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Sri Bhajana Rahasya (5): Explanation of the verse 'abhimanam parityajya prakrta-vapur-adisu'

21:17
#436
Govardhana
Parikrama
Hindi
Srila Gurudeva 50%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Recap of parikrama of Uddhava-kunda, Radha-kunda.
  • Radha-Dasyam is the only aim of our life.
  • One should follow the five limbs of bhakti.
  • Explanation of the verse 'abhimanam-parityajya'.Give up false identification with this material body and pray to attain the svarupa of a gopi.
  • Manjari bhava is attained only by serving under the shelter of Lalita-Sakhi, Visakha-Sakhi, and the manjaris.
  • Nikunja seva is attained by parakiya bhava.

Transcript

श्रीभजनरहस्य (5) : ‘अभिमानं परित्यज्य प्राकृतवपुरादिषु’ श्लोक की व्याख्या

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 14 नवम्बर 2004 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गुरु-गौराङ्ग की कृपा तथा गिरिराजजी की कृपा से कल गौ-पूजा, वैष्णव-पूजा, गिरिराजजी का अभिषेक, अन्नकूट महामहोत्सव, वैष्णव-सेवा आदि सुष्ठुरूप से—अच्छी प्रकार से सम्पन्न हुए।

आज हम लोग लगभग दस मिनट में यहाँ से छोटी परिक्रमा [के लिए प्रस्थान] करेंगे। यहाँ से हम लोग उद्धवकुण्ड जायेंगे। उद्धवकुण्ड से आगे राधाकुण्ड [स्थित] श्रीरघुनाथदास गोस्वामी की समाधि पर जायेंगे। वहाँ हरिकथा होने के बाद हम उसी परिक्रमा-मार्ग से राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड की सङ्गम-स्थली पर जायेंगे। वहाँ पर स्नान कर सकते हैं, आज भ्रातृ-द्वितीया (भैया-दूज) है, किन्तु अत्यन्त सावधानी के साथ। [कृपया] चैन पकड़कर तथा अपने साथियों के साथ ही स्नान करें। अन्यथा (otherwise) वहाँ दुर्घटना (accident) हो सकती है— पैर फिसल सकते हैं।

इसके बाद वहीं पर प्रसाद होगा, जहाँ प्रतिवर्ष होता है और फिर [वापस] लौट आयेंगे।

From here, we will go to Uddhava-kuṇḍa. There [we will have] breakfast (bālya-bhoga.) Then we will go to Rādhā-kuṇḍa and Śyāma-kuṇḍa. First, we will go to the samādhi of Raghunātha Dāsa Gosvāmī, [where there will be] some Hari-kathā. Then we will go to the saṅgama-sthalī, the yoga-pīṭha of Rādhā-kuṇḍa and Śyāma-kuṇḍa.

There, if you like, you may take a bath, but [please be] very careful. The steps are slippery. So, with the help of the chain or [with the assistance of] your friends or others, you can take a bath. And prasāda will be near Uddhava-kuṇḍa, where we usually take it.

[अब हम लोग] भजनरहस्य [का पाठ करेंगे।]

राधाजी का दास्य-अभिमान ही हमारा अ‍न्तिम लक्ष्य (goal) है। उसीके लिए [श्रील भक्तिविनोद ठाकुर] बार-बार हमारे श्रील रूप गोस्वामी और श्रील रघुनाथदास गोस्वामी के विचार बतला रहे हैं—

अभिमानं परित्यज्य प्राकृतवपुरादिषु
श्रीकृष्णकृपया गोपीदेहे व्रजे वसाम्यहम्।
राधिकानुचरी भूत्वा पारकीयरसे सदा
राधाकृष्ण विलासेषु परिचर्यां करोम्यहम् ॥
-श्रीभजनरहस्य (5.11)

[“मैं प्राकृत देह का अभिमान परित्याग करके श्रीकृष्णकृपा से गोपीदेह प्राप्त करूँ तथा व्रज में निवास करूँ। श्रीराधाजी की अनुचरी होकर सर्वदा पारकीय रसविलासी राधाकृष्ण की परिचर्या करूँ।”] GVP

यह किसी गोस्वामी का [वचन] है— इसमें नाम [का उल्लेख] नहीं है।

कब ऐसी दशा होगी? कब उन लोगों की कृपा प्राप्त होगी कि मैं प्राकृत देह का समस्त अभिमान भूल जाऊँगा? स्त्री या पुरुष रूप जो यह प्राकृत शरीर है, इसका अभिमान [पूर्णतः] परित्याग कर दूँगा।”

“आन भाव ना रहिबे” क्या है वह?

श्रीपाद माधव महाराज: व्रजगोपी भाव, हइबे स्वभाव, आन भाव ना रहिबे।

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: व्रजगोपी भाव, हइबे स्वभाव, आन भाव ना रहिबे।

[तब केवल यही अभिमान रहेगा कि] वृषभानुपुर में मेरा ज‍न्म हुआ है, जावट में विवाह हुआ है, गोपियाँ मेरी प्राण-सखियाँ हैं और मेरा सिद्धस्वरूप भी गोपी का है। यह अभिमान आयेगा और प्राकृत देह का अभिमान भूल जायेगा।

तो कृष्ण की कृपा से कब ऐसा दिन होगा, जब मैं गोपी-देह प्राप्त करूँगा और व्रज में निवास करूँगा? कब मैं राधाजी की अनुचरी होकर सर्वदा पारकीय-रासविलासी राधाकृष्ण की परिचर्या करूँगा?

श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी [कह रहे हैं—]

स्थूलदेहादिते आत्म बुद्धि परिहरि। कृष्णकृपाश्रये नित्य गोपीदेह धरि ॥
कबे आमि पारकीयरसे निरन्तर। राधाकृष्ण-सेवा-सुख लभिब विस्तर ॥

इसमें हम लोगों ने मन:शिक्षा से कल जो बतलाया था, [वही सब साधन हैं—]

समं श्रीरूपेण स्मरविवशराधागिरिभृतो—
र्व्रजे साक्षात्सेवालभनविधये तद्गणयुजोः।
तदिज्याख्याध्यानश्रवणनतिपञ्‍चामृतमिदं
धयन्नीत्या गोवर्धनमनुदिनं त्वं भज मनः ॥
श्रीमनःशिक्षा (11)

[हे मेरे प्रिय मन! तुम व्रज में अपने गणों या परिकरों के सहित स्मरविलासपरायण श्रीश्रीराधा-गिरिधारीजी की साक्षात् सेवा प्राप्ति के लिए उनकी पूजा, उनके नाम-रूप-गुण-लीलादि का श्रवण और उन्हें प्रणाम करना—इस पञ्‍चामृत को श्रीरूप गोस्वामी के द्वारा प्रदर्शित परिपाटी के साथ पान करते हुए भक्ति की रीति से प्रतिदिन श्रीगोवर्धन का सेवन करो।] GVP

साधुसङ्ग, नामकीर्तन, भागवतश्रवण।
मथुरावास, श्रीमूर्तिर श्रद्धाय सेवन॥
सकलसाधन-श्रेष्ठ एइ पञ्‍च अङ्ग।
कृष्णप्रेम जन्माय एइ पाँचेर अल्प सङ्ग॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (22.125-126)

[साधुसङ्ग, नामकीर्तन, भागवत-श्रवण, मथुरावास और श्रीमूर्ति की श्रद्धापूर्वक सेवा, समस्त प्रकार के साधन-अङ्गों में ये पाँच अङ्ग सबसे श्रेष्ठ हैं। इन पाँचों के अल्पसङ्ग से ही श्रीकृष्णप्रेम उत्पन्न हो जाता है।] IGVP

ये सब साधन हैं। तो भजनरहस्यवृत्ति में बतला रहे हैं—

साधक के हृदय में जब तक देहात्मबुद्धि है, तब तक वह भजन-राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। अनर्थ इसीमें हैं—देहात्मबुद्धि। समस्त प्रकार के शरीरगत अभिमान [अर्थात्] मैं ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, मैं गुणी हूँ, मैं सु‍न्दर हूँ, धनी हूँ, पण्डित हूँ इत्यादि का परित्यागकर तृणादपि सुनीच होकर अत्य‍न्त आर्त्तिपूर्वक प्रार्थना करें। यदि ऐसा हो जाता है, तो और कोई समस्या ही नहीं रह जायेगी। तब तो वह रूप-रधुनाथ की भाँति भजन करने लग जायेगा। इसलिये देहात्मबुद्धि छोड़कर ‘तृणादपि सुनीच’— इस भाव के साथ में अति आर्त्तिपूर्वक प्रार्थना करें, तभी कृष्ण की प्राप्ति सम्भव है।

समस्त प्रकार के अनर्थ, अपराध, अभिमान केवल सत्सङ्ग के द्वारा ही दूर हो सकते हैं, और कोई उपाय नहीं है। सत्सङ्ग में हरिकथा [श्रवण करो] और उनसे प्रेरणा ले करके उसका पालन करो, उसका साधन करो। रो-रोकर आर्त्त और दीन स्वर में प्रार्थना करो— “हे कृष्ण! हे राधे! आपकी ऐसी कृपा कब होगी कि मैं व्रज में विहारकर, निवासकर राधाजी की दासी की दासी की दासी बनूँ, और व्रज में निवास करूँ तथा नित्यकाल पारकीयरस से राधाकृष्ण के विलास में दिनरात परिचर्या करूँ— “गोपी देहे व्रजे वसाम्यहम्।”

ऐसी आर्त्तियुक्त कातरता के सहित प्रार्थना से राधाजी की सखी—नित्यसिद्धा व्रजगोपियों की कृपा से हृदय में गोपीभाव उदित हो सकता है। पहले तो लोभ होगा और लोभ के बाद में प्रार्थना करते-करते ऐसा भाव उदित होगा। गोपीभाव के बिना राधाकृष्ण की निभृत-निकुञ्‍ज-केलि-विलास-भूमि—वृन्दावनधाम प्राप्त नहीं होगा। [वृन्‍दावन में] हमारे सम्प्रदाय के लोग हैं, अन्य सम्प्रदायों के भी लोग हैं, कि‍न्तु जब तक यह भाव नहीं आयेगा, तब तक शुद्धरूप में व्रजवास नहीं होगा। इस भाव की प्राप्ति राधाजी की अ‍न्तरङ्गा सखियों के आनुगत्य से होगी। राधाजी की अत्यन्‍त प्रिय, अ‍न्तरङ्ग सखियाँ ललिता, विशाखा, मञ्‍जरी इत्यादि हैं। इनकी कृपा से ही होगा। इनके आनुगत्य रूप में सेवा करने से, साधन करने से [ही होगा।] सखीवृन्द के अतिरिक्त इस लीला में किसीका प्रवेश नहीं है। वे ही लीला का विस्तार करती हैं तथा आस्वादन करती हैं। उन्हींकी कृपा से एकादश-भाव और पञ्‍चदशा उत्पन्न होती है, अन्यथा नहीं हो सकती।

युगल चरण सेवि निरन्तर एइ भावि
अनुरागी थाकिबो सदाय।
साधने भाविबे जाहा सिद्धदेहे पाबो ताहा
रागपथेर एइ से उपाय ॥
-श्रीप्रेमभक्तिचन्द्रिका, रागेर भजन पथ, श्लोक 8

[श्रीश्रीराधा-कृष्ण के युगल चरणों की निरन्तर सेवा करने का यही मेरा भाव रहे, और मैं सदा उसी सेवा-भाव में अनुरक्त रहूँ। साधना-अवस्था में जिस सेवा-भाव का चिन्तन और अभ्यास किया जायेगा, सिद्ध-देह प्राप्त होने पर उसी सेवा का अधिकार प्राप्त होगा। यही रागमार्ग का वास्तविक उपाय है।]

“पारकीया रसे सदा”—शास्त्रों में व्रज के पारकीय रस की सर्वोत्तमता निर्धारित की गयी है। स्वकीय भाव से राधाकृष्ण युगल की सेवा नहीं होती है, बल्कि गोलोक की प्राप्ति होती है तथा पारकीय भाव से राधाकृष्ण की निकुञ्‍ज सेवा, व्रजस्थली वृन्दावन की प्राप्ति होती है। इनमें उल्लास-रतियुक्ता मञ्‍जरी सखियाँ ही सर्वोत्तम हैं। वे निकुञ्‍ज-रसकेलि लीलाविलास में निसंकोच रूप से राधाकृष्ण की सेवा करती हैं।

You can explain…

भक्त: स्वकीय भाव गोलोक वृन्दावन में है?

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गोलोक में है। वृन्दावन कहना भूल (mistake) है।

[11.39-21:16 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

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