Sri Bhajana Rahasya (6): Radhya-dasyam, the Ultimate Goal of the Gaudiyas
32:27This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Explanation from Sri Radha-rasa-sudha-nidhi by Srila Prabhodhananda Sarasvati.
- Asa-bandha is developed in mahabhava situation.
- The goal of gaudiya-vaisnavas is to become the servant of Srimati Radharani.
- Srila Prabhodhananda Sarasvati instructs how the practitioner should do bhajana.
- Dhanistha keeps the prasadam and distributes it among the gopis.
- Krsna-seva will flourish in our heart by the happiness of Srimati Radharani.
Transcript
श्रीभजनरहस्य (6) : राधा-दास्यम्—गौड़ीय वैष्णवों का परम अभीष्ट
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 21 नवम्बर 2004 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भजन-रहस्य [पञ्चमयाम-साधन की श्लोक] संख्या 13—
आशास्य दास्यं वृषभानुजाया स्तीरे समध्यास्य च भानुजायाः।
कदा नु वृन्दावनकुञ्जवीथिष्वहं नु राधे ह्यतिथिर्भवेयम्॥
-श्रीराधारससुधानिधि (198)
[हे राधे! हे वृषभानुनन्दिनी! तुम्हारा किंकरीत्व प्राप्त करने की आशा से मैं यमुना-तीरपर स्थित होकर वृन्दावन कुञ्जपथ की अतिथि कब बनूँगी?] GVP
हे राधे! हे वृषभानुनन्दिनी! तुम्हारा किंकरीत्व पाने के लिए, तुम्हारी दासी होने की आशा से, मैं यमुना के तीर पर स्थित होकर वृन्दावन के कुञ्ज के पथ की अतिथि कब बनूँगी? हे राधिके! मैं तुम्हारी दासी बनना चाहती हूँ। कब मेरा ऐसा सुयोग होगा कि यमुना के किनारे स्थित होकर, मैं कुञ्जपथ पर तुम्हारी सेवा करूँगी अर्थात् मैं तुम्हें अभिसार कराऊँगी?
वृषभानु कुमारीर हइब किंकरी। कलिन्द नन्दिनी तीरे रब वास करि ॥
करुणा करिया राधे ए दासीर प्रति। वृन्दाटवी-कुञ्जपथे हइब अतिथि ॥
भजनरहस्यवृत्ति [में कह रहे हैं—] हे वृषभानुनन्दिनी! मेरे मन में बहुत दिनों से यह आशा उदित हो रही है कि यमुना के तट पर वृन्दावन की कुञ्जवीथियों में होकर जब आप अभिसार के लिए गमन करेंगी तब क्या आप मेरे नयनपथ की अतिथि होंगी? अर्थात् क्या अभिसार करते हुए मैं आपको देख सकूँगी, आपकी सेवा कर सकूँगी?
प्रबोधानन्द सरस्वतीपादजी ने स्वामिनीजी की सेवा का स्मरण करते हुए अत्यन्त अधीर दशा में इस श्लोक की रचना की है। लीला-माधुरी की स्मृति तथा सेवा के अभाव में उनके चित्त में विपुल आर्त्ति उत्पन्न होती है, कातरता प्रकट होती है और उत्कण्ठा [तीव्र हो] जाती है।
लीलामाधुरी के आस्वादन में वे अपनी अयोग्यता [का अनुभव करते हैं।] जब अपनी योग्यता का विचार करते हैं, [तो यही अनुभव होता है—] “योग्यता विचारे किछु नाहि पाय”—अर्थात् मेरी कोई योग्यता ही नहीं है। किन्तु [सेवा की प्रबल] लालसा है। इसी कारण वे असह्य दुःख से छटपटा रहे हैं। साधक को ऐसा ही होना चाहिये।
किन्तु स्वामिनीजी की सेवा-प्राप्ति की दृढ़ आशा उनके हृदय में सञ्चरित हो रही है। जातरति अर्थात् जिस भक्त की रति उत्पन्न हो गयी है, उसका यह लक्षण है। प्रबोधानन्द सरस्वती तो उनके नित्य परिकर हैं, वे तुङ्गविद्याजी हैं। तथापि जब वे साधकोचित भाव से भजन करते हैं, तब साधक-दृष्टि से उन्हें जातरति ही कहना पड़ेगा।
क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता।
आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः।।
आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले।
इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावांकुरे जने।।
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (1.3.25-26)
[क्षान्ति (क्षमा), अव्यर्थकालत्व अर्थात् ऐसा यत्न जिससे कि कृष्णसेवा के अतिरिक्त समय व्यर्थ न हो, विरक्ति अर्थात् कृष्णेतर वस्तुओं से वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् अपना सम्मान न चाहना, आशाबन्ध अर्थात् भगवत् प्राप्ति की दृढ़ आशा तथा साधन में उत्कण्ठा, सर्वदा कृष्णनाम-संकीर्तन में रुचि, कृष्ण की लीला कथाओं के वर्णन में आसक्ति और कृष्ण की लीलास्थलियों में प्रीति—ये छह प्रकारके अनुभाव भावांकुर होनेपर मनुष्य के स्वभाव में दिखाई देते हैं।] GVP
जब रति अंकुरित होती है, तो ऐसा ही होता है। आशाबन्ध की चरमावस्था महाभाव में होती है। यह आशाबन्ध चरमावस्था में कहाँ होगी? महाभाव दशा में। व्रजदेवियों का आशाबन्ध अवर्णनीय है। व्रजवासियों का, व्रजदेवियों का, गोपियों का आशाबन्ध अवर्णनीय है। सुदीर्घ कृष्ण-विरह की दशा में भी वे सेवा-प्राप्ति की आशा में किस प्रकार प्राण धारण करती हैं, कृष्ण के वचनों पर विश्वास करती हैं—
आयास्ये भवतो गेहमहमार्य समन्वितः।
यदुचक्रद्रुहं हत्वा वितरिष्ये सुहृत्प्रियम् ॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.41.17)
[भगवान् श्रीकृष्णने कहा—चाचाजी! मैं आर्य बलदेव के साथ आपके घर बाद में आऊँगा, सर्वप्रथम मेरा कर्तव्य है—यदुवंशियों के परम द्रोही कंस का वध करके अपने बान्धवों एवं सुहृदों को आनन्द प्रदान करना।] GVP
प्रबोधानन्द सरस्वतीजी इसमें श्रीमद्भागवत के एक श्लोक [का भाव प्रस्तुत कर] रहे हैं। वे राधाजी के चरणों में प्रार्थना कर रहे हैं— “हा राधे! हा वृषभानुनन्दिनी! तुम्हारे किंकरी-पद प्राप्ति की आशा में मैं कब यमुना के तट पर वृन्दावन के कुञ्जपथ की अतिथि बनूँगी? हा राधे! तुम वृषभानुनन्दिनी हो, वृन्दावन की अधीश्वरी हो।”
कृष्ण वृन्दावन के अधीश्वर नहीं हैं। राधाजी रासरासेश्वरी भी हैं और साथ-साथ वृन्दावन की अधीश्वरी भी हैं।
[हे राधे! तुम] विपुल करुणा की निधि हो, इसलिये मुझ दीन-हीन की उपेक्षा मत करना। अपने प्राण प्रियतम के साथ निकुञ्जलीला-सेवा में मुझे दासी [के रूप में] नियुक्त कर दो।
जिसके [हृदय में] रति का उदय हो चुका है, वह इसी प्रकार प्रार्थना करता है। जब तुम प्रेमानुराग में भरी अपने प्राणनाथ के निकट अभिसार के लिए वृन्दावन के निकुञ्ज की ओर गमन करोगी, तब तुम्हारे आगमन पथ पर कुञ्जवीथी (कुञ्जों के मध्य स्थित पथ) में यमुना तट पर तुम्हारी यह अकिञ्चन अतिथि [स्थिर] होकर बैठी रहेगी और तुम्हारी कृपा प्राप्त किये बिना वहाँ से नही हटेगी। तुम्हें कृपा करनी ही पड़ेगी।
अपनी इस दीन अतिथि को कुञ्जवीथी में इस प्रकार देखकर तुम्हारे मन में करुणा का सञ्चार होगा। हे स्वामिनी! तुम कृष्ण प्रियतमा हो, उनकी आराधिका हो, अपने प्राणप्रियतम की आराधना में यत्किञ्चित मुझे सेवा का अवसर अवश्य प्रदान करना।
मैं अपनी जीवनसन्ध्या में, जीवन के अन्तिम समय में तुम्हारी कृपायाची भिक्षुक हूँ। मुझे अपना निःशुल्क दासीत्व प्रदान करो। यदि मुझे वञ्चित करोगी, तो तुम्हारे नामपर कलंक लगेगा। इस कलंक को मैं सहन नहीं कर पाऊँगी।
इस प्रकार राधारससुधानिधि में प्रबोधानन्द सरस्वती यह भावना व्यक्त कर रहे हैं।
[9.18-15.58 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जिसको रति उत्पन्न हो गयी है, जिसके हृदय में शुद्धसत्व उदित हो गया है, वे क्या साधन करेंगे—इसी का इङ्गित अपने जीवन में आचरण करके प्रबोधानन्द सरस्वतीजी दे रहे हैं—
ध्यायन्तं शिखिपिच्छमौलिमनिशं तन्नाम संकीर्तयन्-
नित्यं तच्चरणाम्बुजं परिचरन्तन्मन्त्रवर्यं जपन्।
श्रीराधापददास्यमेव परमाभीष्टं हृदा धारयन्
कर्हि स्यां तदनुग्रहेण परमाद्भुतानुरागोत्सवः॥
-श्रीराधारससुधानिधि (259)
[अपना अभीष्ट श्रीराधापद-दास्य हृदय में धारणकर शिखिपिच्छमौलि श्रीकृष्ण का सर्वदा ध्यान करूँ, सर्वदा उनका नाम कीर्तन करूँ, उनके चरणकमलों की नित्य परिचर्या करूँ और उनके श्रेष्ठ मन्त्र का नित्य जप करूँ। वे किसी भी क्षण मुझपर अनुग्रह करके अनुरागोत्सव प्राप्त करायेंगी।] GVP
“श्रीराधापददास्यमेव परमाभीष्टं हृदा धारयन्” — राधाजी का दास्य ही हमारा अभीष्ट है। हम यही चाहते हैं कि राधाजी के चरणों की दासी बन जायें। इसी भाव को हृदय में धारण करके शिखिपिच्छमौलि का सर्वदा ध्यान करना चाहिये। उनका ध्यान करूँ, वे ऐसा स्वयं कह रहे हैं। कैसे ध्यान करूँ? राधाजी के पद (चरणों) की दासी मैं बन जाऊँ। यही गौड़ीय वैष्णवों का अभीष्ट है। किन्तु शिखिपिच्छमौलि का सर्वदा ध्यान करूँ, सर्वदा उनका नाम-कीर्तन करूँ, उनके चरणकमलों की नित्य परिचर्या करूँ और [उनके] श्रेष्ठ मन्त्र का जप करूँ। वे किसी भी क्षण मुझपर अनुग्रह करके अनुरागोत्सव प्राप्त करायेंगी।
तात्पर्य क्या है? श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती इस कीर्तन के द्वारा बता रहे हैं कि साधक को राधाजी के पद-दास्य अर्थात् उनके चरणों की दासी बनने के लिए कैसे भजन करना चाहिये। गौड़ीय वैष्णवों की एकमात्र कामना और [परम] अभीष्ट वस्तु राधा-पद-दास्य की ही [प्राप्ति], अर्थात् राधाजी की दासी बनना ही है। उनके कृष्ण-भजन का लक्ष्य भी इसी अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति है, और कुछ नहीं। उनके भजन का मूल मन्त्र क्या है?
मदीशानाथत्वे व्रजविपिनचन्द्रं व्रजवने-
श्वरीं तां नाथत्वे तदतुलसखीत्वे तु ललिताम्।
विशाखां शिक्षालीवितरणगुरुत्वे प्रियसरो-
गिरीन्द्रौ तत्प्रेक्षाललितरतिदत्वे स्मर मनः॥
-श्रीमनः शिक्षा (9)
[हे मन! तुम वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्ण को मेरी स्वामिनी श्रीराधिका के प्राणनाथ रूप में, वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिका को मेरी स्वामिनी रूप में, श्रीललिताजी को स्वामिनी श्रीराधिकाजी की अतुलनीय सखी रूप में, श्रीविशाखाजी को श्रीयुगल-सेवा परिपाटी की शिक्षा देनेवाली गुरुरूप में तथा श्रीराधाकुण्ड और गिरिराज गोवर्धन— इन दोनों को श्रीराधाकृष्ण का दर्शन करानेवाले तथा उनके श्रीचरणकमलों में मनोहर रतिप्रदाता के रूप में सदा-सर्वदा स्मरण करो।] GVP
‘मदीशानाथत्वे’ [का अर्थ है कि] कृष्ण से [हमारा] कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। ‘मद्-ईशा’ अर्थात् मेरी स्वामिनी, मेरी इष्टदेवी राधाजी हैं; और राधाजी के ही प्राणनाथ विपिनचन्द्र कृष्णचन्द्र हैं। [अतः हमें] इसी रूप में उनका ध्यान करना चाहिये।
इस श्लोक में भी परम अभीष्ट सम्पद राधादास्य को हृदय में रखकर शिखिपिच्छमौलि कृष्ण का चिन्तन करें। कृष्ण का चिन्तन किसलिये करें?
श्यामसुन्दर शिखण्डशेखर स्मेरहास मुरलीमनोहर।
राधिकारसिक मां कृपानिधे स्वप्रियाचरणकिंकरीं कुरु ॥
-श्रीराधा प्रार्थना चतुःश्लोकी (2)
[हे श्यामसुन्दर! हे शिखण्डशेखर! हे मधुर-मन्दहास से शोभायमान! हे मुरलीमनोहर! हे श्रीराधिका के रसिक शिरोमणि! हे कृपानिधे! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं आपकी परम प्रिया श्रीराधिका के श्रीचरणों की किंकरी बन सकूँ।]
प्राणनाथवृषभानुनन्दिनी-श्रीमुखाब्ज-रसलोलषट्पद।
राधिकापदतले कृतस्थितिं त्वां भजामि रसिकेन्द्रशेखर ॥
-श्रीराधा प्रार्थना चतुःश्लोकी (3)
[हे रसिकेन्द्र-शेखर श्रीकृष्ण! आप श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीराधाजी के श्रीमुख-कमल के मधुर रस का निरन्तर आस्वादन करने वाले भ्रमर के समान हैं। मैं आपकी उपासना करता हूँ। कृपा करके मुझे श्रीराधाजी के चरण-कमलों में स्थायी स्थान प्रदान कीजिये।]
संविधाय दशने तृणं विभो प्रार्थये व्रजमहेन्द्रनन्दन।
अस्तु मोहन तवातिवल्लभा जन्मजन्मनि मदीश्वरी प्रिया ॥
-श्रीराधा प्रार्थना चतुःश्लोकी (4)
[हे व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण! दाँतों में तिनका दबाकर मैं आपसे अत्यन्त विनीत भाव से एक ही प्रार्थना करता हूँ—हे मनमोहन! आपकी सर्वप्रिय श्रीराधिका ही जन्म-जन्मान्तर तक मेरी आराध्या, मेरी स्वामिनी और मेरी सर्वस्व बनी रहें।]
इस प्रकार से हमारे हृदय में [यही भाव रहे कि] मैं राधाजी की दासी हो करके उनकी सेवा कर सकूँ। आपकी प्रियतमा राधाजी ही हमारी इष्टदेवी हैं। मैं जन्म-जन्मान्तर उनकी सेवा कर सकूँ। कृष्ण से यही [प्रार्थना] करते हुए उनका चिन्तन करो।
कैसे चिन्तन करेंगे? कृष्ण का चिन्तन [इस प्रकार] करेंगे कि कृष्ण को कुञ्ज में आने में कुछ विलम्ब हो गया है। राधाजी वासकसज्जा बनकर उत्कण्ठित हो करके उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं। कुछ देर से आने पर राधाजी मानिनी हो गयीं। अपनी प्रिया की प्रसन्नता के लिए श्यामसुन्दर उनके चरणों में शीश नवा रहे हैं। मुरली भी वहाँ रख रहे हैं, और उनका शिखिपुच्छ-मुकुट भी किशोरीजी के चरणों में भू-लुण्ठित हो रहा है। “स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं’ [#1]— ऐसी मेरी स्वामिनीजी के वशीभूत कृष्ण धीरललित नायक हैं। ऐसे कृष्ण का ध्यान करो, जो राधाजी [के अधीन हैं, सदैव मेरी] स्वामिनी से युक्त हैं। जो जातरति साधक हैं, वे इस प्रकार ध्यान करेंगे।
[श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती] कहते हैं कि मेरे हृदय में ऐसा श्रेष्ठ राग उत्पन्न करें और सचमुच मेरी यह दशा हो। मैं इसी परम सु-रसाल कृष्णसंकीर्तन में निमग्न रहूँ, ऐसा कीर्तन मैं करूँ।
श्रीरघुनाथदास गोस्वामीजी भी ऐसी ही प्रार्थना करते हैं— “राधानाम अत्यन्त सुन्दर अमृत के समान मनोहर है और उसमें कृष्ण का नाम दुग्ध की भाँति अत्यन्त सुस्वादु है। हे मेरी क्षुधार्त रसने! इन दोनों अपूर्व वस्तुओं को सुगन्धि अनुरागरूपी हिम के द्वारा रमणीयकर सर्वदा पान करो।” वे कह रहे हैं कि इनको अपनी जिह्वा को पान [कराओ।] राधानाम तो बहुत सुन्दर है, अमृत से भी [अधिक] मनोहर है; और कृष्ण का नाम कैसा है? घना दुग्ध। हे रसने! इन दोनों को मिला करके सुगन्धि अनुरागरूपी हिम के द्वारा, अर्थात् अनुराग से भरकर सर्वदा पान करो। स्वामिनीजी की आराधना कृष्ण चरणकमलों की परिचर्या, कृष्ण के प्रसाद और निर्माल्य द्वारा करूँ। स्वामीजी की आराधना कैसे करूँ? कृष्ण के चरणों की परिचर्या और कृष्ण के प्रसाद और निर्माल्य के द्वारा करूँ।
जो राधाजी के [साथ] घर नहीं जाकर [नन्दभवन में रुककर] कृष्ण की सेवा करती हैं, उन सखी का क्या नाम है? कुन्दलता?
भक्त: धनिष्टा
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: धनिष्टाजी। धनिष्टाजी क्या करती हैं? [वे कृष्ण] का प्रसाद रख देती हैं और राधाजी की कोई सखी आती है, तो वे उसे [प्रसाद,] निर्माल्य इत्यादि दे देती हैं और [फिर राधाजी उसे] सखियों में बाँट करके खाती हैं।
तो इस तरह से मैं राधाजी की सेवा करूँ। नित्यसखी, प्राणसखी कृष्ण की सेवा इसी भावना से करती हैं कि वे कृष्ण सेवा से प्राप्त उपहार, निर्माल्य इत्यादि को स्वामिनीजी को अर्पण करें।
इसलिये वे नन्दभवन में जाती हैं और वहाँ से ये सब वस्तुएँ लेकर [आती हैं] और राधाजी को अर्पण करती हैं। राधाजी सब सखियों के साथ मिल करके प्रसाद लेती हैं।
प्राणनाथ की व्यवहारित वस्तुएँ प्राप्तकर स्वामिनीजी को अत्यन्त ही प्रसन्नता होगी। मदीय ईश्वरी की प्रसन्नता से ही मेरे हृदय में कृष्ण-सेवा के प्रति परम अनुराग उत्पन्न होगा—स्वतन्त्र रूप में नहीं।
[24:43-32:27 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पद-पल्लवमुदारम्।
ज्वलति मयि दारुणो मदन-कदनानलो हरतु तदुपाहितविकारम्॥
-श्रीगीतगोविन्दम् (10.8)
हे प्रिये! अपने मनोहर चरण किसलय को मेरे मस्तक पर आभूषण-स्वरूप अर्पण कराओ। जिससे मुझे जर्जरित करनेवाला यह अनङ्गरूप गरल प्रशमित हो जाय, मदन यातना रूप निदारुण जो अनल मुझे सन्तप्त कर रहा है, उससे वह दाहजन्य उत्पन्न विकार भी शान्त हो जाये। (GVP)
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