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Sri Bhajana Rahasya (7): Praying for Radha-dasyam

36:22
#442
Govardhana
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 25%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Srila Prabhodananda Sarasvati's prayer for Radharani's darsana and to become her maidservant.
  • If the sadhaka constantly chants the mantra given by Sri Guru, he will definitely know his svarupa.
  • Explanation of svarupa-siddhi and vastu-siddhi
  • Radharani is the vilasa-murti of Krsna
  • Radharani is ‘dhiradhira nayika’ and Krsna is ‘dhiralalita nayaka’
  • Meaning of 'kinkari'
  • Kamanuga-bhakti which is done under the guidance of vraja-devis

Transcript

श्रीभजनरहस्य (7) : राधा-दास्यम् के लिए प्रार्थना

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 21 नवम्बर 2004 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भजन-रहस्य [पञ्‍चमयाम-साधन का] पन्द्रहवाँ श्लोक—

श्रीराधारससुधानिधि में श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीजी बतला रहे हैं—

तस्या अपाररससारविलासमूर्ते-
रानन्दकन्दपरमाद्भुतसौख्यलक्ष्म्याः।
ब्रह्मादि दुर्लभगतेर्वृषभानुजायाः
कैंकर्यमेव मम जन्मनि जन्मनि स्यात्।।
-श्रीराधारससुधानिधि (40)

[जो अपार रससार श्यामसुन्दर की विलासमूर्ति हैं, श्रीकृष्ण की परमाद्भुत सौख्य लक्ष्मी हैं तथा ब्रह्मादि के लिए सुदुर्लभ हैं, उन्हीं श्रीवृषभानु राजनन्दिनी का दासीत्व मुझे जन्म-जन्मान्‍तरों तक प्राप्त हो।] GVP

यहाँ प्रबोधानन्द सरस्वतीजी कह रहे हैं कि जो अपार रससार, श्यामसुन्दर की विलासमूर्ति हैं, कृष्ण की परमाद्भुत सौख्यमयी लक्ष्मी हैं, तथा जिनका दर्शन ब्रह्माजी के लिए भी दुर्लभ है, उन्हीं वृषभानु राजनन्दिनी का दासीत्व मुझे जन्मों-जन्मों तक प्राप्त हो सके।

श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीजी प्रार्थना में कह रहे हैं—

अपार रसेर सार विलास मूरति। परम अद्भुत-सौख्य-आनन्द निर्वृत्ति।।
ब्रह्मादिर सुदुर्लभ वृषभानुकन्या। जन्मे जन्मे तार दास्ये हइ येन धन्या।।

तो यहाँ श्रीराधारससुधानिधि के प्रणेता श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीजी बड़े आर्तस्वर से राधाजी की दासी बनने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। इस प्रार्थना की उपलब्धि स्थूल देह में कभी सम्भव नहीं है। स्थूल देह में यह प्रार्थना सम्भव नहीं है। राधाजी की दासी हो करके उनकी सेवा करना स्थूल देह के द्वारा सम्भव नहीं है। विशेषरूप में राधाजी की सेवा पुरुष रूप में तो सम्भव ही नहीं है। और गोपी रूप इस समय तो होगा नहीं। इसलिये [साधन में कुछ उन्नत होने पर, श्रीगुरु के निर्देश पर जब साधक] सिद्धदेह के अनुसार भावना करके यदि करेगा, तो उसके लिए अभी [यह रागानुगा] साधन है और इसकी साक्षात् प्राप्ति साधना के बाद सिद्धि के समय होगी।

गुरु-प्रदत्त-मन्त्र—गुरुजी ने ब्रह्मगायत्री से लेकर हरिनाम तक जो मन्‍त्र दिये हैं—गुरुमन्त्र, गुरुगायत्री, गौरमन्त्र, गौरगायत्री, गोपालमन्त्र, कामगायत्री, पञ्‍चतत्त्व तथा हरिनाम—उनका निरन्तर जप करने से साधक को अपने स्वरूप की प्राप्ति होती है। यदि [वह विधिपूर्वक इनका जप] करे तो, [इसकी प्राप्ति होती है।] इसमें कितने जन्म लग सकते हैं? यदि दो-चार जन्मों में भी [यह प्राप्त] हो जाये, तो यह बहुत शीघ्र ही है।

यहाँ दो प्रकार की सिद्धियाँ हैं—एक वस्तुसिद्धि और दूसरी स्वरूपसिद्धि। स्वरूपसिद्धि तो कुछ दिनों के बाद में हो जायेगी, किन्तु वस्तुसिद्धि एक-दो जन्मों में होने वाली बात नहीं है। जब साधक को अपने स्वरूप की सिद्धि अथवा उपलब्धि होगी, तब उसके हृदय में स्वामिनीजी के प्रति प्रगाढ़ अनुराग उत्पन्न होगा तथा उस समय राधिकाजी के माधुर्य की स्फूर्ति होगी। मैं समझता हूँ कि रति (भाव) उत्पन्न होने के पहले यह सम्भव नहीं है।

श्रीराधाजी श्यामसुन्दर की विलासमूर्ति स्वरूप हैं। जितना भी विलास है, वह सब राधाजी के साथ ही है अथवा विलास की मूर्ति राधाजी ही हैं। यदि राधाजी न रहें, तो विलास [भी सम्भव] नहीं है। कुञ्‍ज में श्रीराधा का घनरस स्वरूप प्रकाशित हो उठता है तथा अखिलरसामृतमूर्ति श्यामसुन्दर उसका आस्वादन करते हैं—यह विलासमूर्ति [का तात्पर्य है।] निखिल रसों का सार राधाजी हैं, वे विलास की मूर्ति हैं। यहाँ तक कि महाभाव तथा उसके बाद मोहन, मोदन और उनके भी ऊपर मादन तक के जो भाव हैं, वे कृष्ण के विलासमूर्ति हैं। यही माधुर्य रस का सार है।

राधाजी का मादनाख्य प्रेम, आनन्द के घनविग्रह गोविन्द के चित्त में छिपे सम्भोग-आनन्द को उच्छ्‍वलित कर उन्हें किसी भी प्रकार अपनी प्रिया से मिलने के लिए विवश और व्याकुल कर देता है। इसलिये कृष्ण कभी-कभी बरसाना आदि [स्थानों] में तथा कभी जावट में भी स्त्रीवेश धारण करके उनसे मिलने के लिए प्रयत्न करते हैं। [इतना ही नहीं, वे] कभी-कभी सखियों के चरणों में प्रणत होते हैं [और उनसे प्रार्थना करते हैं—] “मुझे राधिकाजी से मिलने दो।”

स्वामिनीजी भी मिलन के सुख में गोविन्द को उनकी सम्भावना से अधिक अर्थात् कृष्ण जैसा सोचते हैं, उससे भी अधिक वे उन्‍हें सम्भोगरस आनन्द प्रदान करती हैं।

रात्रिदिन कुञ्‍जे क्रीड़ा करे राधा सङ्गे।
कैशोर वयस सफल कैल क्रीड़ा रङ्गे।।
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (8.188)

[श्रीकृष्ण रात में और दिन में भी श्रीराधा के साथ कुञ्‍ज में विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हैं और इस प्रकार उन्‍होंने क्रीड़ारङ्ग में अपनी कैशोरावस्था को सफल किया है।] IGVP

दिन-रात कुञ्‍जों में, विशेष करके गोवर्धन के कुञ्‍जों में और-और जो सब कुञ्‍ज हैं, वहाँ विहार करते हैं। इसी प्रकार उन्‍होंने क्रीड़ा में अपना कैशोर वयस सफल किया है।

श्रीराधा आनन्दकन्द व्रजचन्द्र कृष्ण की ह्लादिनी स्वरूपशक्ति ‘धीराधीरा नायिका’ (धीरा+अधीरा) हैं। और कृष्ण क्या हैं? वे ‘धीरललित नायक’ हैं। राधाजी ‘धीराधीरा’ हैं। ललिताजी ‘प्रखरा’ हैं, किन्तु विशाखाजी ‘धीराधीरा’ हैं। वे [राधाजी के] अधीन हैं, वैसे ही अनुगत हैं। इसलिये विशाखाजी के राधाजी से सभी भाव मिलते हैं, उम्र भी मिलती है। इसलिये कहा है न— “ललितासखि! गुणरमितविशाखे” [#1]

इसलिये नन्दनन्दन पूर्णरूप से राधिकाजी के वशीभूत हैं। [राधिकाजी के अतिरिक्त] मादनाख्य भाव किसीमें नहीं है। [कृष्ण] अन्य भक्तों के भी वशीभूत हैं, किन्तु इतने नहीं, जितने राधिकाजी के हैं—

अनङ्ग–रङ्ग मङ्गल–प्रसङ्ग–भंगुरभ्रुवां
सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाण–पातनैः।
निरन्तरं वशीकृत–प्रतीति–नन्दनन्दने
कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम्॥
-श्रीराधाकृपाकटाक्ष–स्तवराज (3)

प्रेम–क्रीड़ा के रङ्गमञ्‍चपर मङ्गलमय प्रसङ्ग में तिरछी भृकुटी करके, आश्चर्य प्रकट करते हुए सहसा कटाक्षरूपी बाणों की वर्षा से श्रीनन्दनन्दन को निरन्तर वशीभूत करनेवाली हे सर्वेश्वरी राधिके! आप कब मुझे अपनी कृपादृष्टि का पात्र बनायेंगी? (GVP)

श्रीमतीजी आनन्दकन्द श्रीकृष्ण की परम अद्भुत सौख्य लक्ष्मी हैं। नारायण-वक्ष:विलासिनी लक्ष्मीजी चञ्‍चला हैं तथा ऐश्वर्य-गर्वपूर्ण हैं। किन्तु व्रज की प्रेमलक्ष्मी राधिकाजी सौम्य स्वभावयुक्त माधुर्यमयी हैं, तथा सौम्य और धीर स्वभाव की हैं। वे प्रेम में कृष्णमयी, रस में गौराङ्गी, ऐश्वर्य में सर्वलक्ष्मीमयी और माधुर्य में प्रधान-गोपिका हैं।

औरों की बात ही क्या, वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिका तो ब्रह्माजी इत्यादि के लिए भी दुर्गम हैं।

यो ब्रह्म-रुद्र-शुक-नारद-भीष्म-मुख्यै-
रालक्षितो न सहसा पुरुषस्य तस्य।
सद्योवशीकरण-चूर्णमनन्तशक्तिं
तं राधिका-चरणरेणुमनुस्मरामि।।
-श्रीराधारससुधानिधि (4)

[जो ब्रह्मा, शंकर, शुकदेव, नारद, भीष्म आदि प्रमुख महाभागवतों को भी सहज में प्रत्यक्ष गोचर नहीं होते, उन परमपुरुष श्रीकृष्ण को तत्काल वशीकरण करने में समर्थ चूर्णस्वरूप अनन्तशक्तिशाली सुप्रसिद्ध श्रीराधिका की चरणरेणु का मैं निरन्तर स्मरण करता हूँ।]

[वृषभानुनन्दिनी श्रीराधिका] ब्रह्मा, रुद्र, नारद, भीष्म इन सबके लिए दुर्गम गति हैं। व्रज के मधुर रस को समझने में ऐश्वर्यज्ञानयुक्त ब्रह्मा असमर्थ हैं। वे ऐश्वर्यज्ञानयुक्त हैं, इसलिये वे समझने में असमर्थ हैं। इसलिये उनकी क्रीड़ाओं को केवल देखने के लिए वे वृषभानुपुर (बरसाना) में पर्वत हो करके जन्म लिए हैं। ब्रह्माजी तो श्यामसुन्दर की पौगण्ड-लीला को भी नहीं समझ सके तथा गोवत्स, गोपबालकों का अपहरण करके अपराधी बने। फिर निगूढ़ कैशोर-लीला, माधुर्य-लीला को कैसे समझेंगे? इस परम रहस्यमयी निकुञ्‍ज लीला के केलिविलास में सेवा का अधिकार एकमात्र व्रजगोपियों को ही प्राप्त है, और किसी को नहीं। सखियों के आनुगत्य के बिना इस सेवा की प्राप्ति असम्भव है। जिनका गुरु गोपी स्वभाव का हो, तो उसे शिष्य भी वैसे ही मिलेंगे और शिष्य भी यदि वैसा ही [अर्थात् गोपीभाव से भजन करने का अभिलाषी] होगा तो कृष्ण उसको ऐसा ही योगायोग करा देते हैं।

सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति।
सखीभावे ये ताँरे करे अनुगति॥
राधाकृष्ण-कुञ्‍जसेवा साध्य सेइ पाय।
सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (8.203-204)

[सखीभाव के अतिरिक्त अन्य भाववालों का यहाँ प्रवेश नहीं है। जो साधक सखीभाव का आनुगत्य करता है, वही श्रीराधाकृष्ण की कुञ्‍जसेवारूप साध्य-वस्तु की प्राप्ति कर सकता है– इसके अतिरिक्त इस साध्य की प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।] GVP

“सखी बिना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति” — सखियों के बिना इस किशोरलीला में दूसरों की गति नहीं है।

“सखीभावे ये ताँरे करे अनुगति” — सखीभाव से जो उनकी अनुगति करता है, जैसे रूप गोस्वामी और रघुनाथदास गोस्वामी इत्यादि गोस्वामीवर्ग को देखते हैं, उस प्रकार करने से “राधाकृष्णेर कुञ्‍जसेवा-साध्य सेइ पाय” तो साध्य अर्थात् राधाकृष्ण की जो कुञ्‍जसेवा है, उसकी प्राप्ति होगी।

“सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय” — [उस साध्य को प्राप्त करने का] और कोई दूसरा उपाय नहीं है।

किशोरीजी की किंकरियाँ सदैव सेवा में तत्पर रहती हैं। ‘कैंकर्य’ शब्द में सेवा की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति है। कैंकर्य अर्थात् ‘किं करोमि’। कैंकर्य माने क्या? ‘किं करोमि’— मैं क्या सेवा करूँ? मैं क्या सेवा करूँ? मैं कैसी सेवा करूँ? मैं क्या-क्या और सेवा कर सकती हूँ? — इस प्रकार की जिनकी भावना है, उनको ‘किंकरी’ कहते हैं। शुद्ध [राधा]-दास्य या मञ्‍जरी भाव की इसमें अभिव्यञ्‍जना है। मञ्‍जरियों में यही होता है। क्या सेवा करूँ? कैसे सेवा करूँ? वृषभानुनन्दिनी के इसी कैंकर्य की मुझे जन्म-जन्म में प्राप्ति हो।

व्रजदेवियों के आनुगत्य में सेवा करना ही ‘तत्तद्भावेच्छामयी कामानुगा-भक्ति’ है। यही इस श्लोक का गूढ़ तात्पर्य है। व्रजदेवियों के आनुगत्य में सेवा करने का नाम ही है— ‘तत्तद्भावेच्छामयी कामानुगा-भक्ति’। यही इस श्लोक का निगूढ़ तात्पर्य है।

भक्त: रस में गौराङ्गी [का क्या अर्थ है?]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वे प्रेम में कृष्णमयी हो जाती हैं, यह तो ठीक ही है। और रस बढ़ाने में राधिका के रूप में गौराङ्गी हैं अर्थात् रस में गौर-अङ्गवाली हैं। प्रेम में कृष्णमयी अर्थात् जिनके भीतर और बाहर कृष्ण हैं। और रासविलास में गौराङ्गी राधिका के रूप में हैं।

[15:56-24:47 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: राधाजी का एक कीर्तन करो तो।

[24:51-34:04 तक भक्तों द्वारा कीर्तन एवं कुछ घोषणा…]

भक्त: Gurudeva! So I was reading in the morning in Vilāpa-kusumāñjali, verse 60— ‘govardhanād api gurur vraja-vandito yaḥ’ [#2] that when when Rādhikā and Her sakhīs were going to Nandagāon in the morning, hambhārair gavām ‘hambhāraiḥ gavām’ the cows make so much noise; ‘ballavānāṁ kolāhalair vividha-vandi’ and so many sounds are coming from the cowherd boys, and from the singers and the brāhmaṇas chanting mantras. ‘samrājate priyatayā vraja-rāja-sūnoḥ govardhanād api gurur’— [Nandagaon] is greater and ‘priyatayā’ more dear to him than even Govardhana. So?

[गुरुदेव! आज प्रातः मैं विलाप-कुसुमाञ्जलि के श्लोक 60 का अध्ययन कर रहा था—गोवर्धनादपि गुरुर्व्रजवन्दितो यः...उसमें वर्णन है कि प्रातःकाल जब श्रीराधिका अपनी सखियों के साथ नन्दगाँव जा रही हैं, तब गायों के रम्भाने की ध्वनि (हम्भारैर्गवाम्), ग्वालबालों का कोलाहल, वन्दीजनों के स्तुतिगान तथा ब्राह्मणों के मन्त्रपाठ से सम्पूर्ण नन्दगाँव गुञ्जायमान हो रहा है। वहाँ कहा गया है कि श्रीव्रजराजनन्दन को नन्दगाँव गोवर्धन से भी अधिक प्रिय है—“गोवर्धनादपि गुरुः... प्रियतया।” इसका क्या तात्पर्य है?]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: In some cases it is mentioned like that. Everywhere Govardhana is glorified.

[कुछ प्रसङ्गों में ऐसा वर्णन मिलता है। वैसे तो सर्वत्र गोवर्धन की ही महिमा गायी गयी है।]

भक्त: I am thinking that perhaps Rādhikā's mood, and those who are following Rādhikā, have one perspective. But this [verse] is not talking about the mood of Rādhikā or the sakhīs. It is talking about Kṛṣṇa's own mood. Because it says that it is due to Kṛṣṇa, not mentioning that how due to the sakhīs. [It says that Nandagāon is] more than Govardhana, but due to Kṛṣṇa.

[मेरा विचार है कि सम्भवतः श्रीराधिका तथा उनके अनुगामियों की दृष्टि एक प्रकार की है; किन्तु इस श्लोक में तो श्रीराधिका या सखियों के भाव की चर्चा नहीं है। यहाँ तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण के अपने भाव की बात कही गयी है। क्योंकि इसमें यह कहा गया है कि श्रीकृष्ण के लिए नन्दगाँव गोवर्धन से भी अधिक प्रिय है।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: You have to reconcile this, because so many pastimes also [took place] in Nandagāon that never took place at Govardhana. Like Bhramara-gīta.

[इसका समन्वय करना होगा। नन्दगाँव में भी अनेक ऐसी लीलाएँ हुई हैं, जो गोवर्धन पर नहीं हुईं। जैसे भ्रमरगीत का प्रसङ्ग।]

भक्त: Yes. [जी।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Very high, this is the mood of mādana-svabhāva, and also Rādhikā coming to meet Kṛṣṇa.

[वह अत्यन्त उच्च अवस्था है—मादन-स्वभाव का भाव। साथ ही, श्रीराधिका का श्रीकृष्ण से मिलने के लिए नन्दगाँव आना भी उसीमें सम्मिलित है।]

भक्त: Secretly, inside the Nanda-bhavana.

[गुप्तरूप से, नन्दभवन के भीतर?]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Nanda-bhavana. And there Kṛṣṇa becomes so happy. Openly this lila is not in [inaudible]. So on this way, when, in which mood and how what they are telling…

[हाँ, नन्दभवन में। वहाँ श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। यह लीला प्रत्यक्षरूप से [गोवर्धन] में नहीं है। इस प्रकार यह समझना होगा कि किस भाव में और किस प्रसङ्ग में यह वर्णन किया गया है।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
वृषभानूदधि–नवशशिलेखे।
ललितासखि! गुणरमितविशाखे॥
करुणां कुरु मयि करुणाभरिते।
सनक-सनातन–वर्णितचरिते॥
-श्रील रूप गोस्वामी

[श्रीवृषभानु महाराजरूप समुद्रसे उदित नवचन्द्रकला रूपिणि! हे ललिताकी सखि! हे सौहार्द–कारुण्य–कृष्णानुकूल्यादि गुणोंके द्वारा विशाखाको वशीभूत करनेवाली! हे सुकोमल सुहृदयवाली कृपापूर्णे! हे सनक–सनातन द्वारा वर्णित चरितोंवाली श्रीराधे! तुम्हारी जय हो, जय हो। तुम मेरे प्रति करुणा करो।] GVP

#2
हम्बारवैरिह गवामपि बल्लवानां
कोलाहलैर्विविध वन्दिकलावतां तैः।
संभ्राजते प्रियतया व्रजराजसूनो-
र्गोवर्धनादपि गुरुर्व्रजवन्दिताद्यः॥
-श्रीविलापकुसुमाञ्‍जलि (60)

श्रीनन्दनन्दन का अतिप्रिय होने से नन्दीश्वरगिरि व्रजवासियों के पूज्य गोवर्धनगिरि से भी अधिक श्रेष्ठ है। गौओं के हम्बारव से तथा गोपों और विविध कला-कुशल स्तुति-पाठक वन्दीजनों के कोलाहल से वह मुखरित हो रहा है।

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