी नहीं है। चाहे कोई धनी-मानी हो, कोई [उच्च] पद पर हो, विद्वान हो— कोई भी सुखी नहीं है। इसलिये भगवान् का भजन करना चाहिये। सबसे पहले साधु के प्रति आत्मसमर्पण (surrender) करो, [उनके प्रति] शरणागति आये। वे ये सब शिक्षाएँ देते हैं।
श्रद्धा माने क्या? उसकी अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग दो दशाएँ या लक्षण होते हैं। कृष्ण-सेवा की वासना को देना ही श्रद्धा है। कृष्ण सेवा की वासना—यह देना ही श्रद्धा का मूल स्वरूप है। और श्रद्धा का बाहरी स्वरूप [लक्षण] क्या है? शास्त्रों में, गुरु के वचनों में तथा [गुरु-]परम्परा के वचनों में श्रद्धा आयेगी। उन्हें मानने की इच्छा होगी, गुरुकरण करने की लालसा जागेगी। इस प्रकार शास्त्रों के वचनों में, कृष्ण के वचनों में तथा गुरु-वैष्णवों के वचनों में श्रद्धा होगी। इसलिये कहा गया है—
‘श्रद्धा तु अन्योपाय वर्जं कृष्णोन्मुखी चित्तवृत्ति विशेष:।’
[अन्य उपायों से रहित केवल श्रीकृष्ण के प्रति उन्मुख चित्तवृत्ति को ही श्रद्धा कहते हैं।] GVP
मतलब क्या है? कृष्ण-सेवा की वासना [ही श्रद्धा है।] और फिर—
‘श्रद्धा’–शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय।
कृष्णे भक्ति कैले सर्वकर्म कृत हय॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (22.62)
[‘श्रीकृष्ण भक्ति करने से सब कार्य करना हो जाता है’—ऐसे सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वास को भक्ति का अधिकार प्रदान करनेवाली ‘श्रद्धा’ कहते हैं।] IGVP
इस बात का विश्वास हो जाये, पारमार्थिक श्रद्धा यदि उदित हो जाये, तब तो कहना ही क्या है! तब [समझो कि] उसका जीवन [सही] रास्ते पर आ गया। इस प्रकार से यह श्रद्धा हुई। श्रद्धा भी उस समय दो प्रकार की होती है। कैसी श्रद्धा? जैसा साधुसङ्ग होगा, वैसी ही श्रद्धा आयेगी। लोभमयी श्रद्धा और…
भक्त: शास्त्र-शासनमयी
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: शास्त्र-शासनमयी श्रद्धा। अब यहीं से [उक्त] दो [प्रकार की श्रद्धा में से किसी एक को उत्पन्न होता हुआ देखा जाता है।] भाग्यवश जिसे जैसा गुरु मिलता है, उसकी पूर्वजन्म की सुकृति के अनुसार, वैसा हो जाता है। बहुत से लोग साधुसङ्ग में रहते हैं। पचास वर्ष [साधुसङ्ग में] रह गये, किन्तु साधुओं की बातें नहीं सुनते। [बाहरी रूप से तो] वे हैं सङ्ग में, किन्तु वही जाने किसलिये सङ्ग में हैं? और बहुत से लोग एक-दो वर्ष में ही आकर शीघ्र उन्नत हो जाते हैं। इसके भी अनेक कारण हैं। मैं [स्वयं] देखता हूँ…
I see that so many red-clothed Vaiṣṇavas (brahmacārīs), when the kīrtana ends, then they come—perhaps they were sleeping, [or I don't know] what they were doing. I mark everyone: who comes late, who comes early, and what they are doing. I am looking, but I am not saying or speaking anything. So don't think that I am not marking them. So try to come early to do kīrtana all that we do. Don't think, "It is neglected," or "It is bogus." [Don't think, "I should come] only when Mahārāja speaks; otherwise Mahārāja will chastise me." This is not bhakti.
[मैं देखता हूँ कि बहुत से लाल वस्त्रधारी वैष्णव (ब्रह्मचारी) कीर्तन समाप्त होने के बाद आते हैं। पता नहीं वे सो रहे थे या क्या कर रहे थे। मैं सब पर ध्यान रखता हूँ—कौन देर से आता है, कौन समय से पहले आता है, और कौन क्या कर रहा है। मैं सब देखता हूँ, किन्तु कुछ कहता या बोलता नहीं हूँ। इसलिये ऐसा मत समझिये कि मैं ध्यान नहीं रखता। अतः समय से पहले आने का प्रयास कीजिये और सम्पूर्ण कीर्तन में भाग लीजिये। यह मत सोचिये कि “इसकी उपेक्षा हो सकती है” या “यह तो व्यर्थ है।” और यह भी मत सोचिये कि “मैं तो केवल तब आऊँगा जब महाराज बोलेंगे; नहीं तो महाराज डाँटेंगे।” यह भक्ति नहीं है।]
श्रीपाद तीर्थ महाराज: (15:21-15:38 अस्पष्ट)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: I see Western devotees also.
तो इस तरह से भजन की पद्धति बतलायी है।
Can you? You can explain now.
[16:03-26:02 किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: What is niśā? निशा क्या है?
भक्त: General meaning of niśā is nighttime. [निशा का सामान्य अर्थ रात का समय होता है।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Generally, people are sleeping in bhajana. Ignorance is niśā. [सामान्यतः लोग भजन के प्रति सोये हुए हैं। अज्ञान ही निशा है।]
[26:20-32:55 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गौर प्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
महामन्त्र कीर्तन [करो।] अब एकादशी के [अवसर पर] सभी लोग पञ्चकोसी [परिक्रमा करेंगे।]
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