Sri Bhajana Rahasya (2): Anartha Nivrtti, Ruci, Asakti
40:03This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Explaining of Anartha-nivṛtti.
- Necessary to control our minds until we reach the stage of ruchi, and the same is possible only by regular sadhu-sanga else chances of falling down.
- Progress in bhava, bhakti from ruci to asakti.
- When asakti matures one will have a glimpse of his siddha deha (eternal body).
- Devotees should always mediate themselves as Radha-dasis, because these thoughts will only come at the time of death.
- A brief description of the journey of the soul (jiva) through the process of devotional service till he arrives at Goloka Vrndavana in the service of the Divine Couple.
Transcript
श्रीभजनरहस्य (2) : अनर्थ-निवृत्ति, रुचि, आसक्ति
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 9 नवम्बर 2004 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीश्रीगुरु-गौराङ्ग की कृपा से आज हम लोगों का बारहवाँ या तेरहवाँ दिन है?
श्रीपाद माधव महाराज: त्रयोदश दिवस (तेरहवाँ दिन)।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तेरहवाँ। त्रयोदश दिन। निर्विघ्न रूप से हमारी परिक्रमा सम्पन्न हुई। हम लोगों ने… यही हमारा वृन्दावन का आदिमठ है—श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ। इसमें स्थान की कमी होने के कारण हम लोग वहाँ [गोपीनाथ भवन से परिक्रमा] कर रहे हैं; अन्यथा यहीं से परिक्रमा होती।
By the special mercy of Śrī Śrī Guru-Gaurāṅga, we have finished our twelve days [parikramā, and today] we are beginning the thirteenth day.
This is our original maṭha in Vṛndāvana. From here, we used to do the entire parikramā in a very nice way. But as times changed, so many devotees, about one thousand, are hearing [harikathā] here. There was not [enough] place, and it became very difficult. Therefore, we shifted to Gopīnātha Bhavana. There are so many facilities.
कल हम लोगों ने पञ्चम-याम आरम्भ किया था।
भक्त: पञ्चम-याम अभी नहीं [आरम्भ किया।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आरम्भ नहीं किया था, माने भूमिका बाँधी थी।
भक्त: हाँ। निष्ठा तक ये…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो “आदौ श्रद्धा” [#1]—श्रद्धा के सम्बन्ध में हम लोग बता चुके हैं। और फिर द्वितीययाम-[साधन अर्थात्] प्रातःकालीन भजन में साधुसङ्ग में अनर्थ-निवृत्ति होगी। अनर्थ-निवृत्ति के सम्बन्ध में पिछले सालों में हमने बतलाया था। चार प्रकार के अनर्थ [होते हैं।] कौन-कौन से?
भक्त : स्वरूपभ्रम…
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: स्वरूपभ्रम, असत्-तृष्णा, हृदयदौर्बल्य और अपराध। और इनको भी चार-चार प्रकार से बताया—[इस प्रकार] सोलह [हो गये।] इसके अतिरिक्त और भी अनर्थ बताये गये हैं। कौन-कौन से? लय, विक्षेप, अप्रतिपत्ति, कषाय, रसास्वाद। इसके अतिरिक्त और भी [बतलाये।]
श्रीपाद तीर्थ महाराज: सुकृतोत्थ, दुष्कृतोत्थ, अपराधोत्थ, भक्त्युत्थ-अनर्थ।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हाँ। तो इन सब [अनर्थों और] अपराधों को समझिये, और समझने के बाद जब आंशिक रूप में अनर्थ-निवृत्ति हुई, तो फिर तृतीय[याम-साधन] में निष्ठा उत्पन्न हुई। अनैष्ठिकी-भक्ति के सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की माधुर्य-कादम्बिनी में बहुत कुछ बतलाया गया है, उसको समझ लेंगे। विशेष करके “तृणादपि सुनीच” होंगे।
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥
-श्रीशिक्षाष्टक (3)
[सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृण से भी अपने को दीन-हीन नीच समझकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरों को यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा—निरन्तर श्रीहरिनाम संकीर्तन करता रहे।] GVP
तो इस प्रकार जब निष्ठा हो जायेगी—बुद्धिपूर्विका निष्ठा होगी—तब मन स्थिर हो जायेगा। अब यह देखना है कि हमारा मन स्थिर हुआ है या नहीं। भोगों की लालसा से ही, कामनाओं से ही, यह मन अस्थिर हो जाता है। इसलिये निष्ठा होनी चाहिये।
जब निष्ठा परिपक्व हो जायेगी, तब फिर चतुर्थ याम में चलेंगे—रुचिपूर्वक भजन में। रुचि आ जाने पर अब डर बहुत कम हो गया है। किन्तु रुचि आने के पहले ही घर भी छोड़ दिया, संसार भी छोड़ दिया, सब कुछ छोड़ दिया और अभी रुचि भी नहीं आयी है—तो इस अवस्था का समय (काल) बहुत ही विकट (Critical) होता है। इसी समय में साधक लोग घर-बार छोड़ देते हैं। किन्तु फिर वही साधक विवाह कर लेता है, या कर लेती है। और फिर अपना वही पुराना [क्रम] चलने लगता है। अतः रुचि तक भी डर है। इसलिये रुचि तक साधुसङ्ग में अवश्य रहो। [जैसे ही] साधुसङ्ग को छोड़ा, और कहाँ गया? सर्वनाश। हम लोग बहुत चेष्टा करते हैं। साधुसङ्ग में आओ। साधुसङ्ग में हरिकथा [श्रवण करो। केवल] साधुसङ्ग करने से नहीं होगा। इसलिये जब रुचि उत्पन्न हो गयी, [तो अब पतन का डर बहुत कम हो गया है, किन्तु फिर भी साधुसङ्ग में रहो।]
और रुचि भी दो प्रकार की होती है—पहले वस्तुवैशिष्ट्य-अपेक्षिणी, और उसके बाद वस्तुवैशिष्ट्य-अनपेक्षिणी। दो प्रकार की रुचि होती है। भले ही ठाकुरजी का… जैसे यहाँ पर तो ठाकुरजी का बहुत सुन्दर शृङ्गार है। इसलिये और मन्दिरों की अपेक्षा, हमारे यहाँ लोग देखकर बड़े आकर्षित होते हैं। और अन्य लोग भी कीर्तन करते हैं, किन्तु कृष्णदास का स्वर थोड़ा मधुर है न! और उसके साथ में ताल बजे, और पखावज, [मृदङ्ग,] सारङ्गी और पियानो इत्यादि बजे, तब तो कहना ही क्या! तब तो [लोग कहेंगे—] “इस मठ में बहुत अच्छा कीर्तन होता है।” और यदि उनसे भी उन्नत व्यक्ति बहुत पुकार-पुकारकर, यदि रो-रोकर भी कीर्तन करता है, किन्तु यदि उसका गला थोड़ा-सा ठीक न हो, तो वह अच्छा नहीं लगेगा। वह किसको अच्छा लगेगा? जो [वस्तुवैशिष्ट्य-अनपेक्षिणी] रुचि में पहुँच गये हैं, उनको अच्छा लगेगा। (8:22 अस्पष्ट) नहीं होगा।
और इसके बाद, जैसे भी कोई कीर्तन कर रहा हो, उसे सुनकर उसके भाव से ही हृदय गद्गद हो जाये—यह वस्तुवैशिष्ट्य-अनपेक्षिणी रुचि है। यही रुचि जब और थोड़ी-सी आगे परिपक्व हो जाती है, तब बस काम बन गया। आसक्ति में [पहुँचने पर] पतन की आशंका बहुत कम [हो जाती है।]
उस समय आसक्ति भी दो प्रकार की होती है—भजन-विषयक और भजनीय-विषयक। पहले यह आसक्ति भजन के प्रति होती है, और फिर यही आसक्ति वस्तु के प्रति, अर्थात् कृष्ण के प्रति, हो जाती है। इस प्रकार हम लोग आसक्ति में पहुँचेंगे। उस समय साधक, आसक्ति के सहित, कृष्ण के चरणों में शिक्षाष्टक के पञ्चम श्लोक का स्मरण करता है।
अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भावाम्बुधौ।
कृपया तव पादपंकजस्थितधूलिसदृशं विचिन्तय ॥
-श्रीशिक्षाष्टकम् (5)
[हे नन्दनन्दन! अपने कर्मफल से भयंकर भवसागर में पड़े हुए अपने नित्यदास—मुझे कृपा करके अपने श्रीचरणकमलों में संलग्न रजःकण के समान सदा-सर्वदा अपने क्रीतदासके रूपमें ग्रहण करें।] GVP
Explain…
[9:50-20:37 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज : कृष्ण [के प्रति] आसक्ति के समय में… यह पञ्चम-साधन है न?
भक्त: जी।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: और शिक्षाष्टक में—
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्द्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम् ॥
-श्रीशिक्षाष्टक (1)
[चित्तरूपी दर्पण को शोधित करनेवाले, संसाररूप महादावानल को सम्पूर्णरूप से बुझा देनेवाले, जीवों की कल्याणरूपिणी कुमुदिनी को विकसित करने के लिए भावरूपी चन्द्रिका का वितरण करनेवाले, विद्यारूपी वधू के जीवनस्वरूप, आनन्दरूपी समुद्र को निरन्तर वर्द्धित करनेवाले, पग-पगपर पूर्ण अमृत का रसास्वादन करानेवाले, बाहर-भीतर से देह, धृति, आत्मा और स्वभाव सबको सर्वतोभावेन निर्मल और सुशोभित करनेवाले केवल श्रीकृष्णसंकीर्तन ही विशेषरूप से सर्वोपरि जययुक्त हों।] GVP
[यह पञ्चमयाम-साधन में होगा—] विद्यावधूजीवनम्। “विद्यावधूजीवनम्”—उस समय कुछ-कुछ सिद्धस्वरूप का आभास होने लगता है—यह अभी बतलायेंगे। इस श्लोक का तात्पर्य ही यही है—
अयि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भावाम्बुधौ।
कृपया तव पादपंकजस्थितधूलिसदृशं विचिन्तय ॥
-श्रीशिक्षाष्टकम् (5)
[हे नन्दनन्दन! अपने कर्मफल से भयंकर भवसागर में पड़े हुए अपने नित्यदास—मुझे कृपा करके अपने श्रीचरणकमलों में संलग्न रजःकण के समान सदा-सर्वदा अपने क्रीतदास के रूपमें ग्रहण करें।] GVP
“हे नन्दनन्दन! अपने कर्मफलों के कारण भवसागर में पड़े हुए अपने इस नित्यदास पर कृपा करके मुझे अपने चरणों में लगी हुई धूलि के समान अपना क्रीतदास समझिये। मैं आपका खरीदा हुआ दास हूँ।”
जब ऐसी आसक्ति की दशा होती है, तब प्रार्थना में दीनता और रुदन होता है। यदि हम पढ़ते हैं, श्लोक-पाठ करते हैं, स्तव-स्तुति करते हैं, तब हमारी प्रार्थना में दीनता [अवश्य] रहेगी।
वह क्या है—रूप गोस्वामी के [श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम्] का दूसरा श्लोक?
भक्त: हा देवि! काकुभर
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज :
हा देवि! काकुभर–गद्गदयाद्य वाचा
याचे निपत्य भुवि दण्डवदुद्भटार्तिः।
अस्य प्रसादमबुधस्य जनस्य कृत्वा
गान्धर्विके! निजगणे गणनां विधेहि ॥
-श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम् (2)
[हे देवि गान्धर्विके! मैं विशिष्ट पीड़ा से युक्त हूँ, अतः आज भूमिपर दण्ड के समान गिरकर अत्यन्त कातरता भरी, गद्गद वाणी से आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझ अज्ञानी जनपर कृपा करके निजजनों में मेरी भी गिनती कर लीजिये।] GVP
साक्षात् श्रीराधाजी [सामने] खड़ी हैं, और हम उनकी उपरोक्त प्रार्थना कर रहे हैं। यदि आसक्ति आ जायेगी, तो भावावेश में रुदन भी होगा। क्यों? क्योंकि अनर्थ प्रायः सब दूर हो चुके हैं। हृदय भी निर्मल हो गया है। रुचि बढ़कर आसक्ति में [परिणत हो] गयी है। इसलिये इस समय की प्रार्थना में, जो भक्त इस अवस्था में पहुँच जाता है, वह भावों से गद्गद हो जाता है, साक्षात् रूप में अपने इष्टदेव का दर्शन करता है, और फिर वह रुदन करता है।
आसक्ति की परिपक्व दशा में सिद्ध-देह का आभास होने लगता है। इसके सम्बन्ध में उस दिन मुझे याद नहीं आया था; थोड़ा-सा बतलाता हूँ।
भरत महाराज मृग-शावक को अपने पास रखकर उसमें आसक्त हो गये। वे भाव-अवस्था पर पहुँच चुके थे। कहते हैं कि उस समय वे भाव की अवस्था में पहुँच गये थे, किन्तु मृत्यु के समय वे हिरण की चिन्ता करने लगे। तब उस समय हिरण की चिन्ता करने से हुआ क्या था?
भक्त: हिरण बन गये।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हिरण बन गये। तो वैसे ही हम भगवान् के परिकरों का चिन्तन करेंगे— “मैं राधा-दासी हूँ। गुरुजी ने मेरा जो सिद्ध-स्वरूप बताया है, अथवा जो हृदय में स्फूर्ति हुई है, वही मेरा स्वरूप है।” तब क्या होगा? वैसा ही जन्म होगा। किन्तु कब?
श्रीपाद माधव महाराज: आसक्ति की अवस्था में
श्रीपाद तीर्थ महाराज: भाव से पहले
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि मृत्यु होने लगे, तब समझो। मृत्यु होने लगे तब। तो वह मृत्यु होते समय कैसे आयेगा? सारा जीवन…
भक्त: अभ्यास करने से।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ऐसे ही अभ्यास होते जायेगा। उसका चिन्तन करते जायेगा। मरते समय वही चिन्ता आयेगी और वही [चिन्तन] होने के बाद वैसा ही जन्म होगा।
तो जो कोई अभी से गोपी-भाव का चिन्तन कर रहा है, ध्यान कर रहा है, इसको कल्पना मत समझो। यह भाव भी कहाँ से आया? भजन के प्रभाव से ही तो आया है। वैसी आसक्ति हुई है, [तब यह भाव आया है।] इसलिये यदि ऐसा हो, तो अगले जन्म में गोपी-गृह में जन्म होगा। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी बहुत आश्वासन देकर ऐसा कह रहे हैं।
पहले महाप्रभुजी की लीला में पहुँचेंगे। योगमाया वहाँ पर पहुँचा देगी, जिस ब्रह्माण्ड में महाप्रभुजी की लीला हो रही है। उसके बाद वहाँ थोड़ा-सा परिपक्व होकर, जहाँ कृष्ण की लीला हो रही होगी, वहाँ पर पहुँचेगा। वहाँ पहुँचकर नित्यसिद्धा-गोपियों के सङ्ग में कृष्णलीला में प्रवेश करेगा। तब फिर वह उसी स्वरूप में गोलोक वृन्दावन की लीला में भी प्रवेश कर जायेगा।
तो [आसक्ति की अवस्था में] सिद्ध-देह का कुछ आभास होने लगता है। भजन के साथ-साथ भजनीय-वस्तु में भी आसक्ति हो जाती है। पहले भजन में निष्ठा होनी चाहिये। “बिना एक लाख हरिनाम किये बिना मैं खाऊँगा नहीं। इसके बाद ही और कुछ करूँगा। वैष्णवों के मुख से अवश्य कुछ श्रवण करना है।” इस प्रकार पहले भजन में निष्ठा होगी—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्म-निवेदन इत्यादि। इसके बाद वह अपने-आप परिवर्तन हो जायेगा और भजन में आसक्ति रहते हुए ही भजनीय-[वस्तु] में आसक्ति हो जायेगी। जब ऐसी [अवस्था] हो जायेगी, तब भगवान् ऐसे भक्तों की पुकार सुनते हैं। वह बताया गया है न?
षडङ्ग-शरणागति हइबे जाँहार।
ताँहार प्रार्थना सुने श्रीनन्दकुमार॥
जिसकी छः प्रकार की शरणागति होगी, श्रीनन्दनन्दन कृष्ण एकमात्र उसीकी प्रार्थना सुनते हैं। (GVP)
यहाँ पर स्पष्ट कह रहे हैं कि आसक्ति की अवस्था में होगा। शरणागति होने पर भी अभी सुन नहीं रहे हैं। शरणागत भक्त जब इस [आसक्ति की] अवस्था तक आयेंगे, तब भगवान् उनकी पुकार सुनेंगे। भजन करते-करते श्रद्धा, अनर्थ-निवृत्ति होने पर [निष्ठा और] फिर रुचि उत्पन्न होती है, इस स्थिति तक भक्त की पुकार अन्तर्यामी विष्णु सुनते हैं; कृष्ण नहीं सुनते। अन्तर्यामी की भाँति वे ग्रहण करते हैं। किन्तु जहाँ आसक्ति होगी, वहाँ भक्त का इष्टदेव स्थिर हो गया। जिन परिकरों का वह अनुसरण (follow) कर रहा है, जिनका अनुगमन करके रागानुगा-[भक्त] बन रहा है, उन परिकरों के प्रति भी उसकी आसक्ति हो जाती है। इसलिये आसक्ति की अवस्था में भक्त की पुकार [स्वयं] कृष्ण श्रवण करते हैं और करुणा से द्रवित हो जाते हैं।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बिल्वमङ्गल की पुकार सुनी या नहीं? जब अनर्थ-निवृत्ति हो गयी, तब कृष्ण आ गये और उनकी करुण पुकार को सुना। क्या नाम है?
भक्त: कृष्ण-कर्णामृत।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण-कर्णामृत को सुना। [उनकी पुकार सुनकर कृष्ण] लाठी पकड़कर उन्हें वृन्दावन ले गये और उनकी भाव-सिद्धि तथा प्रेम-सिद्धि तक करा दी।
Explain.
[29:22-38:33 तक भक्तों के साथ कुछ वार्तालाप तथा किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: बहुत अच्छा। प्रवचन के बाद (after our class), हम लोग गोपीनाथ-भवन जायेंगे। वहाँ पर पारण के लिए बाल्य-भोग प्रस्तुत है। वहाँ जाकर उसका वितरण होगा। फिर शीघ्र प्रसाद पाकर बेलवन जाना है। नौकावालों से [पहले ही] बातचीत कर लेना। बेलवन जाकर दोपहर तक फिर गोपीनाथ-भवन [वापस] आ जायेंगे। बस, आज का [कार्यक्रम इतना ही है।] और शाम को, नियमित रूप में वहीं पाठ (class) होगा। वहीं पर प्रवचन होगा।
श्रीपाद माधव महाराज: जाते समय गोपीनाथ गौड़ीय मठ होकर जायेंगे।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Today, after our class, we will all go to Gopīnātha Bhavana, where Bālya-bhoga— pāraṇa will be given to everyone. After that, you will all go to Belavana through Gopīnātha Gauḍīya Maṭha. Then, after returning from there, prasādam will be given.
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया
ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठारुचिस्ततः।
अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति
साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत क्रमः॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (1.4.15-16)
सर्वप्रथम श्रद्धा, तदनन्तर साधुसङ्ग, उसके पश्चात् भजनक्रिया, तदनन्तर अनर्थनिवृत्ति, उसके पश्चात् निष्ठा, तदनन्तर रुचि और उसके बाद आसक्ति, तत्पश्चात् भाव और भाव के बाद में प्रेम का उदय होता है। साधकों के हृदय में प्रेम उत्पन्न होने का यह क्रम निरूपित हुआ है। (GVP)
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