Sri Bhajana Rahasya (4): Asakti & Gopis' Vamya bhava
43:05This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Sri Bhajana-Rahasya (5th yama).
- At the stage of asakti, one starts realizing his siddha deha.
- Conversation between gopis and Krsna.
- Krsna's beautiful curly hair is like a net to steal gopis' hearts.
- Gopis say that we become your servants and your beauty is our only wage.
- Once the jiva attains self-realization, he gets detached from the material world and gets attached only to Krsna.
- Gopis with children never participate in rasa with Krsna.
Transcript
श्रीभजनरहस्य (4) : आसक्ति एवं गोपियों का वाम्य-भाव
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 12 नवम्बर 2004 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीश्रीभजनरहस्य पञ्चमयाम। इसमें आसक्ति की अवस्था के विषय में बतलाया। आसक्ति की अवस्था में बतलाया कि सिद्धदेह का आभास होने लगता है। इसलिये यहाँ पर साधक वैसे ही श्लोकों को, वैसे ही भावों को स्मरण करता है—
वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री–
गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्।
दत्ताभयञ्च भुजदण्डयुगं विलोक्य
वक्षः श्रियैकरमणञ्च भवाम् दास्यः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.29.39)
[हे प्रियतम! तुम्हारा सुन्दर मुखकमल जिसपर घुँघराली अलकें झलक रही हैं, तुम्हारे कमनीय कपोल जिनपर सुन्दर-सुन्दर कुण्डल अपनी अनन्त शोभा बिखेर रहे हैं, तुम्हारे मधुर अधर जिनकी सुधा अमृत को भी लजानेवाली है, तुम्हारी तिरछी चितवन जो मन्द-मन्द मुस्कान से उल्लसित हो रही है, तुम्हारी दोनों भुजाएँ जो शरणागतों को अभय दान करने में अत्यन्त उदार हैं और तुम्हारा विशाल वक्षःस्थल जो लक्ष्मीजी (सौन्दर्य की एकमात्र देवी) का नित्य क्रीड़ास्थल है—को निहारकर हम सब तुम्हारी दासी हो गयी हैं।] GVP
“हे प्रियतम!”— ये गोपियाँ बोल रही हैं। रासलीला के समय जब कृष्ण कह रहे हैं—“घर लौट जाओ, [अपने-अपने] पतियों की सेवा करो।” [तो ये गोपियाँ कहती हैं—] “हम लौटकर क्या करेंगी?”
और कह रही हैं—“प्रियतम! ‘वीक्ष्यालकावृतमुखं’—तुम्हारा सुन्दर मुखकमल, जिस पर घुँघराली, काली-काली अलकें झलक रही हैं; ‘गण्डस्थलं’—ये तुम्हारे कमनीय कपोल, जिन पर मधुर कुण्डल अपना सौन्दर्य बिखेर रहे हैं तथा तुम्हारे गण्डस्थलों [अर्थात्] कपोलों का चुम्बन भी कर रहे हैं। तुम्हारे ये मधुर अधर, जिनकी सुधा सब प्रकार के अमृतसमूह—देवताओं के अमृत तथा अन्य सभी सुधासमूह—को भी पराजित कर रही है। तुम्हारी यह मनोहर चितवन मन्द-मन्द मुस्कान से उल्लसित रहती है। तुम्हारी ये दोनों भुजाएँ शरणागतों को अभय प्रदान करती हैं। स्वर्ण-रेखा के रूप में लक्ष्मीजी द्वारा सुशोभित तुम्हारा वक्षःस्थल—‘श्रियैकरमणं’—अर्थात् तुम्हारे वक्षःस्थल पर लक्ष्मीजी विराजमान रहती हैं। यह सब देखकर हम तुम्हारी दासी हो गयी हैं।”
ओ मुख अलकावृत ओ कुण्डल-शोभा। अधर-अमृत-गण्ड-स्मित-मनोलोभा।
अभयद भुजयुग श्रीसेवित वक्ष। देखिया हलाम दासी सेवाकार्ये दक्ष॥
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि इस श्लोक में गोपियों का अन्तर्भाव निहित है। इसलिये गोपियाँ अपने मन के भाव को कहती हैं और कृष्ण की मधुर वाणी, उनके सुन्दर मुखारविन्द और उनके समस्त अङ्गों पर अपने आपको न्योछावर कर देती हैं। कहती हैं— “हम तुम्हारी दासी हैं, हम तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जायेंगी।”
तो श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कह रहे हैं कि रसिकचूड़ामणि, व्रजेन्द्रनन्दन श्यामसुन्दर अपना दाक्षिण्यभाव गोपन करके गोपियों के प्रति उदासीन होकर बैठे हैं। जब गोपियाँ वहाँ वंशीवट में कृष्ण के पास आयीं, तो कृष्ण ने देखा कि कहीं ये मेरे दाक्षिण्यभाव को ग्रहण न कर लें। इसलिये उन्होंने उदासीन होकर कहा— “घरों में लौट जाओ और [अपने-अपने] पतियों की सेवा करो।”
इसके बाद वे उन्हें और उपदेश देने लगे और अपना वाम्यभाव दिखलाने लगे। [कृष्ण के इस वाम्यभाव को देखकर] गोपियाँ क्या करने लगीं? दाक्षिण्यभाव में [कहने लगीं—] “अपने चरणकमलों को हमारे सिर पर, हमारे वक्षःस्थल पर धारण कराओ। हम तुम्हारी दासी हैं।”
यदि [गोपियों की] स्वाभाविक स्थिति होती, तो वे यह नहीं कहतीं कि “हम तुम्हारी दासी हैं।” वे कहतीं—“हम तुम्हारी क्रीतदासी नहीं हैं।” किन्तु यहाँ कृष्ण की उदासीनता देखकर [वे ऐसा कह रही हैं।]
अथवा कृष्ण गोपियों के कुछ दाक्षिण्यभाव को देखकर कि वे घर से भागी-भागी यहाँ आयी हैं। इसलिये वे [कुछ वाम्यभाव दिखलाकर] कहने लगे— “हे व्रजदेवियों! तुम लोग मेरी बिना मूल्य की दासी [पद] पाने की चेष्टा क्यों कर रही हो? दासी की क्या आवश्यकता है? वह भी बिना मूल्य के तुम मेरे चरणों में बिक जाओगी।”
[इस प्रकार] दैन्यभाव से और कुछ दाक्षिण्यभाव प्रकट करके गोपियाँ कह रही हैं— “श्यामसुन्दर! आपने हमें एक अवर्णनीय वेतन दिया है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसा वेतन आपने हमें दिया है।”
श्यामसुन्दर ने मुस्कुराकर कहा—“ वह क्या है?”
गोपियों ने कहा— “आपने अपनी स्वभावसिद्ध अधरसुधा, लोभनीय भुजाएँ और उनका स्पर्श, तथा लक्ष्मी के आश्रयस्वरूप अपने वक्षःस्थल का आलिङ्गन—इन सबको वेतन के रूप में आपने हम सब गोपियों को प्रदान किया है। हम लोगों के खञ्जन[पक्षी]-रूपी नयन आपके अलकावृत मुखमण्डलरूपी जाल में आबद्ध हो गये हैं। हमारे नयन क्या हैं? खञ्जन पक्षी हैं और आपका मुखकमल जाल स्वरूप है। इसमें हमारे नयन आबद्ध हो गये हैं।”
[“और आपके मुखकमल पर] यह अलकावली नहीं है। क्या है? यह पाश है, जाल है—पकड़ने और बाँधने के लिए। ये दोनों कर्णकुण्डल भी जाल हैं। आपकी अधरसुधा हमारे नयनरूपी पक्षियों का आहार है। आपके सहास्य दृष्टिरूपी खञ्जन-नयन जो भली प्रकार पालित और शिक्षित हैं, हमारे नयनों को हरण कर लेते हैं।”
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर का भाव देखो। इस श्लोक का कैसा सुन्दर अर्थ कर रहे हैं!
“आपकी लोभनीय भुजाएँ और रतिप्रद वक्षःस्थल हमारे हृदय को उपशमित कर रहे हैं। हे कृष्ण! आपने हमारी वयःसन्धि के पूर्व ही मोहन माधुर्य द्वारा कुञ्ज-मन्दिर में बुलाकर नीलनिधि, पद्मनिधि, जाम्बुनद-स्वर्ण के कुण्डल-युगलादिरूपी सम्पत्ति का दर्शन कराकर [अधरसुधा का पान कराया।”] माने क्या? [आपने हमें वह सब प्रदान किया है] जिसका मूल्य नहीं, वह अमूल्य है न; [इसलिये हम] बिना मूल्य [ही आपके चरणों में] नहीं [बिक रही हैं।] नहीं, बिना मूल्य नहीं।
नीलनिधि, अरब-खरब नीलपद्म और जाम्बुनद-स्वर्ण के कुण्डल इत्यादि रूपी सम्पत्ति का दर्शन कराकर आपने हमें आपकी दासी बनने के लिए लालायित कर दिया है, विवश कर दिया है।
प्रणयरोष के साथ व्रजदेवियाँ कहने लगीं— “कृष्ण! आपकी अनुपम रूप-सम्पत्ति को देखकर हमारी आपकी दासी बनने की इच्छा तो हो रही है, हम यह आशा तो कर रही हैं; किन्तु यह आशा पूर्ण नहीं होगी, दुराशा में बदल जायेगी—नहीं होगी।”
गोपियाँ तर्जनी अँगुली से कृष्ण को इस प्रकार धमकाती हुई बोलीं— “हे धार्मिकचूड़ामणि! आपके धर्म के स्वरूप के विषय में हम अच्छी तरह जानती हैं। आप कितने धार्मिक हैं, बचपन से ही हम जानती हैं! अरे, जन्म से ही तो पर-नारियों से छेड़छाड़ करते हो। पूतना को मारा और परनारियों से सदा छेड़छाड़ करते हो। वैकुण्ठ की रमणियों को भी अपने वक्षःस्थल पर धारण करते हो। आपको इस दोष के लिए—नारायण की लक्ष्मी को अपने वक्षःस्थल पर धारण करते हैं—नारायण क्षमा कर सकते हैं, किन्तु हम नहीं क्षमा कर सकतीं। हमारे पति भी आपको क्षमा नहीं करेंगे; बल्कि महाबली कंस से शिकायत करके आपको दण्ड देंगे। हम कुलवधुएँ हैं। औपपत्य-भाव हमारे लिए अत्यन्त निन्दनीय है। अपना सौन्दर्य, माधुर्य दिखलाकर आप हमें अपनी किंकरी कदापि नहीं बना सकते।”
अब [गोपियों ने] उल्टा पल्ला झाड़ दिया [अर्थात् उल्टा वे उन्हें धमकाने लगीं।] यही [सब श्लेष वाक्यों में, विपरीत अर्थ में, वाम्यभावों का सूक्ष्म विवेचन ही] तो हमारे टीकाकारों की विशिष्टता है। यह कला हमारे श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर में बहुत है; श्रील भक्तिविनोद ठाकुर भी कम नहीं।
गोपियाँ कृष्ण की अद्भुत माधुरी, रूपमाधुरी को देखकर कैसी दासी होती हैं, कृष्ण की कैसी दासी बनती हैं—उसका वर्णन करते हुए रसिकचूड़ामणि महामहोपाध्याय श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर—उनका नाम भी ले लिया—श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरजी भी कहते हैं। यह वाम्यभाव की व्याख्या उनकी अपनी है।
श्यामसुन्दर गोपियों से कहते हैं—“मैंने तो तुम लोगों को कोई वेतन देकर क्रय किया नहीं।” यह श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका [में वर्णित है—] “मैंने कोई मूल्य नहीं दिया, तब तुम मेरी दासी कैसे बन गयीं?”
इसका उत्तर देते हुए व्रजरमणियाँ कहने लगीं—“वेतन से भी कोटि-कोटि गुण अधिक तुमने हमें प्रदान किया है। वह महामूल्य निधि क्या है, सुनो! वयःसन्धि के आरम्भ से ही कुञ्जमन्दिर में वंशी के द्वारा हमें बुलाकर अपनी अलकावलियों से आवृत (ढके हुए) मुखमण्डल का दर्शन कराया। आप टेढ़ी-टेढ़ी पाग बाँधते हैं। उसमें घुँघराले कुञ्चित केशपाशरूपी झरोखों में से आपके मुखकमल का हम दर्शन करती हैं। झरोखा अलकावली है न, केशपाश है; और उस झरोखे से हम दर्शन करती हैं। फिर आप अपनी कोमल अँगुली के द्वारा उसे (केशपाश को) भीतर करते हैं। कोमल कनिष्ठ अँगुली से उनको इस प्रकार हटा लेते हैं—उसमें भी एक कौशल है। वह भी आपके सौन्दर्य को ही प्रस्फुटित करता है।”
“कभी आप ऊँची पाग बाँधते हैं और उसमें से भी आपके घुँघराले बाल लटकते हैं। विश्राम करते समय जब आप अपनी पाग को उतार देते हैं, तो सारी अलकावलियाँ मुख को आवृत कर लेती हैं। पगड़ी रहने पर तो [केश] बँधे रहते हैं, और पगड़ी नहीं रहने पर चारों ओर से [मुख को] घेर लेते हैं। इस प्रकार कभी अनावृत, तो कभी ईषत् आवृत तथा कभी सम्पूर्णरूप से अलकावली से आपका मुखारविन्द सुशोभित रहता है।”
“हास-परिहास के समय कपोलों का चुम्बन करने के लिए कुण्डल दोदुल्यमान होते हैं। मिलनोचित चिह्नों से सुशोभित गण्डस्थल की अपूर्व शोभा विकीर्ण होती है। इस प्रकार आपके मुखरूपी चन्द्रमा को निरख (निहार) करके गोपियों का हृदयकुमुद खिल उठता है। और इस अनुपम माधुरीरूपी मूल्य के द्वारा हम आपकी दासी हो जाती हैं।”
[यदि] कृष्ण कहें—“मैं तो धर्मपरायण हूँ और तुम परनारी हो, तो मैं तुम्हें कैसे अपनी दासी बनाऊँ?”
गोपियाँ फिर अँगुली से तर्जन करती हुई कह रही हैं— “हे धार्मिकप्रवर! वैकुण्ठस्थित नारायण की लक्ष्मी को तुमने अपने वक्षःस्थल पर धारण कर लिया है। हमारे सम्मुख लज्जावशतः वह स्वर्णरेखा के रूप में बदल गयी है, किन्तु एकान्त में वह आपके साथ रमण करती है। क्या त्रिभुवन की कोई भी स्त्री आपका परित्याग कर सकती है? अर्थात् नहीं [कर सकती।] यही सब अमूल्य सम्पत्ति का दर्शन कराकर आपने हमें अपनी दासी बनने के लिए बाध्य किया है।”
You should explain.
[17:03 -26:16 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Finished?
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशलाः स्व आत्मन्
नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदैः किम्।
तन्नः प्रसीद परमेश्वर मास्म छिन्द्या
आशां धृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.29.33)
[हे प्रियतम! शास्त्रज्ञान में निपुण महापुरुष तुमसे ही प्रेम करते हैं, क्योंकि आत्मा (परमबन्धु) के रूप में तुम्हीं सबके नित्य प्रिय हो। अनित्य और दुःखदायक पति-पुत्रादि से प्रेम करने से कौनसा प्रयोजन सिद्ध होगा। अतएव हे परमेश्वर! हमलोगों के प्रति प्रसन्न होओ। हे कमललोचन! ‘तुम्हें प्राप्त करेंगी’ चिरकाल से पाली-पोसी हमारी इस अभिलाषा की लहलहाती लता का छेदन मत करो।] GVP
पहलेवाले [श्लोक में] गोपियों का दाक्षिण्यभाव है और फिर दूसरा उसका [उदाहरण दे रहे हैं।] हे परमात्मन्! ‘स्व आत्मन्’ परमात्मा के रूप में देखकर दाक्षिण्यभाव से कह रही हैं— “आत्महितैषी महापुरुष आपसे प्रेम करते हैं, क्योंकि आप सबकी आत्माओं के भी आत्मास्वरूप हैं। अत्यन्त दुःखद पति, पुत्र आदि की सेवा और रति करने से लाभ क्या है? हम उन्हें छोड़कर [आपके पास] आयी हैं। आप हमारे ऊपर प्रसन्न हों। हे कमलनयन! चिरकाल से तुम्हारे प्रति पाली-पोसी हुई जो आशा है, अभिलाषा की लहलहाती हुई लता है, उसका छेदन मत करो। बचपन से ही हम तुमसे स्नेह करती हैं और अब वह लता बढ़ गयी है। उसको अपने हाथों से काटो मत; अर्थात् हमें घर में मत भेजो।”
भजनरहस्य[वृत्ति में कह रहे हैं—] आत्मदर्शन होने के पश्चात् जीव का लौकिक पति, पुत्र इत्यादि से सम्बन्ध नहीं रह जाता। यदि किसीका आत्मदर्शन हो जाये, तो फिर संसार के सारे सम्बन्ध दूर हो जाते हैं और एकमात्र कृष्ण से ही सम्बन्ध होता है। “व्रजगोपी भाव हइबे स्वभाव, आन भाव न रहिबे।”—[अर्थात् गोपीभाव के अतिरिक्त अन्य कोई भाव नहीं रह जायेगा।] सब कुछ छूट जायेगा। संसार को असार समझकर वह स्वाभाविक कृष्णरति में निमज्जित हो जाता है—सबके सम्बन्ध को छोड़कर एकान्तिक रूप से। इस स्थिति में जीव विधि-निषेध के अधीन न रहकर रागमार्गीय-भक्ति में प्रवृत्त हो जाता है और एकान्तिक रूप से राधाकृष्ण का भजन करने लगता है—इस स्थिति में।
यह कब की स्थिति कह रहे हैं? आसक्ति की। यहाँ आसक्ति का प्रसङ्ग चल रहा है।
यहाँ गोपियाँ कृष्ण से कह रही हैं— “हम लोग पति, पुत्र इत्यादि सबको [छोड़कर आयी हैं।”] यहाँ पर पुत्र कहने से उनका अपना पुत्र मत समझो, दूसरों के पुत्र हैं। पुत्रवती गोपियाँ रास में नहीं आयीं, [नहीं तो] यह रसाभास हो जायेगा। इसलिये अपनी ननद या दूसरे के बच्चों को अपना बच्चा समझकर ये ऐसा कह रही हैं।
“तो उनके साथ और अपने पतियों के साथ चिरकाल से जो सम्बन्ध था, उसे [सम्यक् प्रकार से] छोड़कर आपके सामने उपस्थित हुई हैं। अतएव अब यह सम्बन्ध नहीं टूटेगा क्योंकि हमारे हृदय में प्रेम का अंकुर उदय हुआ है, आपके प्रति प्रीति हुई है।”
यह नहीं कहना चाहिये कि “आपके प्रति हमारा बहुत प्रेम है”—कहने से तब क्या हो जायेगा? प्रेम लाघव (लघु) हो जायेगा, कम हो जायेगा। [इसलिये ऐसा] नहीं कहना चाहिये। किन्तु यहाँ दाक्षिण्यभाव के कारण गोपियाँ यह भाव प्रकट कर रही हैं।
“अब वह आशारूपी लता बृहद्रूप धारण कर चुकी है। आशा माने—आप हमारे प्रियतम हैं और हम उसी रूप में आपकी सेवा करना चाहती हैं। हम लोग तो बाल्यावस्था से ही आपके प्रति अनुरक्त हैं और आपके प्रति हमारी प्रेम-प्रीति निष्कपट है। आप इस प्रीतिलता का छेदन मत कीजिये। आपके रक्तिम कमलनेत्रों के दर्शन से हमारा [हृदय] स्वाभाविक रूप से अनुरञ्जित हो गया है। आपके नेत्रों के दर्शन करने से ही हम आपकी हो गयी हैं और बिना मूल्य की दासी हो गयी हैं।”
श्लेष वाक्यों में, विपरीत अर्थ में, वाम्यभाव से [गोपियाँ] कह रही हैं— “अरविन्दलोचन कृष्ण! रात्रिकाल में जिस प्रकार कमल बन्द हो जाता है, उसी प्रकार आपके नेत्र इस समय अर्धनिमीलित हो रहे हैं, आधे मुद्रित हैं। इसलिये आप हमारे सौन्दर्य और यौवन को सम्पूर्ण रूप से देख नहीं पा रहे हैं। यदि [आपके नेत्र] खुले रहते, तो देख लेते; किन्तु आप देख नहीं पा रहे हैं। इसलिये इस दर्शन से वञ्चित हो रहे हैं। [इसलिये आपका] नयन धारण करना भी व्यर्थ है।”
वहाँ कृष्ण के लिए बताया गया है—“अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः” [#1] — जब कृष्ण वेणुवादन करते हुए सखाओं के साथ एक वन से दूसरे वन में जा रहे हैं, तो जो लोग कृष्ण का रूप-दर्शन नहीं करते, उनके नयन बेकार हैं।
तो गोपियाँ कह रही हैं— “आपके नयन धारण करना भी बेकार है, जो हमारे सौन्दर्य और रूप को नहीं देख सके। ओह! हम आपके मनोऽभीष्ट को समझ गयी हैं। क्या? आपका अनुचित कर्मो से विरत होना [उचित है।] हम आपके मनोऽभीष्ट को समझ गयी हैं कि हमारे प्रति आपका अनुचित प्रेम हो गया है। उस प्रेम को छोड़ दीजिये। हम लोग यहाँ से अब शीघ्र ही जानेवाली हैं। आपके कहने से यहाँ पर ठहरेंगी नहीं। आपके हृदय में जो वासना है, उसका परित्याग कर दीजिये। हम गोपियाँ आपको कभी नहीं मिलेंगी। हम कभी आपके लिए उपलब्ध नहीं होंगी।”
इस प्रकार गोपियाँ वाम्यभाव से कहने लगीं।
[34:00-39:50 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अभी हम लोग दस मिनट में यहाँ से निकलेंगे। यहाँ से सबसे पहले हरिदेवजी के मन्दिर में जायेंगे। वहाँ दर्शन करके पास ही में ब्रह्मकुण्ड जायेंगे—ब्रह्माजी की तपस्या का स्थान, यज्ञ का स्थान। पास ही में मनसा देवी—मानसी गङ्गा का श्रीविग्रह [का दर्शन करेंगे।]
फिर मानसी गङ्गा के तट से होते हुए एक भक्त के घर जायेंगे। वहाँ पर 15–20 मिनट कुछ कीर्तन और हरिकथा करके फिर चकलेश्वर महादेव पहुँचेंगे। वहाँ पर सनातन गोस्वामी की भजनकुटी और चकलेश्वर महादेव के दर्शन करेंगे। फिर वहाँ से मुखारविन्द में आकर दर्शन करके हम लोग यहाँ लौटेंगे।
[41:29 -43:05 तक श्रीपाद माधव महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः
सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः।
वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.21.7)
गोपियाँ परस्पर बातचीत करने लगीं—अरी सखियों! नेत्रवान व्यक्तियों के लिए ऐसा प्रिय दर्शन ही यथार्थ फल है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अपने सखाओं के साथ गोचारण के लिए वन में प्रवेश करनेवाले राम-कृष्ण के वेणुवादरत स्निग्धकटाक्षयुक्त मुखकमल का जिन्होंने दर्शन किया है, निश्चय ही उन्होंने ही इसका अनुभव किया है। (GVP)
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